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महंगे कच्चे तेल का बढ़ा असर, पहली तिमाही में भारत का ऑयल इंपोर्ट बिल 61% उछला

कम मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के बावजूद भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ा. अमेरिका-ईरान तनाव के बीच वैश्विक बाजार में तेल की ऊंची कीमतों का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी का असर भारत के आयात खर्च पर साफ नजर आने लगा है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश का कच्चे तेल का आयात बिल सालाना आधार पर 61% बढ़कर 49.8 अरब डॉलर पहुंच गया. दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान भारत ने पिछले साल की तुलना में कम कच्चा तेल आयात किया, लेकिन ऊंची वैश्विक कीमतों के कारण आयात पर खर्च काफी बढ़ गया.

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में भारत ने 59.8 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 62.6 मिलियन टन था. यानी आयात की मात्रा करीब 4% घट गई, लेकिन कुल आयात बिल 49.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया.

जून महीने में भी यही रुझान देखने को मिला. इस दौरान भारत ने 18.9 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जो एक साल पहले की तुलना में 7% कम है. इसके बावजूद जून का आयात बिल 48% बढ़कर 14.7 अरब डॉलर हो गया.

अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ीं वैश्विक कीमतें

विशेषज्ञों के मुताबिक, आयात बिल बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल रही. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं ने वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया.

अप्रैल और मई के दौरान ब्रेंट क्रूड कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया. अप्रैल में युद्धविराम की खबरों के बाद कीमतें कुछ समय के लिए करीब 90 डॉलर प्रति बैरल तक आईं, लेकिन तनाव बढ़ने पर यह 126 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं. मई में भी कीमतें लंबे समय तक 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहीं.

हालांकि जून में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत घटकर 83.22 डॉलर प्रति बैरल रह गई, लेकिन पूरे तिमाही के दौरान ऊंची कीमतों का असर भारत के आयात बिल पर दिखाई दिया.

भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85% से अधिक हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डालती है.

यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इससे देश का आयात बिल बढ़ सकता है, चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) गहरा सकता है और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है. इसका असर रुपये की विनिमय दर और सरकार के वित्तीय संतुलन पर भी पड़ सकता है.

विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत हर साल करीब 1.8 से 2 अरब बैरल कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की बढ़ोतरी होती है, तो देश का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और वैश्विक मांग पर निर्भर करेगी. यदि तनाव बना रहता है, तो भारत के लिए ऊर्जा आयात लागत और महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ सकता है.
 


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