इस हफ्ते जहां एक इंटीग्रेटेड मार्केटिंग सर्विस मुहैया कराने वाली कंपनी का आईपीओ आ रहा है वहीं दूसरी कैमिकल और तीसरी स्टॉक ब्रोकिंग से जुड़ी कंपनी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पिछले कुछ समय में अलग-अलग कंपनियों के आईपीओ ने बेहतरीन रिटर्न दिया है. इसी का नतीजा है कि ज्यादातर IPO में सब्सक्रिप्शन कई गुना तक देखने को मिल रहा है. इनमें से कुछ ऐसे रहे हैं जिन्होंने मुनाफा दिया है जबकि कुछ ने अपने निवेशकों को फायदा नहीं दिया. इसी कड़ी में आने वाले हफ्ते में कई और कंपनियों के आईपीओ आने जा रहे हैं. आज अपनी इस स्टोरी में हम आपको उन आईपीओ की पूरी जानकारी देने जा रहे हैं.
सबसे पहले आएगा RK Swamy कंपनी का आईपीओ
4 मार्च से शुरू होने जा रहे हफ्ते में सबसे पहले सोमवार को RK Swamy कंपनी का आईपीओ खुलने जा रहा है. ये कंपनी इंटीग्रेटेड मार्केटिंग सर्विस मुहैया कराती है. इस कंपनी के आईपीओ में अगर आप बिड करना चाहते हैं तो आप 4 मार्च से लेकर 6 मार्च तक कर सकते हैं. जबकि एंकर निवेशकों के लिए ये आईपीओ एक मार्च को ही खुल चुका है. कंपनी ने आईपीओ के लिए 270 रुपये से लेकर 288 रुपये तक का प्राइस बैंड रखा है. इसके एक लॉट में 50 शेयर होंगे, इसका मतलब ये है कि एक लॉट की कीमत 14400 है. कंपनी इस आईपीओ के जरिए 424 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी कर रही है. रिटेल निवेशक कम से कम एक और ज्यादा से ज्यादा 13 लॉट के लिए आवेदन कर सकते हैं. कंपनी 173 करोड़ रुपये के नए शेयर जारी कर सकती है.
केमिकल इंडस्ट्री की कंपनी भी ला रही है आईपीओ
इस हफ्ते जहां इंटीग्रेटेड मार्केटिंग सॉल्यूशन वाली कंपनी अपना आईपीओ ला रही है वहीं दूसरी ओर केमिकल इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनी भी अपना पब्लिक ऑफर लेकर आ रही है. केमिकल इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनी (JG Chemicals) का आईपीओ 5 मार्च यानी मंगलवार को खुलने जा रहा है. इस आईपीओ के जरिए कंपनी 251.19 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी कर रही है. कंपनी ने इस आईपीओ के लिए 251 रुपये से लेकर 277 रुपये का रेट तय किया है. अगर आप इसमे आवेदन करना चाहते हैं, तो आप 7 मार्च तक कर सकते हैं. कंपनी 165 करोड़ के फ्रेश शेयर और 86.19 करोड़ रुपये के ऑफर फॉर सेल शेयर जारी कर सकती है. 11 मार्च को शेयरों का अलॉटमेंट और 12 मार्च को रिफंड दे दिया जाएगा.
पुणे ई स्टॉक ब्रोकिंग का आईपीओ आएगा इस तारीख को
आने वाले हफ्ते में जिस तीसरी कंपनी का आईपीओ आएगा उसका नाम पुणे ई स्टॉक ब्रोकिंग है. इसका आईपीओ 7 मार्च को खुलने जा रहा है जबकि ये 12 मार्च को बंद होगा. इस आईपीओ के लिए 78 रुपये से लेकर 83 रुपये का प्राइस बैंड तय किया गया है. हर शेयर की फेस वैल्यू 10 रुपये है. इस आईपीओ के एक लॉट में 1600 शेयर हैं. कंपनी स्टॉक ब्रोकिंग का काम करती है. इसके ग्राहकों में डॉयरेक्टर व्यक्ति और रजिस्टर्ड व्यक्ति दोनों शामिल हैं. कंपनी के ग्राहक दस से ज्यादा शहरों में फैले हुए हैं. दिल्ली और अहमदाबाद में कंपनी के दो ब्रांच ऑफिस भी हैं.
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आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा से जुड़े देशों के निवेश पर लागू 'प्रेस नोट-3' के तहत सरकार अब भी बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में चीन से आए केवल एक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसकी कुल राशि महज 1 करोड़ रुपये रही. वहीं, हांगकांग से आए 13 निवेश प्रस्तावों को स्वीकृति मिली, जिनका कुल मूल्य 610.42 करोड़ रुपये है. ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश पर अब भी कड़ी निगरानी बनाए हुए है.
उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच सरकार ने कुल 63 एफडीआई प्रस्तावों को मंजूरी दी, जिनकी कुल कीमत 10,292.67 करोड़ रुपये (करीब 1.18 अरब डॉलर) रही.
प्रेस नोट-3 के तहत होती है जांच
अप्रैल 2020 में लागू किए गए प्रेस नोट-3 के तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई थी. यह फैसला कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण को रोकने के उद्देश्य से लिया गया था.
मार्च 2026 में सरकार ने इस नियम में आंशिक राहत देते हुए कुछ निवेशों को ऑटोमैटिक रूट के तहत अनुमति दी, लेकिन यह छूट चीन, हांगकांग और भारत की भूमि सीमा साझा करने वाले अन्य देशों में पंजीकृत कंपनियों पर लागू नहीं होती. ऐसे मामलों में अब भी सरकारी मंजूरी जरूरी है.
सिंगापुर रहा सबसे बड़ा निवेशक
मंजूर किए गए प्रस्तावों के मूल्य के आधार पर सिंगापुर सबसे बड़ा निवेश स्रोत रहा. उसके 3,259.88 करोड़ रुपये के पांच प्रस्तावों को मंजूरी मिली. इसके बाद ब्रिटेन के पांच प्रस्ताव (2,477.67 करोड़ रुपये) और थाईलैंड के दो प्रस्ताव (1,600 करोड़ रुपये) स्वीकृत हुए.
भारत में चीन का FDI अब भी बेहद सीमित
DPIIT के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत में कुल एफडीआई इक्विटी निवेश में चीन की हिस्सेदारी केवल 0.32 प्रतिशत रही. इस अवधि में चीन से 2.51 अरब डॉलर (करीब 16,162.25 करोड़ रुपये) का निवेश आया, जिससे वह निवेश करने वाले देशों की सूची में 23वें स्थान पर रहा.
वहीं, हांगकांग 15वें स्थान पर रहा. इस अवधि में वहां से 4.91 अरब डॉलर (करीब 31,220.30 करोड़ रुपये) का निवेश भारत आया, जो कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह का 0.62 प्रतिशत है.
पिछले वित्त वर्ष में भी यही रुझान
वित्त वर्ष 2024-25 में भी सरकार ने चीन के केवल एक एफडीआई प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिसकी कीमत 28.71 करोड़ रुपये थी. उस वर्ष सरकारी मार्ग के तहत कुल 82 निवेश प्रस्तावों को स्वीकृति मिली थी, जिनका मूल्य 39,758 करोड़ रुपये था. इनमें हांगकांग के 11 प्रस्ताव शामिल थे, जिनकी कुल कीमत 1,225.28 करोड़ रुपये थी.
नए ऑर्डर और भर्ती में सुस्ती, जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग PMI अगस्त 2021 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जुलाई में भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार धीमी पड़ गई. HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 53.5 पर आ गया, जो अगस्त 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है. नए ऑर्डर, कच्चे माल की खरीद और भर्तियों की गति कमजोर रहने से फैक्ट्री गतिविधियों में सुस्ती देखने को मिली, हालांकि मजबूत निर्यात मांग और सप्लाई चेन में सुधार ने सेक्टर को कुछ राहत दी.
जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग PMI 53.5 पर आया
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि जुलाई में धीमी पड़ गई. सोमवार को जारी HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के अनुसार, जुलाई में PMI घटकर 53.5 पर आ गया, जो जून में 54.2 था. यह अगस्त 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है और इसके साथ ही इंडेक्स अपने दीर्घकालिक औसत 54.2 से भी नीचे रहा. हालांकि PMI का 50 से ऊपर बने रहना इस बात का संकेत है कि मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां अब भी विस्तार के दौर में हैं, लेकिन उनकी रफ्तार काफी धीमी हो गई है.
नए ऑर्डर और उत्पादन में सुस्ती
रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों को जुलाई में नए ऑर्डर मिलते रहे, लेकिन उनकी वृद्धि पिछले चार वर्षों से अधिक समय में दूसरी सबसे कमजोर रही. बाजार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों और कुछ प्रमुख उत्पादों की मांग में कमी का असर ऑर्डर बुक पर दिखाई दिया. उत्पादन में बढ़ोतरी जारी रही, लेकिन इसकी गति भी कमजोर बनी रही. कंज्यूमर गुड्स कंपनियों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा, जबकि इंटरमीडिएट और कैपिटल गुड्स से जुड़े उद्योगों ने बेहतर प्रदर्शन किया.
निर्यात मांग बनी मजबूत
घरेलू बाजार में सुस्ती के बावजूद निर्यात ऑर्डर में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई. कंपनियों ने बताया कि कनाडा, मिस्र, इंडोनेशिया, केन्या, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों से मांग मजबूत बनी रही, जिससे उत्पादन को सहारा मिला.
सप्लाई चेन में सुधार, लेकिन पश्चिम एशिया का तनाव चिंता
HSBC की मुख्य भारत अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने कहा कि जुलाई में सप्लायर्स की डिलीवरी में सुधार हुआ, जिससे सप्लाई चेन की दिक्कतें कम होने के संकेत मिले हैं. हालांकि, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव भविष्य में सप्लाई पर असर डाल सकते हैं. इसी आशंका के चलते कंपनियां कच्चे माल और तैयार उत्पादों का स्टॉक बढ़ा रही हैं.
कच्चे माल की खरीद और भर्ती की रफ्तार घटी
कंपनियों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए कच्चे माल की खरीद जारी रखी, लेकिन इसकी रफ्तार पिछले 31 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. वहीं, तैयार माल का स्टॉक 11 वर्षों से अधिक समय में सबसे तेज गति से बढ़ा. रोजगार के मोर्चे पर लगातार 29वें महीने नई भर्तियां हुईं, लेकिन भर्ती की रफ्तार लगातार तीसरे महीने कमजोर रही और मौजूदा विस्तार चक्र में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई.
लागत का दबाव कम, कंपनियों ने बढ़ाईं कीमतें
जुलाई में कच्चे माल की लागत बढ़ने का दबाव घटकर पांच महीने के निचले स्तर पर आ गया. हालांकि, परिवहन लागत अब भी ऊंची बनी हुई है. कंपनियों ने बढ़ती लागत का असर ग्राहकों पर डालते हुए उत्पादों की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी की. इसके बावजूद कंपनियों का कारोबारी भरोसा मजबूत हुआ है और उन्हें उम्मीद है कि आने वाले महीनों में मांग, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं, नए ग्राहकों और बेहतर मार्केटिंग के दम पर कारोबार में तेजी आएगी.
आज के दौर में, जब विज्ञापन जगत तेजी से इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की ओर बढ़ रहा है, सुनील ग्रोवर अपनी अभिनय क्षमता और किरदारों के दम पर अलग पहचान बनाए हुए हैं. उनकी खासियत यह है कि दर्शक उनके निभाए किरदार को भी याद रखते हैं और उससे जुड़े ब्रांड को भी नहीं भूलते.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टीवी के लोकप्रिय किरदार 'गुत्थी' और 'डॉ. मशहूर गुलाटी' से दर्शकों का दिल जीतने वाले कॉमेडियन और अभिनेता सुनील ग्रोवर आज यानी 03 अगस्त को अपना जन्मदिन मना रहे हैं. अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग और अलग-अलग किरदारों में ढलने की कला के दम पर उन्होंने न सिर्फ मनोरंजन जगत, बल्कि विज्ञापन की दुनिया में भी खास पहचान बनाई है. यही वजह है कि कई बड़े ब्रांड उन्हें अपने विज्ञापन अभियानों का चेहरा बनाते हैं. उनके जन्मदिन के इस खास मौके पर जानते हैं उनकी अनुमानित नेटवर्थ, कमाई के प्रमुख स्रोत और उन यादगार विज्ञापनों के बारे में, जिन्होंने उन्हें विज्ञापन जगत का 'मार्केटिंग गोल्ड' बना दिया.
कितनी है सुनील ग्रोवर की नेटवर्थ, कहां-कहां से होती है कमाई?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुनील ग्रोवर की अनुमानित नेटवर्थ 21 से 25 करोड़ रुपये के बीच है. हालांकि, उनकी कुल संपत्ति को लेकर आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. उनकी कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा टीवी शो, फिल्मों, वेब सीरीज, लाइव कॉमेडी परफॉर्मेंस, ब्रांड एंडोर्समेंट और विज्ञापनों से आता है. इसके अलावा वह सोशल मीडिया प्रमोशन, स्टेज शो और कॉर्पोरेट इवेंट्स में परफॉर्मेंस के जरिए भी अच्छी आय अर्जित करते हैं. हाल के वर्षों में 'द ग्रेट इंडियन कपिल शो' में वापसी और कई बड़े ब्रांड्स के साथ किए गए विज्ञापन अभियानों ने उनकी कमाई और लोकप्रियता दोनों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. आइए जानते हैं उन पांच विज्ञापन अभियानों के बारे में, जिन्होंने सुनील ग्रोवर को विज्ञापन जगत का 'मार्केटिंग गोल्ड' बना दिया.
1. फिगारो ऑलिव ऑयल: एक विज्ञापन में पांच किरदार
इस साल फिगारो ऑलिव ऑयल ने अपनी नई ब्रांड पहचान के साथ एक नया कैंपेन लॉन्च किया, जिसमें सुनील ग्रोवर एक साथ पांच अलग-अलग किरदार निभाते नजर आए. विज्ञापन का संदेश था कि जिस तरह ग्रोवर आसानी से अलग-अलग किरदार निभा लेते हैं, उसी तरह फिगारो ऑलिव ऑयल भी खाना बनाने से लेकर पर्सनल केयर तक कई कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
यह अभियान कंपनी डियोलियो (Deoleo) की नई ब्रांडिंग रणनीति का हिस्सा था. कंपनी के अनुसार, भारत में फिगारो के कारोबार का करीब 48% हिस्सा मल्टीपर्पज कैटेगरी से आता है.
2. गोआईबिबो की 'डीलपंती': जब बने डोनाल्ड ट्रंप
गोआईबिबो के 'डीलपंती' कैंपेन में सुनील ग्रोवर ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मजेदार नकल की. विज्ञापन में वह होटल की कीमतों पर बहस करते नजर आते हैं, जिसके बाद क्रिकेटर ऋषभ पंत ब्रांड का ऑफर पेश करते हैं.
इस डिजिटल अभियान की खास बात यह थी कि इसमें कॉमेडियन कीकू शारदा भी शामिल थे. दोनों ने अपने हास्य अभिनय से ट्रैवल डील्स को भी मनोरंजक बना दिया.
3. एयरटेल-एडोबी एक्सप्रेस: डिजाइनिंग को बनाया आसान
'झटपट फटाफट' कैंपेन में सुनील ग्रोवर एक ऐसे पारिवारिक ज्योतिषी की भूमिका में दिखे, जो शादी के कार्ड की डिजाइन पर टिप्पणी करता है और फिर Adobe Express से खुद तैयार किया गया निमंत्रण पत्र दिखाता है.
इस अभियान का उद्देश्य Airtel ग्राहकों को Adobe Express Premium की सुविधा से परिचित कराना था. बाद में इसे जन्मदिन की शुभकामनाओं, मीम्स, व्हाट्सऐप क्रिएटिव, पार्टी इनविटेशन और छोटे कारोबारों के प्रमोशनल मटेरियल तक भी विस्तार दिया गया.
4. मेंटोस का 'एंग्री चिकन डैड': जो मीम बन गया
परफेटी वैन मेल (Perfetti Van Melle) के मेंटोस #FarakPadega अभियान में सुनील ग्रोवर ने गुस्सैल मुर्गे की आवाज दी थी. विज्ञापन का डायलॉग, "इनको फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन आपको #FarakPadega", इतना लोकप्रिय हुआ कि बाद में सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम रील्स पर मीम के रूप में खूब वायरल हुआ.
इस विज्ञापन की खासियत यह थी कि इसमें उत्पाद को समस्या का जादुई समाधान नहीं बताया गया, बल्कि हास्य के जरिए दर्शकों का मनोरंजन किया गया.
5. कुरकुरे: जूही चावला के साथ बनाई अलग पहचान
OTT और सोशल मीडिया के दौर से पहले ही सुनील ग्रोवर कुरकुरे के टीवी विज्ञापनों में जूही चावला के साथ नजर आ चुके थे. इन विज्ञापनों में उन्होंने आम लोगों से जुड़े मजेदार किरदार निभाए, जिसने ब्रांड की चुलबुली और मनोरंजक छवि को और मजबूत किया. इन शुरुआती अभियानों ने यह साबित कर दिया कि सुनील ग्रोवर ऐसे कलाकार हैं, जो ब्रांड से ध्यान हटाए बिना विज्ञापन को यादगार बना सकते हैं.
विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रस्तावित CEPA के तहत वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार में टैरिफ तथा अन्य व्यापारिक बाधाओं को कम या समाप्त किया जाएगा और व्यापार को चरणबद्ध तरीके से उदार बनाया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और कनाडा ने प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (Comprehensive Economic Partnership Agreement-CEPA) पर वार्ता को वर्ष 2026 के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया है. केंद्र सरकार ने राज्यसभा में इसकी जानकारी दी. यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के साथ-साथ शुल्क (टैरिफ) और अन्य व्यापारिक बाधाओं को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में लिखित उत्तर में बताया कि अब तक CEPA पर वार्ता के तीन दौर पूरे हो चुके हैं. ताजा दौर 6 जुलाई से 10 जुलाई 2026 के बीच कनाडा की राजधानी ओटावा में आयोजित किया गया था. उन्होंने कहा कि वार्ता के विभिन्न क्षेत्रों में सकारात्मक प्रगति हुई है और दोनों देश 2026 के अंत तक बातचीत को अंतिम रूप देने की दिशा में काम कर रहे हैं.
क्या है CEPA?
विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, प्रस्तावित CEPA का उद्देश्य भारत और कनाडा के बीच एक मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Area) स्थापित करना है. इसके तहत वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार में टैरिफ तथा अन्य व्यापारिक बाधाओं को कम या समाप्त किया जाएगा और व्यापार को चरणबद्ध तरीके से उदार बनाया जाएगा.
सरकार का मानना है कि यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के लिए अधिक पारदर्शी एवं पूर्वानुमान योग्य ढांचा तैयार करेगा. साथ ही आर्थिक सहयोग और दोनों देशों के लोगों के बीच संबंधों को भी मजबूती मिलेगी.
भारत के लिए अहम बाजार है कनाडा
साल 2025 के अनुमान के अनुसार कनाडा की आबादी लगभग 4.16 करोड़ (41.65 मिलियन) है. क्रय शक्ति समता (Purchasing Power Parity-PPP) के आधार पर उसकी अर्थव्यवस्था का आकार करीब 2.34 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है. ऐसे में कनाडा भारत के लिए एक महत्वपूर्ण निर्यात बाजार और निवेश गंतव्य माना जाता है.
रिश्तों में सुधार के साथ तेज हुई वार्ता
भारत और कनाडा के बीच CEPA वार्ता ऐसे समय तेज हुई है, जब दोनों देश पिछले कुछ समय से चले आ रहे कूटनीतिक तनाव के बाद अपने द्विपक्षीय संबंधों को फिर से मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं. नई कनाडाई सरकार के साथ संबंधों में सुधार के प्रयासों के बीच व्यापार समझौते को नई गति मिली है.
प्रधानमंत्री मोदी के कनाडा दौरे की उम्मीद
सरकार को उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वर्ष के अंत में कनाडा की यात्रा कर सकते हैं. माना जा रहा है कि यह दौरा दोनों देशों के संबंधों को और गति देने के साथ-साथ CEPA वार्ता को अंतिम रूप तक पहुंचाने में भी अहम भूमिका निभा सकता है.
कंपनी के अनुसार, इस फंड जुटाने का उद्देश्य उसकी वित्तीय स्थिति को और मजबूत करना तथा हितधारकों के लिए दीर्घकालिक मूल्य सृजित करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के हालिया आदेश के बावजूद ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) ने स्पष्ट किया है कि उसकी प्रस्तावित ₹3,144 करोड़ की फंड जुटाने की योजना पर इसका कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा. कंपनी ने कहा कि वह सेबी के अंतिम आदेश का कानूनी विशेषज्ञों के साथ अध्ययन कर रही है और आगे की कार्रवाई कानून के अनुसार करेगी. कंपनी के प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा, "कंपनी को सेबी का आदेश प्राप्त हो गया है और इस संबंध में कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ली जा रही है."
फंड जुटाने की प्रक्रिया तय कार्यक्रम के अनुसार जारी रहेगी
जी ने दोहराया कि सेबी का आदेश उसके पूंजी जुटाने के प्रस्ताव से सीधे तौर पर जुड़ा नहीं है. कंपनी ने कहा कि 31 जुलाई 2026 को आयोजित असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों की मंजूरी और स्टॉक एक्सचेंजों से आवश्यक नियामकीय स्वीकृतियां मिलने के बाद अब वह फंड जुटाने की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगी.
कंपनी के अनुसार, इस फंड जुटाने का उद्देश्य उसकी वित्तीय स्थिति को और मजबूत करना तथा हितधारकों के लिए दीर्घकालिक मूल्य सृजित करना है.
हितधारकों के हितों की रक्षा के लिए उठाए जाएंगे कानूनी कदम
जी ने कहा कि कंपनी और उसके प्रमोटरों पर लगाए गए आरोपों के संबंध में वह कानून के अनुरूप आवश्यक कदम उठाएगी ताकि सभी हितधारकों के हितों की रक्षा की जा सके.
क्या है पूरा मामला?
यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में सेबी ने ज़ी की हैदराबाद स्थित संपत्ति को प्रमोटर समूह से जुड़ी एस्सेल ग्रुप की कंपनियों द्वारा लिए गए ऋण के लिए बिना अनुमति गिरवी रखने के मामले में अंतिम आदेश जारी किया है.
सेबी ने जी एंटरटेनमेंट को दो महीने तक प्रतिभूति बाजार में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया है. वहीं कंपनी के संस्थापक एवं चेयरमैन एमेरिटस सुभाष चंद्र और प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (MD & CEO) पुनीत गोयनका पर एक-एक वर्ष तक प्रतिभूति बाजार में भाग लेने पर रोक लगा दी गई है. इसके अलावा कंपनी और दोनों अधिकारियों पर मौद्रिक जुर्माना भी लगाया गया है.
बिना मंजूरी गिरवी रखी गई थी संपत्ति
सेबी के अनुसार, ज़ी की हैदराबाद स्थित संपत्ति को निदेशक मंडल, ऑडिट समिति या शेयरधारकों की मंजूरी के बिना ऋण के लिए संपार्श्विक (Collateral) के रूप में गिरवी रखा गया था. साथ ही इस लेनदेन का पर्याप्त खुलासा भी नहीं किया गया, जो नियामकीय नियमों का उल्लंघन माना गया.
नए नियमों के तहत F&O शेयरों के लिए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन शुरू होगा, इक्विटी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग का समय बढ़ेगा और प्री-ओपनिंग सेशन का शेड्यूल भी बदल जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अगर आप शेयर बाजार में निवेश या ट्रेडिंग करते हैं, तो आज से लागू हुए नए नियमों की जानकारी आपके लिए बेहद जरूरी है. भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 3 अगस्त से शेयर बाजार के ट्रेडिंग ढांचे में कई अहम बदलाव लागू कर दिए हैं. नए नियमों के तहत F&O शेयरों के लिए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन शुरू होगा, इक्विटी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग का समय बढ़ेगा और प्री-ओपनिंग सेशन का शेड्यूल भी बदल जाएगा. इन बदलावों का मकसद बाजार को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना है.
F&O शेयरों की क्लोजिंग का तरीका बदला
आज से F&O सेगमेंट में शामिल शेयरों की क्लोजिंग प्रक्रिया पूरी तरह बदल गई है. इन शेयरों में सामान्य खरीद-बिक्री दोपहर 3:15 बजे तक होगी. इसके बाद शाम 3:20 बजे से 3:30 बजे तक क्लोजिंग ऑक्शन सेशन चलेगा, जिसमें निवेशक अपने ऑर्डर दर्ज कर सकेंगे. फिर 3:30 बजे से 3:35 बजे तक ऑर्डर मैचिंग होगी और इसी प्रक्रिया से तय हुई कीमत को उस शेयर की आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस माना जाएगा.
F&O ट्रेडिंग का समय 10 मिनट बढ़ा
SEBI ने इक्विटी डेरिवेटिव्स यानी F&O सेगमेंट की ट्रेडिंग अवधि भी बढ़ा दी है. अब इस सेगमेंट में कारोबार दोपहर 3:40 बजे तक किया जा सकेगा. हालांकि, यह बदलाव केवल F&O सेगमेंट पर लागू होगा. नकद बाजार (Cash Market) के वे शेयर जो F&O में शामिल नहीं हैं, उनमें पहले की तरह दोपहर 3:30 बजे तक ही ट्रेडिंग होगी.
प्री-ओपनिंग सेशन का नया शेड्यूल
बाजार खुलने से पहले होने वाले प्री-ओपनिंग सेशन के समय में भी बदलाव किया गया है. नए नियमों के अनुसार सुबह 9:00 बजे से 9:07 बजे तक ऑर्डर एंट्री होगी. इसके बाद 9:07 बजे से 9:15 बजे तक ऑर्डर मैचिंग की जाएगी. हालांकि, नियमित ट्रेडिंग का समय पहले की तरह सुबह 9:15 बजे से ही रहेगा.
SEBI ने क्यों किए ये बदलाव?
SEBI का कहना है कि क्लोजिंग ऑक्शन सेशन लागू करने का उद्देश्य शेयरों की क्लोजिंग प्राइस को अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना है. इससे बाजार में उपलब्ध लिक्विडिटी बेहतर तरीके से एकत्र होगी, सभी निवेशकों को समान अवसर मिलेगा और पैसिव फंड्स की ट्रैकिंग एरर कम होगी. साथ ही, भारतीय शेयर बाजार की कार्यप्रणाली वैश्विक मानकों के और करीब पहुंचेगी.
निवेशकों और ट्रेडर्स पर क्या होगा असर?
नए नियमों के बाद F&O ट्रेडर्स को अपनी ट्रेडिंग रणनीति और ऑर्डर प्लेसमेंट के समय में बदलाव करना होगा. क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के कारण अंतिम कीमत अधिक पारदर्शी तरीके से तय होगी, जबकि डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग के लिए अतिरिक्त 10 मिनट मिलने से निवेशकों को अपनी पोजिशन मैनेज करने का अधिक समय मिलेगा. वहीं, प्री-ओपनिंग सेशन के नए शेड्यूल के कारण शुरुआती ऑर्डर प्रक्रिया भी पहले से अधिक व्यवस्थित होगी.
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद कच्चे तेल की कीमतों में सोमवार को तेज गिरावट देखने को मिली. इसकी मुख्य वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ईरान पर प्रस्तावित बड़े सैन्य हमले को फिलहाल टालने और बातचीत के जरिए समाधान तलाशने का फैसला रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमला टालने और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देने के फैसले से वैश्विक कच्चे तेल बाजार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई. सोमवार को ब्रेंट क्रूड 4% से अधिक टूटकर 84 डॉलर प्रति बैरल के नीचे पहुंच गया, जबकि WTI क्रूड 5% से ज्यादा फिसलकर 81 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार करने लगा. निवेशकों को उम्मीद है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से तेल आपूर्ति पर मंडरा रहा खतरा भी घट सकता है.
ट्रंप के फैसले से टूटा तेल बाजार
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद कच्चे तेल की कीमतों में सोमवार को तेज गिरावट देखने को मिली. इसकी मुख्य वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ईरान पर प्रस्तावित बड़े सैन्य हमले को फिलहाल टालने और बातचीत के जरिए समाधान तलाशने का फैसला रहा.
ट्रंप ने कहा कि सऊदी अरब समेत पश्चिम एशिया के कई सहयोगी देशों ने सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता देने की अपील की थी. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने की दिशा में प्रगति होती है तो बातचीत का सिलसिला जारी रहेगा.
तेल की कीमतों में क्यों आई गिरावट?
ट्रंप के बयान के बाद बाजार को भरोसा मिला कि पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है और वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने का जोखिम घटेगा. इसी उम्मीद के चलते ब्रेंट क्रूड 4% से ज्यादा टूटकर 84 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया, जबकि WTI क्रूड 5% से अधिक गिरकर 81 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार करने लगा.
जुलाई में रहा भारी उतार-चढ़ाव
हालांकि तेल बाजार में अस्थिरता अभी भी बनी हुई है. जुलाई के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 25% चढ़ा था, जो मार्च के बाद इसकी सबसे बड़ी मासिक बढ़त रही. युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के कारण पिछले महीने ब्रेंट में करीब 32 डॉलर प्रति बैरल का उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया.
तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ
शुरुआती गिरावट के बाद तेल की कीमतों में कुछ रिकवरी भी देखने को मिली. इसकी वजह ओमान के तट के पास एक तेल टैंकर के निकट हुए विस्फोट की खबर रही. इस घटना ने संकेत दिया कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास सुरक्षा संबंधी जोखिम अभी भी बने हुए हैं.
दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है. ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है.
OPEC बढ़ाएगा उत्पादन, सप्लाई को मिलेगा सहारा
इस बीच OPEC के प्रमुख देशों ने उत्पादन बढ़ाने की योजना को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी है. यदि पश्चिम एशिया में तनाव और कम होता है तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ सकती है. वहीं, इराक और तुर्किये ने अपनी तेल पाइपलाइन समझौते को एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया है, जिससे प्रतिदिन लगभग 7.5 लाख बैरल तेल का निर्यात संभव होगा.
ईरान-ओमान के बीच भी जारी है बातचीत
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बताया कि ईरान और ओमान के बीच बातचीत अंतिम चरण में है. दोनों देश होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े नए शिपिंग रूट पर चर्चा कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका मतलब जलडमरूमध्य को खोलने या बंद करने पर कोई अंतिम फैसला नहीं है.
बीते कारोबारी सत्र यानी शुक्रवार को सेंसेक्स 166.49 अंक यानी 0.21% बढ़कर 78,094.64 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी50 इंडेक्स 66.45 अंक यानी 0.27% की बढ़त के साथ 24,383.60 पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार ने पिछले कारोबारी सत्र में लगातार तीसरे दिन बढ़त दर्ज की थी. मजबूत वैश्विक संकेतों और ऑटो व वित्तीय शेयरों में खरीदारी के दम पर बीएसई सेंसेक्स 166.49 अंक की बढ़त के साथ 78,094.64 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी50 24,383.60 के स्तर पर पहुंच गया. इस तेजी के बीच बजाज फाइनेंस और बजाज फिनसर्व सबसे बड़े गेनर रहे. आज के कारोबार में भी कई कंपनियों के तिमाही नतीजों, नए ऑर्डर और नियामकीय घटनाक्रमों के चलते चुनिंदा शेयरों पर निवेशकों की नजर रहेगी.
तीसरे कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुआ था बाजार
घरेलू शेयर बाजार ने शुक्रवार को लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में मजबूती के साथ कारोबार समाप्त किया. मजबूत वैश्विक संकेतों के बीच बाजार की शुरुआत हल्की बढ़त के साथ हुई और पूरे दिन सीमित दायरे में कारोबार चलता रहा. कारोबार के अंत में ऑटो और फाइनेंशियल सर्विसेज शेयरों में खरीदारी के दम पर बीएसई सेंसेक्स 166.49 अंक यानी 0.21% बढ़कर 78,094.64 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई का निफ्टी50 इंडेक्स 66.45 अंक यानी 0.27% की बढ़त के साथ 24,383.60 पर पहुंच गया.
बजाज फाइनेंस और बजाज फिनसर्व ने दिखाई दमदार तेजी
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 14 बढ़त के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा तेजी बजाज फाइनेंस में 8.04% और बजाज फिनसर्व में 6.60% दर्ज की गई. इनके अलावा महिंद्रा एंड महिंद्रा, टाटा स्टील, अडानी पोर्ट्स, रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL), टाइटन और भारती एयरटेल के शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली.
आईटी शेयरों में बिकवाली हावी रही
दूसरी ओर, आईटी और कुछ दिग्गज शेयरों में दबाव बना रहा. टीसीएस, इटरनल, इन्फोसिस, आईटीसी, टेक महिंद्रा, एचडीएफसी बैंक, इंडिगो और सन फार्मा के शेयर गिरावट के साथ बंद हुए.
रुपये ने भी दिखाई मजबूती
मुद्रा बाजार में भी रुपये ने मजबूती दिखाई. सप्ताह के दौरान रुपया 1.2% मजबूत होकर बंद हुआ, जो मार्च के बाद इसका सबसे अच्छा साप्ताहिक प्रदर्शन रहा.
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी खरीदारी
निफ्टी50 में बजाज फाइनेंस, बजाज फिनसर्व और जियो फाइनेंशियल सर्विसेज सबसे अधिक बढ़त वाले शेयर रहे. व्यापक बाजार में निफ्टी मिडकैप और निफ्टी स्मॉलकैप दोनों 0.44% की बढ़त के साथ बंद हुए.
ऑटो और वित्तीय शेयरों ने बाजार को दिया सहारा
सेक्टोरल इंडेक्स में ऑटो और वित्तीय शेयरों ने बाजार की बढ़त में अहम योगदान दिया, जबकि आईटी और एफएमसीजी शेयरों में कमजोरी रही. वैश्विक चिप कंपनियों के शेयरों में तेजी के बावजूद निफ्टी आईटी का लगातार पांच कारोबारी सत्रों से जारी बढ़त का सिलसिला टूट गया.
आज इन शेयरों पर रहेगी बाजार की नजर
आज के कारोबार में कई कंपनियों के शेयर खबरों के चलते फोकस में रह सकते हैं. जाइडस लाइफसाइंसेज को अहमदाबाद स्थित इंजेक्टेबल यूनिट के लिए USFDA से एस्टैब्लिशमेंट इंस्पेक्शन रिपोर्ट (EIR) मिली है. डॉ. रेड्डीज को अमेरिका में Rituximab बायोसिमिलर के विपणन की मंजूरी मिली है.
अफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर ने करीब 900 करोड़ रुपये के नए प्रोजेक्ट हासिल किए हैं. वहीं, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL) को 847 करोड़ रुपये और एनसीसी को 1,052.71 करोड़ रुपये के नए ऑर्डर मिले हैं. मारुति सुजुकी के बोर्ड ने 561 करोड़ रुपये की चार कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जबकि कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CONCOR) ने अजीत कुमार पांडा को नया CMD नियुक्त किया है.
इसके अलावा, मूडीज ने JSW स्टील को Baa3 रेटिंग के साथ 'स्थिर' आउटलुक दिया है. दूसरी ओर, सेबी ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े मामले में जी एंटरटेनमेंट, पुनीत गोयनका और सुभाष चंद्र पर बाजार से प्रतिबंध लगाने के साथ 1.48 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. ONGC ने अपने दो संयुक्त उपक्रमों में 50% हिस्सेदारी बरकरार रखने का फैसला किया है. वहीं, इंडिगो 25 अक्टूबर 2026 को Norse Atlantic Airways के साथ अपना वाइड-बॉडी डैम्प लीज समझौता समाप्त करेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
वित्त वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) में सकल GST कलेक्शन 8.43 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 7.66 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 10.1% अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की आर्थिक गतिविधियों में मजबूती का संकेत देते हुए जुलाई 2026 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह 15.4% की सालाना बढ़ोतरी के साथ 2.11 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. घरेलू कारोबार में तेजी और आयात पर बढ़े टैक्स कलेक्शन के दम पर सरकार की कमाई में यह उछाल दर्ज किया गया. हरियाणा, गुजरात और तेलंगाना जैसे राज्यों ने शानदार प्रदर्शन किया, जबकि कुछ राज्यों में GST संग्रह में गिरावट भी देखने को मिली.
घरेलू कारोबार से GST संग्रह 1.31 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपये हो गया. वहीं, आयात से मिलने वाला GST 28.8% की तेज बढ़ोतरी के साथ 66,511 करोड़ रुपये पहुंच गया. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद देश में आर्थिक गतिविधियों और उपभोक्ता मांग पर खास असर नहीं पड़ा.
रिफंड में भी दो अंकों की बढ़ोतरी
जुलाई के दौरान कारोबारियों को 29,968 करोड़ रुपये का GST रिफंड जारी किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 13.1% अधिक है. वहीं, ICEGATE के जरिए प्रोसेस किए गए निर्यात रिफंड में 22.7% की वृद्धि दर्ज की गई और यह 12,288 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
नेट GST कलेक्शन 1.81 लाख करोड़ रुपये
रिफंड समायोजित करने के बाद सरकार का नेट GST कलेक्शन जुलाई में 1.81 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की तुलना में 15.8% अधिक है. इसमें घरेलू कारोबार से मिलने वाला नेट GST 1.27 लाख करोड़ रुपये और आयात से मिलने वाला नेट GST 54,223 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 30.3% की वृद्धि दर्ज की गई.
GST 2.0 का असर दिखने लगा
विशेषज्ञों का मानना है कि GST 2.0 लागू होने के बाद टैक्स संग्रह में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है. हर महीने 7-8% की स्थिर वृद्धि इस बात का संकेत है कि टैक्स अनुपालन बेहतर हुआ है. हालांकि, आयात से मिलने वाले टैक्स की वृद्धि घरेलू कारोबार की तुलना में अधिक रहने से यह भी संकेत मिलता है कि उपभोक्ता गैर-जरूरी खर्चों को लेकर अभी सतर्क हैं.
अप्रैल-जुलाई में 8.43 लाख करोड़ रुपये का संग्रह
वित्त वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों (अप्रैल-जुलाई) में सकल GST कलेक्शन 8.43 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 7.66 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 10.1% अधिक है. इसी अवधि में नेट GST कलेक्शन 9.2% बढ़कर 7.21 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया.
हरियाणा सबसे आगे, कई राज्यों में शानदार प्रदर्शन
राज्यों की बात करें तो जुलाई में GST संग्रह वृद्धि के मामले में हरियाणा 25% की बढ़ोतरी के साथ शीर्ष पर रहा. इसके बाद गुजरात और तेलंगाना में 19-19%, पंजाब और केरल में 16%, उत्तर प्रदेश में 15%, महाराष्ट्र में 13%, कर्नाटक में 12% और दिल्ली में 8% की वृद्धि दर्ज की गई.
हालांकि, कुछ राज्यों में GST संग्रह कमजोर रहा. हिमाचल प्रदेश में 22%, उत्तराखंड में 18%, पुडुचेरी में 17%, मध्य प्रदेश में 10%, आंध्र प्रदेश में 5% और तमिलनाडु में 1% की गिरावट दर्ज की गई.
10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड: 4.70%. लगातार बढ़ती हुई. 30 साल की यील्ड: 5.20%. और फेडरल रिजर्व अभी ब्याज दरों में बदलाव भी नहीं कर रहा था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
ये आंकड़े वैश्विक वित्त बाजार के लिए खतरे की घंटी की तरह सामने आए. 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड: 4.70%. लगातार बढ़ती हुई. 30 साल की यील्ड: 5.20%. और फेडरल रिजर्व अभी ब्याज दरों में बदलाव भी नहीं कर रहा था.
मुंबई के क्षितिज को निहारते अपने शानदार ऑफिस में बैठे उदय कोटक, एक बैंकिंग साम्राज्य के निर्माता, वह शख्स जिसने हर संकट, हर मोड़ और मौद्रिक नीति के हर उतार-चढ़ाव को संभाला था, अब उसने इसे महसूस किया. वह ठंडी निश्चितता. भूकंप से पहले आने वाली कंपन.
उन्होंने देर नहीं की. उन्होंने ट्वीट किया.
"वैश्विक वित्त के लिए सबसे कमजोर कड़ी अमेरिकी बॉन्ड यील्ड है."
सरल और प्रभावी, लेकिन डरावना.
इसलिए नहीं कि ये आंकड़े उन लोगों के लिए चौंकाने वाले थे जो रोजाना बाजार को देखते हैं. बल्कि इसलिए क्योंकि कोटक, एक स्थापित बैंकर, वह व्यक्ति जिसने यह समझते हुए अपनी संपत्ति बनाई कि केंद्रीय बैंक कैसे सोचते हैं, कैसे कदम उठाते हैं और कैसे दुनिया को सहारा देते हैं, अब खतरे की घंटी बजा रहे थे.
इसका संकेत बिल्कुल साफ था: कुछ टूट चुका है. इक्विटी बाजारों के लिए यह संगीत कभी भी बंद हो सकता है. फेड अब इसे ठीक नहीं कर सकता.
तभी एंट्री होती है केविन वार्श की, नए फेड चेयर की, जिन्हें अब तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है. वार्श ऐसे व्यक्ति हैं जो छोटे देशों के आकार जितनी बड़ी बैलेंस शीट में विश्वास नहीं रखते. उनका मानना है कि तरलता (लिक्विडिटी) को कम करना कोई समस्या नहीं बल्कि व्यवस्था का हिस्सा है.
और अचानक 14 साल का दौर 2008 से 2021 तक मुफ्त पैसे, शून्य ब्याज दरों और 24/7 चलने वाली मनी प्रिंटिंग मशीनों का दौर आधिकारिक तौर पर खत्म हो गया.
कोटक का ट्वीट एक बैंकर की प्रार्थना थी. कृपया कोई इस स्थिति को संभाल ले... कम से कम कोशिश तो करे.
रिंग में उतरता स्ट्रीट फाइटर
कोटक के मुंबई ऑफिस से करीब 500 किलोमीटर दूर, अहमदाबाद के शांतिग्राम स्थित एक और शानदार ऑफिस में जुगेशिंदर "रॉबी" सिंह ने इसे पढ़ा... शायद वह हंसे भी होंगे.
रॉबी सिंह विनम्र वित्तीय दुनिया के लिए नहीं बने हैं. उन्होंने अपना पूरा करियर अडानी ग्रुप में बिताया है, भारत के सबसे आक्रामक, महत्वाकांक्षी और विवादित कारोबारी समूहों में से एक को कठिन परिस्थितियों से निकालते हुए.
राजनीतिक तूफान, मीडिया हमले, नियामकीय चुनौतियां. रॉबी ने नियामकों, विश्लेषकों, शॉर्ट सेलर्स और उन आलोचकों का सामना किया जिन्होंने कहा कि उनके बॉस बहुत जोखिम भरे, बहुत बड़े और अछूते हैं.
रॉबी सिर्फ इन लड़ाइयों से बचे नहीं. वह इनसे मजबत हुए. वह एक बात जानते हैं जो ज्यादातर बैंकर नहीं जानते: आराम मजबूती का दुश्मन है.
इसलिए जब उदय कोटक, भारतीय बैंकिंग के सुनहरे सितारे, वह व्यक्ति जिसे 2008 से भारत के केंद्रीय बैंक की उदार नीतियों का फायदा मिला बॉन्ड यील्ड को लेकर चिंता जता रहे थे, तो रॉबी ने इसे अलग नजरिए से देखा.
उन्होंने कमजोरी देखी. उन्होंने निर्भरता देखी. उन्होंने ऐसे मनी मैनेजरों की पूरी पीढ़ी देखी जो भूल चुके थे कि असली पूंजीवाद कैसा महसूस होता है.
उन्होंने अपना X ऐप खोला और बिना किसी हिचक के जवाब दिया.
सड़क से आया संदेश
"4.70% ट्रेजरी यील्ड को लेकर घबराहट पूरी तरह हास्यास्पद है."
ये छह शब्द एक चुनौती थे. कोटक की सोच को सीधी चुनौती.
रॉबी ने शब्दों को नहीं तौला. उन्होंने ऐसे लिखा जैसे कोई व्यक्ति जिसने दो दशक संघर्ष के मैदान में बिताए हों, जिसने बोर्ड में टकराव देखे हों, नियामकों को अपनी कंपनी पर कार्रवाई करते देखा हो और फिर भी मजबूती से खड़ा रहा हो.
उन्होंने सीधे निशाना साधा.
"मनी मैनेजरों की पूरी एक पीढ़ी 2008-2021 की फेड लिक्विडिटी की आदी हो गई. उन्हें लगता है कि शून्य ब्याज दर सामान्य है. ऐसा नहीं है. यह एक कृत्रिम असामान्यता थी जिसने आलसी पूंजी और आलसी बैंकरों को सब्सिडी दी."
हां, इसे दोबारा पढ़िए.
आलसी पूंजी. आलसी बैंकर.
यह सिर्फ आलोचना नहीं थी. यह तंज था. यह एक स्ट्रीट फाइटर की आवाज थी जो स्थापित व्यवस्था से कह रहा था कि उन्होंने एक भ्रम चलाया और अब जब वह खत्म हो रहा है तो वे शिकायत कर रहे हैं.
इसके बाद रॉबी ने आंकड़े पेश किए, एक बड़ा प्रहार:
"1990 से 2008 तक आधुनिक विकास का सबसे स्थिर दौर, 10 साल की यील्ड औसतन 5.68% थी (मीडियन करीब 5.35%). हम संकट में नहीं हैं; हम ऐतिहासिक सामान्य स्थिति में लौट रहे हैं."
मतलब साफ था: उदय कोटक, आप उस चीज को लेकर घबरा रहे हैं जो 18 वर्षों तक सामान्य स्थिति थी. आपकी पीढ़ी मुफ्त पैसे की इतनी आदी हो गई कि आप भूल गए कि वास्तविक बाजार कैसे दिखते हैं.
फिर आया अंतिम वार. वह लाइन जिसने दिग्गजों और पर्यटकों के बीच अंतर कर दिया:
"अगर आपका बिजनेस मॉडल सिर्फ इसलिए चलता है क्योंकि केंद्रीय बैंक आपके लिए लिक्विडिटी में हेरफेर करता रहे, तो आपके पास बिजनेस नहीं है—आप एक चैरिटी केस हैं."
सबटेक्स्ट: भारत के भविष्य को लेकर दो नजरिए
यहां ज्यादातर लोग एक महत्वपूर्ण बात को नजरअंदाज कर गए.
यह सिर्फ बॉन्ड यील्ड को लेकर बहस नहीं थी. यह उस सवाल पर मूलभूत मतभेद था कि उस दुनिया में पूंजीवाद कैसा दिखेगा, जहां केंद्रीय बैंक अब सहारा देने वाली भूमिका में नहीं होंगे.
कोटक का नजरिया: बैंकर की प्रार्थना
उदय कोटक ने अपना साम्राज्य ऐसे दौर में बनाया जब फेड लगातार बाजार को सहारा देता रहा.
वित्तीय संकट आया? फेड ने पैसा छापा.
महामारी आई? फेड ने हस्तक्षेप किया.
उनकी पूरी सोच इस धारणा पर आधारित रही कि केंद्रीय बैंक हमेशा गिरते बाजार को संभालने के लिए मौजूद रहेंगे.
कोटक बैंक की तरह ज्यादातर भारतीय बैंक भी इसी आधारभूत धारणा पर निर्भर हो गए थे. कम ब्याज दरों का मतलब था आसान कर्ज. फेड की लिक्विडिटी का मतलब था कि वैश्विक पूंजी उभरते बाजारों की ओर आती रहे.
पूरा ढांचा वैल्यूएशन, लीवरेज और रिटर्न की उम्मीदें, इस नींव पर खड़ा था कि "केंद्रीय बैंक हमेशा हस्तक्षेप करेंगे."
जब कोटक "एकिलीज हील" की बात कर रहे हैं, तो उनका वास्तविक मतलब है:
"अगर फेड लिक्विडिटी देना बंद कर देता है तो हमारा मॉडल टूट जाएगा."
यह सिर्फ कोटक बैंक की बात नहीं है. यह उन सभी कंपनियों और कारोबारों की बात है चाहे वे भारतीय हों या वैश्विक, जो पूरी तरह कर्ज पर निर्भर हैं, जो कैरी ट्रेड (कम ब्याज पर उधार लेकर कहीं और ज्यादा रिटर्न के लिए निवेश करना) से पैसा कमा रहे हैं और जो लगभग शून्य उधारी लागत और ज्यादा एसेट रिटर्न के अंतर पर टिके हुए हैं.
सिंह का नजरिया: डार्विनियन बदलाव
रॉबी सिंह अलग मिट्टी के बने हैं.
अडानी ग्रुप में उन्होंने देखा है कि जब समूह पर लगातार दबाव बना तो पूंजी महंगी होती गई.
जब आप पोर्ट, पावर प्लांट, एयरपोर्ट और LNG टर्मिनल बना रहे होते हैं, जब आपका पूरा मॉडल 30 साल तक शून्य ब्याज वाले कर्ज पर निर्भर नहीं होता, तो आप वास्तविक रिटर्न और वास्तविक बिजनेस मॉडल पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आप केंद्रीय बैंकों के मूड में बदलाव से प्रभावित नहीं होते.
रॉबी सिंह का संदेश है:
"अच्छा है. अब कमजोर खत्म होंगे. अब गेहूं और भूसे में अंतर होगा. हमने 14 वर्षों तक अक्षमता को सब्सिडी दी है. वह दौर खत्म हो गया है. वास्तविक बिजनेस, जिनके पास असली प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त, वास्तविक कैश फ्लो और मजबूत आर्थिक आधार हैं, ठीक रहेंगे. कमजोर कंपनियां खत्म हो जाएंगी."
यह एक स्ट्रीट फाइटर की मानसिकता है.
बॉक्सिंग मुकाबले में जब आपका प्रतिद्वंद्वी थक चुका हो, जब रेफरी उसका पक्ष लेना बंद कर दे और नियम निष्पक्ष होने वाले हों, तो आप शिकायत नहीं करते. आप मौके का फायदा उठाते हैं.
सिंह कह रहे हैं: "हम इसके लिए तैयार हैं. हमने वास्तविक बाजार में अपनी चोटें खाकर अनुभव हासिल किया है. अब बाकी सभी को भी यही करना होगा."
असली मायने: 4.70% यील्ड वास्तव में क्या संकेत देती है?
आइए स्पष्ट करते हैं कि सतह के नीचे वास्तव में क्या हो रहा है.
क्या फेड खेल से बाहर हो रहा है?
ऐसा लगता है कि नए फेड चेयर केविन वार्श वही नहीं करेंगे जो बर्नांके, येलेन या पॉवेल ने किया.
वह पहली परेशानी पर पैसा नहीं छापेंगे.
वह पहले से ब्याज दरों में कटौती नहीं करेंगे.
वह बाजार को गिरावट से बचाने के लिए तुरंत हस्तक्षेप नहीं करेंगे.
इसका मतलब क्या है?
पूंजी की अब एक कीमत होगी.
अगर आप 100 मिलियन डॉलर उधार लेना चाहते हैं, तो उसकी लागत वास्तविक जोखिम को दर्शाएगी—फेड द्वारा दी गई कृत्रिम राहत को नहीं.
कैरी ट्रेड का दौर खत्म हो सकता है
पूरी व्यवस्था, जिसमें "2% पर डॉलर में उधार लो और 6% रिटर्न देने वाली उभरती बाजार की संपत्तियों में निवेश करो" जैसी रणनीति शामिल थी, अब कमजोर पड़ रही है.
अब आपको वास्तविक प्रतिस्पर्धा के बीच 4% रिटर्न कमाना होगा, सिर्फ फेड की नीति का फायदा उठाकर नहीं.
## कमजोर कंपनियां खत्म होंगी
हर वह बिजनेस मॉडल जो सिर्फ इसलिए चल रहा था क्योंकि ब्याज दरें लगभग शून्य थीं, अब सामने आएगा.
ऐसी लाखों कंपनियां हैं.
वास्तविक पूंजी दुर्लभ और मूल्यवान होगी
जिन कंपनियों के पास वास्तविक कमाई क्षमता, प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त और मजबूत नकदी प्रवाह है, उन्हें महत्व मिलेगा. वहीं, जिन कंपनियों को लगातार केंद्रीय बैंक के सहारे की जरूरत है, वे कमजोर पड़ जाएंगी.
छिपा हुआ सम्मान
इस बहस में लोग एक बात भूल रहे हैं.
रॉबी सिंह ने पूरे भारतीय वित्तीय प्रतिष्ठान को चुनौती दी है.
कोटक की चिंता गलत नहीं है.
उनका बैंक और ज्यादातर भारतीय बैंक एक खास मौद्रिक व्यवस्था के आदी हो चुके हैं.
आसान ब्याज दरें, ज्यादा डिपॉजिट जुटाने की होड़, कम फंडिंग लागत और वर्षों तक बढ़ती संपत्ति कीमतों के बीच कमजोर क्रेडिट फैसलों को छिपाने की क्षमता.
जब 4.70% ट्रेजरी यील्ड उभरते बाजारों से पूंजी बाहर निकालने लगेगी, जब वैश्विक निवेशकों को अचानक महसूस होगा कि वे बिना जोखिम के 5% कमा सकते हैं, तो खेल तेजी से बदल जाएगा.
कोटक एक उचित चेतावनी दे रहे हैं.
लेकिन रॉबी का कहना है:
"हां, खेल बदल रहा है. अच्छा है. खुद को मजबूत बनाओ."
और एक अजीब तरीके से यही सलाह वास्तव में आपको बचा सकती है.
टकराव की भविष्यवाणी
यह वास्तव में दो तरह के बिजनेस लीडर्स के बीच का अंतर है:
बैंकर (कोटक): वह चिंता करते हैं कि बाहरी परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहेंगी. उनकी उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक उस व्यवस्था को जारी रखेंगे जिसने उन्हें सफल बनाया.
स्ट्रीट फाइटर (रॉबी): वह मानते हैं कि बाहरी परिस्थितियां कभी अनुकूल नहीं होंगी. उनकी उम्मीद है कि उन्होंने इतनी आंतरिक ताकत बनाई है कि वे किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकें.
एक की सोच इस उम्मीद पर आधारित है कि व्यवस्था आपकी रक्षा करेगी.
दूसरे की सोच इस विश्वास पर आधारित है कि आप किसी भी परिस्थिति में टिक सकते हैं.
जब 4.70% ट्रेजरी यील्ड आई, तो कोटक ने इसमें कमजोरी देखी.
लेकिन रॉबी ने इसमें अवसर देखा.
यही अंतर, सोच का मूलभूत अंतर और शायद एक पीढ़ीगत अंतर, इस टकराव का असली मतलब है.
पुराना बनाम नया.
आगे क्या होगा
अब बाजार फैसला करेगा.
वे कंपनियां और नेता जिन्होंने पिछले 14 वर्षों में वास्तव में निर्माण किया है मुश्किल फैसले लिए हैं, कठिन प्रतिस्पर्धियों से मुकाबला किया है और वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मक ताकत बनाई है , वे आगे बढ़ेंगे.
वहीं वे कंपनियां जो फेड की नीतियों का फायदा उठाकर चल रही थीं, कर्ज पर सवार, कैरी ट्रेड पर निर्भर और शून्य ब्याज दरों वाली उधारी तथा ऊंचे रिटर्न वाली संपत्तियों के अंतर से पैसा बना रही थीं, उन्हें बड़ा झटका लग सकता है.
कोटक की चेतावनी कुछ हद तक सही साबित होगी:
दर्द होगा और बदलाव कठिन हो सकता है.
लेकिन रॉबी की भविष्यवाणी ज्यादा टिकाऊ साबित हो सकती है:
यह स्वस्थ बदलाव है. यही वास्तविक पूंजीवाद का तरीका है और मजबूत बिजनेस मॉडल वाली कंपनियां ही टिकती हैं.
4.70% ट्रेजरी यील्ड कोई "एकिलीज हील" नहीं है.
यह एक रीसेट बटन है.
और भारतीय वित्त जगत के दिग्गजों के लिए सवाल यह नहीं है कि वे इससे बच पाएंगे या नहीं.
सवाल यह है कि क्या वे इसके लिए पहले से तैयारी कर रहे थे?
ऐसा लगता है कि रॉबी सिंह कर रहे थे.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)