राज बब्बर फिर से चुनावी मैदान में नजर आएंगे, कांग्रेस ने उन्हें गुरुग्राम सीट से उम्मीदवार बनाया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
एक्टिंग से लेकर राजनीति तक में बड़ा नाम कमाने वाले राज बब्बर (Raj Babbar) लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे. कांग्रेस ने उन्हें गुरुग्राम से टिकट दिया है. यहां उनका मुकाबला BJP के राव इंद्रजीत से होगा. कांग्रेस ने हरियाणा की दस लोकसभा सीटों में से नौ पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, जबकि कुरुक्षेत्र की सीट उसने इंडिया गठबंधन के तहत आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए छोड़ी है.
ऐसे शुरू हुआ सफर
राज बब्बर ने 1989 में जनता दल के साथ राजनीति में एंट्री ली थी. बब्बर तीन बार लोकसभा सांसद और दो बार राज्यसभा सांसद भी रहे हैं. इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली है. राज बब्बर 1994 में पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे. 2009 के लोकसभा चुनाव में राज बब्बर ने यूपी की फतेहपुर सीकरी सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. बसपा के कद्दावर नेता रामवीर उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय ने उन्हें शिकस्त दी थी.
पिछली बार मिली थी हार
2014 के लोकसभा चुनाव में राज बब्बर ने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से चुनाव लड़ा, मगर परिणाम वही रहे. उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद साल 2015 में बब्बर राज्यसभा सांसद चुने गए. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में राज बब्बर ने एक बार फिर से फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ने का फैसला किया. वह कांग्रेस की टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे, लेकिन भाजपा के राजकुमार चाहर ने उन्हें करीब 5 लाख वोटों से हरा दिया. राज बब्बर ने एक्टिंग की दुनिया में कई बेहतरीन फ़िल्में की हैं. उन्हें 5 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट भी किया गया था.
2019 में थी इतनी दौलत
2019 में फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र से नामांकन दाखिल करते हुए कांग्रेस प्रत्याशी राज बब्बर ने बताया था कि पिछले पांच साल में उनकी संपत्ति एक करोड़ रुपए कम हो गई है. उनकी चल और अचल दोनों संपत्तियों में कमी आई है. बब्बर ने यह भी बताया था कि उनके पास अपना कोई वाहन और हथियार नहीं है. 2019 में बब्बर द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार, उनके पास 12.57 करोड़ रुपए से अधिक की चल और अचल संपत्ति है. जबकि 2014 में गाजियाबाद से लोकसभा प्रत्याशी रहे राज बब्बर के पास 13.58 करोड़ से अधिक की संपत्ति थी. 2019 के ब्यौरे के हिसाब से उनके पास 5.83 करोड़ से अधिक की चल और 6.73 करोड़ रुपए की अचल संपत्ति है.
जियो के 30,213 करोड़ रुपये के इश्यू का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कर्ज चुकाने में जाएगा, कोई भी मौजूदा निवेशक एक भी शेयर नहीं बेच रहा है और रिलायंस के शेयरधारक तीन साल से ठहराव के बाद भी इंतजार कर रहे हैं. देश का सबसे बड़ा IPO अपने सबसे बड़े सवालों को अनुत्तरित छोड़ रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
जब जियो प्लेटफॉर्म्स का 27,000 करोड़ रुपये का पब्लिक इश्यू 21 अक्टूबर को खुलेगा, तो इसे भारतीय पूंजी बाजार के परिपक्व होने के एक अहम पड़ाव के रूप में पेश किया जाएगा. भारत का सबसे बड़ा IPO. करीब 10.3 लाख करोड़ रुपये के मूल्यांकन वाली कंपनी. 52.4 करोड़ से ज्यादा ग्राहक. रिलायंस की लंबे समय से वादा की जा रही ‘वैल्यू अनलॉकिंग’ आखिरकार पूरी हो रही है. लेकिन प्रेस रिलीज के बजाय आंकड़ों को देखें, तो एक कम आकर्षक तस्वीर सामने आती है.
आपका पैसा, उनका कर्ज
सबसे पहले यह देखें कि पैसा कहां जाएगा. इश्यू दस्तावेज के रिपोर्ट किए गए विवरण के मुताबिक, इश्यू से मिलने वाली रकम में से 27,500 करोड़ रुपये तक का इस्तेमाल रिलायंस जियो इन्फोकॉम के कर्ज को चुकाने या समय से पहले भुगतान करने में किया जाएगा. यह इश्यू के कुल आकार का 90 फीसदी से ज्यादा है. बची हुई छोटी रकम सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होगी. नई स्पेक्ट्रम खरीद या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी उन महत्वाकांक्षाओं के लिए कोई खास रकम निर्धारित नहीं की गई है, जिनका जिक्र रिलायंस की सालाना बैठकों में होता है.
मार्च 2026 तक जियो पर कुल 70,781 करोड़ रुपये का कर्ज था. IPO की रकम मिलने के बाद भी कंपनी की बैलेंस शीट पर 43,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज बना रहेगा. नए शेयरधारक जियो के भविष्य को वित्तपोषित नहीं कर रहे हैं. वे उसके अतीत के कर्ज का पुनर्वित्तपोषण कर रहे हैं.
यह न तो गैरकानूनी है और न ही असामान्य. लेकिन निवेशकों को यह बात साफ-साफ बताई जानी चाहिए.
कोई शेयर नहीं बेच रहा. सवाल पूछिए क्यों
यह इश्यू पूरी तरह नए शेयर जारी करने पर आधारित है. इसमें ऑफर फॉर सेल (OFS) नहीं है. करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज कोई शेयर नहीं बेच रही है. मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक, मेटा, गूगल या 2020 में जियो में बड़ी रकम लगाने वाले वैश्विक फंड भी अपने शेयर नहीं बेच रहे हैं.
जब शुरुआती निवेशकों में से कोई भी रिकॉर्ड मूल्यांकन पर अपने शेयर नहीं बेच रहा है, तो आम निवेशकों को यह पूछने का अधिकार है कि ऐसा क्यों है. उन्हें यह भी जानना चाहिए कि शेयरों पर लगी लॉक-इन अवधि कब खत्म होगी, क्योंकि अंततः बाजार में इन शेयरों की आपूर्ति आएगी.
कंपनी का बहुत छोटा हिस्सा
प्राइस बैंड के ऊपरी स्तर पर यह इश्यू जियो की कुल हिस्सेदारी के 3 फीसदी से भी कम का प्रतिनिधित्व करता है. बाजार में इतने कम शेयर उपलब्ध होने के कारण लिस्टिंग के दिन शेयर की कीमत कंपनी के वास्तविक मूल्य से ज्यादा शेयरों की कमी और इंडेक्स फंडों की खरीदारी को दर्शा सकती है. न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के नियमों को पूरा करने के लिए भविष्य में जारी किए जाने वाले शेयरों की हर किस्त भी आगे चलकर बाजार पर दबाव डाल सकती है.
एक ऐसा ब्रांड, जिसका मालिकाना हक उसके पास नहीं
जोखिम से जुड़े खुलासों में एक ऐसी बात है, जिसे हर खरीदार को दो बार पढ़ना चाहिए. इश्यू दस्तावेज का विश्लेषण करने वाली ब्रोकरेज फर्मों की रिपोर्टों के मुताबिक, ‘जियो’ ट्रेडमार्क का मालिकाना हक रिलायंस ग्रुप के केंद्रीय स्तर पर है और जियो प्लेटफॉर्म्स का इस बात पर नियंत्रण नहीं है कि समूह की अन्य कंपनियां इसका इस्तेमाल कैसे करती हैं. जियोमार्ट, जियो फाइनेंशियल और समूह की दूसरी कंपनियां भी यही नाम इस्तेमाल करती हैं. इनमें से किसी भी कंपनी की समस्या का असर उस सूचीबद्ध कंपनी पर पड़ सकता है, जिसके अल्पांश शेयरधारकों की इसमें कोई भूमिका नहीं थी.
ट्रेडमार्क का मालिक कौन है? क्या जियो प्लेटफॉर्म्स इसका इस्तेमाल करने के लिए भुगतान करती है? क्या लिस्टिंग के बाद यह शुल्क लगाया जा सकता है या बढ़ाया जा सकता है? ये विरोध जताने वाले सवाल नहीं हैं. ये बुनियादी सवाल हैं.
यही बात संबंधित पक्षों के साथ होने वाले लेनदेन पर भी लागू होती है. जियो अपनी सेवाओं के वितरण और बिक्री के लिए रिलायंस रिटेल समेत रिलायंस के व्यापक कारोबारी नेटवर्क पर निर्भर है. जब प्रमोटर किसी अनुबंध के दोनों पक्षों में शामिल हो, तो स्वतंत्र निदेशकों को कीमत तय करते हुए स्पष्ट रूप से देखा जाना चाहिए. साथ ही, हर तिमाही में ऐसे लेनदेन की कुल रकम सार्वजनिक की जानी चाहिए.
इधर, मूल कंपनी का हाल
अगर जियो का IPO नए निवेशकों के लिए सवाल खड़े करता है, तो यह रिलायंस इंडस्ट्रीज के मौजूदा शेयरधारकों के लिए और भी कठिन सवाल उठाता है.
14 अक्टूबर को RIL के शेयर करीब 1,176 रुपये पर बंद हुए. यह 1,611.80 रुपये के 52 सप्ताह के उच्चतम स्तर से एक चौथाई से भी ज्यादा नीचे है. हाल के सप्ताहों में शेयर ने 52 सप्ताह का नया निचला स्तर भी छुआ है. तीन साल के दौरान शेयर में कुल मिलाकर कोई खास बढ़त नहीं हुई है. डिविडेंड यील्ड करीब आधा फीसदी है.
पूंजी पर मिलने वाला रिटर्न भी यही कहानी बताता है. Screener.in के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का समेकित नियोजित पूंजी पर रिटर्न (ROCE) करीब 10 फीसदी रहा. यह लगभग उसी स्तर पर है, जहां एक दशक पहले था. अरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी कंपनी हर रुपये की पूंजी पर करीब उतना ही कमा रही है, जितना उसने खर्च शुरू करने से पहले कमाया था.
इसके बाद वादों का सवाल है. 2019 की वार्षिक आम बैठक (AGM) में मुकेश अंबानी ने कहा था कि रिलायंस का लक्ष्य पांच साल के भीतर जियो और रिलायंस रिटेल को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराना है. जियो की लिस्टिंग 2026 के आखिर में हो रही है. अब रिपोर्टों के मुताबिक, रिलायंस रिटेल 2028 के आसपास लिस्टिंग की तैयारी कर रही है. हर देरी के साथ शेयरधारकों से उसी वादे के पूरा होने का और इंतजार करने को कहा जा रहा है, जिससे उनके शेयरों के मूल्यांकन में बढ़ोतरी की उम्मीद है.
होल्डिंग कंपनी का पेच
यहां एक असहज विडंबना है. जियो के शेयर बाजार में अलग से सूचीबद्ध होने के बाद जो निवेशक जियो में निवेश करना चाहेंगे, वे सीधे उसके शेयर खरीद सकेंगे. कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि इसके बाद RIL के शेयर होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट पर कारोबार कर सकते हैं. इसके करीब 25 फीसदी होने के अनुमान भी सामने आए हैं. जिस कदम से RIL के शेयरधारकों के लिए मूल्य बढ़ाने की उम्मीद है, वही उनके शेयर की कीमत पर सीमा लगा सकता है.
इस व्यवस्था से ही सवाल उठता है. RIL के शेयरधारकों के पास पहले से ही जियो में अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी है. डीमर्जर के जरिए उन्हें सीधे जियो के शेयर दिए जा सकते थे. इसके बजाय, नए शेयर नए निवेशकों को मिलेंगे और उससे मिलने वाली रकम जियो का कर्ज चुकाने में जाएगी. क्या डीमर्जर पर विचार किया गया था? अगर हां, तो इसे क्यों खारिज किया गया?
और अगर प्राइस बैंड जानबूझकर कम रखा गया है, जबकि कई ब्रोकरेज फर्मों ने 10.3 लाख करोड़ रुपये से काफी ज्यादा मूल्यांकन का अनुमान जताया था, तो नए निवेशकों के लिए छोड़ा गया हर अतिरिक्त रुपया बड़े पैमाने पर RIL के मौजूदा शेयरधारकों के हिस्से से ही जाता है.
वे जवाब, जो मायने रखते हैं
जियो के पक्ष में मजबूत तर्क मौजूद हैं. कंपनी लाभ कमाने वाली बाजार की अग्रणी कंपनी है. वित्त वर्ष 2025-26 में उसने 1,46,885 करोड़ रुपये का राजस्व और 30,049 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया. उसका कर्ज का बोझ भी कम हुआ है. RIL का बचाव करने वाले यह तर्क देते हैं कि व्यापक बाजार के लिए 2026 मुश्किल रहा है और पूंजीगत खर्च के अब अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है.
लेकिन मजबूत कारोबार होने से कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े सवालों के जवाब नहीं मिल जाते. इसी तरह, रिकॉर्ड IPO होने से RIL के शेयरधारकों के तीन साल के ठहराव की भरपाई नहीं हो जाती.
इसलिए जब रिलायंस का नेतृत्व मीडिया के सामने आए, तो सवाल सीधे होने चाहिए. शेयरधारकों को नकद रिटर्न कब मिलेगा? समूह पूंजी पर कितने रिटर्न का लक्ष्य तय करेगा और किस साल तक? AI, डेटा सेंटर और सैटेलाइट ब्रॉडबैंड जैसे नए कारोबार जियो को दिए जाएंगे या समूह की अन्य कंपनियों के पास रहेंगे, इसका फैसला कौन करेगा? और अगली पीढ़ी के नेतृत्व का पारिश्रमिक किस पर निर्भर करेगा: कारोबारी साम्राज्य के आकार पर या उससे मिलने वाले रिटर्न पर?
भारत के सबसे बड़े IPO की सबसे कड़ी जांच होनी चाहिए. निवेशकों को आंकड़े और समयसीमा मांगनी चाहिए. साथ ही, ‘दीर्घकालिक दृष्टिकोण’ को उसी रूप में देखना चाहिए, जैसा कि अक्सर होता है: किसी दूसरे सवाल का जवाब.
यह लेख 15 अक्टूबर 2026 तक सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट किए गए आंकड़ों पर आधारित है और निवेश संबंधी सलाह नहीं है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
पीयूष गोयल ने कहा कि भारत चीन के साथ एक बार फिर संबंध विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन इस यात्रा का अंतिम परिणाम अभी तय नहीं है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और चीन के बीच संबंधों को फिर से बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत किस दिशा में बढ़ेगी, इसे लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बुधवार को नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में यह बात कही. चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2025-26 में 112 अरब डॉलर रहा. ऐसे में भारत की कोशिश व्यापार असंतुलन दूर करने, निर्यात बढ़ाने और अपने उत्पादों के लिए चीनी बाजार में बेहतर पहुंच हासिल करने की है.
चीन के साथ संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश
पीयूष गोयल ने कहा कि भारत चीन के साथ एक बार फिर संबंध विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन इस यात्रा का अंतिम परिणाम अभी तय नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के देशों के साथ व्यापार और सहयोग के लिए तैयार है, बशर्ते उसे उचित शर्तें मिलें, बातचीत में निरंतरता बनी रहे और भू-राजनीतिक माहौल स्थिर हो.
भारत और चीन के संबंधों में 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद तनाव बढ़ गया था. इसके बाद भारत ने चीन से होने वाले निवेश की जांच और निगरानी सख्त कर दी थी. हालांकि, दोनों देशों के बीच व्यापार जारी रहा.
सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी. इस दौरान दोनों नेताओं ने व्यापार में संरचनात्मक असंतुलन, आपूर्ति शृंखला से जुड़े मुद्दों और बाजारों तक सार्थक एवं अनुमानित पहुंच की जरूरत पर चर्चा की थी. शी जिनपिंग का यह सात साल में पहला भारत दौरा था. इस सम्मेलन के दौरान पीयूष गोयल ने भी अपने चीनी समकक्ष से मुलाकात की थी.
चीन से भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर
चीन भारत के लिए आयात का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है. मार्च 2026 में समाप्त वित्त वर्ष के दौरान भारत के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 17 फीसदी रही. इस अवधि में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर दर्ज किया गया. यह भारत की चीनी वस्तुओं पर निर्भरता को भी दर्शाता है.
हालांकि, चीन को भारत का निर्यात भी बढ़ा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चीन को निर्यात करीब 37 फीसदी बढ़कर 19.47 अरब डॉलर हो गया. वहीं, अप्रैल से अगस्त 2026 के दौरान चीन भारत के तीन सबसे बड़े निर्यात बाजारों में शामिल रहा. इस अवधि में भारत ने चीन को 9.61 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया.
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर भी बातचीत जारी
गोयल ने भारत और अमेरिका के संबंधों को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि दोनों देशों के रिश्ते आगे मजबूत होंगे. उन्होंने भरोसा जताया कि दोनों देशों में राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव के बावजूद द्विपक्षीय संबंधों में सुधार जारी रहेगा.
अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते पर बातचीत के बीच उनकी यह टिप्पणी अहम है. अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने इसी महीने कहा था कि दोनों पक्षों ने बातचीत में प्रमुख मतभेदों की पहचान कर ली है, लेकिन निकट भविष्य में समझौते पर पहुंचने की संभावना कम है.
भारत और अमेरिका ने मार्च 2025 में द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बातचीत शुरू की थी. दोनों देशों का लक्ष्य 2025 की शरद ऋतु तक अंतरिम समझौता करने का था. हालांकि, तय समयसीमा बीतने के एक साल से अधिक समय बाद भी बातचीत जारी है.
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है. भारत के कुल सालाना निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब पांचवां हिस्सा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने अमेरिका के साथ 33.86 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष दर्ज किया.
ऐसे में अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच भारत के लिए व्यापार वार्ता का अहम मुद्दा है. चीन के साथ व्यापार घाटे को कम करने और अमेरिका के साथ प्रस्तावित समझौते को आगे बढ़ाने की कोशिशें भारत की व्यापक व्यापार रणनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं.
रेडिफ्यूजन ब्रांड सॉल्यूशंस का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ. संदीप गोयल AAAI के अध्यक्ष हैं, जबकि अनदर आइडिया के जयदीप गांधी उपाध्यक्ष के रूप में बोर्ड में शामिल हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) ने 2026-27 के लिए अपने नए बोर्ड की घोषणा की है. इसमें स्वतंत्र विज्ञापन एजेंसियों, क्षेत्रीय कंपनियों, क्रिएटिव विशेषज्ञों और प्रमुख विज्ञापन एवं मीडिया नेटवर्क के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है. एसोसिएशन का उद्देश्य विज्ञापन उद्योग में विभिन्न आकार और विशेषज्ञता वाली एजेंसियों को अधिक प्रतिनिधित्व देना और उनके बीच सहयोग को मजबूत करना है. डॉ. संदीप गोयल को अध्यक्ष और जयदीप गांधी को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है.
संदीप गोयल अध्यक्ष, जयदीप गांधी उपाध्यक्ष
रेडिफ्यूजन ब्रांड सॉल्यूशंस का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ. संदीप गोयल AAAI के अध्यक्ष हैं, जबकि अनदर आइडिया के जयदीप गांधी उपाध्यक्ष के रूप में बोर्ड में शामिल हैं. नए बोर्ड में स्वतंत्र एजेंसियों और क्षेत्रीय विज्ञापन कारोबार से जुड़े प्रतिनिधियों को जगह दी गई है, ताकि उद्योग से जुड़े अलग-अलग दृष्टिकोणों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जा सके.
स्वतंत्र एजेंसियों की ओर से रतन बत्रा प्राइवेट लिमिटेड के पुनीत बत्रा, पैम एडवरटाइजिंग के सुनील छाबड़ा, 3 ब्रदर्स एंड फिल्स के हेमेंद्र पारेख, नवनीतलाल एंड कंपनी के देवांग एम. गांधी और सिचुएशंस एडवरटाइजिंग एंड मार्केटिंग के अंजन चटर्जी बोर्ड में शामिल हैं.
क्षेत्रीय विज्ञापन कारोबार का प्रतिनिधित्व स्टैंडर्ड पब्लिसिटी की प्रियंका चटर्जी, स्लोका एडवरटाइजिंग के के. श्रीनिवास, मैत्री एडवरटाइजिंग के सी. मुथु और क्रेयॉन्स एडवरटाइजिंग के कुनाल ललानी करेंगे.
अंजन चटर्जी को बोर्ड में सह-चयनित सदस्य के रूप में शामिल किया गया है. विज्ञापन क्षेत्र में अनुभव के साथ उन्होंने Oh! Calcutta और Mainland China जैसे रेस्तरां ब्रांड भी विकसित किए हैं. उनका अनुभव ब्रांड निर्माण, उद्यमिता और उपभोक्ता अनुभव से जुड़े पहलुओं को बोर्ड के विचार-विमर्श में शामिल करेगा.
क्रिएटिव और मीडिया विशेषज्ञता को मिलेगी मजबूती
नए बोर्ड में विज्ञापन जगत के अनुभवी नामों को भी शामिल किया गया है. BBDO India के जोसी पॉल और ऑर्चर्ड एडवरटाइजिंग के अमितेश राव क्रिएटिव और रणनीतिक विशेषज्ञता को मजबूत करेंगे. वहीं, लियो बर्नेट के ललाटेंदु दास मीडिया क्षेत्र का अनुभव लेकर बोर्ड से जुड़ेंगे.
इसके अलावा, आर.के. स्वामी के श्रीनिवासन के. स्वामी, मैडिसन कम्युनिकेशंस के सैम बलसारा, WPP मीडिया के प्रशांत कुमार, मैट्रिक्स पब्लिसिटीज एंड मीडिया इंडिया के विष्णुदास हरदसानी, FCB उल्का एडवरटाइजिंग के धीरज सिन्हा, ओगिल्वी एंड माथर की हेप्जिबा पाठक, इनोशन वर्ल्डवाइड कम्युनिकेशन के संतोष कुमार, एवरेस्ट ब्रांड सॉल्यूशंस की तान्या गोयल, प्लेटिनम एडवरटाइजिंग के अजीत वर्गीज, ओम्निकॉम मीडिया के कार्तिक शर्मा, हवास मीडिया के मोहित जोशी और पब्लिसिस कम्युनिकेशंस की अनुप्रिया आचार्य बोर्ड में अपनी भूमिका जारी रखेंगे. शशि सिन्हा और विक्रम सखूजा को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया गया है.
प्रमुख विज्ञापन और मीडिया नेटवर्क की भागीदारी
नए बोर्ड में ओगिल्वी, रेडिफ्यूजन, इनोशन और साची एंड साची जैसी प्रमुख फुल-सर्विस विज्ञापन एजेंसियों का प्रतिनिधित्व बना रहेगा. मीडिया कारोबार की ओर से WPP मीडिया, ओम्निकॉम मीडिया, हवास मीडिया, पब्लिसिस मीडिया और मैडिसन कम्युनिकेशंस की विशेषज्ञता भी बोर्ड को मिलेगी.
एसोसिएशन के मुताबिक, बोर्ड में व्यापक प्रतिनिधित्व का उद्देश्य उद्योग के भीतर सहयोग बढ़ाना और प्रतिभा विकास, कारोबार की वृद्धि तथा तकनीकी बदलाव से पैदा हो रहे अवसरों पर काम करना है.
क्रिएटिव, मीडिया और AI पर नई पहल की तैयारी
AAAI के अध्यक्ष डॉ. संदीप गोयल ने कहा कि नए बोर्ड में अनुभवी उद्योग नेतृत्व, स्वतंत्र उद्यमियों की ऊर्जा और विज्ञापन क्षेत्र की प्रतिभाओं को एक साथ लाया गया है. उन्होंने कहा कि एसोसिएशन का लक्ष्य उद्योग की विविधता को प्रतिबिंबित करना और स्वतंत्र एजेंसियों को अधिक प्रभावी भूमिका तथा भागीदारी के अवसर देना है.
गोयल के मुताबिक, एसोसिएशन आने वाले सप्ताह में क्रिएटिव, मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेक्नोलॉजी से जुड़ी कुछ नई पहलों की घोषणा करेगा. इन पहलों में स्वतंत्र विज्ञापन एजेंसियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
AIMRA) के मुताबिक, स्मार्टफोन की कमजोर मांग का असर केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है. नवरात्रि शुरू होने के बाद से ऑफलाइन दुकानों पर स्मार्टफोन की बिक्री में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
त्योहारी सीजन में स्मार्टफोन की बिक्री बढ़ने की उम्मीदों को झटका लगा है. नवरात्रि के दौरान ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर स्मार्टफोन की बिक्री में 16 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि ऑफलाइन बाजार में भी बिक्री करीब 20 फीसदी तक घटी है. फोन की बढ़ती कीमतें, मेमोरी चिप महंगी होने और त्योहारी ऑफर्स में मिलने वाली छूट कम होने से ग्राहक खरीदारी टाल रहे हैं. इसका असर मोबाइल कंपनियों से लेकर रिटेलर्स तक के कारोबार पर पड़ रहा है. कई ग्राहक नया फोन खरीदने के बजाय पुराने फोन की मरम्मत करा रहे हैं या सेकंड हैंड फोन का विकल्प चुन रहे हैं. हालांकि, 45,000 रुपये से अधिक कीमत वाले प्रीमियम स्मार्टफोन की मांग अब भी बनी हुई है.
कम डिस्काउंट और बढ़ती कीमतों से घटी मांग
मार्केट रिसर्च फर्म काउंटरपॉइंट रिसर्च के मुताबिक, ई-कॉमर्स कंपनियों की नवरात्रि सेल के दौरान स्मार्टफोन की बिक्री में 16 फीसदी की गिरावट आई है. रिपोर्ट के अनुसार, ग्राहकों में फोन खरीदने की दिलचस्पी है, लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण उनका बजट खरीदारी में बाधा बन रहा है. अमेजन, फ्लिपकार्ट और जियोमार्ट जैसे प्लेटफॉर्म के लिए त्योहारी सीजन अहम होता है, लेकिन इस बार स्मार्टफोन की बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं रही.
पहले त्योहारी सेल में ग्राहकों को 25 से 40 फीसदी तक की छूट मिल जाती थी, लेकिन इस बार डिस्काउंट घटकर करीब 10 से 25 फीसदी रह गया है. इसकी प्रमुख वजह स्मार्टफोन बनाने की लागत में बढ़ोतरी है. मेमोरी चिप की कीमतें दो से तीन गुना तक बढ़ने के साथ रुपये की कमजोरी और माल ढुलाई की लागत ने भी कंपनियों पर दबाव बढ़ाया है. रिपोर्ट के मुताबिक, इन वजहों से स्मार्टफोन की कीमतों में औसतन 35 से 40 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है. लागत बढ़ने के कारण कंपनियां पहले की तरह भारी छूट देने से बच रही हैं.
ऑफलाइन बाजार में भी बिक्री सुस्त
स्मार्टफोन की कमजोर मांग का असर केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं है. ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (AIMRA) के मुताबिक, नवरात्रि शुरू होने के बाद से ऑफलाइन दुकानों पर स्मार्टफोन की बिक्री में करीब 20 फीसदी की गिरावट आई है. संगठन ने त्योहारी सीजन में कुल रिटेल बिक्री पिछले साल के मुकाबले 15 फीसदी से अधिक घटने की आशंका जताई है.
AIMRA के फाउंडर चेयरमैन कैलाश लख्यानी के मुताबिक, महंगाई के कारण सितंबर में दुकानों पर आने वाले ग्राहकों की संख्या में भी 40 से 50 फीसदी तक की कमी देखी गई थी. कमजोर मांग के चलते कुछ ब्रांड अपने स्टॉक को निकालने के लिए सेल की अवधि बढ़ा रहे हैं.
नया फोन खरीदने के बजाय पुराने से चला रहे काम
स्मार्टफोन की बढ़ती कीमतों का असर ग्राहकों के खरीदारी के फैसलों पर भी दिख रहा है. रिटेल बाजार में बड़ी संख्या में फोन किस्तों यानी कंज्यूमर फाइनेंसिंग के जरिए बेचे जाते हैं, लेकिन बढ़ते खर्च के कारण ग्राहक अब नई खरीदारी को टाल रहे हैं. कई लोग पुराने फोन की मरम्मत कराकर उसका इस्तेमाल जारी रख रहे हैं, जबकि कुछ ग्राहक सेकंड हैंड स्मार्टफोन खरीद रहे हैं. इससे नए स्मार्टफोन की मांग प्रभावित हो रही है.
प्रीमियम स्मार्टफोन की मांग बरकरार
बाजार में सुस्ती के बावजूद 45,000 रुपये से अधिक कीमत वाले प्रीमियम स्मार्टफोन की मांग बनी हुई है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के शुरुआती आठ महीनों में स्मार्टफोन की कुल बिक्री में 10 फीसदी की गिरावट आई, लेकिन बिक्री के मूल्य में 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इसकी एक वजह फोन की औसत बिक्री कीमत (ASP) में इजाफा होना है.
रिटेलर्स के अनुसार, एप्पल, सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी जैसे ब्रांड के स्मार्टफोन की औसत कीमत अब 35,000 से 37,000 रुपये के बीच पहुंच गई है. यानी कम संख्या में फोन बिकने के बावजूद बढ़ी हुई कीमतों के कारण कंपनियों की कुल बिक्री के मूल्य में गिरावट सीमित रही है.
दिवाली के बाद महंगे हो सकते हैं स्मार्टफोन
जानकारों को उम्मीद है कि दिवाली के आसपास स्मार्टफोन की बिक्री में कुछ सुधार देखने को मिल सकता है, लेकिन पूरे त्योहारी सीजन में बिक्री पर दबाव बने रहने की आशंका है. वहीं, मेमोरी चिप की बढ़ती कीमतों और अन्य लागतों के कारण दिवाली के बाद स्मार्टफोन की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी हो सकती है. यदि ऐसा होता है, तो बजट और मिड-रेंज स्मार्टफोन खरीदने वाले ग्राहकों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है.
IPO में पात्र कर्मचारियों के लिए 500 करोड़ रुपये तक के शेयर आरक्षित किए गए हैं. वहीं, रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों के लिए 2,500 करोड़ रुपये तक के शेयर रिजर्व होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज की डिजिटल सर्विसेज कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स के बहुप्रतीक्षित आईपीओ की तारीख तय हो गई है. कंपनी का पब्लिक इश्यू 21 अक्टूबर को खुलेगा और 23 अक्टूबर को बंद होगा. इसके जरिए करीब 30,200 करोड़ रुपये जुटाने की योजना है. आईपीओ में पात्र कर्मचारियों के लिए 500 करोड़ रुपये और रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों के लिए 2,500 करोड़ रुपये तक के शेयर रिजर्व रखे गए हैं. कंपनी ने 14 अक्टूबर को रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (RHP) दाखिल कर दिया है.
19 अक्टूबर को एंकर निवेशकों के लिए खुलेगी बोली
जियो प्लेटफॉर्म्स ने अहमदाबाद स्थित गुजरात के रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास आरएचपी जमा किया है. आईपीओ में एंकर निवेशक 19 अक्टूबर को बोली लगा सकेंगे. करीब 30,200 करोड़ रुपये के प्रस्तावित आकार के साथ यह इश्यू भारत के सबसे बड़े आईपीओ में शामिल हो सकता है. फिलहाल यह रिकॉर्ड हुंडई मोटर इंडिया के नाम है, जिसने अक्टूबर 2024 में अपना आईपीओ पेश किया था.
₹1,065 से ₹1,119 होगा प्राइस बैंड
कंपनी ने आईपीओ के लिए प्रति शेयर 1,065 से 1,119 रुपये का प्राइस बैंड तय किया है. एक लॉट में 12 शेयर होंगे. ऊपरी प्राइस बैंड के हिसाब से एक लॉट के लिए निवेशकों को 13,428 रुपये लगाने होंगे. यह राशि पात्र कर्मचारियों को मिलने वाली छूट से पहले की है. आईपीओ में पात्र कर्मचारियों को प्रति शेयर 54 रुपये की छूट दी जाएगी. प्रत्येक शेयर का फेस वैल्यू 10 रुपये है.
रिलायंस के शेयरधारकों के लिए ₹2,500 करोड़ तक रिजर्व
आईपीओ में पात्र कर्मचारियों के लिए 500 करोड़ रुपये तक के शेयर आरक्षित किए गए हैं. वहीं, रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों के लिए 2,500 करोड़ रुपये तक के शेयर रिजर्व होंगे. इस तरह दोनों श्रेणियों के लिए कुल 3,000 करोड़ रुपये तक के शेयर रखे गए हैं.
रिलायंस इंडस्ट्रीज के वे व्यक्तिगत निवेशक और हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) इस श्रेणी के लिए पात्र हो सकते हैं, जिनके पास 14 अक्टूबर को कंपनी के शेयर थे. हालांकि, पात्रता के लिए आईपीओ में निर्धारित शर्तों और नियामकीय नियमों का पालन करना होगा.
27 करोड़ तक नए शेयर जारी करेगी कंपनी
रेगुलेटरी फाइलिंग के मुताबिक, जियो प्लेटफॉर्म्स आईपीओ के तहत 27 करोड़ तक नए शेयर जारी करेगी. यह फ्रेश इश्यू होगा, यानी कंपनी नए शेयर जारी करके पूंजी जुटाएगी. कंपनी ने 19 जून को अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया था. इसके बाद 28 अगस्त को उसे भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) से ऑब्जर्वेशन लेटर मिला.
जियो के कारोबार पर निवेशकों की नजर
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि, जियो प्लेटफॉर्म्स के तहत रिलायंस जियो का टेलीकॉम और डिजिटल सर्विसेज कारोबार आता है. यह रिलायंस इंडस्ट्रीज की उपभोक्ता-केंद्रित कंपनियों के कारोबार की वैल्यू सामने लाने की रणनीति का अहम हिस्सा है. आईपीओ के आरएचपी में कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, कारोबार से जुड़े जोखिम, इश्यू की शर्तों और अन्य जरूरी जानकारियों का विवरण दिया गया है. निवेशकों को बोली लगाने से पहले इन जानकारियों का अध्ययन करना चाहिए.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
बुधवार को घरेलू शेयर बाजार में मुनाफावसूली के चलते गिरावट दर्ज की गई.सेंसेक्स 251.89 अंक यानी 0.34 फीसदी गिरकर 72,781.89 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 99.25 अंक यानी 0.44 फीसदी टूटकर 22,622.70 पर रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार को कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. अमेरिकी और एशियाई बाजारों में भारी बिकवाली, उम्मीद से ज्यादा अमेरिकी महंगाई और गिफ्ट निफ्टी में गिरावट से निवेशकों की चिंता बढ़ गई है. इससे पहले बुधवार को सेंसेक्स 252 अंक और निफ्टी करीब 99 अंक टूटकर बंद हुए थे, जबकि मंगलवार को सेंसेक्स में 1,109 अंकों की जोरदार तेजी आई थी. आज निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों के रुख, कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और कंपनियों के सितंबर तिमाही के नतीजों पर रहेगी. रिलायंस इंडस्ट्रीज, IDBI बैंक, BHEL, ICICI लोम्बार्ड और टाटा टेक्नोलॉजीज समेत कई कंपनियों के शेयर भी कारोबारी गतिविधियों के लिहाज से अहम रहेंगे.
गिफ्ट निफ्टी से कमजोर संकेत, एशियाई बाजारों में भारी बिकवाली
गुरुवार, 15 अक्टूबर को गिफ्ट निफ्टी करीब 40 अंक गिरकर 22,600 के आसपास कारोबार कर रहा था. इससे घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत की आशंका है. एशियाई बाजारों में भी सुबह तेज गिरावट देखने को मिली. जापान का निक्केई करीब 4 फीसदी और दक्षिण कोरिया का कोस्पी करीब 8 फीसदी तक फिसल गया, जबकि हांगकांग और चीन के बाजार भी दबाव में रहे.
इससे पहले बुधवार को अमेरिकी बाजारों में भी बिकवाली देखने को मिली थी. अमेरिका में सितंबर की उपभोक्ता महंगाई दर सालाना आधार पर बढ़कर 3.7 फीसदी पहुंच गई, जबकि अगस्त में यह 3.4 फीसदी थी. यह बाजार के 3.6 फीसदी के अनुमान से अधिक रही. इससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनाए रखने की आशंका बढ़ गई है. इसका असर खासकर टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी कंपनियों के शेयरों पर पड़ा. बुधवार को नैस्डैक 1.88 फीसदी और S&P 500 इंडेक्स 1.11 फीसदी गिरकर बंद हुआ, जबकि डाओ जोन्स में 0.09 फीसदी की गिरावट रही.
सेंसेक्स 252 अंक टूटा, निफ्टी भी गिरावट के साथ बंद
बुधवार, 14 अक्टूबर को घरेलू शेयर बाजार में मुनाफावसूली के चलते गिरावट दर्ज की गई. कारोबार के दौरान निफ्टी 22,558.95 के निचले स्तर तक फिसल गया, हालांकि आईटी और एफएमसीजी शेयरों में खरीदारी से नुकसान कुछ कम हुआ. कारोबार के अंत में सेंसेक्स 251.89 अंक यानी 0.34 फीसदी गिरकर 72,781.89 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 99.25 अंक यानी 0.44 फीसदी टूटकर 22,622.70 पर रहा.
सेंसेक्स और निफ्टी के टॉप गेनर्स-लूजर्स
बुधवार को सेंसेक्स के टॉप गेनर्स में इन्फोसिस, टेक महिंद्रा, TCS, हिंदुस्तान यूनिलीवर और NTPC शामिल रहे. इन्फोसिस का शेयर 2.51 फीसदी, टेक महिंद्रा का 2.20 फीसदी, TCS का 1.54 फीसदी, हिंदुस्तान यूनिलीवर का 1.15 फीसदी और NTPC का 0.87 फीसदी चढ़ा. दूसरी ओर, बजाज फाइनेंस 2.55 फीसदी गिरकर सेंसेक्स का टॉप लूजर रहा. महिंद्रा एंड महिंद्रा में 2.24 फीसदी, बजाज फिनसर्व में 1.99 फीसदी, इटरनल में 1.68 फीसदी और ICICI बैंक में 1.54 फीसदी की गिरावट आई.
निफ्टी में नेस्ले इंडिया 3.69 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. टाटा कम्युनिकेशंस में 2.91 फीसदी, इन्फोसिस में 2.44 फीसदी, TCS में 2.11 फीसदी और कोल इंडिया में 2.08 फीसदी की तेजी रही. वहीं, श्रीराम फाइनेंस 3.85 फीसदी गिरकर टॉप लूजर रहा. HDFC लाइफ में 2.85 फीसदी, बजाज फाइनेंस में 2.62 फीसदी, महिंद्रा एंड महिंद्रा में 2.47 फीसदी और SBI लाइफ में 2.20 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
कच्चे तेल की कीमतों पर भी रहेगी नजर
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच कच्चे तेल की कीमतें बाजार के लिए अहम बनी हुई हैं. हालांकि, गुरुवार सुबह ब्रेंट क्रूड करीब 104 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जिससे कुछ राहत मिलने की उम्मीद है. भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आयात बिल और महंगाई बढ़ा सकती है. इसके अलावा कंपनियों की लागत और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण रहेंगी.
RIL, IDBI बैंक और BHEL समेत इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज रिलायंस इंडस्ट्रीज, IDBI बैंक, BHEL, ICICI लोम्बार्ड, बजाज कंज्यूमर केयर और टाटा टेक्नोलॉजीज के शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है. रिलायंस इंडस्ट्रीज की सहायक कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स का 30,187.6 करोड़ रुपये का IPO 21 अक्टूबर को खुलेगा और 23 अक्टूबर को बंद होगा. इसके लिए 1,065 से 1,119 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया गया है. वहीं, IDBI बैंक में सरकार और LIC की कुल 60.72 फीसदी हिस्सेदारी बेचने के लिए 52,878 करोड़ रुपये के सौदे को मंजूरी मिली है. इस सौदे के तहत सरकार अपनी 30.48 फीसदी और LIC अपनी 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगी.
BHEL का सितंबर तिमाही में मुनाफा सालाना आधार पर 375 करोड़ रुपये से बढ़कर 821 करोड़ रुपये हो गया. कंपनी की आय 23.8 फीसदी बढ़कर 9,300 करोड़ रुपये रही. ICICI लोम्बार्ड का मुनाफा 15.5 फीसदी बढ़कर 946.4 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि शुद्ध अर्जित प्रीमियम आय 17.7 फीसदी बढ़कर 6,651.87 करोड़ रुपये रही. कंपनी ने प्रति शेयर 7 रुपये का अंतरिम लाभांश देने की भी घोषणा की है. बजाज कंज्यूमर केयर का मुनाफा 65.9 फीसदी बढ़कर 70.2 करोड़ रुपये रहा और आय 25.5 फीसदी बढ़कर 333 करोड़ रुपये पहुंच गई. दूसरी ओर, टाटा टेक्नोलॉजीज का मुनाफा पिछली तिमाही के मुकाबले 5.2 फीसदी घटकर 171 करोड़ रुपये रह गया, हालांकि कंपनी की आय 2 फीसदी बढ़कर 1,699 करोड़ रुपये रही.
इसके अलावा हुंडई मोटर इंडिया ने महाराष्ट्र के तालेगांव में अपना नया वाहन निर्माण कारखाना शुरू किया है. कंपनी इस परियोजना में अलग-अलग चरणों में करीब 11,000 करोड़ रुपये निवेश करने की योजना बना रही है. ट्राइडेंट ने राहुल रूंगटा को दोबारा समूह का मुख्य वित्त अधिकारी नियुक्त किया है.
आज इन कंपनियों के तिमाही नतीजों पर भी नजर
गुरुवार को एंजेल वन, HDFC AMC, HDFC लाइफ, DB कॉर्प, IIFL, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज, इंडियन बैंक, IRFC, पॉलीकैब, नेस्ले इंडिया, ओरिएंट इलेक्ट्रिक और पर्सिस्टेंट सिस्टम्स समेत कई कंपनियां सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. निवेशकों की नजर इन कंपनियों की आय, मुनाफे, मार्जिन और भविष्य के कारोबारी अनुमानों पर रहेगी. इसके अलावा आनंद राठी वेल्थ के शेयर भी अंतरिम लाभांश की एक्स-डेट पर कारोबार करेंगे. कंपनी ने 5 रुपये अंकित मूल्य वाले प्रत्येक शेयर पर 4 रुपये का अंतरिम लाभांश घोषित किया है.
कुल मिलाकर, गुरुवार को घरेलू बाजार की दिशा वैश्विक संकेतों, अमेरिकी महंगाई और ब्याज दरों को लेकर निवेशकों की धारणा, कच्चे तेल की कीमतों और कंपनियों के तिमाही नतीजों से तय हो सकती है. ऐसे में कारोबार के दौरान उतार-चढ़ाव बने रहने की आशंका है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
प्रस्तावित शर्तों के मुताबिक, IDBI बैंक की हिस्सेदारी बिक्री का सौदा मार्च 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है. हालांकि, इसकी अंतिम प्रक्रिया संबंधित मंजूरियों और नियामकीय आवश्यकताओं पर निर्भर करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने IDBI बैंक के निजीकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को बैंक की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी Fairfax Financial Holdings को 52,878.08 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दे दी. इस सौदे के तहत केंद्र सरकार अपनी 30.48 फीसदी और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगा. Fairfax ने प्रति शेयर 81 रुपये की बोली लगाई है, जो स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर तय 75.99 रुपये के मानक मूल्य से अधिक है.
सरकार और LIC के पास कितनी हिस्सेदारी बचेगी?
इस सौदे के पूरा होने के बाद केंद्र सरकार के पास IDBI बैंक की 15 फीसदी हिस्सेदारी बनी रहेगी, जबकि LIC के पास 19 फीसदी हिस्सेदारी होगी. इस तरह दोनों की संयुक्त हिस्सेदारी घटकर 34 फीसदी रह जाएगी. बिक्री प्रक्रिया से पहले सरकार और LIC के पास बैंक की कुल 94.71 फीसदी हिस्सेदारी थी.
इस सौदे के जरिए Fairfax को बैंक का बहुमत स्वामित्व हासिल होगा, जबकि सरकार और LIC की इसमें अल्पमत हिस्सेदारी बनी रहेगी. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस लेनदेन को रणनीतिक विनिवेश के बजाय रणनीतिक पुनर्गठन बताया है.
2022 में शुरू हुई थी बिक्री प्रक्रिया
IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया वर्ष 2022 में शुरू हुई थी. हालांकि, शुरुआती बोलियां तय आरक्षित मूल्य पर खरी नहीं उतरने के कारण इस प्रक्रिया में देरी हुई. बाद में सरकार ने बिक्री प्रक्रिया को दोबारा आगे बढ़ाया. जुलाई 2026 में Fairfax और Emirates NBD ने संशोधित बोलियां जमा की थीं. इनमें Fairfax सफल बोलीदाता के रूप में उभरी.
कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब यह सौदा पूरा होने की दिशा में आगे बढ़ेगा. इसके लिए बाकी प्रक्रियागत और नियामकीय औपचारिकताओं को पूरा करना होगा.
मार्च 2027 तक पूरा हो सकता है सौदा
प्रस्तावित शर्तों के मुताबिक, IDBI बैंक की हिस्सेदारी बिक्री का सौदा मार्च 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है. हालांकि, इसकी अंतिम प्रक्रिया संबंधित मंजूरियों और नियामकीय आवश्यकताओं पर निर्भर करेगी.
रिपोर्ट्स के अनुसार, Fairfax को सौदे की शर्तों के तहत कम से कम तीन साल तक IDBI बैंक का नाम बनाए रखना होगा. यह लेनदेन भारत के वित्तीय क्षेत्र में होने वाली बड़ी रणनीतिक हिस्सेदारी बिक्री में से एक है.
बैंक की ओर से स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी के मुताबिक, सितंबर तिमाही में कुल आय सालाना आधार पर 6.04% बढ़कर ₹40,931 करोड़ हो गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केनरा बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मजबूत प्रदर्शन किया है. सितंबर तिमाही में बैंक का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 8.40% बढ़कर ₹5,175 करोड़ हो गया, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह ₹4,774 करोड़ था. बैंक की शुद्ध ब्याज आय में भी 20% से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई. बेहतर नतीजों के बीच शेयर बाजार में केनरा बैंक के शेयर इंट्राडे कारोबार के दौरान 5% से अधिक चढ़ गए.
बैंक की ओर से स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी के मुताबिक, सितंबर तिमाही में कुल आय सालाना आधार पर 6.04% बढ़कर ₹40,931 करोड़ हो गई. पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में बैंक ने ₹38,598 करोड़ की कुल आय दर्ज की थी. वहीं, शुद्ध ब्याज आय (NII) 20.39% बढ़कर ₹11,005 करोड़ पहुंच गई, जो एक साल पहले ₹9,141 करोड़ थी.
बैंक का वैश्विक कारोबार भी मजबूत हुआ है. सितंबर 2026 के अंत तक कुल वैश्विक कारोबार 15.88% की सालाना बढ़ोतरी के साथ ₹30.72 लाख करोड़ हो गया. इसमें वैश्विक जमा ₹16.97 लाख करोड़ और वैश्विक कर्ज ₹13.75 लाख करोड़ रहा.
खराब कर्ज में आई कमी
केनरा बैंक के एसेट क्वालिटी के मोर्चे पर भी सुधार देखने को मिला. सितंबर 2026 में बैंक का ग्रॉस एनपीए अनुपात घटकर 1.33% रह गया, जबकि जून 2026 में यह 1.57% और सितंबर 2025 में 2.35% था. इसी तरह, नेट एनपीए अनुपात एक साल पहले के 0.54% से घटकर 0.30% पर आ गया.
बैंक का ग्रॉस एनपीए सितंबर तिमाही में ₹18,299 करोड़ रहा, जो जून तिमाही में ₹20,354 करोड़ और पिछले साल की समान अवधि में ₹27,040 करोड़ था. हालांकि, खराब कर्ज में आई पूरी कमी को नकद वसूली नहीं माना जा सकता. इसमें ₹719 करोड़ की नकद वसूली, ₹452 करोड़ के खातों का दोबारा सामान्य होना और ₹2,800 करोड़ के कर्ज को बट्टे खाते में डालना भी शामिल है.
तिमाही के दौरान ₹1,844 करोड़ के नए कर्ज खराब कर्ज की श्रेणी में आए. जून तिमाही में यह आंकड़ा ₹1,781 करोड़ था. वहीं, प्रोविजन कवरेज रेश्यो बढ़कर 95.34% हो गया, जो पिछले साल सितंबर में 93.59% था.
कर्ज और जमा में कितनी बढ़ोतरी?
बैंक के वैश्विक कर्ज में सालाना आधार पर 19.46% की बढ़ोतरी हुई और यह ₹13.75 लाख करोड़ पर पहुंच गया. दूसरी ओर, वैश्विक जमा 13.13% बढ़कर ₹16.97 लाख करोड़ हो गई. इससे स्पष्ट है कि बैंक के कर्ज में बढ़ोतरी जमा की तुलना में तेज रही.
खुदरा कर्ज में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिली. यह सालाना आधार पर 31.61% बढ़कर ₹3.31 लाख करोड़ हो गया. आवास कर्ज 17.35% बढ़कर ₹1.35 लाख करोड़ और वाहन कर्ज 25.50% बढ़कर ₹29,326 करोड़ पर पहुंच गया. छोटे एवं मझोले कारोबारों को दिया गया कर्ज 15.49% बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ रहा, जबकि कृषि और संबंधित क्षेत्रों का कर्ज 14.26% बढ़कर ₹3.04 लाख करोड़ हो गया.
कर्ज की तेज वृद्धि के बीच बैंक का वैश्विक क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात बढ़कर 81.01% हो गया. जून तिमाही में यह 80.25% और पिछले साल सितंबर में 76.72% था.
शुद्ध ब्याज मार्जिन में भी सुधार
सितंबर तिमाही में बैंक का शुद्ध ब्याज मार्जिन (NIM) बढ़कर 2.55% हो गया. जून तिमाही में यह 2.52% और पिछले वित्त वर्ष की सितंबर तिमाही में 2.50% था. शुद्ध ब्याज मार्जिन बैंक की ब्याज से होने वाली कमाई और ब्याज पर किए जाने वाले खर्च के बीच के अंतर को दर्शाता है.
हालांकि, कम लागत वाली जमा के मोर्चे पर बैंक को अभी और सुधार करना है. घरेलू चालू और बचत खातों की जमा (CASA) सालाना आधार पर 4.85% बढ़कर ₹4,48,889 करोड़ हो गई. घरेलू जमा में इसकी हिस्सेदारी 29% रही, जबकि बैंक ने मार्च 2027 तक इसे 30-32% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है.
गैर-ब्याज आय में गिरावट
कुछ मोर्चों पर बैंक का प्रदर्शन कमजोर भी रहा. गैर-ब्याज आय सालाना आधार पर 18.17% घटकर ₹5,772 करोड़ रह गई. ट्रेजरी आय में 68.48% की गिरावट आई और यह ₹499 करोड़ रही. निवेश बेचने से होने वाला मुनाफा भी पिछले साल के ₹1,217 करोड़ से घटकर ₹153 करोड़ रह गया.
वहीं, शुल्क आधारित आय 6.54% बढ़कर ₹2,755 करोड़ पहुंच गई. कुल प्रावधान और कर संबंधी मदों का आंकड़ा सालाना आधार पर 6.06% घटकर ₹3,583 करोड़ रहा.
पूंजी की स्थिति मजबूत, पूरे साल के लक्ष्य से आगे कारोबार
सितंबर 2026 में बैंक का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 17.19% रहा, जो पिछले साल की समान अवधि में 16.20% था. मुख्य इक्विटी पूंजी अनुपात 12.80% दर्ज किया गया.
बैंक का वैश्विक कारोबार, कर्ज और जमा में वृद्धि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तय लक्ष्यों से आगे चल रही है. मार्च 2027 तक वैश्विक कारोबार में 10-11%, वैश्विक कर्ज में 11-12% और वैश्विक जमा में 9-10% वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है. सितंबर तक इनकी सालाना वृद्धि दर क्रमशः 15.88%, 19.46% और 13.13% रही.
खराब कर्ज के मामले में भी बैंक की स्थिति तय लक्ष्यों से बेहतर है. मार्च 2027 तक ग्रॉस एनपीए 1.50%, नेट एनपीए 0.40% और क्रेडिट कॉस्ट 0.75% तक रखने का लक्ष्य है. सितंबर तिमाही में ये आंकड़े क्रमशः 1.33%, 0.30% और 0.47% रहे.
नतीजों के बाद शेयर में तेजी
केनरा बैंक के तिमाही नतीजों के बाद शेयर में खरीदारी बढ़ी. खबर लिखे जाने तक शेयर 3.55% की तेजी के साथ ₹124.72 पर कारोबार कर रहा था, जबकि इंट्राडे कारोबार के दौरान इसमें 5% से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. बैंक के मुनाफे, शुद्ध ब्याज आय और एसेट क्वालिटी में सुधार ने निवेशकों का ध्यान खींचा. खबर लिखे जाने के दौरान यह 3.19 प्रतिशत की तेजी पर कारोबार कर रहा था.
सितंबर के थोक महंगाई के आंकड़े संशोधित सूचकांक सीरीज के तहत जारी किए गए हैं. इस सीरीज में 2022-23 को आधार वर्ष बनाया गया है, ताकि अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलावों को बेहतर तरीके से शामिल किया जा सके.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में खुदरा महंगाई के बाद अब थोक महंगाई ने भी चिंता बढ़ा दी है. सितंबर 2026 में थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% हो गई, जो अगस्त में 9.92% थी. सितंबर 2022 के बाद पहली बार थोक महंगाई दोहरे अंकों में पहुंची है. कच्चे तेल, ईंधन और बिजली की कीमतों में तेजी के साथ खाद्य पदार्थों और विनिर्मित उत्पादों की महंगाई ने भी इस बढ़ोतरी में योगदान दिया है.
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से बुधवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर सालाना आधार पर 11.39% रही. यह अर्थशास्त्रियों के 10.18% के अनुमान से भी अधिक है. इससे पहले अगस्त में थोक महंगाई दर 9.92% दर्ज की गई थी. वहीं, इस सप्ताह जारी आंकड़ों के अनुसार, खुदरा महंगाई दर भी अगस्त के 4.83% से बढ़कर सितंबर में 5.54% पर पहुंच गई. खाद्य पदार्थों, खासकर सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी को इसकी प्रमुख वजह माना गया.
चार साल के उच्च स्तर पर पहुंची थोक महंगाई
सितंबर 2022 के बाद पहली बार थोक महंगाई दर 10% के पार पहुंची है. उस समय यह 10.70% दर्ज की गई थी. सितंबर 2026 का आंकड़ा पिछले चार वर्षों में थोक महंगाई का सबसे ऊंचा स्तर है. इसके साथ ही थोक महंगाई में लगातार दूसरे महीने बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
इससे पहले नवंबर 2025 से जून 2026 तक थोक महंगाई में लगातार इजाफा हुआ था, जबकि जुलाई में मामूली गिरावट आई थी. अब एक बार फिर महंगाई में तेजी ने अर्थव्यवस्था और आम लोगों की लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका पैदा कर दी है.
ईंधन और बिजली की महंगाई में सबसे ज्यादा तेजी
आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में ईंधन और बिजली की महंगाई दर बढ़कर 25.85% हो गई, जो अगस्त में 22.93% थी. इसी तरह, विनिर्मित उत्पादों की महंगाई दर अगस्त के 8.37% से बढ़कर सितंबर में 9.76% पर पहुंच गई.
प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर भी 7.76% से बढ़कर 8.67% हो गई. इस श्रेणी में खाद्य पदार्थों के अलावा गैर-खाद्य वस्तुएं और खनिज शामिल हैं. वहीं, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित खाद्य उत्पादों को मिलाकर तैयार थोक खाद्य सूचकांक की महंगाई दर सितंबर में 8.66% रही, जबकि अगस्त में यह 7.05% थी.
मंत्रालय के मुताबिक, थोक महंगाई बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में खनिज तेल, खाद्य पदार्थ, कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस, कोयला, लिग्नाइट, बुनियादी धातुएं, रसायन, कपड़ा, रबर एवं प्लास्टिक उत्पाद और बिजली के उपकरण शामिल रहे.
कच्चे तेल की कीमतें कैसे बढ़ा रही हैं महंगाई?
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता. इससे परिवहन, खेती, सिंचाई और माल ढुलाई की लागत भी बढ़ सकती है. जब कंपनियों की उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ती है, तो उसका असर उत्पादों की थोक कीमतों पर पड़ सकता है.
इसके अलावा, प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतों से उर्वरकों की लागत बढ़ने की आशंका रहती है. भारत खाद्य तेलों के आयात पर भी काफी निर्भर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है. पैकेजिंग, फसल सुरक्षा और माल ढुलाई की बढ़ती लागत भी खाद्य पदार्थों की कीमतों को प्रभावित कर सकती है.
इस तरह ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुंच सकता है. यदि कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो आने वाले समय में खुदरा कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है.
खाद्य महंगाई पर अल नीनो और कमजोर मानसून का खतरा
अर्थशास्त्रियों ने खाद्य महंगाई के लिए अल नीनो और मानसून की असमान बारिश को प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है. मौसम में बदलाव से खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित होने और रबी की बुआई में देरी की आशंका बढ़ सकती है.
ICRA की अदिति नायर और ANZ के धीरज निम के मुताबिक, जलाशयों में पानी का स्तर औसत से कम रहना सर्दियों की फसलों के लिए चिंता का विषय है. हालांकि, खाद्य पदार्थों की कीमतों पर इसका वास्तविक असर फसल उत्पादन और आगे मौसम की स्थिति पर निर्भर करेगा.
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा और अन्य जिंसों की कीमतें बढ़ने से भी खाद्य पदार्थों की लागत पर दबाव पड़ सकता है. ऐसे में आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा तय करने में घरेलू फसल उत्पादन और वैश्विक कमोडिटी कीमतों की अहम भूमिका रहेगी.
महंगाई के मोर्चे पर RBI की चुनौती बढ़ी
थोक और खुदरा, दोनों तरह की महंगाई में बढ़ोतरी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए भी चुनौती बढ़ा सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर की शुरुआत में RBI ने बेंचमार्क रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% कर दिया था. फरवरी 2023 के बाद यह पहली बढ़ोतरी बताई गई है. गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी संकेत दिया था कि महंगाई और उसके अनुमान पिछले साल की तुलना में उतने अनुकूल नहीं हैं.
हालांकि, थोक महंगाई में बढ़ोतरी का खुदरा कीमतों पर कितना और कब असर पड़ेगा, यह कंपनियों की लागत, मांग और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. यदि कच्चे तेल और अन्य इनपुट की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो उत्पादन लागत के साथ उपभोक्ताओं पर भी महंगाई का दबाव बढ़ सकता है.
नई आधार वर्ष वाली सीरीज में जारी हुए आंकड़े
सितंबर के थोक महंगाई के आंकड़े संशोधित सूचकांक सीरीज के तहत जारी किए गए हैं. इस सीरीज में 2022-23 को आधार वर्ष बनाया गया है, ताकि अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलावों को बेहतर तरीके से शामिल किया जा सके.
नई सीरीज में वस्तुओं की संख्या 697 से बढ़ाकर 957 कर दी गई है. इसमें सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा जैसे ऊर्जा के नए स्रोतों को भी शामिल किया गया है. इससे थोक कीमतों में होने वाले बदलावों का आकलन पहले की तुलना में अधिक व्यापक आधार पर किया जा सकेगा.
घरेलू म्यूचुअल फंड में निवेश 25% बढ़कर ₹59,200 करोड़ पहुंचा, सितंबर में निफ्टी 50 में 6.1% की गिरावट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने सितंबर में भारतीय शेयर बाजार से 4.1 अरब डॉलर की निकासी की. इसके साथ ही उन्होंने पिछले दो महीनों के दौरान की गई खरीदारी का करीब 84% हिस्सा वापस निकाल लिया. उभरते बाजारों की तुलना में भारतीय शेयर बाजार के कमजोर प्रदर्शन के बीच विदेशी निवेशकों ने यह कदम उठाया. हालांकि, इस दौरान वित्तीय क्षेत्र के शेयरों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी और इस क्षेत्र को लेकर उनका रुख तटस्थ हो गया. वहीं, घरेलू म्यूचुअल फंड में निवेश सितंबर में 25% बढ़कर ₹59,200 करोड़ पहुंच गया. ब्रोकरेज फर्म CLSA की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है.
सितंबर में 6.1% गिरा निफ्टी 50
सितंबर में निफ्टी 50 इंडेक्स 6.1% की गिरावट के साथ बंद हुआ. अमेरिकी डॉलर के लिहाज से इसका प्रदर्शन उभरते बाजारों और जापान को छोड़कर एशिया के अन्य बाजारों की तुलना में करीब छह प्रतिशत अंक कमजोर रहा. महीने के दौरान सभी सेक्टर गिरावट के साथ बंद हुए. सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और ऑटोमोबाइल शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई, जबकि दूरसंचार और हेल्थकेयर क्षेत्र के शेयरों में अपेक्षाकृत कम कमजोरी रही.
CLSA की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर में भी विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी है. महीने में अब तक वे भारतीय शेयर बाजार से 3.6 अरब डॉलर की निकासी कर चुके हैं.
सितंबर में भारत पर विशेष रूप से निवेश करने वाले सक्रिय फंडों के अलावा अन्य सक्रिय फंडों ने 9 अरब डॉलर के शेयर बेचे. हालांकि, भारत पर केंद्रित नहीं रहने वाले निष्क्रिय फंडों की ओर से 5.8 अरब डॉलर की खरीदारी ने इस बिकवाली के असर को कुछ हद तक कम किया.
वित्तीय क्षेत्र में एफआईआई का रुख हुआ तटस्थ
भारतीय शेयर बाजार में व्यापक बिकवाली के बावजूद विदेशी निवेशकों ने अपने पोर्टफोलियो में सेक्टर के हिसाब से बदलाव किए. उन्होंने वित्तीय क्षेत्र में अपनी सापेक्ष हिस्सेदारी 56 आधार अंक बढ़ाई. इसके साथ ही लगातार तीन महीनों तक इस क्षेत्र में कम निवेश रखने के बाद उनका रुख तटस्थ हो गया.
विदेशी निवेशकों ने ऊर्जा क्षेत्र में अपनी कम हिस्सेदारी 35 आधार अंक और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में 20 आधार अंक कम की. वहीं, आईटी सेक्टर में अपनी सापेक्ष हिस्सेदारी 18 आधार अंक बढ़ाई. इससे आईटी क्षेत्र में उनका कम निवेश वाला रुख घटकर 1.2 प्रतिशत अंक के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया.
इन बदलावों के लिए विदेशी निवेशकों ने उपभोक्ता विवेकाधीन क्षेत्र (ऑटोमोबाइल को छोड़कर) और हेल्थकेयर में अपनी अधिक हिस्सेदारी कम की. इन दोनों क्षेत्रों में उनकी सापेक्ष हिस्सेदारी क्रमशः 47 आधार अंक और 30 आधार अंक घटी. इसके अलावा, कम्युनिकेशन सर्विसेज में आठ आधार अंक और यूटिलिटी सेक्टर में छह आधार अंक की कमी आई.
रिपोर्ट के मुताबिक, औद्योगिक क्षेत्र विदेशी संस्थागत निवेशकों के पोर्टफोलियो में अब भी सबसे अधिक वरीयता वाला सेक्टर बना हुआ है. इसमें उनकी हिस्सेदारी बेंचमार्क से 1.8 प्रतिशत अंक अधिक है.
घरेलू म्यूचुअल फंड में निवेश 25% बढ़ा
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच घरेलू म्यूचुअल फंड भारतीय शेयर बाजार को सहारा देते रहे. एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) सहित घरेलू म्यूचुअल फंड में सितंबर के दौरान निवेश मासिक आधार पर 25% बढ़कर ₹59,200 करोड़ हो गया.
सक्रिय फंडों में निवेश 21% बढ़कर ₹40,900 करोड़ रहा, जबकि निष्क्रिय फंडों में निवेश 35% की बढ़ोतरी के साथ ₹18,300 करोड़ पहुंच गया.
एसआईपी निवेश रिकॉर्ड स्तर पर, लेकिन बंद होने वाले प्लान की संख्या बढ़ी
सितंबर में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए मासिक निवेश रिकॉर्ड ₹32,500 करोड़ पर पहुंच गया. हालांकि, एसआईपी बंद करने वाले निवेशकों की संख्या और नए एसआईपी की संख्या के अनुपात में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनी हुई है.
अगस्त में यह अनुपात 81% था, जो सितंबर में बढ़कर 116% हो गया. यह पिछले 18 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है. इससे संकेत मिलता है कि खुदरा निवेशकों की भागीदारी को लंबे समय तक बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है.
मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंडों में भी निवेश बढ़ा. सितंबर में मिड-कैप फंडों में ₹7,800 करोड़ और स्मॉल-कैप फंडों में ₹9,000 करोड़ का निवेश आया, जो इन दोनों श्रेणियों के लिए अब तक का उच्चतम स्तर है.
इसके विपरीत, लार्ज-कैप फंडों में केवल ₹860 करोड़ का निवेश आया. इससे पहले लगातार दो महीनों तक इन फंडों से शुद्ध निकासी दर्ज की गई थी.
कुल मिलाकर, आंकड़े दिखाते हैं कि विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद घरेलू निवेशक बाजार को सहारा दे रहे हैं. हालांकि, एसआईपी बंद होने के अनुपात में बढ़ोतरी पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि यह घरेलू निवेश प्रवाह की स्थिरता और खुदरा निवेशकों के भरोसे का एक अहम संकेतक है.