देश भर के पुलिस बल में कितनी वैकेंसीज, क्या है महिलाओं की स्थिति; हुआ खुलासा

41% पुलिस थानों में अभी तक महिलाओं के लिए हेल्प डेस्क नहीं है. 3 में से 1 पुलिस थाने में अभी तक एक भी सीसीटीवी कैमरा नहीं है. पुलिस में महिलाओं की हिस्‍सेदारी केवल 10.5% है.

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Sunday, 10 July, 2022
Police Vacancies

नई दिल्ली: डेटा ऑन पुलिस ऑर्गनाइजेशंस रिपोर्ट 2021 (Data on Police Organisations Report 2021) के अनुसार, जनवरी 2021 तक देश भर के पुलिस विभागों में 5.62 लाख रिक्त पद थे. भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस बलों में 2010 और 2020 के बीच 32% की वृद्धि हुई है. लेकिन महिलाओं की हिस्सेदारी 33% के मुकाबले केवल 10.5% है. महिला हेल्प डेस्क, जिसकी कल्पना किसी भी महिला के पुलिस स्टेशन में प्रवेश करने के लिए संपर्क के पहले और एकल बिंदु के रूप में की गई थी, अभी भी पूरे भारत के 41% पुलिस स्टेशन से दूर है.

SC की हिस्सेदारी में मामूली बढ़ोतरी
अनुसूचित जातियों (एससी) की हिस्सेदारी 2010 में 12.6 फीसदी से मामूली बढ़कर 2020 में 15.2% हो गई थी, लेकिन अनुसूचित जनजाति (एसटी) की हिस्सेदारी में मामूली बढ़ोतरी हुई है. यह हिस्‍सेदारी 2010 में 10.6 फीसदी से बढ़कर 2020 में 11.7 फीसदी हो गई है. अन्य पिछड़ा वर्ग ( ओबीसी) ने 2010 में 20.8% से 2020 में 28.8% तक मजबूत प्रतिनिधित्व दर्ज किया है. ये लेटेस्ट डेटा इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (the India Justice Reports ) के डेटा ऑन पुलिस ऑर्गनाइजेशंस (DoPo) रिपोर्ट 2021, के विश्लेषण के कुछ नतीजे हैं. इसमें जनवरी, 2021 तक का डाटा कैप्चर किया गया है. IJR ने 2007 की DoPo रिपोर्ट से पुलिस की क्षमता पर भी डाटा का विश्लेषण किया है. DoPo का प्रकाशन समय-समय पर भारत सरकार की इकाई पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो द्वारा किया जाता है.

33% महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट की मुख्य संपादक सुश्री माजा दारूवाला ने कहा, "केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश (UT) स्तरों पर सरकारों ने अपने पुलिस बलों में नीति और जनादेश दोनों में विविधता को स्वीकार किया है. एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण वाले 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल कर्नाटक ने 2020 में अपने वैधानिक आरक्षित कोटा को पूरा किया है. 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में, जहां पुलिस बल में 33% महिलाओं को शामिल करना अनिवार्य किया गया है, कोई भी राज्य "अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है."

वैकेंसीज
2010 और 2020 के बीच, कुल पुलिस  संख्या में 32% की वृद्धि हुई है और यह 15.6 लाख से बढ़कर 20.7 लाख हो गई है. हालांकि, कॉन्‍स्‍टेबल और अधिकारी रैंक में रिक्तियां स्थिर बनी हुई हैं. 2010 में, राष्ट्रीय समग्र रिक्ति स्तर 24.3% था. अधिकारी रिक्तियां 24.1% और कॉन्‍स्‍टेबल रिक्तियां 27.2% पर थीं. 2020 में, कुल रिक्तियां 21.4% हैं, जिसमें अधिकारी रिक्तियां 32.2% और कॉन्‍स्‍टेबल रिक्‍तयां 20% पर हैं.

कोविड-19 ने भी प्रभावित किया
कोविड-19 प्रभावित पहले वर्ष, 2020 के दौरान, कुल रिक्तियां 20.3% से बढ़कर 21.4% हो गई जबकि पुलिस बल की स्वीकृत संख्या में 8,665 की वृद्धि हुई, वहीं वास्तविक संख्या में 21,926 की कमी हुई. राष्ट्रीय स्तर पर, कॉन्‍स्‍टेबल रिक्ति 2019 में 18% से बढ़कर 20% हो गई है. इसी तरह, अधिकारी रिक्ति 2019 में 29% से बढ़कर 2020 में 32% हो गई है. केवल 3 राज्य - तेलंगाना, कर्नाटक और केरल - कॉन्‍स्‍टेबल और अधिकारियों दोनों के बीच रिक्तियों को कम कर सकते हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम में कॉन्‍स्‍टेबल और अधिकारी के एक चौथाई से अधिक पद खाली हैं. बिहार में सबसे अधिक 41.8% और उत्तराखंड में सबसे कम 6.8% वैकेंसीज हैं. 

पुलिस में अनुसूचित जातियों का हिस्सा
अधिकारी : अधिकारी स्तर पर, 2010 में, 6 राज्य / केंद्र शासित प्रदेश अपने अनुसूचित जाति कोटा तक पहुंचने या उससे अधिक करने में कामयाब रहे, एक दशक बाद, 2020 में, केवल 5 राज्य / केंद्र शासित प्रदेश  गुजरात, मणिपुर, कर्नाटक, गोवा और तमिलनाडु ने अपने स्वयं के एससी कोटे को पूरा कर लिया या उससे अधिक हो गए हैं. 11 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने 2020 में एससी अधिकारी रिक्ति को कम करने में कामयाबी हासिल की, और इतने ही राज्यों (11) में यह बढ़ गया. उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा में अनुसूचित जाति अधिकारी की रिक्ति क्रमशः 50% से बढ़कर 64% और 6% से 22% हो गई, तमिलनाडु और उत्तराखंड में यह 33% से घटकर -4% और 61% से 44% हो गई.

कांस्टेबुलरी : 2010 में, 2 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश  ने एससी कॉन्‍स्‍टेबल का कोटा पूरा किया या उससे अधिक हो गए, यह संख्या 2020 में बढ़कर 7 राज्यों   तक पहुंच गई है. 20 राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों ने 2020 में एससी कॉन्‍स्‍टेबल की रिक्ति को कम करने में कामयाबी हासिल की, लेकिन 10 राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों में यह बढ़ गई. तमिलनाडु और चंडीगढ़ में वैकेंसी 34% से घटकर -15% और 37% से 22% हो गई, यह त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में क्रमशः 7% से बढ़कर 22% और 10% से 23% हो गई.

पुलिस में अनुसूचित जनजातियों का हिस्सा
अधिकारी रैंक : 2010 में, 5 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों   ने अपने एसटी कोटा भरे. एक दशक बाद 2021 में, 8 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश  अपने एसटीकोटा तक पहुंचने या उससे आगे निकलने में कामयाब रहे. 11 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में आरक्षित पदों पर रिक्तियां (वैकेंसी) बढ़ीं और 11 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में घटी. जबकि उत्तराखंड और असम में, रिक्ति क्रमशः 61% से गिरकर 33% और 41% से 26% हो गई, यह उत्तर प्रदेश और सिक्किम में क्रमशः 67% से 89% और 21% से 33% तक बढ़ गई.

कांस्टेबुलरी : 2010 में, 7 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों  ने एसटी कोटा भरा. 2020 में, 9 राज्य / केंद्र शासित प्रदेश  अपने एसटी कॉन्‍स्‍टेबल कोटा तक पहुंचने या उससे अधिक होने में कामयाब रहे. 11 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में आरक्षित पदों पर रिक्तियां बढ़ीं और 10 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में घटीं. जबकि उत्तराखंड और तमिलनाडु में रिक्ति क्रमशः 8% से गिरकर -33% और 54% से 14% हो गई, मेघालय और तेलंगाना में यह क्रमशः -17% से बढ़कर 9% और -7% से बढ़कर 14% पहुंच गई.

पुलिस में अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी
अधिकारी रैंक : 2010 में, 3 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने ओबीसी कोटा को पूरा किया. एक दशक बाद 2021 में, 8 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश  अपने ओबीसी अधिकारी कोटा तक पहुंचने या उससे आगे निकलने में कामयाब रहे. आरक्षित पदों पर रिक्तियां 9 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में बढ़ीं और 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में घटीं. जबकि तमिलनाडु और गुजरात में रिक्ति क्रमश: 2% से -50% और 44% से घटकर 19% हो गई, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में यह क्रमशः 3% से 18% और 33% से बढ़कर 48% हो गई.

कांस्टेबुलरी : 2010 में , 6 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश ओबीसी कोटा तक पहुंच गए या उससे अधिक हो गए. 2020 में, 14 राज्य / केंद्र शासित प्रदेश अपने ओबीसी कॉन्‍स्‍टेबल कोटा तक पहुंच गए या उससे अधिक हो गए. आरक्षित पदों पर रिक्तियां 5 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में बढ़ीं और 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में घटीं. जबकि तमिलनाडु और गुजरात में रिक्ति क्रमशः 33% से घटकर 13% और 21% से -20% हो गई. यह उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में क्रमशः 8% से बढ़कर 16% और 38% से बढ़कर 45% हो गई.

पुलिस में महिलाओं की स्थिति
पुलिस बल में महिलाओं का प्रतिशत 10.5 है. इसे 33% तक ले जाने की आकांक्षा है, जबकि 6 केंद्र शासित प्रदेशों और 11 राज्यों में 33% आरक्षण का लक्ष्य है. अन्य जगहों पर बिहार के 38% से लेकर अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और त्रिपुरा में 10% तक का लक्ष्य है. 7 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों  में कोई आरक्षण नहीं है. 2020 तक, कोई भी एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश अपने लिए निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया है. बड़े और मध्यम आकार के राज्यों में, तमिलनाडु में 19.4%, बिहार में 17.4% और गुजरात में 16% के साथ महिलाओं की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, लेकिन वे भी 30%, 38%, और क्रमशः 33 प्रतिशत के अपने आरक्षण को पूरा नहीं करते हैं. महिलाओं की 6.3 फीसदी हिस्सेदारी के साथ आंध्र प्रदेश में सबसे कम हिस्सेदारी है, झारखंड और मध्य प्रदेश में महिलाओं की 6.6 फीसदी हिस्सेदारी है.

महिला अधिकारी : राष्ट्रीय स्तर पर, महिला अधिकारियों की हिस्सेदारी  8.2% है. 11 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों  में अधिकारी स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी 5% या उससे कम है. केरल पुलिस में 3% महिला अधिकारी हैं, और पश्चिम बंगाल में 4.2% हैं. तमिलनाडु और मिजोरम, दोनों में महिला अधिकारियों की हिस्सेदारी सबसे अधिक 20.2% है. 

किन राज्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी घटी
बिहार और हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की हिस्सेदारी में तेज गिरावट दर्ज की गई. 2019 में, बिहार ने 25.3% महिला अधिकारियों की सूचना दी, जो 2020 में घटकर 17.4% पर आ गई. हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की हिस्‍सेदारी 2019 के 19.2% के मुकाबले 2020 में गिरकर 13.5% रह गई.

थानों में महिला हेल्प डेस्क की स्थापना
10 जनवरी 2020 की अपनी एडवाइजरी में, गृह मंत्रालय, (महिला सुरक्षा प्रभाग) ने राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों को सभी पुलिस स्टेशनों में महिला हेल्प डेस्क स्थापित करने की सलाह दी. यह निर्भया फंड परियोजनाओं के तहत देश के 10,000 पुलिस स्टेशनों में महिला हेल्प डेस्क की स्थापना/मजबूत करने की एक पहले की पायलट पहल का विस्तार था. किसी भी महिला के पुलिस थाने में आने के लिए महिला हेल्प डेस्क संपर्क का पहला और एकल बिंदु होगा. 1 जनवरी 2021 तक, 41% पुलिस स्टेशनों में महिला हेल्प डेस्क नहीं है. केवल त्रिपुरा के सभी 82 पुलिस स्टेशनों में महिला हेल्प डेस्क हैं. 9 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों  में, 90% से अधिक पुलिस स्टेशनों में महिला हेल्प डेस्क हैं. अरुणाचल प्रदेश में कोई नहीं है. बिहार के कुल 1053 पुलिस थानों में से केवल 14% थानों में महिला हेल्प डेस्क हैं.

सीसीटीवी कैमरे की स्थिति
अपनी 2021 की रिपोर्ट में, पुलिस संगठन के डेटा से पता चलता है कि भारत के कुल 17,233 पुलिस स्टेशनों में से 5,396 में एक भी सीसीटीवी कैमरा नहीं है . केवल 3 राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों - ओडिशा, तेलंगाना और पुडुचेरी में सभी पुलिस स्टेशनों में कम से कम एक सीसीटीवी है. 4 राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों - राजस्थान, मणिपुर, लद्दाख, लक्षद्वीप - ने सीसीटीवी कैमरों के साथ 1% से कम पुलिस स्टेशनों की सूचना दी है. राजस्थान, जिसमें कुल 894 पुलिस स्टेशन हैं और जनसंख्या के हिसाब से सातवां सबसे बड़ा राज्य है, केवल एक पुलिस स्टेशन सीसीटीवी कैमरों के साथ रिपोर्ट करता है. मणिपुर, लद्दाख और लक्षद्वीप ने किसी की सूचना नहीं दी.

सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया है आदेश
दिसंबर 2020 में कुछ पुलिस कर्मियों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग का संज्ञान लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश  दिया कि सभी पुलिस स्टेशनों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं. इंडिया जस्टिस रिपोर्ट कलेक्टिव ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कार्यान्वयन की स्थिति का पता लगाने के लिए सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में आरटीआई दायर की है.

क्या है इंडिया जस्टिस रिपोर्ट
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट को संपूर्ण न्याय क्षेत्र में सुधार के लिए काम कर रहे संगठनों के समूह द्वारा लाया गया है. ये हैं, सेंटर फॉर सोशल जस्टिस, कॉमन कॉज़, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव, दक्ष, टीआइएसएस-प्रयास, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी और हाउ इंडिया लिव्ज़ हैं. पहली आईजेआर का प्रकाशन 2019 में हुआ था. 


मेडिकल लॉजिस्टिक्स में आएगी नई उड़ान, एयर इंडिया, स्काईड्राइव और सुजुकी ने किया समझौता

इस साझेदारी के तहत कंपनियां यह आकलन करेंगी कि eVTOL विमान 'लास्ट-माइल' आपातकालीन मेडिकल लॉजिस्टिक्स में किस तरह मददगार साबित हो सकते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 01 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 01 August, 2026
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भारत में आपातकालीन मेडिकल सप्लाई की डिलीवरी को तेज और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एयर इंडिया ने जापान की eVTOL (इलेक्ट्रिक वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग) विमान निर्माता स्काईड्राइव (SkyDrive) और सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन (Suzuki Motor Corporation) के साथ समझौता (MoU) किया है. तीनों कंपनियां मिलकर यह अध्ययन करेंगी कि भीड़भाड़ वाले भारतीय शहरों में समय-संवेदनशील चिकित्सा सामग्री की ढुलाई के लिए eVTOL विमानों का इस्तेमाल कितना व्यावहारिक और प्रभावी हो सकता है.

मेडिकल लॉजिस्टिक्स के लिए होगी व्यवहार्यता का अध्ययन

इस साझेदारी के तहत कंपनियां यह आकलन करेंगी कि eVTOL विमान 'लास्ट-माइल' आपातकालीन मेडिकल लॉजिस्टिक्स में किस तरह मददगार साबित हो सकते हैं. इसका उद्देश्य सड़क जाम के कारण होने वाली देरी को कम करना और उच्च मूल्य वाली तथा समय-संवेदनशील मेडिकल सप्लाई को तेजी से अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाना है.

तीनों कंपनियों की होगी अलग-अलग भूमिका

प्रस्तावित सहयोग के तहत स्काईड्राइव अपनी eVTOL तकनीक उपलब्ध कराएगी. एयर इंडिया विमान संचालन, एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और एविएशन इकोसिस्टम से जुड़े अपने अनुभव का योगदान देगी. वहीं, सुजुकी भारतीय बाजार की समझ और स्थानीय परिचालन संबंधी विशेषज्ञता के आधार पर सुरक्षित, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले मॉडल का मूल्यांकन करेगी.

फिलहाल यह पहल व्यवहार्यता अध्ययन (Feasibility Study) के चरण में है और कंपनियों ने इसके व्यावसायिक संचालन की कोई समयसीमा घोषित नहीं की है.

मेडिकल सप्लाई की डिलीवरी होगी तेज

एयर इंडिया के कार्गो प्रमुख रमेश ममिडाला ने कहा कि भारत का विमानन बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है और ऐसे में एडवांस्ड एयर मोबिलिटी देश के परिवहन नेटवर्क का अहम हिस्सा बन सकती है. उनके मुताबिक, मेडिकल एयर लॉजिस्टिक्स में eVTOL विमानों का उपयोग तकनीक और सामाजिक उद्देश्य का प्रभावी मेल है, क्योंकि इससे आपातकालीन चिकित्सा सामग्री की डिलीवरी का समय काफी कम किया जा सकता है.

एयर इंडिया इस अध्ययन के दौरान यह भी आकलन करेगी कि eVTOL संचालन को मौजूदा विमानन ढांचे और एयरपोर्ट नेटवर्क के साथ किस प्रकार जोड़ा जा सकता है.

भारत पर स्काईड्राइव और सुजुकी का फोकस

स्काईड्राइव के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) तोमोहिरो फुकुजावा ने कहा कि भारत जैसे बड़े और भीड़भाड़ वाले बाजार में eVTOL विमान उच्च मूल्य और समय-संवेदनशील मेडिकल सप्लाई की ढुलाई का प्रभावी समाधान बन सकते हैं.

सुजुकी और स्काईड्राइव पहले से ही eVTOL तकनीक पर साथ काम कर रहे हैं. दोनों कंपनियों ने 2022 में इस क्षेत्र में साझेदारी शुरू की थी, जिसके बाद सुजुकी ने स्काईड्राइव में निवेश किया और विनिर्माण सहयोग समझौता भी किया.

भारत को लेकर भी दोनों कंपनियां पहले से सक्रिय हैं. जुलाई 2025 में सुजुकी ने भारत को अपने प्रमुख विदेशी बाजारों में शामिल करने की रणनीति की घोषणा की थी. वहीं, जनवरी 2025 में स्काईड्राइव को भारतीय प्राइवेट जेट ऑपरेटर JetSetGo से 50 SKYDRIVE विमानों का प्री-ऑर्डर भी मिला था.

अगला कदम

अब तीनों कंपनियां संयुक्त रूप से यह अध्ययन करेंगी कि उनकी तकनीकी और परिचालन क्षमताओं को एकीकृत कर भारत के लिए सुरक्षित, व्यावहारिक और व्यावसायिक रूप से सक्षम मेडिकल एयर लॉजिस्टिक्स मॉडल विकसित किया जा सकता है या नहीं.
 


R&D निवेश में भारत की रफ्तार तेज, लेकिन GDP के अनुपात में अब भी चीन और ब्राजील से पीछे

R&D पर GDP के अनुपात में खर्च के मामले में भारत कई प्रमुख ब्रिक्स देशों से पीछे है. चीन ने 2024 में अपने GDP का 2.69 प्रतिशत, ब्राजील ने 2023 में 1.19 प्रतिशत और रूस ने 2024 में लगभग 0.94 प्रतिशत R&D पर खर्च किया.

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Published - Saturday, 01 August, 2026
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Saturday, 01 August, 2026
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भारत में शोध एवं विकास (R&D) पर कुल निवेश पिछले चार वर्षों में 85 प्रतिशत बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. हालांकि, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में R&D पर खर्च अब भी केवल 0.84 प्रतिशत है, जो चीन, ब्राजील और रूस जैसे ब्रिक्स देशों से कम है. वहीं, इस दौरान एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि पहली बार R&D निवेश में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सरकार से अधिक हो गई.

लोकसभा में सरकार की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2019-20 में R&D पर कुल खर्च 1.33 लाख करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में GDP के मुकाबले R&D खर्च की हिस्सेदारी 0.66 प्रतिशत से बढ़कर 0.84 प्रतिशत हुई. हालांकि, यह 2035 तक R&D पर GDP का 2 प्रतिशत खर्च करने के राष्ट्रीय लक्ष्य से अभी काफी दूर है.

BRICS देशों की तुलना में भारत पीछे

R&D पर GDP के अनुपात में खर्च के मामले में भारत कई प्रमुख ब्रिक्स देशों से पीछे है. चीन ने 2024 में अपने GDP का 2.69 प्रतिशत, ब्राजील ने 2023 में 1.19 प्रतिशत और रूस ने 2024 में लगभग 0.94 प्रतिशत R&D पर खर्च किया. भारत का यह आंकड़ा 0.84 प्रतिशत रहा. हालांकि, दक्षिण अफ्रीका (0.61 प्रतिशत) और वियतनाम (0.41 प्रतिशत) का खर्च भारत से कम दर्ज किया गया.

पहली बार निजी क्षेत्र ने सरकार को पीछे छोड़ा

रिपोर्ट के अनुसार, भारत के R&D निवेश ढांचे में उल्लेखनीय बदलाव आया है. वर्ष 2019-20 में कुल R&D खर्च में सरकार की हिस्सेदारी 66.2 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में घटकर 48.2 प्रतिशत रह गई. इसके विपरीत, निजी उद्योग की हिस्सेदारी 33.8 प्रतिशत से बढ़कर 51.8 प्रतिशत हो गई. यह पहला अवसर है जब देश में शोध एवं विकास पर निजी क्षेत्र का निवेश सरकारी हिस्सेदारी से अधिक रहा.

निजी निवेश में ढाई गुना उछाल

निजी क्षेत्र का R&D पर निवेश 2019-20 के 44,754 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 1.18 लाख करोड़ रुपये हो गया. यानी चार वर्षों में यह करीब ढाई गुना बढ़ा और इसकी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 27.52 प्रतिशत रही.

राज्यों की भागीदारी अब भी सीमित

दूसरी ओर, राज्य सरकारों का योगदान अपेक्षाकृत कमजोर बना हुआ है. 2019-20 से 2023-24 के बीच राज्यों के R&D खर्च में केवल 3.4 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर्ज की गई. 2023-24 में देश के कुल R&D खर्च में राज्यों की हिस्सेदारी महज 4 प्रतिशत रही, जो शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में उनकी सीमित भूमिका को दर्शाती है.


पहली तिमाही में 22 राज्यों की कैपेक्स रफ्तार सुस्त, यूपी-बंगाल समेत कई बड़े राज्य पिछड़े: CAG

अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 22 राज्यों ने संयुक्त रूप से पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित 10.45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए.

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Published - Saturday, 01 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 01 August, 2026
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वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में राज्यों के पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) की रफ्तार सुस्त रही है. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के मासिक खातों के विश्लेषण के अनुसार, 22 राज्यों ने अप्रैल-जून अवधि में अपने पूंजीगत व्यय बजट का औसतन केवल 10.67 प्रतिशत खर्च किया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 10.94 प्रतिशत से कम है. रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों का प्रदर्शन भी अपेक्षा से कमजोर रहा, जबकि केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया.

अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 22 राज्यों ने संयुक्त रूप से पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित 10.45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. हालांकि, यह पिछले छह वर्षों की पहली तिमाहियों में खर्च की गई सबसे बड़ी वास्तविक राशि है, लेकिन बजट आवंटन के मुकाबले खर्च का अनुपात घटा है.

पिछले वर्षों की तुलना में कैसी रही तस्वीर?

सीएजी के आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में कैपेक्स खर्च का अनुपात पिछले कुछ वर्षों से सीमित दायरे में बना हुआ है. वित्त वर्ष 2023 में यह सबसे कम 9.02 प्रतिशत रहा था, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह 13.23 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंचा था. मौजूदा वित्त वर्ष में 10.67 प्रतिशत का खर्च वित्त वर्ष 2023 और 2025 से बेहतर जरूर है, लेकिन वित्त वर्ष 2022 और 2026 की पहली तिमाही से कम है.

केरल ने दिखाई सबसे तेज रफ्तार

राज्यों में केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने वार्षिक पूंजीगत व्यय बजट का 36.41 प्रतिशत पहली तिमाही में ही खर्च कर दिया. इसके बाद मध्य प्रदेश (18.21 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (16.61 प्रतिशत), हरियाणा (16.26 प्रतिशत) और हिमाचल प्रदेश (15.90 प्रतिशत) का स्थान रहा.

त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश पीछे

सबसे कमजोर प्रदर्शन त्रिपुरा का रहा, जिसने अपने पूंजीगत व्यय आवंटन का केवल 1.81 प्रतिशत खर्च किया. इसके बाद पश्चिम बंगाल (1.89 प्रतिशत) और मेघालय (3.03 प्रतिशत) रहे. बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश, जिसका कैपेक्स बजट 1.78 लाख करोड़ रुपये के साथ सबसे बड़ा है, उसने जून के अंत तक केवल 6.34 प्रतिशत राशि खर्च की. वहीं ओडिशा (5.19 प्रतिशत), तमिलनाडु (5.53 प्रतिशत) और कर्नाटक (6.83 प्रतिशत) भी पूंजीगत व्यय के मामले में धीमे रहे.

राजस्व व्यय और कर संग्रह की स्थिति

पहली तिमाही में 22 राज्यों ने कुल 9.66 लाख करोड़ रुपये का राजस्व व्यय किया, जो उनके संयुक्त वार्षिक राजस्व व्यय बजट का 18.52 प्रतिशत है. इस मामले में हिमाचल प्रदेश (25.01 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (24.66 प्रतिशत), तेलंगाना (23.38 प्रतिशत) और केरल (22.69 प्रतिशत) सबसे आगे रहे. वहीं झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा.

कर राजस्व के मोर्चे पर राज्यों ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.73 लाख करोड़ रुपये की वसूली की, जो पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के अनुमानित कर राजस्व 40.48 लाख करोड़ रुपये का 19.11 प्रतिशत है.
 


विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार चौथे सप्ताह बढ़ोतरी, 682.35 अरब डॉलर पर पहुंचा भारत का फॉरेक्स रिजर्व

वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सुधार का असर आरबीआई के गोल्ड रिजर्व पर भी दिखा. समीक्षा सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर हो गया.

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Published - Saturday, 01 August, 2026
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Saturday, 01 August, 2026
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भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में मजबूती का सिलसिला लगातार चौथे सप्ताह भी जारी रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.118 अरब डॉलर बढ़कर 682.354 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इस बढ़ोतरी में विदेशी मुद्रा आस्तियों (FCA) के साथ-साथ सोने के भंडार के मूल्य में आई वृद्धि का अहम योगदान रहा.

आरबीआई के साप्ताहिक आंकड़ों के मुताबिक, इससे पहले वाले सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 1.08 अरब डॉलर का इजाफा हुआ था. हालांकि, यह अब भी 27 फरवरी 2026 को दर्ज 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर से नीचे है.

विदेशी मुद्रा आस्तियों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी

24 जुलाई को समाप्त सप्ताह के दौरान विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets-FCA) में 4.873 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई, जिससे इनका कुल मूल्य बढ़कर 555.929 अरब डॉलर हो गया. विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा FCA का होता है. इसमें यूरो, पाउंड और येन जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी प्रभाव शामिल होता है.

सोने के भंडार का मूल्य भी बढ़ा

वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सुधार का असर आरबीआई के गोल्ड रिजर्व पर भी दिखा. समीक्षा सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर हो गया. मार्च 2026 के अंत तक आरबीआई के पास 880.52 टन सोने का भंडार था, जो देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 16.7 प्रतिशत है.

SDR और IMF रिजर्व में मामूली गिरावट

दूसरी ओर, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) में 53 मिलियन डॉलर की कमी दर्ज की गई, जिसके बाद इसका स्तर 18.617 अरब डॉलर रह गया. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रखे भारत के रिजर्व में भी 11 मिलियन डॉलर की गिरावट आई और यह 4.750 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
 


ZEE को मिला शेयरधारकों का समर्थन, 3,143 करोड़ रुपये जुटाएगी कंपनी, बढ़ेगी प्रमोटर हिस्सेदारी

कंपनी ने शुक्रवार को बताया कि असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने प्रमोटर समूह की इकाई को वरीयता आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंटजारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 01 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 01 August, 2026
BWHindia

कंटेंट और टेक्नोलॉजी कंपनी ZEE एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE Entertainment Enterprises) को पूंजी जुटाने और कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ESOP) लागू करने के प्रस्तावों पर शेयरधारकों की मंजूरी मिल गई है. इस मंजूरी के तहत कंपनी के प्रमोटर समूह की इकाई 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, जिससे प्रमोटर्स की हिस्सेदारी बढ़कर 23.79 प्रतिशत हो जाएगी. कंपनी का कहना है कि यह कदम उसकी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने और दीर्घकालिक विकास रणनीति को गति देने में मदद करेगा.

शेयरधारकों ने EGM में दी मंजूरी

कंपनी ने शुक्रवार को बताया कि असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने प्रमोटर समूह की इकाई को वरीयता (Preferential) आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट (Fully Convertible Warrants) जारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही ZEE और उसकी सहायक कंपनियों के कर्मचारियों के लिए 'ट्रूली यॉर्स' (Truly Yours) कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ESOP) को भी हरी झंडी मिल गई है.

कंपनी के अनुसार, इन प्रस्तावों को मंजूरी मिलने से उसकी वित्तीय नींव और मजबूत होगी, जिससे भविष्य में मूल्य सृजन करने वाले निवेश और विकास के अवसरों का लाभ उठाया जा सकेगा.

प्रमोटर करेंगे 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश

शेयरधारकों की मंजूरी के बाद ZEE, प्रमोटर समूह की इकाई को 126 रुपये प्रति वारंट की कीमत पर 24,94,85,563 पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट जारी करेगी. इसके जरिए प्रमोटर समूह कंपनी में 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश करेगा. इस निवेश के बाद कंपनी में प्रमोटर्स की कुल हिस्सेदारी बढ़कर 23.79 प्रतिशत हो जाएगी.

ZEE एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज के चेयरमैन आर. गोपालन ने कहा कि यह मंजूरी कंपनी और उसके प्रबंधन पर शेयरधारकों के भरोसे को दर्शाती है. उन्होंने कहा कि प्रमोटर्स द्वारा किए जा रहे पूंजी निवेश से कंपनी की वित्तीय मजबूती और लचीलापन बढ़ेगा, जिससे ZEE प्रतिस्पर्धा में आगे रहने और सभी हितधारकों के लिए अधिक मूल्य सृजित करने में सक्षम होगी.

'Truly Yours' ESOP योजना लागू होगी

कंपनी 'Truly Yours' ESOP योजना के तहत ZEE और उसकी सहायक कंपनियों के पात्र कर्मचारियों को एक या अधिक चरणों में 3,74,22,835 स्टॉक विकल्प (Stock Options) जारी करेगी. प्रत्येक विकल्प का अंकित मूल्य (Face Value) 1 रुपये होगा.

कंपनी का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य कर्मचारियों को कंपनी की विकास यात्रा में वास्तविक भागीदार बनाना है. ESOP ढांचा कर्मचारियों की विकास आकांक्षाओं को कंपनी और उसके शेयरधारकों के दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ जोड़ता है, जिससे सभी हितधारकों के लिए सतत मूल्य सृजन सुनिश्चित किया जा सके.

विकास योजनाओं पर रहेगा फोकस

कंपनी के मुताबिक, अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध होने से वह अपने नए रणनीतिक विकास क्षेत्रों में निवेश बढ़ाएगी और मौजूदा कारोबार की क्षमताओं को मजबूत करेगी. इससे कंपनी की दीर्घकालिक विकास रणनीति को गति मिलने की उम्मीद है.
 


समुद्र से निकलेगी ऊर्जा की नई ताकत, 84,084 करोड़ की 'समुद्र मंथन' योजना को कैबिनेट की मंजूरी

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अपतटीय (ऑफशोर) क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को नई गति दी जाएगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 01 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 01 August, 2026
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मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ते ऊर्जा सुरक्षा जोखिमों के बीच केंद्र सरकार ने घरेलू तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन' (नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम) को मंजूरी दे दी है. वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू होने वाली इस योजना का उद्देश्य समुद्री क्षेत्रों में तेल-गैस की खोज तेज करना, आयात पर निर्भरता कम करना और भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत बनाना है.

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अपतटीय (ऑफशोर) क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को नई गति दी जाएगी. सरकार का अनुमान है कि इस पहल से देश के तेल भंडार में 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक की वृद्धि हो सकती है. साथ ही घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ने से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी.

क्यों अहम है यह योजना?

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है. ऐसे समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य, लाल सागर और अन्य प्रमुख समुद्री मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है, सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है. इसी रणनीति के तहत 'समुद्र मंथन' योजना को मंजूरी दी गई है.

अमित शाह ने किया पोस्ट
गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन' योजना भारत की अपतटीय ऊर्जा क्षमता का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करेगी. उनके मुताबिक, इससे घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ेगा, बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और 'विकसित भारत' के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी.

स्वदेशी उद्योग को मिलेगा बढ़ावा

सरकार का मानना है कि इस योजना से 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को नई मजबूती मिलेगी. ऑफशोर टेक्नोलॉजी, उपकरण निर्माण और सेवाओं से जुड़े उद्योगों में निवेश बढ़ेगा, जिससे वैश्विक स्तर का प्रतिस्पर्धी इकोसिस्टम विकसित होगा. साथ ही एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन वैल्यू चेन में दीर्घकालिक निवेश और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.

'समुद्र मंथन' योजना के प्रमुख फायदे

1. हाइड्रोकार्बन भंडार में 600 मिलियन टन से अधिक की संभावित बढ़ोतरी.
2. वार्षिक तेल उत्पादन में 10-15 मिलियन टन तक वृद्धि, जिसे आगे 20 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य.
3. आयात पर निर्भरता घटने से विदेशी मुद्रा की बचत.
4. एक्सप्लोरेशन, मैन्यूफैक्चरिंग और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा.
5. जीडीपी वृद्धि और औद्योगिक गतिविधियों को गति.
6. तेल, गैस और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर.
 


NSE IPO की राह हुई साफ, सेबी से 1,491 करोड़ रुपये में सुलझे सभी लंबित मामले

NSE के मुताबिक, सेबी की ओर से औपचारिक सेटलमेंट आदेश जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी संबंधित मामले वापस ले लिए जाएंगे.

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के बहुप्रतीक्षित IPO का रास्ता अब लगभग साफ हो गया है. बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने एक्सचेंज के खिलाफ लंबित रेगुलेटरी मामलों के निपटारे के लिए 1,491.21 करोड़ रुपये के सेटलमेंट प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है. इस समझौते के साथ को-लोकेशन और डार्क फाइबर जैसे वर्षों पुराने विवाद सुलझने की दिशा में बढ़ गए हैं, जो लंबे समय से NSE के लिस्टिंग प्लान में सबसे बड़ी बाधा बने हुए थे.

सेबी ने सैद्धांतिक मंजूरी दी

NSE ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि 30 जुलाई 2026 को सेबी ने ईमेल के जरिए सेटलमेंट की शर्तों को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया. कुल 1,491.21 करोड़ रुपये की सेटलमेंट राशि में से 776.47 करोड़ रुपये, जो पहले ही सेबी के पास जमा थे, समायोजित कर दिए जाएंगे. इसके बाद एक्सचेंज को 714.74 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान करना होगा. कंपनी ने कहा कि इस सेटलमेंट का वित्तीय प्रभाव 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के खातों में पहले ही शामिल किया जा चुका है.

को-लोकेशन और डार्क फाइबर विवाद होंगे खत्म

यह समझौता को-लोकेशन मामले और डार्क फाइबर विवाद सहित सभी प्रमुख लंबित मामलों को कवर करता है. को-लोकेशन केस 2015 से जांच, अपील और विभिन्न न्यायिक मंचों पर सुनवाई के कारण लंबित था. इस मामले में कुछ ब्रोकरेज फर्मों पर ट्रेडिंग सर्वर तक कथित तौर पर विशेष पहुंच मिलने के आरोप लगे थे.

सुप्रीम कोर्ट से वापस लिए जाएंगे मामले

NSE के मुताबिक, सेबी की ओर से औपचारिक सेटलमेंट आदेश जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी संबंधित मामले वापस ले लिए जाएंगे. इससे एक्सचेंज के खिलाफ चल रही वर्षों पुरानी कानूनी प्रक्रिया समाप्त होने का रास्ता खुल जाएगा.

IPO लॉन्च की तैयारी तेज

रेगुलेटरी अड़चनें दूर होने के बाद NSE अब अपने बहुप्रतीक्षित IPO को आगे बढ़ाने की तैयारी में है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक्सचेंज इस सार्वजनिक निर्गम के जरिए 26,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाने की योजना बना रहा है. यदि प्रक्रिया तय समय पर आगे बढ़ती है, तो यह भारत के सबसे बड़े IPO में से एक हो सकता है.
 


छोटे शहरों से निकले बड़े आइडिया, Samsung Solve for Tomorrow के टॉप 100 में 50% से ज्यादा इनोवेटर्स टियर-2/3 शहरों से

AI, हेल्थटेक, एजुकेशन और सस्टेनेबिलिटी पर आधारित समाधानों के साथ युवा स्टार्टअप आइडिया को मिल रहा बढ़ावा; विजेता टीमों को मिलेगा 2 करोड़ रुपये तक का इनक्यूबेशन सपोर्ट

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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भारत में टेक्नोलॉजी आधारित इनोवेशन का दायरा अब बड़े शहरों तक सीमित नहीं रह गया है. छोटे शहरों से भी बड़ी संख्या में युवा नए बिजनेस आइडिया और तकनीकी समाधान के साथ सामने आ रहे हैं. इसका उदाहरण Samsung Solve for Tomorrow 2026 के टॉप 100 चयन में देखने को मिला है, जहां 50 फीसदी से ज्यादा चुनी गई टीमें टियर-2 और टियर-3 शहरों से हैं.

इस प्रोग्राम के पांचवें एडिशन के लिए देशभर से आए आवेदनों में पिछले साल के मुकाबले 85 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि भागीदारी 95 फीसदी बढ़ी है. चयनित टीमें अब मेंटरशिप, प्रोटोटाइप डेवलपमेंट और इनक्यूबेशन सपोर्ट के जरिए अपने आइडिया को बाजार उपयोग के लायक समाधान में बदलने की दिशा में आगे बढ़ेंगी.

छोटे शहरों में बढ़ रहा इनोवेशन इकोसिस्टम

टॉप 100 टीमों में बिहार के बक्सर, असम के कामरूप, हरियाणा के कैथल, तेलंगाना के मेडचल-मलकजगिरी, ओडिशा के सुंदरगढ़ और मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जैसे शहरों के युवा शामिल हैं. यह ट्रेंड दिखाता है कि देश के छोटे शहरों में भी टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उद्यमिता को लेकर रुचि तेजी से बढ़ रही है. पहले जहां स्टार्टअप और इनोवेशन गतिविधियां मुख्य रूप से मेट्रो शहरों तक केंद्रित थीं, वहीं अब छोटे शहरों के युवा भी स्थानीय समस्याओं के लिए तकनीकी समाधान विकसित कर रहे हैं.

AI और हेल्थटेक पर युवाओं का फोकस

चयनित टीमों के आइडिया चार प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित हैं, जिनमें AI आधारित समाधान, स्वास्थ्य और शिक्षा, खेल तकनीक और पर्यावरणीय स्थिरता शामिल हैं. AI से जुड़े समाधानों में सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गुमनाम रिपोर्टिंग प्लेटफॉर्म, वाहन खराबी की पहचान करने वाली तकनीक और एक्सेसिबिलिटी बढ़ाने वाले स्मार्ट डिवाइस शामिल हैं.

हेल्थ और एजुकेशन सेगमेंट में युवाओं ने ऑटिज्म से जुड़े लोगों की जरूरतों को समझने वाली AI तकनीक, बच्चों में सेंसररी समस्याओं की पहचान करने वाले वियरेबल डिवाइस और कम लागत वाले स्मार्ट क्लासरूम समाधान विकसित किए हैं. वहीं, स्पोर्ट्स टेक्नोलॉजी में दृष्टिबाधित खिलाड़ियों के लिए स्मार्ट डिवाइस और AI आधारित कोचिंग प्लेटफॉर्म जैसे आइडिया शामिल हैं.

इनोवेशन को स्टार्टअप में बदलने पर जोर

टॉप 100 टीमों को अब विशेषज्ञों और स्टार्टअप फाउंडर्स से मेंटरशिप मिलेगी, जिससे वे अपने आइडिया को प्रोटोटाइप और संभावित बिजनेस मॉडल में बदल सकेंगी. टॉप 40 टीमें इनोवेशन बूटकैंप में हिस्सा लेंगी, जहां उन्हें प्रोडक्ट डेवलपमेंट, मार्केट रणनीति और तकनीकी सुधार के लिए मार्गदर्शन मिलेगा.

इसके बाद टॉप 20 टीमों को प्रोटोटाइप तैयार करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी, जबकि फाइनल में चुनी गई चार विजेता टीमों को कुल 2 करोड़ रुपये तक की इनक्यूबेशन ग्रांट और संस्थागत सपोर्ट मिलेगा.

भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए बढ़ते अवसर

युवा इनोवेशन प्रोग्राम्स के जरिए कंपनियां अब केवल आइडिया प्रतियोगिता तक सीमित नहीं रह रही हैं, बल्कि शुरुआती स्तर के प्रोडक्ट और संभावित स्टार्टअप्स को पहचानने पर भी ध्यान दे रही हैं.

AI, हेल्थटेक, क्लाइमेट टेक और एजुकेशन टेक जैसे क्षेत्रों में बढ़ती संभावनाओं के बीच ऐसे प्लेटफॉर्म नए उद्यमियों के लिए फंडिंग, मेंटरशिप और बाजार तक पहुंच बनाने का जरिया बन रहे हैं.
 


टाटा स्टील का Q1 मुनाफा 19% बढ़कर 2,385 करोड़ रुपये, आय में 14% की बढ़ोतरी

टाटा स्टील की कंसोलिडेटेड ऑपरेशंस से आय जून तिमाही में सालाना आधार पर 14.3 फीसदी बढ़कर 60,794 करोड़ रुपये हो गई. हालांकि, पिछली तिमाही की तुलना में इसमें 3.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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टाटा स्टील (Tata Steel) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 19 फीसदी बढ़कर 2,385.24 करोड़ रुपये पहुंच गया. पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी का मुनाफा 2,008 करोड़ रुपये था. हालांकि, तिमाही आधार पर कंपनी की कमाई में गिरावट आई है, क्योंकि कम बिक्री मात्रा (वॉल्यूम) का असर अधिक स्टील कीमतों से मिले लाभ पर पड़ा. कंपनी ने बढ़ती इनपुट लागत और नीदरलैंड्स में नियामकीय अनिश्चितताओं को भी प्रमुख चुनौतियों के रूप में बताया है.

टाटा स्टील की कंसोलिडेटेड ऑपरेशंस से आय जून तिमाही में सालाना आधार पर 14.3 फीसदी बढ़कर 60,794 करोड़ रुपये हो गई. हालांकि, पिछली तिमाही की तुलना में इसमें 3.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

कंपनी का कंसोलिडेटेड EBITDA एक साल पहले के 7,480 करोड़ रुपये से बढ़कर 9,370 करोड़ रुपये हो गया. EBITDA मार्जिन भी 14.1 फीसदी से सुधरकर 15.4 फीसदी पहुंच गया. बेहतर स्टील कीमतों के कारण प्रति टन EBITDA बढ़कर 12,898 रुपये हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में 10,503 रुपये था.

प्री-टैक्स मुनाफे में भी बढ़ोतरी

असाधारण मदों से पहले कंपनी का प्रॉफिट बिफोर टैक्स (PBT) बढ़कर 4,183 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 3,199 करोड़ रुपये था. वित्त लागत मामूली रूप से घटकर 1,771 करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल 1,852 करोड़ रुपये थी. कंपनी ने जून तिमाही में कुल कंसोलिडेटेड प्रॉफिट बिफोर टैक्स 3,838 करोड़ रुपये दर्ज किया.

टाटा स्टील ने कहा कि भारत में खासकर सीजनल कमजोरी के कारण बिक्री मात्रा पर दबाव रहा. भारत और नीदरलैंड्स में कोकिंग कोल की ऊंची लागत, इन्वेंट्री बढ़ना, ज्यादा रॉयल्टी भुगतान और पश्चिम एशिया संकट के कारण बिजली व ईंधन खर्च बढ़ने से मुनाफे पर असर पड़ा. हालांकि, बेहतर स्टील कीमतों और लागत में सुधार की पहलों ने इस दबाव को कुछ हद तक कम किया.

भारत कारोबार ने संभाली कंपनी की कमाई

जून तिमाही में भारत टाटा स्टील का सबसे मजबूत बाजार बना रहा. भारत में कच्चे इस्पात का उत्पादन बढ़कर 54.6 लाख टन पहुंच गया, जबकि डिलीवरी सालाना आधार पर 9 फीसदी बढ़कर 51.7 लाख टन रही.

भारत कारोबार से कंपनी की ऑपरेशंस से आय 36,897 करोड़ रुपये रही और EBITDA 9,409 करोड़ रुपये दर्ज किया गया. स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट भी बढ़कर 4,536 करोड़ रुपये हो गया.

कंपनी ने कहा कि मौसमी सुस्ती के बावजूद घरेलू डिलीवरी उत्पादन के अनुरूप बनी रही. ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन, रिटेल और इंजीनियरिंग क्षेत्रों से मांग में मजबूती देखने को मिली.

पूरे ग्रुप स्तर पर कच्चे इस्पात का उत्पादन 76.9 लाख टन रहा, जबकि डिलीवरी 72.7 लाख टन दर्ज की गई. हालांकि, पिछली तिमाही के मुकाबले बिक्री मात्रा में गिरावट आई, लेकिन विभिन्न बाजारों में बेहतर स्टील कीमतों से इसकी भरपाई हुई.

वैल्यू एडेड कारोबार में भी बढ़ोतरी

टाटा स्टील ने अपने वैल्यू एडेड कारोबार में भी लगातार सुधार की जानकारी दी. हाई-एंड स्टील उत्पादों की ऑटो बिक्री में सालाना आधार पर 21 फीसदी की वृद्धि हुई. वहीं, टाटा टिस्कॉन ने पहली तिमाही में अब तक का सबसे अधिक वॉल्यूम दर्ज किया.

यूरोप कारोबार में मिली-जुली तस्वीर

कंपनी के यूरोपीय कारोबार का प्रदर्शन मिश्रित रहा. टाटा स्टील नीदरलैंड्स का EBITDA 39 करोड़ रुपये पॉजिटिव रहा, लेकिन पिछली तिमाही की तुलना में इसमें तेज गिरावट आई. इसकी वजह कम डिलीवरी और कच्चे माल की बढ़ी लागत रही.

वहीं, टाटा स्टील यूके का EBITDA 341 करोड़ रुपये निगेटिव रहा. हालांकि, मार्च तिमाही के 591 करोड़ रुपये के नुकसान की तुलना में इसमें सुधार हुआ, क्योंकि बेहतर स्टील कीमतों से कुछ राहत मिली.

कंपनी ने बताया कि नीदरलैंड्स में IJmuiden कोक और गैस प्लांट के परमिट रद्द करने के प्रस्ताव के बाद नियामकीय अनिश्चितता बनी हुई है. हालांकि, प्रबंधन ने कहा कि बातचीत जारी है और कंपनी अपने वित्तीय विवरणों को कारोबार जारी रखने (Going Concern) के आधार पर तैयार कर रही है.

टाटा स्टील यूके ने भी यूके सरकार से मिले फंडिंग कमिटमेंट और प्रस्तावित इक्विटी निवेश के आधार पर अपने वित्तीय विवरण तैयार किए हैं. कंपनी ने कहा कि सभी कारोबारों में उसकी लिक्विडिटी स्थिति मजबूत बनी हुई है.

कर्ज बढ़ा, लेकिन डेट-इक्विटी अनुपात में सुधार

तिमाही के दौरान टाटा स्टील ने कुछ संपत्तियों, प्लांट और उपकरणों के उपयोगी जीवन का पुनर्मूल्यांकन किया, जिसके चलते 294 करोड़ रुपये का अतिरिक्त डेप्रिसिएशन चार्ज दर्ज किया गया. कंपनी का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में डेप्रिसिएशन करीब 1,178 करोड़ रुपये बढ़ सकता है.

जून तिमाही के अंत में कंपनी की नेटवर्थ 1.01 लाख करोड़ रुपये रही. कंपनी का नेट डेट मार्च के अंत के 80,144 करोड़ रुपये से बढ़कर 84,173 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, ग्रॉस डेट बढ़कर 97,985 करोड़ रुपये पहुंच गया.

हालांकि, कर्ज बढ़ने के बावजूद नेट डेट-टू-इक्विटी अनुपात वित्त वर्ष 2025-26 के अंत के 0.82 से सुधरकर 0.80 हो गया.

विलय और अधिग्रहण से जुड़े अपडेट

टाटा स्टील ने बताया कि उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड (NINL) के कंपनी में विलय का प्रस्ताव नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की मंजूरी का इंतजार कर रहा है.

इसके अलावा, TM इंटरनेशनल लॉजिस्टिक्स में अतिरिक्त 23 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के प्रस्ताव के लिए भी नियामकीय मंजूरी लंबित है. इस सौदे के बाद कंपनी की संयुक्त उद्यम (JV) में हिस्सेदारी बढ़कर 74 फीसदी हो जाएगी.
 


महिंद्रा की EV यूनिट बनी यूनिकॉर्न, 10,822 करोड़ रुपये के वैल्यूएशन पर पहुंची कंपनी

भारत में क्लीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने के साथ इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल बाजार में तेजी आने की उम्मीद है, जिससे इस क्षेत्र की कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं.

Last Modified:
Friday, 31 July, 2026
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महिंद्रा एंड महिंद्रा की इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर सब्सिडियरी महिंद्रा लास्ट माइल मोबिलिटी (MLMML) ने यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल कर लिया है. कंपनी ने लाइटरॉक (Lightrock), इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (IFC) और इंडिया-जापान फंड (IJF) से करीब 322 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटाई है. इस निवेश के बाद कंपनी का वैल्यूएशन बढ़कर 10,822 करोड़ रुपये हो गया है.

यह फंडिंग राउंड लाइटरॉक के नेतृत्व में पूरा हुआ, जिसमें मौजूदा निवेशकों IFC और IJF ने भी भागीदारी की. यह निवेश महिंद्रा के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी कारोबार में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है और भारत के इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी को उजागर करता है.

इस लेनदेन के तहत MLMML ने निवेशकों के साथ शेयर सब्सक्रिप्शन एग्रीमेंट किया है. प्रस्तावित इक्विटी इश्यू पूरा होने के बाद महिंद्रा एंड महिंद्रा की MLMML में हिस्सेदारी 78.11 फीसदी से घटकर 75.79 फीसदी रह जाएगी. हालांकि, कंपनी महिंद्रा ग्रुप की सब्सिडियरी बनी रहेगी.

इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर सेगमेंट में तेजी से बढ़ रही मांग

MLMML के मुताबिक, भारत में L5 कैटेगरी के इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की पहुंच पिछले दो वर्षों में 12 फीसदी से बढ़कर 40 फीसदी हो गई है. कंपनी की इस सेगमेंट में करीब 40 फीसदी बाजार हिस्सेदारी है.

कंपनी ने पिछले चार वर्षों में इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर बिक्री में छह गुना वृद्धि दर्ज की है. वित्त वर्ष 2025-26 में MLMML ने 1 लाख इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स की बिक्री की. वहीं, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कंपनी के वॉल्यूम में सालाना आधार पर 85 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

महिंद्रा ग्रुप के ग्रुप CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर अनीश शाह ने कहा कि लाइटरॉक का निवेश कंपनी की लास्ट-माइल मोबिलिटी पहल को मजबूती देगा. इस पहल का लक्ष्य 2031 तक भारतीय सड़कों पर 10 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों को उतारना है.

भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी बाजार में बढ़ रहा निवेश

यह निवेश भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इकोसिस्टम में बढ़ते निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है. इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स अब लास्ट-माइल ट्रांसपोर्टेशन के इलेक्ट्रिफिकेशन में अहम भूमिका निभा रहे हैं. ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां रणनीतिक और संस्थागत निवेशकों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं.

भारत में क्लीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने के साथ इलेक्ट्रिक कमर्शियल व्हीकल बाजार में तेजी आने की उम्मीद है, जिससे इस क्षेत्र की कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं.