आज कैसी रह सकती है बाजार की चाल, उससे पहले जान लें हर शेयर का हाल?

इस हफ्ते निफ्टी साप्ताहिक आधार पर 90 अंक नीचे है. बढ़त के साथ बंद होने के लिए निफ्टी को 24,235 के स्तर को पार करना होगा.

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Friday, 06 September, 2024
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सेंसेक्स और निफ्टी गुरुवार को भी घाटे के साथ बंद हुआ. सेंसेक्स 151 अंक लुढ़क गया, वहीं निफ्टी 25,150 के नीचे चला गया. हालांकि छोटे और मझोले शेयरों में तेजी रही, जिसके चलते दिन भर में बीएसई के निवेशकों की संपत्ति करीब 53,000 करोड़ रुपये बढ़ गई. निवेशक अमेरिकी इकोनॉमी से जुड़े कई आंकड़ों के आने से पहले कुछ सतर्क दिखे. रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा मोटर्स, नेस्ले, भारती एयरटेल, बजाज फाइनेंस, लार्सन एंड टुब्रो, जेएसडब्ल्यू स्टील और महिंद्रा एंड महिंद्रा के शेयर नीचे आए थे. इसके उलट फायदे में रहने वाले शेयरों में टाइटन, आईटीसी, इन्फोसिस, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, टाटा स्टील और भारतीय स्टेट बैंक शामिल थे. चलिए जानते हैं आज कैसा रहेगा मार्केट का हाल

इन शेयरों में दिख रही तेजी

मोमेंटम इंडिकेटर मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डिवर्जेंस (MACD) ने Venky's, Ethos, Cholamandalam Financial Holdings, Suven Pharma, Asian Paints, Sun Pharma, Anant Raj और TTK Healthcare पर तेजी का रुख दिखाया है. एमएसीडी को ट्रेडेड सिक्योरिटीज या इंडेक्स में ट्रेंड रिवर्सल के संकेत के लिए जाना जाता है. जब एमएसीडी सिग्नल लाइन को पार करता है, तो यह एक तेजी का संकेत देता है. यह दर्शाता है कि शेयर की कीमत में ऊपर की ओर गति देखी जा सकती है. इसी तरह यह मंदी का भी संकेत देता है.

इन स्टॉक्स में मंदी और खरीदारी के संकेत

एमएसीडी (MACD) ने Trent, Dixon Technologies, Page Industries, Power Mech Projects, VST Industries और PB Fintech के शेयर में मंदी का संकेत दिया है. इसका मतलब है कि अब इन शेयरों में गिरावट शुरू हो गई है.

वहीं जिन शेयरों में मजबूत खरीदारी देखने को मिल रही है, उनमें Caplin Point, UTI AMC, KEC International, Cholamandalam Financial Holdings, Vijaya Diagnostic, Avenue Supermart और Concord Biotech शामिल हैं. इन शेयर ने अपना 52 हफ्ते का उच्च स्तर पार कर लिया है. यह इन शेयर में तेजी का संकेत देता है.

आज इन शेयरों पर होगी नजर

•    Venus Pipes: DRI ने कंपनी की रजिस्टर्ड और कॉरपोरेट ऑफिस में सर्च ऑपरेशन किया था. आयात किए सामान पर कथित टैक्स चोरी के आरोप के बाद यह सर्च ऑपरेशन किया गया है. कंपनी ने इसके बाद कहा कि ₹5 करोड़ ड्यूटी अंडर प्रोटेस्ट के तौर पर डिपॉजिट किया गया है. 

•    Godfrey Phillips: प्रोमोटर विवाद मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि बिना मोदी से खुद की नियुक्ति के लिए वोटिंग अधिकार नहीं छीना जा सकता है. 6 सितंबर को होने वाले AGM में यह वोटिंग होनी है. साथ ही दिल्ली हाई कोर्ट ने हर 6 महीने में डिस्क्लोजर देने के लिए बिना मोदी को निर्देश दिया है. 

•    Sundaram Clayton: तमिलनाडु में स्टेट इंडस्ट्रीज प्रोमोशन कॉरपोरेशन (SIPCOT0 में एल्युमीनियम डाई कास्टिंग का कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू कर दिया है.

•    Ashoka Buildcon: कंपनी की ईकाई Viva Highways ने महाराष्ट्र के पुणे में ₹453 करोड़ की जमीन बेची है.

•    Pidilite Industries: CollTech Group के साथ एक्सक्लुसिव करार किया है. कंपनी भारत में CollTech के प्रोडक्ट्स की एक्सक्लूसिव डिस्ट्रीब्युटर के तौर पर काम करेगी.

•    RCF: NCDs के जरिए 1400 करोड़ रुपये जुटाने को बोर्ड मंजूरी मिल गई है.

•    NLC India और GMDC : कोयला मंत्रालय ने एलोकेशन ऑर्डर जारी किए हैं. NLC India को Machhakata कोयल खादान एलोकेशन में मिला है. जबकि, GMDC को Kudanali Lubri कोयला खादान मिला है.

•    Finolex Cables: निखिल नायक ने चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया है. बोर्ड ने रत्नाकर बारवे को नया चेयरमैन नियुक्त किया है.

•    Nucleus Software: शेयर बायबैक के जरिए ₹1,615 प्रति शेयर के भाव पर 4.48 लाख शेयर (1.67%) वापस खरीदेगी. इस पर कंपनी कुल ₹72.5 करोड़ खर्च करेगी. ये शेयर बायबैक 9 सितंबर से 13 सितंबर तक खुला रहेगा.

•    Shreyas Shipping: कॉरपोरेट मंत्रालय से Transworld Sea-Connect IFSC को पूरी तरह से सब्सिडियरी बनाने की मंजूरी दे दी है.

•    Prestige Estates: QIP के जरिए कंपनी ₹5,000 करोड़ जुटाएगी. QIP का इश्यू प्राइस ₹1,674 करोड़ प्रति शेयर पर तय है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है).
 


सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर बैंकों को मिलने वाली टैक्स छूट खत्म, अब लगेगा 3% IGST

अब सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर बैंकों को 3% इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (IGST) देना होगा, जिससे उन्हें बुलियन एक्सचेंज के जरिए आयात करने वाले अन्य कारोबारियों के समान कर व्यवस्था के दायरे में लाया जा सकेगा.

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Friday, 09 October, 2026
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भारत सरकार ने बैंकों को सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर मिलने वाली टैक्स छूट खत्म कर दी है. राजस्व सचिव अरविंद श्रीवास्तव के मुताबिक, बैंक 1 अप्रैल 2026 से ही इन आयातों पर 3% इंटीग्रेटेड गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (IGST) का भुगतान कर रहे हैं. इस फैसले का उद्देश्य बैंकों और बुलियन एक्सचेंज के माध्यम से कीमती धातुओं का आयात करने वाले अन्य प्रतिभागियों के बीच कर व्यवस्था में समानता लाना है. सरकार ने 8 अक्टूबर को हुई वस्तु एवं सेवा कर (GST) परिषद की बैठक में इस बदलाव की जानकारी दी.

2017 में शुरू हुई थी टैक्स छूट

सरकार ने 2017 में बैंकों और नामित एजेंसियों को कीमती धातुओं के आयात पर IGST से छूट दी थी. उस समय इन संस्थाओं को बिना IGST चुकाए सोना, चांदी और प्लैटिनम आयात करने की अनुमति थी. हालांकि, इसके बाद भारत के बुलियन बाजार में कई बदलाव हुए. गुजरात के गिफ्ट सिटी में इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज (IIBX) की स्थापना भी इसी विकास का हिस्सा है.

बुलियन एक्सचेंज के जरिए कीमती धातुओं का आयात करने वाले कारोबारियों को सीमा शुल्क के साथ 3% IGST का भुगतान भी करना पड़ता है. वहीं, टैक्स छूट के कारण बैंकों को अलग व्यवस्था का लाभ मिलता था. सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था से आयात के अलग-अलग माध्यमों के लिए कर नियमों में समानता सुनिश्चित होगी.

बैंकों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ मिलेगा

IGST का भुगतान करने से बैंकों पर जरूरी तौर पर अतिरिक्त टैक्स लागत बढ़ने की उम्मीद नहीं है. घरेलू ज्वैलर्स या ट्रेडिंग इकाइयों को कीमती धातुओं की आपूर्ति करते समय बैंक लागू GST नियमों के तहत इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का दावा कर सकते हैं.

इनपुट टैक्स क्रेडिट के तहत कारोबारियों को खरीद के समय चुकाए गए पात्र टैक्स को आगे की बिक्री या आपूर्ति पर देय टैक्स के साथ समायोजित करने की सुविधा मिलती है.

इस तरह, बदलाव का मुख्य असर आयात के समय टैक्स भुगतान की प्रक्रिया पर पड़ेगा. पात्र बैंक बाद में होने वाली आपूर्ति पर लागू नियमों के अनुसार इस टैक्स का समायोजन कर सकेंगे.

GST व्यवस्था में बदलाव के बीच फैसला

यह फैसला GST प्रशासन को सरल बनाने और अनुपालन प्रक्रिया में ऑटोमेशन बढ़ाने के लिए किए जा रहे व्यापक बदलावों के बीच आया है. GST परिषद ने हाल ही में कर व्यवस्था को अधिक सुगम बनाने के उद्देश्य से कई उपायों को मंजूरी दी है.

इसके अलावा, सरकार की नजर कीमती धातुओं के आयात पर भी रहती है, क्योंकि इनका आयात देश से विदेशी मुद्रा के बाहर जाने को प्रभावित करता है. बैंकों के लिए टैक्स छूट खत्म करने से कीमती धातुओं के आयात पर लागू कर व्यवस्था को अधिक समान बनाने की दिशा में कदम उठाया गया है.
 


प्याज, तेल और चावल की महंगाई से बिगड़ा रसोई का बजट, वेज थाली 10% महंगी: रिपोर्ट

क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में शाकाहारी थाली की लागत सालाना आधार पर 10% बढ़कर ₹30.8 हो गई, जबकि मांसाहारी थाली 6% महंगी होकर ₹59.5 पर पहुंच गई.

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Friday, 09 October, 2026
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त्योहारी सीजन के बीच आम लोगों की रसोई का खर्च बढ़ गया है. सितंबर में घर पर खाना बनाना पिछले साल के मुकाबले महंगा रहा. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताजा ‘रोटी राइस रेट’ रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में शाकाहारी थाली की लागत सालाना आधार पर 10% बढ़ी, जबकि मांसाहारी थाली तैयार करने का खर्च 6% बढ़ गया. सब्जियों और जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी का असर घरेलू बजट पर दिखाई दे रहा है.

पिछले साल सितंबर में एक शाकाहारी थाली तैयार करने की लागत ₹28.1 थी, जो इस साल बढ़कर ₹30.8 हो गई. इसी तरह मांसाहारी थाली की लागत ₹56 से बढ़कर ₹59.5 पहुंच गई. मासिक आधार पर भी महंगाई का दबाव बढ़ा है. अगस्त के मुकाबले सितंबर में शाकाहारी थाली 4% और मांसाहारी थाली 3% महंगी हुई.

प्याज की कीमतों में 89% का उछाल

रसोई का खर्च बढ़ने की सबसे बड़ी वजह प्याज की कीमतों में आई तेजी है. क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में प्याज के दाम सालाना आधार पर 89% बढ़ गए. पिछले साल सितंबर में प्याज करीब ₹28 प्रति किलो मिल रहा था, जबकि इस साल इसकी कीमत बढ़कर ₹53 प्रति किलो हो गई.

इस तेजी के पीछे उत्पादन और आपूर्ति से जुड़ी कई वजहें हैं. रबी सीजन में प्याज का उत्पादन 5-6% घटने से पुराने स्टॉक में कमी आई. इसके अलावा, इस साल जून में सामान्य से 40% कम बारिश हुई. कम बारिश के कारण खरीफ प्याज की बुआई में देरी हुई और मंडियों में नई फसल की आवक प्रभावित हुई. रिपोर्ट के मुताबिक, केवल एक महीने में प्याज की कीमतों में 34% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

खाद्य तेल, चावल और एलपीजी ने भी बढ़ाया खर्च

रसोई के बजट पर दबाव केवल प्याज तक सीमित नहीं है. खाद्य तेल, चावल और घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी ने भी लोगों का खर्च बढ़ाया है. रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य तेल की कीमतें सालाना आधार पर 12% बढ़ीं. केंद्र सरकार की ओर से पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी घटाए जाने के बावजूद कीमतों में राहत नहीं मिली. वैश्विक तनाव और अल नीनो के प्रभाव से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्पादन प्रभावित होने के कारण घरेलू कीमतों पर दबाव बना रहा.

वहीं, घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में सालाना आधार पर 10% की बढ़ोतरी हुई. वैश्विक आपूर्ति में आई बाधाओं का असर भी इसकी कीमतों पर पड़ा. चावल के दाम भी एक साल में 8% बढ़ गए. रिपोर्ट के मुताबिक, धान की बुआई के रकबे में कमी और पैदावार कमजोर रहने की आशंका के कारण चावल उत्पादन में 5-6% गिरावट का अनुमान है. इससे कीमतों में तेजी बनी हुई है.

नॉन-वेज थाली की महंगाई कम क्यों रही?

शाकाहारी थाली के मुकाबले मांसाहारी थाली की लागत में कम बढ़ोतरी हुई. इसकी प्रमुख वजह ब्रॉयलर चिकन की कीमतों में सीमित वृद्धि है. मांसाहारी थाली की कुल लागत में ब्रॉयलर चिकन की हिस्सेदारी करीब 50% होती है.

क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में ब्रॉयलर चिकन की कीमतें सालाना और मासिक, दोनों आधार पर 2% बढ़ीं. हालांकि, चूजों की कम उपलब्धता, बारिश के कारण आपूर्ति में रुकावट और चारे के लिए मक्के की ऊंची कीमतों ने पोल्ट्री कारोबार की लागत बढ़ाई. इसके बावजूद चिकन की कीमतों में सीमित तेजी रहने से मांसाहारी थाली की महंगाई 6% तक रही, जबकि शाकाहारी थाली की लागत 10% बढ़ गई.

अक्टूबर में प्याज की कीमतों से कब मिलेगी राहत?

त्योहारों के दौरान प्याज की मांग बढ़ने से कीमतों पर दबाव बने रहने की आशंका है. क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर के पहले 15 दिनों में प्याज के दाम सालाना आधार पर और तेजी से बढ़ सकते हैं. त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने और आपूर्ति सीमित रहने से कीमतें ऊंची रह सकती हैं.

हालांकि, अक्टूबर के अंत तक खरीफ प्याज की नई फसल की आवक बढ़ने की उम्मीद है. इससे बाजार में आपूर्ति बेहतर हो सकती है और प्याज की कीमतों में धीरे-धीरे राहत मिलने की संभावना है. तब तक आम परिवारों को रसोई के बढ़ते खर्च का सामना करना पड़ सकता है.


2026 में वैश्विक व्यापार की वृद्धि दर 3.9% रहने का अनुमान, AI में निवेश से मिलेगी रफ्तार: WTO

एशिया निर्यात वृद्धि में सबसे आगे रह सकता है, जबकि भू-राजनीतिक तनावों के कारण दुनिया की प्रमुख व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं में कारोबार की संभावनाएं असमान रहने का अनुमान है.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
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विश्व व्यापार संगठन (WTO) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2026 में वैश्विक वस्तु व्यापार की मात्रा में 3.9% की वृद्धि होने का अनुमान है. यह मार्च में लगाए गए 1.9% के अनुमान से दोगुने से भी अधिक है. अनुमान में इस बढ़ोतरी की वजह साल की पहली छमाही में उम्मीद से बेहतर व्यापारिक गतिविधियां रही हैं.

WTO की रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े बुनियादी ढांचे में निवेश ने भी AI को सक्षम बनाने वाले उत्पादों की मांग बढ़ाई है. इससे वैश्विक वस्तु व्यापार को मजबूती मिली है. हालांकि, रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं और परिवहन मार्गों में बाधा आ सकती है, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित होने का जोखिम है.

रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर वैश्विक खर्च में कम से कम 30% की वृद्धि होने का अनुमान है. WTO का मानना है कि 2027 तक AI से जुड़ा निवेश वस्तु व्यापार को गति देने वाला प्रमुख कारक बना रहेगा. खास तौर पर AI की आपूर्ति श्रृंखला में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों की मांग को इससे समर्थन मिलेगा.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं ने ऊर्जा और उर्वरक बाजारों में आई बाधाओं के अनुरूप खुद को ढाल लिया है. इस बदलाव और AI इंफ्रास्ट्रक्चर में मजबूत निवेश ने वैश्विक वस्तु व्यापार के प्रदर्शन को पहले के अनुमानों से बेहतर बनाने में मदद की है.

निर्यात वृद्धि में एशिया सबसे आगे

WTO की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में एशिया में वस्तुओं के निर्यात में सबसे तेज वृद्धि होने का अनुमान है. इस क्षेत्र का निर्यात 9.9% बढ़ सकता है. वहीं, उत्तरी अमेरिका के निर्यात में 5.7%, अफ्रीका में 5.6% और दक्षिण अमेरिका में 3.4% की वृद्धि का अनुमान है.

इसके विपरीत, यूरोप के लिए तस्वीर कमजोर रहने की आशंका है. यहां वस्तुओं का निर्यात 0.1% घट सकता है. स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल (CIS) से निर्यात में 3.9% की गिरावट का अनुमान है, जबकि मध्य पूर्व में निर्यात में 17.2% की बड़ी कमी आ सकती है.

WTO ने मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को 2026 में वैश्विक व्यापार के लिए एक प्रमुख नकारात्मक जोखिम बताया है. ऊर्जा की ऊंची कीमतें और परिवहन मार्गों में रुकावट कारोबार की लागत बढ़ा सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में वस्तुओं की आवाजाही को प्रभावित कर सकती हैं.

इसका असर सेवा व्यापार पर भी पड़ने की आशंका है, खासकर परिवहन और अंतरराष्ट्रीय यात्रा के क्षेत्र में. WTO के अनुमान के मुताबिक, 2026 में मध्य पूर्व के वस्तु आयात में 15.4% और निर्यात में 17.2% की गिरावट हो सकती है.

भारत के निर्यात को मिल सकता है समर्थन

वैश्विक वस्तु व्यापार के बेहतर परिदृश्य से भारत को वित्त वर्ष 2026-27 में वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात को 1,000 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य में मदद मिल सकती है. वैश्विक मांग में मजबूती और टेक्नोलॉजी से जुड़े बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश से भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं.

हालांकि, WTO की रिपोर्ट में बताए गए जोखिम भारत को भी प्रभावित कर सकते हैं. ऊर्जा और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से भारतीय कारोबारियों पर दबाव पड़ सकता है. इसका वास्तविक असर काफी हद तक मध्य पूर्व में संघर्ष की अवधि और वैश्विक शिपिंग मार्गों तथा कमोडिटी की कीमतों पर उसके प्रभाव पर निर्भर करेगा.

सेवा व्यापार की वृद्धि दर धीमी रहने का अनुमान

WTO के मुताबिक, 2026 में वैश्विक सेवा व्यापार की मात्रा में 3.3% की वृद्धि होने का अनुमान है. यह मार्च में लगाए गए 4.8% के अनुमान से कम है. हालांकि, संगठन का अनुमान है कि मौजूदा दबाव कम होने के साथ 2027 में सेवा व्यापार की वृद्धि दर बढ़कर 6.4% हो सकती है.

रिपोर्ट में 2027 के लिए वैश्विक वस्तु व्यापार में 4.1% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है. वहीं, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 2026 में 2.6% और 2027 में 2.9% की वृद्धि होने की संभावना है.

वैश्विक व्यापार का परिदृश्य पहले के अनुमानों से बेहतर हुआ है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और परिवहन मार्गों में संभावित बाधाएं अब भी इसके लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं.
 


TCS के मुनाफे में 15% का उछाल, AI से कमाई 3 अरब डॉलर के पार; ₹12 डिविडेंड का ऐलान

सितंबर तिमाही में TCS का रेवेन्यू सालाना आधार पर 11.2% बढ़ा, AI से होने वाली सालाना आय 3 अरब डॉलर के पार पहुंची और कंपनी ने 4,258 कर्मचारियों को जोड़ा है.

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Friday, 09 October, 2026
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टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने गुरुवार को वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजे जारी किए. कंपनी का 30 सितंबर 2026 को समाप्त तिमाही में कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 15% बढ़कर ₹13,884 करोड़ हो गया. पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी ने ₹12,075 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया था. कंपनी के बोर्ड ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹12 प्रति शेयर के दूसरे अंतरिम डिविडेंड का भी ऐलान किया है.

सितंबर तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू क्रमिक आधार पर 1.3% बढ़कर ₹73,188 करोड़ रहा. वहीं, कंपनी के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कारोबार से होने वाली सालाना आय 3 अरब डॉलर के पार पहुंचकर 3.1 अरब डॉलर हो गई. तिमाही के दौरान TCS ने अपने कर्मचारियों की संख्या में 4,258 की शुद्ध बढ़ोतरी की, जिससे कुल वर्कफोर्स 5,98,056 हो गई. कंपनी का कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू (TCV) दूसरी तिमाही में 9.6 अरब डॉलर रहा. इस दौरान ऑपरेटिंग मार्जिन 24% और नेट मार्जिन 19% दर्ज किया गया.

रेवेन्यू और मुनाफे में बढ़ोतरी

TCS का ऑपरेशंस से कंसोलिडेटेड रेवेन्यू सालाना आधार पर 11.2% बढ़कर ₹73,188 करोड़ हो गया. पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में यह ₹65,799 करोड़ था. वहीं, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू ₹72,275 करोड़ रहा था. इस लिहाज से दूसरी तिमाही में इसमें 1.3% की बढ़ोतरी हुई. स्थिर मुद्रा (कॉन्स्टेंट करेंसी) के आधार पर क्रमिक वृद्धि 0.5% रही.

कंपनी का शुद्ध मुनाफा जून तिमाही के ₹13,349 करोड़ से 4% बढ़ा. इस दौरान ऑपरेटिंग मार्जिन 24% पर स्थिर रहा, जबकि नेट मार्जिन 19% दर्ज किया गया. TCS ने सितंबर तिमाही में परिचालन से ₹14,190 करोड़ का नेट कैश जेनरेट किया. यह कंपनी की शुद्ध आय का 102.2% रहा.

AI से सालाना आय 3 अरब डॉलर के पार

TCS की AI से होने वाली सालाना आय वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में बढ़कर 3.1 अरब डॉलर हो गई. यह कंपनी के कुल रेवेन्यू के 10% से अधिक है. कंपनी के मुताबिक, AI आधारित समाधानों, एंटरप्राइज सिस्टम के AI के जरिए बदलाव और ऑटोनॉमस ग्लोबल बिजनेस सर्विसेज की मांग में लगातार तेजी आ रही है.

दूसरी तिमाही में कंपनी का कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू 9.6 अरब डॉलर रहा. बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और इंश्योरेंस (BFSI), मैन्युफैक्चरिंग तथा टेक्नोलॉजी एंड सर्विसेज कारोबार ने वृद्धि में अहम योगदान दिया. स्थिर मुद्रा के आधार पर BFSI कारोबार में क्रमिक रूप से 2.5% की वृद्धि हुई, जबकि मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी एंड सर्विसेज, दोनों क्षेत्रों में 3.1% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

तिमाही के दौरान TCS ने पोर्शे एजी के साथ पांच साल की रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की. इसके अलावा, कंपनी ने अपनी सहायक इकाई के जरिए पोर्शे की जर्मनी स्थित मैनेजमेंट और आईटी कंसल्टिंग कंपनी MHP Management- und IT-Beratung GmbH का 100% अधिग्रहण करने के लिए समझौता किया. इस प्रस्तावित अधिग्रहण के लिए नियामकीय मंजूरी मिलना बाकी है.

कंपनी ने बेस्ट बाय के भारत स्थित ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर को TCS में स्थानांतरित करने और उसे AI कैपेबिलिटी सेंटर के रूप में विकसित करने के लिए भी समझौते की घोषणा की. TCS के मुताबिक, इस व्यवस्था के तहत बेस्ट बाय की रिटेल और एंटरप्राइज क्षेत्र की विशेषज्ञता को TCS की टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, AI और वैश्विक डिलीवरी क्षमताओं के साथ जोड़ा जाएगा.

कंपनी ने जोड़े 4,258 कर्मचारी

TCS ने सितंबर तिमाही के दौरान शुद्ध आधार पर 4,258 कर्मचारियों को जोड़ा. इसके साथ कंपनी के कुल कर्मचारियों की संख्या बढ़कर 5,98,056 हो गई. यह लगातार तीसरी तिमाही रही, जब कंपनी ने कर्मचारियों की संख्या में शुद्ध बढ़ोतरी दर्ज की. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कंपनी ने करीब 9,279 कर्मचारियों को जोड़ा था.

कंपनी में पिछले 12 महीनों के आधार पर आईटी सर्विसेज का एट्रिशन रेट घटकर 13.3% रह गया, जो पिछली तिमाही में 13.6% था. एट्रिशन रेट से पता चलता है कि एक निश्चित अवधि में कितने कर्मचारी कंपनी छोड़कर गए.

कर्मचारियों की स्किल बढ़ाने पर भी कंपनी ने निवेश जारी रखा. दूसरी तिमाही में कर्मचारियों के लर्निंग आवर्स क्रमिक आधार पर 17% बढ़कर 1.71 करोड़ हो गए. कंपनी ने AI समेत महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में कर्मचारियों की क्षमताएं विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया है.

₹12 प्रति शेयर डिविडेंड, 14 अक्टूबर रिकॉर्ड डेट

TCS के बोर्ड ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹1 फेस वैल्यू वाले प्रत्येक इक्विटी शेयर पर ₹12 के दूसरे अंतरिम डिविडेंड को मंजूरी दी है. इसके लिए 14 अक्टूबर 2026 की रिकॉर्ड डेट तय की गई है, जबकि डिविडेंड का भुगतान 30 अक्टूबर 2026 को किया जाएगा.

इससे पहले कंपनी ने जून तिमाही के लिए भी ₹12 प्रति शेयर का अंतरिम डिविडेंड दिया था. TCS वित्त वर्ष के दौरान अंतरिम डिविडेंड और वित्त वर्ष के अंत में फाइनल डिविडेंड के जरिए शेयरधारकों को नकदी लौटाने की नीति पर काम करती रही है.

अंतरराष्ट्रीय बाजारों से भी मिली वृद्धि

सितंबर तिमाही में TCS ने अधिकांश अंतरराष्ट्रीय बाजारों में वृद्धि दर्ज की. स्थिर मुद्रा के आधार पर अंतरराष्ट्रीय कारोबार का रेवेन्यू क्रमिक रूप से 1.2% बढ़ा. उत्तरी अमेरिका में 0.4% और ब्रिटेन में 3.5% की वृद्धि हुई. कॉन्टिनेंटल यूरोप में रेवेन्यू 0.4% बढ़ा, जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 2% की क्रमिक वृद्धि दर्ज की गई.

वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में TCS के कुल रेवेन्यू में भारत की हिस्सेदारी 5.5% रही. स्थिर मुद्रा के आधार पर भारत में रेवेन्यू पिछली तिमाही की तुलना में 10.3% घटा. हालांकि, सालाना आधार पर भारत के कारोबार में 6% की वृद्धि दर्ज की गई.

कंपनी के मुताबिक, ग्राहकों के लिए साइबर सुरक्षा अब भी एक प्रमुख प्राथमिकता बनी हुई है. वहीं, एप्लिकेशन मैनेजमेंट सर्विसेज के लिए कंपनी के Human+AI Services Autonomy मॉडल को ग्राहकों से अच्छी रैंकिंग मिली.

तिमाही के दौरान TCS ने बेंगलुरु में NVIDIA की तकनीक से संचालित एक ऑटोनॉमस इंजीनियरिंग लैब भी शुरू की. इसका उद्देश्य मोबिलिटी और मैन्युफैक्चरिंग सहित विभिन्न क्षेत्रों में AI आधारित समाधान विकसित करना है.
 


जियो को 60 अरब डॉलर का झटका: बाजार में गिरावट, मस्क की पोस्ट और मुश्किल में रोड शो

जैसे-जैसे वैल्यूएशन चर्चा $160 अरब से $100 अरब तक चली जाती है और वैश्विक फंड्स भारती पर 30% छूट की मांग करते हैं, जियो के 2020 के बैकर्स को डॉलर रिटर्न मिलता है जो एक बॉन्ड फंड भी पार कर सकता है और एलोन मस्क का 'ओलिगार्क्स' पोस्ट रोडशो के बीच में आता है।

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Friday, 09 October, 2026
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पलक शाह

साल की शुरुआत में बैंकर 160 अरब डॉलर के मूल्यांकन की बात कर रहे थे. यह घटकर 140 अरब डॉलर हुआ, फिर 120 अरब डॉलर पर आ गया. इस सप्ताह रोडशो के दौरान बातचीत में शामिल लोगों के मुताबिक, अब 100 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर चर्चा हो रही है. इसका मतलब है कि एक भी शेयर की ट्रेडिंग शुरू होने से पहले ही करीब 60 अरब डॉलर की वैल्यू घट चुकी है.

इसकी वजह साफ है. भारत इस समय कई वर्षों की सबसे खराब बाजार गिरावट से गुजर रहा है और जियो को जिन बड़े वैश्विक फंडों की जरूरत है, वे अपनी शर्तें तय कर रहे हैं.

"हमें डिस्काउंट दीजिए"

बातचीत से परिचित लोगों के मुताबिक, बड़े संस्थागत निवेशक जियो के बैंकरों को साफ संदेश दे रहे हैं. अगर जियो को भारी डिस्काउंट पर पेश नहीं किया गया, तो वे पैरेंट कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर खरीदकर जियो में अपना निवेश बढ़ा लेंगे.

उनका बेंचमार्क भारती एयरटेल है, जो जियो की सबसे करीबी लिस्टेड प्रतिद्वंद्वी कंपनी है. निवेशक भारती एयरटेल के मल्टीपल्स के मुकाबले करीब 30% कम मूल्यांकन की मांग कर रहे हैं. उनका तर्क है कि प्रमोटर के नियंत्रण वाली नई लिस्टेड कंपनी, जो गिरते बाजार में शेयर बाजार में उतर रही है, उसकी कीमत ऐसी होनी चाहिए कि निवेशक उसे खरीदने के लिए तैयार हों.

रिलायंस के लिए यह असहज स्थिति है. डिस्काउंट देने का मतलब होगा कि बाजार अंबानी की सबसे कीमती कंपनी के लिए उनकी तय की गई कीमत चुकाने को तैयार नहीं है, जबकि कीमत पर अड़े रहने से आईपीओ को कमजोर प्रतिक्रिया मिलने का जोखिम है.

सबसे ज्यादा नुकसान किसे होगा: जियो के 2020 के निवेशक

सबसे ज्यादा जोखिम में रिलायंस नहीं, बल्कि वे 13 वैश्विक निवेशक हैं, जिन्होंने 2020 में जियो में 20.3 अरब डॉलर का निवेश किया था. इनमें मेटा, गूगल, सऊदी अरब का पीआईएफ, केकेआर, सिल्वर लेक, विस्टा, मुबाडाला, एडीआईए, टीपीजी, जनरल अटलांटिक, एल कैटरटन, इंटेल कैपिटल और क्वालकॉम शामिल हैं.

जियो के ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस में बताए गए शेयर आवंटन के विश्लेषण के मुताबिक, इन सभी निवेशकों के पास मिलकर कंपनी की करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी है. उन्होंने प्रति शेयर 488 रुपये (मेटा और गूगल) या 549 रुपये (बाकी निवेशकों) की कीमत पर शेयर खरीदे थे.

120 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर भी इनका रिटर्न सीमित है. इन निवेशकों की हिस्सेदारी का मूल्य 38.4 अरब डॉलर होगा, यानी उनके निवेश का 1.89 गुना. छह वर्षों में डॉलर के लिहाज से यह सालाना करीब 10.9% का रिटर्न है. यह सम्मानजनक है, लेकिन बड़े प्राइवेट इक्विटी फंड आमतौर पर जितने रिटर्न का लक्ष्य रखते हैं, उससे काफी कम है.

100 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर इनकी संयुक्त हिस्सेदारी का मूल्य घटकर करीब 32 अरब डॉलर रह जाएगा और सालाना डॉलर रिटर्न गिरकर 7.6% पर आ जाएगा. केकेआर, पीआईएफ और सिल्वर लेक सहित उन 11 निवेशकों के लिए, जिन्होंने 549 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर निवेश किया था, यह रिटर्न करीब 6.6% होगा. अगर 120 अरब डॉलर के मूल्यांकन से 30% की कटौती होती है, तो उनका रिटर्न घटकर 3.6% रह जाएगा, जो लगभग उतना ही है जितना अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से मिल सकता था.

डॉलर के लिहाज से उन्हें नुकसान तभी शुरू होगा, जब मूल्यांकन करीब 64-67 अरब डॉलर तक गिर जाए. लेकिन असली मुद्दा यह है कि महामारी के दौर के सबसे चर्चित सौदों में से एक से उन्हें कितना कम रिटर्न मिला है.

रुपये की गिरावट पहले ही 11 अरब डॉलर का नुकसान करा चुकी है

2020 के मध्य में डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 75 रुपये था, जो अब गिरकर करीब 96.7 रुपये पर आ गया है. यानी इसमें 29% की गिरावट आई है. केवल इस गिरावट के कारण ही 2020 के निवेशकों के लाभ में करीब 11 अरब डॉलर की कमी आई है.

अगर पुरानी विनिमय दर लागू होती, तो 120 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर उनकी हिस्सेदारी का मूल्य करीब 49.6 अरब डॉलर होता. रुपये के लिहाज से उन्हें सालाना 14-17% का रिटर्न मिलता. लेकिन डॉलर में, जिस मुद्रा में वे अपने रिटर्न की रिपोर्ट करते हैं, उनका सालाना रिटर्न करीब 5 प्रतिशत अंक कम हो गया है.

यही स्थिति गतिरोध की वजह समझाती है. मुद्रा की गिरावट से पहले ही अरबों डॉलर का नुकसान झेल चुके 2020 के निवेशकों के पास अब अतिरिक्त भारी डिस्काउंट स्वीकार करने की बहुत कम वजह है.

रिलायंस का रिटर्न बिल्कुल अलग नजर आता है

रिलायंस की स्थिति इससे अलग है. प्रॉस्पेक्टस के आंकड़ों के आधार पर, जियो में रिलायंस का अपना निवेश, जो बड़े पैमाने पर 2020 की फंड जुटाने की प्रक्रिया से पहले 10 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर किया गया था, डॉलर के लिहाज से अपनी लागत से करीब 14 गुना मूल्य का है. इसका मतलब सालाना करीब 49% का रिटर्न है. हालांकि, यह एक अनुमानित आंकड़ा है, क्योंकि भुगतान की एक तारीख का खुलासा नहीं किया गया है.

डिस्काउंट से रिलायंस की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी. वहीं, 2020 के निवेशकों के रिटर्न पर इसका सीधा असर पड़ेगा.

फिर आई मस्क की पोस्ट

बुधवार को, जब रोडशो पूरी रफ्तार से चल रहा था, एलन मस्क ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, "दुर्भाग्य से, कुछ कुलीन कारोबारी हमें रोक रहे हैं, ताकि भारतीय लोगों पर अपनी एकाधिकारवादी पकड़ बनाए रख सकें. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं..."

उन्होंने आगे लिखा, "यह भारत के लोगों के खिलाफ अपराध है!"

गुरुवार को उन्होंने अंदाजा लगाने का खेल खत्म कर दिया. मस्क ने पोस्ट किया, "स्टारलिंक को 165 से अधिक देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और उसने भारत सरकार के हर कानून और आवश्यकता का पालन करने में पांच साल बिताए हैं, तो फिर अब तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला?" उन्होंने आगे लिखा, "क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं?"

यह उस कारोबारी पर सीधा हमला था, जिसकी कंपनी उसी समय वैश्विक निवेशकों से 100 अरब डॉलर के मूल्यांकन की मांग कर रही थी.

यह शिकायत नई नहीं है. भारत में स्टारलिंक की शुरुआत इस साल अटक गई थी. सरकार ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला दिया था और कंपनी से प्री-ऑर्डर के पैसे वापस करने को कहा गया था. लेकिन मुंबई के डीलिंग रूम में इस समय चर्चा का विषय इस पोस्ट का समय है.

यह पोस्ट उस समय आई, जब जियो का प्रबंधन और उसके बैंकर उन्हीं वैश्विक फंड मैनेजरों के सामने अपनी बात रख रहे थे, जो पहले से ही डिस्काउंट की मांग कर रहे हैं. कोई भी कंपनी अपने आईपीओ के प्रचार के दौरान "एकाधिकारवादी पकड़" जैसे शब्दों को चर्चा में नहीं देखना चाहेगी.

इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मस्क ने आईपीओ को नुकसान पहुंचाने के लिए जानबूझकर पोस्ट का समय चुना. लेकिन इससे हर उस निवेशक के सामने एक सवाल खड़ा हो गया है, जो 100 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर निवेश करने पर विचार कर रहा है: क्या जियो का दबदबा प्रतिस्पर्धा के कारण है या नियामकीय संरक्षण की वजह से, और यह संरक्षण आखिर कब तक बना रहेगा?

अब आगे क्या होगा?

आईपीओ इसी महीने के अंत में खुलने की उम्मीद है. अब बैंकरों के सामने तीन विकल्प हैं:

- कम कीमत तय करके सौदा पूरा करना: यह स्वीकार करते हुए कि जियो की लिस्टिंग भारती एयरटेल के मुकाबले बड़े डिस्काउंट पर होगी और 2020 के निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ेगा.

- कीमत पर कायम रहना और कमजोर प्रतिक्रिया का जोखिम लेना: ऐसा होने पर रिलायंस के लिए यह शर्मिंदगी की स्थिति हो सकती है.

- आईपीओ टालना और बाजार में सुधार का इंतजार करना: इसका मतलब होगा यह स्वीकार करना कि भारत का सबसे बड़ा आईपीओ बाजार में गिरावट से प्रभावित हुआ है.

हर विकल्प में किसी न किसी को कीमत चुकानी पड़ेगी. 2020 में दुनिया के सबसे बड़े निवेशकों ने अंबानी की डिजिटल महत्वाकांक्षा में निवेश करने के लिए कतार लगाई थी. छह साल बाद, उस निवेश से मिला रिटर्न बॉन्ड फंड से मिलने वाले रिटर्न से भी कम रहा है, मस्क की एक पोस्ट ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जियो ने बाजार में अपना दबदबा कैसे बनाया और नए निवेशक अब अतिरिक्त डिस्काउंट की मांग कर रहे हैं.

रिटर्न सकल हैं, यानी इनमें शुल्क और कर शामिल नहीं हैं. ये 19 जून 2026 की तारीख वाले जियो प्लेटफॉर्म्स के ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस में बताए गए शेयर आवंटन और ईसीबी की डॉलर/रुपया संदर्भ विनिमय दरों पर आधारित हैं.

पलक शाह

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)


GST में टैक्स दरें स्थिर, रिफंड, ITC और रजिस्ट्रेशन से जुड़े नियमों में बदलाव के 10 बड़े प्रस्ताव

जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक में टैक्स दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया, लेकिन रजिस्ट्रेशन, रिफंड, इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC), छोटे कारोबारियों और माल परिवहन से जुड़े नियमों को आसान बनाने पर जोर दिया गया.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
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जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक में कर व्यवस्था को सरल बनाने और कारोबारियों की प्रक्रियागत परेशानियां दूर करने के लिए कई अहम प्रस्तावों को आगे बढ़ाया गया. इनमें कम जोखिम वाले कारोबारियों को तेजी से जीएसटी पंजीकरण, रिफंड की समय सीमा घटाने, छोटे कारोबारियों के लिए सालाना रिटर्न का विकल्प और ई-कॉमर्स के जरिए दूसरे राज्यों में कारोबार करने की प्रक्रिया आसान बनाने जैसे कदम शामिल हैं. इसके अलावा, माल परिवहन के दौरान जांच, इनपुट टैक्स क्रेडिट और जीएसटी कानून के तहत दंड से जुड़े नियमों में भी बदलाव प्रस्तावित हैं.

1. कम जोखिम वाले कारोबारियों को तीन दिन में GST रजिस्ट्रेशन

कम जोखिम वाले आवेदकों और ऐसे कारोबारियों, जिनकी पंजीकृत कारोबारियों को आपूर्ति पर आउटपुट टैक्स देनदारी 2.5 लाख रुपये प्रतिमाह से अधिक नहीं है, को सिस्टम के जरिए तीन कार्यदिवस में पंजीकरण देने की व्यवस्था जारी रहेगी. फिलहाल 61 प्रतिशत पंजीकरण इसी स्वचालित माध्यम से हो रहे हैं. व्यापार नाम, निदेशक या साझेदार और अतिरिक्त कारोबारी स्थल के पते में बदलाव जैसे संशोधनों को भी स्वत: स्वीकार करने की व्यवस्था की जाएगी.

2. GST रिफंड की प्रक्रिया होगी तेज

रिफंड दावों को मंजूरी देने या उनमें कमी की सूचना जारी करने की समय सीमा 15 दिन से घटाकर 10 दिन करने का प्रस्ताव है. यदि इस अवधि में कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो दावा स्वीकृत माना जाएगा. जोखिम आकलन के आधार पर रिफंड की 90 प्रतिशत राशि सिस्टम के जरिए मंजूर की जाएगी और आदेश तीन कार्यदिवस में जारी होगा. नकद लेजर में अतिरिक्त राशि की वापसी की प्रक्रिया भी पूरी तरह स्वचालित की जाएगी.

3. ईमानदार खरीदारों के ITC पर होगा विचार

ऐसे खरीदार, जिनके पास उचित चालान हैं, जिन्होंने सामान प्राप्त किया है और आपूर्तिकर्ता को पूरा भुगतान किया है, उन्हें केवल आपूर्तिकर्ता की चूक के कारण इनपुट टैक्स क्रेडिट से वंचित होने से बचाने के मुद्दे पर अधिकारियों की समिति बनाई जाएगी. समिति तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देगी और इस विषय को परिषद की अगली बैठक में रखा जाएगा.

4. कर्मचारियों के बीमा समेत कुछ खर्चों पर ITC

कर्मचारियों के लिए लिए गए स्वास्थ्य और जीवन बीमा पर इनपुट टैक्स क्रेडिट उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है. इसके अलावा, टेलीकॉम टावर, फैक्टरी के बाहर बिछाई गई पाइपलाइन, मुफ्त नमूनों और कानूनन नष्ट किए जाने वाले एक्सपायर्ड स्टॉक से जुड़े मामलों में भी ITC का प्रावधान किया गया है.

5. एक ही सेवा पर दो बार टैक्स से राहत

एक ही कारोबारी श्रृंखला में दोबारा खरीदी और बेची जाने वाली सेवा पर दोहरा कराधान रोकने के लिए प्रावधान किया गया है. होटल में 7,500 रुपये तक के कमरे की एजेंट के जरिए बुकिंग, रेस्तरां और कैटरिंग तथा यात्री परिवहन जैसी सेवाओं को इससे लाभ मिल सकता है.

6. छोटे कारोबारियों को सालाना रिटर्न का विकल्प

पांच करोड़ रुपये तक का कारोबार करने वाले और केवल उपभोक्ताओं को आपूर्ति करने वाले करदाताओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था को सैद्धांतिक मंजूरी दी गई है. इसके तहत साल में एक बार रिटर्न दाखिल करने और तिमाही आधार पर कर भुगतान की सुविधा मिल सकेगी. इस व्यवस्था का विस्तृत खाका परिषद की अगली बैठक में पेश किया जाएगा.

7. माल ढुलाई के दौरान बार-बार जांच से राहत

माल लेकर जा रहे वाहनों को केवल विशिष्ट खुफिया सूचना के आधार पर रोका जा सकेगा. इसके लिए संयुक्त आयुक्त या उससे ऊपर के अधिकारी की पूर्व अनुमति जरूरी होगी. जांच केवल उस राज्य में की जाएगी जहां से माल रवाना हुआ है और जिस राज्य में उसकी डिलीवरी होनी है. बीच के राज्यों में वाहन रोककर जांच नहीं की जाएगी.

8. GST में गिरफ्तारी का प्रावधान हटाने का प्रस्ताव

जीएसटी कानून में गिरफ्तारी की शक्ति हटाने का प्रस्ताव किया गया है. अभियोजन की सीमा एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने की बात कही गई है. न्यूनतम सजा का प्रावधान हटाकर सजा तय करने का अधिकार अदालत के विवेक पर छोड़ने का प्रस्ताव है. सामान्य जुर्माने की अधिकतम राशि भी 25,000 रुपये से घटाकर 10,000 रुपये करने की बात है.

9. सेवा निर्यात को मिलेगा बढ़ावा

विदेशी ग्राहक के माल पर भारत में परीक्षण, मरम्मत, प्रमाणन, शोध या प्रोसेसिंग जैसी सेवाओं को निर्यात सेवा का दर्जा देने का प्रावधान किया गया है, भले ही संबंधित माल भारत से बाहर न जाए. विदेश में अपनी शाखा के जरिए विदेशी ग्राहक को सेवा देने वाली भारतीय कंपनियों को भी निर्यात से जुड़े लाभ मिल सकेंगे.

10. छोटे ई-कॉमर्स विक्रेताओं के लिए आसान होंगे नियम

ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए दूसरे राज्यों में सामान बेचने वाले छोटे विक्रेताओं के लिए पंजीकरण प्रक्रिया आसान की जाएगी. प्लेटफॉर्म के दूसरे राज्य में स्थित वेयरहाउस को उसकी सहमति से विक्रेता के प्रमुख कारोबारी स्थल के रूप में घोषित किया जा सकेगा. इससे छोटे विक्रेताओं के लिए देशभर में कारोबार करना आसान हो सकता है.

GST दरों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं

जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक में कर दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया. दरों की समीक्षा अब साल में एक बार, इसके लिए निर्धारित विशेष बैठक में किए जाने की बात कही गई है. इस बार मुख्य जोर पिछले साल हुए बदलावों के बाद सामने आई प्रक्रियागत विसंगतियों और नियमों की अस्पष्टता दूर करने पर रहा.

 


फेस्टिव सीजन से पहले महंगा हुआ हवाई सफर, एयर इंडिया समेत 3 एयरलाइंस ने बढ़ाया फ्यूल सरचार्ज

एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस की नई दरें 9 अक्टूबर 2026 से लागू होंगी, जबकि आकासा एयर ने भी अपने ईंधन शुल्क में बढ़ोतरी की है.

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Friday, 09 October, 2026
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त्योहारों के सीजन से पहले हवाई यात्रा करने वालों की जेब पर बोझ बढ़ने वाला है. विमान ईंधन (ATF) की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच एयर इंडिया, एयर इंडिया एक्सप्रेस और आकासा एयर ने फ्यूल सरचार्ज बढ़ाने का फैसला किया है. एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस की नई दरें 9 अक्टूबर 2026 से लागू होंगी, जबकि आकासा एयर ने भी अपने ईंधन शुल्क में बढ़ोतरी की है. इससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर हवाई टिकट की कुल कीमत बढ़ सकती है. इससे पहले इंडिगो भी फ्यूल चार्ज बढ़ा चुकी है.

9 अक्टूबर से लागू होंगी नई दरें

एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए फ्यूल सरचार्ज में बदलाव किया है. एयरलाइंस के मुताबिक, हाल के महीनों में भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के कारण विमान ईंधन की कीमतों पर दबाव बना हुआ है. इससे परिचालन लागत बढ़ी है, जिसमें ईंधन का बड़ा हिस्सा होता है.

एयर इंडिया एक्सप्रेस के लिए नया फ्यूल सरचार्ज 9 अक्टूबर को रात 12 बजे (IST) से की गई नई बुकिंग पर लागू होगा. वहीं, एयर इंडिया के लिए नई दरें 9 अक्टूबर को सुबह 11 बजे से की गई बुकिंग पर लागू होंगी. शुल्क की राशि उड़ान की दूरी और रूट की श्रेणी के आधार पर अलग-अलग होगी.

एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस में कितना बढ़ा चार्ज?

दोनों एयरलाइंस ने एकतरफा घरेलू उड़ानों के लिए दूरी के आधार पर फ्यूल सरचार्ज तय किया है. इसके तहत शुल्क 400 रुपये से 1,200 रुपये के बीच होगा. 1,001 से 1,500 किलोमीटर की दूरी वाली उड़ानों के लिए 850 रुपये का सरचार्ज देना होगा. वहीं, 1,501 से 2,000 किलोमीटर और 2,000 किलोमीटर से अधिक दूरी वाले मार्गों पर यह शुल्क 1,200 रुपये होगा. एयरलाइंस का कहना है कि संशोधित फ्यूल सरचार्ज से ईंधन की बढ़ी हुई लागत की कुछ हद तक भरपाई करने और अपने नेटवर्क पर परिचालन जारी रखने में मदद मिलेगी.

आकासा एयर ने भी बढ़ाया फ्यूल चार्ज

आकासा एयर ने भी विमान ईंधन की बढ़ती लागत के मद्देनजर फ्यूल चार्ज में बढ़ोतरी की है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एयरलाइन ने इसे 375 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये तक किया है. हालांकि, अलग-अलग उड़ानों और मार्गों पर लागू शुल्क की सटीक राशि संबंधित बुकिंग की शर्तों पर निर्भर करेगी.

इंडिगो पहले ही बढ़ा चुकी है शुल्क

इससे पहले इंडिगो ने भी विमान ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का हवाला देते हुए 6 अक्टूबर 2026 को रात 12:01 बजे से की गई नई बुकिंग पर फ्यूल चार्ज में बदलाव किया था. एयरलाइन के अनुसार, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक घटनाक्रम और ईंधन की बढ़ती लागत के कारण एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतें पिछले दशक के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. कंपनी ने बताया कि हालिया मासिक बढ़ोतरी 14 फीसदी से अधिक रही है.

संशोधित शुल्क के तहत घरेलू उड़ानों में 500 किलोमीटर तक की यात्रा के लिए 375 रुपये, 501 से 1,000 किलोमीटर की दूरी के लिए 600 रुपये और 1,001 से 1,500 किलोमीटर की दूरी के लिए 900 रुपये का फ्यूल चार्ज निर्धारित किया गया है.

यात्रियों की जेब पर बढ़ेगा बोझ

फ्यूल सरचार्ज में बढ़ोतरी का सीधा असर हवाई टिकट की कुल कीमत पर पड़ सकता है. फेस्टिव सीजन के दौरान यात्रा की मांग बढ़ने के बीच यात्रियों को टिकट बुक करते समय मूल किराए के साथ ईंधन शुल्क और अन्य लागू शुल्कों को भी ध्यान में रखना होगा. हालांकि, अंतिम कीमत एयरलाइन, यात्रा की दूरी, रूट और टिकट बुकिंग के समय के आधार पर अलग-अलग हो सकती है.
 


पैंटोमैथ: बैंकर, खरीदार और विक्रेता

मुंबई के एक निवेश बैंक के अपने ही समूह के फंड उन सौदों में बार-बार दिखाई देते हैं, जिन्हें वह बाजार में बेचता है. इन सौदों में निवेश करने वाले निवेशकों का प्रदर्शन खराब रहा है.

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Friday, 09 October, 2026
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पलक शाह

मुंबई का निवेश बैंक पैंटोमैथ अपने ही समूह के साथ बार-बार सौदे करता है. समूह द्वारा संचालित फंड कंपनियों में निवेश करते हैं, इसके बाद उसका बैंक उन्हीं कंपनियों के शेयर जनता को बेचता है. एक मामले में पैंटोमैथ के एक फंड ने ऐसे प्लेसमेंट में निवेश किया, जिसे उसका अपना बैंक बेच रहा था. हाल के तीन सौदों में ऑफर प्राइस पर निवेश करने वाले निवेशकों को 42% से 65% तक का नुकसान हुआ है. यह सब कानूनी है. यही वजह है कि भारत के बाजार नियामक को इस पर ध्यान देना चाहिए.

अगला सौदा पहले से ही सेबी की मेज पर है. दिल्ली की पाइप निर्माता कंपनी हाई-टेक फ्लो सॉल्यूशंस ने पिछले महीने आईपीओ के लिए आवेदन किया था, जिसमें पैंटोमैथ उसके दो बैंकरों में से एक है. पैंटोमैथ समूह के एक फंड के पास कंपनी की 14.67% हिस्सेदारी है, जिसे उसने 19.74 रुपये प्रति शेयर की दर से खरीदा था. अब वह ऑफर में अपने सभी 2.03 करोड़ शेयर बेच रहा है.

पैंटोमैथ पहले भी इस परिवार के साथ कारोबार कर चुका है. अक्टूबर 2024 में वह हाई-टेक पाइप्स का एकमात्र बैंकर था. यह सूचीबद्ध कंपनी उसी बंसल परिवार के नियंत्रण में है. कंपनी ने 185.50 रुपये प्रति शेयर की दर से 500 करोड़ रुपये (6 करोड़ डॉलर) जुटाए थे. खरीदारों में पैंटोमैथ का एक फंड भी शामिल था. पैंटोमैथ ने पुष्टि की है कि उसके फंड ने इस प्लेसमेंट में 27 लाख शेयर खरीदे थे, जिनकी कीमत करीब 50 करोड़ रुपये थी. 21 सितंबर को शेयर 75 रुपये पर बंद हुए, यानी 60% की गिरावट. यह खरीद किसके हित में थी: अपने बुक को भरने वाले बैंक के या फंड के निवेशकों के?

भारत अपने इतिहास में शेयरों की बिक्री की सबसे बड़ी लहर के बीच है. पिछले महीने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने भी अपने शेयर जनता को बेचे. 123 आईपीओ का प्रबंधन कर चुका पैंटोमैथ भी इसके बैंकरों में शामिल था. इसके संस्थापक महावीर और मधु लुनावत ने एक मर्चेंट बैंक, आईपीओ से पहले निवेश करने वाले फंडों का समूह, सूचीबद्ध ब्रोकिंग समूह में 37% हिस्सेदारी और जुलाई 2025 से करीब 2,000 करोड़ रुपये की खुदरा बचत वाला म्यूचुअल फंड खड़ा किया है. कोटक और मोतीलाल ओसवाल जैसे बड़े समूह भी इसी तरह के कारोबार चलाते हैं. पैंटोमैथ को अलग बनाने वाली बात यह है कि उसके अलग-अलग कारोबार एक ही सौदे में कितनी बार एक साथ आते हैं और किस तरह के सौदों में आते हैं: छोटी कंपनियां, कम कारोबार वाले शेयर और बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक.

भारतीय नियम इस तरह के आपसी जुड़ाव पर ध्यान देते हैं. चूंकि समूह के फंड के पास हाई-टेक फ्लो की 10% से अधिक हिस्सेदारी है, इसलिए पैंटोमैथ को जारीकर्ता कंपनी का एक "सहयोगी" माना जाता है और वह आईपीओ का केवल विपणन कर सकता है, उसका प्रबंधन नहीं. फिर भी सेबी उससे उचित जांच-पड़ताल का प्रमाणपत्र हस्ताक्षरित करने की मांग करता है. यह प्रमाणपत्र इस बात की पुष्टि है कि प्रॉस्पेक्टस सही है. नियम बैंक से ऑफर की विश्वसनीयता की पुष्टि कराते हैं. लेकिन वे बैंक के सहयोगी फंड को आईपीओ में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने से नहीं रोकते.

फंड इस तरीके के बारे में खुलकर बताते हैं. एक फंड वितरक द्वारा प्रकाशित एक फंड की बिक्री सामग्री में आईपीओ या बिक्री के जरिए "करीब 3.5 साल के भीतर" निवेश से बाहर निकलने का वादा किया गया है. इसमें औसतन 2.5 गुना रिटर्न का दावा है. सामग्री में यह भी कहा गया है कि समूह के "स्वतंत्र निवेश बैंकिंग नेटवर्क" का लाभ उठाकर सूचीबद्ध प्रतिस्पर्धी कंपनियों की तुलना में 30-40% कम कीमत पर निवेश किया जाता है.

संक्षेप में: बैंक के जरिए सस्ते में निवेश करें, उसी बैंक के जरिए कंपनी को शेयर बाजार में लाएं और फिर बाजार के जरिए बाहर निकल जाएं.

विक्रान इंजीनियरिंग दिखाती है कि किसी सौदे के दोनों सिरों पर बैंक कैसे मौजूद हो सकता है.

जनवरी 2024 में पैंटोमैथ के एक फंड ने बिजली क्षेत्र में ठेके लेने वाली कंपनी विक्रान इंजीनियरिंग में निवेश किया. इस निवेश दौर में कंपनी का मूल्यांकन करीब 740 करोड़ रुपये आंका गया था. उस समय की घोषणा के अनुसार, पैंटोमैथ कैपिटल इस सौदे का एकमात्र बैंकर था. इसके 19 महीने बाद पैंटोमैथ ने विक्रान के आईपीओ का सह-नेतृत्व किया, जिसमें नई पूंजी जुटाने से पहले कंपनी का मूल्यांकन 1,781 करोड़ रुपये था. खुदरा निवेशकों ने 97 रुपये प्रति शेयर की दर से निवेश किया.

दो महीने बाद विक्रान ने 1,642 करोड़ रुपये के सौर ऊर्जा ऑर्डर की घोषणा की और उसके शेयरों में उछाल आया. फरवरी तक यह ऑर्डर रद्द हो गया और कंपनी के आंतरिक ऑडिटरों ने इस्तीफा दे दिया. सितंबर 2025 से जून 2026 के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों की विक्रान में हिस्सेदारी 12.6% से घटकर 5.7% रह गई. आम जनता की हिस्सेदारी 28.8% से बढ़कर 36.7% हो गई और करीब 17,000 नए शेयरधारक जुड़ गए. शेयरधारिता के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि फंड ने अपनी हिस्सेदारी करीब 6% घटाई है. हालांकि, पैंटोमैथ का कहना है कि उसने अपने शुरुआती निवेश का 5% से भी कम बेचा है.

टेलीकॉम टावर कंपनी एसएआर टेलीवेंचर ने इससे भी अधिक उतार-चढ़ाव वाला सफर देखा. पैंटोमैथ 2023 में इसे शेयर बाजार में लाया और कंपनी ने 25 करोड़ रुपये से कम जुटाए. आठ महीने बाद पैंटोमैथ ने कंपनी के लिए 450 करोड़ रुपये और जुटाए: 210 रुपये प्रति शेयर की दर से फॉलो-ऑन ऑफर में 150 करोड़ रुपये और 200 रुपये प्रति शेयर की दर से राइट्स इश्यू में 300 करोड़ रुपये. बाजार निर्माता की भूमिका असित सी मेहता के ब्रोकिंग कारोबार ने निभाई, जिसमें पैंटोमैथ की एक कंपनी की आंशिक हिस्सेदारी है. छह सप्ताह बाद एसएआर के शेयर 414 रुपये के शिखर पर पहुंच गए. अब इनका कारोबार 73 रुपये पर हो रहा है. पैंटोमैथ का कहना है कि उसके फंड के पास अब भी अपनी पूरी हिस्सेदारी है.

क्या यह महज संयोग है या एक पैटर्न?

आईपीओ डेटा कंपनी आईपीओ प्लेटफॉर्म के अनुसार, पैंटोमैथ के 123 आईपीओ में से 10 में से नौ शेयर बाजार में प्रीमियम पर सूचीबद्ध हुए. लेकिन अब इनमें से आधे से अधिक अपने ऑफर प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे हैं. मुख्य बोर्ड पर उसकी पिछली आठ लिस्टिंग में से पांच में निवेशकों को नुकसान हो रहा है. छोटी कंपनियों के आईपीओ हर बैंकर के लिए जोखिम भरे होते हैं और हमने पैंटोमैथ के रिकॉर्ड की उसके प्रतिस्पर्धियों से तुलना नहीं की है. लेकिन उसके ग्राहकों के निवेशकों के लिए हालात स्पष्ट रूप से मुश्किल रहे हैं.

समूह का पुराना इतिहास भी है.

2016 से 2020 के बीच पैंटोमैथ स्टॉक ब्रोकर्स नाम के एक ब्रोकर ने छोटी कंपनियों के 63 आईपीओ में बाजार निर्माता की भूमिका निभाई. लुनावत इस ब्रोकर के बोर्ड में शामिल थे. इन सभी 63 आईपीओ का प्रबंधन पैंटोमैथ कैपिटल ने किया था. 2022 में सेबी ने पाया कि ब्रोकर ने उसके निरीक्षकों द्वारा जांचे गए 37 में से 35 दिनों में ग्राहकों के 24 करोड़ रुपये तक के धन का दुरुपयोग किया था. नियामक ने इन उल्लंघनों को "बेहद गंभीर" बताया.

सेबी ने पाया कि ब्रोकर ने ग्राहकों के शेयरों को उनकी देनदारी से अधिक गिरवी रखा था और अपने कारोबार में हुए नुकसान की भरपाई के लिए उनके धन का इस्तेमाल किया था. ब्रोकर ने कहा था कि वह "एसएमई बाजार में मार्केट मेकिंग" के लिए 32 करोड़ रुपये के शेयर रख रहा था. सेबी ने उस पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. उसने इसके लिए लुनावत को नहीं, बल्कि ब्रोकर का रोजमर्रा का कामकाज संभालने वाले तोशनिवाल परिवार को जिम्मेदार ठहराया. लुनावत का कहना है कि वे 2019 तक ब्रोकर से "अलग हो चुके थे".

इसके बावजूद पैंटोमैथ ने 2021 और 2022 में दो अन्य आईपीओ के लिए उसी ब्रोकर को बाजार निर्माता बनाया. उसी साल लुनावत की एक नई कंपनी ने असित सी मेहता में हिस्सेदारी खरीदी. यही ब्रोकर बाद में एसएआर के शेयरों के लिए बाजार निर्माता बना. पुराने ब्रोकर ने जुलाई 2025 में अपना एक्सचेंज लाइसेंस छोड़ दिया, समूह के म्यूचुअल फंड को लाइसेंस मिलने के एक सप्ताह बाद. पैंटोमैथ इसे "महज संयोग" बताता है.

2023 में पैंटोमैथ कैपिटल के एक अलग निरीक्षण में सेबी ने पाया कि उसके उचित जांच-पड़ताल संबंधी दो प्रमाणपत्रों पर किए गए हस्ताक्षर न तो एक-दूसरे से मेल खाते थे और न ही हस्ताक्षरकर्ता के पहचान पत्र से. 2024 में हस्ताक्षरों पर कोई फैसला दिए बिना यह आरोप हटा दिया गया.

इसके बाद म्यूचुअल फंड का मामला है. इसे पैंटोमैथ कैपिटल प्रायोजित करता है, मधु लुनावत इसका संचालन करती हैं और पैंटोमैथ ट्रस्टी नाम की ट्रस्ट कंपनी इसकी निगरानी करती है. ये सभी समूह के अंधेरी स्थित मुख्य कार्यालय से काम करते हैं. पैंटोमैथ ने हमें बताया कि उसे "पैंटोमैथ द्वारा प्रबंधित आईपीओ सहित किसी भी आईपीओ में निवेश करने की अनुमति है". अब तक ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं देता. हमने उसकी सात योजनाओं की जांच की और उनमें पैंटोमैथ से जुड़ा कोई शेयर नहीं पाया. हालांकि, नियम उसे ऐसा करने से नहीं रोकेंगे.

पैंटोमैथ का पक्ष

पैंटोमैथ ने हमारे सवालों के जवाब लिखित में दिए और 8 अक्टूबर को आगे पूछे गए सवालों का भी जवाब दिया. उसका कहना है कि प्रत्येक कारोबार सेबी में पंजीकृत एक अलग कंपनी है, जिसका अपना बोर्ड है. उसने यह भी कहा कि न्यूयॉर्क और लंदन में एकीकृत कारोबारी समूह आम हैं. समूह के किसी फंड का ऐसी कंपनी में हिस्सेदारी रखना, जिसे बैंक शेयर बाजार में ला रहा है, "अपने आप में हितों के नियामकीय टकराव का मामला नहीं है". उसके अनुसार, सभी हिस्सेदारियां निर्धारित सीमाओं के भीतर थीं और उनका खुलासा किया गया था. सेबी बैंकरों से उनकी भूमिका चाहे जो हो, उचित जांच-पड़ताल के प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर करने की मांग करता है.

उसके कुछ जवाब उपलब्ध रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते. पैंटोमैथ ने पहले कहा कि उसका भारत वैल्यू फंड "लॉन्ग-ओनली" है और लंबी अवधि के लिए निवेश करता है. जब उससे बिक्री सामग्री में "करीब 3.5 साल के भीतर" निवेश से बाहर निकलने के वादे के बारे में पूछा गया, तो उसने कहा कि लॉन्ग-ओनली का मतलब है कि फंड बिना ट्रेडिंग या शॉर्ट सेलिंग के शेयर खरीदता है और अपने पास रखता है.

ब्रोकर के मामले में उसने कहा कि लुनावत ने "सेबी सहित संबंधित अधिकारियों के समक्ष मामला उठाया था". हालांकि, सेबी ने अपने निरीक्षण के जरिए ब्रोकर के उल्लंघनों का पता लगाया था और यह दलील खारिज कर दी थी कि इसके लिए पिछला प्रबंधन जिम्मेदार था. नियामक ने इस दलील को "निराधार" बताया था.

पैंटोमैथ ने यह नहीं बताया कि उसके किन अन्य आईपीओ में समूह के फंड का पैसा लगा था. हाई-टेक फ्लो के आईपीओ से उसे कितनी कमाई होगी, इस सवाल पर उसने ऑफर दस्तावेजों का हवाला दिया. यह पूछे जाने पर कि क्या उसके म्यूचुअल फंड ने पैंटोमैथ द्वारा प्रबंधित किसी आईपीओ में निवेश किया है, उसने सिर्फ इतना कहा कि फंड को ऐसा करने की अनुमति है.

अमेरिका में यदि किसी बैंक से जुड़ी कंपनियों के पास जारीकर्ता कंपनी की 10% या उससे अधिक हिस्सेदारी है, तो इस हितों के टकराव का प्रमुखता से खुलासा करना जरूरी होता है. अक्सर कीमत की पुष्टि के लिए स्वतंत्र अंडरराइटर की भी जरूरत होती है. दिसंबर में सेबी ने बैंकरों को उन आईपीओ का नेतृत्व करने से रोक दिया था, जिनमें उनके अपने निदेशकों या कर्मचारियों की हिस्सेदारी महज 0.1% तक भी हो. लेकिन समूह का सहयोगी फंड 14.67% हिस्सेदारी रख सकता है और पूरी हिस्सेदारी बेच सकता है.

हो सकता है कि पैंटोमैथ ने किसी नियम का उल्लंघन न किया हो. असली मुद्दा यही है. नियम हर लाइसेंस को अलग-अलग देखते हैं, जबकि निवेशक शेयर खरीदते हैं. जब पैंटोमैथ का फंड हाई-टेक फ्लो से अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचकर बाहर निकलेगा, तो प्रॉस्पेक्टस पर पैंटोमैथ का नाम होगा. निवेशकों को पता होना चाहिए कि वे किससे शेयर खरीद रहे हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


बाजार में रिकवरी के संकेत, गिफ्ट निफ्टी 80 अंक चढ़ा; इन्फोसिस-विप्रो समेत इन शेयरों पर रहेगी नजर

गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 1,045.46 अंक यानी 1.44 फीसदी गिरकर 71,593.24 पर आ गया. वहीं, एनएसई निफ्टी 371.25 अंक यानी 1.64 फीसदी टूटकर 22,231.80 पर बंद हुआ.

Last Modified:
Friday, 09 October, 2026
BWHindia

घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार को लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में भारी बिकवाली देखने को मिली. सेंसेक्स 1,045 अंक टूटकर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 371 अंक फिसल गया. इस गिरावट से बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 11 लाख करोड़ रुपये घट गया. हालांकि, शुक्रवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में करीब 80 अंकों की बढ़त और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी से बाजार में शुरुआती रिकवरी के संकेत मिल रहे हैं. दूसरी ओर, एशियाई बाजारों में कमजोरी और अमेरिकी ग्रीन कार्ड कार्यक्रम से जुड़ी खबर के चलते आईटी शेयरों पर दबाव रह सकता है. ऐसे में निवेशकों की नजर इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक, टीसीएस, रिलायंस इंडस्ट्रीज और आईटीसी समेत कई शेयरों पर रहेगी.

गुरुवार को बाजार में क्यों आई भारी गिरावट?

गुरुवार को घरेलू शेयर बाजार में चौतरफा बिकवाली के चलते प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए. बीएसई सेंसेक्स 1,045.46 अंक यानी 1.44 फीसदी गिरकर 71,593.24 पर आ गया. वहीं, एनएसई निफ्टी 371.25 अंक यानी 1.64 फीसदी टूटकर 22,231.80 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान निफ्टी 22,179 के स्तर तक फिसल गया, जो उसका 52 सप्ताह का निचला स्तर था.

बाजार में गिरावट के कारण बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 11 लाख करोड़ रुपये घटकर लगभग 460 लाख करोड़ रुपये रह गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 27 गिरावट के साथ बंद हुए. आईटीसी, अडानी पोर्ट्स, इंडिगो, पावर ग्रिड और रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में भी कमजोरी रही.

बाजार पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रेपो रेट में बढ़ोतरी और मौद्रिक नीति के रुख में सख्ती, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उछाल और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का दबाव रहा. इसके अलावा, कमजोर वैश्विक संकेतों ने भी निवेशकों की धारणा प्रभावित की.

गिफ्ट निफ्टी से रिकवरी के संकेत, लेकिन वैश्विक बाजार कमजोर

शुक्रवार सुबह गिफ्ट निफ्टी करीब 80 अंकों की बढ़त के साथ 22,370 के ऊपर कारोबार करता दिखा. इससे घरेलू बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान सुधार की उम्मीद जगी है. हालांकि, एशियाई बाजारों में कमजोरी के कारण तेजी पर दबाव रह सकता है.

एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर के मुताबिक, पिछले कारोबारी सत्र में लगभग सभी सेक्टरों में बिकवाली हुई थी. मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में ज्यादा कमजोरी रही. वैश्विक संकेतों और घरेलू आर्थिक दबावों के बीच निवेशक सतर्क रुख अपना सकते हैं.

शुक्रवार सुबह एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई एक फीसदी से अधिक गिर गया, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी करीब 2.6 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा था. हांगकांग का हैंगसेंग इंडेक्स भी कमजोर रहा. इससे पहले गुरुवार को अमेरिकी बाजारों में डॉव जोन्स मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि नैस्डैक और S&P 500 में करीब 1.4 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई.

कच्चे तेल में नरमी से बाजार को राहत

गुरुवार को तेजी के बाद शुक्रवार सुबह ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी देखने को मिली. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड वायदा आधे फीसदी से अधिक गिरकर 104 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार कर रहा था. भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट राहत दे सकती है, क्योंकि इससे आयात बिल और महंगाई पर दबाव कम होने की संभावना रहती है.

हालांकि, मध्य पूर्व में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बाजार की दिशा के लिए अहम रहेगा.

IT शेयरों पर क्यों रहेगी नजर?

शुक्रवार को आईटी सेक्टर के शेयरों में खास हलचल देखने को मिल सकती है. अमेरिकी स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम (PERM) से माइक्रोसॉफ्ट, इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट सहित प्रमुख टेक और आईटी कंपनियों को निलंबित किए जाने की खबर सामने आई है. PERM विदेशी कर्मचारियों के लिए रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है.

इस खबर के बाद इन्फोसिस और विप्रो समेत कुछ भारतीय आईटी कंपनियों के अमेरिकी डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADR) में गिरावट दर्ज की गई. ऐसे में घरेलू बाजार में इन्फोसिस, विप्रो और एचसीएल टेक के शेयरों पर निवेशकों की खास नजर रहेगी. टीसीएस का शेयर भी आईटी सेक्टर के रुख के लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा.

आज इन शेयरों पर भी रखें नजर

आईटी शेयरों के अलावा आईटीसी, रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी पोर्ट्स और इंडिगो भी निवेशकों के रडार पर रहेंगे. गुरुवार की गिरावट के बाद इन शेयरों में होने वाली गतिविधियां बाजार की चाल को प्रभावित कर सकती हैं. वहीं, जेएसडब्ल्यू स्टील के सितंबर तिमाही के उत्पादन में बढ़ोतरी से इस शेयर पर नजर रहेगी. डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज से जुड़ी अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की नियामकीय खबर भी महत्वपूर्ण होगी. इसके अलावा, एनसीसी को मिले करीब 1,286 करोड़ रुपये के सड़क निर्माण ऑर्डर के चलते शेयर में हलचल देखने को मिल सकती है. पावर ग्रिड, टाटा पावर, कोचीन शिपयार्ड, वेदांता और पेटीएम के शेयर भी चर्चा में रह सकते हैं.

निवेशकों के लिए क्या है संकेत?

शुक्रवार के कारोबार में निवेशकों को गिफ्ट निफ्टी, कच्चे तेल की कीमतों, एशियाई बाजारों के रुख और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए. आईटी कंपनियों से जुड़ी अमेरिकी नीति की खबरें भी शेयरों की चाल को प्रभावित कर सकती हैं. गुरुवार की भारी गिरावट के बाद गिफ्ट निफ्टी की बढ़त शुरुआती राहत का संकेत जरूर देती है, लेकिन वैश्विक बाजारों की कमजोरी और ब्याज दरों को लेकर चिंताओं के बीच उतार-चढ़ाव बना रह सकता है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
 


अडानी समूह पर शॉर्ट-सेलिंग हमले की फुसफुसाहट

राजीव जैन के GQG ने ITC में अपनी हिस्सेदारी बेच दी. डीलिंग रूम में चर्चा है कि कुछ ऑफशोर खिलाड़ियों को इसका पहले से अंदाजा था और उन्होंने पहले ही फंड की प्रमुख होल्डिंग्स में शॉर्ट पोजीशन बना ली थी. एलन मस्क की X पोस्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज में बिकवाली को और बढ़ा दिया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 08 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 08 October, 2026
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पलक शाह 

जिस दिन सेंसेक्स 1,000 अंक से ज्यादा गिरा, उस दिन स्क्रीन पर इंडेक्स सबसे कम दिलचस्प चीज थी. असली कहानी अडानी के शेयरों में थी और इसे समझने के लिए आपको फ्लोरिडा की एक फंड हाउस और उस सौदे से शुरुआत करनी होगी, जो मुंबई के ज्यादातर लोगों के सुबह की चाय खत्म करने से पहले ही हो चुका था.

वह फंड हाउस GQG Partners है. और गुरुवार को उसने फैसला किया कि अब वह ITC के साथ नहीं रहना चाहता.

शुरुआती कारोबार

प्री-ओपन ब्लॉक विंडो में करीब 36.66 करोड़ ITC शेयर, यानी कंपनी के लगभग 2.9 फीसदी शेयर, औसतन ₹257 प्रति शेयर की कीमत पर हाथ बदले. इस सौदे की कीमत करीब ₹9,437 करोड़ थी. रिपोर्टों में GQG को संभावित विक्रेता बताया गया और एक बैंकर ने इसे "क्लीन-आउट ट्रेड" कहा, जिसका सीधा मतलब है कि विक्रेता पूरी तरह बाहर निकलना चाहता था, न कि सिर्फ अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा कम करना.

खरीदारों की कोई कमी नहीं थी. एक विदेशी लॉन्ग-ओनली फंड ने कथित तौर पर ब्लॉक का करीब एक-तिहाई हिस्सा खरीदा. घरेलू म्यूचुअल फंड, निप्पॉन इंडिया, ICICI प्रूडेंशियल, SBI, कोटक और आदित्य बिड़ला ने बाकी हिस्सेदारी खरीद ली. इसके बावजूद ITC 5 फीसदी गिरकर 52 हफ्तों के निचले स्तर पर पहुंच गया. 2026 में अब तक शेयर करीब 30 फीसदी गिर चुका है.

यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था. इस सप्ताह की शुरुआत में GQG ने बताया था कि उसने मई 2025 से 5 अक्टूबर 2026 के बीच खुले बाजार में पहले ही ITC के 3.97 करोड़ शेयर बेच दिए थे, जिससे उसकी संयुक्त हिस्सेदारी 3.48 फीसदी से घटकर 3.17 फीसदी रह गई थी. गुरुवार का ब्लॉक वह क्षण था जब धीमी निकासी जोरदार बिकवाली में बदल गई.

GQG को क्यों बेचना पड़ रहा है

इसका जवाब GQG की अपनी किताबों में है. 2026 की पहली छमाही में ग्राहकों ने फर्म से शुद्ध रूप से 15.1 अरब डॉलर निकाल लिए. यह लगातार छठा महीना था जब फर्म में आने वाले पैसे की तुलना में बाहर जाने वाला पैसा ज्यादा रहा. विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि पांच साल का कमजोर प्रदर्शन रिसर्च हाउस की रेटिंग में गिरावट और निवेशकों के और तेजी से बाहर निकलने की स्थिति पैदा कर सकता है.

रिडेम्पशन का सामना कर रहे फंड मैनेजर के पास यह चुनने का विकल्प नहीं होता कि उसे बेचना है या नहीं. उसके पास सिर्फ यह चुनने का विकल्प होता है कि क्या बेचना है. और भारत में GQG के दो सबसे बड़े दांव हर स्ट्रीट ट्रेडर को पता हैं: ITC और अडानी समूह.

यही कारण है कि गुरुवार का ब्लॉक ITC से कहीं ज्यादा मायने रखता है.

डीलिंग रूम में फुसफुसाहट

यहां बाजार की चर्चा सार्वजनिक रिकॉर्ड से आगे निकल जाती है.

कई बाजार प्रतिभागियों का आरोप है कि GQG के ट्रेड संभालने वाले कुछ संस्थानों को ITC ब्लॉक के बारे में पहले से जानकारी थी. उनके मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों से जुड़े सिंगापुर स्थित कुछ हेज फंड उन शेयरों में शॉर्ट पोजीशन बनाने लगे, जिनमें GQG की बड़ी हिस्सेदारी है. अडानी मुख्य निशाना था.

ट्रेडरों के मुताबिक इसका तर्क जितना सरल है, उतना ही निर्मम भी. अगर GQG रिडेम्पशन पूरा करने के लिए ITC बेच रहा है, तो बाजार जल्द ही यह पूछेगा कि अगली बिक्री किसमें होगी. अडानी के शेयर इसका स्पष्ट जवाब हैं. उस डर के फैलने से पहले उन्हें शॉर्ट कर दो और फिर डर को बाकी काम करने दो.

एक वरिष्ठ फंड मैनेजर ने इस संवाददाता को बताया कि गोल्डमैन सैक्स पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिए बिकवाली गुरुवार को भारी रही. ये ऐसे ऑफशोर इंस्ट्रूमेंट हैं जो विदेशी खिलाड़ियों को भारत में रजिस्टर हुए बिना भारतीय शेयरों में पोजीशन लेने की सुविधा देते हैं.

इनमें से किसी भी दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी. किसी नियामक ने कोई टिप्पणी नहीं की है और इसमें शामिल फंडों के नाम भी सामने नहीं आए हैं. लेकिन अगर किसी ने किसी ब्लॉक डील की पहले से मिली जानकारी के आधार पर कारोबार किया है, तो यह मामला सीधे SEBI के अधिकार क्षेत्र में आता है.

स्क्रीन पर क्या दिखा

कारण चाहे जो भी हो, कीमतों में हुई हलचल उस पैटर्न से मेल खाती है जिसका ट्रेडर वर्णन कर रहे हैं.

समूह की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज 7 फीसदी गिरकर ₹2,566 पर आ गया, जबकि यह ₹2,744 पर था. यह 14 मई के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और अब छह कारोबारी सत्रों में 13 फीसदी गिर चुका है. अडानी ग्रीन एनर्जी दोपहर 2:39 बजे तक 6.71 फीसदी गिरकर ₹1,251.40 पर था. अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस 6 फीसदी गिरकर ₹1,241.30 पर आ गया और अडानी पावर 5.6 फीसदी गिरकर ₹185.60 पर पहुंच गया.

एक बार इन हाई-बीटा शेयरों ने अहम तकनीकी स्तरों को तोड़ा, तो बिकवाली खुद ही बढ़ने लगी. स्टॉप-लॉस ट्रिगर हुए, मार्जिन कॉल आए और लीवरेज वाले ट्रेडरों को गिरते बाजार में ही बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. बाहर से देखने पर सफल शॉर्ट रेड इसी तरह दिखाई देता है. वास्तव में ऐसा हुआ या नहीं, यही वह सवाल है जिसका जवाब नियामकों को देना पड़ सकता है.

यहां एक विडंबना है, जिसे बाजार नजरअंदाज नहीं कर पाया. 2023 में जब हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने अडानी के शेयरों को गिरावट में धकेल दिया था, तब राजीव जैन ही थे जो अरबों डॉलर लेकर आगे आए और गिरावट को रोकने में मदद की. गुरुवार को ट्रेडर यह दांव लगा रहे थे कि वही निवेशक अब विक्रेता बन सकता है.

एलन मस्क की एंट्री

जैसे इस दिन को एक और मोड़ की जरूरत थी, दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति भी इसमें शामिल हो गए.

रातोंरात एलन मस्क ने X पर अज्ञात "कुलीन कारोबारियों" पर आरोप लगाया कि वे भारत के इंटरनेट बाजार पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए स्टारलिंक को भारत से बाहर रख रहे हैं. उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया और कोई सबूत भी पेश नहीं किया. इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी. भारत का टेलीकॉम बाजार मुकेश अंबानी की Jio और सुनील मित्तल की Airtel के पास है और इस पोस्ट को दोनों पर निशाना साधने के तौर पर व्यापक रूप से देखा गया.

नई दिल्ली ने इस दावे को निराधार बताया और कहा कि उसकी सैटेलाइट लाइसेंसिंग व्यवस्था निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है. लेकिन बाजार बयानों पर नहीं, भावनाओं पर कारोबार करते हैं. निफ्टी का सबसे भारी शेयर रिलायंस 2.5 फीसदी गिर गया, ऐसे दिन जब इंडेक्स के पास किसी और भारी-भरकम शेयर की गिरावट को सहने की गुंजाइश नहीं थी.

पृष्ठभूमि

इनमें से कुछ भी शांत बाजार में नहीं हुआ. एक दिन पहले RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.5 फीसदी कर दिया था. यह करीब चार साल में पहली बढ़ोतरी थी. ब्रेंट क्रूड 104 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया. विदेशी निवेशक लगातार नौ सत्रों से बिकवाली कर रहे हैं और करीब ₹57,000 करोड़ निकाल चुके हैं.

तो हां, गुरुवार की गिरावट की आधिकारिक वजह कच्चा तेल, RBI और विदेशी बिकवाली है. तीनों वास्तविक हैं. लेकिन ये बताते हैं कि बाजार कमजोर क्यों था. ये यह नहीं बताते कि अडानी को बाकी शेयरों की तुलना में इतना ज्यादा नुकसान क्यों हुआ.

निचोड़

इसके एक ब्लॉक डील के साथ खत्म होने की संभावना कम है. GQG के पास अभी भी ITC में 3.17 फीसदी हिस्सेदारी और अडानी समूह की कई कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी है और जब तक रिडेम्पशन जारी रहेगा, बाजार यह पूछता रहेगा कि वह अगली बिक्री किसमें करेगा. शॉर्ट सेलर्स इस जवाब के लिए अपनी पोजीशन बनाते रहेंगे. विदेशी फंड अब भी बाहर निकल रहे हैं और बाहर जाने वाला हर रुपया करेंसी पर दबाव बढ़ा रहा है.

एक सकारात्मक पहलू जरूर रहा. BofA Securities ने करीब दो साल की सतर्कता के बाद भारतीय इक्विटी पर सकारात्मक रुख अपनाया है और निफ्टी के लिए 26,200 का लक्ष्य देखा है. गुरुवार शाम को, जब स्क्रीन अब भी लाल थीं, यह संख्या काफी दूर नजर आ रही थी.

पलक शाह

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)

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