जीएसटी विभाग ने CGST/SGST अधिनियम, 2017 की धारा 62 के तहत कंपनी का प्रोविजनल असेसमेंट किया है. इस आकलन के आधार पर विभिन्न अवधियों के लिए कुल 124 करोड़ 65 लाख 87 हजार 156 रुपये की कर मांग निर्धारित की गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
निजी विमानन कंपनी स्पाइसजेट की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं. जीएसटी रिटर्न समय पर दाखिल नहीं करने के आरोप में गुरुग्राम जीएसटी विभाग ने कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. यदि कंपनी जल्द ही लंबित रिटर्न दाखिल नहीं करती और वैधानिक दायित्वों का पालन नहीं करती, तो उसका जीएसटी पंजीकरण रद्द किया जा सकता है. विभाग ने कंपनी पर 124.65 करोड़ रुपये से अधिक की कर मांग भी निर्धारित की है.
GST विभाग ने शुरू की कार्रवाई
गुरुग्राम उत्तर राज्य क्षेत्राधिकार के अंतर्गत वस्तु एवं सेवा कर (GST) विभाग ने स्पाइसजेट के खिलाफ अनुपालन संबंधी कार्रवाई शुरू कर दी है. विभाग का आरोप है कि कंपनी लगातार जीएसटी रिटर्न दाखिल करने में अनियमितता बरत रही थी और कई मामलों में रिटर्न तय समयसीमा के बाद जमा किए गए.
इसी के आधार पर विभाग ने कंपनी को जीएसटी पंजीकरण रद्द करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया है. अधिकारियों का कहना है कि कर कानूनों के तहत निर्धारित दायित्वों का पालन नहीं करने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी.
124 करोड़ रुपये से ज्यादा की टैक्स मांग
जीएसटी विभाग ने CGST/SGST अधिनियम, 2017 की धारा 62 के तहत कंपनी का प्रोविजनल असेसमेंट किया है. इस आकलन के आधार पर विभिन्न अवधियों के लिए कुल 124 करोड़ 65 लाख 87 हजार 156 रुपये की कर मांग निर्धारित की गई है.
विभाग के अनुसार, नवंबर महीने के लिए 44.44 करोड़ रुपये और दिसंबर के लिए 43.79 करोड़ रुपये की मांग तय की गई है. वहीं जनवरी के लिए 12.19 करोड़ रुपये, फरवरी के लिए 12.10 करोड़ रुपये और मार्च के लिए 12.12 करोड़ रुपये की कर देनदारी निर्धारित की गई है. इन सभी राशियों को मिलाकर कुल बकाया 124.65 करोड़ रुपये से अधिक बैठता है.
25 मई को जारी हुआ था नोटिस
विभाग ने स्पाइसजेट को 25 मई 2026 को कारण बताओ नोटिस जारी किया था. नोटिस में कंपनी से पूछा गया था कि उसके खिलाफ जीएसटी पंजीकरण रद्द करने की कार्रवाई क्यों न की जाए. हालांकि विभाग का कहना है कि नोटिस जारी होने के बाद भी कंपनी की ओर से लंबित रिटर्न दाखिल नहीं किए गए हैं. इससे मामला और गंभीर हो गया है तथा नियामकीय कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है.
GST पंजीकरण रद्द होने पर क्या होगा असर?
जीएसटी पंजीकरण किसी भी कंपनी के लिए कारोबार संचालन का अहम हिस्सा होता है. इसके जरिए कंपनी टैक्स भुगतान, इनपुट टैक्स क्रेडिट और विभिन्न व्यावसायिक लेनदेन से जुड़े कानूनी दायित्वों को पूरा करती है.
यदि किसी कंपनी का जीएसटी पंजीकरण रद्द हो जाता है, तो उसके कारोबार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. विमानन क्षेत्र जैसी पूंजी-गहन इंडस्ट्री में ऐसी कार्रवाई कंपनी की वित्तीय स्थिति और कारोबारी गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है.
अब कंपनी के सामने क्या विकल्प?
विभागीय अधिकारियों के अनुसार, स्पाइसजेट के पास अभी भी लंबित रिटर्न दाखिल कर स्थिति को सुधारने का अवसर है. यदि कंपनी जल्द ही आवश्यक अनुपालन पूरा करती है और कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करती है, तो आगे की सख्त कार्रवाई से बचा जा सकता है. फिलहाल निवेशकों और बाजार की नजर इस बात पर है कि कंपनी नोटिस का क्या जवाब देती है और लंबित कर मामलों को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाती है.
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आयात रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच भारत ने अपने आयात स्रोतों में बड़ा बदलाव किया है. मई में देश का कच्चे तेल का आयात बढ़कर 49 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जबकि रूस से तेल और अमेरिका से एलएनजी-एलपीजी की खरीद रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज की गई. सरकार और रिफाइनरियां ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं के साथ-साथ नए स्रोतों पर भी दांव लगा रही हैं.
अमेरिका से एलएनजी और एलपीजी की खरीद में वृद्धि दर्ज
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आयात रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं. पिछले कुछ महीनों में देश ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने के साथ-साथ ब्राजील, वेनेजुएला और अंगोला जैसे वैकल्पिक स्रोतों से भी आयात बढ़ाया है. वहीं गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका से एलएनजी और एलपीजी की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है.
मई में 10% बढ़ा कच्चे तेल का आयात
समुद्री परिवहन डेटा उपलब्ध कराने वाली कंपनी केप्लर के अनुसार, मई में भारत का कच्चे तेल का आयात अप्रैल के मुकाबले 10 प्रतिशत बढ़कर 49 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया. इस दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा. कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 38.6 प्रतिशत रही. 28 मई तक रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़कर 19 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, जो इस वर्ष जनवरी के स्तर की तुलना में करीब 80 प्रतिशत अधिक है.
रूस से बढ़ी खरीद के पीछे क्या है वजह?
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों में कुछ राहत मिलने के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से तेल खरीद बढ़ा दी है. इसके तहत उन रूसी तेल खेपों की खरीद की अनुमति मिली है जो पहले प्रतिबंधों के कारण समुद्र में अटकी हुई थीं.
इससे पहले अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों तथा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर चल रही बातचीत के कारण रूस से तेल आयात में कमी आई थी. हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बाद भारतीय कंपनियों ने फिर से रूसी तेल पर निर्भरता बढ़ा दी है.
ब्राजील और वेनेजुएला जैसे नए स्रोतों पर भी जोर
ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित बनाए रखने के लिए भारत ने गैर-पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से भी खरीद बढ़ाई है. मई में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से 5.42 लाख बैरल प्रतिदिन, सऊदी अरब से 3.81 लाख बैरल प्रतिदिन, ब्राजील से 3.14 लाख बैरल प्रतिदिन और वेनेजुएला से 2.90 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया गया.
वहीं इराक से आयात अपेक्षाकृत सीमित रहा. गौरतलब है कि पश्चिम एशिया में संकट से पहले इराक भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता हुआ करता था.
अमेरिका बना भारत का सबसे बड़ा LPG सप्लायर
खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाली एलपीजी के आयात में भी मई के दौरान बढ़ोतरी दर्ज की गई. मासिक आधार पर एलपीजी आयात 11 प्रतिशत बढ़कर 10.8 लाख टन तक पहुंच गया.
इस वृद्धि में सबसे बड़ी भूमिका अमेरिका की रही, जिसने अकेले 5 लाख टन एलपीजी की आपूर्ति की. यह भारत के कुल एलपीजी आयात का आधे से अधिक हिस्सा है.
हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के कारण एलपीजी आयात अब भी युद्ध-पूर्व स्तर की तुलना में 50 प्रतिशत से अधिक नीचे बना हुआ है.
पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं की हिस्सेदारी घटी
मई में एलपीजी आपूर्ति के मामले में अमेरिका के बाद ईरान और यूएई क्रमशः 1.4 लाख टन और 1.1 लाख टन आपूर्ति के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे. दूसरी ओर, यूएई, कतर, सऊदी अरब और कुवैत जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से आयात अपेक्षाकृत सीमित रहा. इससे स्पष्ट है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए नए स्रोतों की ओर तेजी से रुख कर रहा है.
LNG आयात में भी अमेरिका नंबर-1
तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के क्षेत्र में भी अमेरिका भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है. मई में भारत के कुल एलएनजी आयात में अमेरिकी हिस्सेदारी 38 प्रतिशत से अधिक रही.
अमेरिका के बाद नाइजीरिया और ओमान प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहे. वहीं, पारंपरिक रूप से भारत के सबसे बड़े एलएनजी सप्लायर रहे कतर से मई में कोई आयात दर्ज नहीं किया गया.
ऊर्जा सुरक्षा पर भारत का बड़ा फोकस
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता ने भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति रणनीति में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है. रूस, अमेरिका, ब्राजील और वेनेजुएला जैसे देशों से बढ़ती खरीद इस बात का संकेत है कि भारत केवल पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी ऊर्जा आपूर्ति नेटवर्क तैयार कर रहा है.
ऊर्जा मांग में लगातार वृद्धि और वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों को देखते हुए आने वाले महीनों में भी भारत की यह रणनीति जारी रहने की संभावना है.
खातों में कथित हेराफेरी, भ्रामक वित्तीय खुलासे और समूह कंपनियों के बीच फंड घुमाकर मुनाफा दिखाने के आरोपों पर सेबी ने सुजलॉन एनर्जी और उसके पूर्व शीर्ष अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर की प्रमुख कंपनी सुजलॉन एनर्जी को बाजार नियामक सेबी (SEBI) से बड़ा झटका लगा है. सेबी ने कंपनी और उसके कई पूर्व अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए लगभग 29 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. यह मामला कंपनी के वित्तीय खातों में कथित अनियमितताओं, निवेशकों को भ्रामक तस्वीर पेश करने और समूह कंपनियों के बीच फंड ट्रांसफर के जरिए मुनाफा दिखाने से जुड़ा है.
किस पर कितना लगा जुर्माना?
सेबी के पूर्णकालिक सदस्य संदीप प्रधान द्वारा जारी निर्देश के अनुसार, सुजलॉन एनर्जी पर 15.95 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है. इसके अलावा कंपनी के पूर्व वाइस चेयरमैन विनोद आर तंती पर 5.75 करोड़ रुपये, गिरीश आर तंती पर 5.45 करोड़ रुपये, पूर्व सीफओ कीर्ति जे वगाडिया पर 1.5 करोड़ रुपये और अमित अग्रवाल पर 30 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है. नियामक ने सभी संबंधित पक्षों को 45 दिनों के भीतर जुर्माने की राशि जमा करने का निर्देश दिया है.
गुमनाम शिकायत से शुरू हुई जांच
इस मामले की शुरुआत दिसंबर 2019 में मिली एक गुमनाम शिकायत से हुई थी. शिकायत के बाद सेबी ने कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड की जांच के लिए फॉरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया.
जांच के दायरे में वित्त वर्ष 2014-15 से 2020-21 तक के वित्तीय दस्तावेजों और समूह कंपनियों के बीच हुए लेनदेन को शामिल किया गया. जांच के दौरान कई ऐसे ट्रांजैक्शन सामने आए, जिन पर नियामक ने गंभीर सवाल उठाए.
77 करोड़ की संपत्ति से दिखाया 1,923 करोड़ रुपये का मुनाफा
सेबी की जांच के अनुसार, वर्ष 2014 में सुजलॉन ने अपना ऑपरेशंस एंड मेंटेनेंस सर्विसेज (OMS) कारोबार अपनी ही सहायक कंपनी सुजलॉन ग्लोबल सर्विसेज (SGSL) को 2,000 करोड़ रुपये में बेच दिया. दिलचस्प बात यह रही कि इस कारोबार की वास्तविक नेट बुक वैल्यू केवल 77 करोड़ रुपये थी. इस ट्रांजैक्शन के आधार पर कंपनी ने अपने खातों में करीब 1,923 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया.
सेबी का आरोप है कि इस सौदे में दिखाए गए 1,300 करोड़ रुपये वास्तव में बाहरी स्रोतों से नहीं आए थे, बल्कि समूह कंपनियों के बीच ऋण और डिबेंचर के रूप में घुमाए गए थे.
फंड रोटेशन से दिखाया गया भुगतान
नियामक के मुताबिक, मार्च 2017 में 150 करोड़ रुपये की राशि को छह बार और 100 करोड़ रुपये को चार बार विभिन्न लेनदेन के जरिए घुमाया गया, ताकि भुगतान का आभास कराया जा सके. सेबी का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति और नकदी प्रवाह की तस्वीर निवेशकों के सामने स्पष्ट रूप से नहीं आ पाई.
एक ही संपत्ति से दो बार मुनाफा कमाने का आरोप
जांच में यह भी सामने आया कि बाद में SGSL के शेयरों को समूह की ही दूसरी इकाई सुजलॉन स्ट्रक्चर्स लिमिटेड को ट्रांसफर कर दिया गया. इस आंतरिक सौदे के जरिए कंपनी ने 829.78 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मुनाफा भी दर्ज किया. सेबी ने कहा कि एक ही परिसंपत्ति को समूह के भीतर विभिन्न स्तरों पर ट्रांसफर कर बार-बार लाभ दिखाना निवेशकों के लिए भ्रामक स्थिति पैदा कर सकता है.
सेबी ने क्यों पलटी अपनी पुरानी क्लीन चिट?
जून 2025 में नियुक्त अधिकारी ने यह कहते हुए कंपनी को राहत दी थी कि सभी लेनदेन स्वतंत्र वैल्यूएशन, बोर्ड की मंजूरी और शेयरधारकों की सहमति के बाद किए गए थे.
हालांकि नए आदेश में सेबी ने स्पष्ट किया कि केवल कानूनी प्रक्रिया का पालन कर लेना पर्याप्त नहीं है. यदि किसी लेनदेन का प्रभाव निवेशकों के सामने कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सेबी ने कहा कि बाजार में पारदर्शिता और निवेशकों का विश्वास बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है.
कंपनी ने आरोपों को किया खारिज
सुजलॉन एनर्जी ने इन आरोपों से असहमति जताई है. कंपनी का कहना है कि संबंधित पुनर्गठन उस समय की वित्तीय परिस्थितियों को देखते हुए किया गया था और इसका कंपनी के समेकित (Consolidated) खातों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा. हालांकि सेबी के ताजा आदेश के बाद यह मामला एक बार फिर निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गया है.
निवेशकों के लिए क्या है संदेश?
यह मामला कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय पारदर्शिता और निवेशकों को सही जानकारी उपलब्ध कराने के महत्व को रेखांकित करता है. सेबी की कार्रवाई यह संकेत देती है कि नियामक केवल कागजी अनुपालन नहीं, बल्कि लेनदेन के वास्तविक आर्थिक प्रभाव को भी गंभीरता से देख रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सूचीबद्ध कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि निवेशकों को भ्रामक वित्तीय तस्वीर दिखाने वाले किसी भी कदम पर सख्त कार्रवाई की जा सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अगले एक दशक में 135-180 अरब डॉलर के निवेश और मजबूत सरकारी समर्थन के दम पर देश न केवल अपनी चिप जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में भी अहम भूमिका निभा सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन, टेलीकॉम नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा उपकरणों से लेकर लगभग हर आधुनिक तकनीक की नींव सेमीकंडक्टर चिप्स पर टिकी है. ऐसे में भारत ने इस रणनीतिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने और वैश्विक नेतृत्व हासिल करने की दिशा में बड़ा लक्ष्य तय किया है. नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ‘भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य’ देश को वैश्विक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में मजबूत स्थान दिलाने की व्यापक रणनीति पेश करती है. रिपोर्ट में वर्ष 2035 तक 120-150 अरब डॉलर की घरेलू सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है.
2035 तक बनेगा मजबूत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम
रिपोर्ट के अनुसार, भारत को केवल चिप उपभोक्ता या असेंबली हब बनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसके बजाय देश को डिजाइन, निर्माण, पैकेजिंग और सप्लाई चेन के सभी महत्वपूर्ण चरणों में अपनी उपस्थिति मजबूत करनी होगी.
नीति आयोग का मानना है कि यदि भारत समय रहते आवश्यक निवेश और नीतिगत समर्थन सुनिश्चित करता है, तो वह वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर सकता है. इससे देश की तकनीकी क्षमता और आर्थिक प्रतिस्पर्धा दोनों को मजबूती मिलेगी.
200 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है घरेलू मांग
भारत में सेमीकंडक्टर की मांग तेजी से बढ़ रही है. रिपोर्ट का अनुमान है कि वर्ष 2035 तक देश में चिप्स की मांग 200 अरब डॉलर से अधिक हो सकती है. वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का लगभग 90-95 प्रतिशत सेमीकंडक्टर आयात करता है. इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है और वैश्विक सप्लाई चेन में किसी भी व्यवधान का सीधा असर भारतीय उद्योगों पर पड़ सकता है. इसलिए घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
180 अरब डॉलर तक निवेश की जरूरत
देश में विश्वस्तरीय सेमीकंडक्टर उद्योग विकसित करने के लिए भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होगी. रिपोर्ट के मुताबिक, अगले दस वर्षों में 135 से 180 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत पड़ सकती है. इस निवेश का उपयोग चिप डिजाइन, वेफर फैब्रिकेशन, एडवांस पैकेजिंग, अनुसंधान एवं विकास तथा आवश्यक बुनियादी ढांचे के निर्माण में किया जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि यह निवेश भारत को वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति दिला सकता है.
सरकार की भूमिका होगी निर्णायक
नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए सरकार को कुल निवेश का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा वहन करना चाहिए.
रिपोर्ट के अनुसार, यदि सरकार शुरुआती चरण में बुनियादी ढांचे और उत्पादन सुविधाओं के विकास में निवेश करती है, तो परियोजनाओं का जोखिम कम होगा और निजी कंपनियां दीर्घकालिक निवेश के लिए अधिक उत्साहित होंगी. इससे भारत में वैश्विक सेमीकंडक्टर कंपनियों को आकर्षित करने में भी मदद मिलेगी.
तकनीकी संप्रभुता के लिए जरूरी है चिप निर्माण
नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी के अनुसार, विकसित राष्ट्र बनने के लिए भारत को महत्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भर होना होगा. इसे तकनीकी संप्रभुता (Technology Sovereignty) का आधार माना जाता है.
आज AI, 5G नेटवर्क, रक्षा प्रणाली, ऑटोमोबाइल, स्वास्थ्य सेवाएं और डिजिटल अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा सेमीकंडक्टर पर निर्भर है. ऐसे में घरेलू चिप निर्माण क्षमता केवल आर्थिक अवसर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़ा विषय बन गया है.
वैश्विक बाजार में तेजी से बढ़ रही मांग
रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2024 के बीच वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार की औसत वार्षिक वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत रही है. आने वाले वर्षों में इसके 8.5 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है. AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्मार्ट डिवाइसेज की बढ़ती मांग से सेमीकंडक्टर उद्योग को नई गति मिल रही है. ऐसे में भारत के पास वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का बड़ा अवसर मौजूद है.
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मिशन?
यदि भारत 2035 तक अपने सेमीकंडक्टर लक्ष्यों को हासिल करने में सफल रहता है, तो इससे न केवल आयात पर निर्भरता घटेगी बल्कि लाखों रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे. साथ ही देश वैश्विक तकनीकी सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने और विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
RBI के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार में आई कमी का सबसे बड़ा कारण फॉरेन करेंसी एसेट्स (FCA) का घट जाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार दूसरे सप्ताह बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 22 मई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 7.51 अरब डॉलर घटकर 681.38 अरब डॉलर पर आ गया. इससे पहले भी रिजर्व में 8.09 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई थी. विदेशी मुद्रा संपत्तियों और गोल्ड रिजर्व के मूल्य में गिरावट इस कमी की प्रमुख वजह रही है.
फॉरेन करेंसी एसेट्स में सबसे बड़ी गिरावट
RBI के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार में आई कमी का सबसे बड़ा कारण फॉरेन करेंसी एसेट्स (FCA) का घट जाना है. यह विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होता है और इसमें डॉलर समेत विभिन्न विदेशी मुद्राओं में रखी गई परिसंपत्तियां शामिल होती हैं.
समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान FCA में 6.48 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई, जिसके बाद इसका आकार घटकर 545.90 अरब डॉलर रह गया. विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूती और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के वैल्यूएशन में बदलाव का असर भारतीय रिजर्व पर पड़ा है.
सोने के भंडार का मूल्य भी घटा
विदेशी मुद्रा भंडार के साथ-साथ देश के गोल्ड रिजर्व में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई. RBI के मुताबिक, सप्ताह के दौरान गोल्ड रिजर्व का मूल्य 4.53 अरब डॉलर घटकर 114.78 अरब डॉलर रह गया.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मूल्यांकन में बदलाव के कारण गोल्ड रिजर्व के कुल मूल्य पर असर पड़ा. हालांकि, भारत पिछले कुछ वर्षों से अपने स्वर्ण भंडार को लगातार मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है.
SDR और IMF रिजर्व पोजिशन में भी कमी
विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य घटकों में भी गिरावट देखने को मिली. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के साथ रखे गए स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) 77 मिलियन डॉलर घटकर 18.74 अरब डॉलर रह गए.
वहीं IMF के साथ भारत की रिजर्व पोजिशन भी 33 मिलियन डॉलर घटकर 4.81 अरब डॉलर पर पहुंच गई. हालांकि इन दोनों श्रेणियों में गिरावट अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन कुल रिजर्व पर इसका असर दिखाई दिया.
लगातार दूसरे सप्ताह क्यों घटा विदेशी मुद्रा भंडार?
विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के पीछे कई वैश्विक कारण हैं. डॉलर इंडेक्स में मजबूती, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता और विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में बदलाव ने भारतीय रिजर्व को प्रभावित किया है.
इसके अलावा, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच केंद्रीय बैंकों की नीतियों और मुद्रा बाजार की गतिविधियों का असर भी विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा है.
देश की अर्थव्यवस्था के लिए कितना महत्वपूर्ण है विदेशी मुद्रा भंडार?
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का मजबूत आधार माना जाता है. इसका उपयोग आयात बिल चुकाने, विदेशी कर्ज के भुगतान और घरेलू मुद्रा की स्थिरता बनाए रखने के लिए किया जाता है.
पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार होने से वैश्विक आर्थिक संकट, तेल कीमतों में उछाल या वित्तीय बाजारों में अचानक आने वाली उथल-पुथल के दौरान देश की अर्थव्यवस्था को सुरक्षा कवच मिलता है. यही वजह है कि विदेशी मुद्रा भंडार के स्तर पर निवेशकों, नीति निर्माताओं और बाजार की लगातार नजर बनी रहती है.
यह फेस्टिवल समग्र स्वास्थ्य और संतुलित जीवनशैली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है. कार्यक्रम में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न आयामों पर चर्चा होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुंबई के अंधेरी स्थित नोवोटेल होटल में 30 मई 2026 को ‘BW Festival of Wellbeing’ के पांचवें संस्करण का आयोजन किया जाएगा. इस साल का थीम “Wellbeing 5.0: The Evolution of Human Flourishing | Pause, Reconnect, Flourish” है. यह आयोजन विज्ञान, आध्यात्म, व्यवसाय और मानवता के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक खास पहल माना जा रहा है.
यह फेस्टिवल समग्र स्वास्थ्य और संतुलित जीवनशैली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है. कार्यक्रम में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न आयामों पर चर्चा होगी. इसमें विशेषज्ञ, चिकित्सक, आध्यात्मिक गुरु, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और वेलनेस क्षेत्र से जुड़े लोग एक मंच पर एकत्र होंगे.
आत्मिक चेतना और हीलिंग पर होंगी विशेष चर्चाएं
कार्यक्रम की शुरुआत ‘इनर इंटेलिजेंस’ यानी आंतरिक चेतना पर विशेष सत्र से होगी, जिसे इस्कॉन साउथ मुंबई के संयोजक, आध्यात्मिक सलाहकार और लेखक एचजी नित्यानंद चरण दास संबोधित करेंगे. इस सत्र में आत्म-जागरूकता, भावनात्मक मजबूती और मानसिक संतुलन पर चर्चा की जाएगी. इसके बाद ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड थेरेपिस्ट और Centre for Healing & Sacred Arts की संस्थापक जिया नाथ द्वारा हीलिंग सेशन आयोजित किया जाएगा. यह सत्र प्रतिभागियों को शरीर और मन के बीच संतुलन स्थापित करने, तनाव कम करने और आंतरिक शांति पाने के तरीकों से परिचित कराएगा.
साउंड हीलिंग और संगीत से मिलेगा मानसिक सुकून
पूरे दिन चलने वाले इस आयोजन में कई इंटरैक्टिव और अनुभवात्मक गतिविधियां भी शामिल होंगी. होर्मज्द और उनकी टीम द्वारा साउंड हीलिंग सेशन आयोजित किया जाएगा, जिसमें विशेष ध्वनियों, संगीत और कंपन के माध्यम से मानसिक शांति और रिलैक्सेशन का अनुभव कराया जाएगा. कार्यक्रम के समापन पर प्रसिद्ध सिंगर और कंपोजर शिबानी कश्यप तथा सिंगर, वॉइस कोच और हीलर शुभांगी द्वारा ‘म्यूजिकल हीलिंग’ प्रस्तुत की जाएगी. संगीत और मेडिटेशन के मेल से यह अनुभव प्रतिभागियों को मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करेगा.
प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का होगा मेल
फेस्टिवल में ज्योतिष, टैरो, न्यूमरोलॉजी और एनर्जी हीलिंग जैसी प्राचीन पद्धतियों को आधुनिक दौर में किस तरह नए रूप में अपनाया जा रहा है, इस पर भी चर्चा होगी. आयोजन में कई पैनल डिस्कशन, कीनोट एड्रेस और विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे.
इसके अलावा अभिनेत्री ऋषिता भट्ट और BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के बीच भी विशेष बातचीत होगी. यह चर्चा बाहरी सफलता और सार्वजनिक जीवन से आगे बढ़कर समग्र वेलबीइंग के महत्व पर केंद्रित रहेगी.
सात्विक भोजन भी होगा आकर्षण का केंद्र
आयोजकों के अनुसार कार्यक्रम में शामिल होने वाले प्रतिभागियों को सात्विक लंच और डिनर परोसा जाएगा, ताकि आयोजन की थीम के अनुरूप शारीरिक और मानसिक संतुलन का अनुभव और बेहतर हो सके.
Wellbeing 5.0 Awards में होगा सम्मान
कार्यक्रम के दौरान ‘Wellbeing 5.0 Awards’ भी प्रदान किए जाएंगे. इन पुरस्कारों के जरिए उन व्यक्तियों और संस्थानों को सम्मानित किया जाएगा, जिन्होंने वेलनेस, भावनात्मक मजबूती, जागरूक नेतृत्व और स्वस्थ कार्यसंस्कृति को बढ़ावा देने में अहम योगदान दिया है.
पुरस्कार श्रेणियां:
1. Emerging Leaders Under 40
2. Excellence Leaders 40 & Above
3. Institutional Excellence in Wellbeing
आयोजकों का कहना है कि यह आयोजन आधुनिक विज्ञान, प्राचीन ज्ञान और मानवीय संवेदनाओं को एक साथ जोड़कर लोगों को संतुलित और बेहतर जीवन की दिशा में प्रेरित करेगा.
वित्त मंत्री ने कहा कि IBC अब भारत के वित्तीय सुधार ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है. यह सरकार की मजबूत आर्थिक संस्थाएं बनाने की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) ने पिछले एक दशक में भारत की वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करने और संकटग्रस्त कंपनियों के तेजी से पुनरुद्धार में अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने कहा कि इस कानून ने भारत की दिवाला समाधान प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है.
IBC के 10 साल पूरे होने पर कही बात
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के लागू होने के 10 साल पूरे होने के मौके पर वित्त मंत्री ने कहा कि IBC ने पुराने बिखरे हुए और देनदार-आधारित सिस्टम की जगह समयबद्ध और लेनदार-आधारित समाधान प्रक्रिया को स्थापित किया. इससे कंपनियों के मामलों का तेजी से निपटारा संभव हुआ है.
‘देरी और अनिश्चितता’ से ‘समाधान और पुनरुद्धार’ की ओर बदलाव
सोशल मीडिया पर किए गए अपने पोस्ट में निर्मला सीतारमण ने कहा कि IBC ने कारोबारी संकट से निपटने के भारत के तरीके को “देरी और अनिश्चितता” से निकालकर “समाधान और पुनरुद्धार” की दिशा में बदल दिया है. इससे लेनदारों, निवेशकों और उद्योग जगत का भरोसा भी मजबूत हुआ है.
आर्थिक सुधारों का अहम स्तंभ बना IBC
वित्त मंत्री ने कहा कि IBC अब भारत के वित्तीय सुधार ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है. यह सरकार की मजबूत आर्थिक संस्थाएं बनाने की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है.
क्या है IBC
साल 2016 में लागू किया गया IBC भारत का प्रमुख दिवाला कानून है. यह कंपनियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों से जुड़े दिवाला मामलों के समाधान के लिए एकीकृत ढांचा प्रदान करता है. इसके तहत तय समयसीमा में मामलों के निपटारे का प्रावधान है.
समय-समय पर हुए कई संशोधन
IBC लागू होने के बाद से इसमें कई बदलाव किए गए हैं ताकि रिकवरी प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सके, मामलों के समाधान में तेजी लाई जा सके और लागू करने में आने वाली कमियों को दूर किया जा सके. हाल ही में सरकार ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2026 के जरिए नए संशोधन भी किए हैं.
बैंकों को मिला बड़ा सहारा
सरकार लगातार यह कहती रही है कि IBC ने अर्थव्यवस्था में क्रेडिट अनुशासन को मजबूत किया है और बैंकों को बढ़ते फंसे हुए कर्ज यानी स्ट्रेस्ड एसेट्स से निपटने में मदद मिली है. इससे बैंकिंग सेक्टर की स्थिति भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है.
पूरे वित्त वर्ष FY26 में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 33.98% बढ़कर ₹186.67 करोड़ रहा, जबकि FY25 में यह ₹139.32 करोड़ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आउट-ऑफ-होम (OOH) और ट्रांजिट मीडिया क्षेत्र की कंपनी Cash Ur Drive Marketing Limited ने वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी छमाही और पूरे साल के लिए मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी की ग्रोथ ट्रांजिट मीडिया कारोबार में तेजी और EV चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में विस्तार के चलते बढ़ी है.
दूसरी छमाही में शानदार बढ़त
कंपनी के मुताबिक FY26 की दूसरी छमाही में ऑपरेशंस से होने वाला रेवेन्यू सालाना आधार पर 43.72% बढ़कर ₹108.79 करोड़ पहुंच गया, जो पिछले साल इसी अवधि में ₹75.70 करोड़ था. इसी दौरान EBITDA 86.06% बढ़कर ₹20.02 करोड़ हो गया. वहीं कंपनी का शुद्ध लाभ (Net Profit) 94.5% की जोरदार छलांग लगाते हुए ₹18.52 करोड़ पर पहुंच गया.
पूरे वित्त वर्ष में भी मजबूत प्रदर्शन
पूरे वित्त वर्ष FY26 में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 33.98% बढ़कर ₹186.67 करोड़ रहा, जबकि FY25 में यह ₹139.32 करोड़ था. कंपनी का EBITDA 59.2% बढ़कर ₹33.56 करोड़ हो गया. वहीं नेट प्रॉफिट 64.98% बढ़कर ₹29.40 करोड़ दर्ज किया गया.
मुनाफे के मार्जिन में भी सुधार
कंपनी की लाभप्रदता में भी सुधार देखने को मिला. FY26 में EBITDA मार्जिन बढ़कर 17.98% हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 15.13% था. वहीं नेट प्रॉफिट मार्जिन 12.52% से बढ़कर 15.28% पहुंच गया.
कंपनी ने FY26 को बताया ‘ट्रांसफॉर्मेशनल ईयर’
कंपनी के प्रतिनिधि रघु खन्ना ने कहा कि FY26 कंपनी के लिए एक “ट्रांसफॉर्मेशनल ईयर” साबित हुआ है. उन्होंने कहा कि मजबूत वित्तीय वृद्धि, रणनीतिक विस्तार और लंबी अवधि की योजनाओं के सफल क्रियान्वयन ने इस प्रदर्शन में अहम भूमिका निभाई है.
उन्होंने कहा, “टोटल इनकम, EBITDA और प्रॉफिट में मजबूत बढ़त हमारे बिजनेस मॉडल की ताकत, ट्रांजिट और आउटडोर मीडिया की बढ़ती अहमियत और लाभदायक ग्रोथ पर हमारे फोकस को दर्शाती है.”
NSE Emerge पर लिस्टिंग से बढ़ी पहचान
रघु खन्ना ने बताया कि अगस्त 2025 में कंपनी की NSE Emerge प्लेटफॉर्म पर लिस्टिंग से बाजार में उसकी पहचान मजबूत हुई है और भविष्य के विस्तार के लिए मजबूत आधार तैयार हुआ है.
EV इकोसिस्टम में रणनीतिक निवेश
कंपनी ने शहरी मोबिलिटी और EV इकोसिस्टम में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए कई रणनीतिक निवेश किए हैं. FY26 के दौरान कंपनी ने Kolkata Call Taxi Private Limited में 19.06% हिस्सेदारी खरीदी. इसके अलावा Charj Karo Greentech Mobility Private Limited में 50% हिस्सेदारी भी हासिल की.
कंपनी को नगर निगम ऋषिकेश से 10 साल का कंसेशन एग्रीमेंट भी मिला है, जिसके तहत 10 EV चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए जाएंगे. इन चार्जिंग स्टेशनों के साथ विज्ञापन सुविधाएं भी जोड़ी जाएंगी.
2009 में हुई थी शुरुआत
साल 2009 में स्थापित Cash Ur Drive Marketing Limited देश के प्रमुख OOH और ट्रांजिट मीडिया सेक्टर में काम करती है. कंपनी बड़े भारतीय शहरों में टिकाऊ और टेक्नोलॉजी आधारित विज्ञापन समाधान उपलब्ध कराती है.
RBI के आंकड़े बताते हैं कि बैंकिंग सिस्टम में छोटे और डिजिटल फ्रॉड पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया है. लेकिन बड़े कर्ज से जुड़े घोटाले अब भी सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के बैंकिंग सेक्टर में धोखाधड़ी के मामलों की संख्या भले ही तेजी से घटी हो, लेकिन इन फ्रॉड से जुड़ी रकम लगातार बढ़ती जा रही है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में बैंकों में कुल ₹48,021 करोड़ की धोखाधड़ी दर्ज की गई, जो पिछले तीन वर्षों में सबसे अधिक है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब छोटे डिजिटल फ्रॉड की जगह बड़े कर्ज और एडवांस से जुड़े घोटाले बैंकिंग सिस्टम पर भारी पड़ रहे हैं.
तीन साल में बदली तस्वीर
RBI के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में धोखाधड़ी के 10,114 मामले सामने आए, जबकि एक साल पहले यह संख्या 23,722 थी. यानी मामलों की संख्या में करीब 57 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. वहीं वित्त वर्ष 2023-24 के मुकाबले यह गिरावट लगभग 72 फीसदी रही.
हालांकि दूसरी तरफ फ्रॉड से जुड़ी रकम तेजी से बढ़ी है. 2024-25 में जहां यह रकम ₹32,803 करोड़ थी, वहीं 2025-26 में बढ़कर ₹48,021 करोड़ पहुंच गई. तीन साल पहले यह आंकड़ा केवल ₹11,013 करोड़ था. यानी तीन वर्षों में धोखाधड़ी की रकम चार गुना से ज्यादा बढ़ गई.
सरकारी बैंकों पर सबसे बड़ा असर
रिपोर्ट के अनुसार सरकारी बैंकों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा. वित्त वर्ष 2025-26 में पब्लिक सेक्टर बैंकों में फ्रॉड से जुड़ी रकम ₹35,709 करोड़ रही, जो पिछले साल की तुलना में 51 फीसदी ज्यादा है. कुल धोखाधड़ी राशि में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी 74.5 फीसदी तक पहुंच गई. हालांकि इन बैंकों में मामलों की संख्या घटकर 5,418 रह गई, जो एक साल पहले 6,916 थी.
निजी बैंकों में भी बढ़ी फ्रॉड राशि
निजी बैंकों में भी फ्रॉड से जुड़ी रकम में बढ़ोतरी दर्ज की गई. यहां धोखाधड़ी की राशि बढ़कर ₹11,399 करोड़ हो गई, जबकि पिछले साल यह ₹8,927 करोड़ थी. कुल मामलों में निजी बैंकों की हिस्सेदारी 39.1 फीसदी रही.
बड़े लोन फ्रॉड बने सबसे बड़ी चुनौती
RBI रिपोर्ट के मुताबिक अब सबसे बड़ा खतरा कर्ज और एडवांस से जुड़े फ्रॉड बन चुके हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में ऐसे मामलों की रकम बढ़कर ₹40,774 करोड़ पहुंच गई, जो कुल फ्रॉड राशि का करीब 85 फीसदी है.
इन मामलों की संख्या भी बढ़कर 8,640 हो गई, जबकि पिछले साल यह 7,924 थी. इससे साफ है कि बैंकिंग सिस्टम में बड़े कॉरपोरेट लोन और एडवांस से जुड़े जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं.
डिजिटल पेमेंट फ्रॉड में बड़ी राहत
एक सकारात्मक संकेत यह रहा कि कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग और डिजिटल भुगतान से जुड़े फ्रॉड मामलों में भारी गिरावट आई है. ऐसे मामलों की संख्या घटकर केवल 293 रह गई, जबकि पिछले साल यह 13,332 थी. इन मामलों में शामिल रकम भी ₹517 करोड़ से घटकर सिर्फ ₹29 करोड़ रह गई.
वित्त वर्ष 2023-24 में डिजिटल फ्रॉड कुल मामलों का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा थे, लेकिन अब इनकी हिस्सेदारी घटकर केवल 2.9 फीसदी रह गई है.
अन्य कैटेगरी में भी बदलाव
जमा यानी डिपॉजिट से जुड़े फ्रॉड मामलों की रकम घटकर ₹377 करोड़ रह गई. वहीं “अन्य” कैटेगरी में धोखाधड़ी की राशि तेजी से बढ़कर ₹6,063 करोड़ पहुंच गई, जो पिछले साल केवल ₹971 करोड़ थी.
RBI रिपोर्ट से क्या संकेत मिलते हैं?
RBI के आंकड़े बताते हैं कि बैंकिंग सिस्टम में छोटे और डिजिटल फ्रॉड पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया है. लेकिन बड़े कर्ज से जुड़े घोटाले अब भी सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं. खासतौर पर सरकारी बैंकों पर इसका सबसे ज्यादा असर दिखाई दे रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में बैंकों को बड़े कॉरपोरेट लोन की निगरानी, जोखिम मूल्यांकन और रिकवरी सिस्टम को और मजबूत करना होगा, ताकि हजारों करोड़ रुपये के ऐसे फ्रॉड पर लगाम लगाई जा सके.
पॉलीमर नोट सबसे पहले साल 1988 में ऑस्ट्रेलिया में शुरू किए गए थे. इसके बाद कनाडा, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, रोमानिया और मॉरीशस समेत दुनिया के कई देशों ने इन्हें अपनाया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में करेंसी सिस्टम में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर सकता है. आने वाले समय में 100, 200 और 500 रुपये के नोट कागज की जगह प्लास्टिक जैसे मजबूत पॉलीमर मटेरियल में देखने को मिल सकते हैं. बढ़ती नोट छपाई लागत, जल्दी खराब होने वाले नोटों और नकली करेंसी की चुनौती को देखते हुए RBI पॉलीमर बैंक नोट शुरू करने की योजना पर गंभीरता से विचार कर रहा है. केंद्रीय बैंक जल्द ही पॉलीमर नोटों को लेकर पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकता है. इस मुद्दे पर RBI की हालिया बोर्ड बैठकों में भी चर्चा हुई है.
क्यों बढ़ रही है पॉलीमर नोटों की जरूरत?
देश में हर साल बड़ी संख्या में नोट फटने, गंदे होने और खराब होने के कारण चलन से बाहर हो जाते हैं. RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 23.8 अरब पुराने और क्षतिग्रस्त नोटों को नष्ट करना पड़ा. यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले 12% ज्यादा रहा. सबसे ज्यादा खराब होने वाले नोटों में 500 रुपये और 100 रुपये के नोट शामिल रहे. नोटों की लगातार बढ़ती मांग के कारण छपाई लागत भी तेजी से बढ़ रही है. वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने पर RBI का खर्च बढ़कर करीब ₹6,373 करोड़ पहुंच गया, जबकि एक साल पहले यह ₹5,101 करोड़ था.
क्या होते हैं पॉलीमर नोट?
पॉलीमर नोट एक खास तरह के प्लास्टिक आधारित मटेरियल से बनाए जाते हैं. ये सामान्य कागजी नोटों की तुलना में ज्यादा टिकाऊ और मजबूत माने जाते हैं. पानी, नमी, गंदगी और बार-बार इस्तेमाल का इन पर कम असर पड़ता है. विशेषज्ञों के मुताबिक पॉलीमर नोट सामान्य नोटों की तुलना में करीब ढाई गुना ज्यादा समय तक चल सकते हैं. लंबे समय तक उपयोग होने के कारण इनकी रिप्लेसमेंट लागत भी कम हो जाती है.
नकली नोटों पर भी लगेगी रोक
पॉलीमर नोटों में कई एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स जोड़े जा सकते हैं. इनमें ट्रांसपेरेंट विंडो, माइक्रो प्रिंटिंग और विशेष सुरक्षा लेयर शामिल होती हैं, जिन्हें कॉपी करना काफी मुश्किल माना जाता है. RBI का मानना है कि इससे जाली नोटों की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. हालांकि पहले भी सरकार ने स्पष्ट किया था कि पॉलीमर नोटों का मुख्य उद्देश्य नोटों की उम्र बढ़ाना है.
ATM और मशीनें भी होंगी तैयार
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पहले पॉलीमर नोटों को लेकर तकनीकी चुनौतियां थीं, लेकिन अब ATM और करेंसी मशीनों को ऐसे नोटों के अनुकूल बनाने के समाधान तैयार कर लिए गए हैं. RBI का कहना है कि अब देश के पास जरूरी संसाधन और तकनीक उपलब्ध है.
दुनिया के कई देशों में पहले से चलन में हैं पॉलीमर नोट
पॉलीमर नोट सबसे पहले साल 1988 में ऑस्ट्रेलिया में शुरू किए गए थे. इसके बाद कनाडा, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, रोमानिया और मॉरीशस समेत दुनिया के कई देशों ने इन्हें अपनाया. रिपोर्ट्स के अनुसार अब करीब 60 देशों में पॉलीमर नोट इस्तेमाल किए जा रहे हैं. इन नोटों की एक खास बात यह भी है कि खराब होने के बाद इन्हें रिसाइकिल कर दूसरी प्लास्टिक वस्तुएं बनाई जा सकती हैं.
पहले भी हो चुकी है कोशिश
भारत में पॉलीमर नोट लाने का विचार नया नहीं है. साल 2012 में तत्कालीन सरकार ने पांच शहरों में परीक्षण के तौर पर पॉलीमर से बने 10 रुपये के नोट जारी करने की योजना बनाई थी. हालांकि तकनीकी दिक्कतों के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी. अब बदलती तकनीक और बढ़ती करेंसी लागत को देखते हुए RBI एक बार फिर इस दिशा में कदम बढ़ाने की तैयारी कर रहा है.
कंपनी अब विज्ञापन आधारित कमाई पर निर्भरता कम करने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में बढ़ते निवेश के बीच नए रेवेन्यू मॉडल तैयार करने पर जोर दे रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सोशल मीडिया दिग्गज मेटा (Meta) ने अपने प्रमुख प्लेटफॉर्म फेसबुक (Facebook), इंस्टाग्राम (Instagram) और व्हाड्सऐप (WhatsApp) के लिए पेड सब्सक्रिप्शन प्लान लॉन्च करने का ऐलान किया है. कंपनी अब विज्ञापन आधारित कमाई पर निर्भरता कम करने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में बढ़ते निवेश के बीच नए रेवेन्यू मॉडल तैयार करने पर जोर दे रही है. मेटा ने फेसबुक प्लस, इंस्टाग्राफ प्लस और व्हाट्सऐप प्लस नाम से नए प्रीमियम प्लान पेश किए हैं. कंपनी की हेड ऑफ प्रोडक्ट नाओमी ग्लाइट ने इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए एक वीडियो में इन नए सब्सक्रिप्शन प्लान की जानकारी दी.
फेसबुक और इंस्टाग्राफ प्लस की इतनी होगी कीमत
रिपोर्ट्स के मुताबिक फेसबुक प्लस और इंस्टाग्राफ प्लस की कीमत 3.99 डॉलर प्रति माह रखी गई है. वहीं व्हाट्सऐप प्लस के लिए यूजर्स को हर महीने 2.99 डॉलर चुकाने होंगे. कंपनी ने साफ किया है कि इन प्लेटफॉर्म्स के फ्री वर्जन पहले की तरह उपलब्ध रहेंगे. यानी यूजर्स चाहें तो बिना सब्सक्रिप्शन के भी सेवाओं का इस्तेमाल कर सकेंगे.
प्रीमियम यूजर्स को मिलेंगे खास फीचर्स
मेटा के नए पेड प्लान्स में यूजर्स को कई अतिरिक्त फीचर्स और एडवांस टूल्स मिलेंगे. फेसबुक प्लस, इंस्टाग्राफ प्लस यूजर्स को एडवांस ऑडियंस एनालिटिक्स, एंगेजमेंट इनसाइट्स, प्रोफाइल कस्टमाइजेशन और कंटेंट विजिबिलिटी बढ़ाने वाले फीचर्स दिए जा सकते हैं. वहीं, व्हाट्सऐप प्लस में एक्सक्लूसिव स्टिकर्स, कस्टम थीम्स और पर्सनलाइज्ड नोटिफिकेशन टोन जैसे फीचर्स मिलने की उम्मीद है.
AI निवेश बढ़ने से बदली रणनीति
मेटा इस समय AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश कर रही है. कंपनी ने इस साल 125 अरब डॉलर से 145 अरब डॉलर तक के कैपिटल एक्सपेंडिचर का अनुमान जताया है. यह निवेश मुख्य रूप से AI डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और संबंधित टेक्नोलॉजी पर किया जाएगा. निवेशक लंबे समय से इस बात पर नजर बनाए हुए थे कि मेटा इतनी बड़ी लागत के बीच अपनी कमाई को कैसे मजबूत बनाए रखेगी. रिपोर्ट्स के अनुसार सब्सक्रिप्शन प्लान लॉन्च की खबर के बाद Meta के शेयरों में करीब 3% की तेजी देखने को मिली.
पहले भी कर चुकी है प्रयोग
मेटा इससे पहले भी पेड सर्विसेज पर प्रयोग कर चुकी है. साल 2023 में कंपनी ने यूरोप के कुछ हिस्सों में फेसबुक और इंस्टाग्राम के ऐड-फ्री सब्सक्रिप्शन वर्जन लॉन्च किए थे. हालांकि नया कदम पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा माना जा रहा है, क्योंकि इस बार कंपनी वैश्विक स्तर पर उपभोक्ताओं को टारगेट कर रही है.
‘Meta One’ के तहत आएंगी सभी पेड सर्विसेज
नाओमी ग्लाइट ने कहा कि मेटा भविष्य में अपनी सभी पेड सर्विसेज को ‘मेटा वन’ नाम के बड़े इकोसिस्टम के तहत लाने की योजना बना रही है. इसमें कंपनी के अलग-अलग सब्सक्रिप्शन प्रोडक्ट्स को एक प्लेटफॉर्म पर जोड़ा जा सकता है.
यूजर्स की मिली-जुली प्रतिक्रिया
मेटा के इस फैसले पर यूजर्स की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं. कुछ लोग इसे अतिरिक्त सुविधाओं वाला बेहतर विकल्प मान रहे हैं, जबकि कुछ यूजर्स का कहना है कि कंपनी धीरे-धीरे ज्यादा फीचर्स को पेवॉल के पीछे ले जा रही है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यूजर्स इन प्रीमियम फीचर्स के लिए हर महीने भुगतान करने को कितना तैयार होते हैं.