गुरुवार को सोने-चांदी की कीमतों में जहां एक तरफ फिर से बढ़ोतरी देखने को मिल गई, वहीं दूसरी तरफ शेयर बाजार में गिरावट के बावजूद कंपनियों के मार्केट कैप में बढ़ोतरी देखने को मिली.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
नई दिल्लीः गुरुवार को सोने-चांदी की कीमतों में जहां एक तरफ फिर से बढ़ोतरी देखने को मिल गई, वहीं दूसरी तरफ शेयर बाजार में गिरावट के बावजूद कंपनियों के मार्केट कैप में बढ़ोतरी देखने को मिली. फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी के बाद ग्लोबल मार्केट्स का असर देखने को मिला और इस वजह से सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट देखने को मिली.
शेयर बाजार में ये रहा हाल
अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा 75 बेसिस प्वाइंट ब्याज दरें बढ़ाने के बाद बाजार सुबह गिरावट के साथ खुला था. मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स 337 अंकों की गिरावट के साथ 59,119 तो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 88 अंकों की गिरावट के साथ 17,629 अंकों पर क्लोज हुआ है. बाजार ने रिकवरी भी दिखाई लेकिन मुनाफावसूली हावी रही. शेयर बाजार में गिरावट के बावजूद बुधवार के मुकाबले मार्केट कैपिटलाइजेशन बढ़ा है और ये बढ़कर 281.70 लाख करोड़ रुपये रहा है.
सेक्टोरल इंडेक्स का यह रहा हाल
ऑटो, एफएमसीजी, फार्मा, मेटल्स कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर के शेयरों में अच्छी तेजी रही. बैंकिंग सेक्टर, आईटी, ऑयल एंड गैस सेक्टर के शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. सेंसेक्स के 30 शेयरों में केवल 12 शेयर हरे निशान में क्लोज हुआ है तो बाकी 18 शेयर लाल निशान में बंद हुए. निफ्टी के 50 शेयरों में केवल 23 शेयर हरे निशान में बंद हुए बाकी 27 शेयरों में गिरावट रही.
आज के टॉप शेयर्स
टाइटन, एचयूएल, एशियन पेंट्स, मारुति सुजुकी, आईटीसी, डॉ रेड्डी, भारती एयरटेल और सन फार्मा
आज के लूजर शेयर्स
पावर ग्रिड, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी, बजाज फिनसर्व, आईसीआईसीआई बैंक और अल्ट्राटेक सीमेंट
सोना एक बार फिर से 50 हजार के पार
सर्राफा बाजार में आज सोने-चांदी की कीमतों में आज उछाल देखने को मिला. दिल्ली सर्राफा बाजार में आज सोने की कीमतों में 442 रुपये की तेजी आई और ये 50,399 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया. वहीं चांदी भी 558 रुपये बढ़कर 58580 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई.
ऐप पर करें सोने की शुद्धता की जांच
आप घर बैठे बीआईएस केयर ऐप (BIS Care App) के जरिए सोने की शुद्धता की जांच कर सकते हैं. अगर सोने का लाइसेंस नंबर, हॉलमार्क या रजिस्ट्रेशन नंबर गलत है तो आप इसकी शिकायत सीधे सरकार को कर सकते हैं. शिकायत दर्ज होने के बाद इस मामले में क्या कार्रवाई हुई इसकी जानकारी भी आपको मिलती रहेगी.
VIDEO: आखिर happyness को लेकर क्या कहते है मदर डेयरी के सीएचआर प्रद्युमन पांडेय
मूडीज की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत की जीडीपी ग्रोथ 2025 के अनुमानित 7.5% से घटकर 2026 में 7% और 2027 में 6.5% रह सकती है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक रेटिंग एजेंसी Moody’s Investors Service ने अनुमान लगाया है कि आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि दर में धीरे-धीरे कमी आ सकती है. हालांकि इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा.
2028 तक GDP ग्रोथ में गिरावट का अनुमान
मूडीज की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत की जीडीपी ग्रोथ 2025 के अनुमानित 7.5% से घटकर 2026 में 7% और 2027 में 6.5% रह सकती है. आगे चलकर यह 2028 तक घटकर 6.3% तक पहुंचने का अनुमान है. यह संकेत देता है कि उच्च वृद्धि के दौर के बाद अब अर्थव्यवस्था सामान्य स्तर की ओर बढ़ रही है.
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी सुस्ती के संकेत
रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी विकास दर धीमी हो सकती है. इस क्षेत्र की ग्रोथ 2025 में 4.3% से घटकर 2026 में 3.8% और 2027 में 3.6% रहने का अनुमान है.
कमजोर मांग और एक्सपोर्ट ग्रोथ की चुनौती
मूडीज ने कहा कि घरेलू मांग में नरमी और निर्यात वृद्धि में संभावित गिरावट इस सुस्ती के प्रमुख कारण हैं. हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद भारत क्षेत्र में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा.
महंगाई में बढ़ोतरी का अनुमान
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में महंगाई दर में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. 2025 में महंगाई 2.2% और 2026 में 4.5% बढ़ने का अनुमान है. इसका कारण वैश्विक स्तर पर कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव बताए गए हैं.
मध्य पूर्व तनाव और वैश्विक जोखिम
मूडीज ने खास तौर पर मध्य पूर्व में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों को प्रमुख जोखिम बताया है. इन कारणों से तेल और अन्य कमोडिटी कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. यह स्थिति कोविड महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान देखी गई सप्लाई बाधाओं जैसी बताई गई है.
रोजगार पर भी हल्का दबाव
रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी दर में भी मामूली बढ़ोतरी हो सकती है. 2025 में बेरोजगारी 6.9% और 2026 में 7% तक जाने का अनुमान है. यह संकेत देता है कि आर्थिक सुस्ती का असर रोजगार सृजन पर भी पड़ सकता है.
कुल मिलाकर, Moody’s Investors Service की रिपोर्ट के अनुसार भारत की विकास दर में धीरे-धीरे कमी आने की संभावना है, लेकिन इसके बावजूद देश वैश्विक स्तर पर सबसे मजबूत प्रदर्शन करने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहेगा. आने वाले वर्षों में वैश्विक अनिश्चितताएं और घरेलू चुनौतियां आर्थिक गति को प्रभावित कर सकती हैं.
कपड़ा निर्यात में सबसे बड़ा योगदान रेडीमेड गारमेंट्स (RMG) का रहा. इस सेगमेंट का निर्यात ₹1,35,427.6 करोड़ से बढ़कर ₹1,39,349.6 करोड़ हो गया, यानी 2.9% की वृद्धि दर्ज की गई.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के कपड़ा निर्यात ने वित्त वर्ष 2025–26 में स्थिर वृद्धि दर्ज की है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश का कुल टेक्सटाइल निर्यात (हस्तशिल्प सहित) 2.1% बढ़कर ₹3,16,334.9 करोड़ तक पहुंच गया है, जो पिछले वित्त वर्ष में ₹3,09,859.3 करोड़ था. यह बढ़ोतरी वैश्विक मांग में सुधार और प्रमुख बाजारों में मजबूत प्रदर्शन को दर्शाती है.
रेडीमेड गारमेंट्स बने सबसे बड़े निर्यातक सेगमेंट
कपड़ा निर्यात में सबसे बड़ा योगदान रेडीमेड गारमेंट्स (RMG) का रहा. इस सेगमेंट का निर्यात ₹1,35,427.6 करोड़ से बढ़कर ₹1,39,349.6 करोड़ हो गया, यानी 2.9% की वृद्धि दर्ज की गई. यह लगातार भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की सबसे मजबूत कैटेगरी बनी हुई है.
सूती और मैनमेड फाइबर में स्थिर और मजबूत प्रदर्शन
सूती धागा, कपड़े, मेड-अप्स और हैंडलूम उत्पादों का निर्यात लगभग स्थिर रहा और यह ₹1,02,399.7 करोड़ तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष यह ₹1,02,002.8 करोड़ था. वहीं, मैन-मेड यार्न, फैब्रिक्स और मेड-अप्स सेगमेंट में 3.6% की मजबूत वृद्धि देखी गई, जहां निर्यात ₹41,196 करोड़ से बढ़कर ₹42,687.8 करोड़ हो गया.
हैंडिक्राफ्ट्स में सबसे तेज वृद्धि
वैल्यू-एडेड सेगमेंट में हस्तशिल्प (हैंडिक्राफ्ट्स) ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया. हैंडमेड कारपेट्स को छोड़कर इस कैटेगरी का निर्यात 6.1% बढ़कर ₹14,945.5 करोड़ से ₹15,855.1 करोड़ हो गया. यह दर्शाता है कि पारंपरिक भारतीय उत्पादों की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है.
120 से ज्यादा देशों में बढ़ा निर्यात
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारत के टेक्सटाइल निर्यात में 120 से अधिक देशों में वृद्धि दर्ज की गई. यह भारत के निर्यात बाजार के तेजी से भौगोलिक विस्तार को दर्शाता है.
प्रमुख बाजारों में मजबूत बढ़त
भारत के कई प्रमुख बाजारों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई. संयुक्त अरब अमीरात में 22.3%, यूनाइटेड किंगडम में 7.8%, जर्मनी में 9.9%, स्पेन में 15.5%, जापान में 20.6%, मिस्र में 38.3%, नाइजीरिया में 21.4%, सेनेगल में 54.4% और सूडान में 205.6% की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से बढ़ेंगे अवसर
सरकार का कहना है कि आगामी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से टेक्सटाइल सेक्टर को बड़ा लाभ मिलेगा. इससे टैरिफ में कमी, बेहतर सप्लाई चेन इंटीग्रेशन और नए बाजारों तक पहुंच आसान होगी. यह टेक्सटाइल, अपैरल, हैंडिक्राफ्ट्स और टेक्निकल टेक्सटाइल्स के लिए नए अवसर पैदा करेगा.
सरकारी योजनाओं से मिला समर्थन
सरकार ने इस सेक्टर को समर्थन देने के लिए कई योजनाओं को जारी रखा है, जिनमें RoSCTL और RoDTEP स्कीम शामिल हैं. इन्हें 31 मार्च 2026 के बाद भी जारी रखने की घोषणा की गई है, जिससे निर्यातकों को लागत में राहत और प्रतिस्पर्धा में मजबूती मिलेगी.
## निष्कर्ष
कुल मिलाकर, भारत का टेक्सटाइल सेक्टर स्थिर लेकिन मजबूत वृद्धि की ओर बढ़ रहा है. वैश्विक बाजारों में विस्तार, नीतिगत समर्थन और वैल्यू-एडेड उत्पादों की बढ़ती मांग के चलते आने वाले समय में इस सेक्टर के और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है.
एजेंसी दावा करती है कि उसकी कन्विक्शन रेट 93.6 प्रतिशत है, वह ₹1.54 लाख करोड़ की जब्त संपत्तियों को संभालती है, और आज तक कभी किसी स्वतंत्र परफॉर्मेंस ऑडिट के दायरे में नहीं आई है. यहां पढ़िए कि जब आप इसके आंकड़ों को बारीकी से देखते हैं तो क्या सामने आता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
भारत की सबसे शक्तिशाली जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की वित्तीय स्थिति और कार्यप्रणाली देश के सबसे बड़े रहस्यों में से एक बनी हुई है.
ED की 2024–25 की वार्षिक रिपोर्ट 93.6 प्रतिशत की कन्विक्शन रेट के साथ शुरू होती है. यह ऐसा आंकड़ा है जो संसद के जवाबों, FATF ब्रीफिंग्स और टीवी डिबेट्स तक पहुंचता है. यह एक सटीक और प्रभावी जांच तंत्र का संकेत देता है.
लेकिन जब आप इसके गणित को देखते हैं, तो तस्वीर बदल जाती है.
ED ने अपने गठन के बाद से PMLA के तहत 1,739 प्रॉसिक्यूशन शिकायतें दाखिल की हैं. इनमें से केवल 47 मामलों में ही अंतिम अदालत का फैसला आया है.
“47”
यानी सिर्फ 47 मामले.
93.6 प्रतिशत का दावा इन्हीं बेहद छोटे हिस्से पर आधारित है, जो कुल मामलों का केवल 2.7 प्रतिशत है. बाकी 97 प्रतिशत मामले अभी भी अदालतों में लंबित हैं और मुख्य आंकड़े में शामिल नहीं किए जाते.
यह असल में कन्विक्शन रेट नहीं है, बल्कि एक ऐसा चयनित आधार है जिससे एक विशेष परिणाम निकल सके. और आज तक कोई स्वतंत्र ऑडिट नहीं है जो आधिकारिक तौर पर इसे चुनौती दे सके.
यहीं सवाल उठता है: क्या ED अपनी कन्विक्शन रेट को “कुक” करती है?
₹1.54 लाख करोड़, जिसका कोई स्वतंत्र हिसाब नहीं
रिपोर्ट का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण दावा सिर्फ कन्विक्शन रेट नहीं है, बल्कि संपत्ति जब्ती का आंकड़ा है.
₹1,54,594 करोड़ की अस्थायी रूप से जब्त संपत्तियां जमीन, इमारतें, कंपनियां, बैंक खाते, जिन्हें अक्सर वर्षों तक फ्रीज रखा जाता है.
FY25 में ही ED ने ₹30,036 करोड़ की संपत्ति जब्त की, जो पिछले वर्ष की तुलना में 141 प्रतिशत की वृद्धि बताई गई है.
लेकिन इन संपत्तियों का मूल्यांकन कैसे किया गया? इसका कोई स्वतंत्र सत्यापन नहीं है. न ही CAG ने यह जांचा है कि ये मूल्यांकन सटीक, कम या अधिक दिखाए गए हैं.
यह आंकड़ा खुद एजेंसी द्वारा रिपोर्ट किया गया है और बिना किसी बाहरी जांच के आगे बढ़ता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि FY25 में ₹5,238 करोड़ का FEMA जुर्माना लगाया गया, लेकिन इसमें से कितना वसूला गया, यह जानकारी नहीं दी गई है.
वह ऑडिटर जो मौजूद ही नहीं है
ED का पूरा बजट भारत की संचित निधि से आता है. संविधान के अनुच्छेद 148–151 और CAG अधिनियम 1971 की धारा 13 के तहत यह पूरी तरह से नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के अधिकार क्षेत्र में आता है.
लेकिन वास्तविकता में CAG केवल प्रशासनिक खर्चों जैसे वेतन, भवन और खरीद का ऑडिट करता है.
ED के संचालन और प्रदर्शन पर आज तक कोई समर्पित परफॉर्मेंस ऑडिट नहीं किया गया है, और न ही ऐसा कोई रिपोर्ट संसद में पेश हुआ है.
आयकर विभाग और कस्टम्स जैसे संस्थानों का ऑडिट हो चुका है, लेकिन ED का नहीं.
2024–25 की 212 पन्नों की रिपोर्ट में CAG का एक भी उल्लेख नहीं है.
वह डिस्क्लेमर जिसे नजरअंदाज कर दिया गया
रिपोर्ट के अंत में एक अहम लाइन दर्ज है.
प्रवर्तन निदेशालय कहता है कि वह दस्तावेज में मौजूद किसी भी तथ्य, त्रुटि, व्याख्या या राय की जिम्मेदारी या जवाबदेही स्वीकार नहीं करता.
यानि: ये हमारे आंकड़े हैं, हम इन्हें सही मानते हैं, लेकिन अगर ये गलत हों तो इसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं है.
एक मजबूत जवाबदेही प्रणाली में यह काम बाहरी ऑडिट करता है, लेकिन यहां यह खाली जगह बनी रहती है.
असल निगरानी क्या है?
ED पर निगरानी पूरी तरह अनुपस्थित नहीं है. अदालतें मामलों की जांच करती हैं, FATF ने 2024 में भारत की सराहना की है, और आंतरिक निगरानी तंत्र भी मौजूद है.
लेकिन ये सभी निगरानी व्यक्तिगत मामलों तक सीमित हैं, पूरी प्रणाली के प्रदर्शन को नहीं आंकते.
स्पष्ट स्थिति
ED भारत की सबसे शक्तिशाली जांच एजेंसियों में से एक है. यह बिना अदालत के फैसले से पहले संपत्तियां जब्त कर सकती है और भारी वित्तीय नियंत्रण रखती है.
लेकिन यह अपनी सफलता खुद तय करती है, अपने आंकड़े खुद सत्यापित करती है, और अपनी रिपोर्ट खुद प्रकाशित करती है, बिना किसी स्वतंत्र ऑडिट के जो इसे चुनौती दे सके.
यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या एक पूरी संस्था इतने लंबे समय तक बिना स्वतंत्र जांच के अपनी ही परिभाषित सफलता के आधार पर काम कर सकती है?
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
विशाखापट्टनम, जवाहरलाल नेहरू पोर्ट, कोच्चि, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख बंदरगाहों ने कुल निर्यात मूल्य का लगभग 64% हिस्सा संभाला है. इससे इन बंदरगाहों की लॉजिस्टिक और ट्रेडिंग में अहम भूमिका साफ होती है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के समुद्री उत्पादों के निर्यात ने वित्त वर्ष 2025–26 में अब तक का सबसे बड़ा स्तर हासिल किया है. मजबूत वैश्विक मांग, खासकर झींगा (श्रिम्प) की बढ़ती खपत और चीन, यूरोपीय संघ व दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बाजारों में बेहतर प्रदर्शन के चलते कुल निर्यात ₹72,325.82 करोड़ तक पहुंच गया है. यह जानकारी मरीन प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी द्वारा जारी शुरुआती आंकड़ों में सामने आई है.
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा निर्यात
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत ने इस वित्त वर्ष में 19.32 लाख टन समुद्री उत्पादों का निर्यात किया है. यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है, जो वैश्विक बाजारों में भारतीय समुद्री उत्पादों की बढ़ती मांग को दर्शाता है.
झींगा बना सबसे बड़ा कमाई का स्रोत
फ्रोजन झींगा भारत के समुद्री निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा बना हुआ है. इसने अकेले ₹47,973.13 करोड़ का योगदान दिया, जो कुल कमाई का दो-तिहाई से भी अधिक है. झींगा के निर्यात में मात्रा 4.6% और मूल्य में 6.35% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह सेक्टर की रीढ़ बना हुआ है.
अमेरिका में गिरावट, लेकिन अन्य बाजारों ने संभाली कमान
संयुक्त राज्य अमेरिका अभी भी भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार बना हुआ है, लेकिन यहां शिपमेंट में गिरावट देखी गई है. अमेरिका को होने वाले निर्यात में मात्रा 19.8% और मूल्य 14.5% घटा है, जिसका मुख्य कारण पारस्परिक टैरिफ प्रभाव बताया गया है. हालांकि इस गिरावट की भरपाई अन्य प्रमुख बाजारों ने की है.
चीन, यूरोप और एशिया से मजबूत मांग
चीन को होने वाले निर्यात में 22.7% की मूल्य वृद्धि और 20.1% की मात्रा वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं यूरोपीय संघ में यह वृद्धि और भी तेज रही, जहां निर्यात मूल्य 37.9% और मात्रा 35.2% बढ़ी. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी 36% से अधिक की बढ़त देखी गई है, जिससे भारतीय समुद्री उत्पादों की वैश्विक मांग मजबूत बनी हुई है.
जापान और पश्चिम एशिया का प्रदर्शन
जापान को निर्यात में 6.55% की वृद्धि हुई है, जबकि पश्चिम एशिया में वित्त वर्ष के अंत में क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण हल्की गिरावट दर्ज की गई.
फ्रोजन फिश, स्क्विड, कटलफिश, सूखे उत्पाद और लाइव सीफूड सेगमेंट में भी बढ़ोतरी देखी गई है. वहीं कुछ चिल्ड प्रोडक्ट्स में गिरावट आई है. इसके अलावा फिशमील और फिश ऑयल जैसे सेगमेंट ने भी बेहतर प्रदर्शन किया है.
प्रमुख बंदरगाहों की अहम भूमिका
विशाखापट्टनम, जवाहरलाल नेहरू पोर्ट, कोच्चि, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख बंदरगाहों ने कुल निर्यात मूल्य का लगभग 64% हिस्सा संभाला है. इससे इन बंदरगाहों की लॉजिस्टिक और ट्रेडिंग में अहम भूमिका साफ होती है.
कुल मिलाकर, भारत का समुद्री निर्यात अब पारंपरिक बाजारों पर निर्भर न रहकर विविध वैश्विक बाजारों की ओर तेजी से बढ़ रहा है. यह बदलाव कमजोर बाजारों के प्रभाव को संतुलित करते हुए सेक्टर की स्थिर और मजबूत वृद्धि को सुनिश्चित कर रहा है.
सरकार के अनुसार, यह समझौता इस बात को दर्शाता है कि दोनों देश MSME सेक्टर को समावेशी विकास, नवाचार और रोजगार सृजन का प्रमुख इंजन मानते हैं. इससे विभिन्न बाजारों में स्टेकहोल्डर्स के बीच सहयोग भी बढ़ेगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और दक्षिण कोरिया ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) सेक्टर में सहयोग बढ़ाने के लिए बड़ा कदम उठाया है. Ministry of Micro, Small and Medium Enterprises और दक्षिण कोरिया के Ministry of SMEs and Startups के बीच एक समझौता (MoU) साइन हुआ है, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के छोटे व्यवसायों को जोड़ना और व्यापार के नए अवसर पैदा करना है.
राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान हुआ समझौता
यह समझौता दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति Lee Jae Myung की भारत यात्रा के दौरान साइन किया गया. इसका मकसद MSME से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच एक मजबूत और व्यवस्थित संवाद तंत्र तैयार करना है, जिससे सहयोग लंबे समय तक जारी रह सके.
व्यापार और निवेश को मिलेगा बढ़ावा
इस MoU के तहत दोनों देश व्यापार और निवेश बढ़ाने के लिए कई कदम उठाएंगे. इसमें जानकारी और विशेषज्ञों का आदान-प्रदान, बेस्ट प्रैक्टिस साझा करना, बिजनेस मैचमेकिंग और तकनीकी व आर्थिक सहयोग शामिल है. इससे दोनों देशों के MSME सेक्टर को नए बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी.
MSME इकोसिस्टम को जोड़ने पर फोकस
यह समझौता दोनों देशों के MSME इकोसिस्टम को बेहतर तरीके से समझने और आपसी साझेदारी को मजबूत करने पर केंद्रित है. संयुक्त पहलों के जरिए कंपनियों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाई जाएगी, जिससे छोटे व्यवसायों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का मौका मिलेगा.
समावेशी विकास और रोजगार पर जोर
सरकार के अनुसार, यह समझौता इस बात को दर्शाता है कि दोनों देश MSME सेक्टर को समावेशी विकास, नवाचार और रोजगार सृजन का प्रमुख इंजन मानते हैं. इससे विभिन्न बाजारों में स्टेकहोल्डर्स के बीच सहयोग भी बढ़ेगा.
भारत के MSME सेक्टर की ताकत
भारत का MSME सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है.
1. उद्यम पोर्टल पर 7.16 करोड़ से ज्यादा रजिस्टर्ड यूनिट्स
2. 31 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार
3. GDP में करीब 30% योगदान
4. मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में 35.4% हिस्सेदारी
5. निर्यात में लगभग 45% योगदान
यह आंकड़े दिखाते हैं कि यह सेक्टर आर्थिक विकास में कितनी अहम भूमिका निभाता है.
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि, MSME सेक्टर कई चुनौतियों का सामना भी कर रहा है. करीब ₹8.1 लाख करोड़ की राशि देरी से होने वाले भुगतान में फंसी हुई है, जिससे छोटे व्यवसायों की नकदी स्थिति पर दबाव पड़ता है. इसके अलावा सस्ती और औपचारिक क्रेडिट तक पहुंच भी बड़ी समस्या है, जहां लगभग ₹30 लाख करोड़ का क्रेडिट गैप बना हुआ है. इन चुनौतियों के कारण कई कंपनियां तकनीक अपनाने और बड़े सप्लाई चेन से जुड़ने में पीछे रह जाती हैं.
₹1800 करोड़ के प्रस्तावित सेटलमेंट के साथ NSE और SEBI के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब अंतिम चरण में पहुंचता दिख रहा है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
करीब एक दशक से अटके नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के आईपीओ को लेकर बड़ी प्रगति सामने आई है. मार्केट रेगुलेटर भारतीय प्रतिभूति अधिनियम (Securities and Exchange Board of India-SEBI) की एक हाई-पावर्ड कमेटी ने को-लोकेशन विवाद के निपटारे के लिए ₹1800 करोड़ के सेटलमेंट का प्रस्ताव दिया है, जिससे देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज की लिस्टिंग का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है.
₹1800 करोड़ सेटलमेंट का प्रस्ताव क्या है
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सेबी की हाई-पावर्ड एडवाइजरी कमेटी (HPAC) ने NSE से ₹1800 करोड़ से अधिक राशि के सेटलमेंट की सिफारिश की है. इस प्रस्ताव के तहत करीब ₹1200 करोड़ को डिस्गॉर्जमेंट यानी कथित अनुचित लाभ की वसूली के रूप में रखा गया है, जबकि लगभग ₹400 करोड़ ब्याज के तौर पर शामिल हैं. शेष राशि अन्य शर्तों के आधार पर तय की जाएगी. हालांकि इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए अभी सेबी के पूर्णकालिक सदस्यों की अंतिम मंजूरी जरूरी है.
NSE की पेशकश से ज्यादा है राशि
इससे पहले NSE ने इस विवाद को सुलझाने के लिए ₹1387.39 करोड़ का सेटलमेंट प्रस्ताव दिया था. कंपनी ने इस प्रक्रिया के तहत करीब ₹600 करोड़ पहले ही एस्क्रो खाते में जमा कर दिए हैं और बाकी राशि अंतिम मंजूरी मिलने के बाद जमा करने की बात कही है. ऐसे में सेबी की कमेटी द्वारा सुझाई गई राशि NSE की शुरुआती पेशकश से काफी ज्यादा है.
क्या है को-लोकेशन विवाद
को-लोकेशन मामले में NSE पर आरोप लगे थे कि उसने कुछ चुनिंदा ब्रोकर्स को ट्रेडिंग डेटा तक तेज और प्राथमिक पहुंच दी, जिससे उन्हें बाजार में अनुचित बढ़त मिली. इस मामले में लंबे समय तक जांच और कानूनी प्रक्रिया चलती रही, जिसके कारण NSE का आईपीओ करीब 10 वर्षों से अटका हुआ है.
IPO की तैयारी कहां तक पहुंची
इस बीच NSE ने अपने बहुप्रतीक्षित आईपीओ की तैयारी भी तेज कर दी है. कंपनी ने हाल ही में 20 निवेश बैंकों को आईपीओ मैनेज करने की जिम्मेदारी सौंपी है, जो किसी भी भारतीय आईपीओ के लिए अब तक की सबसे बड़ी टीम मानी जा रही है. इसके साथ ही मौजूदा निवेशकों को आईपीओ के जरिए अपने शेयर बेचने के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसके लिए 27 अप्रैल तक की समयसीमा तय की गई है.
क्यों अहम है यह लिस्टिंग
NSE देश का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज होने के साथ-साथ सबसे बड़ी अनलिस्टेड कंपनियों में भी शामिल है. इसके करीब 1.90 लाख निवेशक हैं, जो लंबे समय से लिस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं. आईपीओ आने से निवेशकों को एग्जिट का मौका मिलेगा और कंपनी की वास्तविक बाजार वैल्यू भी सामने आएगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी.
सूत्रों के अनुसार, सेबी जल्द ही NSE को भुगतान के लिए डिमांड लेटर जारी कर सकता है. इसके बाद अंतिम आदेश जारी होगा और सेटलमेंट प्रक्रिया पूरी की जाएगी. इस प्रक्रिया के पूरा होते ही NSE के आईपीओ का रास्ता पूरी तरह साफ हो सकता है.
यह डील पूरी होने पर APSEZ का यह तीसरा पोर्ट अधिग्रहण होगा, जो भारत के दिवालिया ढांचे के तहत किया जा रहा है. इससे पहले कंपनी महाराष्ट्र के दिघी पोर्ट और पुडुचेरी के करैकल पोर्ट का अधिग्रहण कर चुकी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख पोर्ट ऑपरेटर कंपनी अडानी पोर्ट्स (Adani Ports and Special Economic Zone -APSEZ) को करंजा टर्मिनल एंड लॉजिस्टिक्स के अधिग्रहण के लिए कर्जदाताओं की मंजूरी मिल गई है. अगर यह डील पूरी होती है, तो यह कंपनी की दिवालिया प्रक्रिया के तहत तीसरी बड़ी पोर्ट खरीद होगी, जिससे पश्चिमी भारत में उसकी पकड़ और मजबूत होगी.
कर्जदाताओं की समिति से मिली 100% मंजूरी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 14 अप्रैल को कर्जदाताओं की समिति (Committee of Creditors) ने इस अधिग्रहण योजना को 100% वोटिंग सपोर्ट के साथ मंजूरी दे दी. इस समिति का नेतृत्व प्रुडेंट एआरसी (Prudent ARC) कर रहा है, जिसे केनरा बैंक ने जनवरी 2025 में कर्ज ट्रांसफर किया था.
दिवालिया प्रक्रिया के तहत तीसरा अधिग्रहण
यह डील पूरी होने पर APSEZ का यह तीसरा पोर्ट अधिग्रहण होगा, जो भारत के दिवालिया ढांचे के तहत किया जा रहा है. इससे पहले कंपनी महाराष्ट्र के दिघी पोर्ट और पुडुचेरी के करैकल पोर्ट का अधिग्रहण कर चुकी है. करंजा और दिघी दोनों पोर्ट देश के सबसे व्यस्त कंटेनर पोर्ट जवाहरलाल नेहरू के पास स्थित हैं, जो इन्हें रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाता है.
क्या है करंजा टर्मिनल की खासियत
करंजा टर्मिनल एंड लॉजिस्टिक (Karanja Terminal and Logistics) एक मल्टी-पर्पज पोर्ट और लॉजिस्टिक्स सुविधा है, जो महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है.
1. यह पोर्ट 4,000 DWT तक के जहाजों को संभाल सकता है
2. करीब 100 एकड़ में फैला लॉजिस्टिक्स पार्क
3. वेयरहाउसिंग, बॉन्डेड स्टोरेज, कोल्ड स्टोरेज और वैल्यू-एडेड कार्गो सेवाएं उपलब्ध
मौजूदा कंपनी का विरोध
इस अधिग्रहण का विरोध मौजूदा पेरेंट कंपनी Mercantile Ports and Logistics ने किया है. कंपनी का कहना है कि उसने कर्ज चुकाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन कर्जदाताओं ने उसे खारिज कर दिया. MPL ने इस फैसले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात कही है.
अडानी पोर्ट्स को क्या होगा फायदा
अगर यह सौदा पूरा होता है, तो APSEZ की पश्चिमी भारत में मौजूदगी और मजबूत होगी. साथ ही कंपनी की लॉजिस्टिक्स और मरीन इंफ्रास्ट्रक्चर सेगमेंट में पकड़ और गहरी हो जाएगी.
करंजा टर्मिनल का अधिग्रहण Adani Ports and Special Economic Zone के विस्तार की रणनीति में एक अहम कदम साबित हो सकता है. मजबूत लोकेशन और लॉजिस्टिक्स क्षमता के चलते यह डील कंपनी के दीर्घकालिक विकास को नई दिशा दे सकती है.
₹75 करोड़ की यह शुरुआती फंडिंग SEIL की बैलेंस शीट को मजबूत करने और भविष्य के विस्तार की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है. मजबूत निवेशक भागीदारी और बेहतर कच्चे माल की पहुंच से कंपनी की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और बढ़ने की उम्मीद है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
स्टील सेक्टर की कंपनी स्टील एक्सचेंज इंडिया (Steel Exchange India- SEIL) ने अपने प्रस्तावित ₹350 करोड़ फंडरेज के पहले चरण में ₹75 करोड़ जुटा लिए हैं. यह फंड कन्वर्टिबल वारंट्स के जरिए आया है, जिसका उद्देश्य कंपनी की वित्तीय स्थिति मजबूत करना, कर्ज घटाना और सप्लाई चेन को बेहतर बनाना है.
₹350 करोड़ फंडरेज का पहला चरण पूरा
कंपनी ने रेगुलेटरी फाइलिंग में बताया कि यह ₹75 करोड़ की राशि प्रस्तावित ₹350 करोड़ के फंडरेज का पहला हिस्सा है. यह पूरा फंड जुटाव कंपनी की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाने और दीर्घकालिक विकास रणनीति को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है. बोर्ड ने इस इश्यू को 4 मार्च 2026 को मंजूरी दी थी.
IMR ग्रुप से मिला निवेश
इस फंडरेज में निवेश India Coke and Power और IMR Steel द्वारा किया गया है, जो IMR ग्रुप का हिस्सा हैं. यह समूह एक वैश्विक मेटल्स और माइनिंग कॉरपोरेशन है, जिसकी मौजूदगी कई देशों में है. इस निवेश से SEIL को कच्चे माल की सप्लाई और इंटरनेशनल सोर्सिंग नेटवर्क तक बेहतर पहुंच मिलने की उम्मीद है.
कन्वर्टिबल वारंट्स का ढांचा
कंपनी के मुताबिक, यह पूरा फंड कन्वर्टिबल वारंट्स के जरिए जुटाया जा रहा है, जिन्हें 18 महीने के भीतर इक्विटी शेयरों में बदला जा सकेगा. कुल इश्यू साइज ₹350 करोड़ तक सीमित है, जिससे संकेत मिलता है कि आने वाले महीनों में और भी ट्रांच जारी हो सकते हैं.
फंड का इस्तेमाल कहां होगा
कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल कई अहम क्षेत्रों में करेगी:
1. ऑपरेशनल एफिशिएंसी बढ़ाने के लिए
2. कर्ज घटाने (Debt Reduction) के लिए
3. सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए
4. उत्पादन लागत कम करने के लिए जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए
कच्चे माल की सप्लाई होगी मजबूत
इस फंडरेज से कंपनी को मेटलर्जिकल कोक, कोकिंग कोल, नॉन-कोकिंग कोल और फेरस स्क्रैप जैसे अहम कच्चे माल तक बेहतर पहुंच मिलेगी. ये सभी स्टील उत्पादन में लागत नियंत्रण और स्थिर सप्लाई के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं.
स्टील सेक्टर की मौजूदा स्थिति
यह फंडरेज ऐसे समय में आया है जब भारतीय स्टील कंपनियां अस्थिर कच्चे माल की कीमतों, वैश्विक व्यापार बदलावों और घरेलू मांग में बढ़ोतरी जैसे कारकों का सामना कर रही हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की बढ़ती मांग से लंबे स्टील उत्पादों की खपत भी बढ़ रही है.
कंपनी का बिजनेस प्रोफाइल
Steel Exchange India आंध्र प्रदेश में एक इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट संचालित करती है और “सिम्हाद्री TMT” ब्रांड के तहत टीएमटी बार्स बनाती है. कंपनी ने ट्रेडिंग बिजनेस से शुरुआत कर अब स्पंज आयरन, बिलेट्स, रोलिंग मिल्स और कैप्टिव पावर जेनरेशन तक अपना विस्तार किया है.
HCL Tech के नतीजे यह दिखाते हैं कि आईटी सेक्टर में ग्रोथ के बावजूद बाजार की उम्मीदें काफी ऊंची हैं. ऐसे में केवल रेवेन्यू ग्रोथ नहीं, बल्कि मार्जिन और भविष्य की गाइडेंस भी निवेशकों के भरोसे के लिए बेहद अहम हो गई है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मजबूत तिमाही नतीजों के बावजूद देश की प्रमुख आईटी कंपनी एचसीएल टेक (HCL Technologies) के शेयरों में आज भारी दबाव देखने को मिला. कंपनी का मुनाफा और रेवेन्यू बढ़ने के बावजूद निवेशकों की उम्मीदों पर प्रदर्शन खरा नहीं उतरा, जिसके चलते शेयर करीब 10% तक गिर गया और कई ब्रोकरेज हाउस ने टारगेट प्राइस घटा दिया.
शेयर में जोरदार गिरावट, 10% तक टूटा स्टॉक
नतीजों के बाद बाजार में HCL Tech के शेयर पर भारी बिकवाली देखने को मिली. एनएसई पर शेयर 9.58% गिरकर 1,303 रुपये तक पहुंच गया, जबकि बीएसई पर यह 1441.55 रुपये से गिरकर 1301.60 रुपये तक आ गया. कारोबार की शुरुआत भी कमजोरी के साथ 1344.05 रुपये पर हुई थी. शेयर का 52 हफ्ते का उच्चतम स्तर 1,770 रुपये और न्यूनतम 1,275.70 रुपये रहा है.
मुनाफा और रेवेन्यू में बढ़ोतरी
कंपनी ने चौथी तिमाही में मजबूत आंकड़े पेश किए. इस दौरान नेट प्रॉफिट 4.2% बढ़कर 4,488 करोड़ रुपये रहा, जबकि रेवेन्यू 12.34% बढ़कर 33,981 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. हालांकि यह प्रदर्शन बाजार की उम्मीदों के मुकाबले कमजोर माना गया. तिमाही आधार पर भी कंपनी का नेट प्रॉफिट 10.10% और रेवेन्यू 0.32% बढ़ा.
पूरे वित्त वर्ष का प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का शुद्ध लाभ 4.3% घटकर 16,642 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले वर्ष यह 17,390 करोड़ रुपये था. हालांकि वार्षिक रेवेन्यू 11.18% बढ़कर 1,30,144 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
मैनेजमेंट का बयान
कंपनी के सीईओ और एमडी C Vijayakumar ने कहा कि कुछ सेक्टर्स में सुस्ती, विवेकाधीन खर्च में कमी और डील्स में देरी के कारण तिमाही प्रदर्शन प्रभावित हुआ. हालांकि एआई आधारित सेवाओं में मजबूत ग्रोथ जारी है.
टारगेट प्राइस में कटौती
नतीजों के बाद कई ब्रोकरेज हाउस ने स्टॉक को लेकर सतर्क रुख अपनाया है. नोमुरा ने टारगेट 1700 से घटाकर 1600 रुपये कर दिया है, जेपी मॉर्गन ने 1419 से घटाकर 1370 रुपये किया है और न्यूट्रल रेटिंग बरकरार रखी है. वहीं एचएसबीसी और मोतीलाल ओसवाल ने भी टारगेट प्राइस में कटौती की है.
निवेशकों की चिंता क्यों बढ़ी
मजबूत रेवेन्यू ग्रोथ के बावजूद मार्जिन दबाव, धीमी डील क्लोजिंग और कमजोर गाइडेंस ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया. इसी वजह से निवेशकों ने मुनाफावसूली की और शेयर पर दबाव बढ़ गया.
HCL Tech के नतीजे यह दिखाते हैं कि आईटी सेक्टर में ग्रोथ के बावजूद बाजार की उम्मीदें काफी ऊंची हैं. ऐसे में केवल रेवेन्यू ग्रोथ नहीं, बल्कि मार्जिन और भविष्य की गाइडेंस भी निवेशकों के भरोसे के लिए बेहद अहम हो गई है.
कंपनी ने अब तक 71 देशों में 1300 से ज्यादा भारी उपकरण सप्लाई किए हैं. इसकी ऑर्डर बुक 12,700 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुकी है, जो भविष्य की ग्रोथ को सपोर्ट करती है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
डिफेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की सरकारी कंपनी भारत अर्थ मूवर्स (Bharat Earth Movers Limited) एक बार फिर शेयर बाजार में सुर्खियों में है. रक्षा मंत्रालय से करीब ₹590 करोड़ का बड़ा ऑर्डर मिलने के बाद इस मल्टीबैगर स्टॉक में तेजी लौट आई है, जिसने कभी ₹12 के स्तर से शुरुआत कर निवेशकों को 14,000% से ज्यादा का शानदार रिटर्न दिया था.
₹12 से ₹2,400 तक का सफर
BEML का शेयर उन चुनिंदा सरकारी स्टॉक्स में शामिल है जिसने लॉन्ग टर्म निवेशकों को भारी रिटर्न दिया है. कभी ₹12.40 के आसपास कारोबार करने वाला यह स्टॉक अब ₹2,400 के स्तर को पार कर चुका है. लिस्टिंग के बाद से अब तक यह करीब 14,206% का रिटर्न दे चुका है, जो इसे एक मजबूत मल्टीबैगर स्टॉक बनाता है.
नए डिफेंस ऑर्डर की खबर के बाद शेयर में फिर से खरीदारी देखने को मिली और आज बाजार खुलने के बाद खबर लिखे जाने तक ये शेयर 5.32 प्रतिशत की तेजी के साथ 1862 रुपये पर कारोबार कर रहा था. बीते कुछ समय में भी इस स्टॉक ने अच्छा प्रदर्शन किया है, पिछले 1 महीने में करीब 27% की तेजी और सिर्फ 5 दिनों में लगभग 7% का रिटर्न दिया है.
₹590 करोड़ के ऑर्डर से बढ़ा भरोसा
रक्षा मंत्रालय ने कंपनी को लगभग ₹590 करोड़ का ऑर्डर दिया है, जिसके तहत भारतीय सेना के लिए ट्रॉल असेंबली की सप्लाई की जाएगी. यह ऑर्डर कंपनी की ऑर्डर बुक और भविष्य की कमाई के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, जिससे निवेशकों का भरोसा और मजबूत हुआ है.
सिर्फ डिफेंस नहीं, मल्टी-सेक्टर बिजनेस
BEML सिर्फ डिफेंस कंपनी नहीं है, बल्कि इसका बिजनेस कई क्षेत्रों में फैला हुआ है.
1. करीब 50% राजस्व माइनिंग और कंस्ट्रक्शन से आता है
2. 27% कमाई रेलवे और मेट्रो प्रोजेक्ट्स से होती है
3. 23% योगदान डिफेंस सेक्टर का है
यह विविधता कंपनी को स्थिर और मजबूत बिजनेस मॉडल देती है.
ग्लोबल मौजूदगी और मजबूत ऑर्डर बुक
कंपनी ने अब तक 71 देशों में 1300 से ज्यादा भारी उपकरण सप्लाई किए हैं. इसकी ऑर्डर बुक 12,700 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुकी है, जो भविष्य की ग्रोथ को सपोर्ट करती है.
मेक इन इंडिया से मिला बड़ा फायदा
BEML ‘मेक इन इंडिया’ और डिफेंस इंडिजेनाइजेशन पॉलिसी का बड़ा लाभ उठा रही है. कंपनी अपने लगभग 70% प्रोडक्ट्स इन-हाउस टेक्नोलॉजी से बनाती है, जिससे इसकी तकनीकी क्षमता और प्रतिस्पर्धा दोनों मजबूत हुई हैं.
BEML का यह सफर दिखाता है कि लंबे समय के भरोसे और मजबूत बिजनेस मॉडल के साथ सरकारी कंपनियां भी मल्टीबैगर रिटर्न दे सकती हैं. नए डिफेंस ऑर्डर के बाद एक बार फिर यह स्टॉक निवेशकों की नजरों में आ गया है.