भारत को भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी की मार झेलनी पड़ेगी, अमेरिकी डॉलर में काफी मजबूती आई है.
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अभिषेक शर्मा
नई दिल्लीः वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) में इस वक्त कई पश्चिमी देशों में इस वक्त हाहाकार मचा हुआ है. दुनिया पहले कोविड महामारी और उसके बाद रूस द्वारा यूक्रेन पर किए आक्रमण की वजह से काफी पीछे चली गई है और स्लोडाउन के बीच कई देशों में इस वक्त मंदी की आहट सुनाई दे रही है. इसका असर भारत जैसे विकासशील देश और पाकिस्तान व श्रीलंका जैसे संकटग्रस्त देशों में भी देखने को मिल रहा है.
अमेरिका, इंग्लैंड की हालत ज्यादा खराब
अमेरिका और ब्रिटेन जैसे अमीर देश मुद्रास्फीति को कम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) के फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ इंग्लैंड ने नवंबर में अपनी प्रमुख अल्पकालिक ब्याज दरों में 75 आधार अंकों (0.75 प्रतिशत) की बढ़ोतरी की घोषणा कर दी है. वर्तमान में, कई पश्चिमी देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को ठीक करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं.
भारत में रुपया कमजोर हुआ
अमीर देशों में बड़ी कंपनियों का पहले से ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. वर्ष की शुरुआत के बाद से, भारतीय रुपये में तेजी से गिरावट आई है जबकि अमेरिकी डॉलर में काफी मजबूती आई है. अरुण सिंह, ग्लोबल चीफ इकोनॉमिस्ट, डन एंड ब्रैडस्ट्रीट इंडिया ने कहा, “ग्लोबल इकोनॉमी मुद्रास्फीति, बिगड़ते विकास दृष्टिकोण और मंदी की आशंकाओं का मुकाबला करने के लिए पिछली आधी सदी की मौद्रिक नीति के सबसे समकालिक एपिसोड में से एक देख रही है। डॉलर के मजबूत होने से भारत सहित उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी का बहिर्वाह हुआ है। इसके अलावा, वित्तीय संपत्ति की कीमतों में गिरावट आई है, बॉन्ड प्रतिफल बढ़ रहे हैं, उधार की लागत एक दशक के उच्च स्तर पर बढ़ रही है."
आयात से रुपये में कमजोरी बढ़ती है
आईएमसी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष अनंत सिंघानिया ने कहा, भारत की मुद्रास्फीति काफी हद तक आयात की जाती है। "कमजोर रुपया हमारे आयात को और अधिक महंगा बना देता है, और आयात हमारे देश के लिए आवश्यक है। कच्चे तेल, खाद्य तेल, उर्वरक, सोना आदि की हमारी खपत की जरूरतों को पूरा करने के लिए, हम आयात पर निर्भर हैं."
सिंघानिया ने कहा कि महंगाई पर काबू पाने के लिए जहां ब्याज दरों में बढ़ोतरी जरूरी हो सकती है, वहीं ऐसी बढ़ोतरी को नियंत्रित किए जाने की जरूरत है। यदि नियंत्रित नहीं किया जाता है, तो दर वृद्धि संभावित रूप से और संभवतः अनिवार्य रूप से आर्थिक गतिविधियों की मंदी का परिणाम हो सकती है क्योंकि धन महंगा हो जाता है।
यस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री, इंद्रनील पैन ने बीडब्ल्यू बिजनेसवर्ल्ड को बताया कि भारत अभी तक मुद्रास्फीति वृद्धि चक्र के अंत के करीब नहीं है, भले ही यूएस फेड वृद्धि की धीमी गति के लिए तैयार है, लेकिन टर्मिनल दर पर कोई आम सहमति नहीं है।
"हालांकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का एक महत्वपूर्ण अनुपात घरेलू रूप से संचालित है, वैश्विक विकास मंदी निर्यात चैनल के माध्यम से भारत को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी. यह ज्यादातर सामान्य ज्ञान है कि वैश्विक आय स्तर भारतीय रुपये की तुलना में भारत के निर्यात की मात्रा का एक बड़ा निर्धारक है," पैन ने कहा.
अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां ने कम की भारत की रेटिंग
कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत की ग्रोथ को कम कर रही हैं. एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2023 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के विकास के अनुमान को 30 बीपीएस से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया. इससे पहले, अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने चालू वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था, जिसमें गिरावट का जोखिम था.
यहां तक कि डेलॉइट इंडिया ने एक रिपोर्ट में कहा कि देश को वित्तीय वर्ष (FY) 2022-23 के दौरान 6.5 से 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करनी है. कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के वरिष्ठ अर्थशास्त्री सुवोदीप रक्षित ने कहा, "बाहरी वातावरण सभी 'खुली' अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है. मंदी के लिए भारत का सबसे बड़ा जोखिम व्यापार चैनल के माध्यम से होगा. हालांकि भारत का निर्यात सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 11-12 प्रतिशत है. औसतन कम निर्यात, फिर भी वृद्धि पर दबाव डालेगा."
भारत की जीडीपी इतनी रहने की उम्मीद
रक्षित ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि वित्त वर्ष 2023 की जीडीपी वृद्धि लगभग 6.8 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2024 के लिए लगभग 6 प्रतिशत रहेगी. हालांकि, चिंता अपेक्षित वैश्विक मंदी की अवधि और यूएस, यूके और यूरोप में मंदी की गहराई है. इसके अतिरिक्त, कैलेंडर वर्ष 2023 में कोविड-19 के प्रति चीन की रिकवरी और उसकी नीतियों की सीमा भी वैश्विक मांग पर प्रभाव डालेगी.
जैसा कि कई एजेंसियां अब अगले वित्तीय वर्ष के लिए भारत की जीडीपी को 6 प्रतिशत के करीब आंक रही हैं, अब एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार पिछले कुछ वर्षों में विकास दर को बनाए रखने में सक्षम होगी.
अनिश्चितता वाला वर्ष रहेगा 2023
जैसा कि रूस-यूक्रेन संकट अभी भी जारी है, वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता की लंबी अवधि में प्रवेश करने जा रही है. विशेषज्ञों ने कहा कि 2023 में 2022 की तुलना में धीमी विश्व वृद्धि देखी जा सकती है जो भारत के निर्यात को प्रभावित करेगी. पैन ने कहा कि मूल्य के संदर्भ में भारतीय निर्यात में जो वृद्धि देखी गई थी (वैश्विक कीमतों में वृद्धि के कारण) वैश्विक वस्तुओं की कीमतों में गिरावट के कारण कम हो रही है.
रक्षित ने कहा, "मंदी, ब्याज दर चक्र, वित्तीय बाजार अव्यवस्थाओं, ऊर्जा की कीमतों आदि की निकट अवधि की अनिश्चितताओं के अलावा विश्व अर्थव्यवस्था में चल रहे अधिक मौलिक बदलाव कैलेंडर वर्ष 2023 में अनिश्चितता और अस्थिरता को बढ़ाएंगे."
भारत में 2035 तक सर्विसेबल वेल्थ पूल के लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना के बीच, दक्षम् कैपिटल का उद्देश्य बिखरी हुई सलाहकारी सेवाओं को एकीकृत और रिसर्च-आधारित प्लेटफॉर्म के माध्यम से सुव्यवस्थित करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्तीय सेवा क्षेत्र के चार अनुभवी दिग्गजों ने अपनी साझा सोच और विशेषज्ञता के बल पर “दक्षम् कैपिटल” (Daksham Capital) की शुरुआत की है. यह एक मल्टी-फैमिली ऑफिस, प्रीमियम प्राइवेट बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट फर्म है, जो उच्च-नेट-वर्थ (HNI) और अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ (UHNI) व्यक्तियों, पारिवारिक व्यवसायों, CXO स्तर के पेशेवरों और वैश्विक भारतीय निवेशकों को सेवाएं प्रदान करेगी.
दिल्ली-एनसीआर से संचालन, अनुभवी नेतृत्व टीम
दिल्ली-एनसीआर में मुख्यालय वाली इस कंपनी का नेतृत्व साकेत लखोटिया (ग्रुप CEO), आस्था मागो (COO), अचिन भारद्वाज (जॉइंट CIO) और पंकज केडिया (जॉइंट CIO) कर रहे हैं. इन सभी के पास प्राइवेट बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग, कॉर्पोरेट एडवाइजरी और संस्थागत वित्त जैसे क्षेत्रों में व्यापक अनुभव है. यह नेतृत्व टीम रणनीतिक प्रबंधन, बाजार की समझ और संस्थागत अनुभव का संतुलित मिश्रण प्रस्तुत करती है.
भारत के वेल्थ सेक्टर में बड़ा अवसर
भारत में 2035 तक सर्विसेबल वेल्थ पूल के लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना के बीच, दक्षम् कैपिटल का उद्देश्य बिखरी हुई सलाहकारी सेवाओं को एकीकृत और रिसर्च-आधारित प्लेटफॉर्म के माध्यम से सुव्यवस्थित करना है.
निवेश दर्शन और कंपनी का दृष्टिकोण
ग्रुप सीईओ साकेत लखोटिया ने कहा, “भारत का वेल्थ मैनेजमेंट क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है. आज के निवेशक पहले से अधिक जागरूक और विवेकशील हैं, वे केवल संबंध-आधारित सलाह नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर की मजबूती चाहते हैं. हमारा निवेश ढांचा इसी अपेक्षा पर आधारित है, जो स्वामित्व शोध और अनुशासित प्रक्रियाओं के माध्यम से दीर्घकालिक परिणाम सुनिश्चित करता है.”
रिसर्च-फर्स्ट और प्रोसेस-ड्रिवन प्लेटफॉर्म
दक्षम् कैपिटल का मूल आधार रिसर्च-प्रथम और प्रक्रिया-आधारित दृष्टिकोण है. कंपनी का प्लेटफॉर्म संस्थागत स्तर के शोध, स्वामित्व आवंटन मॉडल, अनुशासित उत्पाद चयन और निरंतर पोर्टफोलियो मॉनिटरिंग को एक साथ जोड़ता है, ताकि निवेशक जटिल वित्तीय माहौल में सही निर्णय ले सकें.
जोखिम प्रबंधन और रिटर्न ऑप्टिमाइजेशन के लिए कंपनी एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाती है, जिसमें हर निवेश निर्णय को उपयुक्तता, विविधीकरण, लिक्विडिटी, जोखिम और दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण के नजरिए से परखा जाता है.
“दक्षम् कम्पास” पर आधारित मूल्य प्रणाली
कंपनी के मार्गदर्शक सिद्धांत “दक्षम् कम्पास” पर आधारित हैं, विजडम (ज्ञान), स्टेबिलिटी (स्थिरता), एथिक्स (नैतिकता) और निच (विशेषज्ञता). ये सिद्धांत अनुभव-आधारित अंतर्दृष्टि, अनुशासित प्रक्रियाओं, व्यक्तिगत समाधान और अटूट ईमानदारी के प्रति कंपनी की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं.
तकनीक और मानव विशेषज्ञता का संयोजन
दक्षम् कैपिटल मानव समझ और एल्गोरिदमिक सटीकता का संयोजन करते हुए डेटा इंटेलिजेंस, एनालिटिक्स और AI-आधारित सलाह का उपयोग करता है, जिससे निवेशकों को स्पष्टता, लचीलापन और बेहतर नियंत्रण मिलता है.
मजबूत ट्रैक रिकॉर्ड और भविष्य की योजना
600 से अधिक ग्राहकों को सलाह देने और 1 बिलियन डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियों के प्रबंधन का पूर्व अनुभव रखने वाली यह फर्म तेजी से बढ़ते इस उद्योग में एक नया दृष्टिकोण लेकर आई है. कंपनी का लक्ष्य अनुशासित, पारदर्शी और दीर्घकालिक वेल्थ रणनीतियां प्रदान करना है.
विशेषज्ञों का मानना है कि ODI में यह तेजी भारतीय कंपनियों के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है. कंपनियां नए बाजारों और क्षेत्रों में अवसर तलाशते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की विदेशी निवेश गतिविधियों में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जोरदार तेजी देखने को मिली है. वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) आउटफ्लो बढ़कर 26.7 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जो वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में करीब 84 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है.
लगातार बढ़ रहा वैश्विक विस्तार
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार लगातार बढ़ रहा है. FY25 में ODI आउटफ्लो 24.2 अरब डॉलर रहा, जबकि FY24 में यह लगभग 14.5 अरब डॉलर था. यह रुझान बताता है कि भारत की कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं.
इक्विटी निवेश का दबदबा
FY26 में कुल निवेश का बड़ा हिस्सा इक्विटी निवेश के रूप में रहा, जो 18.6 अरब डॉलर से अधिक था. वहीं, 8 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश लोन के रूप में किया गया. इससे साफ है कि कंपनियां रणनीतिक हिस्सेदारी के साथ-साथ वित्तीय सहयोग का भी सहारा ले रही हैं.
सिंगापुर बना सबसे बड़ा गंतव्य
भौगोलिक रूप से सिंगापुर भारतीय निवेश के लिए सबसे बड़ा गंतव्य बना रहा, जहां FY26 में 7.6 अरब डॉलर से अधिक का निवेश गया. इसके बाद अमेरिका का स्थान रहा, जहां 4 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश हुआ, जबकि मॉरीशस को 2.4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश प्राप्त हुआ.
सेवाएं सेक्टर सबसे आगे
क्षेत्रवार आंकड़ों में वित्तीय, बीमा और व्यवसायिक सेवाएं सबसे आगे रहीं. इस सेक्टर में 11 अरब डॉलर से अधिक निवेश हुआ, जो कुल आउटफ्लो का करीब 45 प्रतिशत है. इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 4.6 अरब डॉलर से अधिक और थोक-खुदरा व्यापार, रेस्तरां और होटल सेक्टर में करीब 3 अरब डॉलर का निवेश हुआ.
मासिक रुझानों में उतार-चढ़ाव
मासिक आंकड़ों में कुछ अस्थिरता भी देखी गई. सितंबर में सबसे ज्यादा 4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हुआ, जबकि नवंबर में यह घटकर करीब 0.8 अरब डॉलर रह गया.
ODI क्या है और क्यों अहम
ODI का मतलब है भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में संयुक्त उपक्रम या पूरी तरह स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों में किया गया निवेश. इससे कंपनियों को वैश्विक स्तर पर विस्तार करने और अंतरराष्ट्रीय वैल्यू चेन से जुड़ने में मदद मिलती है. सरकार की उदारीकृत नीति के तहत कंपनियां अपनी नेटवर्थ के चार गुना तक विदेश में निवेश कर सकती हैं. इसके अलावा, लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत व्यक्तिगत निवेश की भी अनुमति है.
नीतिगत सुधार और आगे की राह
अधिकारियों के अनुसार, सरकार का उद्देश्य विदेशी निवेश से जुड़े नियमों को सरल बनाना और उन्हें वैश्विक कारोबारी जरूरतों के अनुरूप बनाना है. भारतीय कंपनियां अब तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार और विविधीकरण की ओर बढ़ रही हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि ODI में यह तेजी भारतीय कंपनियों के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है. कंपनियां नए बाजारों और क्षेत्रों में अवसर तलाशते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.
अप्रैल में सर्विस सेक्टर की गतिविधियों में उछाल का सबसे बड़ा कारण मजबूत घरेलू मांग रही. कंपनियों को नए ऑर्डर्स में तेजी देखने को मिली, जिससे कुल बिजनेस गतिविधियों में सुधार हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के सर्विस सेक्टर ने वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत दमदार प्रदर्शन के साथ की है. अप्रैल में सर्विसेज PMI बढ़कर 58.8 पर पहुंच गया, जो पिछले पांच महीनों का उच्चतम स्तर है. मजबूत घरेलू मांग, ई-कॉमर्स गतिविधियों में तेजी और नए ऑर्डर्स में सुधार ने इस वृद्धि को गति दी, जबकि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद सेक्टर में सकारात्मक रुझान कायम रहा.
घरेलू मांग बनी ग्रोथ की मुख्य ताकत
अप्रैल में सर्विस सेक्टर की गतिविधियों में उछाल का सबसे बड़ा कारण मजबूत घरेलू मांग रही. कंपनियों को नए ऑर्डर्स में तेजी देखने को मिली, जिससे कुल बिजनेस गतिविधियों में सुधार हुआ. ई-कॉमर्स और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी सेवाओं में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण निर्यात मांग कमजोर रही, लेकिन घरेलू बाजार ने इस कमी की भरपाई कर दी.
निर्यात में नरमी, वैश्विक परिस्थितियों का असर
अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले नए ऑर्डर्स में गिरावट दर्ज की गई. न्यू एक्सपोर्ट बिजनेस इंडेक्स एक साल से अधिक समय के दूसरे सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. कंपनियों ने इसके पीछे पश्चिम एशिया संघर्ष और कमजोर इनबाउंड टूरिज्म को प्रमुख कारण बताया. इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल सर्विस सेक्टर की निर्भरता घरेलू मांग पर अधिक बढ़ गई है.
लागत दबाव बरकरार, लेकिन राहत के संकेत
सर्विस सेक्टर की कंपनियों को अप्रैल में बढ़ती लागत का सामना करना पड़ा. खाद्य पदार्थों, गैस, श्रम और अन्य इनपुट की कीमतों में वृद्धि से ऑपरेटिंग खर्च बढ़ा. हालांकि, मार्च के मुकाबले इनपुट लागत महंगाई में थोड़ी कमी आई, लेकिन यह अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है.
दिलचस्प बात यह रही कि कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला. आउटपुट कीमतों में वृद्धि तीन महीनों की सबसे धीमी रही, जिससे संकेत मिलता है कि कंपनियां प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए लागत का कुछ हिस्सा खुद वहन कर रही हैं.
रोजगार में सुधार, हायरिंग में तेजी
नए कारोबार में मजबूती का असर रोजगार पर भी देखने को मिला. कंपनियों ने बढ़ते काम के दबाव को संभालने के लिए शॉर्ट-टर्म और जूनियर लेवल कर्मचारियों की भर्ती बढ़ाई. सर्विस सेक्टर के सभी प्रमुख क्षेत्रों में रोजगार बढ़ा, जिससे लंबित कार्यों का दबाव कुछ हद तक कम हुआ.
कारोबारी भरोसा थोड़ा कमजोर, लेकिन रुख सकारात्मक
हालांकि कंपनियां भविष्य को लेकर आशावादी बनी हुई हैं, लेकिन मार्च के मुकाबले कारोबारी भरोसे में हल्की गिरावट आई है. पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक तनाव और लगातार ऊंची लागत को कंपनियां आगे के लिए प्रमुख जोखिम मान रही हैं.
कंपोजिट PMI में भी मजबूती के संकेत
सिर्फ सर्विस सेक्टर ही नहीं, बल्कि समग्र अर्थव्यवस्था में भी सुधार दिखा. कंपोजिट PMI मार्च के 57.0 से बढ़कर अप्रैल में 58.2 पर पहुंच गया. यह मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों क्षेत्रों में मजबूती का संकेत देता है, जिससे निजी क्षेत्र के उत्पादन में तेज वृद्धि दर्ज हुई.
अप्रैल के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि भारत का सर्विस सेक्टर मजबूत घरेलू मांग के सहारे तेजी से आगे बढ़ रहा है. हालांकि वैश्विक अनिश्चितताएं और लागत दबाव चुनौतियां बने हुए हैं, फिर भी सेक्टर की बुनियाद मजबूत नजर आ रही है और आने वाले महीनों में स्थिर वृद्धि की उम्मीद बनी हुई है.
उच्च दांव वाला DOJ–SEC मामला “नो-एडमिशन” समझौते की ओर बढ़ रहा है, जो वाशिंगटन और भारत के सबसे शक्तिशाली व्यापारिक साम्राज्यों में से एक के बीच एक संतुलित रीसेट का संकेत देता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
अमेरिकी न्याय विभाग (U.S. Department of Justice) से कुछ ही ब्लॉकों की दूरी पर स्थित शांत गलियारों में और यू.एस. सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के प्रवर्तन क्षेत्रों में एक दृष्टिकोण धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है: गौतम अडानी से जुड़ा लंबे समय से चल रहा अमेरिकी कानूनी दबाव शायद अदालत में लड़ाई के रूप में समाप्त न हो, बल्कि एक ऐसे बातचीत से तय समझौते के रूप में समाप्त हो, जिसे अत्यंत सटीकता के साथ तैयार किया गया हो, ऐसा समझौता जो औपचारिक दोष स्वीकार किए बिना मामले को बंद करने की अनुमति दे. वरिष्ठ कानूनी और नीतिगत सूत्रों के अनुसार, समझौता लगभग तय है और संभवतः इसी महीने घोषित किया जा सकता है.
सूत्रों ने बताया कि हाल के हफ्तों में संभावित समाधान ढांचे पर चर्चाएँ तेज हुई हैं, जबकि मामला औपचारिक रूप से न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट में अपनी प्रक्रियात्मक गति से आगे बढ़ रहा है. अमेरिकी प्रवर्तन प्रथा से परिचित कई लोगों के अनुसार, जिस संरचना पर विचार किया जा रहा है वह अमेरिकी नियामक उपकरणों में असामान्य नहीं है: एक नागरिक समझौता जिसमें आरोपों को “स्वीकार या अस्वीकार किए बिना” निपटाया जाता है, एक ऐसा सूत्र जिसने पिछले दो दशकों में कई जटिल सीमा-पार प्रवर्तन मामलों को हल किया है.
वह मामला जिसने अडानी को वाशिंगटन की निगाह में ला दिया
इस मामले के केंद्र में एक दोहरी अमेरिकी कार्रवाई है सिविल और आपराधिक, जिसने अमेरिकी नियामकों के अधिकार क्षेत्र को भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र तक काफी बढ़ा दिया.
SEC की सिविल शिकायत में आरोप है कि अडानी और उनके सहयोगियों ने ऊर्जा अनुबंधों से जुड़े कथित तौर पर सैकड़ों मिलियन डॉलर के अनुचित भुगतान की योजना बनाई, जबकि साथ ही अमेरिकी निवेशकों से ऐसी जानकारी के आधार पर पूंजी जुटाई जो नियामकों के अनुसार भ्रामक थी.
इसके समानांतर, अमेरिकी अभियोजकों ने 2024 में एक आपराधिक अभियोग (indictment) जारी किया, जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों पर साजिश, प्रतिभूति धोखाधड़ी और अमेरिकी वित्तीय बाजारों से जुड़े भ्रष्टाचार-रोधी कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए.
दोनों कार्रवाइयों के पीछे वाशिंगटन की परिचित कानूनी धारणा है: यदि अमेरिकी निवेशक, डॉलर लेनदेन या अमेरिकी वित्तीय प्रणाली शामिल है, तो अधिकार क्षेत्र लागू होता है, भले ही मूल गतिविधि संयुक्त राज्य के बाहर हुई हो.
इस बाह्य-क्षेत्रीय अधिकार को चुनौती दी गई है. अडानी की कानूनी टीम ने अदालत में दलील दी है कि कथित आचरण मूल रूप से “बाह्य-क्षेत्रीय” है और अमेरिकी अदालतों के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, यह बचाव अभी भी मामले को खारिज करने के लिए दायर याचिका का हिस्सा है.
फिर भी, जैसे-जैसे यह कानूनी चुनौती आगे बढ़ रही है, दोनों पक्षों ने चुपचाप प्रक्रियात्मक समयसीमा पर सहमति जैसा रुख अपनाया है, जो एक वाशिंगटन स्थित प्रतिभूति वकील के अनुसार “सिर्फ मुकदमा नहीं, बल्कि बातचीत की जगह” का संकेत है.
समझौता क्यों और अभी क्यों
अमेरिकी प्रवर्तन संस्कृति में, विशेषकर जटिल सीमा-पार मामलों में, मुकदमे अक्सर अपवाद होते हैं, नियम नहीं.
पूर्व प्रवर्तन अधिकारियों और व्हाइट-कॉलर रक्षा वकीलों के अनुसार, तीन कारक ऐसे हैं जो अडानी मामले में समझौते की संभावना बढ़ाते हैं.
पहला, साक्ष्य की जटिलता, कथित आचरण का अधिकांश हिस्सा अमेरिकी क्षेत्र से बाहर हुआ है, जिसमें विदेशी अधिकारी, ऑफशोर संरचनाएँ और बहुराष्ट्रीय वित्तपोषण शामिल हैं. अमेरिकी आपराधिक मानकों को पूरा करने वाला ट्रायल केस बनाना संसाधन-गहन और अनिश्चित है.
दूसरा, अधिकार क्षेत्र का तनाव, SEC को भारत में समन भेजने में पहले ही प्रक्रियात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ा है, और अदालत से पारंपरिक माध्यमों को दरकिनार करने की अनुमति भी माँगनी पड़ी है. यह तनाव मामले की कूटनीतिक और कानूनी संवेदनशीलता को दर्शाता है.
तीसरा, बाजार स्थिरता, अमेरिकी प्रवर्तन कार्रवाई के मात्र सामने आने से अडानी समूह के बाजार मूल्य में समय-समय पर अरबों डॉलर की गिरावट आई, जो लंबे अनिश्चितता के प्रभाव को दर्शाता है.
नियामकों के लिए, एक संतुलित समझौता प्रवर्तन उद्देश्यों दंड, अनुपालन प्रतिबद्धताओं और मिसाल को प्राप्त कर सकता है, बिना लंबे सीमा-पार मुकदमे के जोखिम के.
“नो एडमिट, नो डिनाई” सिद्धांत
उभरती हुई इस कहानी के केंद्र में एक विशिष्ट अमेरिकी कानूनी उपकरण है.
SEC लंबे समय से ऐसे समझौतों पर निर्भर रहा है जिनमें प्रतिवादी न तो दोष स्वीकार करते हैं और न ही इनकार करते हैं, लेकिन वित्तीय दंड और अनुपालन उपायों पर सहमत होते हैं. यह दृष्टिकोण नियामकों को ट्रायल की अनिश्चितता के बिना लागू करने योग्य परिणाम देता है, जबकि प्रतिवादी औपचारिक स्वीकारोक्ति से बचते हैं जो अन्य क्षेत्रों में अतिरिक्त देनदारियों को जन्म दे सकती है.
वाशिंगटन के कानूनी विशेषज्ञ इसे “स्वीकारोक्ति के बिना समाधान” कहते हैं.
ऐसे समझौतों में आम तौर पर शामिल होते हैं: मौद्रिक दंड या वसूली, भविष्य के उल्लंघनों पर रोक और शासन या अनुपालन संबंधी प्रतिबद्धताएँ, और कुछ मामलों में अधिकारी या निदेशक के रूप में सेवा करने पर प्रतिबंध. महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वीकारोक्ति का अभाव परिणाम के अभाव का संकेत नहीं है. आदेश स्वयं कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है और उल्लंघन पर लागू किया जा सकता है.
समानांतर रूप से, आपराधिक पक्ष पर, DOJ ने कॉर्पोरेट मामलों में डिफर्ड प्रॉसिक्यूशन एग्रीमेंट (DPA) या नॉन-प्रॉसिक्यूशन एग्रीमेंट (NPA) का अधिक उपयोग किया है, ऐसे तंत्र जो अनुपालन, जुर्माना और निगरानी के बदले आरोपों को स्थगित या समाप्त कर सकते हैं.
सूत्रों के अनुसार, अडानी मामले में किसी भी व्यापक समाधान में SEC के साथ नागरिक समझौता और DOJ के साथ एक संरचित समाधान का संयोजन शामिल हो सकता है — हालांकि सटीक रूप अभी भी बदल रहा है.
अडानी के लिए रणनीतिक गणना
अडानी के लिए यह विकल्प केवल कानूनी नहीं, बल्कि वैश्विक है. अमेरिका में लंबा मुकदमा समूह को अनिश्चितता के घेरे में रखेगा, जबकि वह अंतरराष्ट्रीय पूंजी जुटा रहा है और बुनियादी ढांचे में विस्तार कर रहा है. एक समझौता, भले ही वित्तीय दंड के साथ हो, अंतिमता प्रदान करता है.
समान रूप से महत्वपूर्ण यह है कि दोष स्वीकार करने से बचना. ऐसा स्वीकारोक्ति भारत और अन्य न्याय क्षेत्रों में अतिरिक्त प्रभाव पैदा कर सकती है, जिससे नियामकीय या शेयरधारक कार्रवाई शुरू हो सकती है.
एक वाशिंगटन स्थित रक्षा वकील ने स्पष्ट कहा: “ऐसे मामलों में, पैसे से ज्यादा भाषा मायने रखती है.”
आगे क्या होगा
औपचारिक रूप से मामला अभी भी अदालत में सक्रिय है. खारिज करने की याचिकाएँ लंबित हैं और प्रक्रियात्मक समयसीमाएँ जारी हैं. लेकिन इसके पीछे वाशिंगटन में बातचीत यह संकेत देती है कि दोनों पक्ष अंतिम परिणाम को समझते हैं. एक सावधानीपूर्वक शब्दबद्ध, कानूनी रूप से मजबूत और कूटनीतिक रूप से संतुलित समझौता अमेरिकी नियामकों को अधिकार क्षेत्र और मानक लागू करने की अनुमति देगा, जबकि अडानी को अपने सबसे महत्वपूर्ण कानूनी चुनौतियों में से एक को बंद करने का रास्ता देगा.
यह परिणाम कब और किन शर्तों पर होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष कितनी दूर तक जाने को तैयार हैं. लेकिन वाशिंगटन के प्रवर्तन हलकों में एक बात तेजी से स्पष्ट हो रही है: यह मामला शायद अदालत में जीता या हारा नहीं जाएगा, बल्कि बंद दरवाजों के पीछे, पंक्ति-दर-पंक्ति तय किया जाएगा.
राजनीतिक प्रभाव, संयुक्त राज्य
वाशिंगटन में, बिना दोष स्वीकार किए हुआ समझौता ट्रंप प्रशासन की कमजोरी नहीं, बल्कि संतुलित तरीके से इस्तेमाल की गई नियामक शक्ति का उदाहरण माना जाएगा. DOJ और SEC के लिए यह साफ संदेश है कि अमेरिकी बाजार और डॉलर प्रणाली पर उनका कानूनी अधिकार बना रहता है, चाहे मामला कहीं भी हुआ हो. साथ ही, अदालत की लंबी लड़ाई से बचकर यह कदम भारत के साथ रिश्तों में अनावश्यक तनाव पैदा होने से भी रोकता है, खासकर तब जब अमेरिका व्यापार, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत को अहम साझेदार मान रहा है. नीति विशेषज्ञ इसे “गोल्डीलॉक्स जोन” कहते हैं, यानी ऐसा संतुलन जहाँ कार्रवाई भी हो और टकराव भी न बढ़े.
राजनीतिक प्रभाव, भारत
भारत में इसका प्रभाव अधिक जटिल होगा. एक समझौता विशेषकर बिना स्वीकारोक्ति के सरकार और अडानी समूह को इसे दोष के बजाय समाधान के रूप में प्रस्तुत करने की जगह देता है. इससे नई दिल्ली यह तर्क दे सकती है कि भारतीय कॉर्पोरेट दिग्गज वैश्विक जांच का सामना कर सकते हैं, बिना अमेरिकी अदालत में स्पष्ट हार के. साथ ही, विपक्षी आवाजें इसे शासन मानकों और नियामकीय निगरानी पर सवाल उठाने के लिए उपयोग कर सकती हैं. लेकिन राजनीतिक शोर के नीचे एक शांत संकेत है: वैश्विक स्तर पर काम करने वाले भारतीय समूह अब पूरी तरह पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों की अधिकार-सीमा और अनुपालन अपेक्षाओं के भीतर हैं.
एक नया मोड़
कुल मिलाकर, यह समाधान एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है. लंबे कानूनी टकराव के बजाय, एक संरचित समझौता अमेरिका–भारत आर्थिक संबंधों में अधिक व्यावहारिक चरण का रास्ता खोलता है, जहाँ प्रवर्तन कार्रवाइयाँ और पूंजी प्रवाह तथा रणनीतिक सहयोग साथ-साथ चलते हैं. इस तरह यह विवाद पर एक रेखा खींच देता है और खेल के नियमों को स्पष्ट करता है. वाशिंगटन और नई दिल्ली दोनों के लिए, यह स्पष्टता अंततः मामले से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
सरकार का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनाना है. इन नई परियोजनाओं को इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए गुजरात में दो नए चिप प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे दी है. इस फैसले के साथ भारत में घरेलू चिप निर्माण क्षमता विकसित करने की योजना को और गति मिलेगी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत दो नई परियोजनाओं को हरी झंडी दी गई. इनमें एक मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और दूसरी सेमीकंडक्टर पैकेजिंग यूनिट शामिल है. दोनों प्रोजेक्ट्स गुजरात में स्थापित किए जाएंगे.
3,936 करोड़ रुपये का संयुक्त निवेश
इन दोनों परियोजनाओं में कुल मिलाकर लगभग 3,936 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है. सरकार के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स से 2,200 से अधिक कुशल रोजगार अवसर पैदा होने की उम्मीद है.
धोलेरा में बड़ा सेमीकंडक्टर प्लांट
क्रिस्टल मैट्रिक्स (Crystal Matrix) द्वारा गुजरात के धोलेरा में एक इंटीग्रेटेड कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन और पैकेजिंग यूनिट स्थापित की जाएगी. यह यूनिट मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले पैनल बनाएगी और गैलियम नाइट्राइड (GaN) फाउंड्री सेवाएं भी प्रदान करेगी.
इस प्लांट की वार्षिक क्षमता 72,000 वर्ग मीटर डिस्प्ले पैनल और 24,000 सेट RGB GaN वेफर्स होगी. इसके उत्पाद टीवी, स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच, इन-कार डिस्प्ले और एक्सटेंडेड रियलिटी डिवाइसेज जैसे क्षेत्रों में उपयोग किए जाएंगे.
सूरत में OSAT यूनिट का निर्माण
सुची सेमीकॉन (Suchi Semicon) द्वारा सूरत में एक आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (OSAT) यूनिट स्थापित की जाएगी. यह यूनिट डिस्क्रीट सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन करेगी. इसकी सालाना उत्पादन क्षमता 1 अरब से अधिक चिप्स की होगी, जो ऑटोमोबाइल, औद्योगिक ऑटोमेशन, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स में इस्तेमाल होंगे.
सेमीकंडक्टर मिशन में बढ़ी रफ्तार
इन नई मंजूरियों के बाद भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत कुल परियोजनाओं की संख्या बढ़कर 12 हो गई है. इन सभी परियोजनाओं में कुल अनुमानित निवेश लगभग 1.64 लाख करोड़ रुपये है.
सरकार के अनुसार, इनमें से दो परियोजनाएं पहले ही व्यावसायिक उत्पादन और शिपमेंट शुरू कर चुकी हैं, जबकि दो अन्य जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है.
डिजाइन इकोसिस्टम भी मजबूत
सरकार ने बताया कि देश में सेमीकंडक्टर डिजाइन इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है. अब तक 300 से अधिक शैक्षणिक संस्थान और 100 से ज्यादा स्टार्टअप्स को डिजाइन इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट दिया जा चुका है.
आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम
सरकार का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनाना है. इन नई परियोजनाओं को इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है.
इस तिमाही में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 11% बढ़कर 82,762 करोड़ रुपये पहुंच गया. मजबूत ऑर्डर इनफ्लो और कई सेक्टर्स से मिले बड़े प्रोजेक्ट्स ने कंपनी की टॉपलाइन को सपोर्ट किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर इंजीनियरिंग सेक्टर की दिग्गज कंपनी लार्सन एंड टर्बो (L&T) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही के नतीजे जारी किए हैं, जिसमें कंपनी के मुनाफे में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि रेवेन्यू और ऑर्डर इनफ्लो में मजबूत वृद्धि देखने को मिली है.
Q4 में मुनाफे में हल्की गिरावट
जनवरी-मार्च तिमाही में L&T का समेकित शुद्ध लाभ 3% घटकर 5,326 करोड़ रुपये रहा. कंपनी ने बताया कि यह गिरावट मुख्य रूप से पिछले वर्ष हुए एक बार के असाधारण लाभ के कारण बने आधार प्रभावकी वजह से हुई है.
रेवेन्यू में 11% की बढ़ोतरी
इस तिमाही में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 11% बढ़कर 82,762 करोड़ रुपये पहुंच गया. मजबूत ऑर्डर इनफ्लो और कई सेक्टर्स से मिले बड़े प्रोजेक्ट्स ने कंपनी की टॉपलाइन को सपोर्ट किया.
वेस्ट एशिया तनाव का सीमित असर
कंपनी प्रबंधन ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का इस तिमाही पर केवल सीमित प्रभाव पड़ा है. हालांकि, आगे चलकर सप्लाई चेन और इनपुट कॉस्ट पर इसका दबाव बढ़ सकता है, जिसे लेकर कंपनी सतर्क है.
रिकॉर्ड ऑर्डर इनफ्लो और मजबूत ऑर्डर बुक
L&T ने तिमाही के दौरान 89,772 करोड़ रुपये के ऑर्डर हासिल किए, जो बिल्डिंग्स, रोड्स, अर्बन ट्रांसपोर्ट, पावर ट्रांसमिशन और हाइड्रोकार्बन जैसे क्षेत्रों से आए. कंपनी का कुल ऑर्डर बुक 31 मार्च तक 7.40 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिसमें 52% हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आया है.
डिविडेंड की घोषणा
कंपनी के बोर्ड ने 38 रुपये प्रति शेयर के फाइनल डिविडेंड की सिफारिश की है, जो शेयरधारकों की मंजूरी के बाद लागू होगा.
पूरे वित्त वर्ष का प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2025-26 में L&T का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 7% बढ़कर 16,084 करोड़ रुपये रहा, जबकि कुल राजस्व 12% बढ़कर 2.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इसी अवधि में वार्षिक ऑर्डर इनफ्लो 22% बढ़कर 4.35 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया.
सेगमेंट-वाइज प्रदर्शन
इंफ्रास्ट्रक्चर सेगमेंट ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए 26% की वृद्धि दर्ज की, जबकि एनर्जी सेगमेंट में 34% की गिरावट और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में 24% की गिरावट देखी गई. आईटी और टेक्नोलॉजी सर्विसेज सेगमेंट में 13% की बढ़त रही, वहीं फाइनेंशियल सर्विसेज सेगमेंट में 22% की वृद्धि दर्ज की गई.
आगे की रणनीति और आउटलुक
कंपनी ने कहा कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं, लेकिन भारत का डिजिटल और सर्विस सेक्टर ग्रोथ का प्रमुख इंजन बना रहेगा. इसमें फिनटेक, क्लाउड, AI-आधारित सेवाएं और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स अहम भूमिका निभाएंगे.
FY27 का अनुमान
L&T ने संकेत दिया है कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में पश्चिम एशिया तनाव का कुछ असर सप्लाई चेन और इनपुट कॉस्ट के जरिए देखने को मिल सकता है. हालांकि कंपनी ने पूरे साल के लिए 10-12% रेवेन्यू ग्रोथ और स्थिर मार्जिन का अनुमान जताया है.
इस विस्तारित कार्यक्रम के तहत 2030 तक करीब 5.5 मिलियन शिक्षार्थियों, कामगारों और MSMEs तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है. इसका उद्देश्य AI को केवल तकनीक नहीं बल्कि समावेशी विकास का साधन बनाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एशिया की सबसे बड़ी सोशल इन्वेस्टर्स नेटवर्क संस्था AVPN ने अपने AI Opportunity Fund: Asia-Pacific के विस्तार की घोषणा की है. इस नई चरण में Google.org द्वारा 10 मिलियन डॉलर (लगभग 83 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त योगदान दिया गया है, जिसका उद्देश्य शिक्षकों, युवाओं, कामगारों और MSMEs को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) स्किल्स से सक्षम बनाना है.
AI को नई बुनियादी साक्षरता बनाने की पहल
इस कार्यक्रम का फोकस अब केवल AI स्किल्स सिखाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे रोजमर्रा की पढ़ाई, कामकाज और बिजनेस में लागू करने पर होगा. AVPN का मानना है कि आने वाले समय में AI कोई स्पेशलाइज्ड स्किल नहीं बल्कि एक “बेसिक लिटरेसी” बन जाएगी, जिसे हर छात्र, शिक्षक और बिजनेस को सीखना जरूरी होगा.
शिक्षा और युवाओं पर खास जोर
नई योजना के तहत स्कूलों, कॉलेजों और ट्रेनिंग संस्थानों में AI लर्निंग को मजबूत किया जाएगा. इस पहल से पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में लगभग 4.7 मिलियन लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद है. नैना सभरवाल बत्रा ने कहा कि शिक्षक इस बदलाव की सबसे अहम कड़ी हैं, क्योंकि जब वे AI को पढ़ाई में शामिल करते हैं, तो पूरा सिस्टम धीरे-धीरे AI-रेडी बनता है. वहीं, संजय गुप्ता ने कहा कि जब शिक्षक जिम्मेदारी से AI का इस्तेमाल करते हैं, तो इसका सीधा फायदा छात्रों और पूरे शिक्षा तंत्र को मिलता है.
क्रिएटर्स और MSMEs के लिए नई स्किलिंग पहल
इस फंड के तहत क्रिएटिव इंडस्ट्री के लिए भी एक खास AI स्किलिंग प्रोग्राम शुरू किया जाएगा, जिसका पहला पायलट प्रोजेक्ट एशिया-प्रशांत क्षेत्र के किसी देश में लागू किया जाएगा. इसके अलावा छोटे और मझोले व्यवसायों (MSMEs) को AI आधारित टूल्स से दक्षता, निर्णय क्षमता और बाजार पहुंच बढ़ाने में मदद दी जाएगी. इस पहल को ASEAN क्षेत्रीय संस्थाओं के सहयोग से आगे बढ़ाया जाएगा.
वर्कफोर्स और रोजगार पर फोकस
कार्यक्रम का एक बड़ा लक्ष्य कामगारों को AI आधारित नई नौकरियों के लिए तैयार करना भी है. इसके तहत ऐसे ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किए जाएंगे जो छात्रों से लेकर नौकरीपेशा लोगों तक एक निरंतर स्किल डेवलपमेंट पाइपलाइन बनाएं. इससे कामगारों को बदलते रोजगार बाजार में बेहतर अवसर मिल सकेंगे.
नीति और क्षेत्रीय सहयोग
AVPN ने ASEAN फाउंडेशन और क्षेत्रीय शिक्षा मंत्रालयों के साथ मिलकर इस पहल को नीति स्तर पर भी मजबूत करने की योजना बनाई है. इसका लक्ष्य है कि AI ट्रेनिंग को स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढाला जाए और पूरे क्षेत्र में एक समान डिजिटल क्षमता विकसित हो.
2030 तक का लक्ष्य
इस विस्तारित कार्यक्रम के तहत 2030 तक करीब 5.5 मिलियन शिक्षार्थियों, कामगारों और MSMEs तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है. इसका उद्देश्य AI को केवल तकनीक नहीं बल्कि समावेशी विकास का साधन बनाना है.
यह पहल एशिया-प्रशांत क्षेत्र में डिजिटल बदलाव की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर AI स्किल्स को बड़े पैमाने पर अपनाया गया, तो यह आने वाले वर्षों में शिक्षा, रोजगार और छोटे व्यवसायों के लिए विकास के नए अवसर खोल सकता है.
कंपनी की ग्रोथ में ऑटो सेक्टर, खासकर एसयूवी सेगमेंट, सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा. साल के दौरान एसयूवी की बिक्री 6.6 लाख यूनिट तक पहुंच गई और बाजार हिस्सेदारी बढ़कर 25.3% हो गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मजबूत एसयूवी डिमांड, कृषि कारोबार में स्थिर प्रदर्शन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित पहलों के सहारे महिंद्रैा (Mahindra & Mahindra) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में शानदार नतीजे पेश किए हैं. कंपनी का मुनाफा और राजस्व दोनों ही मजबूत वृद्धि के साथ नई ऊंचाई पर पहुंचे, जिससे इसके शेयरों में भी तेजी देखने को मिली.
चौथी तिमाही में कंपनी का समेकित शुद्ध मुनाफा 42% बढ़कर 4,668 करोड़ रुपये हो गया. वहीं राजस्व 29% की वृद्धि के साथ 54,982 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. नतीजों के बाद बीएसई सेसेंक्स पर कंपनी के शेयर में तेजी दर्ज की गई और यह मंगलवार को 3.36 प्रतिशत की तेजी के साथ 3,210.80 रुपये पर बंद हुआ था.
पूरे साल भी मजबूत ग्रोथ
पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कंपनी का कुल राजस्व 25% बढ़कर 1,98,639 करोड़ रुपये हो गया, जबकि कर बाद लाभ (PAT) 32% बढ़कर 17,099 करोड़ रुपये रहा. यह प्रदर्शन कंपनी की मजबूत बिजनेस रणनीति और विविध पोर्टफोलियो को दर्शाता है.
वाहन कारोबार बना ग्रोथ का इंजन
कंपनी की ग्रोथ में ऑटो सेक्टर, खासकर एसयूवी सेगमेंट, सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा. साल के दौरान एसयूवी की बिक्री 6.6 लाख यूनिट तक पहुंच गई और बाजार हिस्सेदारी बढ़कर 25.3% हो गई. इससे कंपनी की लीडरशिप और मजबूत हुई.
कृषि कारोबार और मजबूत मार्जिन
कृषि उपकरण सेगमेंट ने घरेलू मांग के चलते अच्छा प्रदर्शन किया, हालांकि वैश्विक बाजारों में कुछ कमजोरी रही. ट्रैक्टर बिजनेस में मार्जिन 20.54% पर स्थिर रहा, जो इस सेगमेंट की मजबूती को दर्शाता है.
फाइनेंशियल और सर्विस बिजनेस का योगदान
कंपनी के फाइनेंशियल सर्विसेज और अन्य सेवा कारोबारों ने भी बेहतर प्रदर्शन किया. चौथी तिमाही में इस सेगमेंट का राजस्व 23% बढ़कर 12,147 करोड़ रुपये रहा, जबकि मुनाफा 64% उछलकर 1,348 करोड़ रुपये हो गया.
AI से नए अवसर
कंपनी के मैनेजमेंट के अनुसार, AI अब बिजनेस का अहम हिस्सा बन चुका है. वाहन कारोबार में AI आधारित पहल से करीब 4,100 करोड़ रुपये के अतिरिक्त राजस्व की उम्मीद है. इसके साथ ही ग्राहक संतुष्टि में सुधार और प्रोडक्ट डेवलपमेंट का समय भी घटेगा.
क्षमता विस्तार पर फोकस
कंपनी ने बढ़ती मांग को देखते हुए उत्पादन क्षमता में भी इजाफा किया है. मासिक उत्पादन क्षमता को 59,000 यूनिट से बढ़ाकर करीब 64,500 यूनिट किया गया है, जिससे भविष्य की ग्रोथ को सपोर्ट मिलेगा.
कंपनी का मानना है कि मजबूत फंडामेंटल, अनुशासित निवेश और नए टेक्नोलॉजी इनिशिएटिव्स के चलते वह अनिश्चित वैश्विक माहौल में भी ग्रोथ बनाए रखने की स्थिति में है. आने वाले समय में SUV, EV और AI आधारित इनोवेशन कंपनी की रणनीति के केंद्र में रहेंगे.
आरबीआई ने इस मसौदे पर सभी हितधारकों से 26 मई तक सुझाव आमंत्रित किए हैं. अंतिम नियम लागू होने से पहले इन सुझावों पर विचार किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कर्ज वसूली को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और एनबीएफसी के लिए नए नियमों का मसौदा जारी किया है. इस प्रस्ताव के तहत, यदि कोई कर्ज नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) बन जाता है और वसूली के अन्य सभी विकल्प विफल हो जाते हैं, तो बैंक गिरवी रखी गई अचल संपत्ति जैसे जमीन या मकान पर कब्जा कर सकते हैं. हालांकि, केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि यह कदम केवल विशेष परिस्थितियों में ही उठाया जाएगा और इसके लिए सख्त शर्तें लागू होंगी.
क्या है नया प्रस्ताव?
आरबीआई के ड्राफ्ट नियमों के मुताबिक, बैंक और एनबीएफसी डूबे हुए कर्ज की वसूली के लिए सिक्योरिटी के तौर पर रखी गई प्रॉपर्टी को अपने कब्जे में ले सकेंगे. यह कदम तब उठाया जाएगा जब कर्ज की रिकवरी के अन्य सभी रास्ते बंद हो चुके हों या असरदार साबित न हुए हों.
7 साल के भीतर बेचना होगा एसेट
प्रस्ताव में यह भी साफ किया गया है कि वित्तीय संस्थान ऐसी संपत्तियों को हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते. उन्हें अधिकतम सात साल के भीतर इन प्रॉपर्टीज को बेचकर अपनी राशि की वसूली करनी होगी. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बैंक रियल एस्टेट कारोबार में न उलझें और केवल कर्ज वसूली तक सीमित रहें.
क्या होगा फायदा?
आरबीआई के अनुसार, इस व्यवस्था से बैंकों को डूबे हुए कर्ज की बेहतर रिकवरी में मदद मिलेगी. समयबद्ध और पारदर्शी बिक्री प्रक्रिया से संस्थान अपने नुकसान को कम कर सकेंगे और वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनी रहेगी.
किन्हें नहीं बेच पाएंगे प्रॉपर्टी?
ड्राफ्ट में गड़बड़ी या हितों के टकराव को रोकने के लिए सख्त प्रावधान भी किए गए हैं. इसके तहत बैंक या एनबीएफसी ऐसी जब्त की गई प्रॉपर्टी को उसी डिफॉल्टर या उससे जुड़े किसी व्यक्ति को दोबारा नहीं बेच सकेंगे.
SNFA क्या है?
आरबीआई ने इन संपत्तियों को “स्पेसिफाइड नॉन फाइनेंशियल एसेट्स (SNFA)” की श्रेणी में रखा है. इसका मतलब उन अचल संपत्तियों से है जिन्हें कर्ज की वसूली के लिए उधारकर्ता से लेकर संस्थान अपने कब्जे में लेते हैं. इसमें अन्य गैर-वित्तीय एसेट्स भी शामिल हो सकते हैं.
26 मई तक मांगे गए सुझाव
आरबीआई ने इस मसौदे पर सभी हितधारकों से 26 मई तक सुझाव आमंत्रित किए हैं. अंतिम नियम लागू होने से पहले इन सुझावों पर विचार किया जाएगा.
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो बैंकों के लिए NPA रिकवरी का एक मजबूत विकल्प तैयार होगा. वहीं, उधार लेने वालों के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि डिफॉल्ट की स्थिति में गिरवी रखी गई संपत्ति पर कब्जा संभव है, जिससे क्रेडिट अनुशासन को बढ़ावा मिल सकता है.
मंगलवार को सेंसेक्स 252 अंक यानी 0.33% गिरकर 77,017.79 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50 86.50 अंक (0.36%) टूटकर 24,032.80 के स्तर पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कमजोर होते रुपये और सेक्टोरल दबाव के बीच कल भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का माहौल बना हुआ है. एक ओर सेंसेक्स और निफ्टी 50 गिरावट के साथ बंद हुए, वहीं दूसरी ओर ग्लोबल बाजारों की मजबूती और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आज के कारोबार के लिए राहत के संकेत दे रही है. ऐसे में आज निवेशकों के लिए बाजार की दिशा अब वैश्विक घटनाक्रम, क्रूड ऑयल की चाल और चुनिंदा शेयरों में आ रहे एक्शन पर निर्भर करेगी.
मंगलवार को कारोबार के अंत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE Sensex) 252 अंक यानी 0.33% गिरकर 77,017.79 पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (Nifty 50) 86.50 अंक (0.36%) टूटकर 24,032.80 के स्तर पर आ गया. दिन के दौरान सेंसेक्स में 600 अंकों से अधिक की गिरावट भी देखने को मिली.
रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर
कमजोर बाजार सेंटीमेंट के बीच भारतीय मुद्रा पर भी दबाव रहा. रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.2% गिरकर 95.28 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ, जो निवेशकों की बढ़ती चिंता को दर्शाता है.
किन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट?
सेंसेक्स के 30 में से 20 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. प्रमुख गिरने वाले शेयरों में ICICI Bank सबसे ज्यादा 1.54% लुढ़का. इसके अलावा Tech Mahindra, Axis Bank, Maruti Suzuki, Adani Ports, State Bank of India और Tata Steel में भी गिरावट रही. दूसरी ओर कुछ शेयरों ने बाजार को सहारा देने की कोशिश की, जिनमें Infosys, Reliance Industries, Hindustan Unilever और Titan Company शामिल रहे.
सेक्टरवार प्रदर्शन
सेक्टोरल स्तर पर दबाव साफ दिखा. बैंकिंग, रियल्टी और ऑयल एंड गैस शेयरों में गिरावट रही. वहीं ऑटो और एफएमसीजी सेक्टर में कुछ मजबूती देखने को मिली, जिसने गिरावट को सीमित रखने में मदद की. मुख्य सूचकांकों के विपरीत, ब्रॉडर मार्केट में सीमित तेजी रही. मिडकैप इंडेक्स में 0.17% और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.28% की बढ़त दर्ज की गई, जो चुनिंदा शेयरों में खरीदारी का संकेत है.
भू-राजनीतिक तनाव बना बड़ी चिंता
पश्चिम एशिया में तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. स्ट्रेट ऑफ हार्मुज के पास अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की खबरों ने बाजार पर दबाव बनाया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कार्गो जहाजों पर हमले और सैन्य गतिविधियों ने हालात को और गंभीर बना दिया है. इस बीच, अमेरिका के राषट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिकी जहाजों पर किसी भी हमले का सख्त जवाब दिया जाएगा.
विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक वैश्विक स्तर पर तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है. निवेशकों को फिलहाल सतर्क रहने और चुनिंदा सेक्टरों में ही निवेश की सलाह दी जा रही है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज यानी 6 मई 2026 को भारतीय शेयर बाजार में मजबूत शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं, क्योंकि वैश्विक बाजारों की तेजी और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से निवेशकों का सेंटीमेंट बेहतर हुआ है; GIFT Nifty करीब 204 अंकों की बढ़त के साथ 24,310 के आसपास कारोबार करता दिखा, जिससे Nifty 50 के हरे निशान में खुलने की उम्मीद है. इस बीच Brent Crude और WTI Crude में गिरावट से महंगाई को लेकर चिंता कुछ कम हुई है. स्टॉक्स इन फोकस में Larsen & Toubro (मुनाफा हल्का घटा), Hero MotoCorp (मजबूत Q4), Biocon (लीडरशिप बदलाव), Grasim Industries (NCLAT से राहत), Poonawalla Fincorp (मुनाफा 4 गुना), Vedanta (विस्तार योजना), Emcure Pharmaceuticals, Zen Technologies, KEC International और Lemon Tree Hotels जैसे शेयर शामिल हैं, जबकि आज One 97 Communications, Bajaj Auto, Polycab India, Godrej Consumer Products और PB Fintech समेत कई कंपनियों के Q4 नतीजों पर भी बाजार की नजर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)