यह लॉन्च भारत में डिजिटल पेमेंट सिस्टम को OTP आधारित प्रक्रिया से आगे ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. यह पहल सुरक्षित, तेज और आधुनिक भुगतान प्रणाली की ओर देश के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को मजबूत करती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
फ्लिपकार्ट (Flipkart), एक्सिस बैंक (Axis Bank) और पेयू (PayU) ने मिलकर भारत में कार्ड पेमेंट्स के लिए बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन सिस्टम लॉन्च किया है. यह पहल डिजिटल भुगतान को अधिक सुरक्षित, तेज और आसान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
बायोमेट्रिक से अब बिना OTP के पेमेंट
इस नई सुविधा के तहत ग्राहक अब अपने डेबिट या क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन को फेस आईडी या फिंगरप्रिंट के जरिए अप्रूव कर सकते हैं. इससे OTP (वन टाइम पासवर्ड) की जरूरत खत्म हो जाएगी और ट्रांजैक्शन में होने वाली देरी और फेलियर कम होंगे. यह सुविधा सबसे पहले एक्सिस बैंक कार्डधारकों के लिए उपलब्ध कराई गई है.
सुरक्षा और फ्रॉड प्रोटेक्शन में बड़ा सुधार
यह बायोमेट्रिक सिस्टम डिवाइस बाइंडिंग और एडवांस सिक्योरिटी चेक्स पर आधारित है, जिससे SIM स्वैप और OTP फ्रॉड जैसे जोखिम कम होंगे. यह तकनीक स्मार्टफोन यूजर्स के लिए पहले से परिचित फेस आईडी और फिंगरप्रिंट सिस्टम का उपयोग करती है, जिससे भुगतान प्रक्रिया और आसान हो जाती है.
डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में सहयोग
इस साझेदारी के तहत PayU मर्चेंट साइड इंफ्रास्ट्रक्चर और सिक्योरिटी फ्लो मैनेज करेगा, Wibmo (PayU की कंपनी) issuer साइड पर बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन सपोर्ट करेगी और Flipkart इस फीचर को अपने प्लेटफॉर्म पर लागू कर रहा है.
भारत में बढ़ते डिजिटल फ्रॉड पर समाधान
रिपोर्ट्स के अनुसार FY 2024 में डिजिटल पेमेंट फ्रॉड ₹1,400 करोड़ से अधिक पहुंच गया था. ऐसे में भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी 2025 में बायोमेट्रिक और रिस्क-बेस्ड ऑथेंटिकेशन को बढ़ावा देने की सिफारिश की थी. यह नया सिस्टम RBI के दिशानिर्देशों के अनुरूप है और डिजिटल भुगतान को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद करेगा.
फ्लिपकार्ट पेमेंट एंड सुपरकॉइन्स के वाइस प्रेजिडेंट गौरव अरोड़ा ने कहा कि कंपनी का फोकस कंज्यूमर ट्रस्ट और सेफ्टी पर है. उन्होंने कहा कि बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन से भुगतान अनुभव तेज, आसान और अधिक सुरक्षित होगा.
एक्सिस पेमेंट एंड वेल्थ मैनेजमेंट की प्रेजिडेंट और हेड अर्निका दीक्षित ने कहा कि ग्राहक अब सरल और सुरक्षित भुगतान अनुभव की उम्मीद करते हैं. बायोमेट्रिक सिस्टम एक “वन-टच सिक्योर अप्रूवल” अनुभव देता है, जिससे डिजिटल पेमेंट्स और बेहतर बनते हैं.
पेयू पेमेंट्स के चीफ बिजनेस ऑफिसर हेमांग दत्तानी ने कहा कि OTP आधारित सिस्टम में मौजूद जटिलताओं को दूर करना जरूरी था. बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन से भुगतान प्रक्रिया तेज, सुरक्षित और फ्रिक्शन-फ्री बनेगी.
यह अधिग्रहण भारत में पेस्ट कंट्रोल सेवाओं के क्षेत्र में नवाचार, डिजिटल तकनीक और वैश्विक मानकों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अग्रणी पेस्ट कंट्रोल और हाइजीन सेवा प्रदाता कंपनी रेंटोकिल पीसीआई (Rentokil PCI) ने आज पेकॉप पेस्ट कंट्रोल सर्विसेज (Pecopp Pest Control Services Pvt Ltd) के सफल अधिग्रहण की घोषणा की है. यह अधिग्रहण विशेष रूप से पश्चिमी भारत में ग्राहकों को बेहतर सेवाएं प्रदान करने की क्षमता को मजबूत करेगा और पेस्ट मैनेजमेंट उद्योग में नए मानक स्थापित करने की कंपनी की प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ करेगा.
रणनीतिक विस्तार और सेवा क्षमता में वृद्धि
इस अधिग्रहण के तहत पेकॉप का ग्राहक पोर्टफोलियो, अनुभवी कार्यबल और परिचालन संपत्तियां अब रेंटोकिल पीसीआई नेटवर्क का हिस्सा बन जाएंगी. यह विलय दो ऐसी संस्थाओं को एक साथ लाता है जो नवाचार, उत्कृष्ट सेवा और सतत विकास के साझा दृष्टिकोण से प्रेरित हैं.
मजबूत स्थानीय विरासत और वैश्विक संसाधनों का मेल
मुंबई में स्थापित पेकॉप ने पिछले कई दशकों में एक मजबूत प्रतिष्ठा बनाई है. कंपनी ने प्रोफेशनल सर्विसेज, लक्ज़री हॉस्पिटैलिटी और प्रीमियम एंटरटेनमेंट जैसे क्षेत्रों में प्रतिष्ठित ग्राहकों को सेवाएं दी हैं. अब रेंटोकिल पीसीआई के साथ जुड़ने के बाद पेकॉप को वैश्विक संसाधनों, उन्नत रिसर्च एंड डेवलपमेंट और विस्तृत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ मिलेगा, जिससे उसकी सेवा गुणवत्ता और भी बेहतर होगी.
रेंटोकिल पीसीआई के मैनेजिंग डायरेक्टर डेविड लुईस ने कहा कि पेकॉप को रेंटोकिल पीसीआई परिवार में शामिल करना भारत में सेवा गुणवत्ता को नए स्तर पर ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. उन्होंने कहा कि यह साझेदारी ग्राहकों को विश्व स्तरीय, टेक्नोलॉजी-आधारित समाधान प्रदान करेगी.
पेकॉप के मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ बलवानी ने कहा कि पेकॉप की स्थानीय विशेषज्ञता और रेंटोकिल पीसीआई की वैश्विक नेतृत्व क्षमता मिलकर ग्राहकों को अत्याधुनिक समाधान प्रदान करेगी. उन्होंने इसे कंपनी की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया.
डिजिटल नवाचार और ग्राहक-केंद्रित रणनीति
यह अधिग्रहण रेंटोकिल पीसीआई की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है जिसमें वह उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएं देने के लिए डिजिटल रणनीतियों और ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है. कंपनी का फोकस सेवा मानकों को लगातार बेहतर बनाने पर है.
बैंक के एमडी और सीईओ स्वरूप साहा ने बताया कि बोर्ड ने ₹3000 करोड़ तक पूंजी जुटाने को मंजूरी दे दी है. इसके लिए मर्चेंट बैंकर की नियुक्ति भी कर दी गई है और जल्द ही निवेशकों के साथ बातचीत शुरू होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सार्वजनिक क्षेत्र के पंजाब एंड सिंध बैंक (Punjab & Sind Bank) ने पूंजी आधार मजबूत करने और सरकार की हिस्सेदारी घटाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. बैंक ने ₹3000 करोड़ तक इक्विटी पूंजी जुटाने के लिए योग्य संस्थागत प्लेसमेंट (QIP) की तैयारी शुरू कर दी है. इसके साथ ही बैंक ने चालू वित्त वर्ष में शुद्ध ब्याज मार्जिन (NIM) सुधारने, आंतरिक आईटी सिस्टम मजबूत करने और वेंडर जोखिम कम करने पर भी जोर दिया है.
QIP के जरिए पूंजी जुटाने की तैयारी
बैंक के एमडी और सीईओ स्वरूप साहा ने बताया कि बोर्ड ने ₹3000 करोड़ तक पूंजी जुटाने को मंजूरी दे दी है. इसके लिए मर्चेंट बैंकर की नियुक्ति भी कर दी गई है और जल्द ही निवेशकों के साथ बातचीत शुरू होगी. उन्होंने कहा कि पूंजी जुटाने की समयसीमा बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी. यह फंड जुटाव QIP के माध्यम से किया जाएगा.
सरकार की हिस्सेदारी घटाने की रणनीति
फिलहाल बैंक में सरकार की हिस्सेदारी 93.85 प्रतिशत है, जिसे काफी ऊंचा माना जाता है. बैंक प्रबंधन के अनुसार पिछले वर्ष हिस्सेदारी में करीब 3 से 3.5 प्रतिशत की कमी लाई गई थी. अब QIP के साथ-साथ सरकार द्वारा संभावित ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए भी हिस्सेदारी घटाने की योजना पर काम किया जा सकता है. इससे बैंक में पब्लिक शेयरहोल्डिंग बढ़ेगी.
NIM में सुधार की उम्मीद
बैंक ने माना कि वित्त वर्ष 2026 में शुद्ध ब्याज मार्जिन दबाव में रहा. इसकी एक बड़ी वजह बैंक का कम CASA बेस और ब्याज दरों में बदलाव रहा. प्रबंधन का कहना है कि बैंक की करीब 50 प्रतिशत लोन बुक बाहरी बेंचमार्क से जुड़ी है. इसके बावजूद चालू वित्त वर्ष मार्च 2027 तक NIM बढ़कर 2.65 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है.
रिकॉर्ड मुनाफे के बाद बढ़ा डिविडेंड
बैंक ने प्रति शेयर 39 पैसे का लाभांश घोषित किया है, जो हाल के वर्षों में बेहतर स्तर माना जा रहा है. प्रबंधन के अनुसार बैंक की कुल पूंजी पर्याप्तता अनुपात 17 प्रतिशत से अधिक है, इसलिए शेयरधारकों को बेहतर रिटर्न देना संभव हुआ. बैंक ने बताया कि वित्त वर्ष 2027 में ₹1,322 करोड़ का शुद्ध लाभ दर्ज किया गया, जो बैंक के इतिहास में अब तक का सबसे अधिक मुनाफा है.
साइबर जोखिम कम करने पर बोर्ड का फोकस
तेजी से बढ़ते डिजिटल बैंकिंग माहौल के बीच बैंक ने साइबर सुरक्षा और आईटी ढांचे को मजबूत करने का फैसला किया है. बोर्ड स्तर पर वेंडर जोखिम प्रबंधन के लिए रणनीतिक रोडमैप तैयार किया गया है.
बैंक का लक्ष्य बाहरी विक्रेताओं पर निर्भरता कम कर आंतरिक तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करना है. हालांकि प्रबंधन ने माना कि वेंडर पर निर्भरता पूरी तरह खत्म करना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन इसे सीमित किया जाएगा.
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब ईरान से जुड़े जियो-पॉलिटिकल तनाव तेजी से बढ़ रहे हैं. UAE, OPEC+ समूह का चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश रहा है, जिसमें रूस जैसे सहयोगी देश भी शामिल हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ईरान के साथ बढ़ते तनाव और होरमुज़ जलडमरूमध्य में संकट के बीच वैश्विक तेल बाजार को बड़ा झटका लगा है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 1 मई 2026 से OPEC और OPEC+ गठबंधन से बाहर होने का ऐलान कर दिया है. इस फैसले से पहले ही दबाव में चल रहे ग्लोबल एनर्जी मार्केट में नई अनिश्चितता पैदा हो गई है.
OPEC को बड़ा झटका
तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC को मंगलवार को उस समय बड़ा झटका लगा जब UAE ने संगठन से अलग होने का फैसला किया. यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब ईरान से जुड़े जियो-पॉलिटिकल तनाव तेजी से बढ़ रहे हैं. UAE, OPEC+ समूह का चौथा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश रहा है, जिसमें रूस जैसे सहयोगी देश भी शामिल हैं. यह गठबंधन पहले वैश्विक तेल उत्पादन का करीब आधा हिस्सा नियंत्रित करता था.
ऊर्जा रणनीति के तहत लिया गया फैसला
UAE के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल मजुरी ने बताया कि यह फैसला देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति और उत्पादन लक्ष्यों की समीक्षा के बाद लिया गया है. उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से एक नीतिगत निर्णय है, जिसे मौजूदा और भविष्य की उत्पादन नीतियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है.
हार्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा जोखिम
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब स्ट्रेट ऑफ हार्मुज (Strait of Hormuz) में लगातार तनाव बना हुआ है. यह दुनिया का एक अहम समुद्री मार्ग है, जहां से करीब 20% वैश्विक कच्चे तेल और LNG की सप्लाई गुजरती है. ईरान की ओर से जहाजों पर हमलों और धमकियों के कारण खाड़ी देशों के लिए तेल निर्यात करना मुश्किल हो गया है, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है.
बाजार पर असर और तेल की कीमतें
UAE के इस फैसले के बाद तेल कीमतों में शुरुआती बढ़त कुछ कम हुई, लेकिन सप्लाई को लेकर चिंता के चलते ब्रेंट क्रूड अब भी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि असली चिंता OPEC से बाहर निकलना नहीं, बल्कि हार्मुज जलडमरूमध्य में जारी बाधाएं हैं, जो सप्लाई को प्रभावित कर रही हैं.
OPEC+ की पकड़ कमजोर
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, वैश्विक तेल उत्पादन में OPEC+ की हिस्सेदारी फरवरी के करीब 48% से घटकर मार्च में 44% रह गई है. आने वाले समय में यह और कम हो सकती है क्योंकि सप्लाई बाधाएं बढ़ रही हैं.
खाड़ी देशों में बढ़ते मतभेद
UAE का यह कदम खाड़ी देशों के बीच बढ़ती दरार को भी दर्शाता है. ईरान के साथ जारी संघर्ष ने क्षेत्रीय स्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति दोनों को प्रभावित किया है.
अमेरिका से बढ़ती नजदीकी
इस फैसले को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के लिए कूटनीतिक बढ़त के रूप में भी देखा जा रहा है, जो लंबे समय से OPEC की ऊंची तेल कीमतों की नीति की आलोचना करते रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में UAE ने अमेरिका और इजराइल के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं, खासकर 2020 के अब्राहम समझौते के बाद.
विश्लेषकों का मानना है कि OPEC से बाहर होकर UAE अपने सस्ते तेल भंडार से अधिकतम उत्पादन कर सकता है. ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर अतिरिक्त उत्पादन क्षमता सीमित है, यह कदम UAE को रणनीतिक बढ़त दे सकता है. कुल मिलाकर, यह फैसला न सिर्फ OPEC के लिए झटका है, बल्कि वैश्विक तेल बाजार और जियो-पॉलिटिकल समीकरणों को भी नए सिरे से बदल सकता है.
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2025 में IIP ग्रोथ 3.9% थी, जो इस साल बढ़कर 4.1% हो गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया के तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था से राहत देने वाली खबर आई है. मार्च 2026 में देश का औद्योगिक उत्पादन (IIP) बढ़कर 4.1% पर पहुंच गया है, जिसे मैन्युफैक्चरिंग और माइनिंग सेक्टर की मजबूत प्रदर्शन से सहारा मिला. हालांकि यह ग्रोथ पांच महीने के निचले स्तर पर है, लेकिन पिछले साल के मुकाबले सुधार निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए सकारात्मक संकेत दे रहा है.
इंडस्ट्रियल ग्रोथ में सुधार, लेकिन रफ्तार सीमित
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2025 में IIP ग्रोथ 3.9% थी, जो इस साल बढ़कर 4.1% हो गई. हालांकि, यह पिछले पांच महीनों का सबसे निचला स्तर भी है, जिससे संकेत मिलता है कि ग्रोथ बनी हुई है लेकिन रफ्तार अभी स्थिर नहीं है. वहीं, फरवरी 2026 के आंकड़ों में भी हल्का संशोधन किया गया है, जहां पहले अनुमानित 5.2% की ग्रोथ को घटाकर 5.1% कर दिया गया.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बना ग्रोथ का आधार
मार्च 2026 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने 4.3% की ग्रोथ दर्ज की, जो पिछले साल के 4% से थोड़ी बेहतर है. खास बात यह रही कि 23 में से 14 उद्योग समूहों ने सकारात्मक वृद्धि दिखाई.
इनमें सबसे ज्यादा योगदान देने वाले सेक्टर रहे:
1. मूल धातुओं का निर्माण: 8.6%
2. मोटर व्हीकल्स, ट्रेलर और सेमी-ट्रेलर: 18.1%
3. मशीनरी और उपकरण: 11.2%
स्टील और धातु से जुड़े उत्पादों जैसे MS स्लैब, अलॉय स्टील और HR कॉइल्स ने इस ग्रोथ को मजबूत आधार दिया.
माइनिंग में जबरदस्त उछाल, बिजली सेक्टर सुस्त
माइनिंग सेक्टर ने इस बार सबसे ज्यादा चौंकाया और 5.5% की मजबूत ग्रोथ दर्ज की, जो पिछले साल 1.2% थी. वहीं, बिजली उत्पादन में सिर्फ 0.8% की मामूली बढ़त दर्ज हुई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 7.5% की दर से बढ़ा था. इससे साफ है कि पावर सेक्टर की सुस्ती कुल ग्रोथ को सीमित कर रही है.
कैपिटल गुड्स और इंफ्रा में मजबूती
यूजेस-बेस्ड क्लासिफिकेशन के अनुसार, कैपिटल गुड्स में 14.6% की मजबूत ग्रोथ दर्ज की गई, जो निवेश गतिविधियों में तेजी का संकेत है. इसके अलावा बेसिक इंफ्रा और कंस्ट्रक्शन मटीरियल्स 6.7%, इंटरमिडिएट गुड्स 3.3%, कंज्यूमर गुड्स 5.3% और कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स में 1.1% की ग्रोथ दर्ज हुई. ये आंकड़े बताते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश से जुड़े सेक्टर अर्थव्यवस्था को सपोर्ट दे रहे हैं, जबकि उपभोक्ता मांग अभी मिश्रित बनी हुई है.
पूरे वित्त वर्ष में स्थिर रही ग्रोथ
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान औद्योगिक उत्पादन वृद्धि लगभग स्थिर रही और 4.1% पर बनी रही, जो पिछले वित्त वर्ष के 4% के करीब है. विशेषज्ञों के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग और कैपिटल गुड्स में मजबूती भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है. हालांकि, बिजली सेक्टर की धीमी रफ्तार और वैश्विक अनिश्चितताएं आगे की ग्रोथ पर असर डाल सकती हैं. कुल मिलाकर, मौजूदा आंकड़े यह बताते हैं कि चुनौतियों के बावजूद भारत की औद्योगिक गतिविधियों में स्थिरता बनी हुई है और ग्रोथ का आधार मजबूत हो रहा है.
मंगलवार को BSE सेंसेक्स 416.72 अंक गिरकर 76,886.91 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, NSE निफ्टी 50 भी 97 अंक गिरावट के साथ 23,995.70 पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में एक दिन की तेजी के बाद मंगलवार को फिर दबाव देखने को मिला. पश्चिम एशिया में जारी तनाव के जल्द खत्म होने की उम्मीद कमजोर पड़ती दिख रही है, जिसका असर निवेशकों के भरोसे पर पड़ा है. इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है. नतीजतन, प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए और निवेशकों की सतर्कता साफ नजर आई. चलिए जानते हैं आज क्या माहौल रहने वाला है.
सेंसेक्स और निफ्टी दोनों फिसले
मंगलवार के कारोबारी सत्र में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 416.72 अंक यानी 0.54% गिरकर 76,886.91 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 भी 97 अंक यानी 0.4% की गिरावट के साथ 23,995.70 पर आ गया और 24,000 के अहम स्तर से नीचे फिसल गया. इससे पहले सोमवार को बाजार में तेजी देखी गई थी, लेकिन यह रफ्तार बरकरार नहीं रह सकी.
गिरावट की वजह: ग्लोबल संकेत और कच्चा तेल
विश्लेषकों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है. भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए महंगा कच्चा तेल महंगाई और चालू खाता घाटे की चिंता बढ़ाता है, जिससे इक्विटी बाजारों पर दबाव बनता है.
किन शेयरों ने गिराया बाजार?
सेंसेक्स के 30 में से 19 शेयर लाल निशान में बंद हुए. ऑटो सेक्टर में कमजोरी देखने को मिली, जहां मारुति सुजुकी के शेयर में 2.61% की गिरावट दर्ज की गई. कंपनी के मार्च तिमाही नतीजों में स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट में करीब 7% की गिरावट सामने आई, जिससे निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ. इसके अलावा बैंकिंग, आईटी और FMCG सेक्टर के कुछ बड़े शेयरों में भी बिकवाली देखने को मिली. एक्सिस बैंक, इंडिगो, एचसीएल टेक और हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसे दिग्गज शेयरों में 2% से अधिक की गिरावट रही. हालांकि, रिलायंस इंडस्ट्रीज में हल्की तेजी ने बाजार को कुछ हद तक सहारा दिया.
आज फोकस में रहने वाले शेयर
आज के कारोबार में कई कंपनियां अपने तिमाही नतीजों, डिविडेंड घोषणाओं और नए ऑर्डर के चलते चर्चा में रहेंगी. दरअसल, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स ने मजबूत नतीजे पेश किए और मुनाफे में 24% की बढ़त दर्ज की, जबकि बंधन बैंक ने 68% की शानदार प्रॉफिट ग्रोथ दिखाई. इसके उलट, REC का प्रदर्शन कमजोर रहा और मुनाफे में गिरावट आई. CEAT ने दमदार नतीजों के साथ निवेशकों को चौंकाया, वहीं स्टार हेल्थ ने भी मुनाफे में तेज उछाल दर्ज किया. AWL एग्री, गो डिजिट इंश्योरेंस और सनोफी कंज्यूमर हेल्थकेयर ने भी सकारात्मक प्रदर्शन किया. दूसरी ओर, ओरिएंट सीमेंट और मदरसन सूमी के नतीजे मिले-जुले रहे. इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में RVNL को नया ऑर्डर मिला, जबकि BHEL ने गैस टर्बाइन टेक्नोलॉजी से जुड़ा अहम समझौता किया.
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की चाल और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर फैसलों पर निर्भर करेगी. निवेशकों को फिलहाल सतर्क रहने और चुनिंदा शेयरों में ही निवेश की रणनीति अपनाने की सलाह दी जा रही है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
रिपोर्ट के अनुसार, आधार, जन धन खातों, मोबाइल कनेक्टिविटी और UPI पर आधारित भारत के DPI के पहले चरण ने यह दिखाया कि साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म किस तरह दशकों की प्रगति को कुछ ही वर्षों में संभव बना सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में समावेशी आर्थिक विकास को गति देने के लिए तैयार की गई एक नई रिपोर्ट में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के अगले चरण के लिए विकेंद्रीकृत और राज्य-नेतृत्व वाली रणनीति अपनाने की सिफारिश की गई है. vनीति फ्रंटियर टेक हब (Niti Frontier Tech Hub) द्वारा तैयार इस रोडमैप में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) और कृषि क्षेत्र पर शुरुआती फोकस रखते हुए तेज़ और व्यापक आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है.
पहले चरण की सफलता ने बनाई मजबूत नींव
रिपोर्ट के अनुसार, आधार, जन धन खातों, मोबाइल कनेक्टिविटी और UPI पर आधारित भारत के DPI के पहले चरण ने यह दिखाया कि साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म किस तरह दशकों की प्रगति को कुछ ही वर्षों में संभव बना सकते हैं. अनुमान है कि 2022 में DPI का योगदान जीडीपी में लगभग 0.9% था, जो 2030 तक बढ़कर 4.2% तक पहुंच सकता है, यदि अगले चरण को तेजी और बेहतर समन्वय के साथ लागू किया जाए.
DPI 2.0: राज्यों की होगी मुख्य भूमिका
रिपोर्ट की पहली प्रमुख सिफारिश यह है कि DPI 2.0 को मुख्य रूप से राज्यों द्वारा संचालित किया जाए, जबकि केंद्र सरकार और NITI Aayog सहयोगी और मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं. राज्य स्तर पर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार नीति में लचीलापन, प्रशासनिक नियंत्रण और नवाचार को बढ़ावा देकर तेज़ और प्रभावी बदलाव संभव हो सकता है.
दो-वर्षीय परिवर्तन चक्र से मिलेगा गति
दूसरी सिफारिश में दो-वर्षीय सहयोगात्मक और चरणबद्ध (iterative) चक्र अपनाने की बात कही गई है. रिपोर्ट बताती है कि DPI की समझ अभी सभी विभागों और राज्यों में समान नहीं है, इसलिए शुरुआती चरण में प्रयोग, मॉडल तैयार करना और क्षमता निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए. इससे “सफल उदाहरण” (exemplar pathways) तैयार होंगे, जिन्हें बाद में अन्य राज्य अपना सकेंगे.
MSME और कृषि पर विशेष ध्यान
2026–27 के पहले चक्र में MSME और कृषि क्षेत्रों में तीन प्रमुख परिवर्तन लाने की सिफारिश की गई है. ये क्षेत्र उच्च लेनदेन लागत, सीमित बाजार पहुंच, उत्पादकता की कमी और भरोसे की समस्याओं जैसी संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रहे हैं.
1. MSME के लिए: बाजार, ऋण, कुशल श्रम और सरकारी सेवाओं तक आसान पहुंच
2. कृषि के लिए: सूचना असमानता कम करना, सप्लाई चेन की पारदर्शिता बढ़ाना और किसानों, खरीदारों व सेवा प्रदाताओं के बीच भरोसेमंद डेटा साझा करना
‘चैंपियन’ राज्यों में पायलट परियोजनाएं
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि पहले वर्ष में छह “चैंपियन” राज्य या केंद्र शासित प्रदेश पायलट प्रोजेक्ट शुरू करें. दूसरे वर्ष में, सफल मॉडल के आधार पर कम से कम पांच अन्य राज्यों में विस्तार किया जाए. इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology) और नीति आयोग (NITI Aayog) द्वारा विशेषज्ञ समूह और वैश्विक साझेदारियों के साथ एक संस्थागत ढांचा बनाने की भी सिफारिश की गई है.
वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत
रिपोर्ट की चौथी सिफारिश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका को मजबूत करने पर केंद्रित है. इसके तहत 2027 तक एक स्वतंत्र, वैश्विक संस्था बनाने का प्रस्ताव है, जो DPI और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देगी. यह संस्था भारत को वैश्विक DPI समुदाय का नेतृत्वकर्ता बना सकती है.
संरचनात्मक बाधाओं को हटाने पर जोर
रिपोर्ट में “क्रॉस-सेक्टर स्ट्रैटेजिक अनलॉक्स” पर भी जोर दिया गया है, जिनमें शामिल हैं:
- कम लागत और भरोसेमंद डेटा सत्यापन
- खुले नेटवर्क के माध्यम से डिजिटल लेनदेन का विस्तार
- डेटा साइलो, उच्च लागत और इंटरऑपरेबिलिटी की समस्याओं का समाधान
इन सुधारों से विभिन्न उद्योगों में व्यापक सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है, जैसा पहले आधार, जन धन और UPI के संयोजन से हुआ था.
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यदि भारत DPI के अगले चरण को सही रणनीति और सहयोग के साथ लागू करता है, तो MSME और कृषि जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बड़ा बदलाव संभव है.
विकेंद्रीकरण, प्रयोग और वैश्विक सहयोग पर आधारित यह मॉडल भारत को “विक्सित भारत 2047” के लक्ष्य के करीब ले जा सकता है.
कैसे एक आदमी जिसने कभी ठाणे की सड़कों पर पाव भाजी बेची और ऑटो रिक्शा चलाया, अब उसने एक रियल-एस्टेट-राजनीतिक मशीन खड़ी कर दी. कैसे एक खौफनाक एनकाउंटर-युग की सत्ता संरचना ने उस उभार को आकार दिया और कैसे यह परिवार अब रेडिसन जैसे वैश्विक होटल चेन के साथ टाई-अप करके मुंबई के बाहरी उपनगरों में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो केवल महाराष्ट्र ही पैदा कर सकता है. ऐसी कहानियाँ जिनमें एक आदमी सड़क अर्थव्यवस्था की धूल और शोर में शुरुआत करता है. ड्राइवरों, फेरीवालों, मजदूरों और स्थानीय दबंगों के बीच जीने की लय सीखता है और फिर दशकों बाद सफेद कुर्ता. सुरक्षा काफिला और मंत्री कार्यालय के साथ फिर से सामने आता है. ऐसी कहानियाँ जिनमें राजनीति, निर्माण, वफादारी, डर और अवसर अलग-अलग अध्याय नहीं बल्कि एक ही कथानक के हिस्से होते हैं. प्रताप सरनाइक का उभार इसी परंपरा से मजबूती से जुड़ा है. सड़क किनारे पाव भाजी स्टॉल की आय पर जीवित रहने से लेकर ऑटो रिक्शा तक और वैश्विक फाइव-स्टार होटल चेन के साथ टाई-अप करने तक, सरनाइक परिवार ने लंबा सफर तय किया है. उनके 2024 के चुनावी हलफनामे के आधार पर, शिवसेना विधायक प्रताप सरनाइक की कुल संपत्ति लगभग ₹133 करोड़ है. जो लगभग ₹333 करोड़ की कुल संपत्ति और ₹199 करोड़ की देनदारियों से गणना की गई है. उनकी संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई. रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले पांच वर्षों में ₹128 करोड़ से अधिक की बढ़ोतरी हुई है. BW न्यूज मेकर्स की इस पृष्ठभूमि को ट्रेस करता है.
टावरों से पहले, चुनावी जीतों से पहले, सुर्खियों और जांचों से पहले, मुंबई-ठाणे बेल्ट की रोजमर्रा की भागदौड़ थी. सरनाइक के शुरुआती वर्षों को लंबे समय से एक संघर्षकर्ता की यात्रा के रूप में बताया गया है: एक साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आया एक युवा. जिसने उस समय शहर की ओर रुख किया जब मुंबई लाखों प्रवासियों को अपने में समा रही थी और केवल उन्हीं को पुरस्कृत कर रही थी जो दूसरों से ज्यादा मेहनत करने को तैयार थे. उन्होंने डोंबिवली में पढ़ाई की. जल्दी ही स्थानीय नेटवर्क में प्रवेश किया और ऐसे काम किए जो उन्हें सीधे शहर की धड़कन में ले गए. उन्होंने ऑटो रिक्शा चलाया, उन्होंने अगरबत्ती बेची, उन्हें इस रूप में भी याद किया जाता है कि उन्होंने फुटपाथ पर एक फूड कार्ट चलाया, जहाँ वे सुबह और देर रात के घंटों में मजदूरों और राहगीरों को पाव भाजी परोसते थे. जब औपचारिक मुंबई सोती थी और असली मुंबई चलती रहती थी.
जीवनी का यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महाराष्ट्र में जो नेता सड़क से उठकर आते हैं. उन्हें उन लोगों पर बढ़त मिलती है जो ड्राइंग रूम से शुरुआत करते हैं. वे समझते हैं कि मोहल्ले कैसे काम करते हैं. गुस्सा कैसे फैलता है. संरक्षण कैसे बांटा जाता है. स्थानीय विवाद कैसे राजनीतिक संपत्ति बन जाते हैं. कैसे एक एहसान दस साल की वफादारी पैदा कर सकता है, जो लोग इस तरह ऊपर आते हैं. वे केवल निर्वाचन क्षेत्रों में अभियान नहीं चलाते; वे उनमें रहते हैं.
1980 के दशक के अंत तक. सरनाइक को वह क्षेत्र मिल गया जिसने मुंबई के आसपास कई महत्वाकांक्षी लोगों को बदल दिया: रियल एस्टेट. 1989 में उन्होंने विहंग ग्रुप की स्थापना की. उस समय ठाणे में प्रवेश किया जब शहर औद्योगिक किनारे से एक महत्वाकांक्षी आवासीय क्षेत्र में अपने लंबे परिवर्तन की शुरुआत कर रहा था. मुंबई के मध्यम वर्ग को जगह चाहिए थी. जमीन की कीमतें बढ़ने लगी थीं. ऐसे बिल्डर जो नगरपालिका प्रणाली और राजनीतिक समीकरण दोनों को समझते थे. उन्हें भारी लाभ होने वाला था.
सरनाइक इस अवसर को देखने वाले पहले व्यक्ति नहीं थे. लेकिन वे उन लोगों में थे जिन्होंने इसे पकड़ने के लिए पर्याप्त आक्रामक कदम उठाए. आवासीय और वाणिज्यिक परियोजनाएँ बढ़ीं. विहंग गार्डन. विहंग रेजिडेंसी और बाद में ब्रांडेड विकासों की एक श्रृंखला जैसे नामों ने परिवार को ठाणे प्रॉपर्टी बाजार में एक स्थायी ताकत के रूप में स्थापित करने में मदद की. जो बात उन्होंने जल्दी समझ ली थी. वह यह थी कि मुंबई महानगरीय क्षेत्र में निर्माण शायद ही कभी केवल सीमेंट और स्टील के बारे में होता है. यह अनुमतियों, संरेखणों, संबंधों और उन शक्ति केंद्रों को नेविगेट करने की क्षमता के बारे में होता है जो अक्सर सार्वजनिक दृष्टि से परे काम करते हैं.
इसने स्वाभाविक रूप से राजनीति की ओर ले गया
प्रताप सरनाइक का औपचारिक राजनीतिक रास्ता राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में एक प्रारंभिक चरण से शुरू हुआ. इसके बाद 2008 में शिवसेना में एक निर्णायक कदम आया. यह एक महत्वपूर्ण बदलाव था. ठाणे पहले से ही सेना के सबसे मजबूत क्षेत्रों में से एक था. और पार्टी की संस्कृति ऐसे लोगों को पुरस्कृत करती थी जिनकी सड़क पर पकड़, संगठनात्मक ताकत और स्थानीय पहुंच होती थी. सरनाइक इस ढांचे में फिट बैठते थे, वे ड्राइंग रूम के विचारक नहीं थे. वे एक फील्ड ऑपरेटर थे जो जानते थे कि उपनगरीय राजनीति वास्तव में कैसे काम करती है.
लेकिन सरनाइक के उभार का कोई भी विवरण उस छाया प्रणाली का उल्लेख किए बिना पूरा नहीं होता जिसने उन वर्षों में मुंबई-ठाणे की सत्ता को आकार दिया: एनकाउंटर पुलिसिंग, क्षेत्रीय प्रभाव और अनौपचारिक अधिकार की दुनिया. उस दुनिया में कुछ नामों का वजन प्रदीप शर्मा से अधिक था. जो एक विवादास्पद पूर्व पुलिस अधिकारी थे और एनकाउंटर युग के सबसे खौफनाक और मिथकीय व्यक्तियों में से एक बन गए. राजनीतिक हलकों और स्थानीय चर्चाओं में, शर्मा को अक्सर एक रक्षक. फिक्सर. प्रवर्तक या संरक्षक के रूप में देखा जाता था. यह इस पर निर्भर करता था कि कौन बात कर रहा है. ठाणे-शिवसेना के कुछ हिस्सों के साथ उनकी निकटता ने उन्हें पुलिसिंग से परे एक आभा दी.
इन हलकों में. शर्मा को व्यापक रूप से कई उभरते राजनीतिक खिलाड़ियों के आसपास एक शक्तिशाली बैकरूम प्रभाव के रूप में माना जाता था और उन्हें अक्सर फुसफुसाहट में उपनगरीय राजनीति के कठिन किनारों के माध्यम से ऊपर उठने वाले लोगों के लिए एक गॉडफादर जैसी शख्सियत के रूप में वर्णित किया गया है. सरनाइक परिवार की यात्रा को अक्सर इसी संदर्भ में चर्चा की जाती है. किसी औपचारिक लेबल की आवश्यकता नहीं है और ऐसे संबंध शायद ही कभी साफ-सुथरे संस्थागत शब्दों में दर्ज किए जाते हैं. लेकिन महाराष्ट्र के राजनीतिक अंडरवर्ल्ड में. मार्गदर्शन और संरक्षण शायद ही विजिटिंग कार्ड के साथ आते हैं. उन्हें घोषित करने के बजाय समझा जाता है.
यह पारिस्थितिकी तंत्र महत्वपूर्ण था. मुंबई क्षेत्र में, सत्ता अक्सर केवल चुनाव जीतने पर नहीं बल्कि यह संकेत देने पर निर्भर करती है कि कोई अलग-थलग नहीं है. बिल्डरों को मंजूरी चाहिए. राजनेताओं को वफादार जमीनी नेटवर्क चाहिए. स्थानीय ऑपरेटरों को पहुंच चाहिए. हर किसी को ऐसे व्यक्ति के करीब होने से लाभ होता है जिसका नाम ही कमरे का माहौल बदल देता है. उस युग के महत्वाकांक्षी लोगों के लिए. शर्मा जैसे व्यक्ति से जुड़ा हुआ दिखना भी अपने आप में एक मुद्रा हो सकता था.
सरनाइक ने आगे चलकर ओवला-माजीवाड़ा से जीत हासिल की और खुद को ठाणे बेल्ट से सेना के अधिक दृश्य चेहरों में से एक के रूप में स्थापित किया. उनकी पत्नी भी नागरिक राजनीति में आईं. उनके बेटे पार्टी से जुड़े युवा ढांचों में सक्रिय हो गए. जो उभरा वह केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक करियर नहीं था बल्कि एक पारिवारिक नेटवर्क था जो व्यवसाय, नगरपालिका प्रभाव और चुनावी संगठन तक फैला हुआ था.
भारत में टिकाऊ क्षेत्रीय शक्ति अक्सर इसी तरह बनाई जाती है, एक पद के माध्यम से नहीं. बल्कि परतदार नियंत्रण के माध्यम से, एक कमरे में विधायक, दूसरे में पार्षद, तीसरे में व्यावसायिक हित, चौथे में युवा लामबंदी, हर हिस्सा दूसरे को मजबूत करता है.
फिर भी सरनाइक की कहानी को एक सीधी उद्यमशील सफलता की कहानी के रूप में नहीं बताया जा सकता क्योंकि यह देश के सबसे कठिन राजनीतिक मंचों में से एक में सामने आई. ठाणे जिला और व्यापक मुंबई क्षेत्र लंबे समय से ऐसे व्यक्तित्व पैदा करते रहे हैं जो जन अपील को स्पष्ट कठोर शक्ति के साथ जोड़ते हैं. कुछ को रक्षक के रूप में प्यार किया जाता है. कुछ को प्रवर्तक के रूप में डराया जाता है. कई दोनों होते हैं. महाराष्ट्र की राजनीति का कोई भी गंभीर पर्यवेक्षक इस परिदृश्य को एक विनम्र लोकतांत्रिक सैलून के रूप में नहीं देखता.
सरनाइक का उभार इसी पारिस्थितिकी तंत्र में हुआ. अन्य मजबूत व्यक्तित्वों के साथ जिन्होंने संगठन, आक्रामकता और स्थानीय कमान के माध्यम से करियर बनाए. व्यापक ठाणे सत्ता संरचना के साथ उनका जुड़ाव. खासकर उन वर्षों के दौरान जब एकनाथ शिंदे अपना प्रभाव मजबूत कर रहे थे. उन्हें शिवसेना के भीतर एक शक्तिशाली क्षेत्रीय समूह का हिस्सा बना दिया. वे ऐसे लोग थे जिन्हें उसी उपनगरीय भूगोल ने आकार दिया था: घनी आवासीय कॉलोनियां, परिवहन के अवरोध, श्रमिक बस्तियां, पुनर्विकास की लड़ाइयाँ और मतदाता जो अक्सर विचारधारा से कम और काम करवाने वाले व्यक्ति से ज्यादा मतलब रखते थे.
वे एक अत्यधिक दृश्यमान मीडिया योद्धा भी थे. 2020 में अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के आसपास उठे तूफान के दौरान. सरनाइक महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस के सबसे आक्रामक सार्वजनिक रक्षकों में से एक बन गए. उस समय जब राष्ट्रीय टेलीविजन ने इस मामले को एक रात-दर-रात राजनीतिक युद्ध में बदल दिया था. उन्होंने एक सावधान विधायक के बजाय एक पार्टी स्ट्रीट-फाइटर की अपेक्षित लाइन ली. उन्होंने आलोचकों को चुनौती दी. दिवंगत अभिनेता के परिवार के बारे में उत्तेजक सवाल उठाए और मुंबई पर अभिनेत्री कंगना रनौत की टिप्पणियों के बाद उनके खिलाफ प्रतिक्रिया में एक प्रमुख आवाज बने. राजनीति के बारे में चाहे जो भी सोचा जाए. इस प्रकरण ने एक महत्वपूर्ण बात दिखाई: सरनाइक पर संघर्ष क्षेत्रों में प्रवेश करने और दबाव झेलने के लिए भरोसा किया जाता था.
यह भूमिका हल्के-फुल्के राजनेताओं को नहीं दी जाती.
फिर जांचें शुरू हुईं.
प्रवर्तन निदेशालय ने वित्तीय लेनदेन और कथित मनी-लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में छापे मारे. जो सरनाइक और उनके नेटवर्क से जुड़े व्यवसायों को छूते थे. संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया गया. समन जारी किए गए. सहयोगियों की जांच हुई. भारत में ऐसे कई मामलों की तरह. समर्थकों ने इसे राजनीतिक निशाना बताया. विरोधियों ने इसे देर से आई जवाबदेही कहा. और सच्चाई कानूनी प्रक्रिया की धीमी गति से आगे बढ़ती रही. सरनाइक ने किसी भी गलत काम से इनकार किया है और किसी भी अपराध में दोषी नहीं ठहराए गए हैं.
लेकिन भारतीय राजनीति में, जांच के दौरान टिके रहना भी उतना ही खुलासा करता है जितना कि दोषसिद्धि,कई लोग एक छापे के चक्र के बाद गायब हो जाते हैं. अन्य दबाव में टूट जाते हैं. सरनाइक ने ऐसा नहीं किया.
2022 में जब एकनाथ शिंदे के उद्धव ठाकरे के खिलाफ विद्रोह के बाद शिवसेना में नाटकीय विभाजन हुआ. तो सरनाइक ने शिंदे का साथ दिया. जिन्होंने ठाणे की राजनीति को करीब से देखा था. उनके लिए यह आश्चर्यजनक नहीं था. क्षेत्रीय निष्ठाएं. व्यक्तिगत समीकरण और राजनीतिक यथार्थ अक्सर पार्टी के प्रतीकों के प्रति भावनात्मक लगाव से अधिक भारी पड़ते हैं. उन्होंने उस खेमे को चुना जो जिले के आंतरिक गणित को समझता था और राज्य सत्ता के साथ उभरा.
इस निर्णय का पुरस्कार मिला. सरनाइक प्रासंगिक बने रहे और अंततः महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री के रूप में सरकार में शामिल हुए. एक ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने कभी उपनगरों में ऑटो रिक्शा चलाया था. परिवहन नीति को नियंत्रित करना लगभग अविश्वसनीय विडंबना जैसा था.
फिर भी शायद सबसे स्पष्ट संकेत पद में नहीं बल्कि उत्तराधिकार में है.
भारत में कई ताकतवर नेता अकेले उठते हैं और अकेले ही समाप्त हो जाते हैं. अधिक परिष्कृत लोग प्रभाव को वंशवादी निरंतरता में बदल देते हैं. सरनाइक ऐसा करने की कोशिश करते दिखते हैं. विहंग सरनाइक ने व्यवसाय पक्ष में प्रमुख भूमिका निभाई है. पूर्वेश सरनाइक युवा राजनीति और संगठनात्मक कार्य में सक्रिय रहे हैं. साथ मिलकर वे परिवार की अगली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो केवल संपत्तियों को बनाए रखने ही नहीं बल्कि प्रतिष्ठा को उन्नत करने के लिए भी प्रतिबद्ध है.
यही वह जगह है जहां हालिया आतिथ्य कदम प्रतीकात्मक बन जाता है.
परिवार की व्यावसायिक संरचनाओं के माध्यम से सरनाइक ने मीरा रोड में एक अंतरराष्ट्रीय होटल ब्रांड लाने के लिए साझेदारी की घोषणा की है. एक ऐसा उपनगर जिसे लंबे समय से मुंबई के ओवरफ्लो वाल्व के रूप में देखा जाता था, न कि एक प्रतिष्ठित गंतव्य के रूप में. दशकों तक. मीरा रोड वह जगह थी जहां परिवार तब जाते थे जब शहर असहनीय हो जाता था लेकिन सपने अभी खत्म नहीं हुए होते थे, घना, व्यावहारिक, भीड़भाड़ वाला, लचीला, इसे कभी विलासिता का क्षेत्र नहीं माना गया.
अब वहाँ एक ब्रांडेड अपस्केल होटल स्थापित किया जा रहा है.
यह केवल एक रियल-एस्टेट लेनदेन से अधिक है. यह एक सामाजिक संकेत है. जो परिवार कभी उभरते मध्यम वर्ग के लिए आवासीय ब्लॉक बनाते थे. वे अब स्वयं आकांक्षा को परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं. वे अब केवल शहर के मध्यम वर्ग को घर देना नहीं चाहते. वे उनकी शादियों, सम्मेलनों, निवेशकों और विशिष्ट सभाओं की मेजबानी करना चाहते हैं.
तो प्रताप सरनाइक की कहानी न तो किसी पवित्र उत्थान की है और न ही किसी खलनायक की सीधी छवि, यह उससे कहीं अधिक जटिल और परिचित है. वे महाराष्ट्र की कठोर राजनीतिक अर्थव्यवस्था के उत्पाद हैं. जहां दृढ़ता मायने रखती है. शक्ति मायने रखती है. वफादारी मायने रखती है. और नैतिक स्पष्टता अक्सर कम होती है. वे अपने समर्थकों से प्रशंसा. आलोचकों से संदेह और प्रतिद्वंद्वियों से सावधानी प्राप्त करते प्रतीत होते हैं, एक ऐसे व्यक्ति की क्लासिक प्रोफ़ाइल जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया है.
और इस उभार की पृष्ठभूमि में वे लोग बने रहते हैं जिन्होंने उस युग को आकार दिया, प्रदीप शर्मा जैसे लोग, जिनका प्रभाव शायद ही कभी आधिकारिक था लेकिन अक्सर स्पष्ट था. महाराष्ट्र में. सत्ता केवल उन लोगों के पास नहीं होती जिनके नाम मतपत्र पर होते हैं. कभी-कभी इसे वे लोग बनाते हैं जिनके नाम धीमी आवाज़ में लिए जाते हैं.
पाव भाजी की गाड़ी अब नहीं है. उसकी जगह अब टावर, कार्यालय, राजनीतिक नियुक्तियाँ और महानगरीय किनारे पर उठती हुई एक फाइव-स्टार महत्वाकांक्षा खड़ी है.
इसे कोई आकांक्षा. सुदृढ़ीकरण या चेतावनी के रूप में देखता है. यह पूरी तरह इस पर निर्भर करता है कि वह कहाँ खड़ा है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
मार्च 2026 में भारत ने रूस से लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा था, लेकिन अप्रैल में यह आंकड़ा घटकर औसतन 15.7 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मध्य पूर्व में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बीच भारत के लिए राहत माने जा रहे रूसी कच्चे तेल के आयात में अप्रैल महीने में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. मार्च में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची खरीद अब करीब 20 फीसदी घट गई है. इससे संकेत मिल रहे हैं कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता अब भारत की खरीद रणनीति को भी प्रभावित कर रही है.
मार्च के मुकाबले अप्रैल में कम हुआ आयात
मार्च 2026 में भारत ने रूस से लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा था. लेकिन अप्रैल में यह आंकड़ा घटकर औसतन 15.7 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया. यानी एक ही महीने में खरीद में तेज गिरावट दर्ज हुई है.
मार्च में भारत ने अवसर का फायदा उठाते हुए बड़ी मात्रा में तेल खरीदा था, क्योंकि उस समय मध्य पूर्व से सप्लाई बाधित होने लगी थी.
मार्च में क्यों बढ़ी थी खरीद
मार्च के दौरान अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट के कारण कई देशों को तेल आपूर्ति को लेकर चिंता थी. ऐसे समय भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से उपलब्ध फ्लोटिंग कार्गो यानी समुद्र में पहले से मौजूद तेल खेपों की खरीद तेज कर दी थी. इसके अलावा कुछ अमेरिकी प्रतिबंधों में अस्थायी राहत मिलने से भी रूसी तेल खरीदना आसान हुआ था.
अप्रैल में गिरावट की 3 बड़ी वजहें
विश्लेषकों के अनुसार अप्रैल में आयात घटने के पीछे तीन प्रमुख कारण रहे.
1. निर्यात टर्मिनल पर हमला: रूस के एक बड़े निर्यात टर्मिनल पर यूक्रेनी हमले के बाद लोडिंग प्रभावित हुई, जिससे सप्लाई धीमी पड़ी.
2. फ्लोटिंग कार्गो खत्म हुए: मार्च में जो तैयार तेल खेप उपलब्ध थीं, वे अप्रैल तक लगभग समाप्त हो गईं.
3. रिफाइनरियों में मेंटेनेंस: भारत की कुछ रिफाइनरियों में रखरखाव कार्य और शटडाउन के कारण मांग कम रही.
किस कंपनी ने खरीदा सबसे ज्यादा तेल
अप्रैल में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा. कंपनी ने कुल रूसी तेल खरीद का 42 फीसदी हिस्सा अकेले लिया.
1. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन. 6.7 लाख बैरल प्रतिदिन
2. रिलायंस इंडस्ट्रीज. 2.63 लाख बैरल प्रतिदिन
3. भारत पेट्रोलियम. 1.36 लाख बैरल प्रतिदिन
4. हिंदुस्तान पेट्रोलियम. 83 हजार बैरल प्रतिदिन
नायरा एनर्जी की खरीद में भारी गिरावट
नायरा एनर्जी की खरीद मार्च के 3.15 लाख बैरल प्रतिदिन से घटकर अप्रैल में सिर्फ 28 हजार बैरल प्रतिदिन रह गई. कंपनी ने 9 अप्रैल से 35 दिन के मेंटेनेंस शटडाउन की शुरुआत की थी, जिसका असर खरीद पर पड़ा.
भारत के लिए क्यों जरूरी है रूसी तेल
रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल भारत की ऊर्जा लागत नियंत्रित रखने में मदद करता है. इससे पेट्रोल-डीजल कीमतों और महंगाई पर दबाव कम होता है. अगर होर्मुज संकट लंबा खिंचता है और मध्य पूर्व से सप्लाई प्रभावित रहती है, तो भारत दोबारा रूसी तेल खरीद बढ़ा सकता है. हालांकि रूस पर प्रतिबंध, युद्ध और लॉजिस्टिक्स चुनौतियां भविष्य में जोखिम बनी रहेंगी.
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में सबसे अधिक सैन्य खर्च करने वाले पांच देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी और भारत शामिल रहे. इन पांच देशों का कुल रक्षा खर्च वैश्विक सैन्य व्यय का करीब 58 प्रतिशत हिस्सा रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों के बीच वर्ष 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. इसी दौरान भारत ने भी अपने रक्षा बजट में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत का रक्षा खर्च 8.9 प्रतिशत बढ़कर 92.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
लगातार 11वें साल बढ़ा वैश्विक सैन्य खर्च
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में दुनिया का कुल सैन्य खर्च बढ़कर 2,887 अरब डॉलर हो गया. यह लगातार 11वां वर्ष है जब रक्षा बजट में वृद्धि दर्ज की गई है. बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव और सुरक्षा चिंताओं के कारण देशों ने अपनी सैन्य ताकत मजबूत करने पर जोर दिया है.
रक्षा खर्च में शीर्ष पांच देशों का दबदबा
दुनिया में सबसे अधिक सैन्य खर्च करने वाले पांच देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी और भारत शामिल रहे. इन पांच देशों का कुल रक्षा खर्च वैश्विक सैन्य व्यय का करीब 58 प्रतिशत हिस्सा रहा.
भारत-पाकिस्तान तनाव का असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव और सैन्य गतिविधियों का असर भारत के रक्षा बजट पर पड़ा. इस दौरान लड़ाकू विमान, ड्रोन और मिसाइलों के इस्तेमाल जैसी घटनाओं ने सुरक्षा तैयारियों को और मजबूत करने की जरूरत बढ़ाई. वहीं पाकिस्तान ने भी अपना रक्षा बजट 11 प्रतिशत बढ़ाकर 11.9 अरब डॉलर कर दिया. इसके पीछे चीन से हथियार खरीद और पुराने रक्षा सौदों का भुगतान प्रमुख कारण बताया गया है.
यूरोप और एशिया में तेज बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप में सैन्य खर्च 14 प्रतिशत बढ़ा, जबकि एशिया और ओशिआनिया क्षेत्र में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. यूक्रेन युद्ध और नाटो देशों की बढ़ती सैन्य तैयारी इसके बड़े कारण माने जा रहे हैं.
अमेरिका और चीन का खर्च
अमेरिका का रक्षा खर्च 2025 में 7.5 प्रतिशत घटकर 954 अरब डॉलर रह गया. बताया गया कि यूक्रेन के लिए नई सहायता मंजूर नहीं होने का असर इसमें दिखा. दूसरी ओर चीन ने अपना रक्षा बजट 7.4 प्रतिशत बढ़ाकर 336 अरब डॉलर कर लिया. यह लगातार 31वां वर्ष है जब चीन के सैन्य खर्च में बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
आगे भी जारी रह सकता है रक्षा खर्च में इजाफा
विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया में बढ़ते संघर्ष, सीमाई विवाद और राजनीतिक अस्थिरता के चलते आने वाले वर्षों में भी सैन्य खर्च बढ़ने की संभावना बनी रहेगी. भारत सहित कई देश सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर लगातार निवेश कर रहे हैं.
पिछले 6 महीनों में स्टॉक करीब 20% चढ़ा है. वहीं 3 साल की अवधि में इसने निवेशकों का पैसा लगभग दोगुना कर दिया है, जिससे यह एक मजबूत लॉन्ग टर्म पिक बना हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकारी कोयला कंपनी कोल इंडिया (Coal India Limited) के शेयरों में 28 अप्रैल को जोरदार तेजी देखने को मिली. बेहतर तिमाही नतीजों और फाइनल डिविडेंड के ऐलान के बाद निवेशकों की खरीदारी बढ़ी, जिससे स्टॉक में 4% से ज्यादा की उछाल दर्ज हुई.
शेयर में जोरदार तेजी, इंट्राडे में नया हाई
सोमवार के कारोबार में Coal India का शेयर BSE पर 473.90 रुपये तक पहुंच गया, जो करीब 4.6% की तेजी को दर्शाता है. खबर लिखे जाने के दौरान शेयर 3.94% की तेजी के साथ 470.35 रुपये पर कारोबार कर रहा था. एक दिन पहले घोषित Q4 नतीजों के बाद बाजार ने मंगलवार को सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और स्टॉक में मजबूत खरीदारी देखी गई.
Q4 में मुनाफा और रेवेन्यू दोनों में बढ़त
जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में कंपनी का शुद्ध कंसोलिडेटेड मुनाफा 11.1% बढ़कर 10,839.18 करोड़ रुपये हो गया. पिछले साल इसी अवधि में यह 9,751.64 करोड़ रुपये था. इस दौरान ऑपरेशंस से रेवेन्यू बढ़कर 46,490.03 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि खर्च भी बढ़कर 37,107.07 करोड़ रुपये हो गया.
पूरे वित्त वर्ष में मुनाफे में गिरावट
हालांकि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का प्रदर्शन थोड़ा कमजोर रहा. सालाना शुद्ध मुनाफा घटकर 31,094.29 करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले साल 35,505.79 करोड़ रुपये था. रेवेन्यू भी हल्की गिरावट के साथ 1,68,400.29 करोड़ रुपये रहा.
डिविडेंड का बड़ा ऐलान
कंपनी के बोर्ड ने वित्त वर्ष 2026 के लिए 5.25 रुपये प्रति शेयर का फाइनल डिविडेंड मंजूर किया है. इससे पहले कंपनी पहले ही दो अंतरिम डिविडेंड घोषित कर चुकी है. अंतिम मंजूरी अब वार्षिक आम बैठक में शेयरधारकों से ली जाएगी.
मजबूत मार्केट पोजिशन और योगदान
Coal India देश के कुल घरेलू कोयला उत्पादन का लगभग 80% और कोयले आधारित बिजली उत्पादन का करीब 75% हिस्सा देती है. कंपनी का कुल बिजली उत्पादन में भी महत्वपूर्ण योगदान है और यह देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा आधार बनी हुई है. इसका मार्केट कैप अब लगभग 3 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है.
लंबी अवधि में मजबूत रिटर्न
पिछले 6 महीनों में स्टॉक करीब 20% चढ़ा है. वहीं 3 साल की अवधि में इसने निवेशकों का पैसा लगभग दोगुना कर दिया है, जिससे यह एक मजबूत लॉन्ग टर्म पिक बना हुआ है.
बेहतर तिमाही नतीजे, मजबूत डिविडेंड और स्थिर बिजनेस मॉडल के चलते Coal India के शेयर में निवेशकों की रुचि बढ़ी है. हालांकि सालाना मुनाफे में हल्की गिरावट के बावजूद कंपनी का ऑपरेशनल प्रदर्शन बाजार में भरोसा बनाए हुए है.