बिना जांचे, बिना ऑडिट के, बेलगाम: भारत की चार सर्वशक्तिशाली एजेंसियां. ये मनमाने ढंग से आपकी जिंदगी को रोक सकती हैं, लेकिन एक छिपा हुआ कानूनी चक्र उनकी विफलताओं को पूरी तरह सार्वजनिक नजरों से दूर रखता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
चार बेहद शक्तिशाली एजेंसियां पूरी तरह एक तरह की भरोसे की व्यवस्था पर काम करती हैं, संपत्तियां और स्वतंत्रता जब्त करते हुए भी अपने वास्तविक प्रदर्शन को जनता से छिपाए रखती हैं. इन चार एजेंसियों में प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो शामिल हैं. सामूहिक रूप से इनके पास तलाशी लेने, संपत्ति जब्त करने, संपत्ति कुर्क करने और लोगों को जेल भेजने की व्यापक शक्तियां हैं. फिर भी इनमें से किसी एक का भी इस बात को लेकर उचित सार्वजनिक ऑडिट नहीं हुआ है कि इनमें से कोई भी काम वास्तव में कितना प्रभावी है.
ईडी
सबसे पहले प्रवर्तन निदेशालय से शुरुआत करते हैं. 2021-22 से 2025-26 के पांच वर्षों में इसने मनी लॉन्ड्रिंग के 4,622 मामले दर्ज किए. वित्त मंत्रालय ने खुद यह आंकड़ा राज्यसभा के सामने रखा. इनमें से केवल 43 मामलों में दोषसिद्धि हुई. 43 प्रतिशत नहीं. 43 मामले. सौ में एक से भी कम.
इसी अवधि में एजेंसी ने 2,444 अभियोजन शिकायतें दाखिल कीं और 1,243 लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें से हर गिरफ्तारी मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत जमानत की कड़ी दोहरी शर्त वाली कसौटी से गुजरी, जो आरोपी व्यक्ति को यह साबित करने के लिए मजबूर करती है कि वह संभवतः निर्दोष है, तभी वह घर जा सकता है. घरों की तलाशी ली गई. बैंक खाते फ्रीज किए गए. एक ही न्यूज साइकिल में करियर और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा. और लंबी प्रक्रिया के अंत में: 43 दोषसिद्धियां.
एजेंसी आपको बताएगी कि उसकी दोषसिद्धि दर 93 प्रतिशत से अधिक है. यह आंकड़ा भी सही है. लेकिन इसमें एक पेंच है. इसकी गणना केवल उन मामलों पर की जाती है जो वास्तव में अंतिम फैसले तक पहुंचे हैं. एक प्रतिशत से कम का आंकड़ा उन सभी मामलों पर आधारित है जिन्हें एजेंसी ने खुद दर्ज करने का फैसला किया. वही एजेंसी, वही वर्ष, दो बिल्कुल अलग कहानियां. ईडी के बाहर कोई यह तय नहीं करता कि इनमें से कौन सा आंकड़ा ईमानदार है, क्योंकि किसी स्वतंत्र संस्था ने कभी दोनों का ऑडिट नहीं किया.
हाई-प्रोफाइल मामलों पर करीब से नजर डालें. दस वर्षों में ईडी ने मौजूदा और पूर्व सांसदों, विधायकों, विधान परिषद सदस्यों और अन्य राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ 193 मामले दर्ज किए. दोषसिद्धियां: दो. अकेले हाल के पांच वर्षों में इसने राजनेताओं के खिलाफ 125 नए मामले दर्ज किए और एक भी दोषसिद्धि हासिल नहीं की. लगभग कुछ भी पूरा नहीं हो रहा है.
सीबीआई
सीबीआई की अपनी समस्याएं हैं. भारत की प्रमुख जांच एजेंसी में 1,502 अधिकारी कम हैं. केंद्रीय सतर्कता आयोग की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 7,300 पदों की स्वीकृत संख्या है और वास्तव में केवल 5,798 लोग तैनात हैं. अदालतें जिन सबसे संवेदनशील मामलों के लिए इस एजेंसी का रुख करती हैं, वहां पांच में से एक से अधिक पद खाली हैं.
जो काम यह कर भी पाती है, वह भी अक्सर लंबित पड़ा रहता है. 2024 के अंत में 46 सरकारी संगठनों से जुड़े सीबीआई के 200 मामले अभियोजन की मंजूरी के इंतजार में अटके हुए थे यह उस आरोपी अधिकारी के अपने मंत्रालय से मिलने वाली औपचारिक अनुमति है, जिसके आधार पर उसे मुकदमे का सामना करने के लिए अदालत में पेश किया जा सके. इनमें से आधे से अधिक मामलों में कानूनी समयसीमा पहले ही पार हो चुकी थी. अदालतों में सीबीआई के 6,900 से अधिक भ्रष्टाचार के मामले लंबित थे. इनमें से 361 मामले 20 वर्षों से अधिक समय से लंबित थे. 2005 में आरोपी बनाया गया कोई क्लर्क अब सेवानिवृत्त हो चुका हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो चुकी हो, फिर भी उसका नाम विचाराधीन मामले में दर्ज हो सकता है.
सीवीसी ने खुद सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ लंबित 60 विभागीय मामलों को भी दर्ज किया. इनमें से 22 मामले चार वर्षों से अधिक समय से अनसुलझे थे. जिस एजेंसी को भ्रष्टाचार खत्म करने की जिम्मेदारी दी गई है, वह अपने ही लोगों के खिलाफ मामलों को उचित समय में बंद नहीं कर पा रही है.
एसएफआईओ, एनसीबी
गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय से पूछें कि उसने कितनी दोषसिद्धियां हासिल की हैं तो जवाब में आमतौर पर भेजे गए मामलों या दाखिल की गई शिकायतों की संख्या बताई जाती है. वास्तविक दोषसिद्धि दर गायब है. इसलिए नहीं कि यह गोपनीय है, बल्कि इसलिए कि व्यवस्था ने कभी किसी को इसकी गणना करने के लिए बाध्य ही नहीं किया.
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के प्रवर्तन कार्य को लेकर कभी प्रकाशित सीएजी प्रदर्शन ऑडिट नहीं हुआ है. रिकॉर्ड में इसके सबसे करीब 2014 की एक पुरानी समीक्षा है, लेकिन उसमें किसी और चीज को देखा गया था, राजस्व विभाग के अफीम संबंधी संचालन को. हम अंदाजा लगा सकते हैं कि वास्तविक ऑडिट में क्या सामने आ सकता है, क्योंकि सीएजी ने राज्य स्तर पर इसी तरह का काम किया है और नतीजे गंभीर थे. पंजाब में एक वर्ष में मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में बरी हुए 756 लोगों में से 532 इसलिए रिहा हो गए क्योंकि उन्हीं पुलिस अधिकारियों की गवाही में समस्याएं थीं, जिन्होंने उन्हें गिरफ्तार किया था. 70 प्रतिशत बरी होने के मामले जांच करने वाली एजेंसी की ओर से कमजोर सबूतों तक सीमित रहे. जब्त किए गए नमूने अक्सर 23 से 476 दिनों की देरी से फोरेंसिक प्रयोगशालाओं तक पहुंचे. सबूत अलमारियों में पड़े रहे और लोग जेलों में.
यह एक राज्य के मादक पदार्थ प्रवर्तन का एक ऑडिट था. समस्या को उन चार राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ जोड़कर देखिए, जिन्हें कभी इसी तरह की जांच का सामना नहीं करना पड़ा.
अन्य देश नियमित रूप से ऐसा करते हैं. अमेरिका में न्याय विभाग का इंस्पेक्टर जनरल और गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस एफबीआई और डीईए की जांच करते हैं. ब्रिटेन में निरीक्षकों के लिए नेशनल क्राइम एजेंसी की जांच करना कानूनी दायित्व है. ऑस्ट्रेलिया का ऑडिट कार्यालय फेडरल पुलिस की जांच करता है, जिसमें यह भी शामिल है कि वे अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कैसे करते हैं.
कम ऑडिट
भारत में ऐसा कुछ भी तुलनीय नहीं है. सीएजी को सार्वजनिक धन का इस्तेमाल करने वाली किसी भी संस्था का प्रदर्शन ऑडिट करने की अनुमति है, लेकिन इन एजेंसियों के लिए ऐसा करना अनिवार्य नहीं है. चारों संगठन अलग-अलग मंत्रालयों और अलग-अलग संसदीय समितियों को जवाब देते हैं, इसलिए कोई एक जगह पूरी तस्वीर नहीं देख पाती या एक एजेंसी के नतीजों की दूसरी एजेंसी से तुलना नहीं कर पाती. केंद्रीय सतर्कता आयोग केवल सीबीआई को देखता है और वह भी केवल सतर्कता के नजरिए से, जांच की समग्र गुणवत्ता के नजरिए से नहीं. सीबीआई, ईडी और एनसीबी सूचना का अधिकार अधिनियम की एक विशेष अनुसूची में शामिल हैं, जो प्रदर्शन से जुड़े ज्यादातर आंकड़ों को सार्वजनिक नजरों से दूर रखती है.
पैसों के पक्ष का सावधानी से ऑडिट किया जाता है, वेतन, वाहन, कार्यालय का किराया, हर चीज का हिसाब आखिरी रुपये तक संतुलित किया जाता है. केवल एक चीज की गिनती कभी नहीं होती कि वास्तव में किसी को न्याय के कटघरे तक पहुंचाया गया या नहीं.
संसद एक ही सत्र में इसे बदल सकती है. वह केंद्रीय जांच एजेंसियों के प्रदर्शन का केंद्रित ऑडिट करने के लिए सीएजी से कह सकती है. वह जोर दे सकती है कि प्रत्येक एजेंसी समान दोषसिद्धि दर की परिभाषा का इस्तेमाल करते हुए एक स्पष्ट वार्षिक प्रदर्शन विवरण प्रकाशित करे. वह एसएफआईओ और एनसीबी को अपनी पारदर्शी बजट मदें दे सकती है, ताकि लागत और नतीजों की तुलना की जा सके. वह चारों एजेंसियों पर अधिकार रखने वाली एक संयुक्त समिति या उचित निरीक्षण संस्था बना सकती है.
जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक चार शक्तिशाली एजेंसियां, जो किसी व्यक्ति का घर, बैंक खाता और स्वतंत्रता छीन सकती हैं, भरोसे की व्यवस्था पर काम करती रहेंगी. वे अपने ही होमवर्क को खुद जांचती हैं और वही आंकड़ा पेश करती हैं जो सबसे अच्छा दिखाई देता है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
अंबानी परिवार का कैलेंडर ही Jio की IPO टाइमलाइन है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
जन्मदिन वाला IPO, एक केक और एक ग्रे मार्केट
रिलायंस अपने भव्य पारिवारिक समारोहों और शानदार पार्टियों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. परंपरा के मुताबिक, Jio Platforms का मेगा IPO 4 अरब डॉलर की मेहमान सूची, ब्लॉक हुए पैसे और साथ में कोस्टक ट्रेडर्स लेकर आया है. शेयर बाजार के ऊपरी तबके में यह तय माना जा रहा है कि Jio की लिस्टिंग इसे भारत की सबसे मूल्यवान कंपनी बना देगी, जो अपनी पैरेंट कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की मार्केट कैपिटलाइजेशन को भी पीछे छोड़ देगी. हालांकि, आंकड़ों से परे, आगे काफी ड्रामा और जश्न है और वह भी पूरे रिलायंस स्टाइल में.
आम लोग भारत के अब तक के सबसे बड़े IPO का समय उबाऊ तरीके से तय करते हैं. आप इंतजार करते हैं कि बाजार का मूड खराब होना बंद हो. आप FII के फ्लो की जांच करते हैं. आप पूछते हैं कि क्या 2024 और 2025 में जुटाई गई रकम की मुश्किल से आधी रकम जुटाने वाले इस साल में किसी के पास अब भी अतिरिक्त पैसा बचा है.
या फिर आप अंबानी हैं, ऐसी स्थिति में आप परिवार का व्हाट्सऐप ग्रुप खोलते हैं और लाल रंग से जन्मदिनों को घेरना शुरू कर देते हैं.
बेशक, कुछ भी आधिकारिक नहीं है. SEBI की मंजूरी कई हफ्ते पहले आ चुकी है, लेकिन तारीखें, प्राइस बैंड और लॉट साइज अब भी पकड़ में नहीं आ रहे हैं. बाजार ने इस खाली जगह को वैसे भी भर दिया है. चर्चाएं, भले ही आधी सही हों, कहती हैं कि Jio कोई IPO लॉन्च नहीं कर रहा. वह एक पारिवारिक उत्सव और जन्मदिन की पार्टी आयोजित कर रहा है, जिसमें दलाल स्ट्रीट अति-उत्साहित बारातियों की तरह शामिल है.
जुड़वां पार्टी की शुरुआत करते हैं
बाजार में चर्चा है कि इश्यू शुक्रवार, 23 अक्टूबर को खुलेगा, जो जुड़वां बच्चों ईशा और आकाश का जन्मदिन है. Jio Platforms के हाल ही में नियुक्त मैनेजिंग डायरेक्टर आकाश को उसी दिन मोमबत्तियां बुझाने और किताबें खोलने का मौका मिलेगा. ज्यादातर प्रमोटर एक शांत टोस्ट से संतुष्ट हो जाते हैं. अंबानी परिवार सब्सक्रिप्शन विंडो को केक के साथ सिंक्रोनाइज करना पसंद करता है. दामाद आनंद पीरामल अपना जन्मदिन 25 अक्टूबर को मनाते हैं, जब Jio के लिए सब्सक्रिप्शन का सिलसिला जारी रहेगा.
ग्रे-मार्केट आफ्टर-पार्टी
इसके बाद पैसा ब्लॉक हो जाता है और लाखों भारतीय डिमैट ऐप्स को रिफ्रेश करना राष्ट्रीय खेल बना लेते हैं, जबकि दिखावा करते हैं कि उन्हें कोई परवाह नहीं है. आधिकारिक बाजार एक जिम्मेदार वयस्क की तरह वीकेंड मनाता है. ग्रे मार्केट ऐसा नहीं करता. गुजरात के कोस्टक विशेषज्ञ और हर वह काका जो "किसी को जानता है" Jio के प्रीमियम को शादी में आने वाले मेहमानों की सूची से भी ज्यादा बार काटेंगे और फिर से बनाएंगे.
नीता की बर्थडे पार्टी
शेयर रविवार, 1 नवंबर, नीता अंबानी के जन्मदिन तक स्क्रीन पर आ जाने चाहिए. उस दिन बाजार बंद रहेगा, जो लगभग विचारशील बात है. ऐसा कुछ भी नहीं है जो "हैप्पी बर्थडे, मम्मी" कहने जैसा हो, एक नई लिस्टेड कंपनी के अलावा, जबकि बाकी भारत इस बात पर बहस करेगा कि किसे कितने शेयर मिले.
एंटीलिया की भव्य दिवाली
इसके बाद मुहूर्त ट्रेडिंग आएगी, जिसमें हर स्क्रीन पर नई लिस्टेड Jio चमकती दिखाई देगी और एंटीलिया देश के सबसे महंगे दीये से जगमगाएगा. और अगर बाजार को एक और धक्का चाहिए, तो 28 दिसंबर को धीरूभाई का जन्मदिन कैलेंडर में एक अतिरिक्त शुभ तारीख की तरह मौजूद है.
बैंकरों का तर्क बेशर्म है: बाजार के Jio के प्यार में पड़ने का इंतजार क्यों करें, जब आप शादी तय कर सकते हैं और उसे तोहफों के साथ वहां पहुंचने के लिए मजबूर कर सकते हैं?
Jio ₹15 लाख करोड़ की कहानी बनता है या एक ऐसा बच्चा जो अपने माता-पिता की मार्केट कैप पर आक्रामक नजर रख रहा है, यह बाद की समस्या है.
जुड़वां रिबन काटते हैं. नीता को केक मिलता है. एंटीलिया आफ्टर-पार्टी की मेजबानी करता है. और भारत के निवेशक सोचते हैं कि उन्हें इस जश्न में बुलाया गया था... या सिर्फ नकद लाने के लिए कहा गया था.
दिवाली से पहले रिलायंस ग्रुप ₹30 लाख करोड़ की मार्केट कैप को पार कर जाएगा. यह उसके कट्टर प्रतिद्वंद्वी अडानी से लगभग दोगुना और बिना उत्तराधिकारी वाले टाटा साम्राज्य से भी लगभग दोगुना होगा.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
टाटा स्टील अपने नीदरलैंड्स स्थित प्रोजेक्ट में बदलाव को लेकर वहां की सरकार के साथ लगातार बातचीत कर रही है. कंपनी बाध्यकारी समझौते की ओर बढ़ने से पहले कई लंबित मुद्दों को सुलझाना चाहती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा स्टील को चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में घरेलू स्टील की मांग 8-10 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और प्रबंध निदेशक (MD) टी. वी. नरेंद्रन ने मंगलवार को कहा कि स्टील की खपत से जुड़े विभिन्न सेक्टरों में मांग मजबूत बनी हुई है, जिससे घरेलू इस्पात उद्योग के लिए आउटलुक सकारात्मक है. नई दिल्ली में इंडियन फाउंडेशन फॉर क्वालिटी मैनेजमेंट (IFQM) के संगोष्ठी कार्यक्रम के दौरान नरेंद्रन ने कहा कि देश में स्टील की मांग को कई प्रमुख खपत वाले क्षेत्रों से समर्थन मिल रहा है. उन्होंने कहा कि दूसरी छमाही में मांग 8-10 प्रतिशत के आसपास रह सकती है और कंपनी भारतीय स्टील उद्योग की संभावनाओं को लेकर सकारात्मक है.
दूसरी छमाही में मांग मजबूत रहने की उम्मीद
नरेंद्रन के मुताबिक, स्टील की खपत करने वाले लगभग सभी प्रमुख सेक्टरों में गतिविधियां मजबूत हैं. ऐसे में चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में घरेलू मांग में अच्छी वृद्धि की उम्मीद है. इससे स्टील कंपनियों के कारोबार को भी समर्थन मिलने की संभावना है.
नीदरलैंड्स में प्रोजेक्ट को लेकर सरकार से बातचीत जारी
टाटा स्टील अपने नीदरलैंड्स स्थित प्रोजेक्ट में बदलाव को लेकर वहां की सरकार के साथ लगातार बातचीत कर रही है. कंपनी बाध्यकारी समझौते (Binding Agreement) की ओर बढ़ने से पहले कई लंबित मुद्दों को सुलझाना चाहती है.
नरेंद्रन ने बताया कि बातचीत में कोक ओवन बंद करने और स्टील स्लैग के वर्गीकरण व प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल हैं. इन सभी मामलों का समाधान होने के बाद ही कंपनी अंतिम समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकेगी.
टाटा स्टील नीदरलैंड्स के IJmuiden में स्टील प्लांट संचालित करती है, जिसकी वार्षिक स्थापित क्षमता करीब 70 लाख टन है. कंपनी इस प्लांट में उत्पादन क्षमता और दक्षता बढ़ाने, स्थायी लागत कम करने और उत्पाद मिश्रण तथा मार्जिन को बेहतर बनाने के साथ कम-कार्बन स्टील उत्पादन की दिशा में बदलाव पर काम कर रही है.
2027 तक अंतिम समझौते का लक्ष्य
टाटा स्टील, नीदरलैंड्स सरकार और नॉर्थ हॉलैंड प्रांत ने IJmuiden प्लांट के डीकार्बोनाइजेशन को लेकर बातचीत आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है. अब तीनों पक्ष 1 मार्च 2027 तक अंतिम समझौते तक पहुंचने की दिशा में काम कर रहे हैं.
प्रस्तावित बदलाव के तहत टाटा स्टील नीदरलैंड्स मौजूदा परिसंपत्तियों की जगह डायरेक्ट रिडक्शन प्लांट और इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस लगाने की योजना पर काम कर रही है. इसके पहले चरण का उद्देश्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाना है. कंपनी और नीदरलैंड्स सरकार परमिट, कोक और गैस प्लांट, स्टील स्लैग तथा परियोजना के वित्तीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत कर रहे हैं.
बीते कारोबारी सत्र यानी मंगलवार को सेंसेक्स 685.34 अंक यानी 0.95 फीसदी चढ़कर 73,067.81 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 220.35 अंक यानी 0.98 फीसदी की बढ़त के साथ 22,776.10 पर पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को लगातार दूसरे दिन जोरदार तेजी के बाद बुधवार को कारोबार की शुरुआत दबाव में होने के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी 110 अंक से ज्यादा टूटकर 22,700 के नीचे आ गया है, जबकि एशियाई बाजार भी लाल निशान में कारोबार कर रहे हैं. दूसरी ओर, अमेरिकी बाजारों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने से घरेलू बाजार को कुछ सहारा मिल सकता है. अब निवेशकों की नजर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के फैसले पर है. ब्याज दरों में बदलाव का असर बैंकिंग, NBFC, रियल एस्टेट और ऑटो समेत कई सेक्टर के शेयरों पर देखने को मिल सकता है.
लगातार दूसरे दिन बाजार में जोरदार तेजी
बीते कारोबारी सत्र यानी मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे दिन तेजी रही. सेंसेक्स 685.34 अंक यानी 0.95 फीसदी चढ़कर 73,067.81 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 220.35 अंक यानी 0.98 फीसदी की बढ़त के साथ 22,776.10 पर पहुंच गया. बैंक निफ्टी भी 414 अंक चढ़कर 55,128 पर बंद हुआ, जबकि मिडकैप इंडेक्स में 638 अंक की तेजी रही और यह 59,761 पर पहुंच गया.
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 21 बढ़त के साथ बंद हुए. ट्रेंट 12.78 फीसदी की तेजी के साथ सबसे बड़ा गेनर रहा. कोटक महिंद्रा बैंक, हिंदुस्तान यूनिलीवर, रिलायंस इंडस्ट्रीज और इंडिगो में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली. दूसरी ओर, टेक महिंद्रा, टाइटन और बजाज फाइनेंस दबाव में रहे.
आज कमजोर शुरुआत के संकेत
मंगलवार की तेज बढ़त के बाद बुधवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में कमजोरी बढ़ गई. यह 110 अंक से ज्यादा टूटकर 22,700 के नीचे फिसल गया. इससे घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. इससे पहले गिफ्ट निफ्टी करीब 22,780 के स्तर पर कारोबार कर रहा था.
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी शेयर बाजारों की रिकॉर्ड तेजी घरेलू बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और RBI के फैसले से पहले निवेशकों की सतर्कता बाजार पर दबाव डाल सकती है.
RBI का फैसला आज, ब्याज दरों पर बाजार की नजर
आज बाजार की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा घरेलू ट्रिगर RBI की मौद्रिक नीति समिति का फैसला होगा. बाजार में 25 बेसिस पॉइंट की रेपो रेट बढ़ोतरी की अटकलें हैं. हालांकि, कुछ जानकारों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता और घरेलू महंगाई को देखते हुए RBI इस बार भी ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं कर सकता है.
निवेशकों की नजर सिर्फ रेपो रेट पर ही नहीं, बल्कि RBI के नीतिगत रुख और आगे ब्याज दरों को लेकर उसके संकेतों पर भी रहेगी. अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रही थी. वहीं, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी महंगाई और भारत के चालू खाते पर दबाव बढ़ा सकती है.
ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर के पार
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में दो दिन की गिरावट के बाद फिर तेजी लौटी है. ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी से आयात बिल, रुपये और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर शेयर बाजार की धारणा पर भी पड़ सकता है.
एशियाई बाजार कमजोर, अमेरिकी बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर
बुधवार सुबह एशियाई बाजारों में कमजोरी देखने को मिल रही है. जापान का निक्केई करीब 0.40 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा है, जबकि हेंगसेंग और कोस्पी करीब 0.50 फीसदी की गिरावट में हैं.
इसके उलट मंगलवार को अमेरिकी बाजारों में मजबूती रही. नैस्डैक और S&P 500 रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचे. अमेरिकी बाजारों की यह तेजी भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत दे सकती है, हालांकि घरेलू स्तर पर RBI का फैसला आज सबसे बड़ा बाजार ट्रिगर रहेगा.
टाइटन के शेयर पर भी नजर
आज टाइटन का शेयर भी फोकस में रहेगा. कंपनी के सितंबर तिमाही के कारोबारी अपडेट के मुताबिक, घरेलू कारोबार में सालाना आधार पर 22 फीसदी और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में 97 फीसदी की वृद्धि हुई. कंपनी का कुल कंज्यूमर कारोबार 25 फीसदी बढ़ा.
तिमाही के दौरान ज्वैलरी कारोबार में 21 फीसदी, घड़ियों से जुड़े कारोबार में 30 फीसदी और आईकेयर कारोबार में 28 फीसदी की वृद्धि हुई. कंपनी ने दूसरी तिमाही में भारत में 77 और विदेश में एक नया स्टोर खोला. इसके साथ 30 सितंबर 2026 तक टाइटन के कुल स्टोर की संख्या 3,758 हो गई.
इन शेयरों पर भी रहेगी नजर
RBI के ब्याज दरों के फैसले के चलते बैंकिंग और NBFC शेयरों में हलचल रह सकती है. ICICI बैंक, HDFC बैंक, SBI, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक के शेयर फोकस में रहेंगे. NBFC में बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस और चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट पर नजर रहेगी. हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों में LIC हाउसिंग फाइनेंस, PNB हाउसिंग फाइनेंस और बजाजा हाउसिंग फाइनेंस अहम रहेंगे.
दूसरी ओर, ब्याज दरों में बढ़ोतरी से होम लोन महंगा होने और आवासीय मांग प्रभावित होने की आशंका के कारण DLF, गोदरेज प्रॉपर्टीज, लोढ़ा डेवलपर्स, प्रेस्टीज एस्टेट्स और शोभा डेवलपर्स जैसे रियल एस्टेट शेयरों पर दबाव देखने को मिल सकता है. वाहन लोन महंगा होने की स्थिति में मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स, महिंद्रा, बजाज ऑटो, हीरो मोटोकॉर्प, टीवीएस मोटर और आयशर मोटर्स भी बाजार के रडार पर रहेंगे.
आज बाजार के लिए ये संकेत अहम
आज कारोबार के दौरान निवेशकों की नजर RBI MPC का फैसला, रेपो रेट, RBI का नीतिगत रुख, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, एशियाई बाजार और गिफ्ट निफ्टी पर रहेगी. मंगलवार की जोरदार तेजी के बाद अगर बाजार कमजोर खुलता है, तो शुरुआती कारोबार में मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है. हालांकि, RBI के फैसले और उसके बाद गवर्नर के संकेतों के आधार पर बाजार की दिशा में तेजी से बदलाव भी संभव है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
पोषण को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद प्रोटीन और फाइबर का पर्याप्त सेवन नहीं कर पा रहे शहरी भारतीय, कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी बनी बड़ी बाधा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय उपभोक्ताओं में पोषण और खासकर प्रोटीन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन इसका असर उनके रोजाना के खान-पान में पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं दे रहा है. यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च के साथ मिलकर किए गए पेप्सिको इंडिया के एक अध्ययन के मुताबिक, सर्वे में शामिल 70% शहरी भारतीय रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन का सेवन करते हैं. वहीं, 61% लोग रोजाना जरूरी मात्रा से कम फाइबर ले रहे हैं.
‘शहरी भारत में प्रोटीन एवं फाइबर की स्थिति’ नाम से किए गए इस अध्ययन में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और कोच्चि के 18 से 50 वर्ष की उम्र के 1,250 लोगों को शामिल किया गया. अध्ययन में लोगों की प्रोटीन और फाइबर को लेकर जानकारी, सेवन की आदतों, लाइफस्टाइल, नाश्ते की पसंद और खान-पान के विकल्पों को प्रभावित करने वाले कारकों को समझने की कोशिश की गई.
प्रोटीन को लेकर जागरूकता, लेकिन सही जानकारी का अभाव
अध्ययन के मुताबिक, 74% उपभोक्ताओं ने कहा कि उन्हें प्रोटीन की रोजाना जरूरत के बारे में जानकारी है. हालांकि, इनमें से 56% लोगों की जानकारी सही नहीं थी. यानी प्रोटीन की जरूरत को लेकर जागरूक होने का दावा करने वाले बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को इसकी सही मात्रा का पता नहीं था या वे इसे लेकर अनिश्चित थे.
इसका असर वास्तविक सेवन में भी दिखाई देता है. सर्वे में शामिल 70% लोग रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन का सेवन कर रहे थे. यह स्थिति अध्ययन में शामिल सभी पांच शहरों में देखने को मिली.
फाइबर के मामले में जागरूकता और जानकारी का अंतर ज्यादा
फाइबर को लेकर स्थिति और चुनौतीपूर्ण दिखाई दी. 59% लोगों ने कहा कि उन्हें पता है कि उन्हें रोजाना कितने फाइबर की जरूरत है, लेकिन इनमें से 89% लोगों की जानकारी गलत निकली. केवल 11% उपभोक्ता ही फाइबर की सही जरूरत के बारे में जानते थे.
अध्ययन में शामिल 61% लोग रोजाना अनुशंसित मात्रा से कम फाइबर का सेवन कर रहे थे. जेन एक्स में यह आंकड़ा 65% रहा, जबकि जेन जी और मिलेनियल्स में 58% लोग पर्याप्त फाइबर नहीं ले रहे थे.
कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी बड़ी बाधा
प्रोटीन को रोजाना के आहार में शामिल करने की राह में कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी प्रमुख बाधाओं के रूप में सामने आई. करीब 60% लोगों ने अधिक कीमत को बड़ी चुनौती बताया, जबकि 57% ने सुविधाजनक और भरोसेमंद प्रोटीन वाले खाद्य विकल्पों की कमी को समस्या माना.
फाइबर के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दी. 69% उपभोक्ताओं ने कहा कि सुविधाजनक और भरोसेमंद फाइबर वाले खाद्य विकल्पों की कमी उनके लिए बड़ी बाधा है. कोच्चि में यह आंकड़ा 74%, कोलकाता में 72% और मुंबई में 71% रहा.
उपभोक्ता चाहते हैं रोजमर्रा के खाने में आसानी से शामिल हो प्रोटीन
अध्ययन में यह भी सामने आया कि उपभोक्ता प्रोटीन को किसी अलग या मुश्किल डाइट के बजाय अपने रोजमर्रा के खान-पान का हिस्सा बनाना चाहते हैं. सभी आयु वर्गों में करीब 10 में से 9 लोगों ने कहा कि प्रोटीन को आहार में शामिल करना आसान और स्वाभाविक होना चाहिए.
जेन जी के बीच भी ऐसी ही प्राथमिकता देखने को मिली. अध्ययन के अनुसार, 89% उपभोक्ता चाहते हैं कि प्रोटीन को रोजमर्रा के आहार में आसानी से शामिल किया जा सके, जबकि 90% लोग चाहते हैं कि प्रोटीन परिचित और रोजाना खाए जाने वाले खाद्य विकल्पों के रूप में उपलब्ध हो.
जागरूकता से आगे बढ़कर सही जानकारी की जरूरत
पेप्सिको इंडिया की डायरेक्टर, आरएंडडी लाइफसाइंस और इंडिया आरएंडडी साइट लीड डॉ. अंकिता मारवाह ने कहा कि केवल पोषण के प्रति जागरूकता पर्याप्त नहीं है. उपभोक्ताओं को विश्वसनीय जानकारी को रोजमर्रा के व्यावहारिक विकल्पों में बदलने में मदद करना जरूरी है. उनके मुताबिक, अध्ययन प्रोटीन और फाइबर को लेकर जागरूकता, सही जानकारी और वास्तविक खान-पान के बीच के अंतर को सामने लाता है.
यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल के सीनियर कंसल्टेंट दिलीप राधाकृष्ण के अनुसार, अध्ययन से पता चलता है कि उपभोक्ताओं में प्रोटीन और फाइबर को लेकर रुचि तो है, लेकिन रोजाना की जरूरत की सही समझ का अभाव बना हुआ है. खासकर फाइबर के मामले में जागरूकता और सही जानकारी के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है.
अध्ययन के निष्कर्षों को भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के सहयोग से आयोजित एक कार्यक्रम में जारी किया गया. कार्यक्रम में पोषण, जन स्वास्थ्य और उद्योग जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया. चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि पोषण संबंधी जानकारी को केवल जागरूकता तक सीमित रखने के बजाय ऐसे व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने की जरूरत है, जिन्हें लोग आसानी से अपने रोजमर्रा के खान-पान में शामिल कर सकें.
सितंबर 2026 में देश में कुल 25,36,920 वाहनों की खुदरा बिक्री हुई, जो पिछले साल के मुकाबले 31.82% अधिक है. FADA के मुताबिक, त्योहारी मांग के साथ पिछले साल का कमजोर बेस भी इस तेज वृद्धि की बड़ी वजह है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में सितंबर 2026 में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है. फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में देशभर में कुल 25,36,920 वाहनों की खुदरा बिक्री हुई. यह सितंबर 2025 की तुलना में 31.82% अधिक है और किसी एक महीने में ऑटो रिटेल बिक्री का रिकॉर्ड स्तर है. त्योहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने के साथ-साथ पिछले साल की कम बिक्री का भी इस वृद्धि को फायदा मिला.
टू-व्हीलर और पैसेंजर व्हीकल की बिक्री में जोरदार उछाल
सितंबर में लगभग सभी प्रमुख ऑटो सेगमेंट में बिक्री बढ़ी. टू-व्हीलर की खुदरा बिक्री 33.08% बढ़कर 17,90,188 यूनिट हो गई. वहीं, पैसेंजर व्हीकल्स की बिक्री 32.1% की वृद्धि के साथ 4,27,213 यूनिट रही. कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी मजबूत मांग देखने को मिली. सितंबर में इसकी बिक्री 37.62% बढ़ी. थ्री-व्हीलर की बिक्री में 22.25% की वृद्धि दर्ज की गई.
पिछले साल के कमजोर बेस का भी असर
FADA के अध्यक्ष साई गिरिधर के मुताबिक, सितंबर की तेज वृद्धि को समझने के लिए पिछले साल के बेस को देखना जरूरी है. सितंबर 2025 के तीसरे सप्ताह में GST 2.0 लागू होने की आशंका के कारण कई ग्राहकों ने वाहन खरीदने का फैसला टाल दिया था. इससे पिछले साल सितंबर की बिक्री अपेक्षाकृत कमजोर रही थी और इस साल तुलना का आधार नीचे रहा.
हालांकि, FADA के मुताबिक सिर्फ बेस इफेक्ट को इस तेजी की वजह नहीं माना जा सकता. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में कुल वाहन बिक्री 1.55 करोड़ से अधिक रही है. इसके आधार पर वास्तविक वृद्धि दर करीब 20.77% रही, जो ऑटो बाजार में मांग की मजबूती को दर्शाती है.
पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन की हिस्सेदारी करीब बराबर
सितंबर के आंकड़ों में वाहन खरीद के बदलते रुझान की एक और तस्वीर सामने आई है. पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन से चलने वाले वाहनों की हिस्सेदारी अब लगभग बराबर पहुंच गई है. पेट्रोल वाहनों की हिस्सेदारी 41.27% रही, जबकि सीएनजी, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों सहित वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों की हिस्सेदारी करीब 41% तक पहुंच गई. इससे संकेत मिलता है कि भारतीय उपभोक्ताओं के बीच पारंपरिक पेट्रोल वाहनों के अलावा हाइब्रिड, सीएनजी और इलेक्ट्रिक विकल्पों की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है.
त्योहारी सीजन से आगे भी मांग मजबूत रहने की उम्मीद
डीलर्स को उम्मीद है कि त्योहारी सीजन के दौरान ऑटो बिक्री की रफ्तार बनी रह सकती है. नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान वाहन खरीदारी बढ़ने से आने वाले महीनों में बिक्री को और समर्थन मिल सकता है.
हालांकि, वाहनों की बढ़ती कीमतें उद्योग के लिए चुनौती बनी हुई हैं. डीलर्स का कहना है कि अगर कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती रही तो इससे ग्राहकों की खरीद क्षमता प्रभावित हो सकती है. ऐसे में मजबूत मांग के बावजूद वाहन कीमतों में बढ़ोतरी आने वाली तिमाहियों में बाजार की रफ्तार के लिए अहम जोखिम बन सकती है.
सरकार का कहना है कि कामों का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी के अवसर देने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जिनका गांवों में लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के साथ बुनियादी सुविधाओं और आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए सरकार ने कामों का दायरा काफी बढ़ा दिया है. विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी-जी राम जी के तहत अब 375 तरह के काम कराए जा सकेंगे. ग्रामीण विकास मंत्रालय की नई सूची में पानी संरक्षण, गांवों की बुनियादी सुविधाओं, आजीविका से जुड़े ढांचे और आपदा से बचाव के काम शामिल किए गए हैं. पहले इस व्यवस्था में 266 तरह के काम शामिल थे, यानी नई सूची में इनकी संख्या करीब 41 फीसदी बढ़ गई है.
मंत्रालय के अनुसार, 375 कामों को चार प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है. इनमें पानी की सुरक्षा से जुड़े 128 काम, गांवों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े 111 काम, आजीविका से जुड़े ढांचे के 98 काम और आपदा की तैयारी एवं बचाव से संबंधित 38 काम शामिल हैं. सरकार का कहना है कि कामों का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी के अवसर देने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जिनका गांवों में लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके.
पानी संरक्षण के लिए सबसे ज्यादा काम
नई सूची में सबसे ज्यादा 128 काम पानी से जुड़े हैं. इनमें छोटे बांध बनाने, भूजल स्तर बढ़ाने वाले ढांचे तैयार करने, नदियों और नालों के सुधार, जलभराव वाली जमीन को उपयोगी बनाने और खेतों तक पानी पहुंचाने वाली नालियों की मरम्मत जैसे काम शामिल हैं.
इसके अलावा बूंद-बूंद सिंचाई, फव्वारा सिंचाई और छतों से बारिश का पानी जमा करने से जुड़े काम भी कराए जा सकेंगे. पानी संरक्षण और सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए बर्फ के स्तूप और कृत्रिम हिमनद जैसे उपायों को भी सूची में शामिल किया गया है.
गांवों में पुस्तकालय से स्वास्थ्य केंद्र तक
गांवों की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए 111 तरह के कामों को मंजूरी दी गई है. इनमें सौर ऊर्जा से चलने वाली सड़क बत्तियां, ग्रामीण पुस्तकालय, पशु चिकित्सा केंद्र, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र और साझा सेवा केंद्र शामिल हैं.
सरकारी स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं और प्रयोगशालाओं का निर्माण भी कराया जा सकेगा. जल जीवन मिशन के तहत तैयार जलापूर्ति ढांचे की मरम्मत और रखरखाव के अलावा कचरे की छंटाई, पुनर्चक्रण और इस्तेमाल किए गए पानी को साफ करने से जुड़ी सुविधाएं भी इस श्रेणी में शामिल हैं.
ग्रामीण आजीविका बढ़ाने वाले 98 काम
नई सूची में ग्रामीण आय और कारोबार से जुड़े ढांचे पर भी खास जोर दिया गया है. इसके तहत 98 तरह के काम कराए जा सकेंगे. कुल कामों में इनकी हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी है, जबकि पुराने ढांचे में ऐसे कामों की हिस्सेदारी केवल 1.1 फीसदी थी. यह आंकड़ा कामों की संख्या के आधार पर है.
इनमें कृषि उत्पादों की सफाई, छंटाई और पैकिंग की इकाइयां, शीत भंडारण, छोटी आटा मिलें, मंडी परिसर और डेयरी से जुड़े ढांचे शामिल हैं. इसके अलावा मशरूम उत्पादन, रेशम उत्पादन, पॉलीहाउस और मछली पालन के लिए जरूरी ढांचे भी बनाए जा सकेंगे.
महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए कार्यस्थल, समूहों के लिए बाजार केंद्र और उनके संघों के भवन बनाने के साथ प्रशिक्षण एवं कौशल विकास केंद्रों को भी मंजूरी दी गई है.
आपदा से बचाव के लिए अलग श्रेणी
नई सूची में पहली बार आपदा की तैयारी और उससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अलग श्रेणी बनाई गई है. इसमें 38 तरह के काम शामिल हैं. बाढ़ के दौरान राहत आश्रय बनाने, मिट्टी खिसकने से रोकने वाली दीवारें तैयार करने, तटबंध मजबूत करने और बाढ़ से बचाव के उपायों को इसमें शामिल किया गया है. आपदा के बाद ग्रामीण सड़कों और सामुदायिक सुविधाओं को फिर से तैयार करने के काम भी कराए जा सकेंगे. जंगल की आग को फैलने से रोकने वाले उपाय भी इस श्रेणी का हिस्सा हैं.
खेती, महिलाओं और युवाओं पर भी जोर
मंत्रालय ने खेती, कमजोर परिवारों, महिलाओं और ग्रामीण युवाओं को ध्यान में रखते हुए भी कामों की पहचान की है. कुल सूची में खेती और इससे जुड़े क्षेत्रों के 181 काम हैं, जिनमें 52 काम व्यक्तिगत लाभार्थियों के लिए हैं.
कमजोर और अंत्योदय परिवारों के लिए 107 काम चिह्नित किए गए हैं. इनमें 68 काम व्यक्तिगत लाभार्थियों से जुड़े हैं. इनके तहत आवास, शौचालय, ऊर्जा, सिंचाई और पशुओं के आश्रय जैसी सुविधाएं तैयार की जा सकेंगी. महिलाओं और युवाओं से जुड़े 36-36 काम भी चिह्नित किए गए हैं. ये लाभार्थियों के आधार पर बनाई गई श्रेणियां हैं और इन्हें चार प्रमुख श्रेणियों के अतिरिक्त काम नहीं माना जाएगा.
ग्राम सभा तय करेगी प्राथमिकता
हर गांव में स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकसित ग्राम पंचायत योजना के जरिए कामों का चयन किया जाएगा. इसके बाद ग्राम सभा से इन योजनाओं को मंजूरी मिलेगी. कामों की डिजिटल निगरानी विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना ढांचे के जरिए की जाएगी.
सरकार के मुताबिक, इस व्यवस्था से केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर की विभिन्न योजनाओं के संसाधनों को एक साथ जोड़ने में मदद मिलेगी. साथ ही, एक ही काम पर अलग-अलग योजनाओं के तहत दोहराव वाला खर्च रोकने की कोशिश की जाएगी.
₹7,000 करोड़ से ₹18 करोड़ तक. बॉम्बे रेयॉन के ₹7,359 करोड़ के दावों के साथ परिसमापन में जाने से दो साल पहले, उसका तारापुर संयंत्र और ब्रांड एक नई कंपनी में चले गए थे. उस कंपनी ने बाद में ₹240 करोड़ जुटाए और अब उसे गोकलदास एक्सपोर्ट्स में समाहित किया जा रहा है. वह सवाल जिसका बॉम्बे रेयॉन ने कभी जवाब नहीं दिया: कारोबार छोड़ने के बदले उसे क्या मिला?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
उन्होंने दिवालिया होने की घोषणा नहीं की, उन्होंने बस अच्छी संपत्तियां दूसरी जगह कर दीं. अब बची हुई चीजों की नीलामी हो रही है. तीन आंकड़े इस कहानी को बताते हैं, इन्हें एक साथ रखिए और किसी और चीज की जरूरत नहीं है.
पहला ₹7,358.95 करोड़
यह वह राशि है जो बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड (बीआरएफएल) पर भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाले लेनदारों की बकाया थी, जब राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण ने 9 नवंबर 2023 को कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया.
दूसरा ₹18.32 करोड़
यह वह आरक्षित मूल्य है जिस पर कंपनी के परिसमापक राजीव रंजन सिंह ने 6 जुलाई 2024 की एक सूचना में पूरी कंपनी को चालू व्यवसाय के रूप में बेचने की पेशकश की.
यानी हर 400 रुपये के कर्ज के मुकाबले मांग की कीमत सिर्फ एक रुपया थी.
और फिर तीसरा आंकड़ा: ₹592 करोड़
यह वह कीमत है जिस पर सूचीबद्ध परिधान निर्यातक गोकलदास एक्सपोर्ट्स ने बीआरएफएल टेक्सटाइल्स प्राइवेट लिमिटेड (बीटीपीएल) को अपने में समाहित करने पर सहमति जताई है. बीटीपीएल का गठन अगस्त 2020 में हुआ था. कुछ ही हफ्तों के भीतर उसके पास बॉम्बे रेयॉन का तारापुर संयंत्र और उसके सभी ब्रांड थे.
संयंत्र कंपनी के पतन में नहीं खोया. इसे पतन से पहले ही हस्तांतरित कर दिया गया था. इसके बदले बॉम्बे रेयॉन को क्या मिला, यह किसी ने नहीं बताया है. संपत्ति चली गई. लेकिन कर्ज रह गया.
कंपनी क्या थी
बॉम्बे रेयॉन खुद को भारत की सबसे बड़ी शर्ट निर्माता कंपनी बताती थी. उसके पास 13 विनिर्माण इकाइयां थीं, हर साल 100 मिलियन मीटर कपड़े के उत्पादन की क्षमता थी और करीब 38,000 कर्मचारी थे. 2008 में इसके शेयर ₹400 से ऊपर कारोबार करते थे.
2026 तक इसका परिसमापक एक टोयोटा इनोवा, एक स्कोडा कोडियाक और 196 करघा कार्ड की नीलामी कर रहा था. इसके बीच, सितंबर 2020 में इसके शेयरधारकों ने एक प्रस्ताव को मंजूरी दी.
सबसे बड़ा संपत्ति हस्तांतरण
इस प्रस्ताव के तहत कंपनी के तारापुर कारोबार को चालू व्यवसाय के रूप में एकमुश्त बिक्री के जरिए बीटीपीएल को हस्तांतरित किया गया. बीटीपीएल का गठन कुछ ही हफ्ते पहले, 20 अगस्त 2020 को हुआ था.
तारापुर सूत-रंगाई और कपड़ा-प्रसंस्करण परिसर था. यह कारोबार का कोई छोटा हिस्सा नहीं था. यही कारोबार था. ब्रांड भी चले गए: बॉम्बे रेयॉन, बीआरएफएल, लिनेन वोग, गिजा क्लासे, डिकेंस एंड ब्राउन.
बीटीपीएल के पहले निदेशक मंडल में बॉम्बे रेयॉन का अपना प्रबंधन था: प्रशांत अग्रवाल, अमन अग्रवाल, सुरेश विश्वासराव और जॉन मैथ्यू. बॉम्बे रेयॉन के पास इसकी 70% हिस्सेदारी थी. फिर आंकड़े बताते हैं कि क्या हस्तांतरित हुआ था.
बॉम्बे रेयॉन की 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि उसका प्रमुख कारोबार, तैयार कपड़ों का निर्माण, वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान अलग किया गया. उसका परिचालन से राजस्व ₹83.08 करोड़ था.
उस साल बीटीपीएल का कारोबार ₹731.67 करोड़ था. कुल संपत्ति ₹1,101.61 करोड़ थी.
नई सहायक कंपनी उस सूचीबद्ध मूल कंपनी से करीब नौ गुना ज्यादा राजस्व कमा रही थी, जिसने उसे कारोबार सौंपा था. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने कोई कदम नहीं उठाया.
बाजार ने इसकी कीमत तय कर दी
एकमुश्त बिक्री के पांच महीने बाद, 11 फरवरी 2021 को बीटीपीएल ने घोषणा की कि उसे जेएम फाइनेंशियल इंडिया फंड-2 और सैन फ्रांसिस्को की निवेश कंपनी थिंक इन्वेस्टमेंट्स के नेतृत्व वाले समूह से ₹240 करोड़ का इक्विटी निवेश मिला है.
घोषणा में बताया गया था कि निवेशक किस चीज में पैसा लगा रहे थे. तारापुर संयंत्र भारत की एक ही छत के नीचे मौजूद सबसे बड़ी कपड़ा-प्रसंस्करण इकाई थी, जिसकी सालाना क्षमता 144 मिलियन मीटर या प्रतिदिन 4 लाख मीटर थी. इसमें सालाना 10.6 मिलियन किलोग्राम की कैप्टिव यार्न-डाइंग इकाई, कैप्टिव बिजली, अपशिष्ट जल उपचार और रिवर्स-ऑस्मोसिस जल की सुविधा थी. इसका वितरण नेटवर्क 100 से अधिक वितरकों और 8,000 से ज्यादा खुदरा विक्रेताओं तक फैला था.
बीटीपीएल के प्रबंध निदेशक और उससे कुछ समय पहले तक बॉम्बे रेयॉन के प्रबंध निदेशक रहे प्रशांत अग्रवाल ने नई कंपनी को पूरी तरह वित्तपोषित और लगभग कर्ज-मुक्त बताया.
वह एक कंपनी का वर्णन कर रहे थे. दूसरी कंपनी, जिसे वह चला चुके थे, पर ₹6,690 करोड़ का वित्तीय कर्ज था.
₹240 करोड़ का निवेश एकमुश्त बिक्री के कुछ महीने बाद बीटीपीएल में किया गया था. यह वह रकम नहीं है जो बॉम्बे रेयॉन को मिली थी और यह रिपोर्ट इस अंतर को खत्म नहीं करती. लेकिन यह एक संदर्भ बिंदु है. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड में पंजीकृत एक निजी इक्विटी कोष और सैन फ्रांसिस्को की एक कंपनी ने उस कंपनी में ₹240 करोड़ लगाए जिसके पास संयंत्र था, वह भी अल्पांश हिस्सेदारी के लिए. उसी समय जिस कंपनी ने संयंत्र छोड़ा था, वह दिवालियापन की ओर बढ़ रही थी.
पतन
सोलह महीने बाद, 7 जून 2022 को बॉम्बे रेयॉन को एक सूत व्यापारी की याचिका पर दिवालियापन प्रक्रिया में भेजा गया, जिसका ₹1.61 करोड़ बकाया था. इसके 17 महीने बाद कंपनी को परिसमापन में भेजने का आदेश दिया गया.
क्या परिसमापक राजीव रंजन सिंह जानते हैं कि बीआरएफएल की सबसे मूल्यवान संपत्ति कहां गई? क्या उन्होंने इसकी जांच की? सिंह को भेजी गई प्रश्नावली का कोई जवाब नहीं मिला. व्हाट्सऐप संदेश का भी कोई जवाब नहीं आया.
क्या बचा था
भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड में दाखिल परिसमापक की नीलामी सूचनाओं की बीडब्ल्यू ने समीक्षा की. जुलाई 2024 से जून 2026 के बीच ट्रूविजरी दिवाला पेशेवरों के सिंह ने निम्नलिखित संपत्तियों की पेशकश की:
1. बेंगलुरु के प्रोविडेंट वेलवर्थ सिटी में सात फ्लैट
2. प्रेस्टिज मोंटे कार्लो में एक फ्लैट
3. इस्लामपुर में श्री रेजीडेंसी के तीन फ्लैट
4. लोअर परेल के हसा महल में जी+3 इमारत
5. एक टोयोटा इनोवा और एक स्कोडा कोडियाक
6. बेल्लारी के कोंचिगेरी गांव में 2.1 मेगावाट की पवनचक्की
7. एमआईडीसी तारापुर में 8,030 वर्ग मीटर कृषि भूमि
8. 196 विद्युत करघा कार्ड
न कोई कताई मिल. न प्रसंस्करण केंद्र. न बुनाई शेड. न परिधान इकाई. और यह उस कंपनी के साथ हुआ, जिसके पास कभी 13 विनिर्माण इकाइयां थीं.
कीमतें लगातार गिरती जा रही हैं क्योंकि कुछ भी बिक नहीं रहा. नवंबर 2024 में प्रोविडेंट वेलवर्थ सिटी के एक फ्लैट का आरक्षित मूल्य ₹31.57 लाख था. सितंबर 2025 तक सात दौर की नीलामी के बाद यह घटकर ₹19.67 लाख रह गया.
भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड के रिकॉर्ड में सबसे हाल की सूचना 10 जून 2026 की है. इसमें बेल्लारी की पवनचक्की के लिए ₹3.30 करोड़ और करघा कार्ड के लिए ₹31.80 लाख की कीमत रखी गई है.
आखिरकार कीमत सामने आई: ₹592 करोड़
तारापुर के बॉम्बे रेयॉन से अलग होने के पांच साल बाद, एक सार्वजनिक दस्तावेज ने आखिरकार इसकी कीमत बताई.
9 अगस्त 2025 को गोकलदास एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के निदेशक मंडल ने कंपनी अधिनियम की धाराओं 230 से 232 के तहत बीटीपीएल को अपने में समाहित करने के लिए विलय योजना को मंजूरी दी. गोकलदास बेंगलुरु स्थित परिधान निर्यातक है. उसने जून 2024 में वैकल्पिक रूप से परिवर्तनीय ऋणपत्रों के जरिए बीटीपीएल में निवेश किया था और अगस्त 2025 तक उसके पास बीटीपीएल की 19% इक्विटी थी.
शेयर बाजारों में दाखिल योजना में बीटीपीएल की जारी पूंजी 59,23,38,329 इक्विटी शेयर बताई गई है, जिनमें प्रत्येक का अंकित मूल्य ₹10 है. धारा 8.2 में प्रत्येक बीटीपीएल शेयरधारक को दो विकल्प दिए गए हैं:
हर 3,581 बीटीपीएल शेयर के बदले 40 गोकलदास शेयर, या
30 गोकलदास शेयर और ₹8,952.50 नकद
इन दोनों विकल्पों के बीच का अंतर 10 गोकलदास शेयर और ₹8,952.50 है. इससे एक गोकलदास शेयर की कीमत ₹895.25 निकलती है. इसे वापस लागू करने पर 40 शेयरों की कीमत हर 3,581 बीटीपीएल शेयरों के लिए ₹35,810 होती है, यानी प्रत्येक बीटीपीएल शेयर के लिए ठीक ₹10.
बीडब्ल्यू की गणना के अनुसार, योजना के अपने आंकड़ों से बीटीपीएल की पूरी इक्विटी का मूल्य ₹592.34 करोड़ निकलता है, जो उसकी चुकता मूल्य के बिल्कुल बराबर है. गोकलदास ने पहले से मौजूद 19% हिस्सेदारी समेत बीटीपीएल के अधिग्रहण की कुल लागत ₹552 करोड़ बताई है.
कारोबार अब वैसा नहीं है जैसा पहले था. गोकलदास ने बीटीपीएल का वित्त वर्ष 2025 का कारोबार ₹371.42 करोड़ बताया है, जो 2021-22 के ₹731.67 करोड़ का लगभग आधा है. कुल संपत्ति ₹877.13 करोड़ और शुद्ध संपत्ति ₹147.57 करोड़ थी. लेकिन कीमत तो कीमत है और यह कीमत सार्वजनिक है.
जो कारोबार, ब्रांड और संपत्तियां बाहर चली गईं, उनके लिए ₹592 करोड़. और जो कुछ बचा रहा, उसके लिए ₹18.32 करोड़. संपत्ति और ब्रांड के हस्तांतरण के बाद बीआरएफएल का मूल्य 32 गुना घटा. बीआरएफएल खत्म हो गई. उसके ब्रांड दूसरी कंपनी में जिंदा हैं. योजना की धारा बी.1 में दर्ज है कि बीटीपीएल "हमारे ब्रांडों, यानी बॉम्बे रेयॉन, बीआरएफएल, लिनेनवोग - ला क्लासे, गिजा क्लासे, डिकेंस एंड ब्राउन और अन्य" के तहत कपड़े बनाती है.
धारा 4.2.1 के तहत ये सभी ब्रांड और ट्रेडमार्क गोकलदास को हस्तांतरित कर दिए गए. धारा 11 में कहा गया है कि बीटीपीएल "बिना परिसमापन के भंग" हो जाएगी. बीटीपीएल का पंजीकृत कार्यालय प्लॉट नंबर सी-6 और सी-7, एमआईडीसी तारापुर औद्योगिक क्षेत्र, बोइसर है. यही संयंत्र है.
इस तरह ₹7,358.95 करोड़ की देनदारी वाली कंपनी का नाम अब एक सूचीबद्ध परिधान निर्यातक के अंदर ब्रांड के रूप में जिंदा रहेगा. जिस कंपनी ने इसे बनाया था, उसकी अब एक-एक फ्लैट करके नीलामी हो रही है.
वे सवाल जिनका किसी ने जवाब नहीं दिया
ये सवाल केवल बयानबाजी नहीं हैं. इनके जवाब दस्तावेजों में मौजूद हैं.
तारापुर कारोबार के बदले बॉम्बे रेयॉन को क्या मिला?
ब्रांड के बदले उसे क्या मिला?
इनका मूल्यांकन किसने किया और किस आधार पर?
क्या मूल्यांकन स्वतंत्र था?
इन सवालों के जवाब सितंबर 2020 की वार्षिक आम बैठक की सूचना के स्पष्टीकरण विवरण और एकमुश्त बिक्री के पीछे मौजूद मूल्यांकन रिपोर्ट में हैं. बीडब्ल्यू द्वारा समीक्षा किए गए सार्वजनिक दिवालियापन रिकॉर्ड में ये मौजूद नहीं हैं.
गोकलदास की योजना पांचवां सवाल सामने लाती है, जो सबसे महत्वपूर्ण है.
5. बॉम्बे रेयॉन की बीटीपीएल में 70% हिस्सेदारी कहां है?
योजना में दर्ज है कि गोकलदास के पास 19% हिस्सेदारी है. बीटीपीएल की अधिकृत पूंजी में अब ₹625 करोड़ की इक्विटी, ₹375.79 करोड़ के सीरीज-ए वरीयता शेयर और ₹138.49 करोड़ के सीरीज-बी शेयर हैं, जिनके जरिए बाहरी पैसा आया. बॉम्बे रेयॉन की मूल 70% हिस्सेदारी के मुकाबले यह भारी हिस्सेदारी-कमी का संकेत देता है.
धारा 8.2 के तहत प्रभावी तारीख पर हर बीटीपीएल शेयरधारक को गोकलदास के शेयर या नकद मिलेगा. अगर बॉम्बे रेयॉन के पास, परिसमापन के दौरान भी बीटीपीएल के शेयर थे, तो उसके परिसमापक को सूचीबद्ध इक्विटी या नकद मिल सकता था. यह पैसा कंपनी के लेनदारों और उसके 2,027 बकाया कर्मचारियों का है. अगर उसके पास कोई हिस्सेदारी नहीं है, तो सार्वजनिक रिकॉर्ड में यह दिखना चाहिए कि वह 70% हिस्सेदारी कब, किसे और कितने में गई.
यही राजीव रंजन सिंह के लिए सवाल है.
एक समूह, मेज पर चार भूमिकाएं
मूल्यांकन महत्वपूर्ण होने की एक और वजह है. जिस वित्तीय समूह ने संपत्ति पाने वाली कंपनी में निवेश किया था, वह संपत्ति छोड़ने वाली कंपनी में भी गहराई से जुड़ा हुआ था.
लेनदार. 2018 में जेएम फाइनेंशियल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ने बॉम्बे रेयॉन में भारतीय स्टेट बैंक का ₹2,260.79 करोड़ का जोखिम ₹900 करोड़ में खरीदा. इससे सरकारी बैंक को एक ही कर्जदार पर ₹1,300 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ.
निवेशक. फरवरी 2021 में जेएम फाइनेंशियल इंडिया फंड-2, समूह के निजी इक्विटी कोष ने बीटीपीएल में ₹240 करोड़ के निवेश का नेतृत्व किया.
कर्जदाता. जेएम फाइनेंशियल एआरसी को बीटीपीएल का कर्जदाता भी बताया गया था, जिसके पास मार्च 2021 में करीब ₹137 करोड़ का ऋण था.
नियंत्रक. जब बॉम्बे रेयॉन दिवालियापन प्रक्रिया में गई, तो जेएम फाइनेंशियल के ₹6,080 करोड़ के स्वीकृत दावे ने उसे लेनदारों की समिति में 90.80% वोट दिए.
इस तरह समूह उस कंपनी का लेनदार था जिसने संपत्ति खोई, उस कंपनी का निवेशक और कर्जदाता था जिसने संपत्ति हासिल की और फिर पहली कंपनी के साथ क्या हुआ, उस पर उसके पास निर्णायक वोट था. जेएम फाइनेंशियल के प्रवर्तक निमेश और विशाल काम्पानी के पास भी बीपीटीएल में हिस्सेदारी है और उन्हें गोकलदास के शेयर मिलेंगे.
विशाल एन काम्पानी और निमेश काम्पानी के नाम पर 31,78,637 शेयर हैं, जो 0.54% हिस्सेदारी है. विवरण पुस्तिका में इस हिस्सेदारी का उल्लेख है. इसमें यह नहीं बताया गया है कि इसे कब, किस कीमत पर या किस आधार पर खरीदा गया. यह भी नहीं बताया गया है कि वित्तीय समूह के प्रवर्तकों के नाम व्यक्तिगत रूप से उस कंपनी में शेयर कैसे आए, जिसमें समूह की एआरसी का कर्ज था. दोनों लोगों को निवेश करने का अधिकार है. सवाल सिर्फ यह है कि रिकॉर्ड में क्या दिखना चाहिए और क्या नहीं दिखता.
डोनेयर समूह, वेल्सपन समूह और अरविंद ने सभी बॉम्बे रेयॉन की संपत्तियों में रुचि दिखाई थी. हर समाधान योजना खारिज कर दी गई. कंपनी परिसमापन में चली गई.
इन सभी मामलों में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड की ओर से गहन जांच की जरूरत है. वित्तीय समूह की हर इकाई स्वतंत्र और कानूनी तरीके से काम कर सकती है. लेकिन इससे इस कहानी के केंद्र में एक सवाल आता है.
क्या बॉम्बे रेयॉन से बाहर गई संपत्ति का मूल्य ठीक से तय किया गया था और लेनदारों के पास बची संपत्ति छोड़ने से पहले उसका सही तरीके से हिसाब किया गया था?
₹7.46 करोड़ जो दूसरी दिशा में चला
दिवालियापन फाइल की एक छोटी प्रविष्टि अपने आकार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.
नवंबर 2022 में बीटीपीएल ने बॉम्बे रेयॉन के खिलाफ ₹7.46 करोड़ का दावा दाखिल किया. समाधान पेशेवर ने इसे शून्य माना और इसकी वजह दर्ज की. मिलान किए गए आंकड़े सहायक कंपनी को भेजे गए थे, सबसे हाल में 11 जुलाई 2023 को ईमेल के जरिए, जिसमें बीटीपीएल की ओर से बॉम्बे रेयॉन को रकम देय दिखाई गई थी. कोई जवाब नहीं मिला.
इस तरह जिस कंपनी ने संयंत्र और ब्रांड लिए थे, उसने अपनी दिवालिया मूल कंपनी के खिलाफ दावा किया, उसे बताया गया कि पैसा उल्टी दिशा में बकाया है और फिर वह चुप हो गई.
इसी प्रविष्टि में इस दावे को संबंधित पक्ष का दावा नहीं माना गया, जबकि बॉम्बे रेयॉन के पास दावेदार कंपनी की 70% हिस्सेदारी थी.
मूल कंपनी अपनी ही सहायक कंपनी के अंदर नहीं देख पा रही थी. उसकी 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में बीटीपीएल को अंकेक्षण न किए गए अंतरिम आंकड़ों के आधार पर समेकित किया गया और उसके कंपनी सचिवीय लेखा परीक्षक ने दर्ज किया कि सहायक कंपनी के वित्तीय विवरण "उपलब्ध नहीं थे."
यह पैसा गायब नहीं हुआ है. गोकलदास की योजना की धारा 6.1 में कहा गया है कि बीटीपीएल की ओर से या उसके खिलाफ सभी कानूनी कार्यवाही गोकलदास एक्सपोर्ट्स के खिलाफ जारी रहेगी. अगर परिसमापक कभी उस रकम की वसूली करता है जिसे 2023 के मिलान में देय बताया गया था, तो वह एक सूचीबद्ध कंपनी के खिलाफ कार्रवाई कर रहा होगा.
चालू कारोबार की कीमत ने क्या नहीं मापा
₹18.32 करोड़ के आंकड़े में एक महत्वपूर्ण बात को शामिल करना जरूरी है और यह कहानी की एक अहम दिशा है.
चालू कारोबार की सूचना में उन संपत्तियों को बाहर रखा गया था "जिन्हें सुरक्षित वित्तीय लेनदारों द्वारा छोड़ा नहीं गया."
बॉम्बे रेयॉन के दो सुरक्षित वित्तीय लेनदारों, जेएम फाइनेंशियल एआरसी और एक्सिस बैंक के पास कुल ₹6,690.98 करोड़ का दावा था, जो सभी स्वीकृत दावों का 90.92% था. दिवालियापन कानून के तहत सुरक्षित लेनदार परिसमापन से बाहर रहकर अपनी सुरक्षा को खुद लागू कर सकता है.
इसलिए ₹18.32 करोड़ बॉम्बे रेयॉन की पूरी संपत्ति का मूल्यांकन कभी नहीं था. यह उस साझा पूल में बची संपत्ति की कीमत थी, जो सबसे बड़ी संपत्ति के दूसरी कंपनी में जाने और सुरक्षित लेनदारों द्वारा अपने अधिकार बरकरार रखने के बाद बची थी.
इन लेनदारों ने गिरवी रखी संपत्तियों से कितनी रकम वसूली और किस कीमत पर, इसका कोई उल्लेख सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं है. यह गायब आंकड़ा इस कहानी का दूसरा हिस्सा है.
कर्मचारियों को मिले पैसे. प्रवर्तकों को पूरे दावे.
2,027 कर्मचारियों ने बकाया राशि के रूप में ₹29.93 करोड़ का दावा किया. इसमें से सिर्फ ₹4.10 करोड़ स्वीकार किए गए, यानी प्रति रुपये करीब 14 पैसे.
जनार्दन अग्रवाल, बॉम्बे रेयॉन के चेयरमैन, ने कर्मचारी के रूप में ₹2.15 करोड़ का दावा दाखिल किया, जिसे संबंधित पक्ष के रूप में दर्ज किया गया. इसे पूरी तरह स्वीकार किया गया. प्रशांत अग्रवाल ने कर्मचारी के रूप में ₹1.03 करोड़ का दावा दाखिल किया. इसे भी पूरी तरह स्वीकार किया गया.
कर्मचारियों को 14 पैसे मिले. प्रवर्तकों को हर रुपया मिला.
बेंगलुरु, मुंबई, ठाणे और सोलापुर के भविष्य निधि कार्यालयों ने करोड़ों रुपये के दावे दाखिल किए. मार्च 2023 में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण ने आदेश दिया कि भविष्य निधि अंशदान के बराबर रकम संलग्न बैंक खातों की शेष राशि से अलग रखी जाए और भेजी जाए. समाधान पेशेवर ने इस आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील की.
बीआरएफएल के कर्मचारियों ने जिस संयंत्र को अपनी मेहनत और खून-पसीने से चलाया था, वह अब दूसरी कंपनी के अंदर चल रहा है, जो जल्द ही सूचीबद्ध कंपनी बनने वाली है. जिस कंपनी ने उन्हें रोजगार दिया था, उसकी अब एक-एक फ्लैट करके बिक्री हो रही है.
अब जवाब कौन देगा
बीटीपीएल में अब अलग निदेशक मंडल है: देवांग पारेख, राजन बालासुब्रमण्यम, राजगोपालन बालासुब्रमण्यन और सुब्बैया नटराजन. अब इसमें कोई अग्रवाल नहीं है.
लेकिन अब इसे कौन चला रहा है, यह सवाल नहीं है. सवाल यह है कि जिस समय मूल्य हस्तांतरित हुआ, उस समय क्या हुआ.
गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय पहले से बॉम्बे रेयॉन के मामलों की जांच कर रहा है. दांव पर लगी रकम में एक ही खाते पर भारतीय स्टेट बैंक को हुआ ₹1,300 करोड़ से अधिक का नुकसान भी शामिल है. यह केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के लिए जांच का मामला है. और क्या भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड को बीआरएफएल के शेयरधारकों के साथ हुए घटनाक्रम की चिंता है?
इस कहानी का सबसे सरल संस्करण, कि एक कपड़ा कंपनी ने बहुत ज्यादा कर्ज लिया और असफल हो गई, दस्तावेजों के सामने टिकता नहीं है.
जब तक परिसमापक पहुंचा, तब तक परिसमापन के लिए कोई कपड़ा साम्राज्य नहीं था. वहां फ्लैट थे. दो कारें थीं. एक पवनचक्की थी. 196 करघा कार्ड थे.
संयंत्र 2020 में जा चुका था. 2021 में उसमें ₹240 करोड़ की नई इक्विटी आई. 2025 में एक सूचीबद्ध कंपनी ने उसे ₹552 करोड़ में खरीदने पर सहमति जताई.
सिर्फ ₹7,358.95 करोड़ का कर्ज पीछे रह गया.
अगली कड़ी: अग्रवाल परिवार का दूसरा नेटवर्क.
यह रिपोर्ट भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड, राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण, कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय और शेयर बाजारों में दाखिल रिकॉर्ड; बॉम्बे रेयॉन फैशंस लिमिटेड की वार्षिक रिपोर्ट; फरवरी 2021 में बीआरएफएल टेक्सटाइल्स की सार्वजनिक घोषणा; और बीआरएफएल टेक्सटाइल्स तथा गोकलदास एक्सपोर्ट्स के बीच विलय योजना पर आधारित है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कमीशन कैप और खर्च सीमा में बदलाव टालने की मांग की, 2028 तक मौजूदा व्यवस्था जारी रखने की अपील
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इंश्योरेंस सेक्टर में रेगुलेटरी बदलावों को लेकर इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IBAI) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप की मांग की है. IBAI ने चेतावनी दी है कि इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े प्रस्तावित बदलावों से कम से कम 10 लाख लोगों की आजीविका पर जोखिम आ सकता है और सेक्टर में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है.
2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में IBAI के अध्यक्ष नरेंद्र भारिंदवाल ने कहा कि एसोसिएशन गलत तरीके से इंश्योरेंस बेचने पर रोक, लोन के साथ अनिवार्य रूप से इंश्योरेंस जोड़ने पर रोक और ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक पॉलिसी बेचने से जुड़े नियमों को मजबूत करने के भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के उद्देश्यों का समर्थन करता है. हालांकि, एसोसिएशन ने अलग-अलग प्रोडक्ट और डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों के लिए प्रस्तावित 30 से अधिक कमीशन कैप और इंश्योरेंस कंपनियों की कुल खर्च सीमा में एक-तिहाई कटौती पर आपत्ति जताई है.
2028 तक मौजूदा व्यवस्था जारी रखने की मांग
IBAI ने मांग की है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले इसका व्यापक प्रभाव आकलन किया जाए. एसोसिएशन ने यह भी कहा है कि 2023 में लागू किए गए एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट फ्रेमवर्क को उसकी निर्धारित 2028 की समीक्षा तक जारी रखा जाना चाहिए.
IBAI के मुताबिक, भारत में इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन से 83 लाख से अधिक प्रोफेशनल जुड़े हैं. इनमें व्यक्तिगत एजेंट, माइक्रो-इंश्योरेंस एजेंट, प्वाइंट ऑफ सेल पर्सन और अन्य मध्यस्थ शामिल हैं. एसोसिएशन का कहना है कि 27.18 लाख प्वाइंट ऑफ सेल पर्सन में से 14.81 लाख को ब्रोकर स्पॉन्सर करते हैं. इसके अलावा मोटर इंश्योरेंस सर्विस प्रोवाइडर्स में ब्रोकरों की हिस्सेदारी करीब 62 फीसदी है. इनमें बड़ी संख्या टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्वरोजगार से जुड़े लोगों की है.
IBAI का अनुमान है कि पांच साल की ट्रांजिशन अवधि में कम से कम 10 लाख ऐसी आजीविकाओं पर असर पड़ सकता है. इसमें इंश्योरेंस कंपनियों के वेतनभोगी कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया है.
खर्च सीमा घटने से नौकरियों पर असर की आशंका
एसोसिएशन का कहना है कि इंश्योरेंस कंपनियों के कुल खर्च की सीमा में एक-तिहाई कटौती होने पर कंपनियां सिर्फ दक्षता बढ़ाकर बचत हासिल नहीं कर पाएंगी. ऐसे में बिक्री, ग्राहक सेवा और क्लेम से जुड़े कर्मचारियों की संख्या कम करने का दबाव बन सकता है.
IBAI ने प्रोडक्ट और डिस्ट्रीब्यूशन चैनल के हिसाब से अलग-अलग सब-कैप लागू करने पर भी चिंता जताई है. एसोसिएशन का कहना है कि इससे 2023 के सुधारों से पहले जैसी स्थिति दोबारा बन सकती है और वैकल्पिक भुगतान के रास्ते बढ़ सकते हैं.
एसोसिएशन ने IRDAI के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2023 से पहले 15 इंश्योरेंस कंपनियां 824 करोड़ रुपये के फर्जी GST इनपुट क्रेडिट के मामलों में शामिल थीं. IBAI का तर्क है कि सख्त सब-कैप लागू होने से ओवरराइडिंग कमीशन जैसे वैकल्पिक भुगतान तंत्र को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे GST अनुपालन से जुड़ी पुरानी समस्याएं फिर सामने आ सकती हैं.
सरकारी बीमा कंपनियों को नुकसान की आशंका
IBAI ने यह भी कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की इंश्योरेंस कंपनियां ऐसे बदलावों से ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं. सरकारी ऑडिट के दायरे में होने के कारण इन कंपनियों के लिए ऑफ-द-बुक भुगतान की प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल होगा.
एसोसिएशन के मुताबिक, पिछली प्रोडक्ट-वाइज कमीशन कैप व्यवस्था के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की इंश्योरेंस कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी करीब 65 फीसदी से घटकर लगभग 36 फीसदी रह गई थी.
ब्रोकर्स की भूमिका कमजोर होने का डर
IBAI ने प्रस्तावित बदलावों से पॉलिसीधारकों के हितों के प्रतिनिधि के तौर पर इंश्योरेंस ब्रोकर्स की भूमिका कमजोर होने की आशंका भी जताई है. एसोसिएशन के अनुसार, ज्यादातर व्यक्ति और लगभग सभी बड़े कारोबारी ग्राहक ब्रोकर्स की सेवाएं लेते हैं. ब्रोकर्स ग्राहकों की ओर से कवरेज पर बातचीत करते हैं, अलग-अलग कंपनियों के विकल्पों की तुलना करते हैं और क्लेम लेने में मदद करते हैं.
IBAI ने IRDAI के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के खिलाफ आने वाली 69 फीसदी शिकायतें क्लेम से जुड़ी होती हैं, जबकि उसके पोर्टल पर दर्ज 63 फीसदी शिकायतों में फैसला ग्राहकों के पक्ष में रहा है.
एसोसिएशन ने 'इंश्योरेंस ब्रोकर' की जगह 'इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन एंटिटी' शब्द इस्तेमाल करने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाया है. उसका कहना है कि इस शब्द का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई मानक अर्थ नहीं है.
सभी चैनलों पर समान कमीशन कैप का विरोध
IBAI का कहना है कि कंसल्टेशन पेपर में दिए गए आंकड़े सभी डिस्ट्रीब्यूशन चैनलों पर एक जैसे प्रतिबंध लगाने को उचित नहीं ठहराते. एसोसिएशन के मुताबिक, जनरल इंश्योरेंस में मैनेजमेंट का कुल खर्च FY23 में प्रीमियम का 28.2 फीसदी था, जो FY25 में घटकर 26.5 फीसदी रह गया. इसी अवधि में प्रीमियम करीब 13 फीसदी की सालाना दर से बढ़ा.
IBAI ने अलग-अलग चैनलों की डिस्ट्रीब्यूशन लागत में बड़े अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया है. उसके अनुसार, लोन से जुड़े क्रेडिट लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट में कमीशन 42-45 फीसदी तक हो सकता है, जबकि डीलर-कंट्रोल्ड मोटर इंश्योरेंस में यह 75 फीसदी तक पहुंच सकता है. इसके मुकाबले स्वतंत्र ब्रोकर्स और एजेंटों का औसत कमीशन 17-18 फीसदी और कॉरपोरेट ग्राहकों को सेवा देने वाले ब्रोकर्स का औसत 6-11 फीसदी है.
एसोसिएशन का तर्क है कि सभी चैनलों पर समान कमीशन कैप लगाने से उन ब्रोकर्स पर ज्यादा असर पड़ेगा जिन्हें ग्राहक खुद नियुक्त करते हैं और जिनकी डिस्ट्रीब्यूशन लागत तुलनात्मक रूप से कम है.
IBAI ने दिया वैकल्पिक मॉडल
IBAI ने 2023 के एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट फ्रेमवर्क को जारी रखने का सुझाव दिया है. हालांकि, जहां जरूरी हो वहां खर्च की गणना के नियमों को सख्त करने और नए खिलाड़ियों तथा कंपनियों के आकार को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे बदलाव लागू करने की बात कही है. एसोसिएशन ने हार्ड कमीशन कैप से बचने की मांग की है.
फोर्स-सोल्ड इंश्योरेंस के मामले में IBAI ने ग्राहकों को मिलने वाले फायदे को क्लेम रेशियो से जोड़ने का सुझाव दिया है. उसका कहना है कि अगर क्लेम रेशियो 65 फीसदी जैसे तय स्तर से नीचे रहता है, तो इंश्योरेंस कंपनियों को प्रीमियम का कुछ हिस्सा वापस करने या रिन्यूअल प्रीमियम कम करने के लिए कहा जा सकता है.
IBAI का कहना है कि इससे लागत में होने वाली बचत सीधे पॉलिसीधारकों तक पहुंच सकती है, बजाय इसके कि सिर्फ डिस्ट्रीब्यूशन लागत घटने से प्रीमियम अपने आप कम होने की उम्मीद की जाए.
एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि कमीशन या खर्च सीमा से जुड़े किसी नए नियम को लागू करने से पहले पॉलिसीधारकों, रोजगार, सार्वजनिक क्षेत्र की इंश्योरेंस कंपनियों और विदेशी निवेश पर इसके प्रभाव का आकलन सार्वजनिक किया जाए. IBAI ने 25 अक्टूबर की समयसीमा से पहले प्रधानमंत्री के साथ बैठक का समय भी मांगा है.
VRRR नीलामी के जरिए RBI ने दो चरणों में सोखी अतिरिक्त नकदी, 4 अक्टूबर तक बैंकिंग सिस्टम में करीब ₹5.16 लाख करोड़ की सरप्लस लिक्विडिटी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए सोमवार को दो ओवरनाइट वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामियों के जरिए कुल 2.10 लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी सोखी. बैंकिंग सिस्टम में सरप्लस लिक्विडिटी काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है और 4 अक्टूबर तक यह करीब 5.16 लाख करोड़ रुपये थी.
पहली VRRR नीलामी में बैंकों ने 2 लाख करोड़ रुपये की अधिसूचित राशि के मुकाबले 2.11 लाख करोड़ रुपये की बोलियां लगाईं. RBI ने पूरी 2 लाख करोड़ रुपये की राशि स्वीकार की. इस नीलामी में भारित औसत दर 5.24 फीसदी रही.
दूसरी नीलामी में कम रही मांग
दूसरी VRRR नीलामी में बैंकों की भागीदारी अपेक्षाकृत कमजोर रही. 50,000 करोड़ रुपये की अधिसूचित राशि के मुकाबले बैंकों ने सिर्फ 10,142 करोड़ रुपये की बोलियां जमा कीं. RBI ने पूरी राशि स्वीकार कर ली. दोनों नीलामियों को मिलाकर केंद्रीय बैंक ने कुल 2,10,192 करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम से सोखे.
दो महीने से अतिरिक्त नकदी कम कर रहा RBI
RBI पिछले करीब दो महीनों से बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए कई VRRR नीलामियां कर चुका है. इसका उद्देश्य सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करना और ओवरनाइट मनी मार्केट की ब्याज दरों को रेपो रेट के आसपास बनाए रखना है.
4 अक्टूबर तक बैंकिंग सिस्टम में करीब 5.16 लाख करोड़ रुपये की सरप्लस लिक्विडिटी थी. इतनी बड़ी अतिरिक्त नकदी की वजह से ओवरनाइट ब्याज दरों पर नीचे की ओर दबाव बन सकता है. VRRR के जरिए RBI इस अतिरिक्त नकदी को अस्थायी रूप से अपने पास खींचता है.
FCNR(B) जमा से बढ़ी रुपये की लिक्विडिटी
बैंकिंग सिस्टम में हालिया लिक्विडिटी बढ़ने की एक वजह बैंकों की ओर से FCNR(B) जमा में हुई मजबूत बढ़ोतरी भी है. इन विदेशी मुद्रा जमाओं से देश में विदेशी मुद्रा आती है और RBI के साथ स्वैप के बाद बैंकिंग सिस्टम में रुपये की लिक्विडिटी बढ़ती है. इसके अलावा महीने के अंत में सरकार की ओर से वेतन और पेंशन भुगतान समेत विभिन्न खर्चों ने भी बैंकिंग सिस्टम में नकदी बढ़ाने में योगदान दिया है.
रेपो रेट के आसपास दरें रखने की कोशिश
बार-बार VRRR नीलामी कराने से संकेत मिलता है कि RBI बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने पर लगातार ध्यान दे रहा है. केंद्रीय बैंक की कोशिश है कि अतिरिक्त लिक्विडिटी की वजह से ओवरनाइट मनी मार्केट की ब्याज दरें पॉलिसी रेपो रेट से बहुत नीचे न चली जाएं. इस तरह VRRR नीलामी RBI के लिए बैंकिंग सिस्टम में नकदी की मात्रा को संतुलित रखने और मौद्रिक नीति के असर को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण साधन बनी हुई है.
कंपनी IPO में 1.81 करोड़ शेयरों की OFS भी लाएगी, सोलर ग्लास और मॉड्यूल के चार प्रमुख कंपोनेंट बनाती है विशाखा रिन्यूएबल्स
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी ग्रुप के पोर्टफोलियो से जुड़े कारोबार वाली विशाखा रिन्यूएबल्स (Vishakha Renewables) ने IPO लाने की तैयारी शुरू कर दी है. अहमदाबाद स्थित कंपनी ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया है. प्रस्तावित IPO में 1,250 करोड़ रुपये का फ्रेश इश्यू और 1.81 करोड़ इक्विटी शेयरों की ऑफर फॉर सेल (OFS) शामिल है.
विशाखा रिन्यूएबल्स सोलर ग्लास, एनोडाइज्ड एल्युमिनियम फ्रेम, EVA/EPE एनकैप्सुलेंट और बैकशीट जैसे सोलर मॉड्यूल में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट बनाती है. कंपनी की ओर से कराई गई सितंबर 2026 की क्रिसिल इंटेलीजेंस रिपोर्ट के मुताबिक, विशाखा रिन्यूएबल्स भारत की ऐसी कंपनी है जो सोलर मॉड्यूल में इस्तेमाल होने वाले छह प्रमुख कंपोनेंट में से चार का उत्पादन करती है.
सोलर ग्लास से आता है आधे से ज्यादा रेवेन्यू
वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी के कुल रेवेन्यू में सोलर ग्लास की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही. इससे 1,072.86 करोड़ रुपये, यानी कुल रेवेन्यू का करीब 57 फीसदी हासिल हुआ. 31 मार्च 2026 तक कंपनी के पास प्रतिदिन 660 टन सोलर ग्लास उत्पादन क्षमता थी, जो करीब 4.40 GW के बराबर है. इसके अलावा एल्युमिनियम फ्रेम की क्षमता 3.37 GW, EVA/EPE एनकैप्सुलेंट की 6.03 GW और बैकशीट की 3.80 GW के बराबर थी.
सोलर ग्लास क्षमता करीब तीन गुना करने की योजना
कंपनी अपनी सोलर ग्लास उत्पादन क्षमता को 660 TPD से बढ़ाकर 1,920 TPD करने की योजना बना रही है. यह करीब 12.80 GW के बराबर होगी. इसके लिए कंपनी ने लगभग 2,500 करोड़ रुपये के कैपेक्स की योजना बताई है.
विशाखा रिन्यूएबल्स की मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं मुंद्रा सोलर टेक्नोपार्क में स्थित हैं. कंपनी के प्रमुख ग्राहकों में Mundra Solar PV और Mundra Solar Energy शामिल हैं, जो अडानी ग्रुप के पोर्टफोलियो की कंपनियां हैं.
अडानी ग्रुप की जरूरत का करीब 50 फीसदी करती है पूरा
कंपनी के पास सोलर ग्लास और एल्युमिनियम फ्रेम की सप्लाई के लिए लंबी अवधि के समझौते हैं. पहले चरण के सोलर ग्लास टेक-ऑर-पे समझौते की अवधि 15 साल है और इसमें सालाना उत्पादन का कम से कम 70 फीसदी उठाने की प्रतिबद्धता है. दूसरे चरण का समझौता 17 साल का है और इसमें भी कम से कम 70 फीसदी ऑफटेक की शर्त है.
क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, विशाखा रिन्यूएबल्स की मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं अडानी ग्रुप की सोलर ग्लास, मेटल फ्रेम, EVA और बैकशीट की कुल जरूरत का करीब 50 फीसदी पूरा करती हैं.
कर्ज का बोझ भी अहम
वित्त वर्ष 2025-26 के अंत में विशाखा रिन्यूएबल्स पर कुल 2,311.92 करोड़ रुपये का कर्ज था. कंपनी का डेट-टू-इक्विटी अनुपात 3.03 गुना और नेट डेट-टू-EBITDA अनुपात 5.62 गुना था.
FY26 में कंपनी का EBITDA मार्जिन 20.60 फीसदी और PAT मार्जिन 9.03 फीसदी रहा. IPO के जरिए कंपनी पूंजी बाजार से फंड जुटाने के साथ अपनी विस्तार योजनाओं को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है.