पीएम मोदी बोले उनका असामयिक निधन दुख पहुंचाने वाला है। वो एक शानदार बिजनेसमैन थे जो भारत की प्रोग्रेस पर विश्वास रखते थे, उनका निधन वाणिज्य और उद्योग जगत के लिए के नुकसान पहुंचाने वाला है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री के निधन पर पीएम मोदी ने दुख जताया है। सिर्फ पीएम ही नहीं देश के कई अन्य बड़े राजनीतिज्ञ और उद्योगपतियों ने भी उनके आक्स्मिक निधन पर दुख जताया है। साइरस मिस्त्री की मौत अहमदाबाद से मुंबई आते हुए सड़क दुर्घटना में हुई। साइरस मिस्त्री 54 वर्ष के थे।
पीएम मोदी ने क्या कहा
पीएम मोदी ने साइरस की मौत पर ट्वीट करते हुए लिखा, ''साइरस मिस्त्री का निधन आघात पहुंचाने वाला है. उनका असामयिक निधन दुख पहुंचाने वाला है. वो एक शानदार बिजनेसमैन थे जो भारत की प्रोग्रेस पर विश्वास रखते थे, उनका निधन वाणिज्य और उद्योग जगत के लिए के नुकसान पहुंचाने वाला है. उनके परिवार और मित्रों को मेरी सांत्वना.ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे''.
The untimely demise of Shri Cyrus Mistry is shocking. He was a promising business leader who believed in India’s economic prowess. His passing away is a big loss to the world of commerce and industry. Condolences to his family and friends. May his soul rest in peace.
— Narendra Modi (@narendramodi) September 4, 2022
राहुल गांधी ने भी जताया दुख
वहीं साइरस मिस्त्री के निधन पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ट्वीट कर शोक जताने में देरी नहीं लगाई। राहुल गांधी ने ट्वीट कर लिखा, ''साइरस मिस्त्री के अचानक निधन से हतप्रभ और दुखी हूं. वो देश के ब्राइट बिजनेस माइंड लोगों में से एक थे. जिन्होंने भारत के विकास में अहम योगदान दिया था. उनके परिवार के प्रति मेरी शोक संवेदनाएं''.
राजनीति ही नहीं बल्कि उद्योग जगत के लोगों ने भी साइरस मिस्त्री के निधन पर गहरा दुख जताया है। जिसमें महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा, सहित हर्ष गोयनका जैसे कई अन्य नाम शामिल हैं।
Saddened by the tragic news of the demise of former Chairman of Tata Sons, Cyrus Mistry.
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) September 4, 2022
He was amongst the brightest business minds of the country, who made a significant contribution to India’s growth story.
My heartfelt condolences to his family, friends and admirers.
उद्योगपतियों ने भी जताया दुख
टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने उनके निधन पर दुख जताते हुए लिखा, ''मैं सायरस मिस्त्री के आकस्मिक निधन से बेहद दुखी हूं. ये बहुत ही दुखद है कि वो एक युवा उम्र में हम सभी को छोड़कर चले गए'' .
I am deeply saddened by the sudden and untimely demise of #CyrusMistry. He had a passion for life, and it is really tragic that he passed away at such a young age. My deepest condolences and prayers for his family in these difficult times: N Chandrasekaran, Chairman, Tata Sons pic.twitter.com/u7LVonCRNr
— ANI (@ANI) September 4, 2022
आनंद महिंद्रा ने लिखा, ''इस खबर को पचा पाना बेहद मुश्किल है। उन्होंने लिखा मुझे उन्हें टाटा संस में उनके छोटे कार्यकाल के दौरान जानने का मौका मिला. मुझे पूरा विश्वास है कि वो महान कार्यो के लिए बने थें अगर निय को उनके लिए कुछ और ही पसंद है तो वही सही। ओम शांति।
Hard to digest this news. I got to know Cyrus well during his all-too-brief tenure as the head of the House of Tata. I was convinced he was destined for greatness. If life had other plans for him, so be it, but life itself should not have been snatched away from him. Om Shanti ?? https://t.co/lOu37Vs8U1
— anand mahindra (@anandmahindra) September 4, 2022
वहीं आरपीजी एंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने लिखा, ''यह खबर सुनकर बहुत दुखी हूं. वह मेरे दोस्त एक प्रभावशाली व्यक्तित्व थे. उन्होंने वैश्विक कंस्ट्रक्शन दिग्गज शपूरजी पलोनजी को बनाने में बड़ी भूमिका निभाई और टाटा समूह का क्षमतापूर्वक नेतृत्व किया''.
So sad to hear of the shocking news of the passing away of #CyrusMistry in an accident. He was a friend, a gentleman, a man of substance. He was instrumental in creating the global construction giant Shapoorji Pallonji and ably led the Tata group.
— Harsh Goenka (@hvgoenka) September 4, 2022
महाराष्ट्र के सीएम ने जताया दुख
महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए इस घटना पर दुख जताया है। शिंदे ने कहा, '' साइरस मिस्त्री के निधन के बारे में सुनकर स्तब्ध हूं. वह न केवल एक सफल उद्यमी थे बल्कि उद्योग में एक युवा उज्जवल, और दूरदर्शी व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे. ये एक बड़ी क्षति है. उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि''.
Deeply sadden and shocked to know about the sad demise of former chairman of Tata Sons, Cyrus Mistry in a car accident near Palghar. My heartfelt condolences to his grieving family members and praying for sadgati of the departed soul… ॐShanti ? pic.twitter.com/dUVS9AOxEz
— Dr Shrikant Eknath Shinde (@DrSEShinde) September 4, 2022
नितिन गडकरी ने जताया दुख
साइरस मिस्त्री के निधन पर दुख जताते हुए नितिन गडकरी ने दुख जताते हुए कहा, ''महाराष्ट्र के पालघर के पास में हुई सड़क दुर्घटना में उनके निधन की खबर बेहद दुख देने वाली है. उनके परिवार के सदस्यों के प्रति मेरी संवेदना. भगवान उनकी आत्मा को शांति दे'' .
Deeply saddened to know about the unfortunate demise of Ex-Chairman of Tata Sons, Cyrus Mistry Ji in a road accident near Palghar, Maharashtra.
Sincerest condolences to his family members.
May he Rest In Peace.
Om Shanti.
— Nitin Gadkari (@nitin_gadkari) September 4, 2022
वीरेन्द्र सहवाग ने भी जताया दुख
वीरेन्द्र सहवाग ने दुख जताते हुए लिखा, ''ऐसे होनहार जीवन का दुखद अंत, टाटा संस के पूर्व अध्यक्ष, साइरस मिस्त्री"
"वो पीछे की सीट पर बिना सीटबेल्ट के बैठे थे और जो बच गए थे वे सीट बेल्ट के साथ आगे की सीट पर थे. पिछली सीट पर भी सीटबेल्ट जरूरी है"
Extremely tragic end to such a promising life,former Chairman of Tata Sons, #CyrusMistry. Heartfelt condolences.
— Virender Sehwag (@virendersehwag) September 4, 2022
He was sitting on the back seat without a seatbelt & the two who survived were on the front seat with seat belts on. Important to wear seatbelt even on the back seat pic.twitter.com/NWh5QyJlU6
बोमन इरानी ने भी जताया दुख
वहीं बोमन इरानी ने कहा, "साइरस मिस्त्री के निधन की खबर से स्तब्ध और दुखद हूं"
"देश व्यापार और पारसी समुदाय के लिए एक बड़ी क्षति"
"बहुत यंग थे, बहुत दुखद है "
Shocked and saddened by the news of the passing of #cyrusmistri .
— Boman Irani (@bomanirani) September 4, 2022
A giant loss for the country, the business world and the Parsi community.
Too young, too sad.
शिपरॉकेट का ऑपरेटिंग रेवेन्यू सालाना आधार पर 34.7 फीसदी बढ़कर 673.6 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 500.2 करोड़ रुपये था.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ई-कॉमर्स को लॉजिस्टिक्स और अन्य सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कंपनी शिपरॉकेट (Shiprocket) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मुनाफा दर्ज किया है. सितंबर तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड शुद्ध लाभ 0.6 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में उसे 20.3 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था. कंपनी को चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (Q1 FY27) में भी 13.7 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था.
रेवेन्यू में 34.7% की बढ़ोतरी
शिपरॉकेट का ऑपरेटिंग रेवेन्यू सालाना आधार पर 34.7 फीसदी बढ़कर 673.6 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 500.2 करोड़ रुपये था. तिमाही आधार पर भी कंपनी के रेवेन्यू में 13.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. पहली तिमाही में यह 592.1 करोड़ रुपये रहा था.
खर्च में भी हुई बढ़ोतरी
सितंबर तिमाही में कंपनी का कुल खर्च सालाना आधार पर 29.6 फीसदी बढ़कर 692.9 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में यह 534.8 करोड़ रुपये था. हालांकि, कंपनी के खर्च में बढ़ोतरी की रफ्तार ऑपरेटिंग रेवेन्यू की तुलना में कम रही.
इस दौरान कंपनी की अन्य आय बढ़कर 19.9 करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले साल की समान तिमाही में 14.3 करोड़ रुपये थी. इससे कंपनी की कुल आय 693.5 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. तिमाही के दौरान कंपनी की कुल आय उसके कुल खर्च से मामूली अधिक रही. सितंबर तिमाही में शिपरॉकेट ने किसी टैक्स खर्च की जानकारी नहीं दी.
बता दें, शिपरॉकेट के शेयर अगस्त 2026 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर लिस्ट हुए थे.
कंपनी ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में अब तक का सबसे अधिक तिमाही राजस्व दर्ज किया. प्लाईवुड, एमडीएफ, लैमिनेट्स और लॉजिस्टिक्स कारोबार में मजबूत वृद्धि से कंपनी के प्रदर्शन को सहारा मिला.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सेंचुरी प्लाईबोर्ड्स (इंडिया) लिमिटेड (CenturyPly) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में 1,780 करोड़ रुपये का अब तक का सबसे अधिक तिमाही राजस्व दर्ज किया है. यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 28.5 प्रतिशत अधिक है. कंपनी के प्रमुख कारोबारों में वृद्धि के साथ पूंजी पर रिटर्न (ROCE) भी सुधरकर 16.67 प्रतिशत पर पहुंच गया.
प्लाईवुड कारोबार का राजस्व 28.6% बढ़ा
कंपनी के प्लाईवुड कारोबार का राजस्व 28.6 प्रतिशत बढ़कर 982 करोड़ रुपये हो गया. वहीं, मीडियम डेंसिटी फाइबरबोर्ड (MDF) कारोबार ने 380 करोड़ रुपये का अब तक का सबसे अधिक तिमाही राजस्व दर्ज किया. लैमिनेट्स कारोबार के राजस्व में भी 20.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई.
पार्टिकल बोर्ड कारोबार में 211% की बढ़ोतरी
पार्टिकल बोर्ड कारोबार का राजस्व पहली बार तिमाही के दौरान 100 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया. इस खंड में 211 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. वहीं, कंपनी के लॉजिस्टिक्स कारोबार में 72.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.
ROCE सुधरकर 16.67% पर पहुंचा
कंपनी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर केशव भजांका ने कहा कि कारोबार के अलग-अलग क्षेत्रों को विकसित होते देखना उत्साहजनक है. नए ग्रोथ इंजन भी अब बड़े स्तर पर योगदान देने लगे हैं. उन्होंने कहा कि कंपनी का ROCE बढ़कर 16.67 प्रतिशत होना इस बात को दर्शाता है कि कारोबार के विस्तार के साथ परिचालन दक्षता और पूंजी के बेहतर इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया जा रहा है.
भजांका के मुताबिक, कंपनी को अभी कई क्षेत्रों में काम करना है. नई उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाने और फर्नीचर फिटिंग्स कारोबार में विस्तार के साथ आगे विकास की संभावनाएं हैं. उन्होंने कहा कि मौजूदा तिमाही के नतीजे कंपनी को आगे बढ़ने के लिए मजबूत आधार देते हैं.
रवि राजन एंड कंपनी के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर और BSE के पूर्व चेयरमैन एस रवि ने BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ अनुराग बत्रा के साथ इस बातचीत में उत्तराधिकारियों के मूल्यांकन, सार्वजनिक विवादों से कारोबार को बचाने और संपत्ति सृजन में कॉरपोरेट गवर्नेंस की अहमियत पर चर्चा की.
by
डॉ. अनुराग बत्रा
रवि राजन एंड कंपनी के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर और BSE के पूर्व चेयरमैन एस रवि ने BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ अनुराग बत्रा के साथ बातचीत में पारिवारिक कारोबार में उत्तराधिकार की योजना, अगली पीढ़ी के नेतृत्व का आकलन और सार्वजनिक विवादों से कंपनी की प्रतिष्ठा को बचाने जैसे अहम मुद्दों पर अपनी राय रखी. उन्होंने बताया कि कारोबार की दीर्घकालिक सफलता और संपत्ति सृजन के लिए मजबूत कॉरपोरेट गवर्नेंस, स्पष्ट उत्तराधिकार योजना और बोर्ड की एकजुटता कितनी जरूरी है. प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
अगली पीढ़ी को नेतृत्व सौंपने से पहले प्रमोटर को किन बातों का आकलन करना चाहिए?
सबसे पहले अगली पीढ़ी के गुणों और क्षमताओं का आकलन करना चाहिए. दूसरा, उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को समझना चाहिए. तीसरा, यह देखना चाहिए कि वे मौजूदा कारोबारी मॉडल में किस तरह खुद को शामिल करेंगे. कोई व्यक्ति कारोबार में रुचि रखने वाला और भविष्य को लेकर दूरदर्शी हो सकता है, जबकि किसी दूसरे व्यक्ति में कारोबारी समझ या इसमें रुचि ही न हो. हर व्यक्ति अलग होता है.
परिवारों का विस्तार हुआ है और अब उनके पास स्थिर कारोबार, संपत्ति और पूंजी है. अगली पीढ़ी के विचार और कारोबारी मॉडल अलग हैं, लेकिन उसे अपने पूर्वजों की विरासत भी आगे बढ़ानी है. मैं देख रहा हूं कि परिवार उत्तराधिकार की योजना के अनुरूप अपने कारोबारी मॉडल में बदलाव कर रहे हैं.
अगर अगली पीढ़ी कारोबार चलाने के बजाय फैमिली ऑफिस को प्राथमिकता दे तो क्या होगा?
कुछ युवाओं ने देखा है कि पिछली पीढ़ी ने लाइसेंस, सरकार और सही कारोबारी माहौल तैयार करने के लिए कितनी मेहनत की. उन्हें लग सकता है कि परिवार के पास पर्याप्त संपत्ति और डिविडेंड से होने वाली आय है. ऐसे में पेशेवर लोगों को कारोबार संभालने दिया जाए और वे अपना फैमिली ऑफिस बनाएं. इसमें बिल्कुल कुछ गलत नहीं है. यह व्यक्तिगत पसंद है और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए.
लेकिन जब तक आप पूरे समय निवेश के काम में नहीं लगे हैं, तब तक फैमिली ऑफिस में आपका केवल 20 या 30 फीसदी समय ही लग सकता है. युवा पीढ़ी को भी व्यस्त रहना होगा और ऐसा काम तलाशना होगा, जिसे करने में उसकी रुचि हो.
क्या उत्तराधिकार की योजना पर प्रमोटर परिवार से आगे भी पर्याप्त ध्यान दिया जाता है?
अक्सर लोग सोचते हैं कि उत्तराधिकार केवल परिवार के भीतर होता है. लेकिन यह अगली पीढ़ी के अधिकारियों और बोर्ड के सदस्यों से भी जुड़ा है. बोर्ड में हर किसी का एक कार्यकाल होता है. ऐसे में अगली जिम्मेदारी किसे सौंपी जाएगी? कुछ कंपनियां अगले 10 या 15 वर्षों के लिए बोर्ड में पदों की योजना बना रही हैं.
जब कोई संस्थान बहुत अधिक एक व्यक्ति पर केंद्रित हो जाता है, तो शेयरधारकों और प्रबंधन के बीच अंतर करना चुनौती बन जाता है. अच्छे लोग रिटायर होते हैं, लेकिन क्या आपने अपने अगले जनरल मैनेजर, वाइस प्रेसिडेंट या प्रेसिडेंट की योजना बनाई है? उत्तराधिकार की योजना स्वामित्व, बोर्ड और प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिकों (Key Managerial Personnel) के स्तर पर होनी चाहिए.
जब उत्तराधिकार को लेकर मतभेद सार्वजनिक हो जाते हैं, तो क्या होता है?
अगर बोर्ड बंटा हुआ है और यह बात सार्वजनिक हो जाती है, तो सभी की ब्रांड वैल्यू घटती है. इसमें कोई विजेता नहीं होता. यह व्यक्ति और कंपनी, दोनों के लिए नुकसान है. हम अगली पीढ़ी के सामने कैसी मिसाल पेश कर रहे हैं?
पेशेवर लोगों ने कारोबार की वृद्धि में बहुत बड़ा योगदान दिया है, लेकिन वे कंपनी के संरक्षक भी हैं. ब्रांड की रक्षा करना सभी पेशेवरों का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व है. स्वतंत्र निदेशकों और ट्रस्टियों की भूमिका कॉरपोरेट गवर्नेंस, नीतियों और भविष्य को लेकर होती है, लेकिन उन्हें स्वामित्व के अधिकारों में हस्तक्षेप करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.
हर व्यक्ति हर बात पर सहमत नहीं हो सकता. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कारोबारों को सफलतापूर्वक अलग कैसे किया जा सकता है.
पारिवारिक कारोबार के बंटवारे में किस व्यावहारिक जटिलता पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है?
क्रॉस गारंटी एक बड़ी चुनौती है. मान लीजिए कोई समूह 30 या 40 वर्षों से अस्तित्व में है और उसकी कंपनियों ने एक-दूसरे के लिए गारंटी दी हुई है. जब कारोबार अलग होते हैं, तो इन गारंटी का समाधान कैसे किया जाएगा? इसके लिए आपको बैंकरों और नियामकों पर निर्भर रहना पड़ता है. बंटवारे के बाद भी मैं आपके कारोबार के लिए जिम्मेदार क्यों रहूं?
ऐसा मध्यम आकार के कारोबारों में भी होता है. वे बढ़ते हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं, लेकिन पहले दी गई गारंटी जारी रहती है, क्योंकि उस समय कर्ज लिया गया था. हमें ऐसे स्पष्ट नियामकीय प्रावधानों की जरूरत है, जिनसे कारोबारों का हस्तांतरण और बंटवारा आसान हो सके.
भारत के आशाजनक उद्यमशीलता माहौल की राह में क्या बाधा बन सकता है?
हमने अच्छा काम किया है और कई अच्छी कंपनियां सामने आ रही हैं. हमें सकारात्मक उदाहरण दिखाई देते हैं, लेकिन असफलताएं भी हैं. प्रमुख शेयरधारकों के बीच अक्सर अच्छे समझौते नहीं होते. शेयरधारकों के समझौते कमजोर होते हैं. प्रमोटर्स और हितधारकों को एक साथ रहना चाहिए.
नई पीढ़ी की कंपनियों के लिए काफी संभावनाएं हैं, लेकिन उन्हें अधिक स्पष्ट कॉरपोरेट गवर्नेंस की जरूरत है. जिन लोगों का गवर्नेंस अच्छा होगा, उन्हें निवेश आसानी से मिलेगा. निवेशक फंड के दुरुपयोग या हेराफेरी नहीं चाहते. जब IPO के बाद प्रमोटर्स की दिलचस्पी कारोबार के बजाय निजी संपत्ति, घर और फ्लैट बनाने में अधिक हो जाती है, तो इससे निवेश का माहौल बेहतर नहीं होता.
आप अपनी कंपनी में उत्तराधिकार की योजना किस तरह बना रहे हैं?
इस पर काम चल रहा है. मेरा बेटा यहां है और मैंने उसे अपनी जगह बनाने की आजादी दी है. अकाउंटिंग के दायरे में टैक्स, ऑडिट, पारिवारिक समझौते, ट्रस्ट, वसीयत और फॉरेंसिक कार्य शामिल हैं. हर कोई सब कुछ नहीं कर सकता. किसी एक क्षेत्र को चुनना, उसमें विशेषज्ञता हासिल करना और आगे बढ़ना जरूरी है.
ग्राहक हमारे काम का पैमाना हैं. सेवा क्षेत्र के कारोबार में सबसे महत्वपूर्ण पूंजी लोग होते हैं. इसमें आपका ज्ञान और उस दिन दी गई सलाह शामिल होती है. अगर सलाह गलत हो, तो इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. चार्टर्ड अकाउंटेंसी फर्म में उत्तराधिकार का मतलब भरोसा है. अगली पीढ़ी को ग्राहकों के साथ उस भरोसे को अगले स्तर तक ले जाना होगा.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया जगत की प्रमुख हस्ती होने के साथ-साथ वह एंजेल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों एवं मीडिया पेशेवरों के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में सेवाएं दे रहे हैं और प्रबंधन शिक्षा से लंबे समय से जुड़े हैं.
MDI गुरुग्राम के पूर्व छात्र डॉ. बत्रा इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में रह चुके हैं और MDI एलुमनाई एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं. वह इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ टेलीविजन आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य भी हैं. उन्हें पढ़ने का शौक है और उनका मानना है कि जब जुनून ही पेशा बन जाता है, तो काम को एक गहरा उद्देश्य मिल जाता है.)
एक पूर्णकालिक सदस्य ने निप्पॉन से जुड़े आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. दूसरे सदस्य अभी फैसला नहीं कर पाए हैं. बॉन्ड फिर से जीवित हो गए हैं. और सेबी चेयरमैन की डायरी बार-बार निप्पॉन से टकरा रही है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
सायोनारा, तर्क
सेबी (SEBI) के लिए यह साल जापानी रंग में रंगा रहा है. चेयरमैन ओसाका गए, जापान के कौंसुल जनरल सेबी आए और सेबी का आदेश जारी होने से पहले ही निप्पॉन का पैसा आ गया. यहां तक कि लेह में 11,500 फीट की ऊंचाई पर भी चेयरमैन ने निप्पॉन इंडिया की शाखा में जाने का समय निकाल लिया. यह शहर की एकमात्र म्यूचुअल फंड कंपनी की शाखा है.
निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट (NAM India) ने यस बैंक के AT-1 बॉन्ड मामले में समझौता करने के लिए सेबी को 96.76 करोड़ रुपये का भुगतान किया है. पैसा कागजी कार्रवाई से पहले पहुंच गया. इस भुगतान को उचित ठहराने वाला आदेश अभी तक पारित नहीं हुआ है. अन्य जगहों पर किसी सौदे पर हस्ताक्षर होने से पहले किए गए भुगतान को अग्रिम राशि कहा जाता है. सेबी में इसे सैद्धांतिक मंजूरी कहा जाता है.
इस आदेश के लिए दो पूर्णकालिक सदस्यों की जरूरत है. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, संदीप प्रधान इस पर हस्ताक्षर कर चुके हैं. केवीआर मूर्ति ने अभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं. 15 अक्टूबर से यह फाइल आगे नहीं बढ़ी है. इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने उन बॉन्ड को फिर से जीवित कर दिया था, जिन्हें खत्म माना जा रहा था.
AT-1 बॉन्ड अब तक किसी टीवी धारावाहिक के खलनायक से भी ज्यादा बार खत्म होकर वापस आ चुके हैं. इस बार उनका फिर से जीवित होना सेबी के समझौते को भी अपने साथ ले डूब सकता है.
वह नुकसान, जो हुआ ही नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड को मार्च 2020 में राइट-डाउन करने के फैसले को रद्द कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह अवैध और अमान्य बताया.
सेबी का अगस्त 2024 का कारण बताओ नोटिस एक आंकड़े पर आधारित है. इसमें योजनाओं के AT-1 बॉन्ड निवेश का मूल्य शून्य माना गया और निवेशकों का नुकसान 1,828.70 करोड़ रुपये आंका गया. समझौता भी इसी आधार पर टिका है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 अप्रैल 2026 को सेबी के एक पत्र के जरिए भुगतान की गई राशि का करीब 93 फीसदी, यानी लगभग 89.74 करोड़ रुपये, उन निवेशकों को देने की बात कही गई थी, जिन्हें नुकसान हुआ था.
अब इन बॉन्ड की पूरी कीमत वापस मिल गई है. ब्याज के बकाया भुगतान को जोड़ने पर योजनाओं को करीब 2,900 करोड़ रुपये मिल सकते हैं. यह समझौते के तहत मिलने वाली राशि से लगभग 30 गुना अधिक है. और चूंकि निप्पॉन इंडिया ने 6 मार्च 2020 को इन बॉन्ड को साइड-पॉकेट में डाल दिया था, इसलिए इसकी वसूली उन सभी निवेशकों को मिलेगी, जिनके पास उस दिन यूनिट थीं. इसमें वे निवेशक भी शामिल हैं, जिन्होंने बाद में अपनी यूनिट बेच दी थीं.
इसलिए सवाल क्रिकेट स्कोरबोर्ड जितना छोटा है: आखिर किस नुकसान का समझौता किया जा रहा है?
सेबी जीते तो भी तर्क हारे
अगस्त 2025 में सेबी ने इसी मामले में अनिल अंबानी, जय अनमोल अंबानी और राणा कपूर की समझौते की अपीलें खारिज कर दी थीं. खबरों के मुताबिक, इसकी वजह निवेशकों को हुआ बड़ा नुकसान और पूरे बाजार पर पड़ने वाला प्रभाव बताया गया था. ये वही आधार हैं, जिनके तहत सेबी के नियम किसी मामले में समझौते से इनकार करने की अनुमति देते हैं.
एक ही नोटिस. एक ही लेनदेन. एक ही नुकसान. प्रमोटर्स से कहा गया कि मामला इतना गंभीर है कि इसमें समझौता नहीं हो सकता. लेकिन जिन फंड हाउस ने बॉन्ड खरीदे थे, उन्हें समझौता मिल गया.
अगर नुकसान के आधार पर अंबानी और कपूर को समझौते से बाहर रखा गया, तो यही आधार फंड हाउस पर भी लागू होना चाहिए. और अगर ऐसा नहीं था, तो 15 अक्टूबर के बाद शायद नुकसान बचा ही नहीं है. ऐसे में उन्हें समझौते से इनकार करने का सेबी का आधार भी खत्म हो गया है. सेबी नुकसान का तर्क दे सकता है या समझौते का. दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं.
इस महीने के नए समझौता नियमों के तहत जिन आवेदकों के आवेदन पहले खारिज हो चुके हैं, उन्हें दोबारा आवेदन करने के लिए एक बार 90 दिन का मौका दिया गया है. वकीलों को उम्मीद है कि NAM India के आदेश को आधार बनाकर समानता के अधिकार के तहत चुनौती दी जा सकती है. समझौते का उद्देश्य विवाद खत्म करना होता है. लेकिन सेबी में यह मामला तीन नए विवादों की शुरुआत कर सकता है.
सेबी के पास बचाव का एक तर्क है
सेबी के धोखाधड़ी-रोधी नियमों के तहत कार्रवाई के लिए नुकसान होना जरूरी नहीं है. इसके अलावा, 88.59 करोड़ रुपये की प्रबंधन फीस की वसूली और एक्सपोजर सीमा के उल्लंघन का मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी बना हुआ है. यह तर्क अपनी जगह सही है. लेकिन तब आदेश में स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि यह राशि नुकसान के लिए नहीं, बल्कि आचरण के लिए ली जा रही है. साथ ही यह भी बताना होगा कि समान आचरण के लिए एक नोटिस पाने वाली कंपनी को समझौते की अनुमति क्यों दी जा रही है, जबकि दूसरी को नहीं.
नवंबर में अप्रैल के गणित पर हस्ताक्षर करने का मतलब होगा कि सेबी उस आधार को सही ठहरा रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है.
एक हस्ताक्षर, एक खामोशी
यह फाइल सबसे पहले कमलेश वार्ष्णेय के पास गई थी, लेकिन उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया. इसके बाद फाइल मूर्ति और प्रधान के पास पहुंची. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मूर्ति ने इस पर संकोच जताया. समझौता पैनल का सामूहिक फैसला होता है, महज औपचारिक मुहर नहीं. अगर मूर्ति यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह आदेश अब भी तर्कसंगत है, तो संभव है कि वह इस इमारत में अकेले व्यक्ति हों, जो यह सवाल खुलकर पूछ रहे हैं.
सूत्रों के मुताबिक, दो साल तक NAM India और उसके अधिकारियों ने नोटिस के जवाब में मामले के गुण-दोष पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. छोटे फंड हाउस को शायद ही कभी दो साल तक चुप रहने की ऐसी छूट मिलती है. वे यह सोच सकते हैं कि इस फाइल को किस कतार में रखा गया था.
CBI को इसकी जानकारी नहीं मिली
CBI ने कपूर और अनिल अंबानी के खिलाफ रिलायंस निप्पॉन म्यूचुअल फंड और यस बैंक के बीच कथित 2,797 करोड़ रुपये के लेनदेन के बदले लाभ (Quid Pro Quo) के मामले में आरोपपत्र दाखिल किया है. आरोपपत्र देखने वाले लोगों के मुताबिक, इसमें सिक्का और त्रिपाठी की भूमिकाओं का भी जिक्र है. साथ ही पूरक आरोपपत्र दाखिल करने की छूट भी रखी गई है. BW Businessworld को NAM India की ओर से CBI की इस कार्रवाई के बारे में कोई एक्सचेंज डिस्क्लोजर नहीं मिला.
सिक्का AMFI के अध्यक्ष हैं, जो 75 लाख करोड़ रुपये के उद्योग का प्रतिनिधित्व करता है. एक एजेंसी उनके खिलाफ अपनी जांच पूरी कर रही है. दूसरी एजेंसी ने अपनी जांच का रास्ता खुला रखा है.
पांचवां T
तुहिन कांत पांडे ने सेबी की कमान संभालते समय चार T का वादा किया था: भरोसा (Trust), पारदर्शिता (Transparency), टीमवर्क (Teamwork) और टेक्नोलॉजी (Technology). पांचवां T, यानी समय (Timing), सबसे मुश्किल साबित हो रहा है.
22 जनवरी: निप्पॉन लाइफ के मुख्यालय वाले शहर ओसाका में निवेशकों की बैठक हुई. ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे पता चले कि उन्होंने निप्पॉन लाइफ से मुलाकात की थी. और हमारा यह सुझाव भी नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया. भूगोल कोई सबूत नहीं है. यह महज भूगोल है.
15 अप्रैल: सेबी का समझौता पत्र NAM India को भेजा गया.
22 जुलाई: जापान के मुंबई स्थित कौंसुल जनरल ने उनसे शिष्टाचार मुलाकात की.
15 सितंबर: लेह में सेना के लिए AMFI के निवेशक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान उन्होंने निप्पॉन इंडिया की शाखा का दौरा किया. यह इस क्षेत्र में किसी म्यूचुअल फंड हाउस का पहला कार्यालय है. 11,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शहर में एकमात्र फंड हाउस वही था, जो अपने नियामक के हस्ताक्षर का इंतजार कर रहा था.
सूत्रों के मुताबिक, निप्पॉन लाइफ भारत-जापान क्रिकेट मैच की मेजबानी भी कर रही है.
इनमें से कोई भी बात अपने आप में अनुचित नहीं है. लेकिन एक नियामक को निष्पक्ष दिखना भी जरूरी है.
जब किसी समझौते का तथ्यात्मक आधार खत्म हो चुका हो और फिर भी उसे हस्ताक्षर के लिए आगे बढ़ाया जा रहा हो, जबकि चेयरमैन का पूरा साल आवेदक के समूह और उसके देश के लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण मुलाकातों में बीता हो, तो यह महज छवि का सवाल नहीं रह जाता. यही मुख्य मुद्दा बन जाता है.
शीर्ष स्तर पर खामोशी
सेबी ने विस्तृत सवालों का जवाब नहीं दिया. CBI ने भी निप्पॉन के खिलाफ अपने मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
सेबी अब भी इस फाइल को वापस भेजकर गणना दोबारा कर सकता है. या फिर नवंबर में अप्रैल के समझौते पर हस्ताक्षर कर सकता है और आने वाले वर्षों तक ट्रिब्यूनल तथा उन नोटिस पाने वालों को इसका जवाब देता रह सकता है, जिन्हें उसने समझौते से बाहर कर दिया था.
फिलहाल, पैसा जमा हो चुका है, एक पेन रुक चुका है और दूसरा अब भी मूर्ति की जेब में है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
गुरुग्राम की Vaydha Advisory स्मॉल और मिड-कैप कंपनियों को निवेशक संबंध (Investor Relations), IPO की तैयारी, कंपनियों के विभाजन और अधिग्रहण से जुड़ी सलाह देगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वेदांता ग्रुप की पूर्व डिप्टी CFO स्वाति चौहान ने अपनी नई कंपनी वैधा एडवाइजरी (Vaydha Advisory) की शुरुआत की है. गुरुग्राम स्थित यह कंपनी भारत की स्मॉल और मिड-कैप सूचीबद्ध कंपनियों को निवेशक संबंधों (IR) से जुड़ी सलाह और सेवाएं देगी. चौहान अक्टूबर 2026 से इस कंपनी की संस्थापक के तौर पर काम कर रही हैं.
चौहान ने अपनी लिंक्डइन पोस्ट में बताया कि वेदांता में निवेशक संबंधों से जुड़े काम के दौरान उन्होंने महसूस किया कि कंपनियों के वित्तीय नतीजे हमेशा अपने आप पूरी कहानी नहीं बताते. निवेशकों को यह समझना भी जरूरी होता है कि कंपनी का प्रदर्शन किन वजहों से प्रभावित हो रहा है, विकास के लिए पूंजी कहां से आ रही है और भविष्य की कारोबारी रणनीति क्या है. उन्होंने कहा कि Vaydha का उद्देश्य कंपनियों के प्रबंधन को अपनी कारोबारी और निवेश संबंधी योजनाएं निवेशकों के सामने स्पष्ट और लगातार प्रभावी ढंग से रखने में मदद करना है.
तीन प्रमुख क्षेत्रों में देगी सलाह
Vaydha की लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, कंपनी की सेवाओं को तीन प्रमुख क्षेत्रों में बांटा गया है. इनमें सामान्य निवेशक संबंध सेवाएं, रणनीतिक निवेशक संबंध और विशेष कारोबारी परिस्थितियों से जुड़ी सलाह शामिल हैं.
सामान्य निवेशक संबंध सेवाओं के तहत कंपनी वित्तीय नतीजों की घोषणा, अर्निंग्स कॉल की स्क्रिप्ट तैयार करने और प्रबंधन को निवेशकों के सवालों के जवाब देने की तैयारी में मदद करेगी. वहीं, रणनीतिक सेवाओं में निवेशकों की पहचान और विश्लेषकों के साथ संवाद बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा.
इसके अलावा, कंपनी आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) की तैयारी, कंपनियों के विभाजन (डिमर्जर) और अधिग्रहण से जुड़े मामलों में भी सलाह देगी.
कंपनी की प्रोफाइल में धातु, खनन और प्राकृतिक संसाधनों सहित पांच क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है. इसके अलावा, कंपनी में दो से 10 कर्मचारियों की टीम होने का उल्लेख है. स्वाति चौहान खुद ग्राहकों से जुड़े कामकाज का नेतृत्व करेंगी.
वेदांता में पांच साल से अधिक का अनुभव
स्वाति चौहान ने वेदांता ग्रुप में पांच साल और तीन महीने तक काम किया. इस दौरान उन्होंने तीन अलग-अलग पदों पर जिम्मेदारी संभाली. अप्रैल 2024 से मई 2026 तक वह अनिल अग्रवाल फाउंडेशन में डिप्टी CFO रहीं. इससे पहले सितंबर 2022 से मार्च 2024 तक उन्होंने वेदांता में डिप्टी हेड-इन्वेस्टर रिलेशंस और मार्च 2021 से सितंबर 2022 तक ग्रुप फाइनेंशियल प्लानिंग एंड एनालिसिस (FP&A) में एसोसिएट जनरल मैनेजर के तौर पर काम किया.
वेदांता में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने 4 अरब डॉलर के कर्ज के पुनर्वित्त (Debt Refinancing) और समूह के पांच अलग-अलग कंपनियों में विभाजन से जुड़ी निवेशक संवाद प्रक्रिया में भी सहयोग किया.
वेदांता से पहले चौहान Apollo LogiSolutions, Delhivery और Wisdom Mart जैसी कंपनियों में काम कर चुकी हैं. Vaydha की लिंक्डइन प्रोफाइल में Lenovo का नाम भी उनके पूर्व पेशेवर अनुभव से जुड़ी कंपनियों में शामिल है.
इसके तहत कंपनी भारत में फोटोग्राफी, फिल्ममेकिंग और कंटेंट क्रिएटर से जुड़े तेजी से बढ़ते बाजार में निकॉन की मौजूदगी को मजबूत करने का काम करेगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
80dB कम्यूनिकेशंस ने निकॉन इंडिया का स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशन मैंडेट हासिल किया है. इस साझेदारी के तहत एजेंसी निकॉन की कॉरपोरेट और ब्रांड छवि को मजबूत करने, मीडिया के साथ संबंध विकसित करने, उत्पादों के प्रचार, कंपनी के नेतृत्व की पहचान बढ़ाने और कंटेंट क्रिएटर्स के साथ जुड़ाव बढ़ाने की जिम्मेदारी संभालेगी.
इस पहल का उद्देश्य भारत के तेजी से बदलते विजुअल स्टोरीटेलिंग इकोसिस्टम में निकॉन की स्थिति को और मजबूत करना है. इसके लिए एजेंसी Nikon की इमेजिंग तकनीक और मिररलेस कैमरा सेगमेंट में बढ़ते पोर्टफोलियो को प्रमुखता से सामने लाएगी. साथ ही RED डिजिटल सिनेमा टेक्नोलॉजी के जरिए फिल्ममेकिंग और क्रिएटिव क्षेत्र में उपलब्ध नए अवसरों को भी रेखांकित करेगी.
एजेंसी निकॉन इंडिया के नेतृत्व की सार्वजनिक छवि को मजबूत करने के साथ फोटोग्राफर्स, फिल्ममेकर्स और टेक्नोलॉजी मीडिया के साथ संबंधों को भी गहरा करेगी. इसके अलावा ब्रांड की प्रतिष्ठा से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी भी इसकी जिम्मेदारी होगी.
क्रिएटर इकोसिस्टम की जरूरतों को समझना प्राथमिकता
निकॉन इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर सज्जन कुमार ने कहा कि भारत में इमेजिंग का क्षेत्र तेजी से बदल रहा है. वीडियो और सिनेमैटिक स्टोरीटेलिंग के बढ़ते चलन से फोटोग्राफर्स, फिल्ममेकर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए नए अवसर खुल रहे हैं.
उन्होंने कहा कि निकॉन अपनी जी सीरीज के जरिए इमेजिंग क्षेत्र में अपनी क्षमताओं का विस्तार कर रहा है और उन्नत तकनीक को अधिक से अधिक क्रिएटिव लोगों तक पहुंचाने पर काम कर रहा है. कंपनी का फोकस क्रिएटर्स की बदलती जरूरतों को समझने और उन्हें अपने विचारों को वास्तविक रूप देने में मदद करने पर है.
उन्होंने 80dB कम्यूनिकेशंस के साथ साझेदारी को लेकर कहा कि इससे क्रिएटर्स और प्रोफेशनल्स के साथ कंपनी का जुड़ाव मजबूत होगा और भारतीय बाजार में निकॉन की मौजूदगी को विस्तार मिलेगा.
80dB कम्यूनिकेशंस ने क्या कहा?
80dB कम्यूनिकेशंस की को-फाउंडर और ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर अभिलाषा पाढ़ी ने कहा कि निकॉन जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड के साथ साझेदारी करना उनके लिए गर्व की बात है. इस ब्रांड ने एक सदी से अधिक समय से दुनिया को देखने और कहानियां बताने के तरीके को प्रभावित किया है.
उन्होंने कहा कि भारत में क्रिएटर्स तेजी से वीडियो और सिनेमैटिक फॉर्मेट अपना रहे हैं. ऐसे में एजेंसी का फोकस बेहतर स्टोरीटेलिंग, मीडिया और क्रिएटर्स के साथ भरोसेमंद संबंध बनाने और विजुअल स्टोरीटेलिंग के क्षेत्र में निकॉन इंडिया की पहचान को और मजबूत करने पर रहेगा.
सेबी ने म्यूचुअल फंड स्कीमों को शेयरों की खरीद और बिक्री से मिलने वाली रकम को आपस में एडजस्ट करने की अनुमति दी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शेयर बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने म्यूचुअल फंड कंपनियों के लिए शेयरों की खरीद-बिक्री से जुड़े भुगतान के नियमों में बदलाव किया है. अब एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम शेयर खरीदने और बेचने से बनने वाली भुगतान राशि को आपस में एडजस्ट कर सकेगी. इस व्यवस्था को नेट सेटलमेंट (Net Settlement) कहा जाता है. इससे म्यूचुअल फंड कंपनियों को लेनदेन के निपटान में आसानी होगी और कुछ समय के लिए अतिरिक्त नकदी जुटाने की जरूरत कम पड़ेगी.
सेबी ने 5 नवंबर को जारी सर्कुलर में इस बदलाव की जानकारी दी है. नए नियम 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे. इससे पहले नियामक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को भी इस तरह की सुविधा दे चुका है.
क्या है सेबी का नया नियम?
अभी तक म्यूचुअल फंड स्कीमों को शेयरों की खरीद और बिक्री के लिए भुगतान का निपटान अलग-अलग करना पड़ता था. नई व्यवस्था के तहत एक ही स्कीम तय सेटलमेंट अवधि में शेयर खरीदने और बेचने से बनने वाली रकम को एडजस्ट कर सकेगी. इसके बाद केवल बची हुई राशि का भुगतान करना होगा.
इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. मान लीजिए किसी म्यूचुअल फंड स्कीम ने 10 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे और उसी सेटलमेंट अवधि में 7 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए. नई व्यवस्था के तहत दोनों रकम को एडजस्ट करने के बाद स्कीम को केवल 3 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा. इससे फंड हाउसों को खरीदारी के लिए अस्थायी तौर पर अतिरिक्त पैसे की व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी.
क्या सभी म्यूचुअल फंड स्कीमों को मिलेगी यह सुविधा?
सेबी ने स्पष्ट किया है कि नेट सेटलमेंट की सुविधा केवल एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम के भीतर मिलेगी. यानी किसी फंड हाउस की दो अलग-अलग स्कीमों के लेनदेन की रकम को आपस में एडजस्ट नहीं किया जा सकेगा.
इसके अलावा, यदि कोई स्कीम एक ही सेटलमेंट अवधि में किसी शेयर की खरीद और बिक्री दोनों करती है, तो उस शेयर से जुड़े सौदों पर यह सुविधा लागू नहीं होगी. ऐसे लेनदेन का निपटान पहले की तरह अलग-अलग किया जाएगा.
यह व्यवस्था केवल शेयर बाजार के कैश सेगमेंट में निर्धारित शर्तों के तहत होने वाली सीधी खरीद और बिक्री के सौदों पर लागू होगी.
किन सौदों पर लागू नहीं होंगे नए नियम?
सेबी के मुताबिक, डेरिवेटिव्स, सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग (शेयर उधार लेने और देने), शॉर्ट सेलिंग और अन्य निर्दिष्ट लेनदेन को इस सुविधा से बाहर रखा गया है. हालांकि, शेयरों की डिलीवरी की मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा. नए नियम के तहत केवल भुगतान की रकम को एडजस्ट करने की अनुमति दी गई है.
म्यूचुअल फंड कंपनियों को करनी होगी ये तैयारी
सेबी ने एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) को नए नियमों के क्रियान्वयन के लिए जरूरी व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया है. इसके लिए एम्फी क्लियरिंग कॉरपोरेशन, स्टॉक एक्सचेंज, कस्टोडियन और अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर काम करेगा.
म्यूचुअल फंड कंपनियों और कस्टोडियन को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे हर स्कीम के लेनदेन और भुगतान का रिकॉर्ड अलग-अलग रखा जा सके. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि एक स्कीम की रकम का इस्तेमाल दूसरी स्कीम के भुगतान के लिए न हो.
निवेशकों पर क्या होगा असर?
सेबी के इस फैसले से म्यूचुअल फंड कंपनियों के लिए शेयरों की खरीद-बिक्री और भुगतान का प्रबंधन आसान हो सकता है. इससे फंड मैनेजरों को अस्थायी नकदी की जरूरत कम पड़ेगी और लेनदेन की प्रक्रिया अधिक कुशल हो सकेगी.
हालांकि, इस बदलाव का निवेशकों को मिलने वाले रिटर्न पर सीधा असर पड़ने की गारंटी नहीं है. यह मुख्य रूप से म्यूचुअल फंड कंपनियों के परिचालन और भुगतान निपटान से जुड़ा सुधार है.
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) ने इस हफ्ते करीब 5,200 करोड़ रुपये के बॉन्ड की शुद्ध खरीदारी की है. यह जुलाई के बाद किसी एक हफ्ते में उनकी सबसे बड़ी खरीदारी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में इस हफ्ते जोरदार तेजी देखने को मिली है. कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट से भारतीय बॉन्ड को सहारा मिला है. इसका असर विदेशी निवेशकों की खरीदारी में भी दिखाई दिया. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) ने इस हफ्ते करीब 5,200 करोड़ रुपये के बॉन्ड की शुद्ध खरीदारी की है. यह जुलाई के बाद किसी एक हफ्ते में उनकी सबसे बड़ी खरीदारी है. इस प्रदर्शन के साथ भारतीय सरकारी बॉन्ड उभरते एशियाई बाजारों में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले बॉन्ड बन गए हैं.
सरकारी बॉन्ड की यील्ड में 22 बेसिस पॉइंट की गिरावट
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इंडोनेशिया, फिलीपींस, चीन, मलेशिमया और थाईलैंड जैसे बाजारों की तुलना में इस हफ्ते भारतीय बॉन्ड का प्रदर्शन बेहतर रहा. शुक्रवार, 6 नवंबर को सुबह 11:40 बजे भारत के बेंचमार्क 6.94 फीसदी वाले 2036 में मैच्योर होने वाले सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.1973 फीसदी पर थी.
दिन के कारोबार के दौरान यील्ड में 2.5 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन पूरे सप्ताह में इसमें करीब 22 बेसिस पॉइंट की गिरावट दर्ज की गई. अप्रैल के बाद यह बॉन्ड बाजार का सबसे अच्छा साप्ताहिक प्रदर्शन हो सकता है. गौरतलब है कि बॉन्ड की यील्ड में गिरावट का मतलब उसकी कीमतों में बढ़ोतरी होता है.
FIIs ने एक हफ्ते में खरीदे ₹5,200 करोड़ के बॉन्ड
भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ने लगी है. इस हफ्ते FIIs ने करीब 5,200 करोड़ रुपये के बॉन्ड की शुद्ध खरीदारी की. जुलाई के बाद यह किसी एक सप्ताह में उनकी सबसे बड़ी खरीदारी है.
इसकी प्रमुख वजह अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड में आई गिरावट है. अमेरिका के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड इस हफ्ते करीब 10 बेसिस पॉइंट नीचे आई है. इससे भारतीय बॉन्ड विदेशी निवेशकों के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा आकर्षक हो गए हैं. विशेषज्ञों के अनुसार,रुपये की स्थिरता, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें भारतीय बॉन्ड बाजार के लिए अहम हैं. इन परिस्थितियों के कारण भारत वैश्विक बॉन्ड निवेशकों के रडार पर तेजी से आ रहा है.
कच्चे तेल की कीमतों में 15% की गिरावट से रुपये को सहारा
कच्चे तेल की कीमतों में इस हफ्ते करीब 15 फीसदी की गिरावट आई है. अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीद से तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है. अप्रैल 2020 के बाद यह कच्चे तेल की कीमतों में सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट बताई जा रही है.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है. ऐसे में तेल की कीमतों में गिरावट से देश को कई मोर्चों पर राहत मिल सकती है. इससे आयात बिल और महंगाई का दबाव कम होने के साथ रुपये को भी मजबूती मिल सकती है.
इस सप्ताह रुपया करीब 1 फीसदी मजबूत होकर 94.10 प्रति डॉलर पर पहुंच गया. वहीं, निफ्टी 50 भी सप्ताह के दौरान 6.7 फीसदी चढ़कर 24,612 के स्तर पर पहुंच गया. विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की संभावनाओं ने भारतीय बाजार में निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है. हालांकि, उनका मानना है कि 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में आगे और गिरावट के लिए ईरान संकट का समाधान होना और कच्चे तेल की कीमतों का 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आना जरूरी होगा.
RBI की ओर से ब्याज दरें बढ़ाने की आशंका घटी
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से ब्याज दरों में बड़ी बढ़ोतरी की आशंका भी कम हुई है. एक निजी बैंक के ट्रेडर के मुताबिक, पहले बाजार में RBI की ओर से कुल 125 बेसिस पॉइंट तक ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना जताई जा रही थी. अब यह अनुमान घटकर 50 से 75 बेसिस पॉइंट रह गया है.
इसका असर ब्याज दरों से जुड़े ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप (OIS) बाजार में भी देखने को मिला है. एक साल की OIS दर इस हफ्ते 32 बेसिस पॉइंट घटकर 6.40 फीसदी पर आ गई. वहीं, दो साल की दर 34 बेसिस पॉइंट गिरकर 6.40 फीसदी और पांच साल की दर 37 बेसिस पॉइंट घटकर 6.49 फीसदी रह गई. OIS दरों में आई गिरावट से संकेत मिलता है कि बाजार अब भविष्य में ब्याज दरों में बढ़ोतरी को लेकर पहले के मुकाबले कम आशंकित है.
FADA के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में देशभर में कुल 31,72,000 से अधिक वाहनों का रजिस्ट्रेशन हुआ, जबकि पिछले साल इसी महीने बिक्री का आंकड़ा इससे काफी अधिक था.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में ऑटोमोबाइल की खुदरा बिक्री अक्टूबर में सालाना आधार पर 23.8 फीसदी घटकर करीब 31.72 लाख यूनिट रह गई. दोपहिया और यात्री वाहनों की बिक्री में आई गिरावट ने कुल आंकड़ों को प्रभावित किया. हालांकि, फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के मुताबिक, बिक्री में इस गिरावट की प्रमुख वजह त्योहारी कैलेंडर में बदलाव है. इस बीच, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की कुल रिटेल बिक्री में हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 11.5 फीसदी पर पहुंच गई.
FADA के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में देशभर में कुल 31,72,000 से अधिक वाहनों का रजिस्ट्रेशन हुआ, जबकि पिछले साल इसी महीने बिक्री का आंकड़ा इससे काफी अधिक था. दोपहिया वाहनों की खुदरा बिक्री में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई. इस श्रेणी में बिक्री सालाना आधार पर 28.35 फीसदी घटकर 23.21 लाख यूनिट रह गई. वहीं, यात्री वाहनों की बिक्री 4.23 फीसदी गिरकर करीब 5.08 लाख यूनिट पर आ गई.
त्योहारों की तारीखों में बदलाव का असर
FADA के मुताबिक, अक्टूबर में बिक्री के आंकड़ों में गिरावट की एक बड़ी वजह इस साल त्योहारों का नवंबर में पड़ना है. पिछले साल नवरात्रि और दिवाली दोनों अक्टूबर में थे, जबकि इस साल नवरात्रि अक्टूबर में और धनतेरस व दिवाली नवंबर में मनाई जा रही है.
FADA के अध्यक्ष साई गिरिधर ने कहा कि अक्टूबर भारत में ऑटोमोबाइल खुदरा बिक्री के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण महीनों में से एक होता है. इसलिए इस साल के आंकड़ों को त्योहारी कैलेंडर में हुए बदलाव के संदर्भ में देखना जरूरी है. उनके मुताबिक, पिछले साल अक्टूबर में नवरात्रि और दिवाली एक साथ पड़ने के अलावा, 22 सितंबर 2025 को GST दरों में कटौती के बाद लंबे समय से रुकी मांग भी बाजार में आई थी. इस वजह से पिछले साल का बिक्री आधार काफी ऊंचा था.
ग्रामीण इलाकों में दोपहिया वाहनों की बिक्री ज्यादा घटी
FADA के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर में ग्रामीण क्षेत्रों में दोपहिया वाहनों की खुदरा बिक्री 33.97 फीसदी घट गई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह गिरावट 20.77 फीसदी रही. दूसरी ओर, इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री करीब 3.55 लाख यूनिट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. कुल वाहन बिक्री में EV की हिस्सेदारी पिछले साल के करीब 6 फीसदी से बढ़कर इस साल 11.5 फीसदी हो गई.
एक और अहम बदलाव वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों की बढ़ती मांग के रूप में सामने आया. अक्टूबर में CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की संयुक्त हिस्सेदारी कुल बिक्री में 41.83 फीसदी रही, जो पेट्रोल वाहनों की 41.6 फीसदी हिस्सेदारी से अधिक थी.
कमर्शियल वाहन, तिपहिया और ट्रैक्टर की बिक्री में बढ़ोतरी
जहां दोपहिया और यात्री वाहनों की बिक्री में गिरावट रही, वहीं अन्य वाहन श्रेणियों का प्रदर्शन बेहतर रहा. अक्टूबर में कमर्शियल वाहनों की खुदरा बिक्री 2.29 फीसदी बढ़कर करीब 1.15 लाख यूनिट हो गई. तिपहिया वाहनों की बिक्री 3.97 फीसदी बढ़कर 1.41 लाख यूनिट और ट्रैक्टरों की बिक्री 3.10 फीसदी बढ़कर 79,285 यूनिट पर पहुंच गई.
निर्माण उपकरणों की बिक्री में भी 22.07 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 7,434 यूनिट रही. साई गिरिधर के मुताबिक, कुल मिलाकर अक्टूबर अब तक का दूसरा सबसे अच्छा महीना रहा. वहीं, कमर्शियल वाहनों, तिपहिया वाहनों और ट्रैक्टरों के लिए यह अब तक का सबसे बेहतर अक्टूबर साबित हुआ.
नवंबर में बिक्री को लेकर डीलरों को उम्मीद
FADA ने बताया कि सितंबर के मुकाबले अक्टूबर में वाहन बिक्री में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जो त्योहारी मांग का संकेत देती है. डीलरों को नवंबर में बिक्री बेहतर रहने की उम्मीद है, क्योंकि इस महीने 6 नवंबर को धनतेरस और 8 नवंबर को दिवाली है.
एसोसिएशन के मुताबिक, नवंबर में त्योहारी खरीदारी से ऑटो बाजार को सहारा मिल सकता है. हालांकि, दिसंबर और जनवरी में बिक्री का रुख साल के अंत में मिलने वाले डिस्काउंट, नए मॉडल की लॉन्चिंग और ग्राहकों की मांग के अनुरूप वाहनों की उपलब्धता पर निर्भर करेगा.
भारत ने अब तक 310 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता स्थापित की है. 2030 तक 500 गीगावाट का लक्ष्य हासिल करने के लिए 190 गीगावाट क्षमता और जोड़नी होगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 2030 तक 220 अरब डॉलर की अनुमानित निवेश जरूरत से अधिक पूंजी आने की उम्मीद है. केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने गुरुवार को यह भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि देश में स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का विस्तार तेजी से हो रहा है और इस क्षेत्र में घरेलू के साथ-साथ विदेशी निवेशकों की भी दिलचस्पी बढ़ रही है.
भारत मंडपम में आयोजित भारत रिन्यूएबल एनर्जी (BRE) समिट एंड एक्सपो 2026 से इतर बातचीत में जोशी ने बताया कि देश ने अब तक 310 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता स्थापित कर ली है. सरकार ने 2030 तक इसे बढ़ाकर 500 गीगावाट करने का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए अगले चार वर्षों में 190 गीगावाट अतिरिक्त क्षमता जोड़नी होगी.
जोशी ने कहा कि सरकार को भरोसा है कि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 220 अरब डॉलर की अनुमानित निवेश जरूरत से अधिक पूंजी जुटाई जा सकेगी. भारत का स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.
दो साल में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में आया 7 लाख करोड़ रुपये का निवेश
मंत्री ने बताया कि पिछले दो वर्षों में भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में करीब 7 लाख करोड़ रुपये का निवेश आया है. इसमें घरेलू निवेश के साथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भी शामिल है. यह निवेश देश में स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार और इस क्षेत्र में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है.
जोशी ने भारत में स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ने की रफ्तार का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि देश को शुरुआती 100 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता स्थापित करने में 10 साल लगे थे. इसके बाद अगली 100 गीगावाट क्षमता जोड़ने में सात साल का समय लगा. वहीं, हाल की 100 गीगावाट क्षमता सिर्फ दो वर्षों में स्थापित की गई है.
उन्होंने उम्मीद जताई कि क्षमता विस्तार की यह रफ्तार आगे भी तेज बनी रहेगी और भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य हासिल कर लेगा.
2030 के बाद 300 गीगावाट क्षमता जोड़ने की तैयारी
जोशी ने कहा कि सरकार 2030 के लक्ष्य से आगे की योजना पर भी काम कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश के अनुरूप अतिरिक्त 300 गीगावाट क्षमता जोड़ने के लिए रणनीति तैयार की जाएगी. इसका उद्देश्य आने वाले वर्षों में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन को और बढ़ाना है.
उन्होंने यह भी कहा कि भारत आपूर्ति श्रृंखला में संभावित बाधाओं से निपटने की तैयारी मजबूत कर रहा है. पहले आई चुनौतियों से मिले अनुभव के आधार पर सरकार ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर काम कर रही है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के दौरान आपूर्ति में रुकावटों का असर कम किया जा सके.
वैश्विक निवेशकों की भागीदारी बढ़ने का दावा
BRE समिट एंड एक्सपो 2026 में नीति निर्माता, निवेशक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और नवाचार से जुड़े विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं. जोशी के मुताबिक, पहली बार नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े तीन अहम आयोजनों को एक साथ आयोजित किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि इस आयोजन में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों की मौजूदगी भारत के स्वच्छ ऊर्जा विस्तार और ऊर्जा बदलाव में उसकी भूमिका को लेकर बढ़ते वैश्विक भरोसे को दिखाती है.