राजीब कुमार मिश्रा को सेबी ने किसी भी कंपनी के बोर्ड में छह महीने तक सीट रखने से प्रतिबंधित कर दिया और उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पीटीसी इंडिया (PTC India) के चेयरमैन राजीब मिश्रा ने सेबी के आदेश के खिलाफ स्टे के लिए सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल से संपर्क किया है. सेबी ने उन्हें कंपनी के मिसमैनेजमेंट का दोषी पाया है. पीटीसी इंडिया, जो एक सरकारी एनबीएफसी और पावर ट्रेडिंग कॉरपोरेशन की सहायक कंपनी है उसमें कुप्रबंधन, घोटाले और गंभीर कॉर्पोरेट गवर्नेंस की चूक के आरोपों के बाद, सेबी ने चेयरमैन राजीब मिश्रा को छह महीने के लिए किसी भी कंपनी के बोर्ड से प्रतिबंधित कर दिया है और उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है.
सेबी ने कंपनी के पूर्व एमडी पवन सिंह को भी मिसमैनेजमेंट का दोषी पाया है और उन पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है और दो साल के लिए किसी भी सूचीबद्ध कंपनी के बोर्ड में रहने से प्रतिबंधित कर दिया है. सेबी ने यह आदेश 12 जून को जारी किया था. सेबी ने कहा कि पवन सिंह, जो 1 फरवरी, 2012 से कंपनी में 10 साल से अधिक समय तक कार्यरत थे, उन्होंने कंपनी के मामलों में इस तरह से खुद को स्थापित कर लिया कि वे कंपनी के बोर्ड के पर्याय बन गए थे. पवन सिंह, जो एमडी और सीईओ थे, ने बोर्ड की प्रक्रिया को बाधित करने और विफल करने के इस प्रयास में अग्रणी भूमिका निभाई, जबकि राजीब मिश्रा ने इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई.
सेबी ने अपने कारण बताओ नोटिस (एससीएन) में आरोप लगाया था कि 2022 में राजीब मिश्रा और पवन सिंह के तहत पीटीसी इंडिया के छह स्वतंत्र निदेशकों (ID) ने इस्तीफा दे दिया था इसके अलावा ऑडिट समिति के चेयरमैन द्वारा उठाए गए मुद्दों को बैठक में सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया और दोनों ने इस्तीफा देने वाले ID द्वारा उठाई गई चिंताओं को निष्पक्ष रूप से नहीं देखा.
सेबी के हालिया आदेश में कहा गया है कि जिस ढीठ तरीके से पवन सिंह ने बोर्ड और ID (स्वतंत्र निदेशक) के साथ विरोधाभासी कार्य किया, उससे स्पष्ट होता है कि वह केवल कंपनी में अपनी सत्ता जमाने और महत्वपूर्ण मामलों में अपनी बात मनवाने में रुचि रखते थे. जब कंपनी के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्ति इस तरह की प्रवृत्तियों को अपनाते हैं, तो इसका नकारात्मक असर होना निश्चित है, जो इस तथ्य से स्पष्ट है कि कंपनी से दो सेट्स में आईडी ने जल्दी-जल्दी इस्तीफा दिया.
सेबी ने इसके साथ ही कहा कि किसी भी सूचीबद्ध कंपनी में आईडी एक निगरानीकर्ता के रूप में कार्य करते हैं और प्रबंधन को उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों को संबोधित करना होता है, लेकिन एमडी पवन सिंह बार-बार आईडी के साथ टकरावपूर्ण तरीके से काम कर रहे थे और अपने वर्चस्व की लड़ाई में लगे हुए थे. इसका पीएफएस (पीटीसी इंडिया फाइनेंस कॉर्पोरेशन) के प्रदर्शन पर गंभीर प्रभाव पड़ा और वित्तीय वर्ष 2019 से 2023 के दौरान, पीएफएस की संपत्ति 13,193 करोड़ रुपये से घटकर 7,634 करोड़ रुपये हो गई.
पीटीसी इंडिया की होल्डिंग कंपनी पावर ट्रेडिंग है, जिसमें चार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां एनटीपीसी लिमिटेड (NTPC Ltd.), एनएचपीसी लिमिटेड (NHPC Ltd), पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (Power Grid Corporation of India Ltd.) और पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (Power Finance Corporation Ltd.) जो सभी मिलकर 16.20 प्रतिशत शेयर रखती हैं.
SEBI ने इसके अलावा कहा कि राजीब मिश्रा सिंह के एक इच्छुक सहयोगी के रूप में काम कर रहे थे. पीटीसी इंडिया के चेयरमैन के रूप में मिश्रा के पास ID द्वारा उठाए गए मुद्दों को देखने और चीजों को सही करने का पूरा अधिकार था. उन्हें सुनिश्चित करना था कि सभी बोर्ड समितियों का प्रभावी ढंग से संचालन हो, जिससे बैठकों में स्वस्थ चर्चाएं हो सकें. इसके अलावा, उनका कर्तव्य था कि ID स्वतंत्र रूप से काम कर सकें और एक अनुकूल वातावरण में रह सकें, जबकि साथ ही यह सुनिश्चित करना भी कि बोर्ड के निर्णय प्रभावी रूप से लागू हों. हालांकि, उन्होंने ID द्वारा उठाए गए चिंताओं की अनदेखी की और सिंह को अपनी मर्जी से कंपनी चलाने दिया. इस मामले में कॉर्पोरेट गवर्नेंस के नियमों का उल्लंघन करने में मिश्रा की भूमिका भी है.
सेबी के कारण बताओ नोटिस
दिलचस्प बात यह है कि पवन सिंह ने रत्नेश कुमार को PFS में पूर्णकालिक निदेशक के रूप में शामिल होने की अनुमति नहीं दी, भले ही उनकी नियुक्ति बोर्ड और विभिन्न समितियों द्वारा मंजूर की गई थी. कई महीनों तक इंतजार करने के बाद, रत्नेश कुमार एनटीपीसी में वापस शामिल हो गए, जहां से वे आए थे. पवन सिंह ने रत्नेश कुमार की नियुक्ति का विरोध यह कहकर किया कि उन्हें NBFC में काम करने का अनुभव नहीं है. सेबी ने पाया कि कई बार एजेंडा नोटिस के साथ साझा नहीं किया गया था, बल्कि बाद में बहुत कम समय के लिए विचार के लिए निदेशकों के साथ साझा किया गया. एक ID जयंत गोकले ने पीटीसी इंडिया के बोर्ड में तीन आईडी को शामिल करने के एजेंडे पर आपत्ति जताई थी, क्योंकि यह तत्काल नहीं था और इसे बिना पूर्व एजेंडा आइटम के रखा जा रहा था.
SEBI ने पाया कि गोकले ने ऑडिट समिति की बैठकों के मिनटों के मसौदे में बदलाव के कई उदाहरण भी प्रदान किए, जहाँ पीटीसी इंडिया के प्रबंधन द्वारा मिनटों को सावधानीपूर्वक जोड़-घटाकर संशोधित करने के प्रयास किए गए थे. पवन सिंह और राजीब मिश्रा ने नागपट्टिनम पावर और इंफ्राटेक (NPL) के ऋण खाते में धोखाधड़ी का खुलासा करने वाली एक महत्वपूर्ण फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट के प्रकटीकरण में दो साल की देरी की और पटेल दराह-झालावार हाईवे को दिए गए ऋण की शर्तों में बोर्ड की मंजूरी के बिना एकतरफा बदलाव किए. सेबी का कहना है कि दोनों को पूर्व PFS चेयरमैन दीपक अमिताभ द्वारा उजागर किए गए मुद्दों की कोई परवाह नहीं थी, उन्होंने ID द्वारा किसी भी सूचना को नजरअंदाज किया और बोर्ड के साथ इसके बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की.
फोरेंसिक ऑडिट ने संकेत दिया था कि NPL को दिए गए ब्रिज लोन के तहत वितरित धन का दुरुपयोग और गबन हुआ था, जिससे खाते में धोखाधड़ी गतिविधियों का स्पष्ट संदेह पैदा हुआ. ऑडिट रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि PFS ने इसे आरबीआई को प्रकट नहीं किया. भले ही ऐसी गैर-प्रकटीकरण या गैर-अनुपालन में जानबूझकर या गलत इरादा शामिल नहीं था, लेकिन यह लापरवाही, कमजोर सिस्टम और नियंत्रण की कमी के कारण था कुल प्रबंधन विफलता.
सेबी ने कहा है कि उसको मिली सूचना के आधार पर जिसमें 'ऑडिट समिति द्वारा तीसरी तिमाही के परिणामों को अपनाने और सिफारिश न करने के कारणों की जांच की गई थी', उसे ऑडिट समिति के सामने नहीं रखा गया. सभी निदेशकों को इसके बारे में 28 जून, 2022 को तब पता चला जब सेबी ने एक फॉलो-अप ईमेल जारी किया. मिनट्स को इस तरह से तैयार किया गया था कि वे वास्तविक कार्यवाही को सटीक रूप से नहीं दर्शाते थे और ड्राफ्टिंग में पक्षपात को प्रकट करते थे. ऑडिट समिति का पुनर्गठन करने के प्रयास किए गए, जबकि सेबी की सलाह इसके विपरीत थी; और पहले लिए गए प्रबंधन के रुख को सही ठहराने के लिए कई कानूनी राय मांगी गईं.
(लेखक- पलक शाह, BW रिपोर्टर. पलक शाह ने "द मार्केट माफिया-क्रॉनिकल ऑफ इंडिया हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" नामक पुस्तक लिखी है. पलक लगभग दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं, उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसी प्रमुख वित्तीय अखबारों के लिए काम किया है).
JIO के इश्यू का आकार करीब ₹37,000 करोड़ से घटकर ₹30,000 करोड़ रह गया है, वैल्यूएशन ₹10.3 लाख करोड़ और ग्रे-मार्केट प्रीमियम ₹50 पर आ गया है. मस्क के चार दिनों तक चले हमले में रिलायंस ग्रुप के प्रमुख को ‘प्रधानमंत्री अंबानी’ कहे जाने के बाद, भारत का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ बनने की तैयारी में लगा यह इश्यू हुंडई से आगे निकलने के लिए संघर्ष कर रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
एंकर निवेशक निभा रहे हैं अहम भूमिका, वैश्विक फंड छूट की मांग कर रहे हैं. भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक निर्गम (IPO) का आकार घटा दिया गया है. हालांकि, इसकी कीमत अपने सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी से कम नहीं रखी जा रही है.
सौदे से परिचित लोगों के अनुसार, जियो प्लेटफॉर्म्स (JIO) 21 अक्टूबर को अपना इश्यू खुलने पर आम निवेशकों से करीब ₹26,000 करोड़ जुटाएगी. बैंकरों को ₹36,000-38,000 करोड़ जुटाए जाने की उम्मीद थी, जबकि पहले की रिपोर्टों में इश्यू का आकार ₹37,700 करोड़ बताया गया था. इस आकार के साथ यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा IPO बन सकता था. इश्यू के आकार में ₹6,000 करोड़ से ₹7,000 करोड़ तक की कटौती की गई है, जो कुल इश्यू का करीब 20% है.
कर्मचारी और शेयरधारक कोटे को जोड़ने के बाद कुल राशि लगभग ₹30,200 करोड़ या करीब 3.1 अरब डॉलर बैठती है. यह आंकड़ा सोच-समझकर चुना गया है. इससे जियो यह दावा कर सकती है कि उसका इश्यू अक्टूबर 2024 में आए हुंडई मोटर इंडिया के ₹27,870 करोड़ के आईपीओ से थोड़ा बड़ा है, जिसे भारत का सबसे बड़ा आईपीओ बताया गया था.
हालांकि, डॉलर में तस्वीर अलग है. हुंडई ने करीब 3.3 अरब डॉलर जुटाए थे. डॉलर के मुकाबले रुपया करीब ₹97 पर होने के कारण जियो का तथाकथित रिकॉर्ड इससे कम रह जाता है. वैश्विक निवेशकों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पैमाने पर भारत का सबसे बड़ा आईपीओ उस इश्यू से छोटा है, जिसे पीछे छोड़ने का वह दावा कर रहा है.
160 अरब डॉलर से घटकर ₹10.3 लाख करोड़ का वैल्यूएशन
जियो के शेयर का इश्यू प्राइस ₹1,119 तय किया गया है. इससे कंपनी का वैल्यूएशन करीब ₹10.3 लाख करोड़ या लगभग 106 अरब डॉलर बैठता है.
एक समय जियो का वैल्यूएशन 160 अरब डॉलर तक बताया जा रहा था. पिछले सप्ताह तक बाजार की रिपोर्टों में कहा जा रहा था कि जियो, भारती एयरटेल की तुलना में प्रीमियम वैल्यूएशन की मांग करेगी. लेकिन रोडशो से परिचित लोगों के अनुसार, वैश्विक फंडों ने एयरटेल की तुलना में करीब 30% की छूट की मांग की. उन्होंने बैंकरों से कहा कि वे जियो के लिए अधिक कीमत चुकाने के बजाय रिलायंस के शेयर खरीदना पसंद करेंगे. कारोबार शुरू होने से पहले ही वैल्यूएशन में करीब 54 अरब डॉलर की कमी आ चुकी है.
ग्रे मार्केट में भी उत्साह ठंडा पड़ गया है. पहले की रिपोर्टों में ग्रे-मार्केट प्रीमियम करीब ₹160 बताया गया था. अब यह लगभग ₹50 रह गया है, जो इश्यू प्राइस से 5% से भी कम अधिक है.
एंकर निवेशकों के भरोसे आईपीओ
₹26,000 करोड़ के इश्यू में से करीब ₹8,000 करोड़, यानी लगभग एक-तिहाई हिस्सा, सार्वजनिक निर्गम खुलने से पहले एंकर निवेशकों को आवंटित किया जाएगा. संस्थागत निवेशकों से बाकी बुक में केवल करीब ₹5,000 करोड़ की राशि है.
पहले दिन से ही करीब एक-तिहाई राशि के लिए प्रतिबद्धता मिलने के कारण सब्सक्रिप्शन के आंकड़े अच्छे दिखाई देंगे, चाहे खुदरा निवेशक कैसी भी प्रतिक्रिया दें. शेयरधारक कोटे के तहत रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरधारकों के लिए आरक्षित हिस्सेदारी से भी इश्यू को खरीदारों का एक अतिरिक्त समूह मिल जाता है.
2020 के निवेशकों को फिर नुकसान
2020 में जियो में 20.3 अरब डॉलर का निवेश करने वाले 13 वैश्विक निवेशकों को कम कीमत के कारण एक बार फिर सबसे अधिक नुकसान हो रहा है. इनमें मेटा, गूगल, सऊदी अरब का पीआईएफ, केकेआर, सिल्वर लेक, विस्टा, मुबाडाला, एडीआईए, टीपीजी, जनरल अटलांटिक, एल कैटरटन, इंटेल कैपिटल और क्वालकॉम शामिल हैं.
जियो के ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस में दिए गए आवंटन के विश्लेषण के अनुसार, ₹1,119 प्रति शेयर की कीमत पर उनकी हिस्सेदारी का मूल्य करीब 34 अरब डॉलर है. छह वर्षों में यह उनके निवेश का 1.67 गुना है, यानी डॉलर में सालाना करीब 8.7% का रिटर्न.
केकेआर, पीआईएफ, सिल्वर लेक और विस्टा जैसे फंडों ने ₹549 प्रति शेयर की कीमत पर निवेश किया था. उनके लिए सालाना रिटर्न करीब 7.6% है. रुपये में ₹549 का निवेश लगभग दोगुना होकर ₹1,119 हो गया है. लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपया करीब ₹75 से गिरकर ₹97 पर आ गया है, जिससे उनके डॉलर में मिलने वाले रिटर्न में करीब 10 अरब डॉलर की कमी आई है. वहीं, ₹488 प्रति शेयर की कीमत पर निवेश करने वाले मेटा और गूगल का सालाना रिटर्न करीब 9.5-10% है.
रिलायंस की स्थिति इससे बिल्कुल अलग है. उसके अधिकांश शेयर ₹10 की कीमत पर हासिल किए गए थे. कम की गई कीमत पर भी उसकी हिस्सेदारी का मूल्य करीब ₹6.6 लाख करोड़ या लगभग 69 अरब डॉलर है.
जन्मदिन के करीब इश्यू बंद, बुधवार को होगी लिस्टिंग
यह इश्यू बुधवार, 21 अक्टूबर से शुक्रवार, 23 अक्टूबर तक खुला रहेगा. इश्यू बंद होने का दिन मुकेश अंबानी के जुड़वां बच्चों आकाश और ईशा का 35वां जन्मदिन है. आकाश रिलायंस जियो इन्फोकॉम के चेयरमैन हैं. शेयरों की लिस्टिंग बुधवार, 28 अक्टूबर को होने की संभावना है.
उस समय तक ऑर्डर बुक की स्थिति कैसी रहती है, इसी पर निर्भर करेगा कि जश्न मनाने की कोई वजह होगी या नहीं.
मस्क का चार दिनों तक हमला
इश्यू के आकार में कटौती ऐसे समय हुई है, जब जियो का रोडशो जारी रहने के दौरान एलन मस्क ने लगातार चार दिनों तक एक्स पर मुकेश अंबानी को निशाना बनाया.
7 अक्टूबर को मस्क ने लिखा कि स्टारलिंक को “कुछ उद्योगपतियों द्वारा भारतीय लोगों पर अपनी एकाधिकारवादी पकड़ बनाए रखने के लिए रोका जा रहा है.” उन्होंने इसे “भारत के लोगों के खिलाफ अपराध” बताया. अगले दिन उन्होंने उस व्यक्ति का नाम लिया, जिसका वह जिक्र कर रहे थे. उन्होंने पूछा, “क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं?”
शुक्रवार को उन्होंने ‘प्रधानमंत्री अंबानी’ के नाम एक काल्पनिक खुला पत्र पोस्ट किया. इसमें लिखा था, “यह न समझ पाने के लिए कृपया मेरी विनम्र माफी स्वीकार करें कि आप ही भारत के असली बॉस हैं.” उन्होंने अंबानी पर “भारत के महान लोगों का एकाधिकारवादी शोषण जारी रखने” को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया. इसके बाद उन्होंने पूछा, “क्या फिर भी आप स्टारलिंक को प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति देने पर विचार करेंगे?”
शनिवार को उन्होंने किफायती कीमतों का वादा किया और कहा, “अंबानी का मुनाफा कम होगा, लेकिन उनका कारोबार बंद नहीं होने वाला.” जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी इस बहस में शामिल हुए, तो मस्क ने जवाब दिया, “यह वाकई चिंताजनक है.”
सरकार ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है. संचार मंत्रालय ने अपने सैटेलाइट नियमों को “निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण” बताया और आरोपों को “निराधार और गलत धारणा पर आधारित” करार दिया. मंत्रालय ने कहा कि जियो के अपने सैटेलाइट कारोबार सहित लाइसेंस प्राप्त तीनों ऑपरेटर एक ही सुरक्षा मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं. दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि भारत “किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता.” रिलायंस ने इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
किसी भी निवेशक ने यह नहीं कहा है कि इन पोस्ट से उनका निवेश संबंधी फैसला बदला है. लेकिन लगातार चार दिनों तक, जब जियो के बैंकर वैश्विक फंडों से कंपनी के बाजार में दबदबे के लिए अधिक कीमत चुकाने को कह रहे थे, तब दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एक्स पर सवाल उठा रहे थे कि यह दबदबा हासिल कैसे किया गया.
इसका क्या मतलब है
जियो के आईपीओ की योजना एक बड़े बयान के रूप में बनाई गई थी: भारत की सबसे बड़ी कंपनी, देश के सबसे बड़े आईपीओ के साथ और ऐसा वैल्यूएशन जो वैश्विक टेक कंपनियों को टक्कर दे सके. लेकिन अब बाजार में जो इश्यू आ रहा है, उसका आकार छोटा है, कीमत कम है, ग्रे-मार्केट प्रीमियम सीमित है और बुक को बड़े पैमाने पर एंकर निवेशकों का समर्थन मिला हुआ है.
जियो रुपये के लिहाज से सबसे बड़े आईपीओ का रिकॉर्ड बनाने का दावा अब भी कर सकती है. लेकिन जिन वैश्विक निवेशकों से उसके वैल्यूएशन को मान्यता मिलने की उम्मीद थी, उन्होंने इसके बजाय वैल्यूएशन को नीचे धकेल दिया है.
नोट: रिटर्न शुल्क और करों से पहले के सकल रिटर्न हैं. इनकी गणना जियो प्लेटफॉर्म्स के ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (19 जून, 2026) और ईसीबी की डॉलर/रुपया विनिमय दरों के आधार पर की गई है. डॉलर से जुड़े आंकड़ों के लिए ₹96.73 प्रति डॉलर की दर का इस्तेमाल किया गया है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
नायक ने इस इस्तीफे के पीछे पूर्णकालिक परिचालन भूमिका की व्यस्तताओं और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर ध्यान देने की इच्छा का हवाला दिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
डिजिटल मार्केटिंग कंपनी YAAP Digital के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) राज नायक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. इसी साल जुलाई में कंपनी के संस्थापक, चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. अतुल हेगड़े के निधन के बाद राज नायक को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी. नायक ने इस्तीफे के पीछे पूर्णकालिक परिचालन भूमिका की व्यस्तताओं और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर ध्यान देने की इच्छा का हवाला दिया है.
पूर्णकालिक भूमिका की व्यस्तताओं का दिया हवाला
अपने इस्तीफे के पत्र में राज नायक ने कहा कि उन्होंने काफी विचार-विमर्श के बाद पद छोड़ने का फैसला किया है. उनके मुताबिक, पूर्णकालिक परिचालन भूमिका की जिम्मेदारियां और काम का दबाव इस समय उनकी अपेक्षा से अधिक है.
नायक ने इसे एक कठिन निर्णय बताते हुए कहा कि उन्हें कंपनी की टीम के साथ काम करने का अनुभव अच्छा रहा है. उन्होंने YAAP Digital के भविष्य को लेकर भरोसा भी जताया. अब वह अपने उद्यमशीलता से जुड़े प्रयासों और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर अधिक ध्यान देना चाहते हैं.
जुलाई में संभाली थी कंपनी की कमान
YAAP Digital Limited ने 7 जुलाई 2026 को संस्थापक, चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. अतुल हेगड़े के निधन के बाद राज नायक को चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त करने की घोषणा की थी. नायक की नियुक्ति इसी साल जुलाई में हुई थी. उनके इस्तीफे के बाद कंपनी के नेतृत्व में आगे क्या बदलाव होगा, इस बारे में उपलब्ध जानकारी में कोई घोषणा नहीं की गई है.
रिपोर्ट के अनुसार, महंगाई को ध्यान में रखते हुए वास्तविक ब्याज दर कम से कम 1 फीसदी बनाए रखने के लिए रेपो रेट को बढ़ाकर 6.5-7 फीसदी तक करना पड़ सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में आने वाली तिमाहियों में महंगाई दर बढ़कर 6-7 फीसदी तक पहुंच सकती है. Systematix Institutional Equities की एक रिपोर्ट के मुताबिक, महंगाई पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रेपो रेट में मौजूदा स्तर से 100-150 बेसिस पॉइंट तक की और बढ़ोतरी कर सकता है. रिपोर्ट में कंपनियों की बढ़ती लागत, घरेलू स्तर पर महंगाई की ऊंची उम्मीदों, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों को महंगाई बढ़ने की प्रमुख वजह बताया गया है.
महंगाई बढ़ने का क्यों है खतरा?
Systematix की रिपोर्ट के मुताबिक, महंगाई का जोखिम RBI के मौजूदा आकलन से अधिक हो सकता है. सितंबर 2026 में परिवारों की औसत महंगाई संबंधी उम्मीदें 9.1 फीसदी रहीं, जो मौजूदा महंगाई दर से काफी अधिक हैं. इससे संकेत मिलता है कि लोगों को आने वाले समय में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ने की आशंका है.
RBI का महंगाई प्रसार सूचकांक (Inflation Diffusion Index) भी संकेत देता है कि कीमतों का दबाव अब ज्यादा श्रेणियों में फैल रहा है. इसके अलावा, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में गैर-वित्तीय कंपनियों की इनपुट लागत सालाना आधार पर करीब 40 फीसदी बढ़ी.
रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 45 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. बढ़ती लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पाने के कारण कंपनियों के सकल मार्जिन में 650-800 बेसिस पॉइंट की कमी आई. इससे कंपनियों की लाभप्रदता पर दबाव बढ़ा है.
मानसून और कच्चे तेल की कीमतें भी चिंता
रिपोर्ट में महंगाई बढ़ने के पीछे सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों को भी अहम बताया गया है. दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी, अल नीनो की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से महंगाई का दबाव बढ़ सकता है.
इसके अलावा, पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण पैदा हुए महंगाई के असर को कम करने में खाद्य पदार्थों, ऊर्जा और उर्वरकों पर सरकारी सब्सिडी की भूमिका रही है. तेल विपणन कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई भी कीमतों के दबाव को सीमित करने में मदद करती है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर सरकार की ओर से मिलने वाली वित्तीय सहायता कम होती है, तो महंगाई और बढ़ सकती है.
रेपो रेट 6.5-7% तक जाने का अनुमान
RBI ने हाल में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया था. हालांकि, Systematix का मानना है कि महंगाई के दबाव को नियंत्रित करने के लिए यह बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं हो सकती.
रिपोर्ट के अनुसार, महंगाई को ध्यान में रखते हुए वास्तविक ब्याज दर कम से कम 1 फीसदी बनाए रखने के लिए रेपो रेट को बढ़ाकर 6.5-7 फीसदी तक करना पड़ सकता है. इसके लिए मौजूदा 5.50 फीसदी के स्तर से 100-150 बेसिस पॉइंट की अतिरिक्त बढ़ोतरी की जरूरत हो सकती है.
यह रिपोर्ट का अनुमान है, RBI की ओर से घोषित नीतिगत फैसला नहीं. रेपो रेट को लेकर केंद्रीय बैंक का अगला कदम महंगाई के वास्तविक आंकड़ों और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.
GDP ग्रोथ का अनुमान 7.1% किया गया
RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान पहले के 6.7 फीसदी से बढ़ाकर 7.1 फीसदी कर दिया है. इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने महंगाई के अनुमान में भी संशोधन किया है. वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में महंगाई दर 6 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि पहले इसके 5.9 फीसदी रहने की संभावना जताई गई थी.
इस तरह आर्थिक विकास की संभावनाओं के साथ महंगाई का जोखिम भी बना हुआ है. यदि कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है, तो RBI को ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाना पड़ सकता है.
शेयर बाजार और बॉन्ड यील्ड पर पड़ सकता है असर
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहने और ब्याज दरों में आगे बढ़ोतरी से वित्तीय बाजारों पर दबाव पड़ सकता है. ऊंची ब्याज दरें शेयरों के मूल्यांकन को प्रभावित कर सकती हैं. वहीं, कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा होने और इनपुट लागत बढ़ने से उनके मुनाफे पर असर पड़ सकता है.
भारत की 10 साल की बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड यील्ड करीब 7.24 फीसदी के स्तर पर है. रिपोर्ट के मुताबिक, यदि महंगाई अनुमान से ज्यादा बढ़ती है और RBI मौद्रिक नीति को सख्त करता है, तो बॉन्ड यील्ड 7.5 फीसदी से ऊपर जा सकती है. हालांकि, रेपो रेट में आगे कितनी बढ़ोतरी होगी, यह महंगाई के रुझान और RBI के नीतिगत आकलन पर निर्भर करेगा.
कंपनी इस विस्तार पर 550 करोड़ रुपये खर्च करेगी और 2027 तक प्लांट शुरू करने की योजना है. कारोबारी सत्र के दौरान शेयर में 5 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी दर्ज हुई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी सुजलॉन ग्रुप तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक में विंड ब्लेड बनाने के लिए तीन नई फैक्ट्रियां स्थापित करने जा रही है. कंपनी इस विस्तार पर 550 करोड़ रुपये खर्च करेगी और 2027 तक प्लांट शुरू करने की योजना है. इन परियोजनाओं से करीब 3,000 प्रत्यक्ष और 12,000 अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है. इस घोषणा के बाद सोमवार को सुजलॉन एनर्जी के शेयर में भी तेजी देखने को मिली. कारोबारी सत्र के दौरान शेयर में 5 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी दर्ज हुई.
तीन राज्यों में होगा निवेश
सुजलॉन ग्रुप की योजना के मुताबिक, तमिलनाडु में नई फैक्ट्री स्थापित करने पर 200 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. वहीं, गुजरात और कर्नाटक में प्लांट लगाने के लिए कुल 350 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा. कंपनी के को-फाउंडर गिरीश टांटी के अनुसार, इस निवेश के लिए आंतरिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा.
नई फैक्ट्रियों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीकों की मदद से विंड ब्लेड का उत्पादन किया जाएगा. कंपनी का लक्ष्य उत्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाना, उत्पादों की गुणवत्ता पर नजर रखना और विनिर्माण के दौरान होने वाली गलतियों को कम करना है.
15,000 रोजगार के अवसर बनने की उम्मीद
इन तीन परियोजनाओं से करीब 3,000 लोगों को सीधे और 12,000 लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलने की संभावना है. कंपनी के मुताबिक, इनसे पैदा होने वाले लगभग 80 फीसदी रोजगार ग्रामीण क्षेत्रों में हो सकते हैं.
नए प्लांट पवन ऊर्जा परियोजनाओं के नजदीक स्थापित किए जाएंगे. इससे विंड ब्लेड की ढुलाई में लगने वाला समय और लागत कम करने में मदद मिलेगी. साथ ही, कंपनी को अपने मौजूदा ऑर्डर समय पर पूरे करने में भी सुविधा होगी.
विनिर्माण नेटवर्क का होगा विस्तार
सुजलॉन फिलहाल जैसलमेर, भुज, रतलाम, धुले और अनंतपुर में विंड ब्लेड बनाने वाली पांच फैक्ट्रियां संचालित कर रही है. तीन नए प्लांट शुरू होने के बाद कंपनी अपने विनिर्माण नेटवर्क और उत्पादन क्षमता का विस्तार करेगी. कंपनी के मुताबिक, उसका विनिर्माण नेटवर्क 18 फैक्ट्रियों तक पहुंचने की उम्मीद है.
पवन ऊर्जा उपकरणों की घरेलू मांग को पूरा करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिहाज से भी यह विस्तार अहम है. नई इकाइयों में AI और डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल कंपनी की स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक कदम होगा.
सुजलॉन एनर्जी के शेयर में तेजी
नए प्लांट और निवेश की घोषणा के बाद सोमवार को सुजलॉन एनर्जी के शेयर में तेजी दर्ज की गई. खबर लिखे जाने तक शेयर 5.24 फीसदी की बढ़त के साथ 39.57 रुपये पर कारोबार कर रहा था. हालांकि, इस तेजी के बावजूद शेयर के प्रदर्शन को लंबी अवधि के संदर्भ में देखना जरूरी है. खबर में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, सुजलॉन एनर्जी के शेयर में इस साल अब तक करीब 25 फीसदी की गिरावट आई थी. नए निवेश और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजना से कंपनी के कारोबार पर क्या असर पड़ता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा.
वाणिज्य विभाग ने कंपनियों से वीजा, डेटा ट्रांसफर, लाइसेंस, टैक्स और भुगतान से जुड़ी समस्याओं का ब्योरा मांगा है. इसका मकसद चीन के बड़े सर्विस बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने और निर्यातकों के सामने आने वाली चुनौतियों की पहचान करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार चीन के साथ व्यापारिक संबंधों में सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने की संभावनाएं तलाश रही है. इसके लिए वाणिज्य विभाग उन नियमों और प्रक्रियाओं की जानकारी जुटा रहा है, जिनसे भारतीय कंपनियों को चीन में कारोबार करने में परेशानी होती है. इस पहल के तहत लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन की शर्तों से लेकर डेटा सुरक्षा और पेशेवर कर्मचारियों की आवाजाही तक के मुद्दों पर जानकारी मांगी गई है.
300 अरब डॉलर के बाजार में भारत की हिस्सेदारी कितनी?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन सेवाओं के बड़े वैश्विक आयातकों में शामिल है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में चीन को भारत का सेवा निर्यात 8.95 अरब डॉलर रहा. करीब 300 अरब डॉलर के चीनी सेवा आयात बाजार को देखते हुए भारतीय कंपनियों के लिए विस्तार की संभावनाएं मौजूद हैं. भारत की मजबूत मौजूदगी सूचना प्रौद्योगिकी (IT), आईटी आधारित सेवाओं और डिजिटल समाधानों जैसे क्षेत्रों में है. हालांकि, चीन के नियामकीय नियम और बाजार में प्रवेश से जुड़ी शर्तें भारतीय कंपनियों के लिए कारोबार बढ़ाने में चुनौती बन सकती हैं.
वीजा से लेकर डेटा ट्रांसफर तक की चुनौतियां
वाणिज्य विभाग ने उद्योग जगत से चीन में लागू डेटा लोकलाइजेशन, साइबर सुरक्षा और सीमा पार डेटा ट्रांसफर के नियमों से जुड़ी समस्याओं की जानकारी मांगी है. इसके अलावा वीजा मिलने में देरी, वर्क परमिट की शर्तें और भारतीय पेशेवरों की योग्यताओं को मान्यता देने जैसे मुद्दे भी शामिल हैं.
कंपनियों को टैक्स, भुगतान प्राप्त करने, रकम दूसरे देश में भेजने और कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने की प्रक्रिया में आने वाली दिक्कतों का ब्योरा भी देना है. सरकार इन जानकारियों के आधार पर उन बाधाओं की पहचान करना चाहती है, जो भारतीय सेवा निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा और कारोबार के विस्तार को प्रभावित करती हैं.
चीन में किस तरह कारोबार करती हैं भारतीय कंपनियां?
उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के मुताबिक, भारतीय कंपनियां चीन में काम तो कर रही हैं, लेकिन कई मामलों में वे अंतिम ग्राहकों को सीधे सेवाएं देने के बजाय मध्यस्थ संस्थाओं के जरिए कारोबार करती हैं. इससे उनकी बाजार तक सीधी पहुंच सीमित हो सकती है.
वाणिज्य विभाग ने कंपनियों से सीमा पार डिजिटल माध्यमों से सेवाएं देने, चीन में व्यावसायिक मौजूदगी, मालिकाना हक, स्थानीय साझेदारी और परिचालन संबंधी जरूरतों की जानकारी भी मांगी है. इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि भारतीय कंपनियां चीन में किस तरह काम कर रही हैं और उन्हें सीधे कारोबार करने में किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है.
वैश्विक सेवा निर्यात में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी
वैश्विक सेवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी पिछले एक दशक में बढ़ी है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विश्व के सेवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2014 में करीब 3 फीसदी थी, जो 2024 में बढ़कर 4.3 फीसदी हो गई. इसी अवधि में चीन की हिस्सेदारी 4.2 फीसदी से बढ़कर 5.1 फीसदी हो गई.
भारत में सेवा निर्यात की वृद्धि को आईटी, डिजिटल सेवाओं और अन्य पेशेवर सेवाओं की वैश्विक मांग से समर्थन मिला है. ऐसे में चीन जैसे बड़े बाजार में कारोबार की बाधाओं को समझना भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर तलाशने की दिशा में अहम कदम हो सकता है. हालांकि, चीन में भारतीय सेवा निर्यातकों की वास्तविक संभावनाएं वहां के नियमों, बाजार तक पहुंच और स्थानीय प्रतिस्पर्धा पर भी निर्भर करेंगी. सरकार की ओर से जुटाई जा रही जानकारी इन चुनौतियों का आकलन करने और आगे की व्यापार रणनीति तय करने में उपयोगी हो सकती है.
कंपनी इन परियोजनाओं में 26 फीसदी इक्विटी हिस्सेदारी की पेशकश कर रही है. इसका उद्देश्य उद्योगों को भरोसेमंद और किफायती ऊर्जा उपलब्ध कराने के साथ अपने ऊर्जा समाधान कारोबार का विस्तार करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख बिजली उत्पादक कंपनी NTPC लिमिटेड को-जेनरेशन परियोजनाओं के जरिए औद्योगिक ऊर्जा क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी कर रही है. इन परियोजनाओं में बिजली के साथ भाप जैसी तापीय ऊर्जा का उत्पादन किया जाएगा. कंपनी कोयला, नवीकरणीय ऊर्जा और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम को मिलाकर एकीकृत बिजली आपूर्ति समाधान विकसित करने पर भी विचार कर रही है.
क्या है को-जेनरेशन तकनीक?
को-जेनरेशन को कंबाइंड हीट एंड पावर (CHP) भी कहा जाता है. इसमें एक ही ईंधन स्रोत से बिजली और तापीय ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है. पारंपरिक बिजली उत्पादन के दौरान निकलने वाली गर्मी का उपयोग करने से ऊर्जा दक्षता बढ़ाने में मदद मिलती है.
विनिर्माण क्षेत्र की कई इकाइयों को मशीनों के संचालन और उत्पादन प्रक्रिया के लिए बिजली के साथ भाप की भी जरूरत होती है. को-जेनरेशन प्रणाली इन दोनों जरूरतों को एक साथ पूरा कर सकती है, जिससे ऊर्जा की बर्बादी और परिचालन लागत कम करने में मदद मिल सकती है.
दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति पर जोर
NTPC के मुताबिक, प्रस्तावित परियोजनाओं के जरिए उद्योगों को दीर्घकालिक व्यवस्था के तहत ऊर्जा उपलब्ध कराने की योजना है. इससे कंपनियों को अपनी ऊर्जा जरूरतों, लागत और आपूर्ति की बेहतर योजना बनाने में मदद मिल सकती है.
कंपनी अपनी बिजली उत्पादन संबंधी विशेषज्ञता के आधार पर अलग-अलग उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप आपूर्ति मॉडल विकसित करना चाहती है. औद्योगिक साझेदारों की भागीदारी से NTPC को अपने ऊर्जा समाधान कारोबार का विस्तार करने का अवसर मिलेगा.
2032 तक 149 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य
NTPC की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 91 गीगावाट से अधिक है, जबकि 35 गीगावाट से ज्यादा क्षमता की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं. कंपनी ने 2032 तक अपनी कुल क्षमता बढ़ाकर 149 गीगावाट करने का लक्ष्य रखा है. इसमें 60 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से हासिल करने की योजना है.
कंपनी की विस्तार रणनीति में तापीय, जलविद्युत, सौर और पवन ऊर्जा के अलावा ऊर्जा भंडारण, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, वेस्ट-टू-एनर्जी, परमाणु ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं. को-जेनरेशन परियोजनाओं के लिए औद्योगिक साझेदारों को आमंत्रित करना इसी रणनीति का हिस्सा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि रूस और यूक्रेन ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकने के लिए ‘एनर्जी सीजफायर’ पर सहमत हो गए हैं. हालांकि, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने कहा है कि वह इन बातचीत में शामिल नहीं थे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने को लेकर एक नए समझौते की घोषणा ने कूटनीतिक हलचल बढ़ा दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि दोनों देश ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाने से रोकने पर सहमत हुए हैं. उन्होंने दोनों पक्षों से समझौते का उल्लंघन नहीं करने की अपील भी की. हालांकि, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इस घोषणा पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें इस समझौते की जानकारी नहीं थी और वह इसके लागू होने की तारीख स्पष्ट करना चाहते हैं.
जेलेंस्की बोले- युद्धविराम शुरू होने की तारीख बताएं
जेलेंस्की ने समाचार वेबसाइट एक्सियोस (Axios) से बातचीत में कहा कि अगर ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ इस समझौते पर बातचीत की है, तो उन्हें बताया जाना चाहिए कि युद्धविराम कब से शुरू होगा. उन्होंने कहा कि यूक्रेन इसके लिए तैयार है और प्रस्ताव स्वीकार करेगा.
जेलेंस्की की प्रतिक्रिया से संकेत मिलता है कि ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने की घोषणा के बावजूद समझौते की शर्तों और समयसीमा को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है. ट्रंप ने भी सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया है कि यह व्यवस्था किस तारीख से लागू होगी और इसे जमीन पर किस तरह लागू किया जाएगा.
रूस के तेल ढांचे पर हमलों को लेकर बढ़ा दबाव
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका यूक्रेन पर रूस के तेल ढांचे पर हमले रोकने के लिए दबाव बना रहा है. ट्रंप ने इन हमलों को वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से जोड़ा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, वॉशिंगटन और मॉस्को के बीच ऊर्जा से जुड़ी एक संभावित व्यवस्था को लेकर भी तनाव बढ़ा है. इसके तहत अमेरिका घरेलू ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से रूस से लाखों टन डीजल आयात कर सकता है. नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले ईंधन की कीमतें भी प्रशासन के लिए एक अहम मुद्दा हैं. हालांकि, ऊर्जा से जुड़े इस प्रस्ताव और घोषित युद्धविराम के बीच संबंधों को लेकर ट्रंप ने विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है.
यूक्रेन में चुनाव कराने की ट्रंप की मांग पर जेलेंस्की का जवाब
ट्रंप ने शनिवार को यूक्रेन में नए राष्ट्रपति के चुनाव की मांग भी की थी. उनका तर्क था कि युद्ध समाप्त करने के लिए समझौता करने को तैयार नेतृत्व की जरूरत है. इस पर जेलेंस्की ने रविवार को एबीसी न्यूज (ABC News) से बातचीत में कहा कि यूक्रेन का नेतृत्व कौन करेगा, इसका फैसला वहां के नागरिकों को करना है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के सम्मान के बावजूद देश के नेता को चुनने का अधिकार यूक्रेन की जनता के पास है.
जेलेंस्की ने यह भी कहा कि यदि रूस 60 दिनों के युद्धविराम पर सहमत होता है, तो यूक्रेन राष्ट्रपति चुनाव कराने पर विचार करेगा. इस तरह उन्होंने चुनाव की संभावना को लंबे समय तक जारी रहने वाली शत्रुता पर रोक लगाने से जोड़ दिया.
अमेरिका के समर्थन को बताया अहम
ट्रंप के साथ मतभेदों के बावजूद जेलेंस्की ने रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त कराने के प्रयासों में अमेरिका की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि युद्ध रोकने और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए यूक्रेन को अमेरिकी समर्थन की जरूरत है.
जेलेंस्की ने यूरोपीय देशों के सहयोग को भी अहम बताया. उन्होंने उम्मीद जताई कि मौजूदा मतभेदों का असर अमेरिका और यूरोप के बीच सहयोग पर नहीं पड़ेगा. हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि इस एकजुटता को बनाए रखना आसान नहीं है.
ईरान के साथ संघर्ष से ऊर्जा बाजारों पर दबाव
ऊर्जा युद्धविराम की यह घोषणा ऐसे समय में आई है, जब अमेरिका पश्चिम एशिया में ईरान के साथ युद्ध में भी उलझा हुआ है. इससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने की आशंका है. ट्रंप ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि ईरान के साथ संघर्ष का तेल की कीमतों पर क्या असर पड़ सकता है और रूस-यूक्रेन के बीच घोषित ऊर्जा युद्धविराम को किस तरह लागू किया जाएगा. फिलहाल, समझौते की शुरुआत की तारीख और उसकी परिचालन शर्तें स्पष्ट नहीं हैं. जेलेंस्की की प्रतिक्रिया से भी पता चलता है कि यूक्रेन इस घोषणा के बारे में अधिक जानकारी का इंतजार कर रहा है.
शेयर बाजार में इस हफ्ते तीन कंपनियों के निवेशकों को डिविडेंड से कमाई का मौका मिलेगा. वेदांता, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) और आनंद राठी वेल्थ ने अंतरिम डिविडेंड का ऐलान किया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शेयर बाजार में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए यह सप्ताह अहम रहने वाला है. तीन कंपनियों ने अपने शेयरधारकों को अंतरिम डिविडेंड देने की घोषणा की है. इनमें माइनिंग सेक्टर की वेदांता, आईटी कंपनी TCS और वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी आनंद राठी वेल्थ शामिल हैं. हालांकि, डिविडेंड का लाभ पाने के लिए रिकॉर्ड डेट पर निवेशक की पात्रता और लागू नियमों को समझना जरूरी है.
वेदांता देगी 1,955 करोड़ रुपये का डिविडेंड
माइनिंग सेक्टर की प्रमुख कंपनी वेदांता ने अपने शेयरधारकों को हर शेयर पर 5 रुपये का अंतरिम डिविडेंड देने का ऐलान किया है. कंपनी के शेयर की फेस वैल्यू 1 रुपये है. इस घोषणा के तहत कंपनी कुल 1,955 करोड़ रुपये का डिविडेंड वितरित करेगी. इसके लिए 14 अक्टूबर 2026 की रिकॉर्ड डेट तय की गई है.
पिछले कारोबारी सत्र में वेदांता का शेयर 4.11 फीसदी की बढ़त के साथ 263.50 रुपये पर बंद हुआ था. शेयर ने पिछले तीन साल में 234 फीसदी का रिटर्न दिया है. वहीं, एक साल में इसमें 51 फीसदी और दो साल में 47 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है.
TCS के हर शेयर पर 12 रुपये का डिविडेंड
टाटा ग्रुप की आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने भी निवेशकों को अंतरिम डिविडेंड देने की घोषणा की है. कंपनी हर शेयर पर 12 रुपये का डिविडेंड देगी. इसके लिए 14 अक्टूबर 2026 को रिकॉर्ड डेट निर्धारित की गई है. कंपनी के मुताबिक, डिविडेंड की रकम 30 अक्टूबर 2026 को निवेशकों के बैंक खातों में भेजी जाएगी.
पिछले कारोबारी सत्र में TCS का शेयर 4.23 फीसदी की तेजी के साथ 2,163 रुपये पर बंद हुआ था. कंपनी का मार्केट कैप 7.82 लाख करोड़ रुपये बताया गया है. हालांकि, लंबी अवधि में शेयर के प्रदर्शन पर दबाव रहा है. पिछले एक साल में इसमें 29 फीसदी, दो साल में 49 फीसदी और तीन साल में 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.
आनंद राठी वेल्थ देगी 4 रुपये प्रति शेयर डिविडेंड
वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी आनंद राठी वेल्थ ने अपने शेयरधारकों को हर शेयर पर 4 रुपये का अंतरिम डिविडेंड देने का फैसला किया है. कंपनी के शेयर की फेस वैल्यू 5 रुपये है. इस लिहाज से घोषित डिविडेंड फेस वैल्यू का 80 फीसदी है. कंपनी ने इसके लिए 15 अक्टूबर 2026 को रिकॉर्ड डेट तय की है. घोषणा के मुताबिक, डिविडेंड का भुगतान 30 दिनों के भीतर किया जाएगा.
इससे पहले कंपनी ने अप्रैल में 7 रुपये प्रति शेयर का फाइनल डिविडेंड दिया था. पिछले कारोबारी सत्र में आनंद राठी वेल्थ का शेयर 4.68 फीसदी गिरकर 2,038.70 रुपये पर बंद हुआ था. इसके बावजूद शेयर ने पिछले तीन साल में 331.44 फीसदी का रिटर्न दिया है. एक साल में इसमें 38.14 फीसदी की बढ़त रही है, जबकि 2026 में अब तक यह 31.75 फीसदी चढ़ चुका है.
निवेशक इन बातों का रखें ध्यान
डिविडेंड पाने के लिए सिर्फ शेयर खरीदना ही पर्याप्त नहीं है. निवेशकों को कंपनी की रिकॉर्ड डेट और शेयरों के लिए लागू एक्स-डिविडेंड डेट का ध्यान रखना चाहिए. रिकॉर्ड डेट पर कंपनी के पात्र शेयरधारकों की पहचान की जाती है. डिविडेंड की घोषणा का मतलब यह भी नहीं है कि शेयर की कीमत में आगे बढ़त तय है. निवेश का फैसला करते समय कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, शेयर के मूल्यांकन और बाजार के जोखिमों को भी ध्यान में रखना चाहिए.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती दिनों में खरीदारी करने वालों में करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी जेनरेशन जेड यानी युवा पीढ़ी की रही. यह आंकड़ा त्योहारी ऑनलाइन खरीदारी में युवाओं की भागीदारी को दिखाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दिवाली से पहले देश में ऑनलाइन खरीदारी का रुझान तेज हो गया है. त्योहारी सेल के शुरुआती दो दिनों में ई-कॉमर्स कंपनियों ने करीब 24,200 करोड़ रुपये का सामान बेचा. परामर्श कंपनी रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स के अनुमान के मुताबिक, इस दौरान अमेजन, फ्लिपकार्ट, मीशो, अजियो और दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कुल 8 से 9 करोड़ ऑर्डर दिए गए. बिक्री के मूल्य के लिहाज से मोबाइल फोन सबसे बड़ी श्रेणी रहे.
शुरुआती दो दिनों में 24,200 करोड़ रुपये की बिक्री
रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स के एसोसिएट पार्टनर निखिल दलाल के मुताबिक, त्योहारी सेल के शुरुआती आंकड़े भारत में ई-कॉमर्स बाजार के बढ़ते दायरे को दर्शाते हैं. इस दौरान करीब 6 से 6.5 करोड़ खरीदारों ने खरीदारी की. सकल व्यापारिक मूल्य (GMV) 2.5 अरब डॉलर यानी लगभग 24,200 करोड़ रुपये से अधिक रहा.
इस बढ़ोतरी में ऑर्डर की संख्या की अहम भूमिका रही. ग्राहक मोबाइल फोन के अलावा फैशन उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरणों पर भी खर्च कर रहे हैं. खास तौर पर किफायती फैशन उत्पादों की मांग देखने को मिली. टियर-2 शहरों और छोटे शहरों के ग्राहकों ने भी त्योहारी कपड़ों की खरीदारी की.
सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा कारोबार
रेडसीर के अनुसार, शुरुआती दो दिनों में ई-कॉमर्स का सकल व्यापारिक मूल्य सामान्य कारोबारी दिनों के औसत से करीब छह गुना अधिक रहा. अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म अपनी क्विक कॉमर्स सेवाओं का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. इन सेवाओं के जरिए रोजमर्रा के सामान की तेज डिलीवरी के साथ ग्राहकों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.
अनुमानों के मुताबिक, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी सामान्य दिनों के मुकाबले कारोबार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. वहीं, बड़े घरेलू उपकरणों और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में वृद्धि बाजार की औसत रफ्तार से ज्यादा रही.
कुल बिक्री में मोबाइल फोन की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा
शुरुआती दो दिनों की कुल बिक्री में मोबाइल फोन की हिस्सेदारी करीब 38 से 40 फीसदी रहने का अनुमान है. इस श्रेणी में लगभग 9,100 से 9,600 करोड़ रुपये की बिक्री हुई.
कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की हिस्सेदारी करीब 25 से 27 फीसदी यानी 6,000 से 6,500 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. वहीं, फैशन उत्पादों का योगदान 15 से 18 फीसदी यानी लगभग 3,630 से 4,350 करोड़ रुपये रहा.
युवा खरीदारों की भी अहम भूमिका
रेडसीर के मुताबिक, शुरुआती दिनों में खरीदारी करने वालों में करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी जेनरेशन जेड यानी युवा पीढ़ी की रही. यह आंकड़ा त्योहारी ऑनलाइन खरीदारी में युवाओं की भागीदारी को दिखाता है.
कुल मिलाकर, शुरुआती बिक्री में मोबाइल फोन की मजबूत मांग के साथ फैशन, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरणों की खरीदारी ने भी योगदान दिया. छोटे शहरों और नए ग्राहकों की भागीदारी से त्योहारी ई-कॉमर्स बाजार का दायरा बढ़ता नजर आया.
इन कंपनियों का संबंध टेक्नोलॉजी, विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं, रक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा और जल उपचार जैसे क्षेत्रों से है, जिनमें जियो प्लेटफॉर्म्स का प्रस्तावित आईपीओ सबसे बड़ा आकर्षण है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अक्टूबर में प्राइमरी मार्केट में हलचल बढ़ने वाली है. जियो प्लेटफॉर्म्स, जेटवर्क मैन्युफैक्चरिंग और अवाडा इलेक्ट्रो समेत करीब 12 कंपनियां आईपीओ के जरिए पूंजी जुटाने की तैयारी में हैं. इन कंपनियों का संबंध टेक्नोलॉजी, विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं, रक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा और जल उपचार जैसे क्षेत्रों से है, जिनमें जियो प्लेटफॉर्म्स का प्रस्तावित आईपीओ सबसे बड़ा आकर्षण है, जिसका आकार 30,000 करोड़ रुपये से अधिक रहने की उम्मीद है. इस साल अब तक 96 आईपीओ के जरिए कंपनियां 1.1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जुटा चुकी हैं.
जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ होगा सबसे बड़ा
रिलायंस इंडस्ट्रीज की डिजिटल और दूरसंचार इकाई जियो प्लेटफॉर्म्स का प्रस्तावित आईपीओ इस महीने के सबसे चर्चित निर्गमों में शामिल है. सूत्रों के मुताबिक, इसका आईपीओ 21 अक्टूबर को खुलने और 23 अक्टूबर को बंद होने की उम्मीद है. इसका आकार 30,000 करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है. यदि यह योजना तय आकार के साथ आगे बढ़ती है, तो यह भारतीय शेयर बाजार के सबसे बड़े आईपीओ में शामिल हो सकता है.
जेटवर्क और अवाडा इलेक्ट्रो भी जुटाएंगी बड़ी रकम
टेक्नोलॉजी आधारित विनिर्माण प्लेटफॉर्म जेटवर्क करीब 5,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है. इसके प्रस्तावित आईपीओ में 2,600 करोड़ रुपये के नए शेयर जारी किए जाएंगे, जबकि बाकी राशि मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी बिक्री के जरिए जुटाई जाएगी. कंपनी का निर्गम 15 अक्टूबर को खुलने और 19 अक्टूबर को बंद होने का प्रस्ताव है.
नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की कंपनी अवाडा इलेक्ट्रो आईपीओ के जरिए करीब 7,600 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी में है. वहीं, पारस हेल्थकेयर का प्रस्तावित आईपीओ 1,800 करोड़ रुपये और एनडीआर इनविट ट्रस्ट का निर्गम करीब 750 करोड़ रुपये का हो सकता है.
अक्टूबर में इन आईपीओ पर भी रहेगी नजर
एचडी फायर प्रोटेक्ट ने 712 करोड़ रुपये के आईपीओ के लिए 258 से 271 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. कंपनी का निर्गम 13 अक्टूबर को खुलने और 15 अक्टूबर को बंद होने वाला है. इस आईपीओ में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी बिक्री के जरिए पूरी राशि जुटाने का प्रस्ताव है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ग्राहक अनुभव सेवाएं देने वाली फ्यूजन सीएक्स ने 702 करोड़ रुपये के आईपीओ के लिए 275 से 289 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. इसका निर्गम 14 अक्टूबर से 16 अक्टूबर तक खुला रहेगा.
रक्षा तकनीक क्षेत्र की कंपनी टोन्बो इमेजिंग, बोनफिग्लियोली समूह की भारतीय इकाई बोनफिग्लियोली ट्रांसमिशंस और चिकित्सा उपकरण बनाने वाली सहजानंद मेडिकल टेक्नोलॉजीज के आईपीओ भी 15 से 19 अक्टूबर के बीच आने का प्रस्ताव है. टोन्बो इमेजिंग ने 1.22 करोड़ तक शेयरों और बोनफिग्लियोली ट्रांसमिशंस ने 4.32 करोड़ तक शेयरों की बिक्री पेशकश की योजना बनाई है. सहजानंद मेडिकल टेक्नोलॉजीज के प्रस्तावित निर्गम में 1.38 करोड़ शेयरों की बिक्री शामिल है.
गुजरात विक्ट्री फोर्जिंग्स ने भी 1.97 करोड़ तक शेयरों के आईपीओ का प्रस्ताव रखा है. वहीं, जल एवं अपशिष्ट जल उपचार समाधान देने वाली एसएफसी एनवायरनमेंटल टेक्नोलॉजीज ने 150 करोड़ रुपये के नए शेयर जारी करने और 1.23 करोड़ शेयरों की बिक्री पेशकश वाला आईपीओ प्रस्तावित किया है.
इस साल आईपीओ से जुटाए गए 1.1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा
प्राइमरी मार्केट में इस साल अब तक 96 आईपीओ आ चुके हैं. इनके जरिए कंपनियों ने 1.1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है. सितंबर में ही 35 आईपीओ बाजार में आए थे. इससे कंपनियों की ओर से शेयर बाजार के जरिए पूंजी जुटाने की सक्रियता का पता चलता है.
हालांकि, आईपीओ बाजार की गतिविधियों पर शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक घटनाक्रम का असर पड़ सकता है. ऐसे में कंपनियों के लिए निर्गम का सही समय चुनना महत्वपूर्ण रहेगा.
विशेषज्ञों के अनुसार, साल की दूसरी छमाही में भी भारतीय प्राइमरी मार्केट में गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं. हालांकि, बाजार में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक घटनाक्रम कंपनियों के आईपीओ लाने के समय को प्रभावित कर सकते हैं.
उनके अनुसार, गुणवत्तापूर्ण कंपनियों के शेयरों में निवेशकों की रुचि बनी हुई है. घरेलू संस्थागत निवेशकों के पास उपलब्ध पूंजी और विदेशी निवेशकों की चुनिंदा भागीदारी से भी सार्वजनिक निर्गम बाजार को समर्थन मिल रहा है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)