दुनियाभर में छाई हुई महंगाई और रूस-यूक्रेन युद्ध का असर अभी भी बना हुआ है. इसका असर विकास दर से लेकर ग्लोबल सप्लाई चेन पर आसानी से देखा जा सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
IMF की पूर्व डिप्टी एमडी और चीफ इकोनॉमिक एडवॉइजर गीता गोपीनाथ ने दावोस में चल रहे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से वर्ष 2023 की चुनौतियों को आईएमएफ के अनुमान को लेकर अपनी बात कही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2023 की राह कठिन होने जा रही है. दुनिया भर की मौजूदा परिस्थितियों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आने वाला समय कठिन है. उन्होंने दुनियाभर में बढ़ी महंगाई और रूस यूक्रेन युद्ध को लेकर अपनी ये बात कही है.
अपने ट्वीट में उन्होंने क्या कहा
गीता गोपीनाथ इन दिनों दावोस में हैं, जहां वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की मीटिंग चल रही है. उन्होंने दावोस से एक वीडियो जारी करते हुए वर्ष 2023 के आउटलुक को लेकर कई अहम बातें कही हैं. उन्होंने कहा, अगर हम एक लाइन में IMF के 2023 को लेकर जारी किए आउटलुक की बात करें तो आने वाला साल हमारे लिए कठिन है. लेकिन फिर भी इसमें कुछ लचीलापन देखने को मिलेगा. उन्होंने कहा कि हम जानते हैं कि दुनियाभर में इस वक्त महंगाई बहुत बढ़ी हुई है, और हालांकि पिछले कुछ महीनों में इसमें कुछ कमी आई है.
उन्होंने कहा कि कठिन साल इसलिए होने जा रहा है क्योंकि युद्ध अभी भी चल रहा है. पूरी दुनिया में क्लाइमेट और पेंडेमिक अभी भी एक समस्या बने हुए हैं. लचीलापन इसलिए देखने को मिलेगा क्योंकि यूएस से लेकर दूसरी जगहों में स्ट्रांग लेबर मार्केट और कंजप्सन की होल्डिंग बनी हुई है. इसलिए हम इस बार दुनियाभर में विकास दर बॉटमलाइन पर देख रहे हैं. लेकिन ये इस साल के सेकेंड हॉफ से लेकर 2024 तक सुधर सकती है. इसलिए सभी मॉनेटरी पॉलिसी को महंगाई को नियंत्रण में लाने के लिए स्ट्रीक्ट सुधारों को जारी रखने की जरूरत है. जबकि समाज के वर्नरेबल कमजोर तबकों को मदद करते रहने की जरूरत है.
A message from Davos on the global outlook. pic.twitter.com/a4AteclZ3d
— Gita Gopinath (@GitaGopinath) January 17, 2023
दुनियाभर की महंगाई बड़ी समस्या
दुनियाभर में लगातार छाई हुई महंगाई IMF के लिए भी चिंता का विषय है. गीता गोपीनाथ ने महंगाई के इस विषय को गंभीरता से उठाया है. उन्होंने कहा है कि सभी सरकारों को इसे नियंत्रण में लाने के लिए अपने प्रयासों को जारी रखना चाहिए. उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध के अभी जारी रहने को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि इसने कहीं न कहीं सप्लाई चेन अभी भी प्रभावित हो रही है. अगर उनकी बात पर रिजर्व बैंक गंभीरता से विचार करता है तो भारत में भी आने वाले दिनों में रेपा रेट में कमी की संभावना नहीं है.
ग्रोथ रेट पर भी पड़ेगा असर
IMF की पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार गीता गोपीनाथ बता रही हैं कि मंहंगाई और युद्ध का असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं को पर पड़ने जा रहा है. उन्होंने कहा है कि दुनिया भर में सभी देशों की विकास दर निचले स्तर पर रह सकती है, जो चिंता का विषय है.
सोमवार, 2 नवंबर को बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी दोनों में जोरदार तेजी दर्ज की गई. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 75,692 और निफ्टी 23,440 के स्तर को पार कर गए. दोनों प्रमुख सूचकांक लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने सोमवार को भारतीय शेयर बाजार को बड़ी राहत दी. रिलायंस इंडस्ट्रीज के मजबूत तिमाही नतीजों के बाद शेयरों में जोरदार खरीदारी ने बाजार की तेजी को और बल दिया. सेंसेक्स 1,233 अंक उछल गया, जबकि बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 8 लाख करोड़ रुपये बढ़ गया.
भारतीय शेयर बाजार में कारोबारी सप्ताह की शुरुआत शानदार रही. सोमवार, 2 नवंबर को बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी दोनों में जोरदार तेजी दर्ज की गई. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 75,692 और निफ्टी 23,440 के स्तर को पार कर गए. दोनों प्रमुख सूचकांक लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुए. बाजार में खरीदारी का असर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दिखाई दिया. दोनों सूचकांकों में करीब 1 फीसदी तक की तेजी रही.
रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में जोरदार उछाल
सोमवार को बाजार की तेजी में रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) के शेयरों की सबसे अहम भूमिका रही. सितंबर तिमाही के उम्मीद से बेहतर नतीजों के बाद कंपनी के शेयरों में जबरदस्त खरीदारी देखने को मिली. शेयर करीब 9.41 फीसदी उछलकर बंद हुआ. अप्रैल 2020 के बाद यह कंपनी के शेयरों में एक दिन की सबसे बड़ी तेजी बताई जा रही है.
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार को बाजार में आई तेजी के पीछे रिलायंस इंडस्ट्रीज का सबसे बड़ा योगदान रहा. कंपनी के शेयरों में तेजी के चलते एनर्जी इंडेक्स 3.9 फीसदी से अधिक चढ़ गया.
इन सेक्टरों में दिखी सबसे ज्यादा खरीदारी
निफ्टी के शेयरों में रिलायंस इंडस्ट्रीज और टाटा स्टील सबसे ज्यादा बढ़त दर्ज करने वाले शेयरों में शामिल रहे. दूसरी ओर, इंफोसिस और आईसीआईसीआई बैंक के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली.
सेक्टर के लिहाज से ऑयल एंड गैस, मेटल और पीएसयू बैंक शेयरों में अच्छी खरीदारी रही. वहीं, आईटी और मीडिया सेक्टर दबाव में रहे.
बड़ी कंपनियों के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी तेजी का रुख बना रहा. निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1.19 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 0.71 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुआ. बाजार में तेजी का दायरा भी व्यापक रहा. निफ्टी 500 में शामिल 391 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 105 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई.
निवेशकों की दौलत में 8 लाख करोड़ रुपये का इजाफा
शेयर बाजार में आई इस तेजी से निवेशकों को एक ही दिन में करीब 8 लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ. बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण बढ़कर करीब 482.41 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. शुक्रवार, 30 अक्टूबर को बाजार बंद होने के समय यह आंकड़ा 474.37 लाख करोड़ रुपये था. इस तरह एक कारोबारी सत्र में बाजार पूंजीकरण में करीब 8.04 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई.
110 डॉलर के नीचे आया ब्रेंट क्रूड
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भी भारतीय शेयर बाजार के लिए राहत की वजह बनी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 110 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को खत्म करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज होने से निवेशकों की धारणा में सुधार आया है.
दरअसल, कतर और ईरान के अधिकारियों के बीच लगातार तीसरे दिन बातचीत जारी रही. इन चर्चाओं का मकसद अमेरिका और इजरायल के ईरान के खिलाफ जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए समझौते का रास्ता तलाशना है. हालांकि, क्षेत्र में तनाव और अमेरिका की ओर से संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर अनिश्चितता अभी बनी हुई है.
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों के लिए राहत लेकर आती है. इससे तेल आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव कम होने की उम्मीद रहती है.
विदेशी निवेशकों की खरीदारी से भी मिला सहारा
घरेलू शेयर बाजार को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की खरीदारी से भी समर्थन मिला. उपलब्ध प्रोविजनल आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने 30 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार में 3,598 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे थे. इससे बाजार की धारणा को मजबूती मिली.
निफ्टी के लिए 23,600 का स्तर अहम
विशेषज्ञों के मुताबिक, निफ्टी के लिए 23,250 से 23,270 का स्तर तत्काल सपोर्ट जोन है. वहीं, ऊपर की तरफ 23,600 का स्तर अहम रेजिस्टेंस रहेगा. उनका कहना है कि अगर निफ्टी मजबूती के साथ 23,600 के ऊपर निकलता है तो बाजार में शॉर्ट कवरिंग बढ़ सकती है. इससे मौजूदा तेजी को और मजबूती मिल सकती है और निफ्टी 23,750 के स्तर तक पहुंच सकता है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
इस प्रस्ताव का उद्देश्य निवेशकों को म्यूचुअल फंड में निवेश बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना है. मौजूदा व्यवस्था में एक स्कीम से दूसरी स्कीम में स्विच करने को यूनिट्स की बिक्री माना जाता है और इस पर लागू नियमों के अनुसार कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और घरेलू निवेशकों के घटते रिटर्न के बीच भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने सरकार को दो अहम टैक्स राहत देने की सिफारिश की है. इसके तहत विदेशी निवेशकों पर लगने वाला लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स खत्म करने और घरेलू म्यूचुअल फंड निवेशकों को एक स्कीम से दूसरी स्कीम में निवेश ट्रांसफर करने पर टैक्स छूट देने का प्रस्ताव है. हालांकि, इन सिफारिशों पर अंतिम फैसला केंद्र सरकार को लेना है.
बजट से पहले सरकार को भेजे गए सुझाव
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने मामले की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों के हवाले से बताया कि सेबी ने ये सुझाव फरवरी 2027 में पेश होने वाले केंद्रीय बजट से पहले सरकार को दिए हैं. हालांकि, सेबी की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं और इन्हें लागू करने का फैसला सरकार को करना है.
बताया जा रहा है कि सेबी ने पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों के साथ हुई कई बैठकों के बाद ये प्रस्ताव तैयार किए हैं. इन बैठकों में विदेशी निवेशकों ने भारत में लागू टैक्स व्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं. लगातार विदेशी बिकवाली के कारण भारतीय रुपये पर भी दबाव पड़ा है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली रोकने की कोशिश
भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन पिछले दो वर्षों में कई अन्य उभरते बाजारों के मुकाबले कमजोर रहा है. इस साल विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में रिकॉर्ड 31 अरब डॉलर की बिकवाली की है. वहीं, घरेलू शेयर बाजार से मिलने वाला रिटर्न ठहरने के कारण खुदरा निवेशकों का विदेशों में निवेश बढ़ा है.
सूत्रों के मुताबिक, सेबी के प्रस्ताव का उद्देश्य विदेशी निवेशकों पर शुरुआती टैक्स बोझ कम करना और भारतीय बाजार में निवेश को आकर्षक बनाना है.
फिलहाल भारत में एक साल से अधिक समय तक रखे गए शेयरों और अन्य पात्र प्रतिभूतियों पर 12.5 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है. वहीं, एक साल या उससे कम समय तक रखी गई प्रतिभूतियों की बिक्री से होने वाले मुनाफे पर 20 फीसदी शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) टैक्स देना पड़ता है. इसके अलावा शेयरों की खरीद-बिक्री पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) और लाभांश पर टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) भी लागू होता है.
ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कैपिटल गेन टैक्स में कटौती से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार का आकर्षण बढ़ सकता है और निवेश को समर्थन मिल सकता है. वहीं, ब्रोकरेज फर्म IIFL का अनुमान है कि कैपिटल गेन टैक्स खत्म होने से विदेशी निवेशकों का रिटर्न 2.3 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकता है.
म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी मिल सकती है टैक्स राहत
सेबी ने घरेलू म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए भी टैक्स राहत का प्रस्ताव दिया है. इसके तहत अगर कोई निवेशक अपनी म्यूचुअल फंड स्कीम की यूनिट्स को दूसरी स्कीम में ट्रांसफर करता है, तो इसे टैक्स के दायरे में आने वाली बिक्री नहीं माना जाना चाहिए. हालांकि, इस छूट का लाभ तभी मिल सकता है, जब निवेशक ने संबंधित यूनिट्स को एक साल से अधिक समय तक अपने पास रखा हो.
इस प्रस्ताव का उद्देश्य निवेशकों को म्यूचुअल फंड में निवेश बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना है. मौजूदा व्यवस्था में एक स्कीम से दूसरी स्कीम में स्विच करने को यूनिट्स की बिक्री माना जाता है और इस पर लागू नियमों के अनुसार कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ता है.
बाजार के कमजोर प्रदर्शन के बीच प्रस्ताव
पिछले दो वर्षों में भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में कमजोर रहा है. इस दौरान निफ्टी 50 में 4.8 फीसदी की गिरावट आई, जबकि MSCI इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स में 40 फीसदी की तेजी दर्ज की गई.
म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी इक्विटी स्कीमों से अपेक्षित रिटर्न नहीं मिला है. फंड रिसर्च कंपनी मॉर्निंगस्टार के आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में लार्जकैप शेयरों में निवेश करने वाले फंड्स का औसत रिटर्न 1.6 फीसदी घटा है.
भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग के पास फिलहाल 82.6 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति प्रबंधन के तहत है. इस उद्योग में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिये हर महीने औसतन 3,000 करोड़ रुपये का निवेश आता है.
इस समझौते के तहत राज्य के औद्योगिक क्लस्टर में सामुदायिक बॉयलर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर विचार किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
स्टीमहाउस इंडिया लिमिटेड ने हरियाणा सरकार के साथ 500 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) किया है. इसके तहत पानीपत और सोनीपत जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में सामुदायिक बॉयलर और केंद्रीकृत भाप उत्पादन व्यवस्था विकसित करने की संभावनाओं का आकलन किया जाएगा. हालांकि, अभी किसी परियोजना को अंतिम मंजूरी नहीं मिली है.
औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी जरूरतों को देखते हुए स्टीमहाउस इंडिया लिमिटेड हरियाणा में निवेश की संभावनाएं तलाश रही है. कंपनी ने हरियाणा सरकार के हरियाणा एंटरप्राइजेज प्रमोशन सेंटर (HEPC) के साथ 500 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं. इस समझौते के तहत राज्य के औद्योगिक क्लस्टर में सामुदायिक बॉयलर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर विचार किया जाएगा.
इस पहल के तहत औद्योगिक इकाइयों को एक ही स्थान से भाप उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीकृत उत्पादन और पाइपलाइन आधारित वितरण व्यवस्था की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा. कंपनी ने इसके लिए पानीपत और सोनीपत जैसे औद्योगिक केंद्रों का उल्लेख किया है.
क्या है सामुदायिक बॉयलर व्यवस्था
सामुदायिक बॉयलर प्रणाली में एक केंद्रीकृत संयंत्र में भाप तैयार की जाती है और पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए कई औद्योगिक इकाइयों तक पहुंचाई जाती है. मौजूदा व्यवस्था में कई उद्योग अपनी जरूरत के मुताबिक अलग-अलग बॉयलर का इस्तेमाल करते हैं.
केंद्रीकृत व्यवस्था में ईंधन प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और उत्सर्जन की निगरानी एक ही प्रणाली के तहत की जा सकती है. हालांकि, इसका प्रभाव इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक और परिचालन के दौरान पर्यावरणीय मानकों के पालन पर निर्भर करेगा.
छोटे औद्योगिक क्लस्टर में ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा देने का मुद्दा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के दिशा-निर्देशों में भी शामिल रहा है.
अभी शुरुआती चरण में है योजना
कंपनी ने स्पष्ट किया है कि हरियाणा सरकार के साथ हुआ यह समझौता केवल संभावनाओं का पता लगाने के लिए है. यह किसी परियोजना को आवंटित किए जाने या उसके निर्माण की गारंटी नहीं है. प्रस्तावित निवेश और परियोजनाओं पर आगे का फैसला तकनीकी एवं व्यावसायिक व्यवहार्यता, औद्योगिक मांग, पर्यावरणीय जरूरतों और जरूरी सरकारी मंजूरियों के आधार पर होगा.
स्टीमहाउस इंडिया के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक विशाल एस. बुधिया ने कहा कि हरियाणा के औद्योगिक क्षेत्रों में केंद्रीकृत भाप उत्पादन और वितरण व्यवस्था की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा. उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था में प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली और ईंधन प्रबंधन को भी ध्यान में रखना होगा.
औद्योगिक भाप और नाइट्रोजन की आपूर्ति करती है कंपनी
साल 2015 में स्थापित स्टीमहाउस इंडिया लिमिटेड (पूर्व नाम अंकलेश्वर इको एनर्जी लिमिटेड) औद्योगिक भाप के उत्पादन और वितरण का कारोबार करती है. कंपनी अपने बॉयलर संयंत्रों के अलावा दूसरी उत्पादन इकाइयों से खरीदी गई भाप की भी पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए आपूर्ति करती है.
कंपनी गुजरात के अंकलेश्वर में नाइट्रोजन उत्पादन और वितरण की सुविधा भी संचालित करती है. यहां प्रेशर स्विंग एडसॉर्प्शन (PSA) तकनीक से नाइट्रोजन तैयार कर औद्योगिक ग्राहकों को उपलब्ध कराई जाती है. कंपनी के शेयर बीएसई और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में सूचीबद्ध हैं.
फेयरफैक्स, IDBI बैंक का नियंत्रण हासिल करने के लिए 52,878 करोड़ रुपये का भुगतान कर रहा है. लेकिन इसके चेयरमैन प्रेम वत्सा ने निवेशकों से कहा है कि IDBI खुद फेयरफैक्स के बीमा और वित्तीय सेवा कारोबार को खरीदने के लिए नकद भुगतान करेगा. फेयरफैक्स ने इस रकम को उन स्रोतों में भी शामिल किया है, जिनसे वह अधिग्रहण के लिए भुगतान करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
IDBI अपने ही अधिग्रहण की फंडिंग में कैसे मदद कर सकता है
खरीदार बैंक खरीद रहा है. बैंक से उम्मीद है कि वह खरीदार का कारोबार खरीदेगा. और दूसरे सौदे से मिलने वाली रकम पहले सौदे की फंडिंग योजना का हिस्सा है. किसी बैंक के अधिग्रहण के लिए यह वित्तीय व्यवस्था का एक असाधारण तरीका है.
फेयरफैक्स के अधिकारियों ने 15 अक्टूबर को निवेशकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल में खुद इस बात का जिक्र किया था. यह वह दिन था, जब कैबिनेट ने बिक्री को मंजूरी दी थी. Businessworld ने इस बातचीत की पूरी ट्रांसक्रिप्ट की समीक्षा की है.
रेमंड जेम्स के एक विश्लेषक ने सीधा सवाल पूछा. फेयरफैक्स अपनी बीमा कंपनी गो डिजिट को IDBI के तहत कैसे लाएगी? क्या IDBI अपनी अतिरिक्त नकदी का इस्तेमाल बाजार भाव पर शेयर खरीदने के लिए करेगा?
फेयरफैक्स के संस्थापक और चेयरमैन प्रेम वत्सा ने जवाब दिया:
"इसकी प्रक्रिया यह है कि IDBI बैंक के पास अतिरिक्त पूंजी है. इसलिए वे नकद भुगतान करेंगे... हमें उम्मीद है कि सौदे के समय वे बाजार भाव पर नकद भुगतान करेंगे."
इसी कॉन्फ्रेंस कॉल में इससे पहले वत्सा ने बताया था कि फेयरफैक्स IDBI के अधिग्रहण के लिए भुगतान कैसे करेगी. उन्होंने कहा था कि इसके लिए "मौजूदा नकदी, हमारी बीमा कंपनियों से मिलने वाला डिविडेंड, संभावित परिसंपत्ति बिक्री... और डिजिट तथा IIFL कैपिटल का उनके संबंधित बाजार मूल्यों पर योगदान" इस्तेमाल किया जाएगा.
फेयरफैक्स के प्रेसिडेंट पीटर क्लार्क ने इसके बाद इस रकम का आंकड़ा भी बताया. उन्होंने कहा कि इस खरीद के लिए 5.6 अरब डॉलर की जरूरत है. जहां तक "लाइफ ऑपरेशंस और IIFL कैपिटल सहित डिजिट इंश्योरेंस के योगदान" की बात है, तो इन तीनों कंपनियों की कीमत अपने आप में करीब 3 अरब डॉलर है.
क्लार्क का बताया 3 अरब डॉलर का आंकड़ा 5.6 अरब डॉलर की कुल खरीद कीमत के आधे से ज्यादा है. इसका मतलब है कि बैंक अपने ही अधिग्रहण के लिए भुगतान करने में मदद कर सकता है.
इससे इस खबर का सबसे अहम सवाल उठता है: क्या फेयरफैक्स अपने पैसे से IDBI खरीद रही है या अधिग्रहण के लिए जरूरी रकम का एक बड़ा हिस्सा खुद IDBI से आने की उम्मीद है?
एक ही तस्वीर के चार पहलू
यह पहला सवाल नहीं है, जिसे Businessworld ने इस बिक्री को लेकर उठाया है. यह चौथा सवाल है.
कीमत
DIPAM के 13 अगस्त के आंतरिक नोट से पता चलता है कि अधिकारियों ने फेयरफैक्स की बोली खोली, 94.42 रुपये के रिजर्व प्राइस को खारिज किया और उसके बाद ही नए मूल्यांकन का आदेश दिया. नए मूल्यांकन में कीमत 75.99 रुपये आई, जो फेयरफैक्स की 81 रुपये की बोली से कम थी. सरकार का कहना है कि उसकी प्रक्रियाएं दिशानिर्देश हैं, नियम नहीं और यह प्रक्रिया "डबल ब्लाइंड" थी.
विक्रेता के बोर्डरूम में कौन था?
बिक्री प्रक्रिया के सात महीनों के दौरान LIC की निवेश समिति में शामिल एक निदेशक फेयरफैक्स के नियंत्रण वाली कंपनी थॉमस कुक इंडिया के बोर्ड में भी थे. LIC IDBI की 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही थी. LIC ने यह नहीं बताया है कि संबंधित निदेशक ने इस भूमिका की जानकारी दी थी या खुद को इस प्रक्रिया से अलग किया था.
कंपनियां
कैबिनेट की मंजूरी के एक दिन बाद फेयरफैक्स ने घोषणा की कि वह गो डिजिट और IIFL कैपिटल में अपनी हिस्सेदारी IDBI को "उनके संबंधित बाजार मूल्यों" पर हस्तांतरित करेगी. गो डिजिट लाइफ गैर-सूचीबद्ध कंपनी है और उसका कोई बाजार मूल्य उपलब्ध नहीं है. इन तीनों कंपनियों का कोई स्वतंत्र मूल्यांकन सार्वजनिक नहीं किया गया है.
पैसा
अब फेयरफैक्स के अपने अधिकारियों का कहना है कि IDBI इन कंपनियों के लिए नकद भुगतान करेगा और यह नकदी IDBI को खरीदने के लिए इस्तेमाल की जाएगी.
इनमें से हर पहलू को अलग-अलग समझाया जा सकता है. लेकिन एक साथ देखने पर ये ऐसी बिक्री की तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें बोली देखे जाने के बाद कीमत तय हुई, विक्रेता का एक निदेशक खरीदार के समूह की कंपनी के बोर्ड में बैठा था और खरीदार की फंडिंग योजना उस बैंक से मिलने वाले पैसे पर निर्भर है, जिसे वह खरीद रहा है.
पैसा कैसे आगे बढ़ेगा
- फेयरफैक्स सरकार और LIC से IDBI की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी 52,878 करोड़ रुपये में खरीदेगी. यह सौदा 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर होगा. कैबिनेट के फैसले वाले दिन के बाजार भाव से यह कीमत कम थी.
- फेयरफैक्स को IDBI का नियंत्रण मिलेगा. 30 सितंबर को बैंक की नेटवर्थ 61,164 करोड़ रुपये थी.
- IDBI, फेयरफैक्स की गो डिजिट जनरल, गो डिजिट लाइफ और IIFL कैपिटल में हिस्सेदारी खरीदेगा. फेयरफैक्स के मुताबिक, यह खरीद "उनके संबंधित बाजार मूल्यों" पर होगी.
- पैसा फेयरफैक्स समूह के पास जाएगा. उसके अधिकारियों ने इन "योगदानों" को उन स्रोतों में शामिल किया है, जिनसे IDBI की खरीद के लिए भुगतान किया जाएगा.
क्लार्क का बताया 3 अरब डॉलर का आंकड़ा इन तीनों कारोबारों के लिए फेयरफैक्स का अपना मूल्यांकन है, न कि पूरा हो चुका भुगतान. सौदे की कीमत से संकेतित विनिमय दर के हिसाब से यह करीब 28,300 करोड़ रुपये होता है. यह फेयरफैक्स द्वारा IDBI के लिए चुकाई जा रही रकम का 54 फीसदी है.
ATB कॉरमार्क के एक अन्य विश्लेषक ने कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा से इस योजना का सार बताते हुए कहा, "डिजिट और IIFL को इसमें शामिल किया जाएगा. आप नकदी लेंगे, शायद अतिरिक्त पूंजी से." वत्सा ने जवाब में कहा, "हां, यह सही है, जेफ." इसके बाद उन्होंने हिस्सेदारी की सीमा पर बात की.
अभी सौदे की कोई अंतिम संरचना तय नहीं हुई है और वत्सा ने यह भी कहा कि IDBI एक सार्वजनिक कंपनी है. लेकिन जब उनसे सीधे पूछा गया कि IDBI भुगतान कैसे करेगा, तो उनका जवाब था- नकद.
IDBI के दूसरे शेयरधारकों के लिए सवाल
फेयरफैक्स के पास IDBI की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी होगी. बाकी 39.28 फीसदी हिस्सेदारी अन्य शेयरधारकों के पास होगी, जिसमें ज्यादातर हिस्सा सरकार और LIC का है.
IDBI को अपनी नकदी के बदले इन तीनों कंपनियों के शेयर मिलेंगे, इसलिए यह पैसा बिना किसी बदले के नहीं दिया जा रहा है. लेकिन यह बैंक का पैसा है और हर शेयरधारक का इस बात में हित है कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है. इससे तीन सवाल उठते हैं:
- क्या इन कारोबारों का स्वतंत्र और उचित मूल्यांकन किया जा रहा है, खासकर गो डिजिट लाइफ का, जिसका कोई बाजार मूल्य नहीं है?
- क्या बैंक अपनी इतनी पूंजी इन कंपनियों पर खर्च करने की स्थिति में है?
- क्या यह खरीद सभी शेयरधारकों के हित में है या मुख्य रूप से उस विक्रेता के हित में, जिसका खरीदार पर नियंत्रण है?
यह पूंजी किसकी है?
IDBI की "अतिरिक्त पूंजी" अचानक नहीं आई है.
एक दशक पहले IDBI भारत के सबसे संकटग्रस्त बैंकों में शामिल था. इसे संकट से निकालने के लिए सरकार और भारत की सरकारी बीमा कंपनी LIC ने पूंजी लगाई थी. 2019 में दोनों ने बैंक का नियंत्रण अपने हाथ में लिया. इसी साल कैबिनेट ने 9,300 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी को मंजूरी दी थी, जिसे सरकार और LIC के बीच बांटा गया था.
वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल में खुद इस बात को स्वीकार किया. उन्होंने कहा कि IDBI "2016 से 2020 के दौरान संकट में आ गया था" और उसे करीब 6.4 अरब डॉलर का संचयी नुकसान हुआ था, जिसकी भरपाई LIC और भारत सरकार ने की थी.
यह बदलाव सफल रहा. 30 सितंबर, 2026 को IDBI का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 27.10 फीसदी था. यह पूंजी संरक्षण बफर सहित 11.5 फीसदी के नियामकीय न्यूनतम स्तर से दोगुने से भी ज्यादा है.
पूंजी पर्याप्तता अनुपात का मतलब तिजोरी में रखी नकदी नहीं है. लेकिन यह वह वित्तीय मजबूती है, जिसे सार्वजनिक धन से दोबारा खड़ा किया गया.
अब यही मजबूती फेयरफैक्स के निवेश प्रस्ताव का अहम आधार है. और फेयरफैक्स के चेयरमैन का कहना है कि बैंक की "अतिरिक्त पूंजी" का इस्तेमाल फेयरफैक्स की अपनी कंपनियों के लिए नकद भुगतान में होगा.
कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने IDBI को "27 फीसदी पूंजी पर्याप्तता के साथ वित्तीय रूप से बेहद मजबूत" बताया और इसकी खरीद को "जीवन में एक बार मिलने वाला अवसर" कहा. बैंक के भविष्य के डिविडेंड के बारे में उन्होंने कहा, "उनके पास बहुत अच्छी पूंजी है. और यह रकम हमारे पास आएगी."
RBI के लिए एक सवाल
RBI इस बात की सीमा तय करता है कि कोई बैंक अपनी कितनी पूंजी दूसरी कंपनियों में लगा सकता है. वित्तीय सेवाओं से जुड़े वाणिज्यिक बैंकों के लिए 2025 के निर्देशों के तहत:
- किसी बैंक की एक सहायक कंपनी या वित्तीय सेवा कंपनी में इक्विटी हिस्सेदारी "बैंक की चुकता शेयर पूंजी और रिजर्व के 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए" (पैरा 23).
- ऐसी सभी कंपनियों में बैंक की कुल इक्विटी हिस्सेदारी "20 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए" (पैरा 26).
इन सीमाओं की गणना बैंक की चुकता पूंजी और रिजर्व के आधार पर होती है, न कि नेटवर्थ के आधार पर. IDBI के मौजूदा निवेश भी इन सीमाओं में शामिल होंगे. फेयरफैक्स ने इन तीनों कारोबारों का मूल्य करीब 3 अरब डॉलर बताया है. लेकिन इतनी बड़ी खरीद इन सीमाओं के भीतर कैसे आएगी और इसके लिए किन मंजूरियों की जरूरत होगी, इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
इन निर्देशों के तहत ऐसे निवेश के लिए RBI की पहले से मंजूरी लेना भी जरूरी है. इसलिए वत्सा की ओर से बताए गए नकद भुगतान नियामकीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. इन सीमाओं को किस तरह लागू किया जाएगा, यह सौदे की संरचना पर निर्भर करेगा और अभी यह तय नहीं हुई है.
फेयरफैक्स ने कहा है कि इन योगदानों के लिए RBI, SEBI और डिजिट के मामले में बीमा नियामक IRDAI की मंजूरी जरूरी होगी.
क्या सरकार ने अपना अधिकार छोड़ दिया?
बिक्री के बाद भी सरकार और LIC के पास IDBI की 34 फीसदी हिस्सेदारी रहेगी. लेकिन उन्होंने कोई विशेष अधिकार अपने पास नहीं रखने पर सहमति जताई है.
DIPAM के 13 अगस्त, 2026 के आंतरिक नोट में इस फैसले का उल्लेख है, जिसकी रिपोर्ट Businessworld पहले ही कर चुका है. नोट के मुताबिक, सरकार ने शेयर खरीद समझौते का विकल्प इसलिए चुना क्योंकि "IDBI बैंक के प्रबंधन नियंत्रण का हस्तांतरण होगा और सौदा पूरा होने के बाद भारत सरकार और LIC को अनुबंध के तहत कोई विशेष अधिकार नहीं दिए जाएंगे" (पैरा 2.6).
क्या इसका मतलब यह है कि उन्हें किसी भी तरह के शेयरधारक मतदान अधिकार नहीं मिलेंगे? ऐसे बयानों पर सरकार से स्पष्टता की जरूरत है. सरकार का यह भी कहना है कि दोनों IDBI के बोर्ड से अपने नामित निदेशकों को वापस बुला लेंगे.
इसी नोट में फेयरफैक्स को खरीदार के रूप में चुनने की सिफारिश की गई थी. इसमें फेयरफैक्स की उस योजना का उल्लेख नहीं है, जिसके तहत IDBI को गो डिजिट और IIFL कैपिटल का अधिग्रहण करना था. यह भी नहीं बताया गया है कि सरकार को इस योजना की जानकारी थी या नहीं. फेयरफैक्स ने 14 अक्टूबर को इस योजना की घोषणा की थी. इसी दिन कैबिनेट ने बिक्री को मंजूरी दी थी.
घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है
- सरकार ने IDBI को 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बेचा, जो उस दिन के बाजार मूल्य से करीब 10 फीसदी कम था.
- बिक्री के बाद सरकार ने अपने विशेष अधिकार छोड़ दिए.
- एक दिन के भीतर फेयरफैक्स ने कहा कि IDBI की अतिरिक्त पूंजी से फेयरफैक्स की अपनी कंपनियों को बाजार भाव पर खरीदा जाएगा.
## फेयरफैक्स का पक्ष
फेयरफैक्स का कहना है कि इस योजना से "एक एकीकृत वित्तीय सेवा कंपनी तैयार होगी, जो भारतीयों की वित्तीय जरूरतों के लिए एक ही जगह पर समाधान उपलब्ध करा सकेगी." डिजिट, IDBI के ग्राहकों को बीमा बेच सकती है. कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने कहा था कि फेयरफैक्स इन कारोबारों का विलय नहीं करेगी और न ही उनका नाम बदलेगी. उन्होंने कहा, "हमने कभी भी तालमेल से मिलने वाले फायदे (सिनर्जी) में विश्वास नहीं किया है."
इस योजना के पक्ष में एक ठोस तर्क भी है.
एक दशक से भी कम समय पहले शुरू हुई गो डिजिट अब एक सूचीबद्ध और मुनाफे में चल रही बीमा कंपनी है. IIFL कैपिटल एक स्थापित ब्रोकरेज कंपनी है. IDBI के ग्राहकों को डिजिट का बीमा बेचने से बैंक को कमाई हो सकती है और इसका फायदा उसके सभी शेयरधारकों, सरकार और LIC को भी मिल सकता है.
लेकिन कंपनियां अच्छी हैं या नहीं, यह एक अलग सवाल है. शर्तें कौन तय करेगा, यह दूसरा सवाल है. फेयरफैक्स विक्रेता होगी. IDBI के नियंत्रक शेयरधारक के रूप में खरीदार की ओर से भी उसका निर्णायक प्रभाव होगा. कोई अच्छा कारोबार भी बैंक के दूसरे शेयरधारकों को नुकसान पहुंचा सकता है, अगर कीमत और सौदे का समय उस पक्ष की ओर से तय किया जाए, जो दूसरी तरफ बैठा है.
भारतीय नियम इस जोखिम को पहचानते हैं. सूचीबद्ध कंपनियों के लिए SEBI के नियमों के तहत संबंधित पक्षों के साथ बड़े लेनदेन के लिए कंपनी की ऑडिट समिति और शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी होती है. ऐसे लेनदेन में संबंधित पक्षों को मतदान करने की अनुमति नहीं होती.
फेयरफैक्स यह वादा भी नहीं कर रही है कि वह IDBI के कामकाज के तरीके में बदलाव करेगी. कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने कहा था कि राकेश शर्मा मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने रहेंगे. डिजिट और IIFL कैपिटल "काफी हद तक स्वतंत्र रूप से" काम करती रहेंगी. उन्होंने दोहराया कि फेयरफैक्स ने "कभी भी सिनर्जी में विश्वास नहीं किया है."
इस योजना के पक्ष में तर्क इन कंपनियों के कारोबार पर आधारित है. लेकिन यह खबर पैसे और उसके इस्तेमाल का फैसला कौन करेगा, इस सवाल को उठा रही है.
फेयरफैक्स इस बात पर भी जोर दे रही है कि अभी कुछ भी अंतिम नहीं है.
कोई बाध्यकारी समझौता नहीं हुआ है. उसकी विज्ञप्ति में कहा गया है कि IDBI की खरीद "दोनों या इनमें से किसी एक योगदान के पूरा हुए बिना भी हो सकती है." इसमें यह भी कहा गया है कि डिजिट या IIFL कैपिटल के संचालन और प्रबंधन के तरीके में किसी बदलाव की उम्मीद नहीं है.
वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल की शुरुआत में "सरकार और उनकी टीम को बेहद पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाने" के लिए धन्यवाद दिया था. हालांकि, DIPAM के अपने नोट में दर्ज है कि केवल एक बोलीदाता ने संशोधित प्रस्ताव जमा किया था और पहली बोलियां असफल होने के बाद रिजर्व प्राइस को खारिज कर दिया गया था.
इन सबके बावजूद बुनियादी गणित नहीं बदलता. एक खरीदार, जो कैबिनेट के फैसले वाले दिन IDBI के शेयर मूल्य से करीब 10 फीसदी कम भुगतान कर रहा है, प्रस्ताव दे रहा है कि बैंक अपनी अतिरिक्त पूंजी से खरीदार की अपनी कंपनियों को बाजार भाव पर खरीदे.
सवाल
- क्या फेयरफैक्स की बोली में सरकार को बताया गया था कि IDBI की पूंजी का इस्तेमाल फेयरफैक्स की कंपनियों को खरीदने के लिए किया जाएगा?
- क्या सरकार या उसके मूल्यांकनकर्ताओं ने 81 रुपये की कीमत को उचित मानते समय इस बात को ध्यान में रखा था?
- क्या IDBI नकद भुगतान करेगा या शेयर जारी करेगा? अगर नकद भुगतान होगा, तो कितनी रकम दी जाएगी?
- RBI इन खरीद पर 10 फीसदी और 20 फीसदी की निवेश सीमाएं कैसे लागू करेगा?
- गो डिजिट लाइफ का मूल्यांकन कौन करेगा, जिसका कोई बाजार मूल्य उपलब्ध नहीं है?
- क्या IDBI के सबसे बड़े अल्पसंख्यक शेयरधारकों के रूप में सरकार और LIC को इस हस्तांतरण पर मतदान का अधिकार मिलेगा?
संपादक की टिप्पणी
- श्री वत्सा और श्री क्लार्क के सभी उद्धरण 15 अक्टूबर की कॉन्फ्रेंस कॉल की पूरी ट्रांसक्रिप्ट से लिए गए हैं.
- 28,300 करोड़ रुपये = 3 अरब डॉलर × (52,878 करोड़ रुपये ÷ 5.6 अरब डॉलर). क्लार्क का 3 अरब डॉलर का आंकड़ा तीनों कंपनियों के लिए है, जिसमें गैर-सूचीबद्ध गो डिजिट लाइफ भी शामिल है. 54% = 3 ÷ 5.6. 46% = 28,300 ÷ 61,164.
- हिस्सेदारी का मूल्य Businessworld की गणना पर आधारित है.
- 30 अक्टूबर को कारोबार बंद होने के समय गो डिजिट जनरल का बाजार पूंजीकरण 24,109 करोड़ रुपये था (स्क्रीनर); इसका 57 फीसदी करीब 13,700 करोड़ रुपये होता है.
- 57 फीसदी का आंकड़ा जेफरीज और अन्य रिपोर्टों से लिया गया है; फेयरफैक्स की विज्ञप्ति में कोई प्रतिशत नहीं दिया गया है.
- IIFL कैपिटल के बारे में वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल में कहा था कि फेयरफैक्स के पास "मेरा ख्याल है, इसकी 51 फीसदी हिस्सेदारी होगी."
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
SBI रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, अगर RBI रेपो रेट में 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 6 फीसदी तक पहुंचा देता है, तब भी 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 6.75 से 7 फीसदी के दायरे में रह सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार को लेकर राहत भरी संभावना सामने आई है. भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2027 के अंत तक भारत के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड घटकर 6.75 से 7 फीसदी के दायरे में आ सकती है. खास बात यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रेपो रेट में 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी किए जाने की स्थिति में भी बॉन्ड यील्ड में गिरावट आ सकती है.
फिलहाल 10 साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 7.43 फीसदी है. वहीं, भारत और अमेरिका के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड के बीच अंतर लगभग 2.50 फीसदी है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, SBI रिसर्च ने 2019 के बाद के आंकड़ों का विश्लेषण किया है. इसमें पाया गया कि भारतीय और अमेरिकी 10 साल के बॉन्ड की यील्ड के बीच 2 से 3 फीसदी का अंतर सबसे अधिक देखने को मिला है.
रेपो रेट बढ़ने के बावजूद घट सकती है बॉन्ड यील्ड
SBI रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, अगर RBI रेपो रेट में 50 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 6 फीसदी तक पहुंचा देता है, तब भी 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 6.75 से 7 फीसदी के दायरे में रह सकती है.
यह अनुमान बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड यील्ड और रेपो रेट के बीच ऐतिहासिक रुझानों पर आधारित है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार की ओर से उधारी कम रहने की उम्मीद से बॉन्ड बाजार को समर्थन मिल सकता है. सरकारी उधारी में कमी आने से बाजार में बॉन्ड की मांग और आपूर्ति के संतुलन पर सकारात्मक असर पड़ सकता है.
7.6 फीसदी तक जा सकती है यील्ड
हालांकि, SBI रिसर्च ने निकट भविष्य में बॉन्ड यील्ड में अस्थायी बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड कुछ समय के लिए बढ़कर करीब 7.6 फीसदी तक पहुंच सकती है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि जब बॉन्ड यील्ड 7.15 से 7.20 फीसदी के दायरे से ऊपर गई तो बाजार के कुछ प्रतिभागियों को इसकी उम्मीद नहीं थी. इसके बाद निवेशकों की ओर से अपनी पोजीशन घटाने यानी पोजीशन अनवाइंड करने की प्रक्रिया ने भी हालिया तेजी में योगदान दिया.
मार्च 2027 तक स्थिरता की उम्मीद
SBI रिसर्च का मानना है कि निकट अवधि में उतार-चढ़ाव के बावजूद 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड मार्च 2027 के अंत तक 6.75 से 7 फीसदी के स्तर पर आकर स्थिर हो सकती है. रेपो रेट में संभावित बदलाव, सरकारी उधारी और भारत-अमेरिका बॉन्ड यील्ड के बीच अंतर आने वाले समय में बॉन्ड बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे.
22 से 24 अक्टूबर तक ग्रेटर नोएडा स्थित इंडिया एक्सपो मार्ट एंड सेंटर में आयोजित इस प्रदर्शनी में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े उद्योगों, निवेशकों और अन्य हितधारकों ने हिस्सा लिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) सेक्टर को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा निवेश प्रस्ताव सामने आया है. ग्रेटर नोएडा में आयोजित रिन्यूएबल एनर्जी इंडिया (REI) एक्सपो 2026 के दौरान निवेशकों ने इस क्षेत्र में 3,200 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव दिए हैं. भारतीय बायोगैस एसोसिएशन (IBA) के मुताबिक, तीन दिवसीय आयोजन से बायोगैस और CBG सेक्टर के लिए निवेश की संभावनाओं का एक बड़ा दायरा तैयार हुआ है.
22 से 24 अक्टूबर तक ग्रेटर नोएडा स्थित इंडिया एक्सपो मार्ट एंड सेंटर में आयोजित इस प्रदर्शनी में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े उद्योगों, निवेशकों और अन्य हितधारकों ने हिस्सा लिया. इस दौरान कारोबार में साझेदारी, नई तकनीकों और जैव ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के अवसरों पर चर्चा हुई.
वेस्ट-टू-एनर्जी और CBG तकनीकों पर रहा फोकस
एक्सपो में वेस्ट-टू-एनर्जी, बायोगैस अपग्रेडिंग, कंप्रेस्ड बायोगैस उत्पादन, बायोमास के इस्तेमाल और जैविक कचरे के प्रबंधन से जुड़ी तकनीकों और समाधानों को प्रदर्शित किया गया.
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य भारत के बायोएनर्जी और सर्कुलर इकोनॉमी इकोसिस्टम में व्यावसायिक अवसरों का विस्तार करना रहा. देश में वैकल्पिक ईंधनों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की कोशिशों के बीच बायोगैस और CBG सेक्टर को निवेश और तकनीकी विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
इंटरनेशनल बायो-एनर्जी कॉन्फ्रेंस में निवेश और तकनीक पर चर्चा
इस आयोजन के तहत 24 अक्टूबर को भारतीय बायोगैस एसोसिएशन ने इंटरनेशनल बायो-एनर्जी कॉन्फ्रेंस का भी आयोजन किया. इसमें CBG इकोसिस्टम के एकीकृत विकास, निवेश आकर्षित करने, नई तकनीकों को अपनाने और अगली पीढ़ी के नवीकरणीय ईंधनों की संभावनाओं पर चर्चा हुई.
कॉन्फ्रेंस के विभिन्न सत्रों में बायोएनर्जी सेक्टर के विस्तार और इससे जुड़ी व्यावसायिक संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया गया. एक्सपो के दौरान मिले 3,200 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव इस क्षेत्र में उद्योग जगत की बढ़ती दिलचस्पी को दर्शाते हैं.
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों ने बढ़ाई खरीदारी, रूस से करीब 20 लाख और पश्चिम एशिया से 23 लाख बैरल प्रतिदिन हुआ आयात
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का कच्चे तेल का आयात अक्टूबर में बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. ऊर्जा क्षेत्र की आसूचना कंपनी केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने इस दौरान प्रतिदिन करीब 56 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया. भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितताओं के बावजूद भारत ने पश्चिम एशिया और रूस से तेल की खरीद बढ़ाई. अक्टूबर में पश्चिम एशिया से भारत को करीब 23 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल की आपूर्ति हुई, जबकि रूस से आयात लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन रहा.
होर्मुज स्ट्रेट से आपूर्ति में सुधार का मिला फायदा
केप्लर के प्रमुख विश्लेषक निखिल दुबे के अनुसार, जहाज से जहाज के बीच तेल हस्तांतरण (Ship-to-Ship Transfer) बढ़ने से होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते कच्चे तेल की आवाजाही आसान हुई. इससे सितंबर और अक्टूबर के दौरान खाड़ी देशों से आपूर्ति में सुधार आया और भारतीय रिफाइनरियों को तेल खरीदने के अधिक विकल्प मिले. हालांकि, नवंबर और दिसंबर में रूस से कच्चे तेल की आपूर्ति में कुछ कमी आने की आशंका है.
रूसी तेल की लागत बढ़ने से खरीद पर पड़ सकता है असर
काला सागर क्षेत्र में हमलों के कारण माल ढुलाई की लागत बढ़ रही है. इससे रूसी कच्चा तेल भारतीय खरीदारों के लिए महंगा हो सकता है. दूसरी ओर, खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ता भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल उपलब्ध करा रहे हैं.
दुबे के मुताबिक, यदि होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते तेल की आपूर्ति दोबारा बाधित होती है, तो भारतीय रिफाइनरी कंपनियां अधिक परिवहन लागत के बावजूद रूसी तेल की खरीद बढ़ा सकती हैं. उन्होंने यह भी कहा कि 16 अक्टूबर को ग्राहम अधिनियम के तहत मिली छूट से कुछ भारतीय खरीदारों की रूसी तेल खरीद से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंताएं कम हो सकती हैं. इससे रिफाइनरी कंपनियों को खरीद संबंधी फैसले लेने में अधिक लचीलापन मिलेगा.
भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी तेल करता है आयात
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 फीसदी हिस्सा आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के साथ-साथ आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत और परिवहन लागत भी देश के लिए महत्वपूर्ण हैं. यही वजह है कि भारत की तेल खरीद केवल भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि कीमत, माल ढुलाई खर्च और आपूर्ति की सुरक्षा जैसे व्यावसायिक पहलू भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं.
शुक्रवार को सेंसेक्स 308.49 अंक यानी 0.42 फीसदी चढ़कर 74,459.53 पर बंद हुआ था. वहीं, निफ्टी 116.35 अंक यानी 0.51 फीसदी की बढ़त के साथ 23,053.10 के स्तर पर पहुंच गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 2 नवंबर को कारोबारी सप्ताह की शुरुआत तेजी के साथ होने के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी शुरुआती कारोबार में करीब 170 अंकों की बढ़त के साथ 23,265 के स्तर पर पहुंच गया. पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 2 फीसदी से अधिक की गिरावट से निवेशकों को राहत मिली है. ब्रेंट क्रूड 111 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया है. इस बीच निवेशकों की नजर रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL), जियो प्लेटफॉर्म्स, एनटीपीसी, वोडाफोन आइडिया और कोल इंडिया समेत कई कंपनियों के शेयरों पर रहेगी. दूसरी तिमाही के नतीजों और कारोबारी गतिविधियों के चलते इन शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है.
अमेरिका-ईरान बातचीत और कच्चे तेल की कीमतों पर नजर
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए जारी कूटनीतिक प्रयासों से बाजार की धारणा को सहारा मिल सकता है. ईरानी अधिकारियों और कतर के मध्यस्थों के बीच लगातार तीसरे दिन बातचीत हुई है. इससे कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर बनी चिंताएं कम होने की उम्मीद है. हालांकि, बाजार की आगे की दिशा काफी हद तक पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर निर्भर करेगी.
एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर के मुताबिक, हालिया रिकवरी आगे भी जारी रह सकती है, लेकिन जब तक तनाव कम होने के स्पष्ट संकेत नहीं मिलते, तब तक मौजूदा तेजी को लंबी अवधि की मजबूती मानना जल्दबाजी होगी.
सोमवार को शुरुआती कारोबार में ब्रेंट क्रूड वायदा 2.20 फीसदी गिरकर 110.93 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड करीब 102 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से आयात बिल और महंगाई के दबाव में राहत मिल सकती है.
निफ्टी के लिए 23,285 का स्तर अहम
तकनीकी नजरिए से निफ्टी के लिए 23,175 से 23,285 का दायरा अहम रेजिस्टेंस बना हुआ है. HST वेल्थ के फाउंडर और सीईओ हरिसेल्वन राधाकृष्णन के मुताबिक, निफ्टी का 23,000 के ऊपर पहुंचना बाजार में रिकवरी का सकारात्मक संकेत है. यदि इंडेक्स 23,285 के ऊपर टिकता है, तो यह 23,500 से 23,600 के स्तर तक जा सकता है. वहीं, गिरावट आने पर 23,000 और 22,750 से 22,800 के स्तर पर सपोर्ट मिल सकता है. बाजार में व्यापक तेजी की पुष्टि के लिए बैंक निफ्टी का 55,150 के ऊपर बंद होना भी जरूरी होगा.
इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज, जियो प्लेटफॉर्म्स, एनटीपीसी, वोडाफोन आइडिया, एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी, मुथूट फाइनेंस, बैंक ऑफ बड़ौदा, एफल 3आई, पीबी फिनटेक, कोल इंडिया, सीडीएसएल और नजारा टेक्नोलॉजीज के शेयर फोकस में रहेंगे. एनटीपीसी का दूसरी तिमाही में कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 39 फीसदी बढ़कर 7,030 करोड़ रुपये और रिलायंस इंडस्ट्रीज का मुनाफा 32 फीसदी बढ़कर 29,250 करोड़ रुपये रहा. जियो प्लेटफॉर्म्स का नेट प्रॉफिट 13.7 फीसदी बढ़कर 8,387 करोड़ रुपये पहुंच गया. मुथूट फाइनेंस का स्टैंडअलोन मुनाफा 27 फीसदी बढ़कर 2,977 करोड़ रुपये और बैंक ऑफ बड़ौदा का मुनाफा 35.8 फीसदी बढ़कर 6,531 करोड़ रुपये रहा. सीडीएसएल का नेट प्रॉफिट भी 24.3 फीसदी की बढ़त के साथ 174 करोड़ रुपये पहुंच गया. वहीं, एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी का मुनाफा 57 फीसदी बढ़कर 137 करोड़ रुपये रहा, हालांकि इसके नतीजे बाजार के अनुमानों से कमजोर रहे. वोडाफोन आइडिया को वेगा एसएएस के जरिए वोडाफोन ग्रुप में 16.2 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) से मंजूरी मिली है. एफल 3आई की इजरायली सब्सिडियरी ने करीब 42 करोड़ डॉलर में पेरियन नेटवर्क के अधिग्रहण का समझौता किया है. पीबी फिनटेक का मुनाफा 42.2 फीसदी बढ़कर 192 करोड़ रुपये रहा, लेकिन कंपनी का एबिटा बाजार के अनुमान से कम रहा. दूसरी ओर, कोल इंडिया ने अक्टूबर में 7.03 करोड़ टन कोयले की रिकॉर्ड सप्लाई की, जबकि नजारा टेक्नोलॉजीज ने अपनी ब्रिटेन स्थित सब्सिडियरी में 7.7 करोड़ डॉलर का निवेश किया है.
शुक्रवार को बाजार में रही थी तेजी
पिछले कारोबारी सत्र यानी शुक्रवार, 30 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे दिन तेजी दर्ज की गई थी. सेंसेक्स 308.49 अंक यानी 0.42 फीसदी चढ़कर 74,459.53 पर बंद हुआ था. वहीं, निफ्टी 116.35 अंक यानी 0.51 फीसदी की बढ़त के साथ 23,053.10 के स्तर पर पहुंच गया था. आईटी, फार्मा और दिग्गज कंपनियों के शेयरों में खरीदारी से बाजार को सहारा मिला था.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
संशोधित भारतनेट कार्यक्रम के तहत तमिलनाडु के 4,767 गांवों तक मांग के आधार पर ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाई जाएगी. केंद्र की वित्तीय सहायता से ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट नेटवर्क का विस्तार और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच आसान होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने संशोधित भारतनेट कार्यक्रम (Amended BharatNet Programme) के तहत तमिलनाडु में 5 लाख से अधिक ग्रामीण घरों को फाइबर ब्रॉडबैंड कनेक्शन उपलब्ध कराने के लिए वित्तीय सब्सिडी को मंजूरी दी है. इस पहल का उद्देश्य राज्य के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी का विस्तार करना और डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है.
इस संबंध में शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित संचार भवन में डिजिटल भारत निधि (DBN), तमिलनाडु सरकार और तमिलनाडु फाइबरनेट कॉरपोरेशन (TANFINET) के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. इस समझौते के तहत भारतनेट नेटवर्क का इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने के लिए किया जाएगा.
समझौते में तमिलनाडु के 4,767 गांवों तक मांग के आधार पर ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाने का भी प्रावधान है. केंद्र की वित्तीय सहायता से नेटवर्क के अंतिम छोर तक विस्तार में तेजी आने और ग्रामीण एवं दूरदराज के इलाकों में डिजिटल सेवाओं की पहुंच बेहतर होने की उम्मीद है.
समझौता हस्ताक्षर समारोह में डिजिटल भारत निधि के प्रशासक श्यामल मिश्रा मौजूद रहे. तमिलनाडु के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सूचना प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल सेवा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अतुल आनंद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल हुए. इस दौरान भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL), TANFINET, दूरसंचार विभाग (DoT) और डिजिटल भारत निधि के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे.
5 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों को होगा फायदा
इस पहल से तमिलनाडु के 5 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों को फाइबर ब्रॉडबैंड कनेक्शन उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी. इससे ग्रामीण परिवारों को हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाओं का लाभ मिल सकेगा.
विस्तारित नेटवर्क के जरिए ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन, डिजिटल भुगतान और नागरिकों से जुड़ी अन्य डिजिटल सेवाओं की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है. इसके अलावा, 4,767 गांवों में मांग के आधार पर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की व्यवस्था से उन क्षेत्रों तक भी ब्रॉडबैंड सेवाएं पहुंचाने में मदद मिलेगी, जहां अभी डिजिटल नेटवर्क की पहुंच सीमित है.
क्या है संशोधित भारतनेट कार्यक्रम?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 अगस्त 2023 को संशोधित भारतनेट कार्यक्रम को मंजूरी दी थी. इसका उद्देश्य मौजूदा भारतनेट नेटवर्क का उन्नयन, एकीकरण और विस्तार करना है. इस कार्यक्रम के तहत सभी ग्राम पंचायतों तक मजबूत और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के साथ-साथ मांग के आधार पर गांवों तक भी इंटरनेट सेवाएं पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है.
तमिलनाडु के साथ हुआ यह समझौता राज्य के नेतृत्व वाले मॉडल के जरिए कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में मदद करेगा. इसके तहत भारतनेट के बुनियादी ढांचे के इस्तेमाल के लिए केंद्र सरकार वित्तीय सब्सिडी उपलब्ध कराएगी.
ग्रामीण टेलीकॉम विस्तार में डिजिटल भारत निधि की भूमिका
डिजिटल भारत निधि (Digital Bharat Nidhi) को पहले यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (USOF) के नाम से जाना जाता था. यह संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग के अंतर्गत काम करती है.
इसकी स्थापना भारतीय टेलीग्राफ (संशोधन) अधिनियम, 2003 के तहत 1 अप्रैल 2002 से प्रभावी हुई थी. दूरसंचार अधिनियम, 2023 के तहत इसका नाम बदलकर डिजिटल भारत निधि कर दिया गया.
इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण, दूरदराज और ऐसे शहरी क्षेत्रों में दूरसंचार सेवाओं की सार्वभौमिक पहुंच को बढ़ावा देना है, जहां इन सेवाओं की उपलब्धता सीमित है.
भारतनेट के अलावा डिजिटल भारत निधि 4G सैचुरेशन प्रोजेक्ट जैसी कई कनेक्टिविटी योजनाओं को भी समर्थन देती है. इसमें आकांक्षी जिलों के ऐसे इलाके जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है, वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र, हिमालयी और सीमावर्ती इलाके, द्वीप समूह तथा पूर्वोत्तर राज्यों में मोबाइल सेवाओं का विस्तार शामिल है.
तमिलनाडु के साथ हुआ यह समझौता डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने के सरकार के लक्ष्य को आगे बढ़ाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है.
सरकार का लक्ष्य डिजिटल खरीदारी को बढ़ावा देने, सप्लाई चेन मजबूत करने और छोटे खुदरा कारोबारियों को कर्ज की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए उद्योग जगत के साथ मिलकर काम करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने FMCG कंपनियों और उद्योग जगत के अन्य हितधारकों से देश की 1.4 करोड़ किराना दुकानों को डिजिटल बनाने के प्रयासों में सहयोग करने की अपील की है. सरकार ONDC की DigiDukaan पहल के माध्यम से देश के पारंपरिक खुदरा कारोबार को मजबूत करने और उसे डिजिटल इकोसिस्टम से जोड़ने की दिशा में प्रयास तेज कर रही है.
इस सिलसिले में पीयूष गोयल ने नई दिल्ली के वाणिज्य भवन में आयोजित उच्चस्तरीय CEO राउंडटेबल बैठक 'भारत कॉमर्स चिंतन शिविर' की अध्यक्षता की. इस बैठक का आयोजन उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) और ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) ने किया था. इसमें प्रमुख FMCG कंपनियों के 40 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया. बैठक में किराना दुकानों की खरीद प्रक्रिया को डिजिटल बनाने और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए साझा रोडमैप तैयार करने पर चर्चा हुई.
बैठक में FMCG कंपनियों, वितरकों और अन्य हितधारकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया. इसका उद्देश्य डिजिटल खरीदारी को प्रोत्साहित करना, सप्लाई चेन को अधिक प्रभावी बनाना और छोटे खुदरा कारोबारियों की सेवाओं तक पहुंच बेहतर करना है.
DigiDukaan के जरिए खरीद प्रक्रिया होगी डिजिटल
किराना दुकानों को डिजिटल बनाने वाली पारंपरिक पहलों से अलग ONDC की DigiDukaan पहल दुकानदारों को खरीदार के रूप में डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने पर केंद्रित है. इसके तहत पड़ोस की किराना दुकानें एक ही डिजिटल इंटरफेस के जरिए अलग-अलग ब्रांड, वितरकों और थोक विक्रेताओं से उत्पादों की जानकारी हासिल कर सकेंगी और ऑर्डर दे सकेंगी.
इस प्लेटफॉर्म के जरिए दुकानदारों को कीमतों, व्यापारिक योजनाओं और उत्पादों की उपलब्धता के बारे में अधिक पारदर्शिता मिलेगी. खास बात यह है कि वे अपने मौजूदा वितरण नेटवर्क के साथ काम करना जारी रख सकेंगे.
इस पहल का उद्देश्य साझा डिजिटल बुनियादी ढांचा तैयार करना भी है, जिसके माध्यम से भविष्य में किराना दुकानों को साझा लॉजिस्टिक्स, माइक्रो-वेयरहाउसिंग और औपचारिक कर्ज सुविधाओं से जोड़ा जा सके.
बैठक में हिंदुस्तान यूनिलीवर, कोका-कोला इंडिया, ITC, P&G, मैरिको, कैविनकेयर, पिडिलाइट, ब्रिटानिया, अडानी विल्मर, LT फूड्स, अनमोल इंडस्ट्रीज, हल्दीराम, इमामी, वीबा और निलॉन्स सहित कई कंपनियों के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल हुए. इनके अलावा लॉजिस्टिक्स प्रदाताओं, टेक्नोलॉजी पार्टनर्स और ONDC नेटवर्क से जुड़े प्रतिभागियों ने भी हिस्सा लिया.
डिजिटल पहचान, लॉजिस्टिक्स और कर्ज पर जोर
बैठक में देश के पारंपरिक खुदरा कारोबार को मजबूत बनाने के लिए पांच प्रमुख प्राथमिकताओं की पहचान की गई. इनमें किराना दुकानों के लिए एक साझा डिजिटल पहचान विकसित करना शामिल है, ताकि वे अलग-अलग ब्रांड और सेवा प्रदाताओं से आसानी से जुड़ सकें. इसके अलावा साझा लॉजिस्टिक्स और माइक्रो-वेयरहाउसिंग नेटवर्क तैयार करने पर जोर दिया गया, जिससे वितरकों की पहुंच बढ़े और दुकानों तक अगले दिन उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके.
छोटे खुदरा कारोबारियों के लिए औपचारिक कर्ज की उपलब्धता बढ़ाना भी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है. इसके लिए डिजिटल खरीदारी और लेनदेन के रिकॉर्ड से जुड़ी वित्तपोषण सुविधाएं विकसित करने पर चर्चा हुई.
इसके साथ ही प्लग-एंड-प्ले डिस्ट्रीब्यूटर मैनेजमेंट सिस्टम (DMS) कनेक्टर्स, मानकीकृत उत्पाद कैटलॉग और साझा डिजिटल इंटरफेस के जरिए टेक्नोलॉजी को जोड़ने की प्रक्रिया आसान बनाने की जरूरत बताई गई.
FMCG कंपनियों की सेल्स टीमों, वितरकों और चैनल पार्टनर्स के व्यावसायिक प्रोत्साहनों में बदलाव पर भी चर्चा हुई, ताकि डिजिटल ऑर्डरिंग, अधिक खुदरा दुकानों तक पहुंच और प्लेटफॉर्म के लगातार इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सके.
21 हजार से अधिक दुकानदार 450 ब्रांड से जुड़े
सितंबर 2026 तक DigiDukaan के जरिए हैदराबाद, जयपुर और मुंबई में 21 हजार से अधिक खुदरा दुकानदारों को 450 से ज्यादा ब्रांड से जोड़ा जा चुका है. पिछली तिमाही में यह संख्या 12 हजार से अधिक थी.
इस पहल के तहत हैदराबाद में 16 हजार से अधिक दुकानदार पंजीकृत हो चुके हैं. यहां हर महीने दोबारा ऑर्डर देने वाले दुकानदारों की दर 73 से 78 फीसदी के बीच है.
ONDC के शुरुआती अध्ययन में यह भी सामने आया कि सर्वे में शामिल 40 फीसदी दुकानदारों ने DigiDukaan के जरिए खरीदे गए उत्पादों के लिए अपने स्टॉक में कमी दर्ज की. इससे कारोबार में लगने वाली पूंजी यानी वर्किंग कैपिटल के अधिक प्रभावी इस्तेमाल की संभावना दिखाई देती है.
पीयूष गोयल ने कहा कि छोटे खुदरा कारोबारियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया ओपन डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इस पहल को तेजी से आगे बढ़ा सकता है.
उन्होंने कहा, "खरीद प्रक्रिया को आसान और अधिक पारदर्शी बनाकर तथा अपने वितरकों को मजबूत करके हम किराना दुकानों को उनकी कार्यशील पूंजी बचाने और कारोबार बढ़ाने में मदद कर सकते हैं."
उन्होंने FMCG उद्योग से इस पहल को देशभर में विस्तार देने के लिए मिलकर काम करने की अपील की. साथ ही कहा कि DigiDukaan को ऐसा उदाहरण बनाया जाना चाहिए, जिससे दुनिया भारत के डिजिटल कॉमर्स मॉडल से सीख सके.
DPIIT के सचिव अमरदीप सिंह भाटिया ने कहा कि भारत के खुदरा कारोबार, खासकर किराना दुकानों के व्यापक नेटवर्क को डिजिटल बनाने में ओपन डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की महत्वपूर्ण भूमिका है. उनके मुताबिक, DigiDukaan दिखाता है कि एक ओपन और इंटरऑपरेबल नेटवर्क किस तरह छोटे खुदरा कारोबारियों को डिजिटल खरीद के अवसर उपलब्ध करा सकता है.
FMCG कंपनियों और टेक्नोलॉजी पार्टनर्स की बढ़ रही भागीदारी
ONDC के प्रबंध निदेशक एवं CEO विभोर जैन ने कहा कि वितरकों ने बिलिंग, प्रिंटिंग और ऑर्डर देने के लिए डिजिटल टूल्स को तेजी से अपनाया है, लेकिन कई छोटे खुदरा दुकानदार अब भी मैनुअल प्रक्रियाओं पर निर्भर हैं.
उन्होंने कहा कि DigiDukaan का उद्देश्य किराना दुकानों को खरीदार के रूप में डिजिटल बनाना है, न कि मौजूदा वितरण नेटवर्क को बदलना. इसके जरिए दुकानदारों को कई ब्रांडों तक पहुंच, पारदर्शी व्यापारिक योजनाएं, तेजी से उत्पादों की आपूर्ति और भविष्य में औपचारिक कर्ज की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए साझा डिजिटल आधार तैयार किया जा रहा है.
FMCG कंपनियों में HUL, मैरिको, कोलगेट-पामोलिव, इमामी और अमूल अपने वितरण नेटवर्क के जरिए इस पहल में शामिल हैं. वहीं ITC, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और ब्रिटानिया विभिन्न स्तरों पर इंटीग्रेशन या बातचीत की प्रक्रिया में हैं.
टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में Paytm for Business, Qwipo और Mulltiply.ai इस नेटवर्क पर सक्रिय हैं, जबकि Bizom, Botree, QuIDPe और ENS इसके साथ जुड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं. लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग पार्टनर्स में ElasticRun, Shiprocket, India Post और Moeving भी इस नेटवर्क का हिस्सा हैं.
नेशनल ट्रेडर्स वेलफेयर बोर्ड के अध्यक्ष सुनील जे. सिंघी का बोर्ड भी ONDC के साथ मिलकर किराना कारोबारियों के बीच इस पहल को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है. इसके तहत स्थानीय व्यापार संघों को सक्रिय कर खुदरा दुकानदारों की भागीदारी बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है.
ONDC की अगली योजना मुंबई, खासकर उत्तर मुंबई में ब्रांड और वितरकों की भागीदारी बढ़ाने के साथ मौजूदा बाजारों में परिचालन को और मजबूत करने की है.