भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पूंजी का प्रवाह फिर से बढ़ने लगा है. विदेशी निवेशक बेहतर रिटर्न की चाह में वापस लौट रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था विदेशी निवेशकों को फिर से आकर्षित कर रही है. विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में तेजी से पैसा लगा रहे हैं. लोकसभा चुनाव से जुड़ी अनिश्चितता और कुछ वैश्विक कारणों के चलते सतर्कता बरत रहे निवेशक अब पुन: भारतीय बाजार की तरफ लौट रहे हैं. ब्लूमबर्ग के अनुसार, इस तिमाही में भारतीय बाजार में 8.5 बिलियन डॉलर की शुद्ध विदेशी खरीदारी हुई है. इसे 2023 के मध्य के बाद होने वाली सबसे बड़ी खरीदारी बताया जा रहा है.
इसलिए बना है आकर्षक
केंद्र में एक मजबूत सरकार और कुछ ग्लोबल सूचकांकों के भारत के प्रति बेहतर रुझान से विदेशी निवेशक यहां का रुख कर रहे हैं. इसके साथ ही अमेरिकी फेड रिजर्व द्वारा ब्याज दरों कटौती से भी देश में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ने की उम्मीद है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि महंगे वैल्यूएशन के बावजूद, भारतीय शेयर बाजार दूसरे मार्केट की तुलना में आकर्षक बना हुआ है. क्योंकि दूसरे बाजारों में भारत की तुलना में विकास की संभावनाएं अपेक्षाकृत कम हैं.
चीन की कमजोरी का लाभ
जानकारों का कहना है कि अर्थव्यवस्था के लिहाज से चीन की कमजोरी का लाभ भी भारत को मिल रहा है. चीन इस समय तमाम तरह की परेशानियों में घिरा हुआ है. ऐसे में निवेशक वहां पैसा लगाने से हिचक रहे हैं. जबकि भारत में उन्हें अच्छे रिटर्न की बेहतरीन संभावना दिखाई दे रही है. इसलिए उन्होंने पुन: भारतीय शेयर बाजार पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है. बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि भारत 2028 तक तीसरी सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था बन जाएगा.
लगातार बढ़ रहा है निवेश
भारत का सकल घरेलू उत्पाद पिछली तिमाही में एक साल पहले की तुलना में 6.7% बढ़ा है. भले ही यह आंकड़ा अनुमान से कुछ कम रहा, लेकिन चीन के 4.7 प्रतिशत के आंकड़े से ज्यादा है. इस महीने यानी सितंबर में भी भारतीय बाजार में विदेशी निवेश बढ़ रहा है. पिछले कुछ महीनों से इसमें लगातार इजाफा दर्ज किया गया है. जबकि अप्रैल-जून तिमाही में विदेशी निवेशकों ने करीब 1 बिलियन डॉलर के शेयर बेचे थे.
राजीव जैन के GQG ने ITC में अपनी हिस्सेदारी बेच दी. डीलिंग रूम में चर्चा है कि कुछ ऑफशोर खिलाड़ियों को इसका पहले से अंदाजा था और उन्होंने पहले ही फंड की प्रमुख होल्डिंग्स में शॉर्ट पोजीशन बना ली थी. एलन मस्क की X पोस्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज में बिकवाली को और बढ़ा दिया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
जिस दिन सेंसेक्स 1,000 अंक से ज्यादा गिरा, उस दिन स्क्रीन पर इंडेक्स सबसे कम दिलचस्प चीज थी. असली कहानी अडानी के शेयरों में थी और इसे समझने के लिए आपको फ्लोरिडा की एक फंड हाउस और उस सौदे से शुरुआत करनी होगी, जो मुंबई के ज्यादातर लोगों के सुबह की चाय खत्म करने से पहले ही हो चुका था.
वह फंड हाउस GQG Partners है. और गुरुवार को उसने फैसला किया कि अब वह ITC के साथ नहीं रहना चाहता.
शुरुआती कारोबार
प्री-ओपन ब्लॉक विंडो में करीब 36.66 करोड़ ITC शेयर, यानी कंपनी के लगभग 2.9 फीसदी शेयर, औसतन ₹257 प्रति शेयर की कीमत पर हाथ बदले. इस सौदे की कीमत करीब ₹9,437 करोड़ थी. रिपोर्टों में GQG को संभावित विक्रेता बताया गया और एक बैंकर ने इसे "क्लीन-आउट ट्रेड" कहा, जिसका सीधा मतलब है कि विक्रेता पूरी तरह बाहर निकलना चाहता था, न कि सिर्फ अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा कम करना.
खरीदारों की कोई कमी नहीं थी. एक विदेशी लॉन्ग-ओनली फंड ने कथित तौर पर ब्लॉक का करीब एक-तिहाई हिस्सा खरीदा. घरेलू म्यूचुअल फंड, निप्पॉन इंडिया, ICICI प्रूडेंशियल, SBI, कोटक और आदित्य बिड़ला ने बाकी हिस्सेदारी खरीद ली. इसके बावजूद ITC 5 फीसदी गिरकर 52 हफ्तों के निचले स्तर पर पहुंच गया. 2026 में अब तक शेयर करीब 30 फीसदी गिर चुका है.
यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था. इस सप्ताह की शुरुआत में GQG ने बताया था कि उसने मई 2025 से 5 अक्टूबर 2026 के बीच खुले बाजार में पहले ही ITC के 3.97 करोड़ शेयर बेच दिए थे, जिससे उसकी संयुक्त हिस्सेदारी 3.48 फीसदी से घटकर 3.17 फीसदी रह गई थी. गुरुवार का ब्लॉक वह क्षण था जब धीमी निकासी जोरदार बिकवाली में बदल गई.
GQG को क्यों बेचना पड़ रहा है
इसका जवाब GQG की अपनी किताबों में है. 2026 की पहली छमाही में ग्राहकों ने फर्म से शुद्ध रूप से 15.1 अरब डॉलर निकाल लिए. यह लगातार छठा महीना था जब फर्म में आने वाले पैसे की तुलना में बाहर जाने वाला पैसा ज्यादा रहा. विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि पांच साल का कमजोर प्रदर्शन रिसर्च हाउस की रेटिंग में गिरावट और निवेशकों के और तेजी से बाहर निकलने की स्थिति पैदा कर सकता है.
रिडेम्पशन का सामना कर रहे फंड मैनेजर के पास यह चुनने का विकल्प नहीं होता कि उसे बेचना है या नहीं. उसके पास सिर्फ यह चुनने का विकल्प होता है कि क्या बेचना है. और भारत में GQG के दो सबसे बड़े दांव हर स्ट्रीट ट्रेडर को पता हैं: ITC और अडानी समूह.
यही कारण है कि गुरुवार का ब्लॉक ITC से कहीं ज्यादा मायने रखता है.
डीलिंग रूम में फुसफुसाहट
यहां बाजार की चर्चा सार्वजनिक रिकॉर्ड से आगे निकल जाती है.
कई बाजार प्रतिभागियों का आरोप है कि GQG के ट्रेड संभालने वाले कुछ संस्थानों को ITC ब्लॉक के बारे में पहले से जानकारी थी. उनके मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों से जुड़े सिंगापुर स्थित कुछ हेज फंड उन शेयरों में शॉर्ट पोजीशन बनाने लगे, जिनमें GQG की बड़ी हिस्सेदारी है. अडानी मुख्य निशाना था.
ट्रेडरों के मुताबिक इसका तर्क जितना सरल है, उतना ही निर्मम भी. अगर GQG रिडेम्पशन पूरा करने के लिए ITC बेच रहा है, तो बाजार जल्द ही यह पूछेगा कि अगली बिक्री किसमें होगी. अडानी के शेयर इसका स्पष्ट जवाब हैं. उस डर के फैलने से पहले उन्हें शॉर्ट कर दो और फिर डर को बाकी काम करने दो.
एक वरिष्ठ फंड मैनेजर ने इस संवाददाता को बताया कि गोल्डमैन सैक्स पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिए बिकवाली गुरुवार को भारी रही. ये ऐसे ऑफशोर इंस्ट्रूमेंट हैं जो विदेशी खिलाड़ियों को भारत में रजिस्टर हुए बिना भारतीय शेयरों में पोजीशन लेने की सुविधा देते हैं.
इनमें से किसी भी दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी. किसी नियामक ने कोई टिप्पणी नहीं की है और इसमें शामिल फंडों के नाम भी सामने नहीं आए हैं. लेकिन अगर किसी ने किसी ब्लॉक डील की पहले से मिली जानकारी के आधार पर कारोबार किया है, तो यह मामला सीधे SEBI के अधिकार क्षेत्र में आता है.
स्क्रीन पर क्या दिखा
कारण चाहे जो भी हो, कीमतों में हुई हलचल उस पैटर्न से मेल खाती है जिसका ट्रेडर वर्णन कर रहे हैं.
समूह की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज 7 फीसदी गिरकर ₹2,566 पर आ गया, जबकि यह ₹2,744 पर था. यह 14 मई के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और अब छह कारोबारी सत्रों में 13 फीसदी गिर चुका है. अडानी ग्रीन एनर्जी दोपहर 2:39 बजे तक 6.71 फीसदी गिरकर ₹1,251.40 पर था. अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस 6 फीसदी गिरकर ₹1,241.30 पर आ गया और अडानी पावर 5.6 फीसदी गिरकर ₹185.60 पर पहुंच गया.
एक बार इन हाई-बीटा शेयरों ने अहम तकनीकी स्तरों को तोड़ा, तो बिकवाली खुद ही बढ़ने लगी. स्टॉप-लॉस ट्रिगर हुए, मार्जिन कॉल आए और लीवरेज वाले ट्रेडरों को गिरते बाजार में ही बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. बाहर से देखने पर सफल शॉर्ट रेड इसी तरह दिखाई देता है. वास्तव में ऐसा हुआ या नहीं, यही वह सवाल है जिसका जवाब नियामकों को देना पड़ सकता है.
यहां एक विडंबना है, जिसे बाजार नजरअंदाज नहीं कर पाया. 2023 में जब हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने अडानी के शेयरों को गिरावट में धकेल दिया था, तब राजीव जैन ही थे जो अरबों डॉलर लेकर आगे आए और गिरावट को रोकने में मदद की. गुरुवार को ट्रेडर यह दांव लगा रहे थे कि वही निवेशक अब विक्रेता बन सकता है.
एलन मस्क की एंट्री
जैसे इस दिन को एक और मोड़ की जरूरत थी, दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति भी इसमें शामिल हो गए.
रातोंरात एलन मस्क ने X पर अज्ञात "कुलीन कारोबारियों" पर आरोप लगाया कि वे भारत के इंटरनेट बाजार पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए स्टारलिंक को भारत से बाहर रख रहे हैं. उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया और कोई सबूत भी पेश नहीं किया. इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी. भारत का टेलीकॉम बाजार मुकेश अंबानी की Jio और सुनील मित्तल की Airtel के पास है और इस पोस्ट को दोनों पर निशाना साधने के तौर पर व्यापक रूप से देखा गया.
नई दिल्ली ने इस दावे को निराधार बताया और कहा कि उसकी सैटेलाइट लाइसेंसिंग व्यवस्था निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है. लेकिन बाजार बयानों पर नहीं, भावनाओं पर कारोबार करते हैं. निफ्टी का सबसे भारी शेयर रिलायंस 2.5 फीसदी गिर गया, ऐसे दिन जब इंडेक्स के पास किसी और भारी-भरकम शेयर की गिरावट को सहने की गुंजाइश नहीं थी.
पृष्ठभूमि
इनमें से कुछ भी शांत बाजार में नहीं हुआ. एक दिन पहले RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.5 फीसदी कर दिया था. यह करीब चार साल में पहली बढ़ोतरी थी. ब्रेंट क्रूड 104 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया. विदेशी निवेशक लगातार नौ सत्रों से बिकवाली कर रहे हैं और करीब ₹57,000 करोड़ निकाल चुके हैं.
तो हां, गुरुवार की गिरावट की आधिकारिक वजह कच्चा तेल, RBI और विदेशी बिकवाली है. तीनों वास्तविक हैं. लेकिन ये बताते हैं कि बाजार कमजोर क्यों था. ये यह नहीं बताते कि अडानी को बाकी शेयरों की तुलना में इतना ज्यादा नुकसान क्यों हुआ.
निचोड़
इसके एक ब्लॉक डील के साथ खत्म होने की संभावना कम है. GQG के पास अभी भी ITC में 3.17 फीसदी हिस्सेदारी और अडानी समूह की कई कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी है और जब तक रिडेम्पशन जारी रहेगा, बाजार यह पूछता रहेगा कि वह अगली बिक्री किसमें करेगा. शॉर्ट सेलर्स इस जवाब के लिए अपनी पोजीशन बनाते रहेंगे. विदेशी फंड अब भी बाहर निकल रहे हैं और बाहर जाने वाला हर रुपया करेंसी पर दबाव बढ़ा रहा है.
एक सकारात्मक पहलू जरूर रहा. BofA Securities ने करीब दो साल की सतर्कता के बाद भारतीय इक्विटी पर सकारात्मक रुख अपनाया है और निफ्टी के लिए 26,200 का लक्ष्य देखा है. गुरुवार शाम को, जब स्क्रीन अब भी लाल थीं, यह संख्या काफी दूर नजर आ रही थी.
पलक शाह
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
रिपोर्ट में प्रमुख बागवानी उत्पादन केंद्रों के आसपास बहु-वस्तु और अलग-अलग तापमान पर काम करने वाली सुविधाएं विकसित करने की जरूरत बताई गई है. इसके साथ भरोसेमंद रेफ्रिजरेटेड परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने 2037-38 तक जरूरी कोल्ड स्टोरेज क्षमता का 84 फीसदी हिस्सा हासिल कर लिया है, लेकिन खेत से बाजार तक तापमान-संवेदनशील उत्पादों की सप्लाई चेन अभी भी कई अहम मोर्चों पर कमजोर है. फिक्की और ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 8,815 सुविधाओं में कुल 4.022 करोड़ टन कोल्ड स्टोरेज क्षमता मौजूद है, जबकि 2037-38 तक करीब 4.8 करोड़ टन क्षमता की जरूरत होगी.
उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में केंद्रित क्षमता
रिपोर्ट India’s Cold Chain: From Storage to a Chain के अनुसार, मौजूदा कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क भारत की कोल्ड चेन के विस्तार के लिए मजबूत आधार देता है, लेकिन इसकी क्षमता कुछ चुनिंदा वस्तुओं और क्षेत्रों में ज्यादा केंद्रित है. करीब तीन-चौथाई कोल्ड स्टोरेज क्षमता का इस्तेमाल आलू के लिए होता है. वहीं, आधे से अधिक कोल्ड स्टोरेज उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में केंद्रित हैं.
रिपोर्ट में प्रमुख बागवानी उत्पादन केंद्रों के आसपास बहु-वस्तु और अलग-अलग तापमान पर काम करने वाली सुविधाएं विकसित करने की जरूरत बताई गई है. इसके साथ भरोसेमंद रेफ्रिजरेटेड परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.
फिक्की लॉजिस्टिक्स कमेटी के चेयरमैन और डीपी वर्ल्ड के सबकॉन्टिनेंट, सेंट्रल एशिया, लेवेंट और मिस्र के सीईओ एवं मैनेजिंग डायरेक्टर रिजवान सूमार ने कहा कि कोल्ड चेन को केवल कोल्ड स्टोरेज तक सीमित नहीं रखा जा सकता. इसमें खेत और शुरुआती परिवहन से लेकर स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन, डिस्ट्रीब्यूशन और अंतिम उपभोक्ता तक तापमान-संवेदनशील उत्पादों की पूरी आवाजाही शामिल होनी चाहिए. इसमें बंदरगाह और निर्यात बाजार भी महत्वपूर्ण हैं.
पैक-हाउस और रेफ्रिजरेटेड वाहनों की बड़ी कमी
रिपोर्ट के मुताबिक, जहां कोल्ड स्टोरेज क्षमता दीर्घकालिक जरूरत की 84 फीसदी तक पहुंच गई है, वहीं कोल्ड चेन के दूसरे हिस्सों में काफी बड़ा अंतर बना हुआ है. पैक-हाउस की क्षमता तय लक्ष्य की सिर्फ करीब 0.4 फीसदी है. वहीं रेफ्रिजरेटेड यानी रीफर वाहनों की उपलब्धता करीब 3.8 फीसदी और फल पकाने वाले चैंबर यानी राइपनिंग चैंबर की क्षमता करीब 7.1 फीसदी है.
पैक-हाउस खेतों के पास उत्पाद से खेत की गर्मी निकालने, उसकी ग्रेडिंग और पैकेजिंग के लिए जरूरी होते हैं. वहीं रीफर वाहन परिवहन के दौरान उत्पाद का तापमान बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान के तहत पैक-हाउस, रीफर वाहनों और राइपनिंग चैंबर की जरूरत पूरी करने के लिए 2037-38 तक करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत पड़ सकती है. यानी हर साल औसतन करीब 8,800 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा.
हर साल 4.7 करोड़ टन तक खाद्य नुकसान
रिपोर्ट में भारत में खाद्य पदार्थों के बाद-कटाई नुकसान को भी बड़ी चुनौती बताया गया है. इसके मुताबिक, बागवानी, डेयरी, मांस, पोल्ट्री और मछली समेत विभिन्न क्षेत्रों में हर साल करीब 1.7 करोड़ से 4.7 करोड़ टन खाद्य पदार्थों का नुकसान होता है.
54 फसलों में बाद-कटाई नुकसान का अनुमानित मूल्य करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये सालाना है. रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी प्रमुख वजहों में उत्पाद की हैंडलिंग, स्टोरेज और परिवहन से जुड़ी कमियां शामिल हैं.
रिपोर्ट में खेत के स्तर पर प्री-कूलिंग सुविधाओं, फीडर पैक-हाउस और साझा रेफ्रिजरेटेड परिवहन के लिए पूंजीगत सहायता देने की सिफारिश की गई है.
हर खेप के तापमान का डिजिटल रिकॉर्ड रखने का सुझाव
रिपोर्ट में एक एकीकृत राष्ट्रीय कोल्ड चेन मानक बनाने का सुझाव भी दिया गया है. इसके तहत उत्पाद की हर खेप के पूरे सफर के दौरान तापमान का मशीन से पढ़े जा सकने वाला रिकॉर्ड रखा जा सकता है.
इससे कंपनियों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि सप्लाई चेन के किस चरण में तापमान तय सीमा से बाहर गया. साथ ही खरीदारों, नियामकों और कर्जदाताओं को सप्लाई चेन के प्रदर्शन से जुड़ी सत्यापन योग्य जानकारी मिल सकेगी.
रिपोर्ट में बहु-वस्तु कोल्ड स्टोरेज के ज्यादा इस्तेमाल, पूरे साल उपयोग के अनुबंध और प्रोसेसर, रिटेलर तथा निर्यातकों के साथ सुनिश्चित खरीद व्यवस्था को बढ़ावा देने की भी बात कही गई है. इससे मौजूदा बुनियादी ढांचे का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है.
अब सिर्फ कोल्ड स्टोरेज बढ़ाना काफी नहीं
ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर करण शर्मा ने कहा कि भारत की चुनौती अब सिर्फ अतिरिक्त कोल्ड स्टोरेज क्षमता तैयार करने तक सीमित नहीं है. उनके मुताबिक, देश को एकीकृत कोल्ड चेन और उसे जोड़ने वाली लॉजिस्टिक्स की जरूरत है.
उन्होंने कहा कि देश की करीब तीन-चौथाई कोल्ड स्टोरेज क्षमता आलू के लिए इस्तेमाल होती है, जबकि हर साल बड़ी मात्रा में फल और सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं. इनमें काफी नुकसान उत्पाद के पहले कोल्ड प्वाइंट तक पहुंचने से पहले और परिवहन के दौरान होता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा कोल्ड स्टोरेज को खेत से जुड़ी शुरुआती सुविधाओं, रेफ्रिजरेटेड परिवहन और डिजिटल ट्रेसबिलिटी से जोड़ने पर खाद्य नुकसान कम किया जा सकता है. इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने के साथ भारत के खाद्य, फार्मास्यूटिकल और कृषि निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता भी बढ़ सकती है.
सितंबर में डीजल निर्यात में आई तेजी ऐसे समय में हुई है जब यूरोप और अमेरिका समेत कई बाजारों में डीजल की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक स्तर पर डीजल की कीमतों में तेजी के बीच भारत से डीजल का निर्यात सितंबर में एक साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया. कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में भारत ने रोजाना करीब 6.2 लाख बैरल डीजल का निर्यात किया. इसमें करीब आधा हिस्सा यूरोप भेजा गया. बेहतर निर्यात मार्जिन ने भारतीय रिफाइनरों को घरेलू बाजार के बजाय विदेशी बाजारों में डीजल बेचने के लिए प्रोत्साहित किया.
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, लेकिन देश में बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन होता है और उनका निर्यात भी किया जाता है. सितंबर में डीजल निर्यात में आई तेजी ऐसे समय में हुई है जब यूरोप और अमेरिका समेत कई बाजारों में डीजल की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं.
यूरोप को सबसे ज्यादा डीजल भेजा गया
केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में भारत से रोजाना करीब 2.8 लाख बैरल डीजल यूरोप भेजा गया. यह अगस्त के मुकाबले करीब 80 फीसदी अधिक है. अफ्रीका के ग्राहकों को रोजाना करीब 2 लाख बैरल, एशिया को 50,000 बैरल और अमेरिका को करीब 40,000 बैरल डीजल भेजा गया. करीब 50,000 बैरल की खेप ऐसे गंतव्यों को गई, जिनकी जानकारी उपलब्ध नहीं है. केप्लर के अनुसार, सितंबर में रूस को भारत से डीजल की कोई खेप नहीं भेजी गई.
बढ़े मार्जिन ने दिया एक्सपोर्ट का प्रोत्साहन
ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, डीजल की बढ़ती कीमतों और बेहतर मार्जिन का असर भारत के निर्यात पर पड़ा है. केप्लर में रिफाइनिंग के लीड एनालिस्ट निखिल दुबे ने बताया कि सितंबर में दुबई के मुकाबले सिंगापुर डीजल क्रैक 60 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर था. डीजल क्रैक रिफाइनर के लिए कच्चे तेल को डीजल में बदलने से मिलने वाले अनुमानित मार्जिन को दर्शाता है. ऊंचे मार्जिन ने रिफाइनरों के लिए डीजल उत्पादन और उसके निर्यात को बढ़ाने का मजबूत प्रोत्साहन दिया.
सप्लाई में रुकावट से बढ़ीं कीमतें
सितंबर में बेंचमार्क डीजल की कीमतें एक साल पहले की तुलना में करीब दोगुनी थीं. पश्चिम एशिया और रूस में रिफाइनरियों तथा शिपिंग से जुड़ी रुकावटों के कारण वैश्विक बाजार में डीजल की आपूर्ति प्रभावित हुई. कम आपूर्ति और ऊंची कीमतों के बीच चीन ने भी डीजल के निर्यात पर रोक लगाई है. यूरोप डीजल के आयात पर काफी निर्भर है, इसलिए वैश्विक आपूर्ति में बदलाव का असर वहां की मांग और कीमतों पर ज्यादा पड़ता है.
रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी को फायदा
भारत के डीजल निर्यात में रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी की अहम भूमिका है. सितंबर में डीजल के निर्यात पर लागू विंडफॉल टैक्स करीब 37 डॉलर प्रति बैरल था, जिससे निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव पड़ा. हालांकि, यह टैक्स रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर स्थित केवल निर्यात के लिए संचालित होने वाली रिफाइनरी पर लागू नहीं होता. ऐसे में वैश्विक स्तर पर डीजल के ऊंचे मार्जिन का फायदा इस रिफाइनरी को अपेक्षाकृत ज्यादा मिल सकता है.
बैंक का लाइसेंस इसी साल अप्रैल में नियमों का पालन नहीं करने के चलते रद्द किया गया था. इससे पहले आरबीआई ने बैंक के खिलाफ कई कारोबारी पाबंदियां भी लगाई थीं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड (PPBL) के खिलाफ एक और नियामकीय कार्रवाई की है. केंद्रीय बैंक ने बैंकिंग लाइसेंस रद्द होने के बाद पेटीएम पेमेंट्स बैंक को आरबीआई अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल शेड्यूल बैंकों की सूची से हटा दिया है. बैंक का लाइसेंस इसी साल अप्रैल में नियमों का पालन नहीं करने के चलते रद्द किया गया था. इससे पहले आरबीआई ने बैंक के खिलाफ कई कारोबारी पाबंदियां भी लगाई थीं.
आरबीआई ने बुधवार को जारी बयान में कहा कि पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड को भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची से बाहर कर दिया गया है. इस संबंध में अधिसूचना 31 जुलाई को जारी की गई थी, जबकि सितंबर में इसे भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया.
क्या होता है शेड्यूल बैंक?
आरबीआई अधिनियम की दूसरी अनुसूची में शामिल बैंकों को शेड्यूल बैंक कहा जाता है. ऐसे बैंक केंद्रीय बैंक द्वारा तय वित्तीय मानकों को पूरा करते हैं और उन्हें कुछ विशेष बैंकिंग एवं परिचालन सुविधाएं मिलती हैं. पेटीएम पेमेंट्स बैंक का नाम इस सूची से हटाया जाना उसके बैंकिंग लाइसेंस रद्द किए जाने के बाद की नियामकीय प्रक्रिया का हिस्सा है.
पहले भी लग चुकी हैं कई पाबंदियां
पेटीएम से जुड़ा पेटीएम पेमेंट्स बैंक इससे पहले भी आरबीआई की कार्रवाई के दायरे में रहा है. मार्च 2022 में केंद्रीय बैंक ने पीपीबीएल को नए ग्राहक जोड़ने से रोक दिया था. साथ ही बैंक को अपनी सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली का व्यापक ऑडिट कराने के लिए एक आईटी ऑडिट फर्म नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था.
इसके बाद 31 जनवरी 2024 और 16 फरवरी 2024 को आरबीआई ने बैंक पर अतिरिक्त कारोबारी पाबंदियां लगाईं. इनमें मौजूदा ग्राहकों के खातों, प्रीपेड माध्यमों और वॉलेट में नई जमा, क्रेडिट या टॉप-अप स्वीकार करने पर रोक शामिल थी.
इसके बाद आरबीआई ने अप्रैल 2026 में नियमों का पालन नहीं करने का हवाला देते हुए पेटीएम पेमेंट्स बैंक का बैंकिंग लाइसेंस रद्द कर दिया था. केंद्रीय बैंक ने उस समय कहा था कि बैंक का संचालन नुकसानदायक तरीके से किया जा रहा था. इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने भी पीपीबीएल को बंद करने का आदेश दिया था.
*हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते समुद्री तनाव के बीच शारजाह भारतीय कंपनियों को निवेश का बड़ा अवसर दे रहा है. अमीरात को 2026 और 2027 के दौरान भारत से कुल 3 अरब डॉलर निवेश मिलने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का शारजाह भारतीय कंपनियों के लिए खाड़ी क्षेत्र में कारोबार विस्तार का नया केंद्र बनने की तैयारी कर रहा है. अमीरात की निवेश एजेंसी ‘इन्वेस्ट इन शारजाह’ को उम्मीद है कि 2026 और 2027 के दौरान भारत से करीब 3 अरब डॉलर का निवेश आएगा. इसमें दोनों वर्षों में लगभग 1.5-1.5 अरब डॉलर निवेश का अनुमान है. यह निवेश मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन जैसे क्षेत्रों में आने की उम्मीद है.
भारतीय कंपनियों के लिए खाड़ी बाजार तक आसान पहुंच
शारजाह का फोकस भारतीय कंपनियों को यूएई के साथ-साथ सऊदी अरब, कुवैत और इराक जैसे बड़े खाड़ी बाजारों तक पहुंच उपलब्ध कराने पर है. इसके लिए कंपनियों को खोरफक्कन पोर्ट के आसपास उत्पादन इकाइयां, वेयरहाउस और अन्य कारोबारी सुविधाएं स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.
‘इन्वेस्ट इन शारजाह’ के सीईओ मोहम्मद जुमा अल मुशर्रख के मुताबिक, भारतीय कंपनियां यूएई में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं और खोरफक्कन पोर्ट के करीब जगह तलाश रही हैं. इससे उन्हें निर्यात के लिए बेहतर लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी मिल सकती है.
हॉर्मुज संकट के बीच खोरफक्कन की बढ़ी अहमियत
इस पूरी रणनीति में खोरफक्कन कमर्शियल टर्मिनल की अहम भूमिका है. यह ओमान की खाड़ी पर स्थित है और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के सीधे प्रभाव वाले क्षेत्र से बाहर है. मौजूदा क्षेत्रीय तनाव और समुद्री मार्गों में आ रही रुकावटों के बीच इसकी रणनीतिक स्थिति कारोबारियों के लिए आकर्षण बढ़ा रही है.
शारजाह का कहना है कि खोरफक्कन पोर्ट प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पूर्व-पश्चिम समुद्री व्यापार मार्गों से जुड़ा हुआ है. ऐसे में भारतीय कंपनियां इसे खाड़ी देशों में अपने माल की आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण गेटवे के रूप में इस्तेमाल कर सकती हैं.
दुबई और अबू धाबी से शारजाह की ओर बढ़ा रुख
शिपिंग से जुड़ी अनिश्चितता का असर कंपनियों के निवेश और विस्तार के फैसलों पर भी दिखाई दे रहा है. शारजाह के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन क्षेत्र की कंपनियों की ओर से पूछताछ बढ़ी है. इनमें सबसे ज्यादा दिलचस्पी खोरफक्कन पोर्ट के आसपास औद्योगिक जमीन में देखी जा रही है.
कई कंपनियां दुबई और अबू धाबी से अपना कारोबार समेटने के बजाय शारजाह में अतिरिक्त सुविधाएं विकसित करने पर विचार कर रही हैं. पोर्ट के नजदीक फैक्ट्री और वेयरहाउस स्थापित करने से कंपनियों को माल की आवाजाही और निर्यात में संभावित व्यवधान कम करने में मदद मिल सकती है.
2 अरब डॉलर से बढ़ेगी पोर्ट की क्षमता
बढ़ती कारोबारी मांग को देखते हुए खोरफक्कन पोर्ट के विस्तार पर करीब 2 अरब डॉलर खर्च किए जा रहे हैं. पोर्ट ऑपरेटर गल्फटेनर चरणबद्ध तरीके से इसकी क्षमता बढ़ा रहा है.
फिलहाल खोरफक्कन पोर्ट की सालाना कंटेनर हैंडलिंग क्षमता करीब 35 लाख टीईयू है. इसे बढ़ाकर 50 लाख टीईयू किया जा रहा है. लंबी अवधि में क्षमता को 1 करोड़ टीईयू से ज्यादा करने का लक्ष्य है. टीईयू 20 फीट लंबे मानक शिपिंग कंटेनर की क्षमता को दर्शाता है.
पोर्ट की क्षमता बढ़ने से शारजाह की लॉजिस्टिक्स क्षमता मजबूत होगी और भारतीय कंपनियों को यूएई के जरिए खाड़ी क्षेत्र के बड़े बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए एक अतिरिक्त कारोबारी विकल्प मिल सकता है.
बैठक में 40 लाख रुपये तक सालाना कारोबार वाले व्यवसायों को MDR से छूट देने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई. इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों और कारोबारियों पर डिजिटल भुगतान की लागत का बोझ कम रखना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की तारीख 15 अक्टूबर से आगे बढ़ सकती है. अब इसे 1 जनवरी 2027 से लागू किए जाने की संभावना है. इसका मतलब है कि क्रिसमस तक चलने वाले त्योहारी सीजन में UPI से भुगतान पहले की तरह मुफ्त रह सकते हैं. इसके अलावा, सालाना 40 लाख रुपये तक कारोबार करने वाले छोटे कारोबारियों को MDR से छूट देने पर भी विचार किया जा रहा है.
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) के नेतृत्व वाली UPI और सर्विसेज संचालन समिति की बैठक में बुधवार को MDR लागू करने की तारीख समेत इससे जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई. बैठक में छोटे कारोबारियों को प्रस्तावित MDR से राहत देने के विकल्प पर भी विचार किया गया.
15 अक्टूबर से लागू होने की थी योजना
UPI लेनदेन पर MDR लागू करने की चर्चा के बीच पहले इसे 15 अक्टूबर 2026 से लागू किए जाने की संभावना जताई जा रही थी. हालांकि, अब इसकी समयसीमा बढ़ाकर नए साल से लागू करने पर विचार किया जा रहा है. अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो त्योहारी और साल के अंत के दौरान डिजिटल भुगतान करने वाले ग्राहकों और कारोबारियों पर तत्काल कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं आएगा.
छोटे कारोबारियों को मिल सकती है छूट
बैठक में 40 लाख रुपये तक सालाना कारोबार वाले व्यवसायों को MDR से छूट देने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई. इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों और कारोबारियों पर डिजिटल भुगतान की लागत का बोझ कम रखना है.
हालांकि, MDR की नई तारीख और छोटे कारोबारियों के लिए छूट को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. इस संबंध में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) को जानकारी के लिए ईमेल भेजा गया था, लेकिन खबर लिखे जाने तक उसकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला था.
क्या है MDR?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले कारोबारी से भुगतान के बदले लिया जाता है. यह शुल्क भुगतान की प्रक्रिया में शामिल बैंक और अन्य पक्षों के बीच बंटता है. फिलहाल UPI के जरिए सामान्य बैंक खाते से किए जाने वाले भुगतान पर ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता और छोटे कारोबारियों के लिए भी लागत को लेकर अलग व्यवस्था रही है.
UPI देश में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है. ऐसे में MDR लागू होने की तारीख और इससे छोटे कारोबारियों को मिलने वाली संभावित छूट का असर डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले लाखों व्यापारियों पर पड़ सकता है.
ऊपरी प्राइस बैंड ₹271 प्रति शेयर के हिसाब से HD Fire Protect का IPO करीब ₹712.13 करोड़ का होगा. यह पूरा इश्यू ऑफर फॉर सेल (OFS) है, जिसमें प्रमोटर शेयरधारक हरिश नरशी धरमशी और कुसुम धरमशी कुल 2.62 करोड़ शेयर बेचेंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुंबई स्थित फायर प्रोटेक्शन उपकरण बनाने वाली कंपनी HD Fire Protect ने अपने IPO के लिए ₹258 से ₹271 प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. कंपनी का वैल्यूएशन ऊपरी प्राइस बैंड पर करीब ₹4,749 करोड़ बैठता है. कंपनी का IPO 13 अक्टूबर को सब्सक्रिप्शन के लिए खुलेगा और 15 अक्टूबर को बंद होगा. एंकर निवेशक 12 अक्टूबर को बोली लगा सकेंगे.
₹712 करोड़ का होगा IPO
ऊपरी प्राइस बैंड ₹271 प्रति शेयर के हिसाब से HD Fire Protect का IPO करीब ₹712.13 करोड़ का होगा. यह पूरा इश्यू ऑफर फॉर सेल (OFS) है, जिसमें प्रमोटर शेयरधारक हरिश नरशी धरमशी और कुसुम धरमशी कुल 2.62 करोड़ शेयर बेचेंगे. चूंकि IPO में कोई फ्रेश इश्यू शामिल नहीं है, इसलिए इससे मिलने वाली पूरी रकम कंपनी के पास नहीं जाएगी. इश्यू से प्राप्त राशि शेयर बेचने वाले प्रमोटर शेयरधारकों को मिलेगी.
55 शेयरों का होगा लॉट
निवेशक कम से कम 55 शेयरों के लिए बोली लगा सकेंगे. इसके बाद 55 शेयरों के गुणक में बोली लगाई जा सकेगी. इश्यू का 50 फीसदी हिस्सा क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) के लिए, 15 फीसदी हिस्सा नॉन-इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (NII) के लिए और शेष 35 फीसदी हिस्सा रिटेल निवेशकों के लिए आरक्षित है. कंपनी 16 अक्टूबर को शेयरों के अलॉटमेंट का आधार तय करने की उम्मीद है, जबकि इसके शेयरों की BSE और NSE पर लिस्टिंग 21 अक्टूबर को प्रस्तावित है.
सितंबर 2025 में दाखिल किया था DRHP
HD Fire Protect ने सितंबर 2025 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया था. कंपनी को जनवरी 2026 में IPO लाने की मंजूरी मिली थी.
क्या कारोबार करती है कंपनी?
HD Fire Protect फायर प्रोटेक्शन उपकरण और सिस्टम बनाती है. कंपनी पानी, फोम और गैस आधारित फायर सप्रेशन तकनीक से जुड़े उत्पाद तैयार करती है. महाराष्ट्र में कंपनी की दो मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी हैं और यह भारत के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी अपने उत्पाद बेचती है. वित्त वर्ष 2026 में कंपनी ने 2,066 ग्राहकों को सेवाएं दीं. उसके कुल कारोबार में घरेलू बाजार की हिस्सेदारी 65 फीसदी रही, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों से 35 फीसदी कारोबार आया.
FY26 में 13 फीसदी बढ़ा राजस्व
वित्त वर्ष 2026 में HD Fire Protect का राजस्व 13 फीसदी बढ़कर ₹489.3 करोड़ हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष में ₹433.1 करोड़ था. इस दौरान कंपनी का मुनाफा 6.4 फीसदी बढ़कर ₹116.8 करोड़ रहा. जून 2026 को समाप्त तिमाही में कंपनी ने ₹109 करोड़ का राजस्व दर्ज किया, जबकि उसका मुनाफा ₹23.8 करोड़ रहा. IPO के लिए अंबित, आनंद राठी एडवाइजर और आईआईएफएल कैपिटल सर्विसेज मर्चेंट बैंकर के तौर पर काम कर रहे हैं.
बुधवार को 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 429.11 अंक यानी 0.59 फीसदी गिरकर 72,638.70 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 173.05 अंक यानी 0.76 फीसदी की गिरावट के साथ 22,603.05 पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को दो दिनों की तेजी पर ब्रेक लग गया और अब गुरुवार को भी कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी करीब 70 अंक फिसलकर 22,560 के आसपास कारोबार कर रहा है. इसके अलावा ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जबकि कमजोर वैश्विक संकेत, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है. इन संकेतों के बीच निवेशकों की नजर आज कंपनियों के तिमाही नतीजों और अन्य कॉरपोरेट अपडेट पर भी रहेगी.
बुधवार को 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 429.11 अंक यानी 0.59 फीसदी गिरकर 72,638.70 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 173.05 अंक यानी 0.76 फीसदी की गिरावट के साथ 22,603.05 पर आ गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में सिर्फ 4 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 26 में गिरावट रही. यानी बीते कारोबारी सत्र में बाजार ने मंगलवार की तेजी का बड़ा हिस्सा गंवा दिया.
आज कमजोर शुरुआत के संकेत
गुरुवार सुबह गिफ्ट निफ्टी 22,560 के आसपास कारोबार कर रहा था, जो निफ्टी के पिछले बंद स्तर से करीब 70 अंक नीचे है. इससे घरेलू बाजार की कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. एशियाई बाजारों में भी दबाव है, जबकि अमेरिकी बाजारों में पिछले सत्र में कमजोरी देखने को मिली.
एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर के मुताबिक, बाजार में फिलहाल सतर्कता बनी रह सकती है. निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर रहेगी.
101 डॉलर के पार ब्रेंट क्रूड
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारतीय बाजार के लिए बड़ी चिंता है. ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है. यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो इससे भारत के आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर रुपये और चालू खाते के घाटे पर भी पड़ सकता है.
वहीं, अमेरिकी 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड ऊंचे स्तरों के करीब बनी हुई है. ऊंची अमेरिकी यील्ड और भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली से घरेलू शेयर बाजार पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में FII बिकवाली में कमी और अमेरिकी यील्ड में नरमी बाजार के लिए अहम संकेत होंगे.
RBI की दर बढ़ोतरी से भी दबाव
बाजार के लिए बुधवार को RBI का मौद्रिक नीति फैसला भी अहम रहा. भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.25 फीसदी से बढ़ाकर 5.50 फीसदी कर दिया. महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच दरों में बढ़ोतरी से बाजार की धारणा पर दबाव आया है. रेपो रेट बढ़ने से कंपनियों के लिए कर्ज और फंडिंग लागत बढ़ सकती है. ऐसे में निवेशक अब महंगाई के रुख और RBI के आगे के कदमों पर नजर रखेंगे.
कल किन शेयरों में रही सबसे ज्यादा हलचल?
बुधवार को सेंसेक्स में कोटक महिंद्रा बैंक 2.21 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. भारती एयरटेल 1.33 फीसदी और ICICI बैंक 1.15 फीसदी चढ़े. दूसरी ओर, टाइटन 3.52 फीसदी गिरकर सबसे बड़ा लूजर रहा. भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड 2.21 फीसदी, एशियन पेंट्स 2.07 फीसदी और इन्फोसिस 2.06 फीसदी नीचे रहे. वहीं, निफ्टी में कोटक महिंद्रा बैंक 1.88 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा, जबकि टाइटन 3.80 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे बड़ा लूजर रहा. अडानी एंटरप्राइजेज, हिंडाल्को, JSW स्टील और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड में भी कमजोरी रही.
आज इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजाप विशेषज्ञों के अनुसार, आज TCS, ओला इलेक्ट्रिक, टाटा स्टील, जुबिलेंट फूडवर्क्स, MRF समेत कई शेयर कॉरपोरेट अपडेट के चलते फोकस में रहेंगे. TCS आज सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेगी. ओला इलेक्ट्रिक ने ₹27 प्रति शेयर के भाव पर 37.02 करोड़ शेयरों के राइट्स इश्यू के जरिए करीब ₹999.73 करोड़ जुटाने की योजना बनाई है, जिसकी रिकॉर्ड डेट 13 अक्टूबर और इश्यू 22 से 30 अक्टूबर तक रहेगा. टाटा स्टील का भारत में कच्चे इस्पात उत्पादन सितंबर तिमाही में सालाना आधार पर 10 फीसदी बढ़कर 62.1 लाख टन रहा, जबकि कंपनी ने टी स्टील होल्डिंग्स में इक्विटी शेयर खरीदकर 34 करोड़ डॉलर का निवेश किया है. जुबिलेंट फूडवर्क्स का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू दूसरी तिमाही में 11.9 फीसदी बढ़कर ₹2,608.7 करोड़ रहा. MRF के मामले में केरल के राज्य कर विभाग ने टैक्स मांग को ₹91.53 करोड़ से घटाकर ₹36.19 करोड़ कर दिया है. टॉरेंट पावर की सहायक कंपनी ने 300 मेगावाट पवन ऊर्जा के बिजली खरीद समझौते को समाप्त किया है, जबकि IRFC ने अंतरिम डिविडेंड के लिए 23 अक्टूबर को रिकॉर्ड डेट तय की है. टीडी पावर सिस्टम्स ने पात्र संस्थागत निवेशकों के लिए शेयर जारी करने की प्रक्रिया शुरू की है और इससे करीब ₹600 करोड़ जुटाने की योजना है. टाटा पावर ने नॉर्वे की Ocean Sun के साथ भारत में झिल्ली आधारित तैरती सौर ऊर्जा तकनीक लाने के लिए साझेदारी की है. HCL टेक ने दक्षिण अफ्रीका में नया क्षेत्रीय मुख्यालय शुरू किया है. इसके अलावा फिनो पेमेंट्स बैंक, राठी स्टील एंड पावर, सुदर्शन केमिकल, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स, भारत फोर्ज और गोदरेज प्रॉपर्टीज से जुड़े अपडेट भी आज संबंधित शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
त्योहारी सीजन से पहले डिलीवरी नेटवर्क से जुड़े ड्राइवरों के लिए सुविधाओं का विस्तार, बेंगलुरु में दो मोबाइल आश्रय वैन शुरू; कंपनी ने 2026 में ऑपरेशंस नेटवर्क के सहयोगियों के लिए 2,800 करोड़ रुपये से अधिक निवेश की बात कही
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेजन इंडिया भारत में अपने ऑपरेशंस नेटवर्क को मजबूत करने के लिए 2026 में 2,800 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश कर रहा है. इस निवेश के तहत कंपनी डिलीवरी नेटवर्क से जुड़े लोगों के लिए सुविधाओं का विस्तार कर रही है. त्योहारी सीजन से पहले अमेजन ने देशभर में 50 नए ‘आश्रय’ रेस्ट सेंटर खोलने की घोषणा की है, जिससे इन केंद्रों की कुल संख्या 200 हो जाएगी. कंपनी की योजना 2026 के अंत तक 250 आश्रय केंद्रों का नेटवर्क तैयार करने की है. इसके साथ ही बेंगलुरु में दो मोबाइल आश्रय वैन भी शुरू की गई हैं.
अमेजन द्वारा बेंगलुरु, दिल्ली और मुंबई समेत विभिन्न शहरों में नए आश्रय केंद्र स्थापित किए जाएंगे. यह पहल केवल अमेजन के लिए डिलीवरी करने वाले ड्राइवरों तक सीमित नहीं है. आश्रय केंद्र ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के सभी डिलीवरी ड्राइवरों के लिए खुले हैं, चाहे वे किसी भी कंपनी के लिए काम करते हों.
बेंगलुरु में शुरू हुईं दो मोबाइल वैन
दिल्ली एनसीआर, मुंबई और हैदराबाद के बाद बेंगलुरु चौथा शहर बन गया है, जहां मोबाइल आश्रय वैन की सुविधा शुरू की गई है. बेंगलुरु में शुरू की गई दोनों वैन को अमेजन के वाइस प्रेसिडेंट, एम्प्लॉयी एक्सपीरियंस एंड रिलेशंस, सैंडी गॉर्डन और नॉर्थ अमेरिका एम्प्लॉयी रिलेशंस के वाइस प्रेसिडेंट ब्रेंडन ब्रैनन की मौजूदगी में रवाना किया गया.
कंपनी के मुताबिक मोबाइल वैन को अधिक आवागमन वाले डिलीवरी मार्गों पर तैनात किया जाएगा. इनमें वातानुकूलित बैठने की व्यवस्था, पेयजल, मुफ्त वाई-फाई और मोबाइल फोन चार्जिंग पॉइंट जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी. इसका उद्देश्य डिलीवरी ड्राइवरों को उनके मार्ग के दौरान ही कुछ समय आराम करने और जलपान की सुविधा उपलब्ध कराना है.
आश्रय केंद्रों में मिलेंगी ये सुविधाएं
आश्रय केंद्रों में वातानुकूलित बैठने की जगह, पेयजल, मोबाइल चार्जिंग पॉइंट, स्वच्छ शौचालय, प्राथमिक उपचार किट और विश्राम की सुविधा उपलब्ध है. प्रत्येक केंद्र में एक समय में 10 से 15 लोग बैठ सकते हैं. ड्राइवर प्रत्येक विजिट पर 30 मिनट तक इन सुविधाओं का मुफ्त इस्तेमाल कर सकते हैं. यहां पार्किंग की सुविधा भी उपलब्ध है.
ये केंद्र पेट्रोल पंपों और व्यावसायिक परिसरों जैसे अधिक आवागमन वाले स्थानों पर पूरे साल सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक संचालित होते हैं. कंपनी के मुताबिक, इनके स्थान गूगल मैप्स पर भी उपलब्ध हैं, ताकि ड्राइवर आसानी से नजदीकी केंद्र का पता लगा सकें.
2024 में शुरू हुआ था आश्रय कार्यक्रम
अमेजन ने 2024 में दिल्ली एनसीआर, बेंगलुरु और मुंबई में आश्रय केंद्रों के पायलट कार्यक्रम के साथ इसकी शुरुआत की थी. इसके बाद इस नेटवर्क का लगातार विस्तार किया गया.
2025 में आश्रय केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 100 की गई और इनका विस्तार 16 शहरों तक किया गया. मई 2026 में 50 नए केंद्र जोड़ने के बाद कुल संख्या 150 हो गई. इसी दौरान दिल्ली एनसीआर में मोबाइल आश्रय वैन की शुरुआत की गई.
सितंबर 2026 में कंपनी ने 50 और केंद्र जोड़ने की घोषणा की है. इसके बाद कुल संख्या 200 हो जाएगी. मोबाइल आश्रय वैन अब दिल्ली एनसीआर, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु में उपलब्ध हैं. कंपनी का लक्ष्य 2026 के अंत तक 250 आश्रय केंद्रों का नेटवर्क तैयार करना है.
अमेजन ने 2,800 करोड़ रुपये से अधिक निवेश की बात कही
अमेजन इंडिया के निदेशक-ऑपरेशंस सलीम आर. मेमन ने कहा कि त्योहारी सीजन में डिलीवरी में तेज बढ़ोतरी को देखते हुए पूरे उद्योग के डिलीवरी ड्राइवरों के लिए रास्ते में विश्राम की सुविधा उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है.
उन्होंने कहा कि 200 केंद्रों तक विस्तार और अधिक शहरों में मोबाइल वैन शुरू होने से ज्यादा ड्राइवरों तक सुविधा पहुंच सकेगी. कंपनी के मुताबिक यह विस्तार 2026 में अपने ऑपरेशंस नेटवर्क के सहयोगियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय कल्याण को मजबूत करने के लिए किए जा रहे 2,800 करोड़ रुपये से अधिक के व्यापक निवेश का हिस्सा है.
लगातार चौथे सप्ताह घटा विदेशी मुद्रा भंडार, रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच RBI का हस्तक्षेप जारी; कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी पूंजी निकासी ने बढ़ाई चिंता
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार चौथे सप्ताह घटकर 734.6 अरब डॉलर रह गया है. सितंबर में 785.71 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद अब इसमें करीब 50 अरब डॉलर की गिरावट आ चुकी है. रुपये पर बढ़ते दबाव को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप बढ़ाए जाने के बीच भंडार में यह कमी आई है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों की बढ़ती निकासी ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है.
4 सितंबर को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 785.71 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था. इसके बाद पांच सप्ताह से भी कम समय में इसमें करीब 51 अरब डॉलर की कमी आई है. यह गिरावट बताती है कि विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल कर रहा है.
रुपये को संभालने के लिए RBI का हस्तक्षेप बढ़ा
विदेशी मुद्रा भंडार में ताजा गिरावट RBI की ओर से स्पॉट मार्केट में डॉलर की बिक्री और डॉलर-रुपये की बिक्री/खरीद वाले विदेशी मुद्रा स्वैप के इस्तेमाल को दर्शाती है. इन कदमों का उद्देश्य रुपये में गिरावट को नियंत्रित करने के साथ बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी को भी मैनेज करना है.
हालांकि, RBI के हस्तक्षेप के बावजूद रुपये पर दबाव बना हुआ है. बुधवार को रुपया करीब 0.5 फीसदी कमजोर होकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.8450 पर आ गया. यह 96.96 के अपने रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब है.
कच्चे तेल की ऊंची वैश्विक कीमतों, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी इक्विटी निवेश की बढ़ती निकासी ने रुपये पर दबाव और बढ़ा दिया है. रुपये में कमजोरी से आयातित महंगाई का जोखिम भी बढ़ता है, खासकर इसलिए क्योंकि भारत कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है.
सितंबर में भी तेजी से घटा था भंडार
ताजा गिरावट सितंबर में विदेशी मुद्रा भंडार में आई तेज कमी के बाद हुई है. 18 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भंडार 14.88 अरब डॉलर घटकर 765.9 अरब डॉलर रह गया था. इसके बाद 25 सितंबर को समाप्त सप्ताह में इसमें 18.34 अरब डॉलर की और कमी आई और यह 747.56 अरब डॉलर पर आ गया.
25 सितंबर को समाप्त सप्ताह में गिरावट मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में कमी के कारण हुई. इस दौरान विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 15.57 अरब डॉलर घटकर 615.41 अरब डॉलर रह गईं. वहीं, स्वर्ण भंडार 2.59 अरब डॉलर घटकर 108.7 अरब डॉलर हो गया. विशेष आहरण अधिकार (SDR) 97 मिलियन डॉलर घटकर 18.64 अरब डॉलर और IMF में भारत की रिजर्व पोजिशन 86 मिलियन डॉलर घटकर 4.8 अरब डॉलर रह गई.
ताजा गिरावट से पहले विदेशी मुद्रा के असामान्य रूप से बड़े प्रवाह का दौर भी रहा था. जून से सितंबर के बीच RBI की ओर से उठाए गए कदमों से करीब 143.5 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह आया, जिसमें लगभग 133 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा जमा के जरिए आए. इससे सितंबर में भंडार रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने में मदद मिली थी.
रुपये को समर्थन और नकदी प्रबंधन के बीच संतुलन
RBI की विदेशी मुद्रा संबंधी गतिविधियां घरेलू नकदी प्रबंधन से भी जुड़ी हैं. अगस्त के अंत में केंद्रीय बैंक की फॉरवर्ड बुक में डॉलर की नेट शॉर्ट पोजिशन रिकॉर्ड 200.06 अरब डॉलर पर पहुंच गई, जो जुलाई के अंत में 136.77 अरब डॉलर थी. यह बढ़ोतरी बड़े एकमुश्त डॉलर प्रवाह को सोखने के बाद हुई.
इसके बाद RBI ने अपनी फॉरवर्ड पोजिशन को मैनेज करने और रुपये की अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए खासकर छोटी अवधि के डॉलर-रुपया सेल/बाय स्वैप का इस्तेमाल किया है.
भंडार का स्तर अभी भी मजबूत
हालांकि विदेशी मुद्रा भंडार में करीब 50 अरब डॉलर की कमी आई है, लेकिन इसका मौजूदा स्तर अभी भी पर्याप्त है. वित्त मंत्रालय की सितंबर की आर्थिक समीक्षा के मुताबिक 18 सितंबर तक 765.9 अरब डॉलर का भंडार मौजूद था, जो करीब 11.1 महीने के वस्तु आयात को कवर करने के बराबर था. हालांकि, समीक्षा में अस्थिर पूंजी प्रवाह, ऊंची ऊर्जा कीमतों और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को रुपये और बाहरी क्षेत्र के लिए जोखिम बताया गया था.
अब बाजार की नजर रुपये की चाल, कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के प्रवाह और RBI के आगे के हस्तक्षेप पर रहेगी. रुपया एक बार फिर अपने रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया है. ऐसे में आने वाले हफ्तों में रुपये में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए RBI कितनी तेजी से विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करता है, यह बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक बना रहेगा.