सुवोजॉय सेनगुप्ता का मानना है कि डाटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और प्रोसेस इंडस्ट्री जैसे क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल और बढ़ने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
COP29 सम्मेलन इस हफ्ते अज़रबैजान में संपन्न हुआ, जहां कई हितधारक जलवायु परिवर्तन पर सामूहिक कार्रवाई के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराने के लिए एकत्र हुए. हालांकि, मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों (Geopolitical Uncertainty) और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के चलते वैश्विक डीकार्बनाइजेशन प्रयास मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. इसके बावजूद, यह सहमति बनी हुई है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है. अगले 4-5 साल बड़े देशों में ऊर्जा परिवर्तन की गति और तीव्रता के लिए बेहद अहम होंगे.
भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार, भारत ने COP29 में हुई प्रगति पर गंभीर चिंता जताई. भारत ने कहा कि हमारा क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों का सामना कर रहा है, जबकि हमारी इनसे उबरने और इनके साथ तालमेल बिठाने की क्षमता बेहद कम है, और इन हालातों के लिए हम जिम्मेदार भी नहीं हैं.
इस स्थिति का मतलब भारत के स्वच्छ ऊर्जा की ओर सफर के लिए क्या है? पिछले 7-8 वर्षों में भारत ने 140 गीगावाट से अधिक सोलर और विंड एनर्जी क्षमता जोड़ी है. सोलर और विंड एनर्जी अब सबसे सस्ती बिजली के स्रोत बन गए हैं. नई तकनीकों जैसे RTC (राउंड द क्लॉक पावर), FDRE (फ्लेक्सिबल डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी), और पीक पावर से रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी और बढ़ेगी. ग्रीन हाइड्रोजन, हालांकि अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन कठिन उद्योगों को डीकार्बनाइज करने में मदद कर सकता है.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रिन्यूएबल एनर्जी बाजार है, चीन और अमेरिका के बाद. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2024-30 के दौरान चीन 3200 गीगावाट, अमेरिका 500 गीगावाट, और भारत लगभग 350 गीगावाट रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ेगा. यूरोपीय संघ सामूहिक रूप से 500+ गीगावाट जोड़ेगा, लेकिन कोई भी एकल यूरोपीय देश चीन, अमेरिका या भारत के करीब नहीं है. क्या वैश्विक हरित ऊर्जा रुझानों में संभावित अनिश्चितता भारत के लिए अपनी गति तेज करने का एक बड़ा मौका दे सकती है?
हम चार प्रमुख अवसर देखते हैं. पहला, पूंजी उपकरण और सामग्री की आपूर्ति में. सोलर, बैटरी, पवन ऊर्जा और अन्य उपकरणों के उत्पादन की क्षमता बढ़ाई गई है, क्योंकि रिन्यूएबल एनर्जी की बढ़ती मांग की उम्मीद थी. अगर इस क्षेत्र में किसी कारण से प्रोजेक्ट्स धीमे होते हैं या प्रोत्साहन घटता है, तो उपकरणों की अधिकता हो सकती है, जिससे कीमतें कम हो सकती हैं. भारत पहले से ही हरित निर्माण (ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग) का एक मजबूत तंत्र तैयार कर रहा है. यह समय इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने का है.
जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) जुटाने में दूसरा अवसर है. अगर अन्य देशों में प्रोत्साहन कम हो जाते हैं, तो निजी पूंजी का एक हिस्सा नए निवेश विकल्प खोज सकता है. नीतियों में अनिश्चितता से हरित ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में लंबे समय तक निवेश करने का उत्साह भी कम हो सकता है. यह पूंजी मुख्य रूप से बड़े पेंशन फंड्स, सॉवरेन वेल्थ फंड्स और ESG फंड्स के पास है, जो जलवायु और ऊर्जा बदलाव में निवेश करने की प्रतिबद्धता रखते हैं। फिलहाल इस पूंजी का केवल एक छोटा हिस्सा उभरते बाजारों में निवेशित है.
चीन के बाहर बड़े पैमाने पर बाजारों में से एक होने के नाते, भारत इस पूंजी को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सक्रिय हो सकता है. यह भारत के लिए अवसर है कि वह निवेशकों को अपनी नीतियों की सक्रियता, विनियमन और जोखिम के अनुसार उचित रिटर्न दिखाए. ऊर्जा की लागत (LCOE) के मामले में वैश्विक मानक तय करने का तीसरा अवसर है. भारत पहले से ही दुनिया में सबसे कम सोलर LCOE (लगभग 3 सेंट/KWH) में से एक प्रदान करता है. अब मौका है कि इसे पूरे दिन और रात (राउंड द क्लॉक) की आधार पर भी हासिल किया जाए. हाल ही में सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) की फर्म और डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी (FDRE) की टेंडर दरें 4.98–4.99 रुपये (6 सेंट से कम) प्रति KWH थीं. यह दिखाता है कि भारत इस दिशा में अच्छी प्रगति कर सकता है.
भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा ने सोलर ऊर्जा परियोजनाओं की लागत (capex) प्रति मेगावाट लगातार कम की है. भारतीय बाजार का बड़ा पैमाना और बड़े पैमाने की नवीकरणीय परियोजनाओं के डिजाइन और प्रबंधन में भारत की उत्कृष्ट इंजीनियरिंग प्रतिभा, कैपेक्स और ऑपेक्स (संचालन लागत) को और भी बेहतर बना सकती है. अब अवसर है कि ऊर्जा भंडारण (पंप हाइड्रो और बैटरियों), ग्रिड फ्लेक्सिबिलिटी, डिमांड रिस्पॉन्स सॉल्यूशंस, और सहायक सेवाओं (एंसिलरी सर्विसेज) के बाजार के विकास जैसी तकनीकों में अधिक निवेश किया जाए. ट्रांसमिशन कनेक्टिविटी का समय पर विस्तार बेहद जरूरी है ताकि पूरी नवीकरणीय क्षमता को उपयोग में लाया जा सके.
हाल ही में रूफटॉप सोलर और स्मार्ट मीटरिंग पर दिए गए जोर के साथ, ऊर्जा ग्रिड को द्वि-दिशात्मक प्रवाह (बाय-डायरेक्शनल फ्लो) और पीयर-टू-पीयर एनर्जी ट्रेडिंग जैसी नई तकनीकों को संभालने के लिए तैयार करना होगा. चौथा अवसर कठिन क्षेत्रों जैसे सीमेंट और स्टील का तेजी से हरित बदलाव करने का है. बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए इन क्षेत्रों में नई क्षमता की आवश्यकता होगी. रिन्यूएबल एनर्जी, वेस्ट हीट रिकवरी, ग्रीन हाइड्रोजन और बायोफ्यूल्स जैसी तकनीकों का संयोजन इन क्षेत्रों को टिकाऊ और लाभदायक विकास पथ पर ले जा सकता है. भारत ने पहले ही एक अनुपालन कार्बन बाजार (कॉम्प्लायंस कार्बन मार्केट) शुरू करने की योजना की घोषणा की है, जो इन क्षेत्रों में निवेश के लिए और अधिक प्रोत्साहन देगा.
इन अवसरों का फायदा उठाकर भारत तेज आर्थिक विकास और डीकार्बोनाइजेशन का एक अनोखा मॉडल बना सकता है. आने वाले समय में डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और प्रोसेस इंडस्ट्री जैसे क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा का और अधिक इस्तेमाल बढ़ेगा, भविष्य में भारतीय रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियां अपने कुशल प्रोजेक्ट निष्पादन मॉडल और वैश्विक पूंजी स्रोतों का उपयोग करते हुए अन्य देशों में भी प्रोजेक्ट्स विकसित कर सकती हैं. सबसे कम लागत वाली रिन्यूएबल एनर्जी ग्रीन हाइड्रोजन को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने का आधार बनेगी, जिससे जीवाश्म ईंधन के आयात में कमी आएगी.
हर प्रकार की अनिश्चितता और बदलाव के दौर को एक अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है. भारत के पास अगले 4-5 वर्षों में अपनी प्रगति को तेज करने और 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य समय से पहले हासिल करने का मौका है, वह भी अधिक कुशलता और निवेशकों के लिए बेहतर लाभ के साथ.
डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और जरूरी नहीं कि यह पब्लिकेशन के विचारों को दर्शाते हों.
(लेखक- सुवोजॉय सेनगुप्ता, चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, AECOM इंडिया)
14 जुलाई से शेयर बाजार में देश की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल SBI Funds Management के अलावा Alpine Texworld और Millworks Technologies के IPO खुल रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अगले सप्ताह IPO में निवेश करने वालों के लिए कई बड़े मौके आने वाले हैं. 14 जुलाई से शेयर बाजार में तीन नए IPO खुलेंगे. इनमें देश की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल SBI Funds Management के अलावा Alpine Texworld और Millworks Technologies शामिल हैं. तीनों कंपनियां मिलकर करीब 11,980 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी में हैं.
SBI Funds Management का होगा सबसे बड़ा IPO
अगले हफ्ते का सबसे बड़ा IPO SBI Funds Management का होगा. यह इश्यू 14 जुलाई को खुलेगा और 16 जुलाई को बंद होगा. कंपनी ने प्रति शेयर 545 से 574 रुपये का प्राइस बैंड तय किया है. एक लॉट में 26 शेयर होंगे. ऊपरी प्राइस बैंड के हिसाब से रिटेल निवेशकों को एक लॉट खरीदने के लिए 14,924 रुपये का निवेश करना होगा.
यह पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है. यानी कंपनी नए शेयर जारी नहीं करेगी, बल्कि मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे. ऐसे में IPO से जुटाई गई राशि कंपनी को नहीं मिलेगी. शेयरों की संभावित लिस्टिंग 21 जुलाई को BSE और NSE पर हो सकती है. SBI Funds Management की स्थापना 1992 में हुई थी और यह भारत की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) में शामिल है.
Alpine Texworld भी ला रही है IPO
Alpine Texworld का IPO भी 14 जुलाई से 16 जुलाई तक सब्सक्रिप्शन के लिए खुला रहेगा. कंपनी ने 100 से 105 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. एक लॉट में 142 शेयर होंगे, जिसके लिए निवेशकों को अधिकतम 14,910 रुपये लगाने होंगे.
यह 126.25 करोड़ रुपये का फ्रेश इश्यू है. यानी कंपनी नए शेयर जारी कर पूंजी जुटाएगी. जुटाई गई राशि का इस्तेमाल कारोबार विस्तार के लिए किया जाएगा. कंपनी टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए फैब्रिक डाइंग और प्रोसेसिंग का कारोबार करती है और अहमदाबाद में अपनी तीसरी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने की योजना बना रही है.
Millworks Technologies के IPO पर भी नजर
SME सेगमेंट की Millworks Technologies भी 14 जुलाई को अपना IPO खोलेगी, जो 16 जुलाई तक खुला रहेगा. कंपनी ने 315 से 331 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है और इस इश्यू के जरिए 160.34 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है.
ग्रे मार्केट में इस IPO को लेकर अच्छी मांग देखने को मिल रही है. कंपनी के शेयर इश्यू प्राइस के मुकाबले 100% से अधिक प्रीमियम (GMP) पर कारोबार कर रहे हैं. हालांकि, निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ग्रे मार्केट प्रीमियम केवल बाजार का संकेत होता है और इससे लिस्टिंग पर मुनाफे की कोई गारंटी नहीं मिलती.
निवेश से पहले रखें इन बातों का ध्यान
IPO में निवेश करने से पहले कंपनी के कारोबार, वित्तीय स्थिति, जोखिम और वैल्यूएशन का अच्छी तरह आकलन करना जरूरी है. केवल GMP या बाजार की चर्चा के आधार पर निवेश का फैसला नहीं करना चाहिए. किसी भी निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय लेना बेहतर माना जाता है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
सरकार के इस फैसले के बाद कोई भी दवा कंपनी या मेडिकल स्टोर निर्धारित कीमत से अधिक राशि नहीं वसूल सकेगा. नियमों का उल्लंघन करने पर अतिरिक्त वसूली गई रकम ब्याज सहित लौटानी होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महंगी दवाओं से परेशान मरीजों के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हृदय रोग, HIV और आंखों के संक्रमण समेत 39 जरूरी दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (Retail Price) तय कर दी है. अब कोई भी दवा कंपनी या मेडिकल स्टोर निर्धारित कीमत से अधिक राशि नहीं वसूल सकेगा. नियमों का उल्लंघन करने पर अतिरिक्त वसूली गई रकम ब्याज सहित लौटानी होगी.
39 जरूरी दवाओं की कीमत हुई तय
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय की ओर से 8 जुलाई को जारी अधिसूचना के अनुसार, ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर (DPCO), 2013 के तहत 39 नई दवा फॉर्मूलेशन की अधिकतम खुदरा कीमत निर्धारित की गई है. इन दवाओं का उपयोग हाई BP, डायबिटीज, हृदय रोग, HIV और आंखों के संक्रमण जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जाता है. सरकार का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य जरूरी दवाओं को आम लोगों के लिए किफायती बनाना और इलाज का खर्च कम करना है.
तय कीमत से ज्यादा वसूली पर होगी सख्त कार्रवाई
NPPA ने स्पष्ट किया है कि कोई भी दवा निर्माता, मार्केटिंग कंपनी या विक्रेता निर्धारित खुदरा कीमत से अधिक राशि नहीं वसूल सकता. यदि कोई कंपनी या विक्रेता नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसे अतिरिक्त वसूली गई पूरी राशि ब्याज सहित जमा करनी होगी. यह कार्रवाई ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 और आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत की जाएगी.
मेडिकल स्टोर पर प्राइस लिस्ट लगाना होगा अनिवार्य
सरकार ने सभी मेडिकल स्टोर और दवा विक्रेताओं को निर्देश दिया है कि वे दवा कंपनियों द्वारा जारी नवीनतम प्राइस लिस्ट दुकान में ऐसी जगह प्रदर्शित करें, जहां ग्राहक उसे आसानी से देख सकें. इस व्यवस्था का उद्देश्य दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाना और मरीजों को अधिक कीमत वसूले जाने से बचाना है.
मरीजों को कैसे मिलेगा फायदा?
नई व्यवस्था लागू होने के बाद मरीजों को जरूरी दवाएं निर्धारित कीमत पर उपलब्ध होंगी. इससे इलाज की लागत कम होगी, दवा कंपनियों और विक्रेताओं की मनमानी पर रोक लगेगी और उपभोक्ताओं के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी. सरकार का मानना है कि यह कदम आम लोगों तक सस्ती और जरूरी दवाओं की पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
त्रिपुरा ने टेक्नोलॉजी और डिजिटल निवेश के क्षेत्र में बड़ा कदम बढ़ाते हुए 'डेस्टिनेशन त्रिपुरा बिजनेस कॉन्क्लेव 2026' के दौरान ₹10,000 करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव हासिल किए हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
त्रिपुरा ने टेक्नोलॉजी और डिजिटल निवेश के क्षेत्र में बड़ा कदम बढ़ाते हुए 'डेस्टिनेशन त्रिपुरा बिजनेस कॉन्क्लेव 2026' के दौरान ₹10,000 करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव हासिल किए हैं. दो दिवसीय कॉन्क्लेव में सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), हेल्थकेयर, क्लाउड, ग्रीन एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर समेत कई क्षेत्रों में 43 समझौता ज्ञापनों (MoU) और 11 एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) पर हस्ताक्षर हुए. इस दौरान गूगल और सेल्सफोर्स जैसी वैश्विक टेक कंपनियों के साथ भी अहम साझेदारियां की गईं.
दो दिन तक चला बिजनेस कॉन्क्लेव
अगरतला के इंटरनेशनल फेयर ग्राउंड, हापानिया में आयोजित इस दो दिवसीय (9 और 10 जुलाई 2026) कॉन्क्लेव में देशभर के निवेशकों, उद्योगपतियों, स्टार्टअप्स, टेक कंपनियों और नीति निर्माताओं ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम का उद्देश्य त्रिपुरा को टेक्नोलॉजी आधारित और सतत निवेश के उभरते केंद्र के रूप में स्थापित करना था.
मुख्यमंत्री बोले- निवेशकों का भरोसा बढ़ा
कार्यक्रम का उद्घाटन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री प्रो. (डॉ.) माणिक साहा ने किया. इस दौरान सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त एवं योजना मंत्री प्रणजीत सिंघा रॉय समेत राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे. वहीं केंद्रीय पूर्वोत्तर विकास एवं संचार मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया और केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने वर्चुअली कार्यक्रम को संबोधित किया.
मुख्यमंत्री माणिक साहा ने कहा कि पिछले छह वर्षों में राज्य की सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) दोगुनी हुई है. उन्होंने बताया कि कॉन्क्लेव में 500 प्रतिभागियों के आने की उम्मीद थी, लेकिन 1,000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया, जो त्रिपुरा में निवेशकों के बढ़ते भरोसे का संकेत है.
गूगल और सेल्सफोर्स के साथ रणनीतिक साझेदारी
कॉन्क्लेव के दौरान सूचना प्रौद्योगिकी निदेशालय (DIT) ने गूगल इंडिया के साथ डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम के विकास के लिए समझौता किया. इसके अलावा सेल्सफोर्स के साथ AI आधारित नागरिक सेवाओं, CRM समाधान और डिजिटल गवर्नेंस प्लेटफॉर्म विकसित करने पर साझेदारी हुई. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के साथ भी शुरुआती स्तर पर चर्चा की गई.
इसके अलावा Da'Spatio Rhobotique Laboratory, Bodhi Tree Multimedia, Elvania Energies 369, Indigi Consulting and Solutions समेत कई कंपनियों के साथ भी MoU पर हस्ताक्षर किए गए.
आईटी सेक्टर में बढ़ रहा निवेश
सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के निदेशक जेया रागुल गेशन बी ने बताया कि राज्य की आईटी नीतियों का सकारात्मक असर दिखने लगा है. उन्होंने कहा कि एयरटेल ने अगरतला में डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए ₹200 करोड़ के निवेश का फैसला किया है.
उन्होंने बताया कि राज्य में फिलहाल 134 स्टार्टअप पंजीकृत हैं, 59 कंपनियों को मान्यता मिल चुकी है और स्टार्टअप्स को ₹2.7 करोड़ से अधिक की वित्तीय सहायता दी जा चुकी है.
निवेशकों के लिए आसान होगी प्रक्रिया
उद्योग एवं वाणिज्य विभाग के सचिव किरण गिट्टे ने कहा कि राज्य सरकार ने कारोबार शुरू करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया है. बेहतर सड़क, रेल, इंटरनेट, बैंकिंग और कुशल मानव संसाधन के दम पर त्रिपुरा निवेश के लिए आकर्षक गंतव्य बन रहा है.
IT Pavilion बना आकर्षण का केंद्र
कॉन्क्लेव में सूचना प्रौद्योगिकी निदेशालय का IT Pavilion सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र रहा. यहां निवेशकों, स्टार्टअप संस्थापकों, छात्रों और उद्योग प्रतिनिधियों को त्रिपुरा की IT/ITeS नीति, स्टार्टअप नीति और डेटा सेंटर नीति की जानकारी दी गई. साथ ही प्रस्तावित AI Policy, AVGC-XR Policy और Global Capability Centre (GCC) Policy की भी झलक दिखाई गई.
डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा फोकस
राज्य सरकार ने प्रस्तावित IT Park, Tripura IT & Data Ecosystem Zone (TIDEZ), Airtel Nxtra Data Centre और T-NEST इनक्यूबेशन सेंटर जैसी परियोजनाओं को भी प्रदर्शित किया. इन परियोजनाओं का उद्देश्य आईटी, डेटा सेंटर, साइबर सिक्योरिटी, BPO, ESDM और AI आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना है.
टेक्नोलॉजी आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता त्रिपुरा
सरकार का कहना है कि 'डेस्टिनेशन त्रिपुरा बिजनेस कॉन्क्लेव 2026' राज्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होगा. वैश्विक टेक कंपनियों के निवेश और नई साझेदारियों से त्रिपुरा को आने वाले वर्षों में पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख टेक्नोलॉजी निवेश केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद मिलेगी.
यह ऑर्डर बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पावर कन्वर्जन सिस्टम (PCS) की आपूर्ति से जुड़ा है, जिससे कंपनी के ऊर्जा भंडारण कारोबार को और मजबूती मिलने की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जेएसडब्ल्यू एनर्जी (JSW Energy) के शेयर अगले कारोबारी सत्र में निवेशकों के रडार पर रह सकते हैं. कंपनी की स्टेप-डाउन सब्सिडियरी JSW Energy PSP Eleven Ltd (JEPEL) को ₹443.74 करोड़ का बड़ा ऑर्डर मिला है. यह ऑर्डर बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पावर कन्वर्जन सिस्टम (PCS) की आपूर्ति से जुड़ा है, जिससे कंपनी के ऊर्जा भंडारण कारोबार को और मजबूती मिलने की उम्मीद है.
सब्सिडियरी को मिला ₹443.74 करोड़ का ऑर्डर
JSW Energy ने शेयर बाजार को दी सूचना में बताया कि उसकी 100% स्वामित्व वाली स्टेप-डाउन सब्सिडियरी JSW Energy PSP Eleven Ltd (JEPEL) को Bondada Renewable Energy Pvt Ltd से ₹443.74 करोड़ का ऑर्डर मिला है.
Bondada Renewable Energy, Bondada Engineering Ltd की सहायक कंपनी है. यह ऑर्डर 200 मेगावाट/400 मेगावाट-घंटा (MWh) क्षमता वाले बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पावर कन्वर्जन सिस्टम (PCS) की आपूर्ति के लिए है.
पुणे में है 5 GWh क्षमता का बैटरी प्लांट
JEPEL पुणे में 5 GWh वार्षिक क्षमता वाला बैटरी असेंबली प्लांट संचालित करती है. कंपनी का कहना है कि यह ऑर्डर उसके एनर्जी स्टोरेज कारोबार को और मजबूत करेगा तथा भारत में बढ़ती BESS मांग का लाभ उठाने में मदद करेगा.
2030 तक 30 GW क्षमता का लक्ष्य
JSW Energy की कुल लॉक्ड-इन जनरेशन क्षमता 32.1 गीगावाट (GW) है. इसमें 14.53 GW परिचालन में है, 13 GW निर्माणाधीन है और 4.6 GW परियोजनाएं पाइपलाइन में हैं. वहीं, कंपनी की लॉक्ड-इन एनर्जी स्टोरेज क्षमता 29.6 GWh है, जिसमें 26.4 GWh पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज और 3.2 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज शामिल है. कंपनी ने 2030 तक 30 GW बिजली उत्पादन क्षमता और 40 GWh ऊर्जा भंडारण क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है.
रिन्यूएबल एनर्जी पोर्टफोलियो लगातार बढ़ रहा
JSW Energy ने अप्रैल 2026 से अब तक 1,081 मेगावाट नई रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता शुरू की है, जिसके बाद उसकी कुल स्थापित क्षमता बढ़कर 14,535 मेगावाट हो गई है. नई क्षमता में 442 मेगावाट सोलर, 108 मेगावाट विंड, 381 मेगावाट हाइब्रिड और 150 मेगावाट हाइड्रो प्रोजेक्ट शामिल हैं. इसके साथ कंपनी की कुल स्थापित क्षमता में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी बढ़कर 61% हो गई है.
तीन महीने में 13% चढ़ा शेयर
JSW Energy का शेयर शुक्रवार को बीएसई पर ₹553.30 पर बंद हुआ. कंपनी का बाजार पूंजीकरण 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक है और यह BSE 200 इंडेक्स का हिस्सा है. पिछले तीन महीनों में कंपनी का शेयर करीब 13% की तेजी दर्ज कर चुका है. नए ऑर्डर के बाद सोमवार के कारोबारी सत्र में इस शेयर पर निवेशकों की खास नजर रहने की संभावना है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
रिपोर्ट के अनुसार, AI फिलहाल हर साल लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर के बराबर उत्पादकता बढ़ा रहा है. यह अध्ययन में शामिल 86 देशों की कुल GDP का करीब 3.4% है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वैश्विक अर्थव्यवस्था में हर साल करीब 2.7 ट्रिलियन डॉलर की उत्पादकता बढ़ा रहा है, लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ अब भी अमीर देशों और अधिक वेतन पाने वाले पेशेवरों को मिल रहा है. एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी के मुताबिक, यदि विकासशील देश AI से जुड़े नियमों, बुनियादी ढांचे और स्थानीय AI इकोसिस्टम को मजबूत नहीं करते हैं, तो वे AI क्रांति में और पीछे छूट सकते हैं.
100 से ज्यादा देशों के डेटा पर आधारित है अध्ययन
यह अध्ययन जनवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच 100 से अधिक देशों में लगभग 10 लाख AI बातचीत (AI Conversations) के विश्लेषण पर आधारित है. इसमें Anthropic Economic Index के पांच संस्करणों के डेटा का इस्तेमाल किया गया.
शोधकर्ताओं ने AI के आर्थिक प्रभाव को मापने के लिए दो नए पैमाने विकसित किए हैं. पहला 'लेबर कॉस्ट इक्विवेलेंट' (LCE), जो AI से होने वाले उत्पादकता लाभ का अनुमान लगाता है. दूसरा 'AI कंसंट्रेशन इंडेक्स' (ACI), जो यह बताता है कि AI से होने वाले लाभ विभिन्न पेशों में कितनी समानता से बंट रहे हैं.
2.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा AI का आर्थिक योगदान
रिपोर्ट के अनुसार, AI फिलहाल हर साल लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर के बराबर उत्पादकता बढ़ा रहा है. यह अध्ययन में शामिल 86 देशों की कुल GDP का करीब 3.4% है. यह आंकड़ा 2025 के मध्य में अनुमानित 1.2 ट्रिलियन डॉलर से दोगुने से भी अधिक है. इसकी मुख्य वजह यह है कि AI का उपयोग अब केवल सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षा, सेल्स, ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन और अन्य बड़े रोजगार वाले क्षेत्रों तक फैल गया है.
AI का उपयोग बढ़ा, लेकिन प्रति बातचीत आर्थिक मूल्य घटा
रिपोर्ट में दिलचस्प तथ्य सामने आया कि प्रत्येक AI बातचीत से मिलने वाला औसत आर्थिक मूल्य कुछ कम हुआ है. जनवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच AI वार्तालाप का वेतन सूचकांक (Wage Index) 5.5% घटा. हालांकि, AI के इस्तेमाल में तेज बढ़ोतरी ने इस गिरावट की भरपाई कर दी. कुल उत्पादकता लाभ में हुई वृद्धि का 80% से अधिक हिस्सा AI उपयोग की बढ़ती मात्रा से आया.
अमीर देशों को मिल रहा सबसे ज्यादा फायदा
स्टडी के अनुसार, AI से होने वाले आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा अभी भी उच्च आय वाले देशों के पास केंद्रित है. हाई-इनकम देशों में AI से मिलने वाला उत्पादकता लाभ उनकी GDP के लगभग 4.2% के बराबर है. वहीं, मध्यम आय वाले देशों में यह आंकड़ा केवल 0.6% और निम्न आय वाले देशों में महज 0.1% है.
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक कार्यबल में अपेक्षाकृत कम हिस्सेदारी होने के बावजूद अमीर देशों को AI से होने वाले कुल उत्पादकता लाभ का लगभग 96% हिस्सा मिल रहा है.
भारत में सीमित वर्ग तक पहुंचा AI का लाभ
अध्ययन के मुताबिक, भारत में भी AI से होने वाले लाभ मुख्य रूप से उच्च कौशल और अधिक वेतन पाने वाले पेशेवरों तक सीमित हैं. भारत का AI कंसंट्रेशन इंडेक्स (ACI) 0.84 दर्ज किया गया, जो बताता है कि AI से होने वाली अधिकांश उत्पादकता वृद्धि सीमित संख्या में कुशल कर्मचारियों को मिल रही है.
इसके मुकाबले अमेरिका का ACI 0.49 है, जो दर्शाता है कि वहां AI का उपयोग ऑफिस प्रशासन, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और बिजनेस सर्विसेज जैसे कई क्षेत्रों में व्यापक रूप से हो रहा है.
कई नए क्षेत्रों में बढ़ रहा AI का इस्तेमाल
रिपोर्ट के अनुसार, AI का उपयोग अब केवल सॉफ्टवेयर और STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स) क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. अध्ययन में शामिल आधे से अधिक देशों में 2025 के अंत से 2026 की शुरुआत के बीच AI कंसंट्रेशन इंडेक्स में गिरावट दर्ज की गई. इसका मतलब है कि AI का इस्तेमाल अब अधिक विविध पेशों में होने लगा है, खासकर मध्यम आय वाले देशों में, हालांकि, कई निम्न आय वाले देशों में AI का उपयोग अब भी सीमित पेशेवर वर्ग तक ही केंद्रित है.
AI से अधिक फायदा दिलाने में नियमों की अहम भूमिका
स्टडी के मुताबिक, किसी देश का AI नियामकीय ढांचा (Regulatory Framework) यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि उसे AI से कितना आर्थिक लाभ मिलेगा. जिन देशों में AI से जुड़े नियम अधिक मजबूत हैं, वहां उत्पादकता लाभ भी ज्यादा है और उसका वितरण विभिन्न पेशों में अपेक्षाकृत संतुलित है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जिन देशों में अंग्रेजी आधिकारिक भाषा है, वहां AI के फायदे अधिक तेजी से अलग-अलग पेशों तक पहुंचे हैं. इसकी वजह यह है कि मौजूदा बड़े भाषा मॉडल (Large Language Models) मुख्य रूप से अंग्रेजी डेटा पर प्रशिक्षित हैं.
चुनौतियां अभी भी बरकरार
शोधकर्ताओं ने कहा कि यह अनुमान केवल AI से बचने वाले समय और उत्पादकता लाभ पर आधारित है. इसमें AI इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा खपत, सब्सक्रिप्शन शुल्क, निवेश लागत और संभावित रोजगार प्रभाव जैसे खर्च शामिल नहीं हैं.
इसके अलावा, अध्ययन में एंटरप्राइज API और अन्य प्रमुख AI प्लेटफॉर्म के उपयोग को भी शामिल नहीं किया गया है. ऐसे में वास्तविक आर्थिक प्रभाव वर्तमान अनुमान से अलग हो सकता है.
विकासशील देशों के लिए बड़ा संदेश
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि AI का दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि इसके लाभ उच्च आय वाले देशों और विशेषज्ञ पेशों से आगे कितनी तेजी से बाकी दुनिया तक पहुंचते हैं.
हालांकि AI अब शिक्षा, बिक्री और प्रशासनिक कार्यों जैसे क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा है, लेकिन विकासशील देशों के बड़े हिस्से को अभी भी वह व्यापक उत्पादकता लाभ नहीं मिल पाया है, जो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पहले से देखने को मिल रहा है.
GP Petroleums ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसकी संयुक्त उद्यम कंपनी Amron Oil Resources Pvt Ltd को IOCL के गुजरात स्थित पिपावाव बिटुमेन सेल के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जीपी पेट्रोलियम (GP Petroleums Ltd) की संयुक्त उद्यम (JV) कंपनी एमरॉन ऑयल रिसोर्सिस (Amron Oil Resources Pvt Ltd) को इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) ने गुजरात के पिपावाव स्थित अपने बिटुमेन सेल के लिए ऑपरेटिंग पार्टनर चुना है. इस साझेदारी से गुजरात और आसपास के क्षेत्रों में स्पेशलिटी बिटुमेन उत्पादों की आपूर्ति मजबूत होने के साथ सड़क और परिवहन अवसंरचना परियोजनाओं को भी गति मिलने की उम्मीद है.
IOCL ने Amron Oil Resources को चुना
GP Petroleums ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसकी संयुक्त उद्यम कंपनी Amron Oil Resources Pvt Ltd को IOCL के गुजरात स्थित पिपावाव बिटुमेन सेल के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है. Amron Oil Resources, GP Petroleums और West Coast Oils LLP के बीच 50:50 हिस्सेदारी वाला संयुक्त उद्यम है.
सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद बनाती है कंपनी
Amron Oil Resources स्पेशलिटी बिटुमेन उत्पादों का निर्माण करती है. इनमें बिटुमेन इमल्शन, पॉलिमर मॉडिफाइड बिटुमेन (PMB) और क्रम्ब रबर मॉडिफाइड बिटुमेन (CRMB) शामिल हैं. इन उत्पादों का व्यापक उपयोग सड़क निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में किया जाता है.
जून से शुरू हो चुकी है सप्लाई
कंपनी के मुताबिक, पिपावाव सुविधा से बल्क बिटुमेन की आपूर्ति 4 जून 2026 से शुरू हो चुकी है. इस सुविधा का उद्घाटन इंडियन ऑयल के 'SPRING 2026 Mission Excellence' (यदि मूल नाम 'SPRINT 2026 Mission Excellence' है तो वही रखें) पहल के तहत किया गया था.
गुजरात और आसपास के राज्यों को मिलेगा फायदा
GP Petroleums का कहना है कि पिपावाव बिटुमेन सेल के संचालन से गुजरात और आसपास के क्षेत्रों में स्पेशलिटी बिटुमेन उत्पादों की उपलब्धता बेहतर होगी. पिपावाव बंदरगाह के निकट स्थित होने के कारण यह सुविधा लॉजिस्टिक्स को अधिक कुशल बनाएगी, जिससे सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को समय पर सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी.
सड़क अवसंरचना कारोबार में बढ़ेगी हिस्सेदारी
कंपनी का मानना है कि IOCL के ऑपरेटिंग पार्टनर के रूप में चयन होने से स्पेशलिटी बिटुमेन सेगमेंट में GP Petroleums की मौजूदगी और मजबूत होगी. साथ ही भारत के सड़क और परिवहन अवसंरचना क्षेत्र में कंपनी की भागीदारी का दायरा भी बढ़ेगा.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि देशभर में लागू किए जाने से पहले E20 पेट्रोल का इंजन की मजबूती, उत्सर्जन, जंग-प्रतिरोध और वाहनों के साथ अनुकूलता जैसे कई मानकों पर व्यापक परीक्षण किया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने पहली बार स्वीकार किया है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से कुछ वाहनों का माइलेज 3% से 5% तक कम हो सकता है. हालांकि, सरकार का कहना है कि बेहतर इंजन परफॉर्मेंस, कम प्रदूषण और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने जैसे फायदे इस मामूली कमी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने E20 पेट्रोल को लेकर जारी विस्तृत FAQ में इसकी जानकारी दी है.
E20 पेट्रोल पर सरकार का बड़ा बयान
केंद्र सरकार ने शुक्रवार को कहा कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से कुछ वाहनों की ईंधन दक्षता (फ्यूल इकोनॉमी) में 3% से 5% तक कमी आ सकती है. हालांकि, सरकार का कहना है कि E20 एक स्वच्छ और हाई-ऑक्टेन ईंधन है, जो इंजन की बेहतर कार्यक्षमता, कम उत्सर्जन और ऊर्जा सुरक्षा जैसे कई फायदे देता है.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि देशभर में लागू किए जाने से पहले E20 पेट्रोल का इंजन की मजबूती, उत्सर्जन, जंग-प्रतिरोध (Corrosion Resistance) और वाहनों के साथ अनुकूलता जैसे कई मानकों पर व्यापक परीक्षण किया गया है.
E20 को जल्दबाजी में लागू करने के दावों को किया खारिज
सरकार ने E20 पेट्रोल को जल्दबाजी में लागू किए जाने के आरोपों को भी खारिज किया है. मंत्रालय के मुताबिक, भारत का एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol-EBP) कार्यक्रम वर्ष 2001 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ था. इसके बाद 2018 में राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति (National Policy on Biofuels) लागू होने के बाद इस कार्यक्रम का धीरे-धीरे विस्तार किया गया.
सरकार ने 2022 में तय समय से पहले 10% एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लिया था. वहीं, 2025-26 एथेनॉल आपूर्ति वर्ष के दौरान 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य भी पूरा कर लिया गया.
ऑटो कंपनियों ने नहीं जताई कोई चिंता
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, Maruti Suzuki और Hero MotoCorp सहित प्रमुख वाहन निर्माताओं ने वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में E20 पेट्रोल के कारण इंजन में जंग लगने या पुर्जों के असामान्य घिसाव जैसी किसी समस्या की रिपोर्ट नहीं दी है.
तेल आयात घटाना है सरकार का मुख्य उद्देश्य
सरकार ने स्पष्ट किया कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का उद्देश्य पेट्रोल की कीमतें कम करना नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना है.
मंत्रालय के अनुसार, इस कार्यक्रम के जरिए वर्ष 2014-15 से अब तक 1.97 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है. इसके अलावा करीब 316 लाख टन कच्चे तेल के आयात की आवश्यकता कम हुई है.
किसानों और पर्यावरण को भी हुआ फायदा
सरकार का दावा है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से लगभग 952 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन में कमी आई है. साथ ही इस कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को 1.66 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है, जिससे उनकी आय बढ़ाने और जैव ईंधन उत्पादन को प्रोत्साहन देने में मदद मिली है.
दोनों देशों ने 'इंडिया-न्यूजीलैंड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप: रोडमैप 2030' को भी मंजूरी दी, जिसके तहत अगले चार वर्षों में व्यापार, कृषि, सुरक्षा, नवाचार, पर्यटन और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर संयुक्त रूप से काम किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान भारत और न्यूजीलैंड ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए कई अहम समझौतों पर सहमति जताई है. दोनों देशों ने 2030 तक आपसी व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर (करीब ₹35,000 करोड़) तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. इसके साथ ही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA), कृषि, डेयरी, पर्यटन, समुद्री सहयोग, कौशल विकास और स्वच्छ ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत करने का रोडमैप भी तैयार किया गया है.
भारत-न्यूजीलैंड रिश्ते बने 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप'
भारत और न्यूजीलैंड ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को आधिकारिक तौर पर 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' का दर्जा दे दिया है. दोनों देशों ने 'इंडिया-न्यूजीलैंड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप: रोडमैप 2030' को भी मंजूरी दी, जिसके तहत अगले चार वर्षों में व्यापार, कृषि, सुरक्षा, नवाचार, पर्यटन और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर संयुक्त रूप से काम किया जाएगा.
यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में लिया गया. उल्लेखनीय है कि करीब चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक न्यूजीलैंड यात्रा है.
2030 तक ₹35,000 करोड़ व्यापार का लक्ष्य
दोनों देशों ने आर्थिक साझेदारी को नई गति देने के लिए 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं के द्विपक्षीय व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर (करीब ₹35,000 करोड़) तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. सरकारों का मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच निवेश बढ़ेगा, नए कारोबारी अवसर बनेंगे और कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंच मिलेगी.
FTA को जल्द लागू करने पर बनी सहमति
भारत और न्यूजीलैंड ने लंबे समय से लंबित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को जल्द अंतिम रूप देने और लागू करने पर भी सहमति जताई है. दोनों प्रधानमंत्रियों ने कहा कि यह समझौता संतुलित, व्यापक और दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा. FTA लागू होने के बाद व्यापारिक बाधाएं कम होंगी, आयात-निर्यात आसान होगा और दोनों देशों के उद्योगों को नए अवसर मिलेंगे.
कृषि और डेयरी सेक्टर को मिलेगा बड़ा फायदा
दोनों देशों ने कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई है. इसके तहत बागवानी, वानिकी, पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं पर काम किया जाएगा. न्यूजीलैंड भारत में कीवी, सेब और शहद के उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए तकनीकी सहयोग देगा. साथ ही भारत में कीवी फ्रूट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना में भी सहयोग करेगा. पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच नए सहयोग समझौते (MoC) पर सहमति बनी है.
पर्यटन और सीधी उड़ानों को मिलेगा बढ़ावा
पर्यटन क्षेत्र को मजबूत करने के लिए दोनों देशों ने एक समझौता (MoA) पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके अलावा भारत और न्यूजीलैंड के बीच सीधी नॉन-स्टॉप उड़ानें शुरू करने की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा. सीधी उड़ानें शुरू होने से पर्यटन, व्यापार और शिक्षा के क्षेत्र में आवाजाही आसान होगी और लोगों के बीच संपर्क बढ़ेगा.
कस्टम और समुद्री सहयोग होगा मजबूत
दोनों देशों ने कस्टम प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने के लिए ऑथराइज्ड इकोनॉमिक ऑपरेटर-म्यूचुअल रिकग्निशन अरेंजमेंट (AEO-MRA) लागू करने पर सहमति जताई है. इसके जरिए भरोसेमंद निर्यातकों और आयातकों के लिए कस्टम क्लियरेंस की प्रक्रिया अधिक तेज और सुगम हो सकेगी.
इसके साथ ही भारत और न्यूजीलैंड समुद्री क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाएंगे. दोनों देश नाविकों के प्रमाणपत्रों की पारस्परिक मान्यता पर काम करेंगे, जिससे भारतीय नाविकों के लिए वैश्विक रोजगार के नए अवसर खुलेंगे.
कई क्षेत्रों में बढ़ेगा सहयोग
'रोडमैप 2030' के तहत दोनों देशों ने स्वच्छ ऊर्जा, कौशल विकास, नवाचार, निवेश और तकनीकी सहयोग को भी प्राथमिकता देने का फैसला किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीतिक साझेदारी न केवल द्विपक्षीय व्यापार को नई गति देगी, बल्कि दोनों देशों के बीच आर्थिक, तकनीकी और लोगों के स्तर पर सहयोग को भी मजबूत बनाएगी.
'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत अब तक 40 लाख रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन का लक्ष्य हासिल किया जा चुका है. इस योजना का उद्देश्य 1 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों तक सोलर बिजली पहुंचाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में रूफटॉप सोलर अपनाने की रफ्तार बढ़ाने के लिए विश्व बैंक ने बड़ा कदम उठाया है. संस्था देश में 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत 4.2 अरब डॉलर की निजी वित्तपोषण (Private Financing) जुटाने में मदद करेगी. इस पहल से लाखों परिवारों के लिए सोलर पैनल लगाना आसान होगा, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार और घरेलू विनिर्माण को भी बढ़ावा मिलेगा.
विश्व बैंक ने मंजूर किया फंडिंग पैकेज
विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशक मंडल ने भारत की रूफटॉप सोलर योजना को गति देने के लिए नए वित्तपोषण पैकेज को मंजूरी दे दी है. इस पैकेज का उद्देश्य 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत घरों में सोलर पैनल लगाने की प्रक्रिया को तेज करना और निजी निवेश को आकर्षित करना है. विश्व बैंक के मुताबिक, इस पहल के जरिए 4.2 अरब डॉलर तक की निजी फाइनेंसिंग जुटाई जाएगी, जिससे देश में रूफटॉप सोलर अपनाने की रफ्तार और तेज होगी.
फंडिंग पैकेज में क्या-क्या शामिल?
इस कार्यक्रम के लिए तैयार किए गए वित्तीय पैकेज में कई स्रोतों से धन उपलब्ध कराया जाएगा.
1. इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (IBRD) से 82 करोड़ डॉलर का ऋण.
2. क्लीन टेक्नोलॉजी फंड (CTF) से 6 करोड़ डॉलर का रियायती ऋण.
3. IBRD के 'लिवेबल प्लैनेट फंड' के तहत 1 करोड़ डॉलर का अनुदान.
40 लाख इंस्टॉलेशन का लक्ष्य पूरा, अब 1 करोड़ घरों पर नजर
सरकार की 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत अब तक 40 लाख रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन का लक्ष्य हासिल किया जा चुका है. इस योजना का उद्देश्य 1 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों तक सोलर बिजली पहुंचाना है. सरकार का मानना है कि इस मिशन से नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण, इंस्टॉलेशन और सर्विस सेक्टर में करीब 17 लाख रोजगार के अवसर पैदा होंगे.
बिना गिरवी के मिलेगा सोलर लोन
विश्व बैंक के कार्यक्रम के टास्क टीम लीडर मोएज चेरिफ ने कहा कि यह योजना आवासीय सोलर बाजार में बड़ा बदलाव ला सकती है. उन्होंने कहा कि वितरण कंपनियों (DISCOMs), बैंकों और सोलर उपकरण विक्रेताओं की क्षमता बढ़ाकर एकीकृत सेवा मॉडल तैयार किया जाएगा. इसके जरिए परिवार बिना किसी संपत्ति को गिरवी रखे ऋण लेकर सोलर पैनल लगवा सकेंगे और अपने बिजली बिल में उल्लेखनीय बचत कर पाएंगे.
65 लाख आवेदन विचाराधीन
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने हाल ही में बताया था कि योजना के तहत 65 लाख से अधिक आवेदन प्रक्रिया में हैं. सरकार का लक्ष्य दिसंबर 2026 तक 75 लाख घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित करना है.
भारत के सोलर मिशन को मिलेगा नया बल
भारत में विश्व बैंक के कार्यवाहक कंट्री डायरेक्टर पॉल प्रोप्सी ने कहा कि विश्व बैंक पिछले एक दशक से अधिक समय से भारत के रूफटॉप सोलर सेक्टर का समर्थन कर रहा है. उन्होंने बताया कि इस दौरान 2 अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय सहायता जुटाई गई, जिससे देश की रूफटॉप सोलर क्षमता 500 मेगावॉट से बढ़कर 27 गीगावॉट से अधिक हो गई.
नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में अहम कदम
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य तय किया है. साथ ही 2035 तक देश के बिजली उत्पादन में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा की हिस्सेदारी 60% तक पहुंचाने का संकल्प लिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व बैंक की यह नई पहल भारत के स्वच्छ ऊर्जा अभियान, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ग्रीन इकोनॉमी को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया लिक्विडिटी उपाय और विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह बैंकिंग सिस्टम को समर्थन देंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का बैंकिंग सेक्टर अगले तीन वित्त वर्षों (FY26-FY28) में मजबूत कमाई दर्ज कर सकता है. ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFS) की रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार बढ़ती कर्ज मांग, RBI की लिक्विडिटी सपोर्ट और नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) में वृद्धि के दम पर बैंकिंग सेक्टर की आय 15% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने का अनुमान है. रिपोर्ट में प्राइवेट बैंकों के सरकारी बैंकों (PSU Banks) से बेहतर प्रदर्शन करने की संभावना जताई गई है.
FY28 तक 15% CAGR से बढ़ सकती है कमाई
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFS) की रिपोर्ट के अनुसार, FY26 से FY28 के बीच भारतीय बैंकिंग सेक्टर की आय लगभग 15% CAGR की दर से बढ़ सकती है. वहीं, प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की कमाई इस अवधि में करीब 20% CAGR से बढ़ने का अनुमान है, जिससे उनके सरकारी बैंकों से बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद है.
कर्ज की मजबूत मांग देगी रफ्तार
रिपोर्ट के मुताबिक, FY27 में कॉरपोरेट, सर्विसेज और इंडस्ट्रियल सेक्टर में मजबूत मांग के चलते क्रेडिट ग्रोथ मिड-टू-हाई टीन्स में बनी रह सकती है. मई 2026 में कॉरपोरेट सेक्टर को दिए गए कर्ज में सालाना आधार पर 18.7% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि सर्विस सेक्टर को दिए गए कर्ज में 19.1% की वृद्धि हुई.
इंडस्ट्रियल क्रेडिट में आई तेजी
रिपोर्ट के अनुसार, FY26 की पहली छमाही में जहां औद्योगिक क्षेत्र को मिलने वाले कर्ज की वृद्धि एकल अंक (Mid-Single Digit) में थी, वहीं दिसंबर 2025 के बाद इसमें मिड-टीन्स की वृद्धि दर्ज की गई है. इस तेजी की वजह बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और बड़े कॉरपोरेट्स, मिड-साइज कंपनियों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की वर्किंग कैपिटल जरूरतों में इजाफा बताया गया है.
RBI के कदम से मिलेगा सहारा
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया लिक्विडिटी उपाय और विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह बैंकिंग सिस्टम को समर्थन देंगे. MOFS का अनुमान है कि FCNR(B) डिपॉजिट और विदेशी उधारी से जुड़े नियमों में RBI की ढील के बाद 40 से 50 अरब डॉलर तक का विदेशी निवेश आ सकता है. यह बैंकिंग सिस्टम के कुल डिपॉजिट का करीब 1.5% से 1.8% के बराबर होगा.
डिपॉजिट ग्रोथ अभी भी कमजोर
रिपोर्ट के मुताबिक, डिपॉजिट ग्रोथ अभी भी क्रेडिट ग्रोथ से पीछे चल रही है. मई 2026 तक डिपॉजिट ग्रोथ 12% रही, जबकि पूरे 2026 में यह 10% से 12% के दायरे में बनी हुई है. इसका असर यह हुआ कि बैंकिंग सिस्टम का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो बढ़कर रिकॉर्ड 83.4% पर पहुंच गया.
मार्जिन पर रहेगा दबाव
MOFS का कहना है कि FY27 की पहली तिमाही में नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बना रह सकता है. इसकी वजह पहले हुई रेपो रेट कटौती का असर, लेंडिंग यील्ड में कमी और डिपॉजिट पर ऊंची ब्याज दरें हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि होलसेल और MSME लेंडिंग का बढ़ता हिस्सा बैंकों की ब्याज दरों में सुधार की क्षमता को सीमित कर सकता है. इसके अलावा, कुछ मिड-साइज बैंकों ने तिमाही के दौरान डिपॉजिट रेट बढ़ाई है. वहीं, चालू खाता-बचत खाता (CASA) अनुपात में गिरावट से बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ने की आशंका है.
मध्यम अवधि का आउटलुक सकारात्मक
हालांकि, निकट अवधि में चुनौतियां बनी रहने की संभावना है, लेकिन MOFS ने बैंकिंग सेक्टर के मध्यम अवधि के आउटलुक को सकारात्मक बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, उधारी लागत में संभावित कमी और FY27 के अंत तक ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी से बैंकों के मार्जिन और आय में सुधार देखने को मिल सकता है.