आरबीआई के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत की अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर मजबूती की ओर बढ़ रही है. वित्तीय और मौद्रिक नीतियों, ग्रामीण और शहरी मांग में सुधार, तथा डिजिटल लेनदेन की तेजी से बढ़ती स्वीकार्यता ने अर्थव्यवस्था को सतत विकास की दिशा में अग्रसर किया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कहा है कि इस वर्ष उठाए गए राजकोषीय, मौद्रिक और विनियामक कदम आने वाले समय में निजी निवेश, उत्पादकता और समग्र आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने वाले एक सतत और सकारात्मक विकास चक्र की शुरुआत करेंगे. केंद्रीय बैंक के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था में गति बढ़ने के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं.
अपनी मासिक बुलेटिन में आरबीआई ने बताया कि वैश्विक अनिश्चितता अभी भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है, हालांकि अक्टूबर में लगातार एक साल से अधिक समय तक बढ़ने के बाद इसमें हल्की गिरावट दर्ज की गई. अक्टूबर के हाई-फ्रीक्वेंसी आंकड़े बताते हैं कि विनिर्माण और सेवाओं दोनों क्षेत्रों में मजबूत विस्तार देखने को मिला है, जिसका श्रेय त्योहारों की मांग और जीएसटी सुधारों के निरंतर सकारात्मक प्रभाव को जाता है.
आरबीआई ने कहा, “मुद्रास्फीति ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर आ गई है और लक्ष्य दर से काफी नीचे बनी हुई है. वित्तीय स्थिति अनुकूल रही और वाणिज्यिक क्षेत्र को वित्तीय संसाधनों का प्रवाह पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है.”
केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि बाहरी क्षेत्र की झटकों को झेलने की क्षमता समय के साथ बेहतर हुई है, जिससे वैश्विक व्यापार नीतियों की अनिश्चितताओं के बीच भारत की लचीलापन बढ़ा है. डिजिटल लेनदेन के हालिया आंकड़ों के अनुसार देशभर में डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता और उपयोग तेजी से बढ़ा है, चाहे वह किराना और सुपरमार्केट हों या फिर सोने की खरीद.
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा, “हम नवाचार को प्रोत्साहित कर रहे हैं, साथ ही प्रणालीगत स्थिरता की सुरक्षा पर ध्यान बनाए हुए हैं. जहां संभव है, हम विनियमों को सरल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आवश्यक सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए. हम अन्य नियामकों के साथ समन्वय को मजबूत कर रहे हैं, जबकि उनके अधिकार क्षेत्र का सम्मान भी कर रहे हैं.”
अक्टूबर माह में समग्र मांग परिस्थितियों में भी सुधार देखने को मिला. ग्रामीण मांग ने कुल मांग को आगे बढ़ाया, जिसे अनुकूल मानसून, मजबूत कृषि गतिविधियों, जीएसटी दरों में कटौती और त्योहारों के दौरान बढ़ी खरीदारी ने समर्थन दिया. दोपहिया वाहनों और ऑटोमोबाइल की ग्रामीण बिक्री में तेज उछाल आया, और दोनों ने अपनी अब तक की सबसे ऊंची वृद्धि दर्ज की.
शहरी मांग में भी गति आई, जहां पैसेंजर वाहन बिक्री ने पिछले नौ महीनों में अपना सर्वाधिक स्तर छू लिया. आरबीआई ने कहा कि मनरेगा (MGNREGS) के तहत काम की मांग में निरंतर कमी यह दर्शाती है कि ग्रामीण श्रम बाजार की स्थिति में सुधार हो रहा है.
इतने मजबूत तरीके से भरोसे से जुड़े समूह के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या लंबे समय तक बनी रहने वाली अनिश्चितता अंततः व्यापक टाटा समूह को लेकर धारणाओं को प्रभावित कर सकती है, लिखते हैं डॉ. अनुराग बत्रा
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डॉ. अनुराग बत्रा
टाटा का बोर्डरूम शायद ही कभी वह जगह रहा है, जहां सार्वजनिक मतभेद खबर का विषय बनते हैं. लेकिन टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर मौजूदा विवाद ने स्थिति बदल दी है. जो मामला शुरुआत में कॉरपोरेट गवर्नेंस का मुद्दा था, वह अब सार्वजनिक रूप से सामने आ रहा है, जिसमें टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है.
बिजनेस मीडिया के लिए स्वाभाविक रूप से ध्यान गवर्नेंस, नियंत्रण, टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका और टाटा संस के भविष्य पर है. लेकिन एक और सवाल है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है: क्या बोर्डरूम का विवाद अंततः कॉरपोरेट छवि तक पहुंच सकता है और समय के साथ व्यक्तिगत टाटा ब्रांड्स को भी प्रभावित कर सकता है?
प्रतिष्ठा का जोखिम
टाटा केवल एक कॉरपोरेट समूह नहीं है. यह एक ऐसा नाम है, जो पीढ़ियों से भरोसे, ईमानदारी, संस्थागत विश्वसनीयता और जिम्मेदार कारोबार के इर्द-गिर्द बना है. यह प्रतिष्ठा पूरे समूह में एक अमूर्त संपत्ति है.
इसीलिए नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक मतभेद को केवल एक और कॉरपोरेट लड़ाई के रूप में नहीं देखा जा सकता.
तत्काल कारोबारी प्रभाव सीमित हो सकता है. टाटा की कंपनियां कारों का निर्माण, तकनीकी सेवाएं उपलब्ध कराना, होटल चलाना, उपभोक्ता उत्पाद बेचना और अपनी-अपनी विकास रणनीतियों को आगे बढ़ाना जारी रखेंगी. लेकिन प्रतिष्ठा अलग तरह से काम करती है. यह केवल इस बात से प्रभावित नहीं होती कि कोई कंपनी क्या करती है, बल्कि इससे भी प्रभावित होती है कि हितधारक उसके पीछे मौजूद संस्थान को लेकर क्या धारणा रखते हैं.
इतने मजबूत तरीके से भरोसे से जुड़े समूह के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या नेतृत्व स्तर पर लंबे समय तक बनी रहने वाली अनिश्चितता अंततः व्यापक टाटा समूह को लेकर धारणाओं को प्रभावित कर सकती है.
दो छवियों की रक्षा
वास्तव में दो प्रतिष्ठाओं की रक्षा करनी है.
पहली है टाटा की कॉरपोरेट छवि, उसका गवर्नेंस, नेतृत्व, स्थिरता और निवेशकों, कर्मचारियों, साझेदारों तथा नियामकों के बीच विश्वसनीयता.
दूसरी है टाटा की व्यक्तिगत कंपनियों की ब्रांड छवि.
इन दोनों को एक ही कहानी नहीं बनने देना चाहिए.
टाटा की कार खरीदने वाला ग्राहक शायद टाटा संस के बोर्डरूम में चल रही गतिविधियों पर करीबी नजर नहीं रख रहा होगा. टीसीएस का ग्राहक मुख्य रूप से तकनीक, डिलीवरी और कारोबारी नतीजों को लेकर चिंतित होता है. ताज का मेहमान अनुभव पर ध्यान देता है.
लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि दोनों दुनिया पूरी तरह एक-दूसरे से अलग हैं.
सवाल यह है कि क्या शीर्ष स्तर का यह विवाद बोर्डरूम तक सीमित रहेगा या धीरे-धीरे व्यापक कॉरपोरेट और ब्रांड तंत्र को लेकर लोगों की धारणाओं तक पहुंच जाएगा.
फिलहाल ऐसा होने के कोई तत्काल प्रमाण नहीं हो सकते हैं. लेकिन यही वह वजह है कि संचार टीमों को पहले से सोचने की जरूरत है.
प्रतिष्ठा पर दबाव आने के बाद उसे सुधारने की तुलना में दबाव आने से पहले उसकी रक्षा करना हमेशा बेहतर होता है.
सावधानी, घबराहट नहीं
इसका मतलब यह नहीं है कि हर टाटा ब्रांड को बोर्डरूम में हो रहे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर देना चाहिए.
इसके बिल्कुल विपरीत.
व्यक्तिगत कारोबारों को अपनी ताकत, प्रदर्शन, नवाचार, ग्राहक पेशकश और विकास योजनाओं के बारे में संवाद जारी रखना चाहिए. उन्हें होल्डिंग कंपनी के विवाद को अपने रोजमर्रा के ब्रांड नैरेटिव का हिस्सा बनने से बचना चाहिए.
हालांकि कॉरपोरेट स्तर पर संचार की प्रतिक्रिया अधिक सोच-समझकर तय करने की जरूरत है.
उद्देश्य भरोसा बनाए रखना, जहां जरूरी हो वहां स्पष्टता देना और कर्मचारियों, निवेशकों, साझेदारों तथा अन्य हितधारकों को यह भरोसा दिलाना होना चाहिए कि कारोबारी निरंतरता प्रभावित नहीं हुई है.
यह ऐसा संकट पैदा करने के बारे में नहीं है, जहां शायद कोई संकट है ही नहीं. यह इस संभावना के लिए तैयार रहने के बारे में है कि गवर्नेंस का विवाद प्रतिष्ठा से जुड़ा मुद्दा बन सकता है.
संचार के बीच संतुलन
यहीं टाटा के कॉरपोरेट संचार विभाग के सामने एक नाजुक संतुलन की चुनौती आती है.
बाहरी स्तर पर विवाद को और बढ़ावा दिए बिना स्पष्टता की जरूरत है. आंतरिक स्तर पर कर्मचारियों को यह भरोसा दिलाने की जरूरत है कि उनके कारोबार अपने काम पर केंद्रित हैं और परिचालन प्राथमिकताओं में बदलाव नहीं हुआ है.
ऐसी स्थितियों में सबसे बड़ा खतरा संचार का खालीपन होता है. जब संगठन स्पष्टता उपलब्ध नहीं कराते, तो अटकलें उस जगह को भर देती हैं.
साथ ही, जरूरत से ज्यादा संवाद किसी मुद्दे को उसकी वास्तविकता से बड़ा दिखा सकता है.
इसलिए इसका जवाब जरूरी नहीं कि अधिक संवाद हो. जवाब अधिक उद्देश्यपूर्ण संवाद है.
टाटा संस को गवर्नेंस के मुद्दे को पारदर्शिता और संयम के साथ संबोधित करना होगा, जबकि व्यक्तिगत टाटा कंपनियों को कारोबार, ग्राहकों और विकास पर केंद्रित रहना होगा.
टाटा के प्रभाव की रक्षा
इसका एक और पहलू भी है.
टाटा का नाम उसके कई कारोबारों को एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रभाव प्रदान करता है. यह प्रभाव दशकों में बना है और इसे मूल संगठन को लेकर बनी धारणाओं से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता.
यह वित्तीय बाजारों में विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है, जहां गवर्नेंस और नेतृत्व से जुड़े सवाल निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं.
लेकिन संचार के स्तर पर किसी खास कॉरपोरेट घटनाक्रम को लेकर बाजार की प्रतिक्रिया और व्यक्तिगत कारोबारों के दीर्घकालिक मूल सिद्धांतों के बीच अंतर करना जरूरी है.
उद्देश्य यह होना चाहिए कि गवर्नेंस का विवाद पूरे टाटा समूह के लिए एक संक्षिप्त पहचान न बन जाए.
ब्रांडरूम का महत्व
बोर्डरूम के मतभेद अंततः गवर्नेंस तंत्र, शेयरधारकों के फैसलों या अन्य उपयुक्त प्रक्रियाओं के जरिए सुलझ जाएंगे.
ब्रांड की प्रतिष्ठा अलग होती है.
यह ग्राहकों, कर्मचारियों, निवेशकों और समाज के साथ हजारों संवादों के जरिए धीरे-धीरे बनती है. जब कॉरपोरेट नैरेटिव किसी ब्रांड से जुड़े मूल्यों को चुनौती देने लगे, तो यह तेजी से प्रभावित भी हो सकती है.
इसलिए टाटा के लिए चुनौती यह तय करने से कहीं बड़ी है कि शीर्ष पर कौन बैठता है.
यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि जब बोर्डरूम अपने मतभेदों से निपट रहा हो, तब टाटा ब्रांड उन अपेक्षाओं के अनुरूप बना रहे, जो हितधारकों ने उससे विकसित की हैं.
क्योंकि जब बोर्डरूम ब्रांडरूम बन जाता है, तब संचार केवल संकट को संभालने के बारे में नहीं रह जाता.
यह उस संस्थागत विरासत की रक्षा करने के बारे में होता है, इससे पहले कि बोर्डरूम का विवाद ब्रांड विवाद बनने का मौका पाए.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्ट्स
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और प्रधान संपादक तथा एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया जगत के दिग्गज के रूप में वह एंजल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया पेशेवरों के मार्गदर्शक भी हैं.
वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और प्रबंधन शिक्षा से उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है. MDI गुरुग्राम के पूर्व छात्र डॉ. बत्रा इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में भी रह चुके हैं और MDI Alumni Association के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर चुके हैं.
वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. पढ़ने के शौकीन डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून ही किसी व्यक्ति का पेशा बन जाता है, तो काम को उद्देश्य की गहरी भावना मिलती है.)
ICRA के मुताबिक, वित्त वर्ष 2030-31 तक InvIT और REIT का संयुक्त AUM करीब ₹20 लाख करोड़ हो सकता है. सड़क, रिन्यूएबल एनर्जी, वेयरहाउसिंग और डेटा सेंटर जैसे सेक्टर इस वृद्धि को रफ्तार दे सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvIT) और रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REIT) का बाजार अगले पांच वर्षों में तेजी से विस्तार कर सकता है. रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुमान के मुताबिक, दोनों का संयुक्त एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) वित्त वर्ष 2025-26 के करीब ₹10 लाख करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2030-31 तक लगभग ₹20 लाख करोड़ हो सकता है. इस तरह अगले पांच वर्षों में संयुक्त AUM में सालाना औसतन करीब 15 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है.
ICRA के मुताबिक, इस अवधि में InvIT का AUM बढ़कर करीब ₹13.5 लाख करोड़ और REIT का AUM लगभग ₹6.5 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है. इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट के मोनेटाइजेशन, रिन्यूएबल एनर्जी और फाइबर प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ कमर्शियल रियल एस्टेट, वेयरहाउसिंग और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से इस बाजार को समर्थन मिलने की उम्मीद है.
पांच साल में दोगुने से ज्यादा बढ़ा AUM
InvIT और REIT बाजार में पिछले पांच वर्षों में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है. दोनों का संयुक्त AUM वित्त वर्ष 2020-21 में करीब ₹4 लाख करोड़ था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर लगभग ₹10 लाख करोड़ हो गया.
इस दौरान InvIT का AUM मार्च 2021 के करीब ₹3.2 लाख करोड़ से बढ़कर मार्च 2026 में लगभग ₹7 लाख करोड़ हो गया. यानी इसमें सालाना औसतन करीब 17 फीसदी की वृद्धि हुई. वहीं, REIT का AUM इसी अवधि में करीब ₹70,000 करोड़ से बढ़कर ₹3.1 लाख करोड़ हो गया. REIT के AUM में सालाना औसतन करीब 33 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. वित्त वर्ष 2025-26 तक देश में 25 InvIT और छह सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध REIT थे.
सड़क क्षेत्र बना InvIT का बड़ा ग्रोथ इंजन
InvIT में सड़क क्षेत्र सबसे तेजी से विस्तार करने वाले सेगमेंट के तौर पर उभरा है. कुल InvIT AUM में सड़क क्षेत्र की हिस्सेदारी मार्च 2021 के 16 फीसदी से बढ़कर मार्च 2026 में 43 फीसदी हो गई. हालांकि, 44 फीसदी हिस्सेदारी के साथ टेलीकॉम अभी भी मामूली अंतर से सबसे बड़ा सेगमेंट है.
दूसरी ओर, REIT के पोर्टफोलियो में ऑफिस एसेट की हिस्सेदारी प्रमुख बनी हुई है. इसके साथ रिटेल और वेयरहाउसिंग जैसे क्षेत्रों में भी विस्तार देखने को मिल रहा है.
नए एसेट से बढ़ेंगे ग्रोथ के मौके
ICRA की वाइस प्रेसिडेंट और ग्रुप हेड (कॉरपोरेट रेटिंग्स) अनुपमा रेड्डी के मुताबिक, InvIT और REIT बाजार अब ऐसे स्तर पर पहुंच गया है, जहां पारंपरिक एसेट के साथ नए तरह के एसेट में भी विस्तार की गुंजाइश है.
उनके मुताबिक, इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट का लगातार मोनेटाइजेशन और नई एसेट कैटेगरी का जुड़ना आगे ग्रोथ के नए अवसर पैदा कर सकता है. घरेलू संस्थागत निवेशकों की बढ़ती भागीदारी और हाल में हुए नियामकीय बदलाव भी इन एसेट के लिए फंड जुटाने के विकल्पों को बेहतर बना सकते हैं.
नियामकीय बदलावों से मिल सकता है समर्थन
ICRA के अनुसार, पिछले एक दशक में हुए नियामकीय बदलावों ने InvIT और REIT बाजार के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इन बदलावों से निवेशकों की पहुंच बढ़ी है और फंड जुटाने के विकल्पों का विस्तार हुआ है.
जनवरी 2026 में म्युचुअल फंड निवेश के लिए REIT को इक्विटी के रूप में वर्गीकृत किया गया. इसके अलावा 1 अक्टूबर 2026 से बैंकों को सीधे REIT स्तर पर कर्ज देने की अनुमति दी गई है.
ICRA का मानना है कि इन बदलावों से InvIT और REIT में पूंजी का प्रवाह बढ़ सकता है. साथ ही, फंड जुटाने के स्रोत बढ़ने और लंबी अवधि का कर्ज उपलब्ध होने से पुराने कर्ज की रीफाइनेंसिंग में भी मदद मिल सकती है.
इसके अलावा, स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टर की परिभाषा का दायरा बढ़ाकर सभी क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIB) को शामिल किया गया है. इससे लंबी अवधि के घरेलू निवेशकों की भागीदारी बढ़ने की संभावना है.
InvIT-REIT में घरेलू निवेशकों की बढ़ी भागीदारी
घरेलू पूंजी भी इस सेक्टर की वृद्धि में अहम भूमिका निभा रही है. जून 2026 तक म्युचुअल फंड का InvIT और REIT में निवेश सालाना आधार पर 56 फीसदी बढ़कर ₹31,000 करोड़ से अधिक हो गया.
इसके साथ बीमा कंपनियों, पेंशन फंड, सॉवरेन फंड और रिटेल निवेशकों की भागीदारी भी बढ़ी है. स्थापित इश्यू में जोखिम के मुकाबले मिलने वाले रिटर्न ने भी निवेशकों की रुचि बढ़ाने में योगदान दिया है. ऐसे इश्यू का औसत एक्सटेंडेड इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न (XIRR) करीब 14 फीसदी रहा है.
इसके अलावा, सरकारी बॉन्ड और AAA रेटिंग वाले कॉरपोरेट बॉन्ड की तुलना में InvIT और REIT की उधारी लागत का अंतर भी कम हुआ है.
पूंजी जुटाने की गतिविधियां भी बढ़ीं
बाजार के परिपक्व होने के साथ InvIT और REIT की ओर से पूंजी जुटाने की गतिविधियों में भी तेजी आई है. वित्त वर्ष 2019-20 से अब तक दोनों माध्यमों ने पब्लिक इश्यू, प्राइवेट प्लेसमेंट, प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट, इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट और राइट्स इश्यू के जरिए मिलकर करीब ₹20,000 करोड़ जुटाए हैं.
इसमें करीब 80 फीसदी रकम InvIT के जरिए जुटाई गई. अब तक जुटाई गई कुल पूंजी का करीब आधा हिस्सा पिछले तीन वर्षों में आया है. यह InvIT और REIT के जरिए फंड जुटाने वाली संस्थाओं की बढ़ती गतिविधि और निवेशकों के बीच इन माध्यमों की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है.
इन ट्रस्ट की एक अहम खासियत यह है कि इनके जरिए चालू और कमाई करने वाली संपत्तियों में फंसी पूंजी को निकालकर नई इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल एस्टेट परियोजनाओं में लगाया जा सकता है.
कर्ज और वैल्यूएशन से जुड़े जोखिम पर नजर जरूरी
हालांकि, ICRA के मुताबिक इस सेक्टर के सामने कुछ जोखिम भी बने हुए हैं. मध्यम से लंबी अवधि में अवसर मजबूत रहने के बावजूद ग्रोथ की रफ्तार और उसकी गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करेगी कि कर्ज का प्रबंधन कितनी सावधानी से किया जाता है और नए एसेट खरीदते समय कितना वित्तीय अनुशासन बरता जाता है.
रीफाइनेंसिंग का जोखिम, संबंधित स्पेशल पर्पज व्हीकल (SPV) पर कर्ज की शर्तें, एसेट वैल्यूएशन में बदलाव, एक साथ बड़ी मात्रा में नकदी की जरूरत और टैक्स नियमों में बदलाव ऐसे प्रमुख जोखिम हैं जिन पर नजर रखना जरूरी होगा.
ICRA के अनुसार, पर्याप्त नकदी बनाए रखना, कर्ज की मैच्योरिटी को अलग-अलग अवधि में बांटना और कैश फ्लो का बेहतर प्रबंधन करना जरूरी होगा. इससे InvIT और REIT का क्रेडिट प्रोफाइल मजबूत बनाए रखने में मदद मिलेगी, खासकर जब संयुक्त AUM वित्त वर्ष 2030-31 तक अनुमानित ₹20 लाख करोड़ के स्तर की ओर बढ़ सकता है.
विदेश मंत्रालय के अनुसार, बैठक में राजनीतिक संबंधों के साथ व्यापार और निवेश, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा, डिजिटल गवर्नेंस, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता और ऊर्जा सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुख रहे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और कैरेबियन कम्युनिटी (CARICOM) के बीच 23 सितंबर को हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में व्यापार, निवेश, कृषि, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल गवर्नेंस, जलवायु लचीलापन और ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई. इस दौरान CARICOM ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 2028-29 अवधि के लिए भारत की उम्मीदवारी का समर्थन करने की घोषणा की.
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र से इतर आयोजित भारत-CARICOM विदेश मंत्रियों की बैठक की सह-अध्यक्षता भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और सूरीनाम के विदेश मंत्री मेल्विन डब्ल्यू.जे. बोउवा ने की. यह बैठक नवंबर 2024 में गुयाना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और CARICOM नेताओं की अध्यक्षता में हुए दूसरे भारत-CARICOM शिखर सम्मेलन के बाद सहयोग की समीक्षा के लिए आयोजित की गई.
व्यापार, निवेश और ऊर्जा सहयोग पर जोर
विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों पक्षों ने भारत-CARICOM सहयोग में अब तक हुई प्रगति पर संतोष जताया और कई क्षेत्रों में आपसी भागीदारी बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की. बैठक में राजनीतिक संबंधों के साथ व्यापार और निवेश, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा, डिजिटल गवर्नेंस, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता और ऊर्जा सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुख रहे. दोनों पक्षों ने विकास सहयोग को मजबूत करने और आपसी आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा की. CARICOM नेताओं ने कैरेबियन क्षेत्र में भारत की विकास साझेदारी और ग्लोबल साउथ के देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने में भारत के योगदान को स्वीकार किया.
UNSC उम्मीदवारी के लिए भारत को समर्थन
बैठक में CARICOM की ओर से भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 2028-29 अवधि की उम्मीदवारी का समर्थन किया गया. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस समर्थन के लिए CARICOM देशों का आभार जताया.
जयशंकर ने कहा कि भारत ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के लिए काम करता रहेगा. UNSC की उम्मीदवारी के लिए CARICOM का समर्थन भारत और कैरेबियन देशों के बीच बहुपक्षीय मंचों पर बढ़ते समन्वय को भी दर्शाता है.
संयुक्त राष्ट्र सुधार और आतंकवाद पर भी चर्चा
बैठक में दोनों पक्षों ने बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई. इसके तहत संयुक्त राष्ट्र सुधार, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद से मुकाबला और अंतरराष्ट्रीय अपराध जैसे मुद्दों पर साथ काम करने की बात कही गई.
बैठक में बारबाडोस, डोमिनिका, बहामास, गुयाना, जमैका, सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनाडाइन्स, त्रिनिदाद एंड टोबैगो, सूरीनाम, हैती, सेंट लूसिया, सेंट किट्स एंड नेविस और एंटीगुआ एंड बारबुडा के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया. ग्रेनाडा का प्रतिनिधित्व उसके वित्त मंत्री ने और बेलीज का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्रालय के CEO ने किया. CARICOM की महासचिव कार्ला नताली बार्नेट भी बैठक में मौजूद रहीं. भारत और CARICOM ने राजनीतिक, आर्थिक, विकासात्मक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने संबंधों को आगे मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई.
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर टाटा सन्स ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है, लेकिन इससे टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद समाप्त नहीं हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के बीच एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर विवाद और गहरा गया है. टाटा सन्स ने टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा है कि चंद्रशेखरन को पांच साल के नए कार्यकाल के लिए चेयरमैन नियुक्त करने का 17 सितंबर का बोर्ड फैसला कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन और लागू कानून के अनुरूप है. कंपनी ने इस रुख के समर्थन में वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की राय का भी हवाला दिया है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, टाटा सन्स के कंपनी सेक्रेटरी सुप्रकाश मुखोपाध्याय ने 24 सितंबर को नोएल टाटा को पत्र भेजकर कंपनी का पक्ष रखा. इसमें कहा गया कि बोर्ड ने बहुमत से चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का फैसला लिया है और यह प्रस्ताव वैध है. हालांकि, इस मामले में टाटा ट्रस्ट्स का रुख इससे अलग है और विवाद अब आर्टिकल 118 और 121 की व्याख्या को लेकर केंद्रित हो गया है.
आर्टिकल 118 को लेकर है मुख्य विवाद
नोएल टाटा की आपत्ति का एक प्रमुख आधार टाटा सन्स के आर्टिकल 118 से जुड़ा है. यह प्रावधान टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी की 40 फीसदी या उससे अधिक हिस्सेदारी होने की स्थिति में चेयरमैन के चयन के लिए विशेष प्रक्रिया का प्रावधान करता है.
टाटा सन्स का कहना है कि आर्टिकल 118 में दी गई प्रक्रिया नए चेयरमैन की पहली नियुक्ति के लिए है और मौजूदा चेयरमैन की पुनर्नियुक्ति पर लागू नहीं होती. कंपनी ने इसी आधार पर चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को वैध बताया है.
तीन कानूनी विशेषज्ञों की राय का हवाला
अपने जवाब में टाटा सन्स ने वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप्तो सरकार, पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित और पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी.एन. श्रीकृष्ण की कानूनी राय का हवाला दिया है. कंपनी के मुताबिक, इन रायों में 17 सितंबर के बोर्ड फैसले को वैध माना गया है.
विवाद आर्टिकल 121 के तहत वोटिंग प्रक्रिया को लेकर भी है. रिपोर्टों के मुताबिक, चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव पर टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशकों की राय अलग-अलग थी. नोएल टाटा ने प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने समर्थन किया. चंद्रशेखरन ने मतदान से खुद को अलग रखा था. इसके बाद कास्टिंग वोट का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को मंजूरी दी गई.
पूर्व CJI यू.यू. ललित की राय के मुताबिक, वोट बराबर होने की स्थिति में कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया जा सकता था और 17 सितंबर का प्रस्ताव वैध रूप से पारित हुआ. वहीं, बी.एन. श्रीकृष्ण की राय में भी बोर्ड की कार्रवाई को आर्टिकल 121 के अनुरूप बताया गया है.
हालांकि, दूसरी ओर नोएल टाटा की ओर से प्राप्त कानूनी राय में इस व्याख्या पर आपत्ति जताई गई है. इसलिए फिलहाल दोनों पक्षों की कानूनी व्याख्याएं अलग-अलग हैं.
अगस्त में टली थी AGM
टाटा सन्स ने अपने पत्र में 18 अगस्त को हुई सालाना आम बैठक यानी AGM का भी जिक्र किया. कंपनी के मुताबिक, बैठक में जरूरी कोरम पूरा नहीं हो सका था, क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स की ओर से संयुक्त प्रतिनिधि नामित नहीं किया गया था.
टाटा सन्स ने इस घटना को 17 सितंबर को चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के लिए हुए बोर्ड फैसले से जोड़ने को भी खारिज किया है. कंपनी का कहना है कि दोनों घटनाओं को आपस में जोड़ना उचित नहीं है.
आगे क्या होगा?
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर टाटा सन्स ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है, लेकिन इससे टाटा सन्स और टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद समाप्त नहीं हुआ है. खास तौर पर आर्टिकल 118 और 121 की व्याख्या तथा कास्टिंग वोट के इस्तेमाल को लेकर दोनों पक्षों के कानूनी रुख अलग हैं.
इसके अलावा, चंद्रशेखरन के निदेशक पद पर बने रहने से जुड़ा मामला कंपनी अधिनियम की धारा 152 के तहत शेयरधारकों के सामने रखा जाना है. ऐसे में आने वाली बैठक इस पूरे घटनाक्रम में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव होगी.
न प्लेटफॉर्म्स पर कंपनी के ब्रांड एंबेसडर और पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की तस्वीर भी लगाई गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
फुटवियर ब्रांड एशियन फुटवेयर्स ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म 14, 15 और 16 के नेमिंग राइट्स हासिल किए हैं. कंपनी की ओर से की गई इस ब्रांडिंग के तहत इन प्लेटफॉर्म्स को ‘एशियन फुटवेयर्स प्लेटफॉर्म 14’, ‘एशियन फुटवेयर्स प्लेटफॉर्म 15’ और ‘एशियन फुटवेयर्स प्लेटफॉर्म 16’ के नाम से जाना जाएगा. इन प्लेटफॉर्म्स पर कंपनी के ब्रांड एंबेसडर और पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की तस्वीर भी लगाई गई है.
24 सितंबर 2026 को घोषित इस साझेदारी के तहत प्लेटफॉर्म 14, 15 और 16 पर पैनल्स, बिलबोर्ड्स, विनाइल रैपिंग, बैकलिट डिस्प्ले और अन्य ब्रांडिंग टचपॉइंट्स के जरिए एशियन फुटवेयर्स की मौजूदगी दर्ज कराई जाएगी. कंपनी का कहना है कि इस पहल के जरिए उसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आने-जाने वाले प्रतिदिन 10 लाख से अधिक यात्रियों तक पहुंच बनाने का अवसर मिलेगा.
प्लेटफॉर्म्स पर दिखेगा धोनी का चेहरा
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन देश के प्रमुख रेलवे ट्रांजिट हब में शामिल है. ऐसे में प्लेटफॉर्म्स के नेमिंग राइट्स के जरिए एशियन फुटवेयर्स ने बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई है. कंपनी के मुताबिक, प्लेटफॉर्म्स पर ब्रांडिंग के साथ महेंद्र सिंह धोनी की तस्वीर भी लगाई जाएगी, जिससे ब्रांड की विजिबिलिटी बढ़ाने की योजना है.
एशियन फुटवेयर्स के चेयरमैन राजिंदर जिंदल ने कहा, “यह एशियन फुटवेयर्स के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है. लाखों भारतीयों के लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन केवल एक ट्रांजिट पॉइंट नहीं है. यह एक ऐसा डेस्टिनेशन है, जो देश के हर कोने से आने वाले लाखों भारतीयों को जोड़ता है. इसी तरह, महेंद्र सिंह धोनी हमारे लिए सिर्फ एक क्रिकेटर नहीं, बल्कि एक भावना हैं.”
उन्होंने कहा कि यह साझेदारी कंपनी को यात्रियों की रोजमर्रा की यात्राओं के केंद्र में अपनी पहचान बनाने का अवसर देती है. जिंदल के मुताबिक, कंपनी अपने फुटवियर के जरिए जिस तरह लाखों भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनने की कोशिश करती है, उसी तरह रेलवे स्टेशन पर यह मौजूदगी भी उपभोक्ताओं से जुड़ाव बनाने में मदद करेगी.
शहरी और छोटे शहरों के उपभोक्ताओं तक पहुंच
कंपनी के अनुसार, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर यह ब्रांडिंग उसे अलग-अलग उपभोक्ता वर्गों तक पहुंचने में मदद करेगी. इसमें मेट्रो शहरों के साथ टियर-2 शहरों और ग्रामीण इलाकों के उपभोक्ता भी शामिल हैं. कंपनी इस साझेदारी को अपनी कंज्यूमर आउटरीच और मास कंज्यूमर एंगेजमेंट रणनीति का हिस्सा मान रही है.
कंपनी के मुताबिक, उसके पास देशभर में 250 से अधिक डिस्ट्रीब्यूटर्स और हजारों रिटेल टचपॉइंट्स हैं. कंपनी क्वालिटी, कंफर्ट, इनोवेशन और किफायती फुटवियर पर फोकस करते हुए अपने रिटेल और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का विस्तार कर रही है.
टाटा विवाद के केंद्र में 18% हिस्सेदारी और इसके इर्द-गिर्द परिवारों, दोस्तों, वकीलों और निदेशकों का असाधारण नेटवर्क
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
भारत के प्रमुख कारोबारी परिवारों की कहानी, जिनके हाथों में ताकत है, साथ ही उन पेशेवरों की, जिन्होंने दशकों तक उनकी मेजों पर बैठकर काम किया है.
17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने अपने चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को पांच और वर्षों के लिए पद पर बनाए रखने और भारत की सबसे प्रतिष्ठित निजी कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की तैयारी करने के पक्ष में मतदान किया. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा, जिनके ट्रस्ट के पास कंपनी की दो-तिहाई हिस्सेदारी है, ने इसके खिलाफ वोट किया. बोर्ड में ट्रस्ट्स के दूसरे प्रतिनिधि ने इसके पक्ष में वोट किया. रात होते-होते ट्रस्ट्स ने पूरे मतदान को अवैध घोषित कर दिया. और लगभग कोई भी उस चीज के बारे में बात नहीं कर रहा था, जिसने इस पूरे मामले को इतना महत्वपूर्ण बनाया: टाटा संस में 18.37% हिस्सेदारी, जो एक ऐसे परिवार के पास है जिसे पैसों की सख्त जरूरत है.
यह हिस्सेदारी शापूरजी पालोनजी समूह के पास है, वह परिवार जिसने कभी टाटा संस को साइरस मिस्त्री के रूप में चेयरमैन दिया था और 2016 में टाटा द्वारा उन्हें पद से हटाए जाने को देखा. टाटा संस का मूल्य करीब 12 लाख करोड़ रुपये आंका जाए तो मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये की है, जो इसे भारतीय कारोबार की सबसे मूल्यवान संपत्तियों में से एक बनाती है. लेकिन यह ऐसी संपत्ति भी है जिसे शापूर या मिस्त्री परिवार खर्च नहीं कर सकता, क्योंकि यह एक ऐसी कंपनी में फंसी हुई है जिसका शेयर बाजार में कोई भाव नहीं है और जिससे निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है. दूसरी ओर टाटा ट्रस्ट्स हैं, जिनके पास टाटा संस की करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी है और जो इसे निजी कंपनी बनाए रखना चाहते हैं.
इन दोनों के बीच आरबीआई का एक फैसला, बोर्ड का एक मतदान, चेयरमैन का दूसरा कार्यकाल और वह सवाल है, जिसे मुंबई के डिनर टेबलों पर वर्षों से बेहद शालीनता से टाला जाता रहा है: क्या टाटा संस को सूचीबद्ध होना चाहिए?
यह कहानी लिस्टिंग की नहीं है. यह इस बारे में है कि किसे इसकी जरूरत है, किसे नहीं है और जब यह फैसला लिया जाता है तो मेज के आसपास कौन बैठता है. मुंबई के कॉरपोरेट जंगल में कमरे में मौजूद लोग शायद ही कभी अजनबी होते हैं. यह किसी साजिश का चार्ट नहीं है और किसी पर डोर खींचने का आरोप लगाने की जरूरत नहीं है. डोर पहले से दिखाई दे रहे हैं.
18%
शुरुआत पैसे से करते हैं.
एसपी ग्रुप की हिस्सेदारी स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन और साइरस इन्वेस्टमेंट्स के जरिए रखी गई है और इसे कर्ज के बदले गिरवी रखा गया है.
इस गिरवी का लंबा इतिहास है. 2020 में समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी पर करीब 9,280 करोड़ रुपये का बाहरी कर्ज था, जबकि पूरे समूह का कर्ज 30,000 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया था. उसी साल खबरें आई थीं कि रतन टाटा मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी खरीदने के लिए किसी साझेदार की तलाश कर रहे थे और एसपी ग्रुप ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि 70 साल से अधिक समय बाद अब टाटा समूह से अलग होने का समय आ गया है. तब भी बाधा स्पष्ट थी. एक प्रॉक्सी एडवाइजर ने कहा था कि टाटा समूह को कोई जल्दबाजी नहीं थी, जबकि एसपी ग्रुप को पैसों की सख्त जरूरत थी.
यह अलगाव कभी नहीं हुआ.
कर्ज भी खत्म नहीं हुआ. 2022 में एरेस एसएसजी और फैरालॉन ने टाटा संस के शेयरों के बदले समूह को 15,000 करोड़ रुपये तक का कर्ज देने पर सहमति जताई, जिसकी ब्याज दर 24% सालाना थी. इसका इस्तेमाल भारतीय बैंकों का कर्ज चुकाने के लिए किया जाना था. इस जुलाई में समूह ने 21,500 करोड़ रुपये का पुनर्वित्त पूरा किया और निवेशकों को बताया कि वह 18 महीनों के भीतर लिस्टिंग या शेयर बिक्री के जरिए टाटा संस की अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को नकदी में बदल देगा.
यही केंद्रीय तनाव है. एसपी ग्रुप को नकदी चाहिए. टाटा ट्रस्ट्स लिस्टिंग नहीं चाहते.
बाहर निकलने का शांत रास्ता एक छोटी बिक्री थी. एसपी ग्रुप ने नोएल टाटा के साथ टाटा संस की करीब 2.5% हिस्सेदारी बेचने पर चर्चा की थी. इसके लिए बैंक या वित्तीय संस्थान को शामिल करते हुए कर-कुशल ढांचे का इस्तेमाल किया जाना था. इससे मिलने वाली रकम धीरे-धीरे एसपी ग्रुप तक पहुंचती और टाटा संस शायद पूरी तरह लिस्टिंग से बच जाता. यह प्रस्ताव टाटा संस में अटक गया और आरबीआई के निर्देश के बाद ही बोर्ड तक पहुंचा, जिसने लिस्टिंग को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया.
यहीं से कहानी व्यक्तिगत हो जाती है. 17 सितंबर को टाटा संस की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने मिस्त्री परिवार को एक प्रस्ताव दिया: टाटा संस उनके इतने शेयर वापस खरीद लेगा कि उन्हें कम से कम 25,000 करोड़ रुपये मिल जाएं. यह भुगतान 18 महीनों में दो किस्तों में किया जाता. परिवार को उसका पैसा मिल जाता. टाटा संस निजी कंपनी बना रहता. ट्रस्ट्स का नियंत्रण कायम रहता.
नोएल टाटा उन ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं जो लिस्टिंग का विरोध करते हैं. वह साइरस मिस्त्री की बहन से विवाहित भी हैं. उनका प्रस्ताव एक साथ दोनों परिवारों को संतुष्ट करने की कोशिश था. मिस्त्री परिवार पहले ही अपना मन बना चुका था: छोटी हिस्सेदारी की बिक्री में देरी के बाद उसने लिस्टिंग के पक्ष में आना चुना, जिससे वह अपनी हिस्सेदारी को नकदी में बदल सकता था और अपने कर्ज को आसानी से संभाल सकता था. बोर्ड ने उसी दिन नोएल को जवाब दिया और लिस्टिंग के पक्ष में मतदान किया.
इसके बाद आने वाला हर संबंध उसी 18% हिस्सेदारी तक पहुंचता है.
बिक्री से पहले की बिक्री
18% हिस्सेदारी पहली एसपी संपत्ति नहीं है जिसे खरीदार की जरूरत पड़ी, और आखिरी बड़ा खरीदार एक जाना-पहचाना नाम था.
अक्टूबर 2021 में रिलायंस की एक सहायक कंपनी ने शापूरजी पालोनजी एंड कंपनी, दारूवाला परिवार और स्टर्लिंग एंड विल्सन सोलर के साथ चरणबद्ध तरीके से सोलर कंपनी में 40% हिस्सेदारी खरीदने पर सहमति जताई. कर्ज कम करने के लिए यह एक महीने में एसपी ग्रुप की दूसरी बड़ी संपत्ति बिक्री थी. इससे पहले यूरेका फोर्ब्स को एडवेंट इंटरनेशनल ने 4,400 करोड़ रुपये में खरीदा था.
शापूर मिस्त्री ने रिलायंस का कंपनी में स्वागत किया.
जिस कर्ज का बोझ अब 18% हिस्सेदारी पर है, उसी ने पहले भी एसपी की संपत्तियों को बिक्री के लिए बाजार में पहुंचाया था और रिलायंस पहले ही एक खरीदार बन चुका था.
शादियां
मुंबई के कारोबारी परिवार सिर्फ एक-दूसरे के साथ कारोबार नहीं करते. वे एक-दूसरे के परिवारों में भी शादी करते हैं.
नोएल टाटा की पत्नी आलू, साइरस मिस्त्री की बहन हैं. इसका मतलब है कि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन उस परिवार के बहनोई हैं, जिसके पास 18% हिस्सेदारी है. इसका मतलब यह भी है कि वह साइरस के बेटों, फिरोज और जहान के मामा हैं, जिन्हें मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी में साइरस का आधा हिस्सा विरासत में मिला. ट्रस्ट्स की लिस्टिंग के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति उन युवा वारिसों का मामा है, जिन्हें लिस्टिंग से फायदा होने की संभावना है.
अजय पीरामल के बेटे आनंद ने 2018 में ईशा अंबानी से शादी की, जिससे मुकेश अंबानी और अजय पीरामल समधी बन गए. यहां यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद के वर्षों में पीरामल कहां रहे.
और करण अडानी ने पारिधि श्रॉफ से शादी की, जो सिरिल श्रॉफ की बेटी हैं. सिरिल श्रॉफ की लॉ फर्म अब 18% हिस्सेदारी के भविष्य को लेकर चल रही लड़ाई में टाटा ट्रस्ट्स को सलाह दे रही है.
बोर्डरूम
2016 में टाटा ने घोषणा की कि अजय पीरामल और वेणु श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड में गैर-कार्यकारी निदेशक के रूप में शामिल हुए हैं. पीरामल को 2019 में दूसरा तीन साल का कार्यकाल मिला. वर्षों तक मुकेश अंबानी की बेटी के ससुर उस बोर्ड में बैठे रहे, जिसे एक दिन 18% हिस्सेदारी के साथ क्या करना है, यह तय करना था.
टीवीएस के चेयरमैन श्रीनिवासन इस सवाल के दोनों पक्षों में हैं. वह टाटा संस बोर्ड में ट्रस्ट्स के नामित सदस्य और टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी हैं. पिछले अक्टूबर में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने उनके ट्रस्टी पद का नवीनीकरण किया और उन्हें आजीवन ट्रस्टी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया. जब लिस्टिंग के लिए मतदान हुआ, तो वही व्यक्ति अपने चेयरमैन से अलग जाकर वोट करने वाला था.
पुराने दोस्त
कुछ रिश्ते कभी शेयरधारकों के रजिस्टर में दिखाई नहीं देते, लेकिन फिर भी यह तय करते हैं कि कौन किसके साथ खड़ा है.
जब सितंबर 2022 में एक सड़क दुर्घटना में साइरस मिस्त्री की मौत हुई, तो शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने ट्वीट किया कि उनके भाई साइरस का निधन हो गया. द ट्रिब्यून ने उन्हें उन कुछ लोगों में बताया जो बोर्डरूम की लड़ाई के दौरान उनके साथ खड़े रहे थे और सबसे पहले शोक व्यक्त करने वालों में शामिल थीं.
फिर हैं मेहली मिस्त्री, जो साइरस के फर्स्ट कजिन हैं और रतन टाटा के करीबी विश्वासपात्र बने तथा उनके अंतिम वर्षों में उनकी देखभाल में मदद की. अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद मेहली को वकील डेरियस खंबाटा और टाटा की सौतेली बहनों, शिरीन और डियाना जेजीभॉय के साथ उनकी वसीयत का एक्जीक्यूटर बनाया गया.
खंबाटा, जो महाराष्ट्र के पूर्व एडवोकेट जनरल रह चुके हैं, ने कभी रतन टाटा और साइरस मिस्त्री के बीच मध्यस्थता की थी, जैसा कि बिजनेसवर्ल्ड ने रिपोर्ट किया था. जुलाई में खबरें आई थीं कि नवंबर में उनका ट्रस्टी कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह हट सकते हैं. लेकिन पिछले साल ट्रस्ट्स को लिखे एक पत्र में उन्होंने एक ऐसे पल को याद किया, जो अब एक त्रासदी की शुरुआत जैसा लगता है: रतन टाटा की मौत के बाद मेहली मिस्त्री ने नोएल टाटा को ट्रस्ट्स का चेयरमैन बनाने का प्रस्ताव रखा और खंबाटा ने इसका समर्थन किया.
एक साल बाद नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने मेहली की दो प्रमुख ट्रस्ट्स में पुनर्नियुक्ति का विरोध किया, जो टाटा संस की बहुमत हिस्सेदारी को नियंत्रित करती हैं. मेहली का कार्यकाल समाप्त हो गया. जिस व्यक्ति ने नोएल का नाम प्रस्तावित किया था, उसे नोएल के वोट के साथ ही बाहर कर दिया गया.
आरबीआई की मेज
लिस्टिंग की लड़ाई अपने मौजूदा चरण तक पहुंचने से बहुत पहले वही कॉरपोरेट दुनिया रिजर्व बैंक की केंद्रीय मेज पर मौजूद थी.
जब एस. गुरुमूर्ति 2018 में आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए, तब एन चंद्रशेखरन पहले से ही सदस्य थे. गुरुमूर्ति चेन्नई के चार्टर्ड अकाउंटेंट, तमिल साप्ताहिक तुगलक के संपादक और व्यापक रूप से आरएसएस के प्रमुख विचारक के रूप में जाने जाते हैं. कुछ महीने बाद शक्तिकांत दास गवर्नर बने. भुवनेश्वर में जन्मे दास ने अपने आईएएस करियर का बड़ा हिस्सा तमिलनाडु कैडर में बिताया था, जिसमें राज्य के उद्योग विभाग के प्रधान सचिव के रूप में काम करना भी शामिल था. 2022 में सरकार ने आनंद महिंद्रा, वेणु श्रीनिवासन, पंकज पटेल और रवींद्र ढोलकिया को बोर्ड में शामिल किया. इससे एक और चेन्नई के उद्योगपति और टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी इस मेज पर आ गए.
दास ने दिसंबर 2024 में मिंट स्ट्रीट छोड़ी और अब प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव-2 के रूप में कार्यरत हैं. टाटा संस के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैसला बाद में उनके उत्तराधिकारी के कार्यकाल में आया, जब आरबीआई ने टाटा संस को अपना पंजीकरण छोड़ने और उस नियम से बचने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जिसके तहत उसे सूचीबद्ध होना जरूरी है.
वकील
मुंबई का कानूनी जगत इससे भी छोटा है.
सिरिल श्रॉफ, जिन्होंने अंबानी से लेकर अडानी तक भारत के ज्यादातर अरबपति परिवारों को सलाह दी है, व्यक्तिगत रूप से नोएल टाटा और ट्रस्ट्स को सलाह दे रहे हैं. उनकी टीम में भारत वासनी भी हैं, जो 17 वर्षों से अधिक समय से टाटा संस के ग्रुप जनरल काउंसल हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता अस्पी चिनॉय, जनक द्वारकादास, अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी के भी इसी पक्ष में रहने की खबर है.
दूसरी ओर शुभा मंडल हैं. सिरिल श्रॉफ के भाई द्वारा संचालित शार्दुल अमरचंद मंगलदास में उन्होंने 2016 में साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के समय टाटा संस को सलाह दी थी और बाद में समूह के जनरल काउंसल बने. इससे पहले AZB & Partners में उनके ग्राहकों में रिलायंस शामिल था. उनकी फर्म एनाग्राम पार्टनर्स अब टाटा संस और चंद्रशेखरन का प्रतिनिधित्व करती है.
फिर हरीश साल्वे हैं, जो वर्षों से रिलायंस की ओर से पेश होते रहे हैं और साइरस मिस्त्री के खिलाफ टाटा संस की ओर से दलीलें दे चुके हैं. अब वह टाटा संस और चंद्रा को सलाह देते हैं और सार्वजनिक रूप से यह तर्क दे चुके हैं कि टाटा संस को एक सार्वजनिक कंपनी बनना चाहिए, जो वही नतीजा है जिसे 18% हिस्सेदारी रखने वाले परिवार अब चाहते हैं.
इस तरह दो भाई ऐसी प्रतिद्वंद्वी फर्में चलाते हैं जो एक ही बोर्डरूम में एक-दूसरे के विरोधी पक्षों में रह चुकी हैं. टाटा के दो पूर्व जनरल काउंसल विरोधी खेमों को सलाह दे रहे हैं. ट्रस्ट्स के वकील अडानी परिवार के समधी हैं और टाटा संस के वकीलों के रिज्यूमे में रिलायंस भी है.
मतदान
17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 से पांच और वर्षों के लिए कार्यकारी चेयरमैन के रूप में फिर से नियुक्त करने और लिस्टिंग की दिशा में कदम उठाने के पक्ष में 4-1 से मतदान किया.
नोएल टाटा ने दोनों प्रस्तावों के खिलाफ वोट किया, जबकि ट्रस्ट्स के दूसरे नामित सदस्य वेणु श्रीनिवासन ने पक्ष में मतदान किया. ट्रस्ट्स के अपने निदेशक भी बंट गए. इसके बाद ट्रस्ट्स ने मतदान को अमान्य घोषित कर दिया और तर्क दिया कि उनके नामित सदस्यों की सकारात्मक मंजूरी जरूरी थी.
पांच दिन बाद शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से ट्रस्ट्स का समर्थन किया और कहा कि उनके अधिकारों और समूह के धर्मार्थ स्वामित्व की रक्षा की जानी चाहिए. जिस परिवार ने साइरस मिस्त्री को भाई की तरह शोक मनाया था, वही अब उस ट्रस्ट्स का बचाव कर रहा था, जिसके चेयरमैन उनके बहनोई हैं, जबकि साइरस का अपना परिवार उस लिस्टिंग के पक्ष में था, जिसका ट्रस्ट्स विरोध कर रहे थे. पवार की राजनीति एक अलग कहानी है. और वह अच्छी तरह जानते हैं कि मौजूदा सरकार शायद उससे बिल्कुल उलट चाहती हो, जिसका वह प्रस्ताव कर रहे हैं.
घटनाक्रम
पूरी समयरेखा को एक साथ रखने पर यह अपने आप में एक कहानी बताती है.
2016: साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाया गया. अजय पीरामल और वेणु श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड में शामिल हुए.
2018: गुरुमूर्ति आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए, जहां चंद्रशेखरन पहले से सदस्य थे. शक्तिकांत दास गवर्नर बने. ईशा अंबानी ने आनंद पीरामल से शादी की.
2020: एसपी ग्रुप ने कहा कि अब टाटा से अलग होने का समय आ गया है. खबरों के मुताबिक रतन टाटा मिस्त्री परिवार की हिस्सेदारी के लिए खरीदार की तलाश कर रहे थे.
2021: रिलायंस ने एसपी की स्टर्लिंग एंड विल्सन सोलर में हिस्सेदारी खरीदी.
2022: एसपी ग्रुप ने टाटा संस के शेयरों के बदले 24% ब्याज पर कर्ज लिया. वेणु श्रीनिवासन आरबीआई बोर्ड में शामिल हुए. साइरस मिस्त्री की मौत हुई.
अक्टूबर 2024: रतन टाटा का निधन हुआ. मेहली मिस्त्री के प्रस्ताव और डेरियस खंबाटा के समर्थन से नोएल टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन बने.
अक्टूबर 2025: मेहली मिस्त्री को ट्रस्ट्स से बाहर कर दिया गया.
जुलाई 2026: एसपी ग्रुप ने 21,500 करोड़ रुपये का पुनर्वित्त पूरा किया और 18 महीनों के भीतर टाटा संस की अपनी हिस्सेदारी को नकदी में बदलने का वादा किया.
सितंबर 2026: आरबीआई ने टाटा संस की डीरजिस्ट्रेशन की कोशिश को खारिज कर दिया. एसपी ग्रुप ने लिस्टिंग का समर्थन किया. नोएल टाटा ने 25,000 करोड़ रुपये के बायबैक का प्रस्ताव दिया. बोर्ड ने चंद्रशेखरन को 4-1 से फिर नियुक्त किया, जिसमें नोएल ने विरोध किया और वेणु ने समर्थन किया. ट्रस्ट्स ने मतदान को अमान्य घोषित कर दिया. शरद पवार ने ट्रस्ट्स का समर्थन किया.
संबंध साफ दिखाई देते हैं
क्या यह सिर्फ एक जटिल स्वामित्व ढांचे की वह प्रक्रिया थी, जो आखिरकार नियमन से टकरा गई? या मेज के आसपास मौजूद लोगों के पास 18% हिस्सेदारी के भविष्य को लेकर बिल्कुल अलग विचार थे?
रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं दिखता कि किसी ने कुछ योजना बनाई थी और ये संबंध हर दिशा में फैले हुए हैं. ट्रस्ट्स के अपने नामित सदस्यों ने अलग-अलग वोट दिए. ट्रस्ट्स के चेयरमैन ने अपने रिश्तेदारों को ऐसा रास्ता दिया, जिससे टाटा संस निजी बनी रहती; उन्होंने बाजार का रास्ता चुना. पवार परिवार ने एक मिस्त्री के निधन पर शोक जताया और ट्रस्ट्स का समर्थन किया. वकीलों ने सभी के लिए काम किया है.
18% हिस्सेदारी का पीछा कीजिए और यह आपको मुंबई के आधे से अधिक अभिजात कारोबारी वर्ग तक ले जाती है: उनकी शादियों, उनके बोर्डरूम, उनके केंद्रीय बैंक, उनकी अदालतों और उनके अंतिम संस्कारों तक.
क्लब छोटा है. हिस्सेदारी बड़ी है. और ये संबंध हमेशा से सबके सामने रहे हैं. टाटा क्लब उन वंशानुगत कारोबारी अभिजात वर्ग की कहानी है, जिनके हाथों में सारी ताकत है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
SEBI ने REIT और InvIT की यूनिट्स पर डिपॉजिटरी रिसीट जारी करने की भी मंजूरी दी है. इसका उद्देश्य इन निवेश साधनों में विदेशी पूंजी की भागीदारी बढ़ाने से जुड़ा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) से जुड़े नियमों में कई अहम बदलावों को मंजूरी दी है. इसके तहत PMS कंपनियां अब पोर्टफोलियो मैनेजर रूट फॉर इन्वेस्टमेंट इन म्यूचुअल फंड्स (PRIM) के जरिए ग्राहकों का पैसा म्युचुअल फंड की डायरेक्ट योजनाओं और स्पेशलाइज्ड इनवेस्टमेंट फंड (SIF) में लगा सकेंगी. इसके अलावा नियामकीय मामलों के सेटलमेंट, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI), PMS के निवेश विकल्पों और विज्ञापन नियमों में भी बदलाव किए गए हैं.
PMS के जरिए म्युचुअल फंड में निवेश का विकल्प
SEBI ने म्युचुअल फंड यूनिट्स में निवेश के लिए पोर्टफोलियो मैनेजर रूट यानी PRIM शुरू करने की मंजूरी दी है. इसके तहत मौजूदा PMS कंपनियां इसे अलग निवेश रणनीति के रूप में पेश कर सकेंगी और ग्राहकों की ओर से म्युचुअल फंड की डायरेक्ट योजनाओं तथा SIF में निवेश कर सकेंगी.
PRIM के तहत न्यूनतम निवेश सीमा 25 लाख रुपये तय की गई है. इससे बड़ी रकम निवेश करने वाले निवेशकों के लिए PMS के जरिए म्युचुअल फंड योजनाओं में निवेश का एक नया विकल्प उपलब्ध होगा.
स्वतंत्र फंड मैनेजर की नई कैटेगरी
SEBI ने इंडिपेंडेंट फंड मैनेजर यानी स्वतंत्र फंड मैनेजर की नई श्रेणी को भी मंजूरी दी है. ये फंड मैनेजर किसी रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर के साथ मिलकर ग्राहकों के पोर्टफोलियो का प्रबंधन कर सकेंगे. इसके लिए निवेशकों के हितों की सुरक्षा से जुड़ी निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा.
इसके अलावा डिस्क्रिशनरी PMS को ग्राहक की सहमति से उसके कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) का अधिकतम 10 फीसदी हिस्सा बेहतर क्रेडिट रेटिंग वाली अनलिस्टेड डेट सिक्योरिटीज में निवेश करने की अनुमति होगी.
PMS कंपनियां IPO, प्राइमरी मार्केट में जारी होने वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स और एक्सचेंज पर कारोबार करने वाले डेरिवेटिव्स में भी निवेश कर सकेंगी. SEBI ने PMS से जुड़े नियमों की भाषा को सरल बनाने और अप्रासंगिक प्रावधानों को हटाने का भी फैसला किया है.
SEBI मामलों के सेटलमेंट की प्रक्रिया बदली
SEBI ने नियामकीय मामलों को सेटलमेंट यानी समझौते के जरिए निपटाने से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया है. नए नियमों के तहत कारण बताओ नोटिस जारी करने से पहले संबंधित कंपनी या व्यक्ति को सेटलमेंट नोटिस दिया जाएगा. इसके बाद सेटलमेंट के लिए आवेदन करने को 60 दिन का समय मिलेगा. हालांकि, ऐसे मामले जिनमें अंतरिम आदेश जारी होने की संभावना हो, इस सुविधा के दायरे में नहीं आएंगे.
वित्तीय विवरण में गलत जानकारी देने या कंपनी के फंड को दूसरी जगह भेजने से जुड़े मामलों को भी सेटलमेंट के दायरे में शामिल किया गया है. सेटलमेंट राशि तय करने के लिए नया फॉर्मूला बनाया जाएगा, जबकि गलत तरीके से हुई कमाई को अलग आधार पर देखा जाएगा. डिस्क्लोजर से जुड़े छोटे मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट की सुविधा भी शुरू की जाएगी. यह उन मामलों में उपलब्ध होगी, जिनमें समझौता राशि 10 लाख रुपये तक होगी.
FPI को कमोडिटी डेरिवेटिव्स में निवेश की अनुमति
SEBI ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को गैर-कृषि कमोडिटी इंडेक्स डेरिवेटिव्स में निवेश की अनुमति देने का फैसला किया है. वे ऐसे गैर-कृषि कमोडिटी सौदों में भी हिस्सा ले सकेंगे, जिनका निपटारा नकदी के बजाय अन्य तरीके से होता है. हालांकि, वास्तविक डिलिवरी की जिम्मेदारी आने से पहले उन्हें अपनी पोजीशन बंद करनी होगी.
इसके अलावा SEBI ने REIT और InvIT की यूनिट्स पर डिपॉजिटरी रिसीट जारी करने की भी मंजूरी दी है. इसका उद्देश्य इन निवेश साधनों में विदेशी पूंजी की भागीदारी बढ़ाने से जुड़ा है.
विज्ञापन नियमों में भी बदलाव
SEBI ने कुछ पंजीकृत संस्थाओं के लिए एक समान विज्ञापन संहिता को मंजूरी दी है. इसके तहत ब्रांड या संस्था के प्रचार के लिए मशहूर हस्तियों का इस्तेमाल किया जा सकेगा. कई तरह के विज्ञापनों के लिए पहले से मंजूरी लेने की अनिवार्यता भी हटाई जाएगी. हालांकि, मशहूर हस्तियों वाले विज्ञापनों के लिए पूर्व मंजूरी की शर्त जारी रहेगी.
इसके अलावा SEBI ने रिसर्च एनालिस्ट और रिसर्च संस्थाओं को संस्थागत ग्राहकों के साथ हुई बातचीत की कॉल रिकॉर्डिंग रखने की अनिवार्यता से राहत दी है. वॉल्ट मैनेजर, REIT, InvIT और पहली बार सूचीबद्ध बॉन्ड जारी करने वाली कंपनियों से जुड़े कुछ नियमों में भी बदलाव किए गए हैं.
बैंक द्वारा ऑफलाइन भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी. इसके लिए ग्राहक बैंक की किसी भी शाखा में जाकर चेक, डिमांड ड्राफ्ट या नकद के जरिए टैक्स का भुगतान कर सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
IDFC फर्स्ट बैंक ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन के लिए अपने पेमेंट गेटवे का इंटीग्रेशन पूरा कर लिया है. इसके साथ ही देशभर के करदाता अब कई डिजिटल और ऑफलाइन माध्यमों से सीधे टैक्स का भुगतान कर सकेंगे.
बैंक के मुताबिक, करदाता डायरेक्ट टैक्स जमा करने के लिए UPI, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और IDFC FIRST Bank की रिटेल व कॉरपोरेट इंटरनेट बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं. ऑफलाइन भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध है. इसके लिए ग्राहक बैंक की किसी भी शाखा में जाकर चेक, डिमांड ड्राफ्ट या नकद के जरिए टैक्स का भुगतान कर सकते हैं.
दूसरे बैंकों के ग्राहक भी कर सकेंगे भुगतान
इस सुविधा का लाभ केवल IDFC FIRST Bank के ग्राहकों तक सीमित नहीं है. दूसरे बैंकों के ग्राहक भी बैंक के पेमेंट गेटवे के जरिए डायरेक्ट टैक्स का भुगतान कर सकते हैं. इसके लिए वे अपने संबंधित बैंक की इंटरनेट बैंकिंग सुविधा का इस्तेमाल कर सकेंगे.
बैंक के अनुसार, पेमेंट पूरा होने के बाद करदाताओं को चालान और पेमेंट कन्फर्मेशन डाउनलोड करने की सुविधा भी मिलेगी. इससे अलग-अलग बैंकिंग सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले करदाताओं के लिए डायरेक्ट टैक्स भुगतान की प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकेगा.
ग्राहकों को भुगतान के विकल्प में मिलेगी सुविधा
IDFC फर्स्ट बैंक के हेड-रिटेल लाइबिलिटीज, कार्ड्स एंड पेमेंट्स, शिरीष भंडारी ने कहा, "ग्राहक आज भुगतान के तरीके को लेकर लचीलापन और विकल्प चाहते हैं. इस इंटीग्रेशन के साथ करदाता अपनी पसंद के माध्यम से टैक्स का भुगतान कर सकते हैं, चाहे वह UPI, इंटरनेट बैंकिंग, डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड हो. यह ग्राहक-केंद्रित डिजिटल बैंकिंग समाधान तैयार करने की हमारी प्रतिबद्धता की दिशा में एक और कदम है."
IDFC फर्स्ट बैंक CBDT की ओर से डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन के लिए अधिकृत निजी क्षेत्र के बैंकों में शामिल है. बैंक के अनुसार, वह डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के साथ व्यक्तिगत ग्राहकों और कारोबारों की जरूरतों के अनुरूप बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने पर काम कर रहा है.
ऐसे कर सकेंगे डायरेक्ट टैक्स का भुगतान
1. सबसे पहले इनकम टैक्स ई-फाइलिंग पोर्टल पर लॉगिन करें.
2. चालान बनाकर "Payment Gateway" विकल्प चुनें.
3. भुगतान के विकल्प के तौर पर *IDFC FIRST Bank* चुनें.
4. UPI, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड या इंटरनेट बैंकिंग में से पसंदीदा माध्यम चुनकर भुगतान पूरा करें.
5. भुगतान पूरा होने के बाद चालान डाउनलोड या प्रिंट कर लें और भविष्य के संदर्भ के लिए सुरक्षित रखें.
सेक्स 1,247.71 अंक यानी 1.67 फीसदी टूटकर 73,580.54 पर आ गया, जबकि निफ्टी 383.70 अंक यानी 1.64 फीसदी गिरकर 23,063.10 के स्तर पर बंद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार को भारी बिकवाली के चलते सेंसेक्स और निफ्टी 1.6 फीसदी से ज्यादा की गिरावट के साथ बंद हुए. सेंसेक्स 1,247.71 अंक यानी 1.67 फीसदी टूटकर 73,580.54 पर आ गया, जबकि निफ्टी 383.70 अंक यानी 1.64 फीसदी गिरकर 23,063.10 के स्तर पर बंद हुआ. बाजार में इस तेज गिरावट से निवेशकों की संपत्ति करीब 4.02 लाख करोड़ रुपये घट गई. वैश्विक बाजारों में दबाव के साथ अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, ब्याज दरों को लेकर बढ़ती चिंता, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और रुपये में कमजोरी ने घरेलू बाजार के सेंटीमेंट को प्रभावित किया.
30 में 29 सेंसेक्स शेयर लाल निशान में
गुरुवार को सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 29 गिरावट के साथ बंद हुए. बजाज फाइनेंस 5.47 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे ज्यादा नुकसान में रहा. इसके अलावा एक्सिस बैंक 4.67 फीसदी, बजाज फिनसर्व 4.06 फीसदी, इंडिगो 2.78 फीसदी और ट्रेंट 2.75 फीसदी टूटे. एनटीपीसी लगभग सपाट रहा और इसमें 0.00 फीसदी की मामूली बढ़त दर्ज की गई.
निफ्टी पर एचडीएफसी लाइफ सबसे ज्यादा टूटा
निफ्टी के शेयरों में एचडीएफसी लाइफ 6.16 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे ज्यादा नुकसान में रहा. बजाज फाइनेंस 5.87 फीसदी, एक्सिस बैंक 4.56 फीसदी, बजाज फिनसर्व 4.56 फीसदी और अडानी एंटरप्राइजेज 3.11 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए. दूसरी ओर, सिप्ला 1.16 फीसदी और ओएनजीसी 0.89 फीसदी की बढ़त में रहे, जबकि एनटीपीसी 0.18 फीसदी चढ़ा.
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल से बाजार पर दबाव
बाजार में गिरावट की प्रमुख वजहों में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी रही. अमेरिका में सितंबर की बिजनेस एक्टिविटी से जुड़े आंकड़ों के बाद 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 2007 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई. बेंचमार्क 10 साल की यील्ड 13.89 बेसिस प्वाइंट बढ़कर 5.106 फीसदी हो गई. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी से वैश्विक निवेशकों के लिए अमेरिकी डेट इंस्ट्रूमेंट्स का आकर्षण बढ़ सकता है. इससे इक्विटी बाजारों में निवेश पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है.
फेड की ब्याज दरों को लेकर बढ़ी चिंता
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर भी बाजार में चिंता बढ़ी. फेड फंड्स फ्यूचर्स के अनुसार, अक्टूबर में ब्याज दर बढ़ने की संभावना 66 फीसदी तक पहुंच गई, जबकि दिन की शुरुआत में यह करीब 53 फीसदी थी. दरों में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ने से वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति मजबूत हुई.
कच्चे तेल की कीमतें 102 डॉलर के पार
कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेजी ने भी घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ाया. तेल की कीमतें 102 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं. ईरान और अमेरिका के बीच तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण तेल बाजार में चिंता बढ़ी है.
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी से देश के आयात बिल और मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ सकता है.
रुपये में भी कमजोरी
बाजार में बिकवाली के बीच रुपया भी कमजोर हुआ. रुपया डॉलर के मुकाबले 95.96 के स्तर तक फिसल गया, जो 17 सितंबर के बाद इसका सबसे कमजोर स्तर था. कारोबार के अंत में रुपया 95.9550 प्रति डॉलर पर बंद हुआ.
निवेशकों की संपत्ति ₹4.02 लाख करोड़ घटी
शेयर बाजार में तेज गिरावट के बीच निवेशकों की संपत्ति 4,02,173.32 करोड़ रुपये घट गई. गुरुवार को सेंसेक्स 74,272.40 के स्तर पर खुला था, जबकि निफ्टी 23,221.80 पर खुला. कारोबार के दौरान बिकवाली बढ़ने के साथ दोनों प्रमुख सूचकांक लगातार दबाव में रहे और 1.6 फीसदी से ज्यादा की गिरावट के साथ बंद हुए.
आज इन शेयरों पर रहेगी नजर
25 सितंबर के कारोबार में PB Fintech, Inox Green Energy Services, Dr Lal PathLabs, JSW Cement और Bharat Dynamics समेत कई शेयर कंपनी-विशेष खबरों के चलते फोकस में रह सकते हैं. PB Fintech के शेयर में 24 सितंबर को करीब 36 फीसदी की तेज गिरावट आई थी. यह गिरावट IRDAI की इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन की कमाई और कमीशन व्यवस्था में प्रस्तावित बदलावों से जुड़ी चिंताओं के बीच आई.
Inox Green Energy Services ने QIP शुरू किया है और इसके लिए ₹174.36 प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है. वहीं, Dr Lal PathLabs ने जीनोमिक्स डायग्नोस्टिक्स कंपनी SN Genelab में 70 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने को मंजूरी दी है. कंपनी का FY26 टर्नओवर ₹57.96 करोड़ रहा था.
JSW Cement भी क्षमता विस्तार और लागत दक्षता से जुड़े अपडेट्स के चलते बाजार की नजर में रह सकता है. दूसरी ओर, Bharat Dynamics ने रक्षा मंत्रालय के साथ भारतीय वायुसेना के लिए SAT-SAAW और संबंधित उपकरणों की सप्लाई के लिए ₹810.79 करोड़ का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
क्रूड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई है, जबकि क्रूड सूरजमुखी तेल पर इसे 10 फीसदी से घटाकर शून्य कर दिया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
त्योहारी सीजन से पहले खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने क्रूड और रिफाइंड खाद्य तेलों के आयात पर बेसिक कस्टम ड्यूटी में कटौती की है. क्रूड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई है, जबकि क्रूड सूरजमुखी तेल पर इसे 10 फीसदी से घटाकर शून्य कर दिया गया है. सरकार के इस फैसले से आयातित खाद्य तेल की लागत कम होने और घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव घटने की उम्मीद है.
कुछ क्रूड तेलों पर ड्यूटी आधी
केंद्रीय वित्त मंत्रालय की ओर से जारी गजट नोटिफिकेशन के मुताबिक, क्रूड सोयाबीन और क्रूड पाम ऑयल के आयात पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई है. इसका मतलब है कि बिना रिफाइन किए गए इन तेलों का आयात पहले के मुकाबले सस्ता होगा. वहीं, क्रूड सूरजमुखी तेल के मामले में सरकार ने इससे भी बड़ी कटौती की है. इस पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10 फीसदी से घटाकर शून्य कर दी गई है. इससे सूरजमुखी तेल के आयातकों की लागत में कमी आने की संभावना है.
रिफाइंड तेल पर भी शुल्क घटा
सरकार ने केवल क्रूड तेलों पर ही राहत नहीं दी है, बल्कि रिफाइंड खाद्य तेलों पर भी कस्टम ड्यूटी कम की है. रिफाइंड सोयाबीन और रिफाइंड पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 32.5 फीसदी से घटाकर 27.5 फीसदी कर दी गई है. यानी इन दोनों तेलों के आयात पर ड्यूटी में 5 प्रतिशत अंक की कमी हुई है.
इसी तरह रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 32.5 फीसदी से घटाकर 22.5 फीसदी कर दी गई है. यानी यहां भी ड्यूटी में 10 प्रतिशत अंक की कटौती हुई है.
खाद्य तेल पहले बेसिक कस्टम ड्यूटी अब बेसिक कस्टम ड्यूटी
क्रूड सोयाबीन ऑयल 10% 5%
क्रूड पाम ऑयल 10% 5%
क्रूड सूरजमुखी ऑयल 10% 0%
रिफाइंड सोयाबीन ऑयल 32.5% 27.5%
रिफाइंड पाम ऑयल 32.5% 27.5%
रिफाइंड सूरजमुखी ऑयल 32.5% 22.5%
24 सितंबर से लागू होगी नई दर
गजट नोटिफिकेशन के अनुसार, कस्टम ड्यूटी में की गई यह कटौती 24 सितंबर 2026 से प्रभावी होगी. भारत खाद्य तेलों की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर है. ऐसे में आयात शुल्क कम होने से खाद्य तेल की लैंडेड लागत में कमी आ सकती है.
इसका असर घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ सकता है. हालांकि, उपभोक्ताओं को मिलने वाली वास्तविक राहत इस बात पर भी निर्भर करेगी कि आयात लागत में कमी का कितना हिस्सा कंपनियां और कारोबारी आगे कीमतों में पास करते हैं. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे खाद्य तेल की कीमतें, रुपये की विनिमय दर और वैश्विक आपूर्ति भी घरेलू कीमतों को प्रभावित करती हैं.
त्योहारों से पहले आया फैसला
सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार नजदीक हैं. इन त्योहारों के दौरान खाद्य तेल की मांग आमतौर पर बढ़ जाती है. ऐसे में आयात लागत कम होने से बाजार में कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है.
इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IVPA) के अध्यक्ष सुधाकर देसाई ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि कुछ खाद्य तेलों के आयात पर सीमा शुल्क में कटौती महत्वपूर्ण समय पर की गई है. उनके मुताबिक, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आने वाले हैं और इस कदम से क्रूड ऑयल के आयातकों को राहत मिलेगी.
महंगाई पर भी पड़ सकता है असर
खाद्य तेल घरेलू खाद्य महंगाई की अहम कड़ी है. आयात शुल्क में कमी से आयातित तेल की लागत कम होने पर घरेलू बाजार में कीमतों को राहत मिल सकती है. इसका असर खाद्य मुद्रास्फीति पर भी पड़ने की संभावना है.
हालांकि, कस्टम ड्यूटी में कटौती का पूरा फायदा उपभोक्ताओं तक कितनी जल्दी पहुंचेगा, यह अंतरराष्ट्रीय कीमतों और घरेलू बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. फिलहाल सरकार के इस कदम से त्योहारी सीजन में खाद्य तेल की उपलब्धता और कीमतों को लेकर कुछ राहत की उम्मीद बढ़ी है.