RBI ने साफ किया है कि Crypto कोई मुद्रा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक मुद्रा को केंद्रीय बैंक या सरकार द्वारा जारी किया जाना आवश्यक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
नई दिल्ली: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का मानना है कि क्रिप्टोकरेंसी को देश में बैन कर दिया जाए. ये बताया है देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने. वित्त मंत्री ने सोमवार को लोकसभा में बताया कि किसी देश की मौद्रिक और राजकोषीय स्थिरता पर क्रिप्टोकरेंसी के अस्थिर प्रभाव से जुड़ी चिंताओं के मद्देनजर RBI ने इसपर कानून बनाने की सिफारिश की है.
वित्त मंत्री ने लिखित में दिया जवाब
लोकसभा में थोल थिरूमावलवन ने प्रश्न किया था कि क्या RBI ने भारतीय अर्थव्यवस्था में क्रिप्टोकरेंसी के दुष्प्रभाव के संबंध में अपनी चिंता व्यक्त की है? क्या सरकार की भारत में क्रिप्टोकरेंसी के उपभोग को परिसीमित करने वाला कोई कानून लाने की कोई योजना है? वित्त मंत्री ने इसी प्रश्न के लिखित उत्तर में ये बातें बताईं.
क्या है RBI की राय
वित्त मंत्री ने जवाब दिया, "जी, हां. भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्रिप्टोकरेंसी के प्रतिकूल प्रभाव पर RBI ने अपनी चिंता जाहिर की है. आरबीआई ने साफ किया है कि क्रिप्टोकरेंसी कोई मुद्रा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक मुद्रा को केंद्रीय बैंक या सरकार द्वारा जारी किया जाना आवश्यक है." उन्होंने बताया कि क्रिप्टोकरेंसी का मूल्य पूरी तरह से अटकलों एवं उच्च रिटर्न की उम्मीदों पर निर्भर करता है, इसलिए देश की मौद्रिक और राजकोषीय स्थिरता पर इसका एक अस्थिर प्रभाव पड़ता है.
क्रिप्टोकरेंसी को बैन किया जाना चाहिए
उन्होंने कहा, "RBI का मानना है कि क्रिप्टोकरेंसी को बैन किया जाना चाहिए." उन्होंने बताया कि आरबीआई ने 24 दिसंबर 2013, एक फरवरी 2017 और पांच दिसंबर 2017 को सार्वजनिक नोटिसों के माध्यम से डिजिटल करेंसी के उपयोगकर्ताओं, धारकों और व्यापारियों को आर्थिक, वित्तीय, कानूनी, ग्राहक सुरक्षा और सुरक्षा संबंधी जोखिमों से आगाह कर रहा है. इस संबंध में आरबीआई ने 6 अप्रैल 2018 को एक परिपत्र भी जारी किया, जिसमें अपनी विनियमित संस्थाओं को वर्चुअल करेंसी में व्यापार करने या निपटान में किसी भी व्यक्ति या संस्था को सुविधा प्रदान करने के लिए सेवाएं प्रदान करने पर रोक लगाई थी.
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वैश्विक रेटिंग एजेंसी ने बैंक को Baa2/P-2 रेटिंग दी, मजबूत पूंजी स्थिति और कारोबार में वृद्धि की उम्मीद को बताया आधार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक रेटिंग एजेंसी Moody’s Ratings ने RBL बैंक को पहली बार इन्वेस्टमेंट ग्रेड इश्यूअर रेटिंग प्रदान की है. Moody’s (मूडीज) ने बैंक को Baa2/P-2 रेटिंग दी है और इसका आउटलुक स्थिर (Stable) रखा है. रेटिंग एजेंसी ने यह रेटिंग बैंक की मजबूत फ्रेंचाइजी, बेहतर पूंजी स्थिति और अगले दो से तीन वर्षों में कारोबार में निरंतर वृद्धि की उम्मीदों के आधार पर दी है. Moody’s ने कहा कि यह रेटिंग बैंक की वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की पर्याप्त क्षमता और बेहतर होते क्रेडिट प्रोफाइल को दर्शाती है.
मजबूत पूंजी स्थिति बनी रेटिंग का आधार
Moody’s के अनुसार, RBL बैंक की बढ़ती बाजार पहुंच, कारोबार विस्तार की संभावनाएं और मजबूत पूंजीकरण स्तर इस रेटिंग के प्रमुख आधार हैं. स्थिर आउटलुक से संकेत मिलता है कि रेटिंग एजेंसी को उम्मीद है कि RBL बैंक अपनी एसेट क्वालिटी, पूंजी बफर और लाभप्रदता को मजबूत बनाए रखेगा और बैलेंस शीट को और बेहतर करेगा.
रेटिंग में दो पायदान का अतिरिक्त लाभ (Two-notch uplift) बैंक के सबसे बड़े शेयरधारक Emirates NBD Bank से मिलने वाले संभावित रणनीतिक समर्थन को ध्यान में रखते हुए दिया गया है. Moody’s ने कहा कि यह समर्थन बैंक की वित्तीय मजबूती को लेकर अतिरिक्त भरोसा पैदा करता है.
वैश्विक फंडिंग तक पहुंच होगी आसान
RBL बैंक की पहली अंतरराष्ट्रीय इन्वेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग से बैंक की वैश्विक फंडिंग बाजारों तक पहुंच मजबूत होने और निवेशकों का भरोसा बढ़ने की उम्मीद है. ऐसी रेटिंग को विदेशी निवेशकों और डेट मार्केट से जुड़े प्रतिभागियों द्वारा बारीकी से देखा जाता है, क्योंकि इसका असर फंडिंग लागत और अंतरराष्ट्रीय पूंजी जुटाने की क्षमता पर पड़ता है.
बैंकिंग सेक्टर में मजबूत हो रही पूंजी स्थिति
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब भारतीय बैंक लगातार अपनी पूंजी स्थिति को मजबूत कर रहे हैं और स्थिर क्रेडिट ग्रोथ के बीच फंडिंग स्रोतों में विविधता ला रहे हैं. RBL बैंक के लिए यह रेटिंग बाजार में अपनी छवि सुधारने और लंबे समय तक कारोबार विस्तार को समर्थन देने की दिशा में एक अहम उपलब्धि मानी जा रही है.
1 अगस्त से लागू हुई नई कीमतें, लगातार दूसरे महीने कम हुए व्यावसायिक गैस सिलेंडर के दाम; घरेलू LPG की कीमतों में कोई बदलाव नहीं
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
व्यावसायिक उपयोग वाले LPG सिलेंडर की कीमतों में 209 रुपये तक की कटौती की गई है. तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने 1 अगस्त से 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर के नए दाम लागू कर दिए हैं. इस कटौती से होटल, रेस्टोरेंट, कैटरिंग कंपनियों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो बड़े पैमाने पर LPG का इस्तेमाल करते हैं.
यह कमर्शियल LPG कीमतों में लगातार दूसरी मासिक कटौती है. हालांकि, घरेलू रसोई गैस सिलेंडर (14.2 किलोग्राम) की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
दिल्ली में 202 रुपये और कोलकाता में 209 रुपये की कटौती
तेल विपणन कंपनियों ने 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में दिल्ली में 202 रुपये और कोलकाता में 209 रुपये की कमी की है. मुंबई, चेन्नई और अन्य प्रमुख शहरों में भी इसी तरह की कटौती की गई है. यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है.
होटल-रेस्टोरेंट और छोटे कारोबारियों को फायदा
कमर्शियल LPG की कीमतों में कमी से उन कारोबारों की परिचालन लागत कम होने की उम्मीद है, जहां ईंधन का इस्तेमाल काफी अधिक होता है. खासतौर पर होटल, रेस्टोरेंट, कैटरर्स और छोटे फूड आउटलेट्स को इसका सीधा लाभ मिलेगा.
इससे पहले जुलाई में भी कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में कटौती की गई थी. साल 2026 की शुरुआत में वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति संबंधी बाधाओं के कारण कमर्शियल LPG की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई थी. ऐसे में लगातार दो महीनों में हुई कटौती कारोबारियों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है.
घरेलू LPG सिलेंडर के दाम स्थिर
जहां कमर्शियल LPG उपभोक्ताओं को राहत मिली है, वहीं घरेलू उपयोग वाले 14.2 किलोग्राम LPG सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. तेल विपणन कंपनियां हर महीने LPG कीमतों की समीक्षा करती हैं. कीमतों में बदलाव मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों, आयात लागत और विदेशी मुद्रा दरों के आधार पर किया जाता है.
कारोबारियों को आगे भी राहत की उम्मीद
कमर्शियल LPG कीमतों में कटौती ऐसे समय में हुई है जब कारोबारी बढ़ती इनपुट लागत को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं. कम ईंधन लागत से हॉस्पिटैलिटी और फूड सर्विस सेक्टर को फायदा मिलने की उम्मीद है.
हालांकि, वैश्विक कच्चे तेल और LPG कीमतों पर अभी भी भू-राजनीतिक घटनाओं और आपूर्ति की स्थिति का असर बना हुआ है. अगर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में स्थिरता जारी रहती है तो आने वाले महीनों में कमर्शियल ईंधन कीमतों में और नरमी देखने को मिल सकती है.
US जेनरिक और अफ्रीका कारोबार ने कंपनी की ग्रोथ को दी मजबूती, एडजस्टेड EBITDA बढ़कर 454 करोड़ रुपये हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अजंता फार्मा (Ajanta Pharma) ने जून 2026 को समाप्त पहली तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी का कंसोलिडेटेड शुद्ध लाभ (PAT) सालाना आधार पर 31% बढ़कर 334 करोड़ रुपये हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 255 करोड़ रुपये था.
कंपनी की परिचालन से आय (Revenue from Operations) 25% बढ़कर 1,626 करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले साल की इसी अवधि में 1,303 करोड़ रुपये थी. विदेशी मुद्रा नुकसान को छोड़कर एडजस्टेड EBITDA 21% बढ़कर 454 करोड़ रुपये रहा. इस दौरान EBITDA मार्जिन 28% और PAT मार्जिन 21% रहा.
US जेनरिक और अफ्रीका कारोबार से मिली रफ्तार
अजंता फार्मा के US जेनरिक कारोबार में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई. इस सेगमेंट का राजस्व 57% बढ़कर 487 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल 310 करोड़ रुपये था.
अफ्रीका इंस्टीट्यूशनल कारोबार का राजस्व 83% बढ़कर 70 करोड़ रुपये पहुंच गया. वहीं भारत, एशिया और अफ्रीका में ब्रांडेड-जेनरिक कारोबार से आय 13% बढ़कर 1,059 करोड़ रुपये रही.
भारत के ब्रांडेड-जेनरिक कारोबार का राजस्व 24% बढ़कर 509 करोड़ रुपये हो गया, जबकि अफ्रीका ब्रांडेड-जेनरिक कारोबार में 30% की वृद्धि के साथ आय 295 करोड़ रुपये रही. हालांकि, एशिया कारोबार का राजस्व 16% घटकर 255 करोड़ रुपये रह गया.
भारत में फार्मा बाजार से बेहतर प्रदर्शन
अजंता फार्मा के भारत ब्रांडेड-जेनरिक पोर्टफोलियो में 15% की वृद्धि हुई, जबकि भारतीय फार्मास्युटिकल बाजार में 11% की ग्रोथ दर्ज की गई.
कंपनी के ऑप्थैल्मोलॉजी (नेत्र चिकित्सा) और पेन मैनेजमेंट (दर्द प्रबंधन) सेगमेंट में 15% की वृद्धि हुई. वहीं डर्मेटोलॉजी कारोबार 14% बढ़ा, जबकि कार्डियोलॉजी सेगमेंट में 9% की ग्रोथ रही.
US बाजार के लिए दो नए प्रोडक्ट लॉन्च
कंपनी को तिमाही के दौरान तीन Abbreviated New Drug Application (ANDA) की मंजूरी मिली और अमेरिका में दो नए उत्पाद लॉन्च किए गए. अजंता फार्मा के कुल कमर्शियलाइज्ड ANDA की संख्या बढ़कर 51 हो गई है. वहीं, 17 आवेदन अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) के पास मंजूरी के लिए लंबित हैं, जबकि पांच आवेदनों को टेंटेटिव अप्रूवल मिल चुका है.
R&D खर्च बढ़ा, 400 करोड़ रुपये के अंतरिम डिविडेंड को मंजूरी
कंपनी ने रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च बढ़ाकर 66 करोड़ रुपये कर दिया, जो पिछले साल 56 करोड़ रुपये था. यह कंपनी के कुल राजस्व का करीब 4% है. अजंता फार्मा का रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (ROCE) 37% और रिटर्न ऑन नेट वर्थ (RONW) 28% रहा.
कंपनी के बोर्ड ने 2 रुपये के फेस वैल्यू वाले प्रत्येक शेयर पर 32 रुपये के अंतरिम लाभांश (Interim Dividend) को मंजूरी दी है. इस डिविडेंड पर कंपनी का कुल भुगतान करीब 400 करोड़ रुपये होगा.
इस साझेदारी के तहत कंपनियां यह आकलन करेंगी कि eVTOL विमान 'लास्ट-माइल' आपातकालीन मेडिकल लॉजिस्टिक्स में किस तरह मददगार साबित हो सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में आपातकालीन मेडिकल सप्लाई की डिलीवरी को तेज और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एयर इंडिया ने जापान की eVTOL (इलेक्ट्रिक वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग) विमान निर्माता स्काईड्राइव (SkyDrive) और सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन (Suzuki Motor Corporation) के साथ समझौता (MoU) किया है. तीनों कंपनियां मिलकर यह अध्ययन करेंगी कि भीड़भाड़ वाले भारतीय शहरों में समय-संवेदनशील चिकित्सा सामग्री की ढुलाई के लिए eVTOL विमानों का इस्तेमाल कितना व्यावहारिक और प्रभावी हो सकता है.
मेडिकल लॉजिस्टिक्स के लिए होगी व्यवहार्यता का अध्ययन
इस साझेदारी के तहत कंपनियां यह आकलन करेंगी कि eVTOL विमान 'लास्ट-माइल' आपातकालीन मेडिकल लॉजिस्टिक्स में किस तरह मददगार साबित हो सकते हैं. इसका उद्देश्य सड़क जाम के कारण होने वाली देरी को कम करना और उच्च मूल्य वाली तथा समय-संवेदनशील मेडिकल सप्लाई को तेजी से अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाना है.
तीनों कंपनियों की होगी अलग-अलग भूमिका
प्रस्तावित सहयोग के तहत स्काईड्राइव अपनी eVTOL तकनीक उपलब्ध कराएगी. एयर इंडिया विमान संचालन, एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और एविएशन इकोसिस्टम से जुड़े अपने अनुभव का योगदान देगी. वहीं, सुजुकी भारतीय बाजार की समझ और स्थानीय परिचालन संबंधी विशेषज्ञता के आधार पर सुरक्षित, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले मॉडल का मूल्यांकन करेगी.
फिलहाल यह पहल व्यवहार्यता अध्ययन (Feasibility Study) के चरण में है और कंपनियों ने इसके व्यावसायिक संचालन की कोई समयसीमा घोषित नहीं की है.
मेडिकल सप्लाई की डिलीवरी होगी तेज
एयर इंडिया के कार्गो प्रमुख रमेश ममिडाला ने कहा कि भारत का विमानन बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है और ऐसे में एडवांस्ड एयर मोबिलिटी देश के परिवहन नेटवर्क का अहम हिस्सा बन सकती है. उनके मुताबिक, मेडिकल एयर लॉजिस्टिक्स में eVTOL विमानों का उपयोग तकनीक और सामाजिक उद्देश्य का प्रभावी मेल है, क्योंकि इससे आपातकालीन चिकित्सा सामग्री की डिलीवरी का समय काफी कम किया जा सकता है.
एयर इंडिया इस अध्ययन के दौरान यह भी आकलन करेगी कि eVTOL संचालन को मौजूदा विमानन ढांचे और एयरपोर्ट नेटवर्क के साथ किस प्रकार जोड़ा जा सकता है.
भारत पर स्काईड्राइव और सुजुकी का फोकस
स्काईड्राइव के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) तोमोहिरो फुकुजावा ने कहा कि भारत जैसे बड़े और भीड़भाड़ वाले बाजार में eVTOL विमान उच्च मूल्य और समय-संवेदनशील मेडिकल सप्लाई की ढुलाई का प्रभावी समाधान बन सकते हैं.
सुजुकी और स्काईड्राइव पहले से ही eVTOL तकनीक पर साथ काम कर रहे हैं. दोनों कंपनियों ने 2022 में इस क्षेत्र में साझेदारी शुरू की थी, जिसके बाद सुजुकी ने स्काईड्राइव में निवेश किया और विनिर्माण सहयोग समझौता भी किया.
भारत को लेकर भी दोनों कंपनियां पहले से सक्रिय हैं. जुलाई 2025 में सुजुकी ने भारत को अपने प्रमुख विदेशी बाजारों में शामिल करने की रणनीति की घोषणा की थी. वहीं, जनवरी 2025 में स्काईड्राइव को भारतीय प्राइवेट जेट ऑपरेटर JetSetGo से 50 SKYDRIVE विमानों का प्री-ऑर्डर भी मिला था.
अगला कदम
अब तीनों कंपनियां संयुक्त रूप से यह अध्ययन करेंगी कि उनकी तकनीकी और परिचालन क्षमताओं को एकीकृत कर भारत के लिए सुरक्षित, व्यावहारिक और व्यावसायिक रूप से सक्षम मेडिकल एयर लॉजिस्टिक्स मॉडल विकसित किया जा सकता है या नहीं.
R&D पर GDP के अनुपात में खर्च के मामले में भारत कई प्रमुख ब्रिक्स देशों से पीछे है. चीन ने 2024 में अपने GDP का 2.69 प्रतिशत, ब्राजील ने 2023 में 1.19 प्रतिशत और रूस ने 2024 में लगभग 0.94 प्रतिशत R&D पर खर्च किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में शोध एवं विकास (R&D) पर कुल निवेश पिछले चार वर्षों में 85 प्रतिशत बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. हालांकि, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में R&D पर खर्च अब भी केवल 0.84 प्रतिशत है, जो चीन, ब्राजील और रूस जैसे ब्रिक्स देशों से कम है. वहीं, इस दौरान एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि पहली बार R&D निवेश में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सरकार से अधिक हो गई.
लोकसभा में सरकार की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2019-20 में R&D पर कुल खर्च 1.33 लाख करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में GDP के मुकाबले R&D खर्च की हिस्सेदारी 0.66 प्रतिशत से बढ़कर 0.84 प्रतिशत हुई. हालांकि, यह 2035 तक R&D पर GDP का 2 प्रतिशत खर्च करने के राष्ट्रीय लक्ष्य से अभी काफी दूर है.
BRICS देशों की तुलना में भारत पीछे
R&D पर GDP के अनुपात में खर्च के मामले में भारत कई प्रमुख ब्रिक्स देशों से पीछे है. चीन ने 2024 में अपने GDP का 2.69 प्रतिशत, ब्राजील ने 2023 में 1.19 प्रतिशत और रूस ने 2024 में लगभग 0.94 प्रतिशत R&D पर खर्च किया. भारत का यह आंकड़ा 0.84 प्रतिशत रहा. हालांकि, दक्षिण अफ्रीका (0.61 प्रतिशत) और वियतनाम (0.41 प्रतिशत) का खर्च भारत से कम दर्ज किया गया.
पहली बार निजी क्षेत्र ने सरकार को पीछे छोड़ा
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के R&D निवेश ढांचे में उल्लेखनीय बदलाव आया है. वर्ष 2019-20 में कुल R&D खर्च में सरकार की हिस्सेदारी 66.2 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में घटकर 48.2 प्रतिशत रह गई. इसके विपरीत, निजी उद्योग की हिस्सेदारी 33.8 प्रतिशत से बढ़कर 51.8 प्रतिशत हो गई. यह पहला अवसर है जब देश में शोध एवं विकास पर निजी क्षेत्र का निवेश सरकारी हिस्सेदारी से अधिक रहा.
निजी निवेश में ढाई गुना उछाल
निजी क्षेत्र का R&D पर निवेश 2019-20 के 44,754 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 1.18 लाख करोड़ रुपये हो गया. यानी चार वर्षों में यह करीब ढाई गुना बढ़ा और इसकी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 27.52 प्रतिशत रही.
राज्यों की भागीदारी अब भी सीमित
दूसरी ओर, राज्य सरकारों का योगदान अपेक्षाकृत कमजोर बना हुआ है. 2019-20 से 2023-24 के बीच राज्यों के R&D खर्च में केवल 3.4 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर्ज की गई. 2023-24 में देश के कुल R&D खर्च में राज्यों की हिस्सेदारी महज 4 प्रतिशत रही, जो शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में उनकी सीमित भूमिका को दर्शाती है.
अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 22 राज्यों ने संयुक्त रूप से पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित 10.45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में राज्यों के पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) की रफ्तार सुस्त रही है. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के मासिक खातों के विश्लेषण के अनुसार, 22 राज्यों ने अप्रैल-जून अवधि में अपने पूंजीगत व्यय बजट का औसतन केवल 10.67 प्रतिशत खर्च किया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 10.94 प्रतिशत से कम है. रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों का प्रदर्शन भी अपेक्षा से कमजोर रहा, जबकि केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया.
अप्रैल-जून तिमाही के दौरान 22 राज्यों ने संयुक्त रूप से पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित 10.45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 1.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. हालांकि, यह पिछले छह वर्षों की पहली तिमाहियों में खर्च की गई सबसे बड़ी वास्तविक राशि है, लेकिन बजट आवंटन के मुकाबले खर्च का अनुपात घटा है.
पिछले वर्षों की तुलना में कैसी रही तस्वीर?
सीएजी के आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में कैपेक्स खर्च का अनुपात पिछले कुछ वर्षों से सीमित दायरे में बना हुआ है. वित्त वर्ष 2023 में यह सबसे कम 9.02 प्रतिशत रहा था, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह 13.23 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंचा था. मौजूदा वित्त वर्ष में 10.67 प्रतिशत का खर्च वित्त वर्ष 2023 और 2025 से बेहतर जरूर है, लेकिन वित्त वर्ष 2022 और 2026 की पहली तिमाही से कम है.
केरल ने दिखाई सबसे तेज रफ्तार
राज्यों में केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन करते हुए अपने वार्षिक पूंजीगत व्यय बजट का 36.41 प्रतिशत पहली तिमाही में ही खर्च कर दिया. इसके बाद मध्य प्रदेश (18.21 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (16.61 प्रतिशत), हरियाणा (16.26 प्रतिशत) और हिमाचल प्रदेश (15.90 प्रतिशत) का स्थान रहा.
त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश पीछे
सबसे कमजोर प्रदर्शन त्रिपुरा का रहा, जिसने अपने पूंजीगत व्यय आवंटन का केवल 1.81 प्रतिशत खर्च किया. इसके बाद पश्चिम बंगाल (1.89 प्रतिशत) और मेघालय (3.03 प्रतिशत) रहे. बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश, जिसका कैपेक्स बजट 1.78 लाख करोड़ रुपये के साथ सबसे बड़ा है, उसने जून के अंत तक केवल 6.34 प्रतिशत राशि खर्च की. वहीं ओडिशा (5.19 प्रतिशत), तमिलनाडु (5.53 प्रतिशत) और कर्नाटक (6.83 प्रतिशत) भी पूंजीगत व्यय के मामले में धीमे रहे.
राजस्व व्यय और कर संग्रह की स्थिति
पहली तिमाही में 22 राज्यों ने कुल 9.66 लाख करोड़ रुपये का राजस्व व्यय किया, जो उनके संयुक्त वार्षिक राजस्व व्यय बजट का 18.52 प्रतिशत है. इस मामले में हिमाचल प्रदेश (25.01 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (24.66 प्रतिशत), तेलंगाना (23.38 प्रतिशत) और केरल (22.69 प्रतिशत) सबसे आगे रहे. वहीं झारखंड, बिहार और महाराष्ट्र का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा.
कर राजस्व के मोर्चे पर राज्यों ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.73 लाख करोड़ रुपये की वसूली की, जो पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के अनुमानित कर राजस्व 40.48 लाख करोड़ रुपये का 19.11 प्रतिशत है.
वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सुधार का असर आरबीआई के गोल्ड रिजर्व पर भी दिखा. समीक्षा सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर हो गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में मजबूती का सिलसिला लगातार चौथे सप्ताह भी जारी रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.118 अरब डॉलर बढ़कर 682.354 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इस बढ़ोतरी में विदेशी मुद्रा आस्तियों (FCA) के साथ-साथ सोने के भंडार के मूल्य में आई वृद्धि का अहम योगदान रहा.
आरबीआई के साप्ताहिक आंकड़ों के मुताबिक, इससे पहले वाले सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 1.08 अरब डॉलर का इजाफा हुआ था. हालांकि, यह अब भी 27 फरवरी 2026 को दर्ज 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड उच्च स्तर से नीचे है.
विदेशी मुद्रा आस्तियों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी
24 जुलाई को समाप्त सप्ताह के दौरान विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets-FCA) में 4.873 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई, जिससे इनका कुल मूल्य बढ़कर 555.929 अरब डॉलर हो गया. विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा FCA का होता है. इसमें यूरो, पाउंड और येन जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी प्रभाव शामिल होता है.
सोने के भंडार का मूल्य भी बढ़ा
वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सुधार का असर आरबीआई के गोल्ड रिजर्व पर भी दिखा. समीक्षा सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर हो गया. मार्च 2026 के अंत तक आरबीआई के पास 880.52 टन सोने का भंडार था, जो देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 16.7 प्रतिशत है.
SDR और IMF रिजर्व में मामूली गिरावट
दूसरी ओर, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) में 53 मिलियन डॉलर की कमी दर्ज की गई, जिसके बाद इसका स्तर 18.617 अरब डॉलर रह गया. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रखे भारत के रिजर्व में भी 11 मिलियन डॉलर की गिरावट आई और यह 4.750 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
कंपनी ने शुक्रवार को बताया कि असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने प्रमोटर समूह की इकाई को वरीयता आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंटजारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कंटेंट और टेक्नोलॉजी कंपनी ZEE एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (ZEE Entertainment Enterprises) को पूंजी जुटाने और कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ESOP) लागू करने के प्रस्तावों पर शेयरधारकों की मंजूरी मिल गई है. इस मंजूरी के तहत कंपनी के प्रमोटर समूह की इकाई 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश करेगी, जिससे प्रमोटर्स की हिस्सेदारी बढ़कर 23.79 प्रतिशत हो जाएगी. कंपनी का कहना है कि यह कदम उसकी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने और दीर्घकालिक विकास रणनीति को गति देने में मदद करेगा.
शेयरधारकों ने EGM में दी मंजूरी
कंपनी ने शुक्रवार को बताया कि असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों ने प्रमोटर समूह की इकाई को वरीयता (Preferential) आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट (Fully Convertible Warrants) जारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही ZEE और उसकी सहायक कंपनियों के कर्मचारियों के लिए 'ट्रूली यॉर्स' (Truly Yours) कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना (ESOP) को भी हरी झंडी मिल गई है.
कंपनी के अनुसार, इन प्रस्तावों को मंजूरी मिलने से उसकी वित्तीय नींव और मजबूत होगी, जिससे भविष्य में मूल्य सृजन करने वाले निवेश और विकास के अवसरों का लाभ उठाया जा सकेगा.
प्रमोटर करेंगे 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश
शेयरधारकों की मंजूरी के बाद ZEE, प्रमोटर समूह की इकाई को 126 रुपये प्रति वारंट की कीमत पर 24,94,85,563 पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट जारी करेगी. इसके जरिए प्रमोटर समूह कंपनी में 3,143.5 करोड़ रुपये का निवेश करेगा. इस निवेश के बाद कंपनी में प्रमोटर्स की कुल हिस्सेदारी बढ़कर 23.79 प्रतिशत हो जाएगी.
ZEE एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज के चेयरमैन आर. गोपालन ने कहा कि यह मंजूरी कंपनी और उसके प्रबंधन पर शेयरधारकों के भरोसे को दर्शाती है. उन्होंने कहा कि प्रमोटर्स द्वारा किए जा रहे पूंजी निवेश से कंपनी की वित्तीय मजबूती और लचीलापन बढ़ेगा, जिससे ZEE प्रतिस्पर्धा में आगे रहने और सभी हितधारकों के लिए अधिक मूल्य सृजित करने में सक्षम होगी.
'Truly Yours' ESOP योजना लागू होगी
कंपनी 'Truly Yours' ESOP योजना के तहत ZEE और उसकी सहायक कंपनियों के पात्र कर्मचारियों को एक या अधिक चरणों में 3,74,22,835 स्टॉक विकल्प (Stock Options) जारी करेगी. प्रत्येक विकल्प का अंकित मूल्य (Face Value) 1 रुपये होगा.
कंपनी का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य कर्मचारियों को कंपनी की विकास यात्रा में वास्तविक भागीदार बनाना है. ESOP ढांचा कर्मचारियों की विकास आकांक्षाओं को कंपनी और उसके शेयरधारकों के दीर्घकालिक लक्ष्यों के साथ जोड़ता है, जिससे सभी हितधारकों के लिए सतत मूल्य सृजन सुनिश्चित किया जा सके.
विकास योजनाओं पर रहेगा फोकस
कंपनी के मुताबिक, अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध होने से वह अपने नए रणनीतिक विकास क्षेत्रों में निवेश बढ़ाएगी और मौजूदा कारोबार की क्षमताओं को मजबूत करेगी. इससे कंपनी की दीर्घकालिक विकास रणनीति को गति मिलने की उम्मीद है.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अपतटीय (ऑफशोर) क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को नई गति दी जाएगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ते ऊर्जा सुरक्षा जोखिमों के बीच केंद्र सरकार ने घरेलू तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन' (नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम) को मंजूरी दे दी है. वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू होने वाली इस योजना का उद्देश्य समुद्री क्षेत्रों में तेल-गैस की खोज तेज करना, आयात पर निर्भरता कम करना और भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत बनाना है.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अपतटीय (ऑफशोर) क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को नई गति दी जाएगी. सरकार का अनुमान है कि इस पहल से देश के तेल भंडार में 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक की वृद्धि हो सकती है. साथ ही घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ने से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी.
क्यों अहम है यह योजना?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है. ऐसे समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य, लाल सागर और अन्य प्रमुख समुद्री मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है, सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है. इसी रणनीति के तहत 'समुद्र मंथन' योजना को मंजूरी दी गई है.
अमित शाह ने किया पोस्ट
गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन' योजना भारत की अपतटीय ऊर्जा क्षमता का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करेगी. उनके मुताबिक, इससे घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ेगा, बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और 'विकसित भारत' के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी.
The Union Cabinet's approval of the ₹84,084 crore 'Samudra Manthan' Scheme gives fresh impetus to our nation's growth.
— Amit Shah (@AmitShah) July 31, 2026
Unlocking India's vast offshore energy potential, the scheme will boost domestic oil and gas production while generating employment at scale, to achieve Modi… pic.twitter.com/XEFvfau9dK
स्वदेशी उद्योग को मिलेगा बढ़ावा
सरकार का मानना है कि इस योजना से 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को नई मजबूती मिलेगी. ऑफशोर टेक्नोलॉजी, उपकरण निर्माण और सेवाओं से जुड़े उद्योगों में निवेश बढ़ेगा, जिससे वैश्विक स्तर का प्रतिस्पर्धी इकोसिस्टम विकसित होगा. साथ ही एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन वैल्यू चेन में दीर्घकालिक निवेश और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.
'समुद्र मंथन' योजना के प्रमुख फायदे
1. हाइड्रोकार्बन भंडार में 600 मिलियन टन से अधिक की संभावित बढ़ोतरी.
2. वार्षिक तेल उत्पादन में 10-15 मिलियन टन तक वृद्धि, जिसे आगे 20 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य.
3. आयात पर निर्भरता घटने से विदेशी मुद्रा की बचत.
4. एक्सप्लोरेशन, मैन्यूफैक्चरिंग और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा.
5. जीडीपी वृद्धि और औद्योगिक गतिविधियों को गति.
6. तेल, गैस और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर.
NSE के मुताबिक, सेबी की ओर से औपचारिक सेटलमेंट आदेश जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी संबंधित मामले वापस ले लिए जाएंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के बहुप्रतीक्षित IPO का रास्ता अब लगभग साफ हो गया है. बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने एक्सचेंज के खिलाफ लंबित रेगुलेटरी मामलों के निपटारे के लिए 1,491.21 करोड़ रुपये के सेटलमेंट प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है. इस समझौते के साथ को-लोकेशन और डार्क फाइबर जैसे वर्षों पुराने विवाद सुलझने की दिशा में बढ़ गए हैं, जो लंबे समय से NSE के लिस्टिंग प्लान में सबसे बड़ी बाधा बने हुए थे.
सेबी ने सैद्धांतिक मंजूरी दी
NSE ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि 30 जुलाई 2026 को सेबी ने ईमेल के जरिए सेटलमेंट की शर्तों को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया. कुल 1,491.21 करोड़ रुपये की सेटलमेंट राशि में से 776.47 करोड़ रुपये, जो पहले ही सेबी के पास जमा थे, समायोजित कर दिए जाएंगे. इसके बाद एक्सचेंज को 714.74 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान करना होगा. कंपनी ने कहा कि इस सेटलमेंट का वित्तीय प्रभाव 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के खातों में पहले ही शामिल किया जा चुका है.
को-लोकेशन और डार्क फाइबर विवाद होंगे खत्म
यह समझौता को-लोकेशन मामले और डार्क फाइबर विवाद सहित सभी प्रमुख लंबित मामलों को कवर करता है. को-लोकेशन केस 2015 से जांच, अपील और विभिन्न न्यायिक मंचों पर सुनवाई के कारण लंबित था. इस मामले में कुछ ब्रोकरेज फर्मों पर ट्रेडिंग सर्वर तक कथित तौर पर विशेष पहुंच मिलने के आरोप लगे थे.
सुप्रीम कोर्ट से वापस लिए जाएंगे मामले
NSE के मुताबिक, सेबी की ओर से औपचारिक सेटलमेंट आदेश जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी संबंधित मामले वापस ले लिए जाएंगे. इससे एक्सचेंज के खिलाफ चल रही वर्षों पुरानी कानूनी प्रक्रिया समाप्त होने का रास्ता खुल जाएगा.
IPO लॉन्च की तैयारी तेज
रेगुलेटरी अड़चनें दूर होने के बाद NSE अब अपने बहुप्रतीक्षित IPO को आगे बढ़ाने की तैयारी में है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक्सचेंज इस सार्वजनिक निर्गम के जरिए 26,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाने की योजना बना रहा है. यदि प्रक्रिया तय समय पर आगे बढ़ती है, तो यह भारत के सबसे बड़े IPO में से एक हो सकता है.