फर्जी कॉल पर लगेगी लगाम! अब 1601 नंबर से आएगी बिजली, गैस और कूरियर कंपनियों की कॉल

TRAI ने वॉयस कॉल के जरिए होने वाली धोखाधड़ी और फर्जी पहचान के मामलों पर लगाम लगाने के लिए 1601 नंबर सीरीज शुरू की है.

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Tuesday, 11 August, 2026
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मोबाइल पर आने वाली अनजान और फर्जी कॉल से परेशान लोगों के लिए राहत की खबर है. दरअसल, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने 1601 नंबर सीरीज की नई व्यवस्था लागू कर दी है. इसके तहत बिजली, पानी, गैस, कूरियर और पार्सल डिलीवरी जैसी सेवाओं से जुड़ी संस्थाएं खास 1601 सीरीज के नंबरों से ग्राहकों को कॉल करेंगी. इससे लोगों के लिए असली सेवा प्रदाता और संभावित ठगों के बीच अंतर करना आसान होगा.

क्या है TRAI की नई 1601 नंबर सीरीज?

TRAI ने वॉयस कॉल के जरिए होने वाली धोखाधड़ी और फर्जी पहचान के मामलों पर लगाम लगाने के लिए 1601 नंबर सीरीज शुरू की है. इसके पहले चरण में यूटिलिटी और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को शामिल किया गया है. यानी बिजली वितरण कंपनियां, जल सेवा प्रदाता, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां और एलपीजी वितरण संस्थाएं इस सीरीज का इस्तेमाल कर सकेंगी. इसके अलावा कूरियर, एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स और पार्सल डिलीवरी कंपनियां भी 1601 नंबर से ग्राहकों को कॉल कर सकेंगी.

बैंक और सरकारी कॉल के लिए 1600 सीरीज

बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, बीमा और सरकारी संस्थाओं से जुड़ी जरूरी कॉल के लिए 1600 नंबर सीरीज की व्यवस्था पहले की तरह जारी रहेगी. इससे अलग-अलग तरह की महत्वपूर्ण सेवाओं से आने वाली कॉल की पहचान करना उपभोक्ताओं के लिए आसान होगा.

टेलीकॉम कंपनियों को मिला 90 दिन का समय

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TRAI ने टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स (TSPs) को नई व्यवस्था लागू करने के लिए 90 दिनों का समय दिया है. पात्र संस्थाओं का माइग्रेशन और ऑनबोर्डिंग इसी अवधि के भीतर पूरा करना होगा. 1601 सीरीज के नंबर उचित सत्यापन के बाद सीधे पात्र संस्थाओं को आवंटित किए जाएंगे. नंबर आवंटन की प्रक्रिया में बिचौलियों और एग्रीगेटरों को शामिल नहीं किया जाएगा.

1601 नंबर से नहीं होगी प्रचार वाली कॉल

TRAI ने साफ किया है कि 1601 सीरीज का इस्तेमाल केवल जरूरी सेवा और ट्रांजैक्शन से जुड़ी वॉयस कॉल के लिए किया जाएगा. इन नंबरों से किसी तरह की प्रमोशनल या प्रचारात्मक कॉल करने की अनुमति नहीं होगी. नंबर जारी करने से पहले संबंधित संस्थाओं से इस संबंध में वचन-पत्र भी लिया जाएगा.

ग्राहकों को क्या फायदा होगा?

अक्सर साइबर ठग बिजली बिल, गैस कनेक्शन, कूरियर डिलीवरी या अन्य सेवाओं के नाम पर आम 10 अंकों वाले मोबाइल नंबरों से लोगों को कॉल करते हैं. नई व्यवस्था लागू होने के बाद वैध सेवा प्रदाताओं की कॉल के लिए एक अलग नंबर सीरीज होने से ग्राहकों को कॉल की पहचान करने में मदद मिलेगी. हालांकि, किसी भी कॉल पर बैंकिंग डिटेल, ओटीपी, यूपीआई पिन या अन्य संवेदनशील जानकारी साझा करने से पहले हमेशा सावधानी बरतना जरूरी होगा.


UPI यूजर्स के लिए बड़ी खबर! संसद से पास हुआ टैक्स बिल, लेनदेन पर नहीं लगेगा कोई चार्ज

संसद ने टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 को मंजूरी दे दी है. बिल के तहत सरकार को इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट के ऐसे माध्यम और ट्रांजैक्शन तय करने का अधिकार मिलेगा, जिन पर कोई शुल्क नहीं लगाया जा सकेगा.

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Tuesday, 11 August, 2026
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संसद ने सोमवार को कराधान और अन्य विधियां (संशोधन) विधेयक, 2026 (Taxation and Other Laws (Amendment) को मंजूरी दे दी. राज्यसभा ने संक्षिप्त चर्चा और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के जवाब के बाद इसे ध्वनिमत से पारित किया. लोकसभा पहले ही पिछले सप्ताह इस बिल को मंजूरी दे चुकी है. बिल का उद्देश्य डिजिटल भुगतान से जुड़े नियमों को कानूनी आधार देना और सरकार को यह तय करने की शक्ति देना है कि कौन से इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड और ट्रांजैक्शन शुल्क-मुक्त रहेंगे.

UPI पर नहीं लगेगा कोई चार्ज

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ किया कि इस कानून का मतलब यह नहीं है कि UPI यूजर्स से ट्रांजैक्शन चार्ज लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि UPI की शुरुआत से ही ग्राहकों के लिए यह सुविधा मुफ्त रही है और आगे भी लोग बिना किसी ट्रांजैक्शन शुल्क के इसका इस्तेमाल कर सकेंगे. उन्होंने कहा कि ग्राहक को UPI ट्रांजैक्शन के लिए कोई चार्ज नहीं देना होगा. यानी आम लोगों के लिए UPI के जरिए तत्काल डिजिटल भुगतान पहले की तरह मुफ्त बना रहेगा.

सरकार को मिलेगी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड तय करने की शक्ति

नए कानून के तहत केंद्र सरकार को नोटिफिकेशन के जरिए ऐसे इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड या ट्रांजैक्शन निर्धारित करने का अधिकार मिलेगा, जिन्हें शुल्क-मुक्त रखना जरूरी होगा. यह बदलाव Payment and Settlement Systems Act को इनकम टैक्स एक्ट से अलग करने के लिए किया गया है. मौजूदा व्यवस्था के तहत बैंक और पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर UPI और RuPay डेबिट कार्ड के जरिए किए गए ट्रांजैक्शन पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से यूजर्स से शुल्क नहीं ले सकते. हालांकि, नया कानून UPI यूजर्स पर कोई नया ट्रांजैक्शन चार्ज लागू नहीं करता. इसके बजाय यह एक वैधानिक व्यवस्था तैयार करता है, जिसके तहत सरकार यह अधिसूचित कर सकेगी कि किन इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट माध्यमों और ट्रांजैक्शन को शुल्क-मुक्त रखना है.

MDR को लेकर बहस के बीच आया बदलाव

यह प्रावधान Merchant Discount Rate यानी MDR को लेकर चल रही व्यापक बहस के बीच आया है. MDR डिजिटल पेमेंट की प्रोसेसिंग लागत को पेमेंट सिस्टम से जुड़े अलग-अलग पक्षों के बीच बांटने से संबंधित है. बिल के प्रावधानों से सरकार को मौजूदा जीरो-MDR व्यवस्था को लेकर ज्यादा लचीलापन मिलेगा. हालांकि, वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया है कि इससे ग्राहकों के लिए UPI भुगतान पर कोई शुल्क लागू नहीं होगा.

विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की भी कोशिश

टैक्स बिल में डिजिटल पेमेंट के अलावा विदेशी निवेश आकर्षित करने और घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं. साथ ही विदेशी क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर्स को भारतीय डेटा सेंटर का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करने का भी प्रावधान है.

बिल 5 जून को जारी किए गए उस अध्यादेश की जगह लेता है, जिसके तहत सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPIs को मिलने वाली ब्याज आय और कैपिटल गेन पर इनकम टैक्स छूट दी गई थी.

भारत में फंड मैनेजरों को लाने की कोशिश

इस कानून में निवेश फंड्स से जुड़ी कुछ शर्तों को भी आसान बनाने का प्रावधान है. इसका उद्देश्य फंड मैनेजरों को भारत में स्थानांतरित होने के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि कुछ परिस्थितियों में उनके वैश्विक आय पर भारत में टैक्स लगाने का जोखिम कम हो.

दोनों सदनों से बिल पारित होने के बाद अब केंद्र सरकार के पास इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट के उन माध्यमों और ट्रांजैक्शन को अधिसूचित करने का कानूनी ढांचा है, जिन्हें शुल्क-मुक्त रखना होगा. हालांकि, UPI को लेकर वित्त मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि आम ग्राहकों से कोई ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लिया जाएगा.
 


गौतम अडानी को अमेरिका से बड़ी राहत, आपराधिक केस खत्म; बोले- ‘सच्चाई और कानून पर भरोसा कायम रहा’

अमेरिकी अदालत के फैसले के बाद गौतम अडानी और समूह के वरिष्ठ अधिकारियों को बड़ी कानूनी राहत मिली है. मामले में आरोप हटाए जाने के बाद अडानी ने कहा कि मुश्किल दौर में भी उनका सच्चाई, निष्पक्षता और कानून के शासन में भरोसा अटूट रहा.

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Tuesday, 11 August, 2026
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अडानी ग्रुप (Adani Group) के चेयरमैन गौतम अडानी को अमेरिका से बड़ी कानूनी राहत मिली है. अमेरिकी अदालत ने उनके और समूह के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले में आरोप हटा दिए हैं. यह मामला कथित रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी से जुड़ा था और सोलर पावर कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने के दौरान अमेरिकी निवेशकों को कथित तौर पर गुमराह करने के आरोप लगाए गए थे. फैसले के बाद गौतम अडानी ने न्यायिक प्रक्रिया में अपना भरोसा दोहराते हुए इसे सच्चाई और कानून के शासन में विश्वास की जीत बताया है.

गौतम अडानी ने क्या कहा?

अमेरिकी अदालत के फैसले के बाद गौतम अडानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपना बयान साझा किया. उन्होंने कहा कि वह अदालत के फैसले का विनम्रता और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति गहरे सम्मान के साथ स्वागत करते हैं. अडानी ने कहा कि मुश्किल दौर में भी सच्चाई, निष्पक्षता और कानून के शासन में उनका भरोसा अटूट रहा. उन्होंने उन लोगों का भी आभार जताया, जिन्होंने इस पूरे मामले के दौरान अडानी समूह, कानूनी प्रक्रिया और भारत की न्याय व्यवस्था पर अपना विश्वास बनाए रखा.

क्या था अडानी के खिलाफ मामला?

गौतम अडानी और अडानी ग्रीन एनर्जी से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों पर अमेरिका में सोलर पावर कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए कथित रिश्वतखोरी और अमेरिकी निवेशकों को कथित तौर पर गुमराह करने के आरोप लगाए गए थे. अडानी समूह ने शुरुआत से ही इन आरोपों को खारिज किया था और कहा था कि समूह ने सभी लागू कानूनों और नियामकीय मानकों का पालन किया है. अब अमेरिकी जिला अदालत के फैसले के बाद इस आपराधिक मामले में अडानी और संबंधित अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है.

Adani Group के शेयरों पर भी नजर

अमेरिका में कानूनी मामले से जुड़ी यह राहत अडानी समूह की कंपनियों के लिए अहम मानी जा रही है. फैसले से निवेशकों के बीच सेंटीमेंट मजबूत होने की उम्मीद है और अडानी समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है. हालांकि, शेयरों की वास्तविक चाल बाजार के व्यापक रुख और अन्य कारोबारी संकेतकों पर भी निर्भर करेगी.

ग्लोबल बिजनेस के लिए क्यों अहम है फैसला?

अडानी समूह के लिए यह फैसला सिर्फ कानूनी राहत तक सीमित नहीं है. अमेरिकी मामले का निपटारा समूह के लिए वैश्विक निवेशकों और कारोबारी साझेदारों के बीच भरोसे के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे समूह की अंतरराष्ट्रीय विस्तार योजनाओं, संभावित निवेश और फंडिंग गतिविधियों को लेकर धारणा में सुधार आ सकता है.
 


बाजार में फिर दबाव के संकेत, गिफ्ट निफ्टी लाल निशान में; आज इन शेयरों पर रहेगी नजर

सोमवार को सेंसेक्स 43.27 अंक यानी 0.06 फीसदी की बढ़त के साथ 78,542.44 अंक पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी50 13.15 अंक यानी 0.05 फीसदी बढ़कर 24,583.80 अंक पर पहुंच गया.

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Tuesday, 11 August, 2026
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भारतीय शेयर बाजार के लिए मंगलवार, 11 अगस्त का कारोबारी सत्र सतर्कता भरा रह सकता है. GIFT Nifty में कमजोरी के संकेत मिल रहे हैं और यह करीब 43 अंक गिरकर 24,617.50 के स्तर पर कारोबार कर रहा था. अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीद कमजोर पड़ने से निवेशकों की चिंता बढ़ी है. वहीं कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी बाजार के लिए दबाव का कारण बन सकती है. ऐसे में निवेशकों की नजर आज बाजार की शुरुआती चाल के साथ-साथ कई कंपनियों से जुड़े अहम कॉरपोरेट अपडेट्स पर रहेगी.

सोमवार को मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ था बाजार

सोमवार को घरेलू शेयर बाजार में पूरे कारोबारी सत्र के दौरान उतार-चढ़ाव देखने को मिला. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण निवेशकों का सेंटीमेंट प्रभावित रहा. हालांकि, आखिरी घंटे में खरीदारी लौटने से बाजार मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ. बीएसई सेंसेक्स 43.27 अंक यानी 0.06 फीसदी की बढ़त के साथ 78,542.44 अंक पर बंद हुआ. वहीं एनएसई का निफ्टी50 13.15 अंक यानी 0.05 फीसदी बढ़कर 24,583.80 अंक पर पहुंच गया.

सेंसेक्स की 30 कंपनियों में से 19 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. टाइटन का शेयर सबसे ज्यादा 3.14 फीसदी चढ़ा. बजाज फाइनेंस में 1.93 फीसदी, बजाज फिनसर्व में 1.15 फीसदी, टाटा स्टील में 1.09 फीसदी और एशियन पेंट्स में 1.07 फीसदी की तेजी रही. दूसरी ओर बैंकिंग शेयरों पर दबाव देखने को मिला. SBI का शेयर 2.19 फीसदी टूटकर सेंसेक्स का सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाला शेयर रहा. इटरनल, NTPC, ITC, TCS, टेक महिंद्रा, भारती एयरटेल और रिलायंस इंडस्ट्रीज भी गिरावट में बंद हुए. सेक्टरों में निफ्टी PSU बैंक इंडेक्स करीब 2 फीसदी गिरकर सबसे कमजोर रहा, जबकि निफ्टी रियल्टी इंडेक्स ने बेहतर प्रदर्शन किया.

एशियाई बाजारों में तेजी, अमेरिकी बाजार कमजोर

मंगलवार को एशियाई बाजारों में मिलाजुला रुख देखने को मिला. हांगकांग का Hang Seng करीब 0.42 फीसदी ऊपर था, जबकि दक्षिण कोरिया का Kospi 0.32 फीसदी की बढ़त के साथ कारोबार कर रहा था. निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया की स्थिति और अमेरिकी बाजारों के प्रदर्शन पर बनी हुई है. अमेरिकी बाजारों में सोमवार को हल्की गिरावट रही. Dow Jones Industrial Average 0.11 फीसदी, S&P 500 0.06 फीसदी और Nasdaq Composite 0.32 फीसदी गिरकर बंद हुआ.

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से बढ़ी चिंता

अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध की आशंका के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. अमेरिकी पेट्रोलियम भंडार 300 मिलियन बैरल से नीचे पहुंच गया है, जिसे 1983 के बाद का सबसे निचला स्तर बताया जा रहा है. इससे आने वाले समय में तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है. इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज पर अगस्त वायदा 0.09 फीसदी बढ़कर 87.80 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. इसके अलावा सोने और चांदी के वायदा भाव में भी तेजी रही. सोना 1.51 फीसदी और चांदी 2.02 फीसदी चढ़ी.

इन शेयरों पर रहेगी नजर

मंगलवार को कई कंपनियों से जुड़े बड़े कॉरपोरेट अपडेट्स सामने आए हैं, जिनका असर शेयरों पर देखने को मिल सकता है. Bharat Electronics (BEL) को 31 जुलाई के बाद से अब तक करीब 541 करोड़ रुपये के अतिरिक्त ऑर्डर मिले हैं. वहीं RailTel को डाक विभाग से करीब 119 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है. Prestige Estates की हॉस्पिटैलिटी यूनिट में CPPIB 3,000 करोड़ रुपये तक निवेश कर सकता है और कंपनी में 28 फीसदी तक हिस्सेदारी हासिल कर सकता है. TVS Motor ने प्राइवेट प्लेसमेंट के जरिए 1,000 करोड़ रुपये के नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर जारी किए हैं. PC Jeweller के बोर्ड ने QIP के जरिए 1,000 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी दी है. Adani Enterprises, Adani Energy Solutions, Adani Green Energy, Adani Ports, Adani Power, Adani Total Gas, Ambuja Cements और ACC के शेयर भी फोकस में रहेंगे. वहीं Bharat Forge ने अपनी सहयोगी कंपनी Kalyani Strategic Systems में 241 करोड़ रुपये अतिरिक्त निवेश को मंजूरी दी है.

BSE के शेयरों पर भी नजर रहेगी. NSE Nifty 50 इंडेक्स में BSE, Wipro की जगह शामिल होगा और यह बदलाव 30 सितंबर 2026 से प्रभावी होगा. इसके अलावा JSW Energy ने अप्रैल 2026 से अब तक 1,166 MW नई रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी है. Maruti Clean Coal and Power के अधिग्रहण के बाद कंपनी की कुल स्थापित क्षमता 14,920 MW हो गई है. फार्मा कंपनी Lupin को अमेरिकी FDA से Sodium Zirconium Cyclosilicate ओरल सस्पेंशन के लिए मंजूरी मिली है. इस दवा का इस्तेमाल वयस्कों में हाइपरकलेमिया यानी शरीर में पोटैशियम का स्तर बढ़ने के इलाज में किया जाता है. इसके चलते Lupin का शेयर भी निवेशकों के रडार पर रहेगा.

आज कई कंपनियां जारी करेंगी Q1 नतीजे

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मंगलवार को कई कंपनियां वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. इनमें Arkade Developers, Ashiana Housing, Ashoka Buildcon, Balrampur Chini Mills, Bata India, Borana Weaves, AvenuesAI, DAM Capital Advisors, Delta Corp, EPL, Finolex Cables, Gokaldas Exports, IFCI, Manappuram Finance, MRF, NBCC India, PI Industries, Rail Vikas Nigam, Senco Gold, Siemens, SKF India, TARC, TD Power Systems, Unichem Laboratories, Venky’s India और Zydus Lifesciences समेत कई कंपनियां शामिल हैं.

आज बाजार की दिशा तय करने में GIFT Nifty, कच्चे तेल की कीमतें, पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिकी बाजारों का रुख और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां अहम रहेंगी. इसके अलावा Q1 नतीजों और कंपनियों के ऑर्डर, फंड जुटाने और कारोबार विस्तार से जुड़े अपडेट्स के कारण चुनिंदा शेयरों में तेज हलचल देखने को मिल सकती है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


SEBI का नया सिद्धांत: पकड़ो, छोड़ो और मिटा दो

भारत के बाजार नियामक ने 2025-26 में उल्लंघनों को लगातार पकड़ा, लेकिन 42% कम प्रवर्तन कार्यवाही शुरू की, 76% कम चेतावनियां जारी कीं और चुपचाप यह बदल दिया कि वह किन चीजों को गिनता और सार्वजनिक करता है.

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Monday, 10 August, 2026
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पलक शाह

SEBI की नजरें अब भी हैं. लेकिन ऐसा लगता है कि उसने अपनी मुट्ठी का इस्तेमाल करने की इच्छाशक्ति और कागजी कार्रवाई  खो दी है.

31 मार्च 2026 को समाप्त वर्ष में भारत का बाजार नियामक लगातार गड़बड़ी करने वालों को पकड़ता रहा. उसने 402 जांच शुरू कीं. 14 शहरों में 46 स्थानों पर 48 संस्थाओं की तलाशी ली. बाजार में हेरफेर की जांच बढ़ी. फ्रंट-रनिंग के मामले बढ़े. निगरानी प्रणालियां लगातार अलर्ट देती रहीं. निरीक्षक रिपोर्ट दाखिल करते रहे. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) सो नहीं रहा था.

तो फिर क्या बदला? उसके बाद जो कुछ होता था, वह सब.

2024-25 में SEBI ने 342 औपचारिक प्रवर्तन कार्यवाही शुरू की थी  धारा 11 के निर्देश, मध्यस्थों से जुड़ी जांच और अधिनिर्णयन मामले, जो किसी निष्कर्ष को उसके परिणाम में बदलते हैं. 2025-26 में, तुहिन कांता पांडे के पहले पूर्ण वर्ष के दौरान, यह संख्या घटकर 198 रह गई. यानी 12 महीनों में 42% की गिरावट.

प्रशासनिक चेतावनियां 1,678 से गिरकर 397 रह गईं. रिकवरी सर्टिफिकेट वह साधन जो वास्तव में डिफॉल्टरों से पैसा निकलवाता है 942 से घटकर 376 रह गए. SEBI के अधिनिर्णयन अधिकारियों द्वारा लगाए गए जुर्माने 29% घट गए. तलाशी लगभग आधी रह गई. एक्सचेंजों द्वारा ब्रोकरों के निरीक्षण में एक-तिहाई से अधिक की गिरावट आई. अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) के निरीक्षण 69% गिर गए.

इनमें से किसी भी आंकड़े पर विवाद नहीं है. ये सभी SEBI की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में हैं, जो वह संसद के समक्ष रखता है और जिनमें दो वर्षों के आंकड़े साथ-साथ दिए जाते हैं, ताकि तुलना की जा सके. 342 और 198 इन तीन तालिकाओं की समान आधार पर की गई तुलना का परिणाम हैं.

प्रवर्तन को चार चरणों वाली मशीन मानिए. निगरानी. पकड़ना. आरोप लगाना. सजा देना.

बाजार के पुलिसकर्मी के तौर पर SEBI नरम पड़ा

संस्थाओं की तलाशी में 46% की गिरावट आई. एक्सचेंजों द्वारा ब्रोकरों के निरीक्षण में 36% की गिरावट आई. SEBI के अपने ब्रोकर निरीक्षण 45% घट गए. डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट और AIF निरीक्षण, दोनों में 69% की गिरावट आई.

पकड़ने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत बेहतर बनी रही. शुरू की गई जांच में केवल 12% की गिरावट आई. हेरफेर और फ्रंट-रनिंग की जांच वास्तव में बढ़ी. पूरी की गई जांच में मामूली 5% की गिरावट आई.

इससे क्या पता चलता है? SEBI ने उल्लंघनों को पकड़ना बंद नहीं किया. उसने उन निष्कर्षों में से कम मामलों को प्रवर्तन में बदलना बंद कर दिया यानी कम आरोप लगाए और फिर बाकी बचे प्रवर्तन को रिपोर्ट करने का तरीका बदल दिया.

मशीन रुक गई

धारा 11 के तहत शुरू की गई कार्यवाही में 55% की गिरावट आई. मध्यस्थों से जुड़ी जांच आधी रह गई. शुरू किए गए अधिनिर्णयन मामलों में एक-तिहाई की गिरावट आई. कुल औपचारिक कार्यवाही 42% घट गई. रिकवरी सर्टिफिकेट 60% घट गए. वसूले गए सेटलमेंट शुल्क 86% गिर गए. चेतावनियां तीन-चौथाई, यानी 75% घट गईं.

सबसे साफ माप आसान है. शुरू की गई कार्यवाही बनाम पूरी की गई जांच. दो साल पहले यह अनुपात 1.68 था. पिछले साल यह 0.55 रह गया. SEBI जांच पूरी करता रहा. उसने जो कुछ पाया, उसके खिलाफ औपचारिक मामले बहुत कम खोले. निश्चित रूप से मामलों में देरी होती है. मार्च में बंद हुई जांच बाद में कार्यवाही में बदल सकती है. लेकिन तीन वर्षों के आंकड़ों में दिशा फिर भी स्पष्ट है, और यह उस दिशा के बिल्कुल विपरीत है जो अधिक दक्षता का दावा करने वाला नियामक दिखाता.

एक आंकड़ा लगभग असंभव है जिसे समझाकर टाला जा सके. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए प्रशासनिक चेतावनियां 2023-24 में 1,314 थीं, अगले वर्ष 956 और 2025-26 में 68 — यानी एक ही साल में 93% की गिरावट. यह वह वर्ष था जब FPI ने भारतीय बाजारों से रिकॉर्ड ₹1.52 लाख करोड़ निकाले, जो SEBI द्वारा दर्ज अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक बहिर्वाह था. अचानक नियामक ने उन्हीं निवेशकों को 103 “सलाहकारी” पत्र जारी किए, जबकि पिछले दो वर्षों में यह श्रेणी शून्य थी. भाषा नरम थी, डिफॉल्ट का कोई रिकॉर्ड नहीं था और आगे कार्रवाई की कोई आसान राह नहीं थी.

यही पैटर्न AIF के मामले में भी दिखाई देता है, जो देश में निजी पूंजी का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ स्रोत है.

चेतावनियां: 377 से 44 और फिर 14. दो वर्षों में 96% की गिरावट, जबकि AIF प्रतिबद्धताएं बढ़कर ₹16.94 लाख करोड़ हो गईं और फंड-ऑफ-फंड लेयरिंग दोगुनी हो गई. AIF के निरीक्षण घटकर पांच रह गए. ज्यादा पैसा, कम निरीक्षण, लगभग कोई चेतावनी नहीं. डिबेंचर ट्रस्टी, रजिस्ट्रार, पोर्टफोलियो मैनेजर, मर्चेंट बैंकर, सूची यही दोहराती है. यहां तक कि एक्सचेंज, क्लियरिंग कॉरपोरेशन और डिपॉजिटरी भी 27 चेतावनियों से घटकर सात पर आ गए. यह उस बाजार का प्रोफाइल नहीं हो सकता जो अचानक नियमों का पालन करने लगा हो.

SEBI के पास इसका तैयार जवाब है और उसका एक हिस्सा सही भी है. अधिनिर्णयन मामलों का बैकलॉग खत्म कर दिया गया है. लंबित मामले तेजी से घटे हैं. दो साल से पुराने मामलों में और भी ज्यादा कमी आई है. वास्तविक काम हुआ है. चेयरमैन “ऑप्टिमम रेगुलेशन” की बात करते हैं, जहां निवेशक सुरक्षा के लिए जरूरी हो वहां सख्ती और जहां सुरक्षा कमजोर किए बिना बाधाओं को हटाया जा सकता है वहां नरम रुख. ब्रोकरों पर लगाए जाने वाले जुर्माने को तर्कसंगत बनाना उपलब्धि के रूप में सूचीबद्ध है. विश्व बैंक सहित गंभीर संस्थान, जिसका आकलन उसी वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित है, लंबे समय से तर्क देते रहे हैं कि भारतीय प्रतिभूति नियमन जरूरत से ज्यादा जटिल हो गया था.

लेकिन बैकलॉग खत्म करने से मामलों के निपटारे में गिरावट समझ आती है. यह मामलों के शुरू होने में 55% की गिरावट, जारी किए गए रिकवरी सर्टिफिकेट में 60% की गिरावट, तलाशी ली गई संस्थाओं में 46% की गिरावट या एक हजार से ज्यादा चेतावनी पत्र जारी न किए जाने को नहीं समझाता. और एक आंकड़ा दक्षता की कहानी को चुपचाप नुकसान पहुंचाता है. दो साल से अधिक समय से लंबित धारा 11 के मामले 25 से बढ़कर 37 और फिर 54 हो गए. आसान मामले निपटाए जा रहे हैं. कठिन और पुराने मामले और पुराने हो रहे हैं. यह दक्षता से ज्यादा छंटाई जैसा लगता है.

एक दूसरा रास्ता भी है जिसे SEBI अपना सकता है. सेटलमेंट में गिरावट के बारे में कहा जा सकता है कि यह 2024-25 में चलने वाली एक बार की Illiquid Stock Options योजना का परिणाम थी. ऐसा नहीं है. SEBI की अपनी रिपोर्ट बताती है कि उस योजना से उस वर्ष वसूले गए ₹798.9 करोड़ में केवल ₹10.8 करोड़ आए. उसने संस्थाओं की संख्या बढ़ाई. पैसे पर उसका असर नहीं पड़ा.

233 बनाम 2

पहली नजर में एक आंकड़ा इसके विपरीत जाता दिखाई देता है. आपराधिक अभियोजन बढ़कर 65 हो गए, जो पहले 42 थे. कार्रवाई? आम व्यक्ति को यह प्रभावशाली लग सकता है. लेकिन फिर आप देखते हैं कि ये किस लिए थे.

65 में से 51 उन लोगों के खिलाफ थे जिन्हें SEBI पहले ही दंडित कर चुका था और जिन्होंने भुगतान नहीं किया था — यानी मूल रूप से पहले से लगाए गए मौद्रिक दंड की वसूली के लिए आपराधिक अदालतों का इस्तेमाल. धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार (PFUTP), बाजार में हेरफेर को दंडित करने के लिए बनाई गई वही धारा, के तहत केवल दो आपराधिक अभियोजन हुए, बेहद कम.

फिर भी उसी वार्षिक रिपोर्ट में कहीं और SEBI कहता है कि PFUTP के लिए 233 संस्थाओं को दंडित किया गया. 233 नियामकीय दंड. दो आपराधिक अभियोजन. क्या इससे सवाल नहीं उठते?

अधिनिर्णयन और अभियोजन अलग-अलग वैधानिक प्रक्रियाएं हैं और इनमें सबूत के अलग-अलग मानक होते हैं. SEBI के लिए एक को दूसरे में बदलना अनिवार्य नहीं है. लेकिन तुलना फिर भी एक सवाल खड़ा करती है जिसका नियामक ने कभी जवाब नहीं दिया: SEBI के अनुसार अब बाजार में हेरफेर का किस स्तर का मामला आपराधिक अदालत के योग्य है? तीन वर्षों में इसका जवाब तीन मामले प्रतीत होता है.

यह मुख्य अभियोजन आंकड़े की चाल को भी उजागर करता है. एक नियामक आपराधिक अभियोजन में 55% की वृद्धि की घोषणा कर सकता है, जबकि उनमें से पांच में से चार मामले उन लोगों से जुड़े हों जिन्होंने पहले से लगाए गए जुर्माने का भुगतान नहीं किया. आंकड़ा कार्रवाई जैसा सुनाई देता है. लेकिन इसकी संरचना एक अलग कहानी बताती है.

तीन वर्षों में SEBI ने 149 आपराधिक अभियोजन दाखिल किए. इनमें से तीन बाजार धोखाधड़ी के लिए थे. इनके पीछे एक कब्रिस्तान है: अदालतों में 1,049 मामले लंबित हैं, जिनमें से 90% दो साल से ज्यादा पुराने हैं. 1992 से अब तक दो हजार से अधिक अभियोजनों में SEBI को 295 मामलों में दोषसिद्धि मिली है. दोषसिद्धि की तुलना में अधिक मामलों में पैसे के लिए समझौता हुआ है.

SAT में कहानी

इस बीच SEBI Securities Appellate Tribunal (SAT) में ज्यादा बार हार रहा है. उसकी पूरी तरह जीत की दर पिछले वर्ष के 73% से घटकर 41.8% रह गई. प्रतिकूल या आंशिक रूप से प्रतिकूल परिणाम तय किए गए कुल मामलों के आधे से अधिक हो गए. फाइलिंग में गिरावट के बावजूद ट्रिब्यूनल में लंबित मामलों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. मामले का स्वरूप मायने रखता है और एक खराब वर्ष गिरावट साबित नहीं करता. लेकिन बाकी सभी आंकड़ों के साथ इतनी बड़ी गिरावट के लिए अभी भी ऐसे स्पष्टीकरण की जरूरत है जो नहीं दिया गया है.

फिर खिड़कियां बंद हुईं, पारदर्शिता भी घटी

2024-25 की रिपोर्ट में संसद को एक स्पष्ट वाक्य में बताया गया था कि SEBI ने धारा 11 की प्रवर्तन कार्यवाही के जरिए ₹813.83 करोड़ का जुर्माना लगाया था. इसके साथ एक तालिका भी थी जिसमें 463 संस्थाओं और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण था.

2025-26 की रिपोर्ट में ऐसा कोई तुलनीय आंकड़ा नहीं दिया गया. इसमें प्रकाशित एकमात्र जुर्माने का आंकड़ा ₹35.5 करोड़ है, जो उसके अधिनिर्णयन अधिकारियों द्वारा लगाया गया यह एक संकीर्ण माप है, जिसे SEBI ने एक साल पहले भी बताया था, जब यह ₹50.31 करोड़ था. इसलिए दोनों रिपोर्टों में मौजूद एकमात्र जुर्माना माप पर कुल राशि 29% घटी. बड़े माप पर अब SEBI के बाहर कोई यह नहीं बता सकता, क्योंकि नियामक ने इसे प्रकाशित करना बंद कर दिया है. अचानक.

SEBI यह तर्क दे सकता है कि ₹813.83 करोड़ एक-दो असाधारण आदेशों की वजह से बढ़ा हुआ था. उसने ऐसा कभी नहीं कहा. उसने बिना विवरण के कुल राशि प्रकाशित की, यह बताने से इनकार किया कि उसमें क्या शामिल था और अब उस कुल राशि को प्रकाशित करना ही बंद कर दिया है. अगर यह आंकड़ा विकृत था, तो नियामक के पास यह बताने की पूरी स्वतंत्रता थी,  किसी भी वर्ष में.

यह भी गायब हो गया: कितनी संस्थाओं को प्रतिबंधित किया गया. 2024-25 में SEBI ने बताया था कि 202 संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया गया, 89 पर प्रतिबंध के साथ-साथ राशि लौटाने का आदेश दिया गया और 15 को केवल राशि लौटाने का आदेश दिया गया. 2025-26 के लिए इसका कोई समकक्ष आंकड़ा नहीं है.

यह भी गायब: कितने रजिस्ट्रेशन रद्द या निलंबित किए गए. “Type of Enforcement Actions Taken” शीर्षक वाली एक तालिका में 560 संस्थाओं के खिलाफ निषेधात्मक निर्देश, 28 रद्दीकरण और नौ निलंबन दर्ज थे. पूरी तालिका हटा दी गई है.

यह भी गायब: क्या SEBI सुप्रीम कोर्ट में जीतता है. पिछले साल की रिपोर्ट में कहा गया था कि 72 मामले, यानी 90%, SEBI के पक्ष में निपटाए गए और आठ उसके खिलाफ. इस साल उसने निपटाए गए मामलों की संख्या 54 तो दी है, लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं बताया.

यह भी गायब: SEBI की अपनी निगरानी प्रणालियों से कितने प्रवर्तन आदेश शुरू हुए. एक छोटी सी तालिका, जिसे उस वर्ष चुपचाप हटा दिया गया जब नियामक ने अपने नए AI निगरानी प्लेटफॉर्म का जश्न मनाने के लिए एक पूरा अध्याय समर्पित किया.

और बाजार पर बकाया कर्ज का मुख्य आंकड़ा भी हटा दिया गया है. एक साल पहले SEBI ने लंबित रिकवरी सर्टिफिकेट पर कुल बकाया राशि ₹1,04,583 करोड़ बताई थी. नई रिपोर्ट अब कुल राशि नहीं देती. वह अलग-अलग हिस्से प्रकाशित करती है, सक्रिय प्रमाणपत्र, वसूल न की जा सकने वाली राशि, अदालत में फंसी रकम — जो मिलकर लगभग ₹1.2 लाख करोड़ बैठती है. कर्ज बढ़ गया. मुख्य आंकड़ा गायब हो गया.

SEBI नरम पड़ा और उसी समय खुद को मापना कठिन बना दिया.

बदलता हुआ मापदंड

SEBI ने जांच की गिनती का तरीका भी बदल दिया. पिछली रिपोर्ट में कॉरपोरेशन-फाइनेंस जांच को मुख्य जांच संख्या से बाहर रखा गया था. नई रिपोर्ट में उन्हें शामिल किया गया है. दोनों मुख्य आंकड़ों को लगातार पढ़ने पर प्रवर्तन की तस्वीर काफी हद तक स्थिर यहां तक कि बेहतर दिखाई देती है. लेकिन दोनों वर्षों को समान आधार पर रखें तो शुरू की गई जांच 459 से घटकर 402 और पूरी की गई जांच 356 से घटकर 338 रह गईं. नियामक ने केवल संख्या नहीं बदली. उसने यह भी बदल दिया कि संख्या का मतलब क्या था. बिना स्पष्ट सूचना के परिभाषा में ऐसा बदलाव जो मौजूदा वर्ष को बेहतर दिखाता है. दिलचस्प.

दोनों दस्तावेजों के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास भी है: 2024-25 में मर्चेंट बैंकरों को दी गई प्रशासनिक चेतावनियां एक रिपोर्ट में 55 और दूसरी में 85 दिखाई गई हैं. एक ही वर्ष, एक ही माप, 30 पत्रों का अंतर.

वह हाथी जिसे छोड़ दिया गया

यह कोई शांत वर्ष नहीं था. 3 जुलाई 2025 को SEBI ने इंडेक्स में कथित हेरफेर के मामले में Jane Street Group से ₹4,843.57 करोड़ जब्त किए — यह नियामक के तीन दशक से अधिक के इतिहास में अपनी तरह का सबसे बड़ा आदेश था. पैसा एस्क्रो में चला गया. एक सप्ताह बाद फर्म ने कारोबार फिर शुरू कर दिया. यह मामला भारतीय बाजारों में सबसे ज्यादा निगरानी वाला मामला बना हुआ है.

उस वर्ष को कवर करने वाली वार्षिक रिपोर्ट में “Jane Street” शब्द नहीं है.

इसमें 63,176 निवेशक जागरूकता कार्यक्रम, एक AI धोखाधड़ी-पहचान प्लेटफॉर्म, Google Play के साथ साझेदारी, क्वांटम क्रिप्टोग्राफी की तैयारी और “Vibe Coding” नाम की किसी चीज में कर्मचारियों का प्रशिक्षण शामिल है. इसमें अदालत के फैसलों के सारांश के लिए 12 पेज हैं, जिनमें वे मामले भी शामिल हैं जिन्हें SEBI हार गया और एक मामला जिसमें उसे लागत चुकाने का आदेश दिया गया. लेकिन यह संसद को यह नहीं बताता कि अपनी प्रवर्तन कार्यवाही के जरिए लगाया गया कुल जुर्माना कितना था, कितनी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया गया, कितने रजिस्ट्रेशन रद्द किए गए या बाजार पर निवेशकों का कितना पैसा अब भी बकाया है.

एक नियामक को अपनी कार्यप्रणाली बदलने का अधिकार है. पांडे ने खुले तौर पर कहा है कि वह कम बाधाओं और अधिक अनुपातिकता के पक्ष में हैं. इतनी महत्वपूर्ण नीति का ऐलान, बचाव और मापन किया जाना चाहिए. इसे तालिकाओं में लागू किया गया और टेक्स्ट से बाहर छोड़ दिया गया. SEBI ने कहीं यह नहीं बताया कि प्रवर्तन कार्यवाही में 42% की गिरावट क्यों आई, विदेशी निवेशकों को दी जाने वाली चेतावनियां 93% क्यों घट गईं या अब वह आधी संस्थाओं की तलाशी क्यों लेता है. जब आंकड़े इतनी तेजी से गिरते हैं और उसी दस्तावेज में उन आंकड़ों के माप भी गायब हो जाते हैं, तो स्पष्टीकरण का दायित्व कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाता है.

ये आंकड़े किसी गलत आचरण को साबित नहीं कर सकते और किसी को ऐसा दावा नहीं करना चाहिए. वे जो स्थापित करते हैं, वह यह है कि भारत का बाजार नियामक किस तरह जांच करता है, आरोप लगाता है, दंड देता है और प्रवर्तन की रिपोर्ट करता है, उसमें नाटकीय और अस्पष्ट बदलाव आया है. SEBI अपनी कार्यप्रणाली बदल सकता है. वह सजा के बजाय अनुपातिकता को चुन सकता है. वह अपनी प्रवर्तन व्यवस्था को दोबारा डिजाइन कर सकता है. लेकिन वह जनता से यह उम्मीद नहीं कर सकता कि वह इस बदलाव का आकलन उस समय करे, जब वह खुद इस बदलाव को मापने का तरीका बदल रहा हो.

इसलिए सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि SEBI नरम पड़ गया है.

बल्कि, फायदा किसे हुआ?

स्रोत: सभी आंकड़े संसद के समक्ष रखे गए दो वैधानिक दस्तावेजों से लिए गए हैं: SEBI (Annual Report) Rules, 2021 के तहत SEBI Annual Report 2024-25 (12 अगस्त 2025 को प्रकाशित) और SEBI Annual Report 2025-26 (6 अगस्त 2026 को प्रकाशित). तीन वर्षों के जांच आंकड़े सभी स्ट्रीम के समान आधार पर दिए गए हैं और इसलिए प्रत्येक रिपोर्ट में प्रकाशित मुख्य आंकड़ों से अलग हैं. 342 और 198 औपचारिक कार्यवाहियों का आंकड़ा धारा 11 के निर्देशों, मध्यस्थों से जुड़ी जांच और शुरू किए गए अधिनिर्णयन मामलों को दोनों वर्षों में समान आधार पर जोड़कर तैयार किया गया है. Jane Street के आदेश से जुड़े विवरण SEBI की जुलाई 2025 की अपनी प्रेस रिलीज से लिए गए हैं, वार्षिक रिपोर्ट से नहीं. 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 
 


10 साल में GeM का GMV ₹422 करोड़ से बढ़कर ₹1.55 लाख करोड़ के पार: गोयल

पीयूष गोयल ने कहा, डिजिटल खरीद प्रक्रिया के जरिए प्लेटफॉर्म ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, कीमतों की बेहतर खोज, खरीद प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करने और जवाबदेही मजबूत करने में मदद की है.

Last Modified:
Monday, 10 August, 2026
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सरकारी खरीद के लिए बनाए गवर्मेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) ने पिछले एक दशक में तेजी से विस्तार किया है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, GeM का सकल व्यापारिक मूल्य (GMV) एक दशक पहले के ₹422 करोड़ से बढ़कर अब ₹1.55 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया है. उन्होंने कहा कि GeM ने सरकारी खरीद प्रक्रिया को देशभर में एंड-टू-एंड डिजिटल मार्केटप्लेस की दिशा में आगे बढ़ाया है.

10 साल में सरकारी खरीद का बदला तरीका

पीयूष गोयल ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में GeM ने सार्वजनिक खरीद की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है. डिजिटल खरीद प्रक्रिया के जरिए प्लेटफॉर्म ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, कीमतों की बेहतर खोज, खरीद प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करने और जवाबदेही मजबूत करने में मदद की है. 7 अगस्त 2026 तक GeM पर शुरुआत से अब तक कुल GMV ₹20 लाख करोड़ को पार कर चुका था. इस दौरान प्लेटफॉर्म पर 3.78 करोड़ से अधिक ऑर्डर दर्ज किए गए हैं.

12.28 लाख से ज्यादा MSEs GeM पर रजिस्टर्ड

GeM पर इस समय 12.28 लाख से अधिक माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज (MSEs) रजिस्टर्ड हैं. इनमें 2.25 लाख से ज्यादा महिला नेतृत्व वाले MSEs शामिल हैं. MSEs ने प्लेटफॉर्म पर ₹9 लाख करोड़ से अधिक के ऑर्डर पूरे किए हैं. यह GeM के कुल संचयी GMV का करीब 45.6 फीसदी है. इसके अलावा, 69,000 से अधिक SC/ST स्वामित्व वाले MSEs ने ₹23,000 करोड़ से ज्यादा मूल्य के ऑर्डर पूरे किए हैं.

महिला उद्यमियों और स्टार्टअप्स की भी बढ़ी भागीदारी

GeM पर महिला नेतृत्व वाले MSEs ने 50 लाख से ज्यादा ऑर्डर पूरे किए हैं, जिनकी कुल कीमत ₹99,800 करोड़ से अधिक है. वहीं, GeM पर रजिस्टर्ड 42,000 से ज्यादा स्टार्टअप्स ने ₹65,900 करोड़ से अधिक के संयुक्त GMV वाले ऑर्डर पूरे किए हैं. GeM का ‘स्टार्टअप रनवे’ फीचर उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स के उत्पादों को 13 अलग-अलग प्रोडक्ट कैटेगरी में प्रदर्शित करता है. इसके अलावा, ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) के तहत GeM ने 600 से ज्यादा प्रोडक्ट कैटेगरी वाला GeM बाजार भी तैयार किया है.

MSEs, स्टार्टअप्स और कारीगरों के लिए बढ़ी बाजार तक पहुंच

गोयल ने कहा कि GeM ने MSEs, स्टार्टअप्स, महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs), कारीगरों और बुनकरों के लिए सरकारी बाजार तक पहुंच आसान बनाई है. उन्होंने इन प्रयासों को सरकार के ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान से भी जोड़ा.

GeM Sahay से 25,000 से ज्यादा यूजर्स जुड़े

MSEs को सरकारी ऑर्डर के आधार पर कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई GeM Sahay पहल से 25,000 से ज्यादा यूजर्स जुड़ चुके हैं. इसके तहत MSEs को सक्रिय सरकारी खरीद ऑर्डर के आधार पर बिना किसी कोलेटरल के वर्किंग कैपिटल फाइनेंस की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य है.

गोयल ने कहा कि GeM आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के साथ विकसित भारत की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. उनके मुताबिक, पिछले एक दशक में प्लेटफॉर्म के विस्तार ने डिजिटल प्रक्रियाओं के जरिए सार्वजनिक खरीद के तौर-तरीकों को बदल दिया है.
 


मुनाफे में 19% गिरावट का असर, रेमंड रियल्टी के शेयर 10% से ज्यादा टूटे; जानें पूरी वजह

सोमवार की तेज गिरावट के बावजूद रेमंड रियल्टी के शेयर ने पिछले छह महीनों में करीब 30 फीसदी का रिटर्न दिया है. कंपनी का मार्केट कैप ₹4,100 करोड़ से ज्यादा है.

Last Modified:
Monday, 10 August, 2026
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रेमंड रियल्टी (Raymond Realty) के जून तिमाही के नतीजे बाजार की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 19 फीसदी घटकर ₹13.43 करोड़ रह गया. नतीजों के बाद सोमवार को निवेशकों ने शेयर में जमकर बिकवाली की, जिससे बीएसई पर रेमंड रियल्टी का शेयर करीब 10.5 फीसदी टूटकर ₹617.10 के निचले स्तर पर पहुंच गया. हालांकि, कंपनी की सेल्स बुकिंग और EBITDA में मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

कमाई बढ़ी, फिर भी मुनाफा क्यों घटा?

रेमंड रियल्टी ने अप्रैल-जून 2026 तिमाही के नतीजे 7 अगस्त को जारी किए थे. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट पिछले साल की समान तिमाही के ₹16.50 करोड़ से घटकर ₹13.43 करोड़ रह गया. यानी मुनाफे में करीब 19 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, कंपनी की कुल आय में अच्छी बढ़ोतरी हुई है. जून 2026 तिमाही में कुल इनकम बढ़कर ₹535.71 करोड़ हो गई, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह ₹391.86 करोड़ थी. इसके बावजूद मुनाफे पर दबाव रहा. इसकी प्रमुख वजह कंपनी के खर्च में हुई तेज बढ़ोतरी रही.

जून तिमाही में कंपनी का कुल खर्च बढ़कर ₹520.54 करोड़ हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में ₹370.41 करोड़ था. यानी आय बढ़ने के साथ खर्च भी काफी तेजी से बढ़ा, जिसका सीधा असर कंपनी के मुनाफे पर पड़ा.

सेल्स बुकिंग दोगुने से ज्यादा बढ़ी

मुनाफे में गिरावट के बावजूद रेमंड रियल्टी के ऑपरेशनल प्रदर्शन में मजबूती देखने को मिली है. जून तिमाही में कंपनी की सेल्स बुकिंग ₹700 करोड़ रही, जो पिछले साल की समान तिमाही के ₹306 करोड़ से दोगुने से भी ज्यादा है. कंपनी के EBITDA में भी मजबूत बढ़ोतरी हुई है. EBITDA पिछले साल के ₹29.8 करोड़ से बढ़कर ₹61.2 करोड़ हो गया. वहीं, EBITDA मार्जिन 7.8 फीसदी से बढ़कर 11.6 फीसदी हो गया.

एक साल पहले ही शेयर बाजार में हुई थी लिस्टिंग

रेमंड रियल्टी का शेयर बाजार में सफर अभी ज्यादा पुराना नहीं है. यह रेमंड लिमिटिड से डीमर्ज होकर एक स्वतंत्र रियल्टी कारोबार के रूप में सामने आया. कंपनी के शेयर 1 जुलाई 2025 को शेयर बाजार में लिस्ट हुए थे. डीमर्जर के तहत 14 मई 2025 तक रेमंड लिमिटिड के शेयर रखने वाले निवेशकों को प्रत्येक एक शेयर के बदले रेमंड रियल्टी का एक शेयर मिला था. इससे पहले रेमंड ग्रुप ने अपने लाइफस्टाइल फैशन कारोबार को भी अलग कर रेमंड लाइफस्टाइल लिमिटिड के नाम से एक अलग लिस्टेड कंपनी बनाई थी.

6 महीने में करीब 30% का रिटर्न

सोमवार की तेज गिरावट के बावजूद रेमंड रियल्टी के शेयर ने पिछले छह महीनों में करीब 30 फीसदी का रिटर्न दिया है. कंपनी का मार्केट कैप ₹4,100 करोड़ से ज्यादा है. जून 2026 के अंत तक प्रमोटर्स के पास कंपनी की 50.93 फीसदी हिस्सेदारी थी. यानी ताजा गिरावट के बावजूद शेयर का हालिया प्रदर्शन पूरी तरह कमजोर नहीं रहा है. हालांकि, तिमाही मुनाफे में गिरावट और बढ़ते खर्च पर बाजार की नजर बनी रहेगी.


भारत की बड़ी उपलब्धि! गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता 300 GW के पार, 2030 के लक्ष्य का 60% हासिल

31 जुलाई तक देश की गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 300.50 GW पहुंची, कुल स्थापित बिजली क्षमता में 54% से ज्यादा हिस्सेदारी; सौर ऊर्जा सबसे आगे

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Monday, 10 August, 2026
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भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक और बड़ा मुकाम हासिल किया है. देश की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 300 GW के पार पहुंच गई है. सरकार के मुताबिक, 31 जुलाई 2026 तक यह क्षमता बढ़कर 300.50 GW हो गई. इसके साथ ही भारत ने 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता स्थापित करने के लक्ष्य का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा हासिल कर लिया है.

कुल बिजली क्षमता में 54% से ज्यादा हिस्सेदारी

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोत अब भारत की कुल करीब 552 GW की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में 54 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी रखते हैं. इसमें सौर, पवन, जलविद्युत, बायो-पावर और परमाणु ऊर्जा शामिल हैं.

गैर-जीवाश्म क्षमता में सबसे बड़ा योगदान सौर ऊर्जा का है. देश में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 164.59 GW हो गई है. इसके बाद पवन ऊर्जा की क्षमता 58.14 GW और बड़ी एवं छोटी जलविद्युत परियोजनाओं की संयुक्त क्षमता 57.24 GW है. वहीं, बायो-पावर की क्षमता 11.75 GW और परमाणु ऊर्जा की क्षमता 8.78 GW है.

10 साल में सौर क्षमता करीब 165 GW पहुंची

भारत ने पिछले एक दशक में सौर ऊर्जा क्षमता में तेज विस्तार किया है. वर्ष 2014 में देश की सौर क्षमता महज 2.8 GW थी, जो अब बढ़कर करीब 165 GW हो गई है. इसी अवधि में पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता भी 21 GW से बढ़कर 58 GW से अधिक हो गई है.

एक साल में जुड़ी 55.29 GW गैर-जीवाश्म क्षमता

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने गैर-जीवाश्म बिजली उत्पादन क्षमता में रिकॉर्ड 55.29 GW की बढ़ोतरी की. इसमें अकेले 44.6 GW सौर ऊर्जा और 6 GW पवन ऊर्जा क्षमता शामिल थी. स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. सरकार के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में नवीकरणीय बिजली उत्पादन बढ़कर 477.79 अरब यूनिट हो गया, जबकि वित्त वर्ष 2014-15 में यह 190.96 अरब यूनिट था. यानी करीब एक दशक में नवीकरणीय बिजली उत्पादन दोगुने से भी अधिक हो गया है.

घरेलू सोलर मैन्युफैक्चरिंग को मिल रहा बढ़ावा

सरकार ने देश में स्वच्छ ऊर्जा के घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए हैं. सरकार की मॉडल और निर्माताओं की स्वीकृत सूची (ALMM) के तहत शामिल सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल की विनिर्माण क्षमता 200 GW के पार पहुंच गई है. 2014 में यह क्षमता महज 2.3 GW थी. घरेलू स्तर पर उच्च दक्षता वाले सोलर मॉड्यूल के उत्पादन को बढ़ावा देने और आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI) योजना समेत कई प्रोत्साहन दिए हैं.

2030 तक 500 GW क्षमता का लक्ष्य

भारत ने 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य तय किया है. यह देश की व्यापक जलवायु रणनीति का अहम हिस्सा है. 300.50 GW की क्षमता हासिल होने के साथ भारत इस लक्ष्य के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से को पहले ही पूरा कर चुका है.
 


अनिल अंबानी ग्रुप से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ED की बड़ी कार्रवाई, दो मामलों में चार्जशीट दाखिल

Reliance Infrastructure समेत कई कंपनियों और पूर्व अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई, शेल कंपनियों के जरिए फंड डायवर्जन और लेयरिंग का आरोप

Last Modified:
Monday, 10 August, 2026
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प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रुप (Reliance Group) से जुड़ी कंपनियों और पूर्व अधिकारियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के दो अलग-अलग मामलों में चार्जशीट दाखिल की है. एजेंसी ने फंड के डायवर्जन और शेल कंपनियों के जरिए पैसों की लेयरिंग का आरोप लगाया है. इनमें एक मामला रिलायंस इंफ्रा (Reliance Infrastructure Ltd) और दूसरा रिलायंस कम्यूनिकेशंस (RCOM), रिलायंस टेलीकॉम (RTL) और रिलायंस इंफ्राटेल (Reliance Infratel Ltd) से जुड़ा है.

रिलायंस इंफ्रा मामले में चार्जशीट दाखिल

ईडी ने शनिवार को द्वारका स्थित विशेष धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) अदालत में रिलायंस इंफ्रा, रिलायंस ग्रुप के पूर्व अधिकारी सतीश सेठ और अन्य के खिलाफ अभियोजन शिकायत यानी चार्जशीट दाखिल की. यह मामला मुंबई पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंसिस विंग (EOW) की जांच के बाद सामने आया. पुलिस की जांच में आरोप लगाया गया था कि फर्जी दस्तावेजों और बैंक खातों के जरिए शेल कंपनियां बनाई गईं. इन कंपनियों का इस्तेमाल कथित तौर पर फंड ट्रांसफर करने और विदेशों में पैसे भेजने के लिए किया गया. एजेंसी के मुताबिक, यह रकम बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए डायमंड एक्सपोर्ट से जुड़े फर्जी इनवॉइस के जरिए भेजी गई.

NHAI की चार सड़क परियोजनाओं से फंड डायवर्जन का आरोप

ईडी ने कहा कि उसकी जांच में NHAI की ओर से आवंटित चार टोल रोड परियोजनाओं से फंड डायवर्ट करने की एक संगठित योजना का पता चला है. इनमें Trichy-Karur, Trichy-Dindigul, Salem-Ulundurpet और Jaipur-Reengus परियोजनाएं शामिल हैं. एजेंसी के मुताबिक, इन परियोजनाओं को NHAI के अनुदान के साथ-साथ बैंकों और वित्तीय संस्थानों से मिले कर्ज के जरिए वित्तपोषित किया गया था.

शेल कंपनियों के जरिए पैसों की लेयरिंग का आरोप

ईडी के अनुसार, रिलायंस इंफ्रा, परियोजना-विशिष्ट स्पेशल पर्पज व्हीकल्स (SPV) या इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन (EPC) ठेकेदारों से रकम निर्माण ठेकेदारों तक पहुंचाई गई. इसके बाद कथित तौर पर यह पैसा ऐसी शेल कंपनियों को ट्रांसफर किया गया, जिनका सड़क निर्माण से कोई संबंध नहीं था. एजेंसी का आरोप है कि बाद में इन लेनदेन को वास्तविक परियोजना खर्च दिखाने के लिए दस्तावेज तैयार किए गए. इसके बाद शेल कंपनियों और डायमंड कारोबारियों के जरिए रकम की लेयरिंग की गई.

सतीश सेठ न्यायिक हिरासत में

ईडी ने सतीश सेठ को जून में गिरफ्तार किया था और वह फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं. सेठ ने 2025 में रिलायंस ग्रुप छोड़ दिया था. एजेंसी ने बताया कि उसने रिलायंस इंफ्रा के पास मौजूद रिलायंस पावर के इक्विटी शेयरों और अचल संपत्तियों के साथ Ksheeraabd Constructions की जमीन भी अटैच की है. इन संपत्तियों की कुल कीमत करीब 187 करोड़ रुपये बताई गई है. ईडी ने कहा कि मामले में अन्य लोगों की भूमिका की जांच अभी जारी है.

RCOM और अन्य कंपनियों से जुड़े मामले में भी सप्लीमेंट्री चार्जशीट

एक अलग मामले में ईडी ने शनिवार को नई दिल्ली के राउज एवेन्यू स्थित विशेष अदालत में रिलायंस कॉम (RCOM), रिलायंस टेलीकॉम (RTL) और रिलायंस इंफ्राटेल (Reliance Infratel) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की. यह कार्रवाई मार्च में दाखिल की गई ईडी की मुख्य चार्जशीट के बाद हुई है. यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के कई मामलों से जुड़ा है, जिनमें तीनों कंपनियों पर फंड आधारित और गैर-फंड आधारित क्रेडिट सुविधाओं के कथित डायवर्जन के आरोप हैं.

अमित दोषी और सतीश सेठ भी गिरफ्तार

ईडी के मुताबिक, RCOM मामले में रिलायंस ग्रुप के पूर्व अधिकारी अमित दोषी को जून में गिरफ्तार किया गया था, जबकि सतीश सेठ को जुलाई में गिरफ्तार किया गया. दोनों फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं. अमित दोषी ने 2020 में रिलायंस ग्रुप छोड़ दिया था. मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े इन मामलों में ईडी की जांच आगे भी जारी है और एजेंसी अन्य आरोपियों तथा कथित वित्तीय लेनदेन में शामिल लोगों की भूमिका की जांच कर रही है.


सेबी हर बिस्किट का हिसाब रख सकता है, ₹4,843 करोड़ का नहीं

235 पन्नों के स्क्रीनसेवर और वाइब कोडिंग, उसके अब तक के सबसे बड़े ऑर्डर पर शून्य शब्द

Last Modified:
Monday, 10 August, 2026
BWHindia

पलक शाह

भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) निश्चित रूप से साल के दौरान खर्च किए गए पैसे का हिसाब रखने के बारे में एक-दो बातें जानता है. 2025-26 के लिए नियामक की वार्षिक रिपोर्ट 235 पन्नों की है. रिपोर्ट की यह विशाल लंबाई अपने आप में दिखाती है कि यह ऐसा दस्तावेज नहीं है जो पन्ने भरने के लिए संघर्ष कर रहा हो. इसमें प्रोजेक्ट सुदर्शन, SEBI R(AI)DAR, SUPCOMS, SEBI Setu, SWAGAT-FI, एक India Market Access पोर्टल और Google Play के साथ साझेदारी के लिए पर्याप्त जगह है. यहां तक कि आधिकारिक X अकाउंट लॉन्च करने जैसी मामूली बातें भी 63,176 निवेशक-जागरूकता कार्यक्रमों के उल्लेख के साथ रिपोर्ट में शामिल हैं, साथ ही कर्मचारियों के प्रशिक्षण या उस चीज के लिए भी जगह है जिसे रिपोर्ट 'Vibe Coding' कहती है. आधिकारिक भाषा पर एक अध्याय में डेस्कटॉप स्क्रीनसेवर के लिए भी जगह है. यहां तक कि एक समिति की बैठक के लिए ठीक ₹17,527 का खर्च भी दर्ज है, जो ऐसी राशि है जिस तक शायद बिस्किट गिनकर ही पहुंचा जा सकता है.

किस चीज के लिए जगह नहीं है? जेन स्ट्रीट

सेबी ने अपने 34 साल के नियामकीय इतिहास का सबसे बड़ा डिस्गॉर्जमेंट ऑर्डर दुनिया की सबसे गोपनीय अमेरिकी ट्रेडिंग फर्म के खिलाफ पारित किया, जिसमें बाजार में हेरफेर के लिए ₹4,843.57 करोड़ जब्त किए गए. फिर भी, यह मामला ठीक शून्य बार दिखाई देता है, ऑर्डर 3 जुलाई, 2025 को आया था. 14 जुलाई तक पैसा एस्क्रो में था. एक हफ्ते बाद ही फर्म फिर से ट्रेडिंग कर रही थी. किसी भी बाजार भागीदार से पूछिए कि पिछले साल सेबी ने एक काम क्या किया था और वह यही बताएगा. लेकिन नियामक अपनी वार्षिक रिपोर्ट में जेन स्ट्रीट का उल्लेख न करके इसे कालीन के नीचे दबाना चाहता है, ₹4,843.57 करोड़ कोई फुटनोट, टेबल या लाइन आइटम नहीं हो सकता.

इसके पैमाने को समझने के लिए टेबल 10.19 पर गौर करें, जिसमें पूरे साल सेबी के सभी एडजुडिकेटिंग अधिकारियों द्वारा लगाए गए कुल जुर्माने दर्ज हैं: ₹35.5 करोड़. लेकिन वह आंकड़ा जिसे सेबी छापना नहीं चाहता, उन जुर्मानों की तुलना में लगभग 136 गुना बड़ा है, जिसे उसने वसूल किया. और यह सेबी की चुनिंदा पारदर्शिता की लंबी सूची में केवल एक आइटम है.

इसे क्यों छोड़ा गया? शायद सावधानी या शायद इसलिए कि इसका उल्लेख आगे आने वाले सवालों को आमंत्रित करता है: पैसा किसने गंवाया, इसे वापस कौन पाता है और क्या किसी और की भी उसी रणनीति से काम करने के लिए जांच हो रही है, जो सेबी की जांच में नहीं बल्कि मैनहैटन के एक वाणिज्यिक मुकदमे में सामने आई. कुछ न कहें, और सेबी के इतिहास के सबसे बड़े ऑर्डर के किसी अगले अध्याय की जरूरत नहीं पड़ती.

अमूर्त रूप में प्रवर्तन

इनमें से कोई भी बात इसलिए नहीं है कि रिपोर्ट हेरफेर के विषय से बचती है. चेयरमैन के बयान में कहा गया है कि सेबी ने "मार्केट एब्यूज के खिलाफ कार्रवाई जारी रखी है, जिसमें सिक्योरिटीज और डेरिवेटिव्स बाजारों में हेरफेर, पंप-एंड-डंप योजनाएं, इनसाइडर ट्रेडिंग, फ्रंट-रनिंग और कॉरपोरेट धोखाधड़ी शामिल हैं",  एक ऐसा वाक्य जो दृढ़, आश्वस्त करने वाला और पूरी तरह ऐसे किसी संज्ञा से मुक्त है जिसे कोई पाठक खोज सके.

अध्याय 4.3 इससे काफी आगे जाता है. वास्तव में सावधानीपूर्वक तकनीकी लेखन के कई पन्नों में यह बताया गया है कि सेबी को इंडेक्स डेरिवेटिव्स में एक्सपायरी-डे ट्रेडिंग में बदलाव क्यों करना पड़ा: Future Equivalent Open Interest, इंट्राडे पोजिशन-लिमिट मॉनिटरिंग, दिन में चार रैंडम स्नैपशॉट, प्रत्येक एक्सचेंज पर एक साप्ताहिक इंडेक्स-ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट. इसमें बीमारी का दो बार नाम लिया गया है — "expiry-day hyperactivity" और "concentration or manipulation risk in index options" और इलाज भी विस्तार से बताया गया है.

लेकिन इसमें एक्सपायरी-डे पर इंडेक्स ऑप्शंस में कंसंट्रेशन और हेरफेर के जोखिम से जुड़े मामले का उल्लेख कभी नहीं किया गया. इसमें यह भी नहीं बताया गया कि बीएसई ने जेन स्ट्रीट से संबंधित डेटा साझा नहीं किया था.

यह ऐसा है जैसे इतिहास की सबसे बड़ी समुद्री दुर्घटनाओं के बारे में पढ़ना और उसमें Titanic शब्द न होना, जहाज पर चर्चा है. हिमखंड पर चर्चा है. नए नियमों पर चर्चा है. यात्रियों की सूची, जाहिर तौर पर, गोपनीय है.

जेन स्ट्रीट की अनुपस्थिति को इस आधार पर दोष नहीं दिया जा सकता कि मामला विचाराधीन है, क्योंकि अध्याय 10 लगभग बारह पन्नों में मुकदमेबाजी का खुशी-खुशी सारांश प्रस्तुत करता है. दो विदेशी फंड जिन्होंने अपनी अपीलें गंवाईं. रिलायंस इंडस्ट्रीज और लीक हुई खबर पर ₹30 लाख का जुर्माना. 2008 का एक मामला जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने SEBI से कहा था कि नियामकों पर भी अंतिमता लागू होती है. सहारा, विस्तार से. अपील में मामले, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मामले, सेबी द्वारा हारे गए मामले सभी पर चर्चा की जा सकती है और नियामक के श्रेय के लिए, चर्चा की गई है. केवल एक श्रेणी का मामला ऐसा लगता है जो मेन्यू से बाहर है.

नैतिकता पर तेईस शब्द, बाकी हर चीज पर अठारह पन्ने. एक चूक एक चुनाव है. एक पैटर्न एक दर्शन है.

पारदर्शिता का अगला अध्याय

पिछले साल, सेबी के अपने नेतृत्व के आचरण को लेकर उठे सवालों के बाद, नियामक के हितों के टकराव और खुलासे के ढांचे की समीक्षा के लिए एक हाई-लेवल कमेटी का गठन किया गया था. इस अभ्यास का वार्षिक रिपोर्ट में पूरा विवरण है: "एक हाई-लेवल कमेटी ने हितों के टकराव और खुलासे पर हमारे ढांचे की समीक्षा की और इसकी कई सिफारिशों को लागू करने का निर्णय लिया गया है."

वे शानदार "तेईस शब्द", जिनमें सबसे महत्वपूर्ण शब्द "कई" है. हमें यह नहीं बताया गया कि सिफारिशें क्या थीं, उनकी संख्या कितनी थी, कौन-सी स्वीकार की गईं, कौन-सी नहीं, समिति में कौन शामिल था, उसने कब रिपोर्ट दी या उसकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक होगी भी या नहीं. संस्थागत आत्म-मंथन के लिए इससे अधिक किफायती दृष्टिकोण की कल्पना करना मुश्किल है.

अध्याय 13, "संगठनात्मक मामले", अठारह पन्नों का है और ऐसी जानकारी के लिए स्वाभाविक जगह होता. इसके बजाय, यहां हमें आधिकारिक भाषा प्रभाग के बारे में बेहतरीन विस्तार से पता चलता है: छह हिंदी कार्यशालाएं, 104 प्रतिभागियों वाली चार प्रतियोगिताएं, इन-हाउस पत्रिका Viniyamika के दो अंक, जिनमें "कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों की साहित्यिक प्रतिभा को लेखों, कहानियों, कविताओं के रूप में" प्रदर्शित किया गया, विजेताओं के लिए चांदी के सिक्के और नकद पुरस्कार, एक विभाग के लिए राजभाषा गौरव शील्ड, एक क्षेत्रीय कार्यालय के लिए राजभाषा प्रतिष्ठा शील्ड और राजभाषा पोर्टल को बढ़ावा देने वाला एक अभियान, जो "सभी सेबी कार्यालयों में उपलब्ध डेस्कटॉप के स्क्रीनसेवर के माध्यम से" चलाया गया.

स्क्रीनसेवर: दो उल्लेख. हितों का टकराव: एक वाक्य

यह हिंदी सेल पर कोई कटाक्ष नहीं है, जिसने स्पष्ट रूप से काम किया और इसे सराहनीय उत्साह के साथ लिखा. इसके उलट. उनका सेक्शन साबित करता है कि रिपोर्ट बारीकियों के साथ खुलासा करने में पूरी तरह सक्षम है. इसलिए बाकी जगह संक्षिप्तता कोई संस्थागत शैली नहीं है. यह एक संपादकीय निर्णय है.

मंथन: जवाबों के अलावा सब कुछ

हालांकि, रिपोर्ट की उत्कृष्ट कृति मंथन है. सितंबर 2025 में SEBI के सतर्कता विभाग ने सभी ग्रेड के कर्मचारियों के बीच एक गुमनाम 30-सवालों वाली प्रश्नावली प्रसारित की, जिसमें "नैतिक आचरण, नैतिक दुविधाओं और सतर्कता नियमों पर स्पष्ट राय" मांगी गई थी. 80 प्रतिशत से अधिक अधिकारियों ने जवाब दिया. रिपोर्ट इस अभ्यास का खूबसूरती से दस्तावेजीकरण करती है: इसकी तारीख, भागीदारी, सतर्कता जागरूकता सप्ताह के दौरान प्रारंभिक निष्कर्षों की प्रस्तुति, 1 जनवरी, 2026 को चेयरमैन द्वारा अंतिम रिपोर्ट का अनावरण, इसे केंद्रीय सतर्कता आयोग को भेजना और आयोग के कमिश्नर की गर्मजोशी भरी टिप्पणी, जिसमें इसे "अन्य संगठनों के लिए अनुकरणीय मॉडल" बताया गया.

सब कुछ वहां है, सिवाय इसके कि भारत के सिक्योरिटीज नियामक के लगभग नौ सौ अधिकारियों ने वास्तव में क्या कहा, जब उनसे गुमनाम रूप से उनके कार्यस्थल में नैतिकता के बारे में पूछा गया. निष्कर्षों का पूरा खुलासा इस प्रकार किया गया है: "इस पहल से प्रशिक्षण आवश्यकताओं, नैतिक चिंताओं और प्रणालीगत सुधार वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिली."

नैतिक चिंताओं की पहचान की गई. कौन-सी? ओह, यह पाठकों के लिए एक अभ्यास के रूप में छोड़ दिया गया है.

यह पारदर्शिता है जिसे उत्कृष्ट प्रक्रियात्मक विवरण में बताया गया और फिर ठीक उस बिंदु पर रोक दिया गया जहां असली दिलचस्पी शुरू होती है, संस्थागत रूप से यह ऐसा है जैसे किसी सीलबंद लिफाफे को खोलने की लाइव स्ट्रीमिंग की जा रही हो. इसी अध्याय में बताया गया है कि विभाग ने "CBI, ED आदि जैसी बाहरी एजेंसियों से प्राप्त लगभग 80 अनुरोधों" को संभाला. अस्सी. बस इतना ही वाक्य है. दूसरी जगह, Vigilance Adda नाम के एक आउटरीच कार्यक्रम में "200 से अधिक अधिकारियों ने हिस्सा लिया, जिसमें 100 से अधिक मैन-आवर्स लगाए गए." मैन-आवर्स गिने गए हैं. लेकिन चिंताएं? ओह, उन्हें छोड़ दिया गया है.

सेबी क्या गिनना चुनता है

इस तरह पढ़ने पर, वार्षिक रिपोर्ट संस्थागत अंकगणित का एक अध्ययन बन जाती है. सेबी कार्यशालाओं, प्रतिभागियों, प्रतियोगिताओं, मैन-आवर्स, चांदी के सिक्कों, स्क्रीनसेवर, पोर्टलों, परियोजनाओं और जागरूकता कार्यक्रमों को 63,176 तक गिनता है. यह Investor Protection and Education Fund के ₹965.1 करोड़ के क्लोजिंग बैलेंस, इसके द्वारा खर्च किए गए ₹4.7 करोड़ और यह सबसे शानदार हिस्सा है, एक समिति की बैठक पर खर्च हुए ₹17,527 को भी गिनता है. लगभग ₹18,000 नहीं. बल्कि ₹17,527, किसी ने बिस्किट और चाय गिनी है.

यहां तक कि चेयरमैन के आधिकारिक आवास का भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में एक आंकड़ा है: 51वीं मंजिल पर 3,000 वर्ग फुट का फ्लैट, जिसका किराया करीब ₹7 लाख प्रति माह बताया गया है. क्या किसी नियामक के आवास के लिए यह सही कीमत है, यह एक अलग बहस है और यह उसका विषय नहीं है. प्रासंगिक तथ्य बस इतना है कि इसकी कीमत तय की जा सकती है.

क्योंकि इस रिपोर्ट में बहुत कुछ ऐसा है जिसे तय किया जा सकता है. सेबी ₹17,527 का पता लगा सकता है. वह एक स्क्रीनसेवर अभियान को माप सकता है. जो वह नहीं कर सकता, वह है ₹4,843 करोड़ का उल्लेख.

नियामक चार स्थायी सिद्धांतों को सूचीबद्ध करता है: विश्वास, पारदर्शिता, टीमवर्क और टेक्नोलॉजी. टेक्नोलॉजी को परियोजनाएं, पोर्टल, AI सिस्टम, टोकनाइजेशन, क्वांटम जोखिम और Vibe Coding मिलते हैं. पारदर्शिता को कुछ अधिक जटिल मिलता है, क्योंकि पारदर्शिता 235 पन्ने प्रकाशित करने की क्षमता नहीं है. यह उन दस पन्नों को प्रकाशित करने की इच्छा है जो मायने रखते हैं.

इस वार्षिक रिपोर्ट की समस्या जानकारी की कमी नहीं है. समस्या जानकारी की प्राथमिकता है. गतिविधियों को गिना जाता है; जवाबों को नहीं. और यह क्रम, क्या टेबल में जगह पाता है, क्या एक वाक्य पाता है, क्या बिल्कुल कुछ नहीं पाता, पूरी रिपोर्ट में सबसे अधिक खुलासा करने वाला तथ्य बन जाता है.

अगले लेख का इंतजार करें.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


भारतीय स्टेट बैंक समेत सरकारी बैंक जुटाएंगे 30 अरब डॉलर, विदेशी फंडिंग बढ़ाने की तैयारी

RBI की रियायती स्वैप विंडो से सरकारी बैंकों को बड़ी मदद, अब तक 8.84 अरब डॉलर जुटा चुके हैं PSU बैंक

Last Modified:
Monday, 10 August, 2026
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भारतीय सरकारी बैंक विदेशी मुद्रा जुटाने की मुहिम को और तेज करने की तैयारी में हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रियायती स्वैप विंडो के तहत सरकारी बैंकों ने कुल करीब 30 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा है. इसमें सबसे बड़ा योगदान देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक SBI का हो सकता है, जिसने अकेले करीब 10 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा है. सरकारी बैंकों का यह कदम देश में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाने और बैंकों की विदेशी फंडिंग को मजबूत करने के लिहाज से अहम माना जा रहा है.

अब तक सरकारी बैंक जुटा चुके हैं 8.84 अरब डॉलर

सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, 30 जुलाई तक FCNR (B) जमा में कुल 28 अरब डॉलर की शुद्ध आवक हुई थी. इसमें विदेशी बैंकों ने 8.37 अरब डॉलर, निजी क्षेत्र के बैंकों ने 10.73 अरब डॉलर और सरकारी बैंकों ने 8.84 अरब डॉलर जुटाए हैं.

SBI सबसे आगे, 10 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य

सरकारी बैंकों में SBI इस अभियान में सबसे आगे नजर आ रहा है. SBI के चेयरमैन सी.एस. शेट्टी ने बैंक के तिमाही नतीजे घोषित होने के बाद कहा था कि बैंक अब तक करीब 6 अरब डॉलर की FCNR (B) जमा जुटा चुका है. उन्होंने उम्मीद जताई कि बैंक करीब 10 अरब डॉलर जुटाने में सफल रहेगा.

HSBC ने जुटाई सबसे ज्यादा रकम

बैंकों के बीच HSBC अब तक सबसे ज्यादा रकम जुटाने वाला बैंक रहा है. HSBC ने 6.14 अरब डॉलर जुटाए हैं. इसके बाद SBI ने 4.12 अरब डॉलर और ICICI Bank ने 3.70 अरब डॉलर जुटाए हैं. इससे पता चलता है कि विदेशी मुद्रा जुटाने की इस प्रक्रिया में विदेशी और निजी क्षेत्र के बैंक भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

तीन योजनाओं के जरिए जुटाई जा रही विदेशी मुद्रा

RBI की रियायती स्वैप विंडो के तहत बैंकों को FCNR (B) जमा, विदेशी मुद्रा में विदेशी कर्ज (OFCB) और बाहरी वाणिज्यिक ऋण (ECB) के जरिए विदेशी मुद्रा जुटाने की सुविधा दी गई है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, इन तीनों योजनाओं के तहत 31 जुलाई तक कुल 41 अरब डॉलर की आवक हुई थी.

इसमें FCNR (B) जमा के जरिए 36.7 अरब डॉलर, OFCB के जरिए 2.57 अरब डॉलर और ECB के माध्यम से 1.5 अरब डॉलर की राशि जुटाई गई है. सरकारी बैंकों के 30 अरब डॉलर के लक्ष्य और SBI के 10 अरब डॉलर के लक्ष्य के बीच विदेशी फंडिंग जुटाने की यह प्रक्रिया आने वाले समय में भी जारी रहने की उम्मीद है.