एस्सार ऑयल का मकसद ये है कि वो तकनीक के जरिए रिफाइनरी का उत्सर्जन कम करने में कामयाब हो सके. कंपनी का लक्ष्य है इससे ~1 मिलियन टन CO2 की वार्षिक कमी होगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
एस्सार ऑयल यूके ने एलीसेंट क्लीन टेक्नोलॉजी को टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर के रूप में चयनित कर लिया है. 2 मिलियन टन CO2 (95%) उत्सर्जन को कम करके रिफाइनरी को डीकार्बोनाइजिंग करने में एस्सार ऑयल यूके के 1.2 बिलियन डॉलर के निवेश की दिशा में यह एक और महत्वपूर्ण कदम है, जिससे यह दुनिया की पहली कार्बन कम रिफाइनरी और दुनिया की पहली कम कार्बन ईंधन उत्पादक बन गई है.
क्या बोले एस्सार ऑयल के सीईओ?
एस्सार ऑयल यूके के सीईओ दीपक माहेश्वरी ने कहा जैसा कि हम अपनी डीकार्बोनाइजेशन रणनीति के अगले चरण में आगे बढ़ रहे हैं ऐसे में हमारे लिए लाइसेंसकर्ता प्रौद्योगिकी प्रदाता का होना बेहद सकारात्मक बात है. $1.2 बिलियन के निवेश के साथ, एस्सार ऑयल यूके दुनिया की पहली कार्बन कम रिफाइनरी बनने की स्थिति में है. Elessent Clean Technologies BELCO स्क्रबिंग तकनीक का उपयोग करके हमारी रिफाइनरी उत्सर्जन को 95% तक कम करने की हमारी योजना में एक मूल्यवान भागीदार है.
क्या है एस्सार ऑयल की भविष्य की योजना
एस्सार की समग्र डीकार्बोनाइजेशन रणनीति का लक्ष्य 2 अत्याधुनिक परियोजनाओं के साथ रिफाइनरी उत्सर्जन को कम करना है.
1) नवंबर 2022 में स्टैनलो में औद्योगिक कार्बन कैप्चर की घोषणा की गई और 2028 तक चालू करने की योजना बनाई गई है. इस परियोजना के परिणामस्वरूप ~1 मिलियन टन CO2 की वार्षिक कमी होगी.
2) हाइड्रोजन ईंधन स्विचिंग में प्राकृतिक गैस और अन्य रिफाइनरी ईंधन स्रोतों से ईंधन के रूप में हाइड्रोजन पर स्विच करना शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप 1 मिलियन टन CO2 की वार्षिक कमी होती है.
यह निवेश सुनिश्चित करता है कि एस्सार ऑयल यूके लगातार काम करता रहेगा. एलीसेंट क्लीन टेक्नोलॉजीज के चयन के साथ, एस्सार ऑयल यूके ने अपने सभी प्रमुख प्रौद्योगिकी भागीदारों को शामिल कर लिया है और लाइसेंस प्राप्त प्रौद्योगिकियों के लिए बुनियादी इंजीनियरिंग डिजाइन पैकेज (बीईडीपी) के विकास में प्रगति की जा रही है. यह परियोजना के फ्रंट-एंड इंजीनियरिंग डिजाइन (FEED) चरण के दौरान एक आवश्यक मील का पत्थर है.
क्या बोले एलीसेंट क्लीन टेक्नोलॉजी के वाइस प्रेसीडेंट
एलीसेंट क्लीन टेक्नोलॉजीज में रिफाइनिंग टेक्नोलॉजीज उपाध्यक्ष माइकल चेरी ने कहा एस्सार के साथ मिलकर, हमने कार्बन कैप्चर सुविधा के लिए एक आवश्यक और विश्वसनीय गैस सफाई समाधान प्रदान करने के लिए काम किया है. हमारी BELCO® स्क्रबिंग तकनीक के साथ, हम यह सुनिश्चित करेंगे कि स्वच्छ और ठंडी ग्रिप गैस वितरित की जाए.
ये भी पढ़ें: कुछ ही घंटे में ओवरसब्सक्राइब हुआ JYOTI CNC का आईपीओ, इतने गुना हुआ ओवरसब्सक्राइब
भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता 20 अक्टूबर से लागू हो गया है. इसके तहत भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में 100 फीसदी शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) लागू होने के साथ ही दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है. इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी. इसका फायदा खास तौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), महिला उद्यमियों, किसानों और कारीगरों को मिल सकता है. इसके अलावा, अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश की संभावना है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग, बुनियादी ढांचे, कृषि और नवाचार जैसे क्षेत्रों में अवसर पैदा हो सकते हैं.
दोनों देशों ने 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर यानी लगभग 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. इसे हासिल करने के लिए व्यापार में करीब 18 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) की जरूरत होगी.
कपड़ा, फुटवियर और फार्मा सेक्टर को मिलेगा फायदा
मुक्त व्यापार समझौते के तहत कपड़ा, परिधान, चमड़ा और फुटवियर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है. इन क्षेत्रों में 10 फीसदी तक के टैरिफ समाप्त होने से भारतीय उत्पाद न्यूजीलैंड के बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं.
इसके अलावा, इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी, रसायन और कृषि उत्पादों के निर्यातकों को भी बेहतर बाजार पहुंच मिलने की संभावना है.
न्यूजीलैंड के व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैक्ले के मुताबिक, यह समझौता प्रमुख क्षेत्रों के निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा करेगा. उन्होंने कहा कि समझौते के पूरी तरह लागू होने के बाद भारत को होने वाले न्यूजीलैंड के मौजूदा निर्यात के 95 फीसदी हिस्से को टैरिफ समाप्त होने या उनमें बड़ी कटौती का लाभ मिलेगा.
न्यूजीलैंड के जिन उत्पादों पर टैरिफ में कटौती की गई है, उनमें शहद, सेब, कीवीफ्रूट, मिल्क एल्बुमिन सहित अन्य एल्बुमिन, वाइन, फार्मास्यूटिकल्स, पॉलिमर और एल्युमीनियम शामिल हैं.
भारतीय छात्रों को वर्क वीजा, कस्टम मंजूरी भी होगी तेज
इस समझौते में शिक्षा के लिए न्यूजीलैंड जाने वाले भारतीय युवाओं के लिए वर्क वीजा से जुड़ी सुविधा भी शामिल है. इसके तहत पात्र भारतीय छात्रों को निर्धारित अवधि के लिए प्रशिक्षण लेने और काम करने का अवसर मिलेगा.
व्यापार को आसान बनाने के लिए कस्टम मंजूरी की समयसीमा भी तय की गई है. समझौते के तहत सामान्य कार्गो को 48 घंटे के भीतर और जल्दी खराब होने वाले सामान यानी पेरिशेबल कंसाइनमेंट को 24 घंटे के भीतर कस्टम मंजूरी देने का प्रावधान है.
इसके अलावा, पात्र कारोबारियों के लिए डिजिटल सर्टिफिकेशन और उत्पत्ति के नियमों (रूल्स ऑफ ओरिजिन) के तहत स्वयं प्रमाणन की सुविधा दी जाएगी. इससे कागजी प्रक्रिया, देरी और अनुपालन लागत कम करने में मदद मिल सकती है.
घरेलू किसानों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान
भारत और न्यूजीलैंड के बीच कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के साथ घरेलू किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए भी प्रावधान किए गए हैं. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, भारतीय किसानों को फलों, सब्जियों, मसालों और अन्य कृषि उत्पादों के लिए व्यापक बाजार पहुंच मिलेगी. इससे उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय में सुधार करने और आजीविका मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
समझौते के तहत न्यूजीलैंड के सेब, कीवीफ्रूट और मनुका शहद को संतुलित बाजार पहुंच दी गई है. घरेलू किसानों को संभावित प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए टैरिफ-रेट कोटा, न्यूनतम आयात मूल्य और अन्य सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं.
इसके साथ ही, भारत और न्यूजीलैंड कृषि उत्पादकता साझेदारी भी शुरू करेंगे. इस पहल के तहत सटीक खेती (प्रिसीजन एग्रीकल्चर) और संबंधित तकनीकों में न्यूजीलैंड की विशेषज्ञता का इस्तेमाल भारतीय कृषि क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए किया जाएगा.
भारत ने डेयरी और कई कृषि उत्पादों को समझौते से रखा बाहर
घरेलू उद्योगों और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए भारत ने कई उत्पादों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा है. इनमें डेयरी उत्पाद, प्याज, चीनी, चना, मटर, मक्का, बादाम, विभिन्न वसा और तेल, रत्न एवं आभूषण, एल्युमीनियम, तांबा, हथियार और गोला-बारूद शामिल हैं.
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि भारत और न्यूजीलैंड के बीच संबंध केवल बाजार पहुंच बढ़ाने या एक-दूसरे को अधिक निर्यात करने तक सीमित नहीं हैं. इसका उद्देश्य एक मजबूत और टिकाऊ आर्थिक साझेदारी तैयार करना है.
उन्होंने यह भी कहा कि न्यूजीलैंड का 60 से 70 फीसदी व्यापार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में केंद्रित है. इस क्षेत्र की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ न्यूजीलैंड के व्यापारिक संबंध भारत की तुलना में अधिक मजबूत हैं.
मुक्त व्यापार समझौते से भारत को इस बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने, निर्यात के नए अवसर तलाशने और निवेश आकर्षित करने में मदद मिलने की उम्मीद है. हालांकि, 2030 तक व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य हासिल करने के लिए दोनों देशों को व्यापार में लगातार वृद्धि बनाए रखनी होगी.
राष्ट्रीय राजमार्गों पर बार-बार होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों के लिए अब निर्माण ठेकेदारों की जवाबदेही तय होगी. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के नए नियमों के तहत दूसरी दुर्घटना में प्रत्येक मृतक के लिए ₹25 लाख और तीसरी दुर्घटना में ₹50 लाख तक का जुर्माना देना होगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को रोकने और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार ने ठेकेदारों पर शिकंजा कस दिया है. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) परियोजनाओं के लिए नए मॉडल अनुबंध समझौते में सख्त प्रावधान किए हैं. इसके तहत सड़क की खामियों के कारण बार-बार दुर्घटनाएं होने पर ठेकेदारों को भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है. गंभीर मामलों में अनुबंध समाप्त करने और ठेकेदार के खर्च पर सुधार कार्य कराने का भी प्रावधान है.
दूसरी दुर्घटना में ₹25 लाख, तीसरी पर ₹50 लाख का जुर्माना
नए नियमों के मुताबिक, यदि किसी स्थान पर पहली दुर्घटना के एक वर्ष के भीतर या पिछली दुर्घटना के बाद सुधारात्मक कार्रवाई पूरी होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर, उसी स्थान के 500 मीटर के दायरे में सड़क की खामियों के कारण दूसरी दुर्घटना होती है, तो ठेकेदार पर प्रत्येक मृतक के लिए ₹25 लाख और गंभीर रूप से घायल प्रत्येक व्यक्ति के लिए ₹10 लाख का जुर्माना लगाया जाएगा.
वहीं, अगले एक वर्ष के भीतर उन्हीं खामियों के कारण तीसरी दुर्घटना होने पर जुर्माने की राशि बढ़ जाएगी. इस स्थिति में ठेकेदार को प्रत्येक मृतक के लिए ₹50 लाख और गंभीर रूप से घायल प्रत्येक व्यक्ति के लिए ₹25 लाख देने होंगे.
पहली दुर्घटना के बाद खामियां दूर करने के लिए 15 दिन
नए प्रावधानों के तहत पहली दुर्घटना के बाद ठेकेदार को सड़क की खामियां दूर करने के लिए 15 दिन का समय दिया जाएगा. यदि वह निर्धारित समय में सुधारात्मक कार्रवाई नहीं करता है, तो सरकार उसके खर्च पर सड़क का रखरखाव और जरूरी सुधार कार्य करा सकती है. इसके अलावा, परिस्थितियों के अनुसार ठेकेदार का अनुबंध भी समाप्त किया जा सकता है.
यह व्यवस्था ईपीसी परियोजनाओं के लिए जारी नए मॉडल अनुबंध समझौते का हिस्सा है. इस व्यवस्था में ठेकेदार राजमार्ग का निर्माण करता है और काम के विभिन्न चरण पूरे होने के आधार पर उसे भुगतान किया जाता है. हालांकि, दोष दायित्व अवधि (डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड) समाप्त होने के बाद ठेकेदार की जिम्मेदारी सीमित हो जाती है.
सड़क दुर्घटनाओं में 2024 में 1.77 लाख से अधिक मौतें
मंत्रालय के मुताबिक, भारत में 2024 के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में 1,77,175 लोगों की मौत हुई. यह दुनिया में सबसे अधिक आंकड़ों में से एक है. सड़क सुरक्षा के लिए कई उपाय किए जाने के बावजूद दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि हुई है.
एक अधिकारी के अनुसार, ईपीसी परियोजनाओं के लिए इस तरह का प्रावधान पहली बार किया गया है. इसका उद्देश्य सड़क निर्माण में खामियों के लिए जिम्मेदारी तय करना और दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना है.
उप-ठेके देने की सीमा 49% से घटाकर 30%
राजमार्ग परियोजनाओं की गुणवत्ता और जवाबदेही को लेकर मिल रही शिकायतों के बीच सरकार ने उप-ठेके देने के नियम भी सख्त किए हैं. अब ईपीसी परियोजनाओं में उप-ठेके की सीमा अनुबंध मूल्य के 49 फीसदी से घटाकर 30 फीसदी कर दी गई है.
आमतौर पर मुख्य ठेकेदार परियोजना के कुछ हिस्सों का काम उप-ठेकेदारों को सौंप देते हैं. सरकार का नया कदम निर्माण कार्यों की जिम्मेदारी स्पष्ट करने और मुख्य ठेकेदारों की जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है.
पिछले वर्ष अगस्त में संसद की लोक लेखा समिति ने भी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में उप-ठेके देने के मुद्दे पर मंत्रालय की आलोचना की थी. समिति ने कहा था कि मंत्रालय की अपनी प्रस्तुतियों के अनुसार, सड़क बुनियादी ढांचे का बड़ा हिस्सा उप-ठेकेदारों द्वारा तैयार किया जाता है, जबकि मुख्य अनुबंध व्यवस्था के तहत उनकी जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो सकती है.
ठेकेदारों के चयन और रेटिंग के नियम भी सख्त
नए नियमों में उप-ठेकेदारों के चयन के लिए मंजूरी संबंधी मानदंड भी कड़े किए गए हैं. इसके अलावा, सरकार ने अनुबंध मिलने से पहले लागू होने वाली कई शर्तों को ठेकेदार की रेटिंग से जोड़ दिया है.
इन बदलावों के जरिए सरकार राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण और रखरखाव में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के साथ-साथ दुर्घटनाओं के लिए ठेकेदारों की जवाबदेही बढ़ाना चाहती है.
पहले ईमेल में हरि शंकर तिबरेवाल ने कहा कि उन्हें ईडी की फाइलिंग पर रिपोर्टिंग से कोई आपत्ति नहीं है, फिर उन्होंने लेख हटाने की मांग की. अप्रैल 2024 में पहली बार समन जारी होने के बाद से वह ईडी के सामने पेश नहीं हुए हैं. BW के पास उनसे पूछने के लिए कुछ सवाल हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
ईडी के दो समन पर पेश नहीं हुए, BW को दी समयसीमा
हरि शंकर तिबरेवाल अप्रैल 2024 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से पहली बार समन जारी किए जाने के बाद से उसके सामने पेश नहीं हुए हैं. एजेंसी ने महादेव बेटिंग ऐप मामले में मनी लॉन्ड्रिंग अभियोजन में उन्हें आरोपी नंबर 24 बताया है. ईडी ने तिबरेवाल को "सिंडिकेट का सरगना श्री हरि शंकर तिबरेवाल (HST), स्काईएक्सचेंज का मालिक" कहा है. ईडी का कहना है कि HST का स्काईएक्सचेंज और महादेव ऐप साझेदारी में चलाए जाते थे और ये "एक ही आपराधिक उद्यम का हिस्सा" थे.
48 घंटे के भीतर उन्होंने BW Businessworld को एक समयसीमा दी, मांगों की सूची भेजी और ईडी की चार्जशीट तथा अन्य कानूनी दस्तावेजों पर मीडिया की वैध रिपोर्टिंग को लेकर दीवानी और आपराधिक कार्रवाई की धमकी दी.
इसका निशाना BW की 17 अक्टूबर की रिपोर्ट "हरि, शंकर, महादेव: स्काईएक्सचेंज के पीछे का रहस्य" है, जिसमें उन दस्तावेजों के आधार पर बताया गया था कि ईडी ने उनके बारे में क्या कहा है, जिन्हें एजेंसी ने अदालत में दाखिल किया है.
समयसीमाएं
तिबरेवाल का पहला ईमेल लेख प्रकाशित होने की दोपहर को आया. इसमें BW को पांच अंश हटाने या दोबारा लिखने, पेज के सर्च प्रीव्यू को ठीक करने, सुधार नोट प्रकाशित करने और उठाए गए कदमों की "लिखित पुष्टि" करने के लिए 48 घंटे दिए गए. उन्होंने लिखा कि ये मांगें "दुनिया भर में लेख के हर संस्करण" पर लागू होती हैं.
पूरा लेख ईडी की चार्जशीट पर आधारित है और BW इसे नहीं हटाएगा. BW ने तिबरेवाल का पक्ष बिना किसी संपादन के पूरी तरह प्रकाशित किया है. इसके बाद BW ने ईडी के दस्तावेजों में शामिल मामलों पर उनसे विस्तृत सवाल भी पूछे.
19 अक्टूबर को आए उनके दूसरे ईमेल में मांगें और सख्त हो गईं. उन्होंने BW से लेख को पूरी तरह हटाने की मांग की, जिसमें उसका सर्च प्रीव्यू, सोशल मीडिया प्रीव्यू और "हर कॉपी तथा सिंडिकेटेड संस्करण" शामिल था. उन्होंने इसकी लिखित पुष्टि भी मांगी. उन्होंने एक बयान तैयार किया, जिसके बारे में कहा कि भविष्य में किसी भी रिपोर्ट में BW को इसे "बिना किसी संपादन के पूरी तरह प्रकाशित करना होगा". उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भविष्य के किसी लेख में यह बयान शामिल नहीं किया गया या यह कहा गया कि उन्होंने जवाब नहीं दिया, तो उसे "बिना किसी और सूचना के अदालत के सामने रखा जाएगा". उन्होंने लिखा कि वह "BW, उसके संपादकों और लेखक के खिलाफ अपने सभी दीवानी और आपराधिक अधिकार सुरक्षित रखते हैं".
रिपोर्टिंग से नहीं, सिर्फ लेख से आपत्ति
तिबरेवाल के दोनों ईमेल एक-दूसरे के विपरीत हैं.
17 अक्टूबर को उन्होंने लिखा था, "मैं आपसे प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी फाइलिंग में जो कहा है, उसकी रिपोर्टिंग रोकने के लिए नहीं कह रहा हूं." दो दिन बाद उन्होंने लेख हटाने की मांग की.
दोनों में से किसी भी ईमेल में BW की उस रिपोर्ट में किसी तथ्यात्मक गलती की पहचान नहीं की गई है, जिसमें ईडी के दस्तावेजों में कही गई बातों का विवरण दिया गया है. वह इस बात से इनकार नहीं करते कि ईडी ने उन्हें आरोपी नंबर 24 बताया है, उन्हें "सिंडिकेट का सरगना" और "स्काईएक्सचेंज का मालिक" कहा है या स्काईएक्सचेंज को महादेव ऑनलाइन बुक के साथ "एक ही आपराधिक उद्यम का हिस्सा" बताया है.
वह इस बात से भी इनकार नहीं करते कि एजेंसी के रिकॉर्ड के मुताबिक, वह 22 अप्रैल और 25 अप्रैल 2024 को जारी समन पर पेश नहीं हुए. वह ईडी की ओर से बताए गए आंकड़ों, विदेशों में मौजूद धन और गवाहों के बयानों पर भी सवाल नहीं उठाते. उनकी आपत्ति लेख की प्रस्तुति को लेकर है, न कि ईडी के दस्तावेजों में मौजूद सामग्री को लेकर.
जवाब देने को तैयार, लेकिन शर्तों के साथ
BW के सवाल इन विषयों पर थे:
- स्काईएक्सचेंज के कथित स्वामित्व को लेकर.
- ईडी की ओर से उनसे जुड़ी बताई गई विदेशी फंडिंग, जिसमें टैनो इन्वेस्टमेंट ऑपर्च्युनिटीज फंड भी शामिल है, जिसे मॉरीशस के वित्तीय नियामक ने सेबी को उनका लाभकारी स्वामित्व वाला फंड बताया था.
- ईडी के उस दावे के बारे में कि जिन कंपनियों में उनके फंड ने निवेश किया, उनके प्रमोटरों ने 30-40 फीसदी रकम नकद "कैशबैक" के रूप में वापस की.
- जेल में बंद ईबिक्स के चेयरमैन विकास गर्ग के साथ लंदन में उनकी कथित मुलाकातों को लेकर.
- ईडी के दो समन पर पेश नहीं होने के बारे में.
तिबरेवाल ने कहा कि वह "सवालों से डरते नहीं हैं" और "अगर आप सौ सवाल पूछेंगे, तो भी हर सवाल का जवाब देंगे". लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी: BW को पहले लेख हटाना होगा और उन्हें "नई प्रश्नावली" भेजनी होगी. तब तक उन्होंने लिखा कि वह "BW को लेख सही ठहराने में मदद करने वाले सवालों" का जवाब नहीं देंगे.
उन्होंने आपत्ति जताई है कि BW ने लेख प्रकाशित करने से पहले उनसे सवाल नहीं पूछे. ईडी के रिकॉर्ड बताते हैं कि अप्रैल 2024 के बाद से वह भारत में एजेंसी के सामने पेश नहीं हुए हैं. ईडी का कहना है कि वह दुबई में रहते हैं. BW की जानकारी के मुताबिक, वह फिलहाल लंदन में हैं. BW से उनका पहला संपर्क लेख प्रकाशित होने के बाद विदेश से ईमेल के जरिए हुआ.
अदालत की आड़
तिबरेवाल के खिलाफ नहीं, बल्कि उनकी ओर से दिल्ली की अदालतों में मानहानि के दो मुकदमे लंबित हैं. इन मुकदमों में अंतरिम आदेशों के जरिए कुछ मीडिया संस्थानों को उनके बारे में विशिष्ट शब्दों का इस्तेमाल करने से रोका गया है. अदालतों ने जांचकर्ताओं और अदालतों की ओर से कही गई बातों की रिपोर्टिंग पर रोक नहीं लगाई है और तिबरेवाल ने खुद अपने ईमेल में इस बात को स्वीकार किया है.
दिल्ली के एक प्रमुख समाचार संगठन के वकील ने पहले BW से कहा था, "सफेदपोश अपराधों के आरोपी मीडिया को चुप कराने के लिए कानून का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे उन्हें आड़ मिलती है और उस मीडिया को डराया जाता है, जो उनकी रक्षा करने वाली व्यवस्था पर दबाव डाल सकता है."
तिबरेवाल का बयान
BW ने मूल रिपोर्ट में उनका बयान पूरा प्रकाशित किया है.
एक बार फिर, उनके अनुरोध पर BW उनका बयान पूरा प्रकाशित कर रहा है:
"मैं अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों से इनकार करता हूं. मुझे किसी भी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया है और किसी अदालत ने मुझे फरार या भगोड़ा घोषित नहीं किया है. दिल्ली की अदालतों ने उन दावों के प्रकाशन पर रोक लगाई है कि मैं फरार या भगोड़ा हूं (सिविल मुकदमा संख्या 4242/2024, दिनांक 14.11.2024 का आदेश) और यह भी कहा है कि मुझे 'हवाला कारोबारी' कहना अपने आप में मानहानिकारक है (सिविल मुकदमा DJ ADJ 1212/2025, दिनांक 17.08.2026 का आदेश). BW ने लेख प्रकाशित करने से पहले मुझसे एक भी सवाल नहीं पूछा. मैंने BW से कहा है कि लेख हटाने और नई प्रश्नावली भेजने के बाद मैं उसके सभी सवालों के जवाब दूंगा."
BW का पक्ष
BW अपनी रिपोर्ट पर कायम है, जो ईडी की ओर से अदालत में दाखिल दस्तावेजों पर आधारित है, और इसे नहीं हटाएगा. अपने ईमेल में तिबरेवाल ने कहा है कि BW ने पत्रकारिता के बुनियादी नियमों का पालन नहीं किया. BW का कहना है कि उसे ईडी की चार्जशीट में आरोपी नंबर 24 से पत्रकारिता का पाठ सीखने की जरूरत नहीं है.
तिबरेवाल से BW के सवाल अब भी खुले हैं. जब भी वह जवाब देंगे, उन्हें पूरा प्रकाशित किया जाएगा.
तिबरेवाल के खिलाफ ईडी के किसी भी आरोप की सुनवाई के दौरान जांच नहीं हुई है, क्योंकि उन्होंने ईडी के समन का पालन नहीं किया है और वह विदेश में रह रहे हैं, भारत की अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर.
सवाल
1\) ईडी ने आपको पीएमएलए की धारा 50 के तहत 22 अप्रैल 2024 और 25 अप्रैल 2024 को समन जारी किया था. उसके रिकॉर्ड के मुताबिक, आप दोनों ही बार पेश नहीं हुए. क्यों?
आप कहते हैं कि आप निर्दोष हैं और आपको दोषी नहीं ठहराया गया है. आप भारत लौटकर ईडी के सामने अपना बयान देने और सीधे उसके आरोपों का जवाब देने क्यों नहीं आए? आप ईडी के समन से क्यों बच रहे हैं?
2\) आप अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए दिल्ली की भारतीय अदालतों में वादी के रूप में मुकदमे कर रहे हैं, लेकिन रायपुर में भारतीय जांचकर्ताओं के सामने पेश नहीं हुए. आप इस अंतर को कैसे समझाते हैं?
3\) आप फिलहाल कहां रहते हैं और क्या भारत लौटने का इरादा रखते हैं? अगर हां, तो कब? क्या अप्रैल 2024 के बाद से आपको ईडी, पुलिस या किसी अदालत की ओर से कोई और समन, नोटिस या वारंट मिला है? आपने उस पर क्या प्रतिक्रिया दी?
4\) ईडी का कहना है कि आप स्काईएक्सचेंज के मालिक थे और इसे महादेव ऑनलाइन बुक के प्रमोटरों के साथ "साझेदारी में सह-स्वामित्व और सह-प्रचार" के तहत चलाया जाता था. क्या आप स्काईएक्सचेंज में किसी भी स्वामित्व, हित या भूमिका से इनकार करते हैं?
5\) प्रशांत बागरी ने ईडी को बताया कि वह 2017 से आपके कर्मचारी हैं. क्या यह सही है? वह आपके लिए क्या काम करते हैं?
6\) क्या आप सौरभ चंद्राकर या रवि उप्पल को जानते हैं? क्या आपने उनके साथ कोई कारोबारी लेन-देन किया है?
7\) मॉरीशस के वित्तीय सेवा आयोग ने सेबी को बताया कि टैनो इन्वेस्टमेंट ऑपर्च्युनिटीज फंड के लाभकारी मालिक आप हैं. क्या यह सही है? अगर नहीं, तो इसका मालिक कौन है?
8\) ईडी का कहना है कि समन जारी होते ही आपने टैनो का लाभकारी स्वामित्व "तुरंत बदल दिया". क्या आपने ऐसा किया और क्यों?
9\) क्या आपके पास AG Dynamic Funds, Forbes EMF, Coeus Global, Ebisu Global, Oyster Bay, Plutus, Zenith Multi Trading DMCC या Ecotek General Trading LLC का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष स्वामित्व या नियंत्रण है?
10\) एक गवाह ने ईडी को बताया कि इकोटेक का दर्ज मालिक आपका "बेनामीदार" है. आप इस पर क्या कहेंगे?
11\) ईडी का कहना है कि जेनिथ मल्टी ट्रेडिंग DMCC का पंजीकृत ईमेल पता आपका है. क्या यह सही है?
12\) इन फंड्स ने भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों में जिस धन का निवेश किया, वह कहां से आया?
13\) ईडी का कहना है कि आपके संस्थानों से निवेश पाने वाली कंपनियों ने 30-40 फीसदी रकम नकद वापस की. क्या आपको कभी किसी ऐसी कंपनी के प्रमोटरों से सीधे या किसी अन्य व्यक्ति के जरिए नकद मिला है, जिसमें आपके संस्थानों ने निवेश किया हो?
14\) क्या आपको सलासर टेक्नो इंजीनियरिंग या टाइगर लॉजिस्टिक्स के प्रमोटरों से नकद मिला था?
15\) गगन गुप्ता के साथ आपका क्या संबंध है? ईडी का कहना है कि वह आपके नकद का प्रबंधन करते थे.
16\) क्या आप 2024 में लंदन में विकास गर्ग और रॉबिन रैना से मिले थे? दो गवाहों ने एक तस्वीर देखकर आपकी पहचान "मुख्य निवेशक" के रूप में की थी. क्या आप मुख्य निवेशक थे?
17\) क्या आपसे जुड़ी संस्थाओं ने एराया लाइफस्पेसेज, विकास लाइफकेयर या श्री गर्ग की अन्य कंपनियों में निवेश किया था? किन शर्तों पर?
18\) श्री गर्ग को "हरि भाई" कहते हुए दर्ज किया गया है. क्या वह आप हैं?
19\) ईडी ने उन प्रतिभूतियों में ₹580.78 करोड़ की राशि फ्रीज की है, जिनका लाभकारी मालिक वह आपको बताता है. क्या आपने इस फ्रीज को चुनौती दी है? अगर ये होल्डिंग्स आपकी हैं, तो आपने इन्हें कैसे हासिल किया?
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ 21 अक्टूबर से 23 अक्टूबर तक सब्सक्रिप्शन के लिए खुलेगा. इससे पहले कंपनी ने 212 एंकर निवेशकों को ₹1,119 प्रति शेयर के भाव पर 7.24 करोड़ शेयर आवंटित किए हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज की टेलीकॉम और डिजिटल इकाई जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को आम निवेशकों के लिए खुलने से पहले ही बड़े संस्थागत निवेशकों का समर्थन मिला है. कंपनी ने एंकर निवेशकों से ₹8,110 करोड़ जुटाए हैं. स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी के मुताबिक, जियो प्लेटफॉर्म्स ने 212 एंकर निवेशकों को प्राइस बैंड के ऊपरी स्तर ₹1,119 प्रति शेयर के भाव पर कुल 7.24 करोड़ शेयर आवंटित किए हैं.
भारत के सबसे बड़े आईपीओ के तौर पर पेश किए जा रहे इस इश्यू में घरेलू और विदेशी संस्थागत निवेशकों की भागीदारी पर बाजार की नजर है. हालांकि, एंकर निवेशकों से मिली प्रतिक्रिया के बावजूद आम निवेशकों की ओर से आईपीओ को कैसी प्रतिक्रिया मिलती है, यह सब्सक्रिप्शन के आंकड़ों से स्पष्ट होगा.
LIC ने लगाए ₹500 करोड़, विदेशी निवेशकों की भी भागीदारी
एंकर निवेशकों में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) सबसे बड़ा निवेशक रहा. LIC को ₹500 करोड़ के शेयर आवंटित किए गए, जो कुल एंकर निवेश का करीब 6.17 फीसदी है. इसके अलावा न्यू वर्ल्ड फंड इंक को ₹486.27 करोड़, सिंगापुर सरकार को ₹340.93 करोड़, SBI फोकस्ड फंड को ₹315 करोड़ और BNP परिबास फाइनेंशियल मार्केट्स को ₹303.25 करोड़ के शेयर आवंटित किए गए हैं.
विदेशी संस्थागत निवेशकों की भागीदारी भी इस आईपीओ में देखने को मिली है. ब्लैकरॉक (BlackRock), फिडेलिटी, कैपिटल ग्रुप और जेपी मॉर्गन एसेट मैनेजमेंट जैसे वैश्विक निवेशकों ने एंकर बुक में हिस्सा लिया है. इसके अलावा, अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी जैसे सरकारी निवेश संस्थानों ने भी निवेश किया है.
म्यूचुअल फंड्स को मिले ₹2,785 करोड़ के शेयर
जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ में घरेलू म्यूचुअल फंड्स की भी उल्लेखनीय भागीदारी रही. कुल 25 फंड हाउस की 95 योजनाओं के माध्यम से म्यूचुअल फंड्स को ₹2,785 करोड़ के शेयर आवंटित किए गए. यह कुल एंकर आवंटन का करीब 34.34 फीसदी है.
वहीं, जीवन बीमा और पेंशन फंड्स को भी ₹1,090 करोड़ के शेयर आवंटित किए गए हैं. एंकर निवेशकों की इस भागीदारी से आईपीओ में संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी का पता चलता है.
₹30,213 करोड़ जुटाने की तैयारी
जियो प्लेटफॉर्म्स इस आईपीओ के जरिए करीब ₹30,213 करोड़ जुटाने की योजना बना रही है. इसके लिए प्राइस बैंड ₹1,065 से ₹1,119 प्रति शेयर तय किया गया है. ऊपरी प्राइस बैंड के आधार पर कंपनी का मूल्यांकन करीब 108 अरब डॉलर यानी लगभग ₹9 लाख करोड़ बैठता है.
यह आईपीओ 21 अक्टूबर से 23 अक्टूबर 2026 तक सब्सक्रिप्शन के लिए खुला रहेगा. कंपनी इश्यू से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल मुख्य रूप से अपनी टेलीकॉम सब्सिडियरी का कर्ज चुकाने और अन्य कॉरपोरेट जरूरतों को पूरा करने के लिए करेगी.
आईपीओ के बाद भी रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास जियो प्लेटफॉर्म्स की बहुलांश हिस्सेदारी बनी रहने की बात कही गई है. अब निवेशकों की नजर आईपीओ के सब्सक्रिप्शन आंकड़ों, शेयरों के आवंटन और लिस्टिंग के दौरान बाजार की प्रतिक्रिया पर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: यह खबर केवल सूचनात्मक उद्देश्य से है और इसे निवेश संबंधी सलाह नहीं माना जाना चाहिए. निवेश से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श करें.)
महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा नियामक की कार्रवाई के बाद रक्षा मंत्रालय के कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट (CSD) ने ओल्ड मोंक रम के तीन वेरिएंट के ऑर्डर निलंबित कर दिए हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ओल्ड मोंक रम बनाने वाली कंपनी मोहन मीकिन्स को एक और झटका लगा है. महाराष्ट्र में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) की कार्रवाई के बाद अब रक्षा मंत्रालय के कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट (CSD) ने भी कंपनी के तीन उत्पादों के ऑर्डर निलंबित कर दिए हैं. इन उत्पादों में ओल्ड मोंक गोल्ड रिजर्व रम, ओल्ड मोंक द लीजेंड रम और ओल्ड मोंक XXX मैच्योर्ड रम शामिल हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सीएसडी ने 11 अगस्त को अपने क्षेत्रीय प्रबंधकों और डिपो को लिखे पत्र में इन तीनों उत्पादों के ऑर्डर निलंबित करने का निर्देश दिया था. सीएसडी रक्षा मंत्रालय के कर्मचारियों और उनके परिवारों को शराब सहित विभिन्न घरेलू उत्पाद उपलब्ध कराता है. ऐसे में इस फैसले से देशभर में फैले उसके नेटवर्क के जरिए ओल्ड मोंक की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
FSSAI ने लेबलिंग और उत्पाद संरचना पर उठाए सवाल
FSSAI ने करीब दो महीने पहले महाराष्ट्र के खोपोली स्थित मोहन मीकिन्स के प्लांट का निरीक्षण किया था. इस दौरान नियामक ने ओल्ड मोंक रम की उत्पाद संरचना और लेबलिंग पर आपत्तियां जताई थीं. इसके बाद महाराष्ट्र में इसकी बिक्री पर रोक लगा दी गई थी.
नियामक ने रम के लेबल पर इस्तेमाल किए गए ‘7 इयर्स ओल्ड ब्लेंड्ड’ और ‘वेरी ओल्ड वेटेड’ जैसे दावों पर सवाल उठाए थे. इसके अलावा, उत्पाद में मिलाए गए फ्लेवर की स्पष्ट जानकारी नहीं दिए जाने को लेकर भी आपत्ति जताई गई थी.
तीन उत्पादों की जगह दूसरे ब्रांड शामिल
सीएसडी ने ओल्ड मोंक के तीन वेरिएंट के ऑर्डर निलंबित करने के साथ ही उनकी जगह तीन अन्य उत्पादों को शामिल किया है. इनमें मैकडॉवेल्स नंबर 1 सेलिब्रेशन मैच्योर्ड XXX रम, एंटिक्विटी ब्लू व्हिस्की और रॉयल चैलेंज व्हिस्की शामिल हैं. मोहन मीकिन्स के लिए सीएसडी एक प्रमुख ग्राहक माना जाता है. ऐसे में उसके तीन उत्पादों के ऑर्डर निलंबित होने से कंपनी की कैंटीन नेटवर्क के जरिए होने वाली बिक्री पर असर पड़ने की आशंका है.
कंपनी ने एनसीआर से विस्तार की शुरुआत की है और दिल्ली-मुंबई समेत टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी संभावनाएं तलाश रही है. विस्तार के लिए नए स्टोर खोलने के साथ अधिग्रहण के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
फ्रांस की रिटेल कंपनी कैरेफोर (Carrefour) अगले पांच साल में भारतीय बाजार में अपने स्टोर की संख्या बढ़ाकर 50 करने की योजना बना रही है. कंपनी ने ग्रेटर नोएडा वेस्ट में पहला स्टोर खोलने के बाद 15 अक्टूबर को गाजियाबाद में अपना दूसरा स्टोर शुरू किया. अब कंपनी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के साथ दिल्ली, मुंबई और दूसरे शहरों में विस्तार की संभावनाएं तलाश रही है.
दुबई स्थित अपैरल ग्रुप के साथ फ्रेंचाइजी साझेदारी के जरिए भारतीय बाजार में उतरी कैरेफोर की रणनीति फिलहाल ऑफलाइन स्टोर नेटवर्क को मजबूत करने पर केंद्रित है. कंपनी नए स्टोर खोलने के अलावा मौजूदा रिटेल नेटवर्क के अधिग्रहण, क्विक कॉमर्स और भारत से फैशन एवं फुटवियर उत्पादों की खरीद के अवसरों पर भी विचार कर रही है.
अपैरल ग्रुप की मालिक कंपनी ऐपकॉर्प होल्डिंग के चेयरमैन नीलेश वेद ने बीडब्ल्यू रिटेल वर्ल्ड से बातचीत में बताया कि कंपनी अगले पांच साल में 50 स्टोर खोलने का लक्ष्य लेकर चल रही है. उन्होंने कहा कि भारत में विस्तार के लिए कंपनी ऐसे बाजारों को प्राथमिकता देगी, जहां पर्याप्त संख्या में स्टोर खोलकर परिचालन को प्रभावी बनाया जा सके.
ग्लोबल ब्रांड के साथ भारतीय बाजार में विस्तार
कैरेफोर एक अंतरराष्ट्रीय रिटेल ब्रांड है, जिसका वैश्विक स्तर पर व्यापक स्टोर नेटवर्क है. कंपनी भारतीय बाजार में अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान और रिटेल क्षेत्र के अनुभव के आधार पर कारोबार बढ़ाना चाहती है.
नीलेश वेद के मुताबिक, कंपनी का लक्ष्य केवल अलग-अलग शहरों में एक-एक स्टोर खोलना नहीं है, बल्कि उन क्षेत्रों में स्टोर का मजबूत नेटवर्क तैयार करना है, जहां कारोबार को लंबे समय तक टिकाऊ बनाया जा सके.
उन्होंने कहा कि विस्तार के दौरान सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स और स्थानीय बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाएगा. कंपनी बहुत अधिक भौगोलिक क्षेत्रों में एक साथ विस्तार करने के बजाय आसपास के इलाकों में पर्याप्त संख्या में स्टोर खोलने की रणनीति पर काम कर रही है.
वेद ने कहा, “हमें राज्यों या आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर कारोबार की जरूरत है. हम अपने कारोबार को बहुत ज्यादा क्षेत्रों में फैलाकर संसाधनों को बिखेरना नहीं चाहते.” इस रणनीति से कंपनी को उत्पादों की आपूर्ति, स्टॉक प्रबंधन और स्टोर संचालन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.
दिल्ली और मुंबई में जगह तलाश रही कंपनी
एनसीआर में शुरुआती मौजूदगी बनाने के बाद कैरेफोर दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े बाजारों में भी प्रवेश की तैयारी कर रही है. कंपनी इन शहरों में स्टोर खोलने के लिए उपयुक्त स्थान तलाश रही है. कुछ नए मॉल में जगह को लेकर बातचीत भी चल रही है.
हालांकि, कंपनी ने दिल्ली और मुंबई में स्टोर खोलने की कोई निश्चित तारीख नहीं बताई है. विस्तार का फैसला उपयुक्त लोकेशन मिलने और कारोबार की व्यावसायिक संभावनाओं के आधार पर किया जाएगा.
वेद ने कहा कि दिल्ली और मुंबई दोनों बाजारों में कंपनी जगह तलाश रही है. आने वाले वर्षों में खुलने वाले कुछ नए मॉल भी उसके विस्तार की योजना का हिस्सा हो सकते हैं.
कंपनी की योजना केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है. वेद के मुताबिक, भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी रिटेल कारोबार के विस्तार की अच्छी संभावनाएं हैं. कंपनी इन बाजारों में भी अवसरों का आकलन कर रही है. हालांकि, हर शहर में प्रवेश करने से पहले कंपनी स्थानीय प्रतिस्पर्धा, ग्राहकों की मांग और स्टोर नेटवर्क स्थापित करने की संभावनाओं का आकलन करेगी.
अधिग्रहण से तेजी से बढ़ सकता है स्टोर नेटवर्क
कैरेफोर भारत में विस्तार के लिए अधिग्रहण के विकल्प को भी खुला रख रही है. कंपनी का मानना है कि यदि किसी मौजूदा रिटेल नेटवर्क का अधिग्रहण करने का अवसर मिलता है, तो उसके जरिए नए बाजारों में तेजी से पहुंच बनाई जा सकती है.
वेद ने कहा कि कंपनी संभावित अधिग्रहण के अवसरों पर विचार करेगी और जरूरत पड़ने पर इसके लिए निवेश भी बढ़ाया जा सकता है. उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर 80 स्टोर वाले नेटवर्क के अधिग्रहण का अवसर मिलता है, तो कंपनी उसे खरीदने पर विचार कर सकती है. यह एक संभावित स्थिति का उदाहरण था, किसी तय सौदे की घोषणा नहीं.
अधिग्रहण से कंपनी को पहले से स्थापित स्टोर, लोकेशन और परिचालन नेटवर्क का लाभ मिल सकता है. इससे नए बाजारों में विस्तार की प्रक्रिया तेज हो सकती है. हालांकि, कैरेफोर ने फिलहाल किसी संभावित अधिग्रहण के लिए कंपनी या रिटेल नेटवर्क का नाम नहीं बताया है.
वेद के मुताबिक, विस्तार के लिए निवेश जारी रहेगा और यदि अधिग्रहण का कोई उपयुक्त अवसर सामने आता है, तो निवेश की जरूरत भी बढ़ सकती है. कंपनी ने भारत में अपने पांच साल के विस्तार लक्ष्य के लिए कुल निवेश राशि का खुलासा नहीं किया है.
पहले ऑफलाइन स्टोर, फिर क्विक कॉमर्स
कैरेफोर की फिलहाल प्राथमिकता अपने ऑफलाइन स्टोर नेटवर्क को मजबूत करना है. कंपनी आगे चलकर क्विक कॉमर्स कारोबार में भी उतरना चाहती है, लेकिन इसके लॉन्च की समयसीमा, डिलीवरी पार्टनर या परिचालन मॉडल के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं दी गई है.
भारतीय रिटेल बाजार में कंपनी को पहले से स्थापित संगठित रिटेल कारोबारियों से प्रतिस्पर्धा करनी होगी. इनमें डीमार्ट जैसे बड़े रिटेलर शामिल हैं, जो कीमतों और रोजमर्रा के जरूरी सामान की उपलब्धता पर ध्यान देते हैं.
ऐसे बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए कैरेफोर को उत्पादों की विविधता, कीमत, स्टोर लोकेशन और ग्राहकों के खरीदारी अनुभव पर ध्यान देना होगा.
भारतीय ग्राहक कीमतों को लेकर काफी जागरूक हैं और खरीदारी करते समय अलग-अलग विकल्पों की तुलना करते हैं. ऐसे में कंपनी के लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान के साथ स्थानीय ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप कारोबार विकसित करना महत्वपूर्ण होगा.
भारत से फैशन और फुटवियर उत्पादों की खरीद पर भी नजर
कैरेफोर की भारत में रणनीति केवल घरेलू रिटेल बिक्री तक सीमित नहीं है. कंपनी भारत से फैशन और फुटवियर उत्पादों की खरीद कर उन्हें अपने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उपलब्ध कराने की संभावनाएं भी तलाश रही है.
इससे भारतीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ कंपनी के संबंधों का दायरा बढ़ सकता है. हालांकि, इस योजना का आकार, उत्पादों की संभावित श्रेणियां और खरीद का लक्ष्य अभी स्पष्ट नहीं किया गया है.
भारतीय बाजार में कंपनी स्थानीय स्तर पर खरीदे गए उत्पादों के साथ अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भी उपलब्ध करा रही है. गाजियाबाद स्थित स्टोर में किराने के सामान, घरेलू उपयोग की वस्तुओं, ताजे फल-सब्जियों और बेकरी उत्पादों जैसी श्रेणियां शामिल हैं. कंपनी अपने निजी ब्रांड के उत्पादों की संभावनाएं भी तलाश रही है.
कैरेफोर के अंतरराष्ट्रीय साझेदारी कारोबार के कार्यकारी निदेशक पैट्रिक लासफार्ग ने कहा, “भारत में हमारे दूसरे स्टोर का खुलना इस बाजार में कैरेफोर की यात्रा का एक महत्वपूर्ण कदम है. ग्रेटर नोएडा में अपना पहला प्रमुख स्टोर शुरू करने के बाद गाजियाबाद में विस्तार से हमें एनसीआर में और अधिक ग्राहकों तक अपनी रिटेल सेवाएं पहुंचाने का अवसर मिला है. हम इस सफर को आगे बढ़ाने और पूरे भारत में अपनी मौजूदगी का विस्तार करने के लिए उत्सुक हैं.”
कंपनी की आगे की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह पांच साल में 50 स्टोर खोलने के लक्ष्य को किस गति से पूरा करती है और भारतीय बाजार में अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान को स्थानीय ग्राहकों की जरूरतों के साथ किस तरह जोड़ पाती है.
ट्रेंट ने 18 अक्टूबर को शेयर बाजारों को दी गई जानकारी के जरिए भट के इस्तीफे की सूचना दी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा समूह के वरिष्ठ अधिकारी हरीश भट ने बढ़ती पेशेवर और व्यक्तिगत जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए ट्रेंट लिमिटेड के गैर-कार्यकारी, गैर-स्वतंत्र निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया है. उनका इस्तीफा 17 अक्टूबर, 2026 से प्रभावी हो गया है.
हरीश भट ने ट्रेंट के चेयरमैन नोएल एन. टाटा को लिखे इस्तीफे के पत्र में कहा कि कई वर्षों तक कंपनी के निदेशक मंडल का हिस्सा रहना और उसकी चर्चाओं में भाग लेना उनके लिए खुशी और सम्मान की बात रही है. अपने इस्तीफे के पत्र में भट ने लिखा, “कंपनी के संचालन और रणनीतिक दिशा में योगदान देने का अवसर देने के लिए मैं आपको और निदेशक मंडल को धन्यवाद देता हूं.” ट्रेंट ने 18 अक्टूबर को शेयर बाजारों को दी गई जानकारी के जरिए भट के इस्तीफे की सूचना दी.
2014 से ट्रेंट के निदेशक मंडल में थे शामिल
हरीश भट अप्रैल 2014 से ट्रेंट के निदेशक मंडल में शामिल थे. इससे पहले वह टाटा संस में ब्रांड संरक्षक के रूप में कार्यरत थे. उन्होंने 1987 में टाटा प्रशासनिक सेवा में अधिकारी के रूप में टाटा समूह में अपना करियर शुरू किया था.
टाटा समूह में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई वरिष्ठ नेतृत्व पदों पर काम किया. इनमें टाटा ग्लोबल बेवरेजेज लिमिटेड के प्रबंध निदेशक, टाइटन कंपनी लिमिटेड के घड़ी और आभूषण कारोबार के मुख्य परिचालन अधिकारी तथा समूह के दूरसंचार कारोबार से जुड़ी जिम्मेदारियां शामिल हैं. भट टाटा स्टारबक्स प्राइवेट लिमिटेड और इनफिनिटी रिटेल लिमिटेड के निदेशक भी हैं.
IMF ने 2028 में भारत की अर्थव्यवस्था के 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान घटाकर 2029 कर दिया है. रुपये की कमजोरी से डॉलर में जीडीपी का आकार घटने का अनुमान है, जबकि मजबूत घरेलू मांग के कारण वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7 फीसदी किया गया है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी देश के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य में देरी कर सकती है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अक्टूबर 2026 के वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के अनुसार, भारत अब 2028 के बजाय 2029 में इस आंकड़े को पार कर सकता है. हालांकि, वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की रैंकिंग में भारत की स्थिति मजबूत होने का अनुमान है. वर्ष 2027 में भारत जापान और ब्रिटेन को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है.
आईएमएफ ने भारत की घरेलू आर्थिक वृद्धि को लेकर सकारात्मक अनुमान जताया है. मजबूत घरेलू मांग और आर्थिक गतिविधियों के चलते वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर का अनुमान 6.4 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया गया है. ऐसे में सवाल है कि जब देश की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार मजबूत है, तो 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में देरी क्यों हो रही है?
रुपये की कमजोरी ने बिगाड़ा 5 ट्रिलियन डॉलर का गणित
किसी देश की अर्थव्यवस्था का वैश्विक आकार और रैंकिंग तय करने के लिए उसकी जीडीपी को डॉलर में भी मापा जाता है. रुपये की विनिमय दर में बदलाव का सीधा असर इस गणना पर पड़ता है. रुपये की कीमत गिरने पर समान घरेलू आर्थिक उत्पादन का डॉलर में मूल्य कम हो जाता है.
आईएमएफ ने अप्रैल 2026 में अनुमान लगाया था कि भारत की अर्थव्यवस्था 2028 में 5.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी. अक्टूबर के नए अनुमान में इसे घटाकर 4.996 ट्रिलियन डॉलर कर दिया गया है. यानी भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा पार करने के लिए अब 2029 तक इंतजार करना पड़ सकता है.
आईएमएफ के अनुमान के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2026 में 4.06 ट्रिलियन डॉलर और 2027 में 4.52 ट्रिलियन डॉलर रहेगा. वर्ष 2028 में इसके 4.996 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. इसके बाद 2029 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार बढ़कर 5.54 ट्रिलियन डॉलर हो सकता है.
रुपये में बढ़ेगी जीडीपी, फिर भी डॉलर में घटा अनुमान
आईएमएफ के ताजा अनुमानों में रुपये के हिसाब से भारत की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा है. वर्ष 2028 में देश की नाममात्र जीडीपी 477.1 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जबकि अप्रैल में यह अनुमान 471.9 लाख करोड़ रुपये था. यानी रुपये के हिसाब से अनुमान में करीब 1.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
इसके बावजूद डॉलर में जीडीपी का अनुमान घट गया है. इसकी प्रमुख वजह रुपये की विनिमय दर में संभावित गिरावट है. आईएमएफ ने 2027 के लिए डॉलर के मुकाबले रुपये की अनुमानित विनिमय दर 93 रुपये से बढ़ाकर 95 रुपये प्रति डॉलर कर दी है. वहीं, 2028 के लिए औसत विनिमय दर का अनुमान 93.3 रुपये से बढ़ाकर 95.5 रुपये प्रति डॉलर किया गया है.
रुपये की कीमत में गिरावट का असर इस बात से समझा जा सकता है कि समान राशि को डॉलर में बदलने पर पहले की तुलना में कम डॉलर मिलते हैं. इसी वजह से घरेलू अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के बावजूद डॉलर में उसका मूल्य अपेक्षाकृत कम रह सकता है.
इस साल रुपये में 5 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है. खबर में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, शुक्रवार को रुपया 96.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. रुपये में गिरावट को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को भी कदम उठाने पड़े हैं.
2027 में जापान और ब्रिटेन से आगे निकल सकता है भारत
5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में देरी के बावजूद वैश्विक आर्थिक रैंकिंग में भारत की स्थिति मजबूत होने का अनुमान है. आईएमएफ के अनुमानों के मुताबिक, 2027 में भारत की जीडीपी 4.52 ट्रिलियन डॉलर रह सकती है. इसके साथ भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है.
तुलना करें तो 2027 में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आकार 4.49 ट्रिलियन डॉलर और जापान का 4.47 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान है. हालांकि, इन तीनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच अंतर कम है. ऐसे में विनिमय दरों में बदलाव से उनकी वास्तविक रैंकिंग प्रभावित हो सकती है.
आईएमएफ के अनुमान के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था 2030 में 6.13 ट्रिलियन डॉलर और 2031 में 6.74 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है. इस अनुमान के आधार पर भारत 2031 में जर्मनी को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. फिलहाल भारत से आगे अमेरिका, चीन और जर्मनी हैं.
घरेलू मांग से मजबूत रहेगी आर्थिक वृद्धि
डॉलर में जीडीपी के अनुमान में कमी के बीच भारत के लिए राहत की बात यह है कि आईएमएफ ने आर्थिक विकास दर का अनुमान बढ़ाया है. वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.4 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी किया गया है. इसके अलावा, 2027 में रुपये के हिसाब से नाममात्र जीडीपी वृद्धि दर 10.8 फीसदी के पुराने अनुमान से बढ़कर 11.7 फीसदी रहने की संभावना जताई गई है.
ये अनुमान बताते हैं कि भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था में विकास की रफ्तार मजबूत बनी हुई है. हालांकि, डॉलर में अर्थव्यवस्था का आकार केवल घरेलू उत्पादन पर निर्भर नहीं करता, बल्कि रुपये और डॉलर के बीच विनिमय दर भी इसमें अहम भूमिका निभाती है. इसलिए भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का समय आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ रुपये की चाल पर भी निर्भर करेगा.
भारतीय विज्ञापन एजेंसियों के संगठन ने वर्ष 2026-27 के एजेंडे के तहत क्रिएटिव काउंसिल का गठन किया है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय विज्ञापन एजेंसियों के संगठन एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) ने पहली बार क्रिएटिव काउंसिल का गठन किया है. इस परिषद का नेतृत्व बीबीडीओ ग्रुप इंडिया के चेयरमैन और ग्रुप चीफ क्रिएटिव ऑफिसर जोसी पॉल करेंगे. इस पहल के जरिए संगठन भारतीय विज्ञापन उद्योग में रचनात्मक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने और इसके पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम करेगा.
क्रिएटिव काउंसिल का उद्देश्य स्वतंत्र विज्ञापन एजेंसियों, क्षेत्रीय प्रतिभाओं और उभरते रचनात्मक पेशेवरों सहित अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों को एक मंच पर लाना है. इसके माध्यम से सहयोग, नए प्रयोग, मार्गदर्शन और विभिन्न क्षेत्रों व पीढ़ियों के बीच विचारों के आदान-प्रदान के अवसर तैयार किए जाएंगे.
विज्ञापन जगत से बाहर के विशेषज्ञ भी होंगे शामिल
जोसी पॉल ने इस पहल पर कहा कि क्रिएटिव काउंसिल प्रतिभाओं को निखारने, विविधता को प्रोत्साहित करने और नए विचारों के विकास के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने का अवसर है. उन्होंने बताया कि परिषद के तहत अलग-अलग पीढ़ियों के लोगों के बीच संवाद, प्रयोग, बहस, प्रदर्शन, पाठ सत्र और फिल्मों की स्क्रीनिंग जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है.
उन्होंने कहा कि विज्ञापन जगत के बाहर के लोगों को भी इस पहल से जोड़ा जाएगा. इनमें कलाकार, वैज्ञानिक, फिल्म निर्माता, डिजाइनर, उद्यमी और विचारक शामिल होंगे. इससे रचनात्मक समुदाय को नए दृष्टिकोण मिल सकेंगे और उद्योग में नए विचारों को बढ़ावा मिलेगा.
जोसी पॉल के काम को मिल चुके हैं 25 से अधिक कान्स लायंस पुरस्कार
जोसी पॉल के नेतृत्व में तैयार किए गए अभियानों को 25 से अधिक कान्स लायंस पुरस्कार मिल चुके हैं. इनमें ग्रां प्री और कई गोल्ड पुरस्कार शामिल हैं. एरियल के ‘शेयर द लोड’ अभियान को वार्क (WARC) ने लगातार दो बार दुनिया का सबसे प्रभावी अभियान माना था. यह अभियान लंबे समय तक ब्रांड निर्माण और विज्ञापन प्रभावशीलता के क्षेत्र में एक प्रमुख उदाहरण बना हुआ है.
एएएआई अध्यक्ष ने क्या कहा?
एएएआई के नवनिर्वाचित अध्यक्ष संदीप गोयल ने कहा कि संगठन के इतिहास में पहली बार रचनात्मकता को संस्थागत ढांचे में सबसे प्रमुख स्थान दिया जा रहा है. उनके मुताबिक, जोसी पॉल के नेतृत्व में क्रिएटिव काउंसिल नई पीढ़ी की प्रतिभाओं को मार्गदर्शन देने और देश की स्वतंत्र तथा क्षेत्रीय विज्ञापन एजेंसियों की विविधता को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाएगी. उन्होंने कहा कि विज्ञापन उद्योग ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां रणनीतिक नवाचार और रचनात्मक उत्कृष्टता को साथ लेकर आगे बढ़ने पर जोर होगा.
मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपने कर्मचारियों को अक्टूबर महीने का वेतन तय समय से करीब 15 दिन पहले जारी किया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी अपने कर्मचारियों को जियो प्लेटफॉर्म्स के आगामी आईपीओ में निवेश करने पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपने कर्मचारियों को अक्टूबर महीने की सैलरी निर्धारित समय से करीब 15 दिन पहले दे दी है. कंपनी का यह कदम जियो प्लेटफॉर्म्स के आगामी आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) से पहले आया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रिलायंस समूह अपने कर्मचारियों को इस आईपीओ में निवेश करने पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है.
रिपोर्ट में मामले से परिचित लोगों के हवाले से बताया गया है कि कंपनी ने अपने समूह की विभिन्न कंपनियों में काम करने वाले करीब 4.20 लाख कर्मचारियों में से अधिकांश से संपर्क किया है. कंपनी का लक्ष्य लगभग 3.2 अरब डॉलर यानी करीब 30,213 करोड़ रुपये के प्रस्तावित शेयर निर्गम में कर्मचारियों की भागीदारी को प्रोत्साहित करना है. हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, कर्मचारियों को वेतन जल्दी जारी करने की कोई वजह नहीं बताई गई.
कर्मचारियों और उनके परिवारों के डीमैट खातों की जानकारी ली
रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस की ओर से कर्मचारियों से यह भी पता किया गया है कि उनके या उनके परिवार के सदस्यों के पास शेयरों में निवेश के लिए जरूरी डीमैट खाते हैं या नहीं. जिन कर्मचारियों के पास ऐसे खाते नहीं हैं, उन्हें खाते खुलवाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है.
ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के हवाले से आई रिपोर्ट के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज में कुल 4,19,911 कर्मचारी कार्यरत थे. वहीं, कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, जियो में 74,822 कर्मचारी काम करते हैं.
जियो कर्मचारियों के लिए अलग श्रेणी में आवेदन का विकल्प
जियो प्लेटफॉर्म्स के पात्र कर्मचारी आईपीओ में कर्मचारियों के लिए आरक्षित श्रेणी के तहत आवेदन कर सकते हैं. रिलायंस समूह की अन्य कंपनियों के कर्मचारी खुदरा निवेशक श्रेणी के तहत आवेदन कर सकते हैं. इसके अलावा, पात्र रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरधारकों के लिए भी आईपीओ में एक अलग हिस्सा आरक्षित है.
21 अक्टूबर से खुलेगा जियो प्लेटफॉर्म्स का IPO
जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ 21 अक्टूबर 2026 को सार्वजनिक सदस्यता के लिए खुलेगा और 23 अक्टूबर को बंद होगा. कंपनी इस निर्गम के जरिए करीब 30,213 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है. इसके लिए प्रति शेयर 1,065 रुपये से 1,119 रुपये का प्राइस बैंड तय किया गया है.
कंपनी की ओर से दाखिल दस्तावेजों के अनुसार, कर्मचारियों के लिए आरक्षित हिस्से के तहत पात्र कर्मचारियों को शेयरों पर छूट भी मिलेगी. ऐसे में आईपीओ में कर्मचारियों की भागीदारी पर बाजार की नजर रहेगी.