आज से 45 नए स्टॉक एफएंडओ लिस्ट में जोड़े गए हैं. एफएंडओ ऐसी सिक्योरिटीज़ हैं जिनका स्टॉक एक्सचेंज के फ्यूचर एंड ऑप्शन सेगमेंट में कारोबार किया जाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पेटीएम, जोमैटो, जियो फाइनेंशियल, एलआईसी और डीमार्ट समेत 52 शेयरों में आज से कमाई का नया जरिया मिलने जा रहा है. दरअसल इन स्टॉक्स को फ्यूचर एंड ऑप्शन सेगमेंट में शामिल कर लिया गया है. ऐसे में अब आप इन शेयरों में कैश के साथ-साथ F&O सेगमेंट में भी ट्रेड कर सकते हैं. फ्यूचर एंड ऑप्शन सेगमेंट में कम पूंजी में बड़े सौदे बनाए जाते हैं. हालांकि, यह पूरी तरह जोखिम आधारित ट्रेडिंग होती है.
F&O के नए खिलाड़ी
फ्यूचर एंड ऑप्शन सेगमेंट में शामिल हुए नए शेयर्स में जोमैटो, पेटीएम, जियो फाइनेंशियल, एलआईसी, अडानी टोटल, एंजेल वन, डीमार्ट, साइएंट, पीबी फिनटेक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑयल इंडिया, इंडियन बैंक और जेएसडब्ल्यू एनर्जी के स्टॉक्स शामिल हैं. एफएंडओ में शामिल होने के बाद इन शेयरों के सर्किट फिल्टर भी बदले गए हैं. अब तक, बीएसई में ये शेयर 20%, 10%, 5% या 2% के डेली प्राइस बैंड के अंदर काम कर रहे थे. अब एफएंडओ के फ्रेमवर्क के तहत इन शेयरों की सर्किट लिमिट 20% के डेली प्राइस बैंड से लेकर वीकली 60% तक ऊपर या नीचे जा सकती है.
क्या होती है F&O ट्रेडिंग?
फ्यूचर एंड ऑप्शन सेगमेंट, डेरिवेटिव (वायदा बाजार) कैटेगरी में आता है. यहां एक्सपायरी कॉन्ट्रेक्ट के साथ स्टॉक के स्ट्राइक प्राइस पर ट्रेड किया जाता है. खास बात है इस सेगमेंट में किसी स्टॉक को खरीदने की जरूरत नहीं होती है. हालांकि, यह बहुत ही हाई रिस्क और रिवॉर्ड वाली ट्रेडिंग होती है. एफएंडओ स्टॉक आमतौर पर अत्यधिक लिक्विडेट होते हैं, जिससे उन्हें खरीदना और बेचना आसान हो जाता है. एफएंडओ स्टॉक अक्सर हाई वोलिटिलिटी प्रदर्शित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्राइस में बड़ा उतार-चढ़ाव हो सकता है.
SBI ने प्री-IPO प्लेसमेंट के तहत SBI Funds Management के 2.88 करोड़ इक्विटी शेयर 30 निवेशकों को बेचे हैं. इस हिस्सेदारी की बिक्री 574 रुपये प्रति शेयर के भाव पर हुई, जो IPO के प्राइस बैंड का ऊपरी स्तर है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने अपनी एसेट मैनेजमेंट इकाई SBI Funds Management में 1.42% हिस्सेदारी 1,655 करोड़ रुपये में बेच दी है. यह सौदा कंपनी के 11,700 करोड़ रुपये के IPO से पहले प्री-IPO प्लेसमेंट के जरिए किया गया है. इस डील से कंपनी को मजबूत संस्थागत निवेशकों का भरोसा मिलने का संकेत माना जा रहा है.
30 निवेशकों को बेचे 2.88 करोड़ शेयर
SBI ने प्री-IPO प्लेसमेंट के तहत SBI Funds Management के 2.88 करोड़ इक्विटी शेयर 30 निवेशकों को बेचे हैं. इस हिस्सेदारी की बिक्री 574 रुपये प्रति शेयर के भाव पर हुई, जो IPO के प्राइस बैंड का ऊपरी स्तर है.
कंपनी के मुताबिक, इस सौदे में टाटा AIG जनरल इंश्योरेंस, गो डिजिट जनरल इंश्योरेंस, 360 ONE फंड्स, बेनेट कोलमैन के अलावा कई अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) और फैमिली ऑफिसेज ने निवेश किया है.
14 जुलाई को खुलेगा 11,700 करोड़ रुपये का IPO
SBI Funds Management का 11,700 करोड़ रुपये का IPO 14 जुलाई को निवेशकों के लिए खुलेगा और 16 जुलाई को बंद होगा. कंपनी ने IPO का प्राइस बैंड 545 रुपये से 574 रुपये प्रति शेयर तय किया है. शेयरों की लिस्टिंग 21 जुलाई को BSE और NSE पर होने की उम्मीद है.
1.17 लाख करोड़ रुपये तक हो सकता है वैल्यूएशन
IPO के ऊपरी प्राइस बैंड 574 रुपये के आधार पर SBI Funds Management का वैल्यूएशन करीब 1.17 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. इससे यह देश की सबसे मूल्यवान एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल होगी.
पूरी तरह OFS होगा IPO
यह IPO पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा. यानी इस इश्यू से कंपनी को कोई नई पूंजी नहीं मिलेगी. IPO के तहत SBI अपनी 12.83 करोड़ इक्विटी शेयर बेचेगा, जबकि उसकी संयुक्त उद्यम (JV) साझेदार यूरोप की एसेट मैनेजमेंट कंपनी Amundi India Holding 7.54 करोड़ शेयरों की बिक्री करेगी. दोनों मिलकर कंपनी की करीब 10% चुकता इक्विटी हिस्सेदारी बेचेंगे.
SBI और Amundi का संयुक्त उपक्रम
SBI Funds Management, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और यूरोप की एसेट मैनेजमेंट कंपनी Amundi का संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) है. यह देश की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल है और IPO के जरिए निवेशकों को इसमें हिस्सेदारी खरीदने का अवसर मिलेगा.
बुधवार को बाजार में आई भारी गिरावट ने केंद्रीय बैंक के बैंक गारंटी नियमों को लेकर उद्योग की बहस को फिर से तेज कर दिया है. लेकिन जहां एक ओर पूरा उद्योग एकजुट नजर आ रहा है, वहीं अंदरखाने ब्रोकरेज कंपनियां इस मुद्दे पर बंटी हुई हैं. साथ ही RBI के कदम के पीछे भी ठोस वजहें हो सकती हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
बुधवार के बाजार में आई बड़ी गिरावट के लिए सिर्फ एक बयान काफी था. जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम "खत्म हो गया है", तो सेंसेक्स 1,677 अंक टूट गया. यह पिछले तीन महीनों में उसकी सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट थी. वहीं निफ्टी 24,000 के नीचे फिसल गया. इस दौरान निवेशकों की करीब 8 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई, जबकि इंडिया VIX में लगभग 30% की तेजी दर्ज की गई.
इस गिरावट की वजह भू-राजनीतिक तनाव था. लेकिन बाजार के जानकारों को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की हुई कि गिरावट को थामने के लिए बाजार में खरीदारी लगभग नदारद थी. ब्रोकिंग इंडस्ट्री का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इसकी वजह RBI के नए क्रेडिट नियम हैं, जो 1 अप्रैल से लागू हुए. इन नियमों के तहत बैंकों को ब्रोकर्स की प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग के लिए फंडिंग देने से रोक दिया गया और क्लियरिंग कॉरपोरेशन को दी जाने वाली बैंक गारंटी पर कड़े कोलेटरल नियम लागू कर दिए गए.
लिक्विडिटी की दलील
प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग डेस्क लंबे समय से भारतीय डेरिवेटिव बाजारों में झटकों को संभालने का काम करते रहे हैं. खासकर BSE और MCX में, जहां कुल कारोबार का बड़ा हिस्सा प्रॉप ट्रेडिंग से आता है. ब्रोकर्स का कहना है कि इन डेस्कों को मिलने वाली बैंक फंडिंग पर रोक लगाकर RBI ने बाजार के उसी हिस्से को कमजोर कर दिया, जो अस्थिरता बढ़ने पर खरीदारी के लिए आगे आता था.
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "उच्च अस्थिरता से निपटने के लिए लिक्विडिटी सबसे अहम होती है. बुधवार जैसे दिन बाजार में दूसरी तरफ खरीदारी करने वाला कोई मौजूद ही नहीं था."
उद्योग की दूसरी शिकायत यह है कि इन प्रतिबंधों को जोखिम प्रबंधन के नाम पर लागू किया गया, जबकि अधिकारियों का कहना है कि पिछले 20 वर्षों में मार्जिन की कमी के कारण एक भी डिफॉल्ट दर्ज नहीं हुआ है. उनका सवाल है कि यदि दो दशक से व्यवस्था बिना किसी समस्या के चल रही थी, तो आखिर किस जोखिम को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है?
इसी तर्क के आधार पर ब्रोकर्स अब RBI और वित्त मंत्रालय के समक्ष एक नया प्रतिनिधित्व तैयार कर रहे हैं. इस बार वे SEBI, मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों और ब्रोकर्स एसोसिएशनों सहित सभी हितधारकों को साथ लेकर समीक्षा की मांग करना चाहते हैं.
अधिकारी ने कहा, "जो उद्योग के लिए अच्छा है, वही सभी हितधारकों के लिए भी अच्छा है."
RBI का पक्ष
हालांकि केंद्रीय बैंक की चिंताएं काल्पनिक नहीं हैं. वे इस बात से जुड़ी हैं कि बैंक गारंटी का इस्तेमाल और उसकी मार्केटिंग किस तरह की जा रही थी.
आमतौर पर बैंक गारंटी केवल 10-25% मार्जिन के आधार पर जारी की जाती है. यानी यदि कोई ब्रोकर 25 रुपये जमा करता है, तो उसे 100 रुपये की बैंक गारंटी मिल सकती है. यदि इस गारंटी का इस्तेमाल डेरिवेटिव ट्रेडिंग में किया जाए, जहां पहले से ही 30-40 गुना एक्सपोजर मिलता है, तो वास्तविक लीवरेज बढ़कर ब्रोकर की अपनी पूंजी का 120-160 गुना तक पहुंच जाता है.
एक अनुभवी बाजार विशेषज्ञ ने इसे साफ शब्दों में समझाया. "यह दूसरे के पैसे से सट्टेबाजी है. ब्रोकर्स अपनी पूंजी लगाने के बजाय बैंक का पैसा इस्तेमाल करना चाहते हैं. मुनाफा हुआ तो उनका, लेकिन नुकसान हुआ तो वे डिफॉल्ट घोषित कर देते हैं और बैंक का पैसा डूब जाता है."
यह केवल सैद्धांतिक आशंका नहीं है. 2019 से 2021 के बीच कई ब्रोकरेज कंपनियां दिवालिया हुईं. उस दौरान कई बैंकों ने क्लियरिंग हाउस को दी गई बैंक गारंटी का भुगतान करने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वे पहले डिफॉल्ट करने वाले ब्रोकर से अपना बकाया वसूलेंगे, जो कई मामलों में पूरी बैंक गारंटी के बराबर था.
इस नजरिए से देखें तो RBI का संदेश स्पष्ट है. यदि सट्टा लगाना है तो 100% मार्जिन अपनी पूंजी से लाना होगा. बैंक गारंटी उपलब्ध रहेगी, लेकिन उसके पीछे वास्तविक कोलेटरल होना चाहिए. प्रॉपराइटरी एक्सपोजर के लिए कम से कम 50% नकद कोलेटरल जरूरी होगा, ताकि डेरिवेटिव में सट्टेबाजी असुरक्षित बैंक ऋण के सहारे न चल सके.
उद्योग में मतभेद
जिस एकजुटता के साथ उद्योग अपनी बात रखना चाहता है, उसे कायम रखना आसान नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि पुराने सिस्टम का फायदा और नुकसान सभी को समान रूप से नहीं मिला.
छोटे ब्रोकर्स का कहना है कि व्यवहार में बैंक गारंटी का लाभ केवल बड़े खिलाड़ियों को मिलता था. ऐसे संस्थानों को, जिनकी बैलेंस शीट 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की थी और जो बैंकों से आसानी से बैंक गारंटी हासिल कर सकते थे.
वे यह शिकायत भी करते हैं कि ANMI ने भी इस मुद्दे पर बड़े ब्रोकर्स का साथ दिया है.
एक छोटे ब्रोकर ने सवाल किया, "इसमें छोटे ब्रोकर्स की क्या गलती है?"
उनका कहना है कि पत्रकारों और नीति-निर्माताओं तक सबसे ज्यादा आवाज उन्हीं कुछ बड़ी प्रॉप-ट्रेडिंग कंपनियों की पहुंच रही है, जिन्हें बैंक के लीवरेज वाले फंड का सबसे अधिक लाभ मिला.
नियामकीय जांच कुछ बड़ी प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग कंपनियों के कारोबारी मॉडल पर भी केंद्रित रही है. यह मॉडल मुख्य रूप से दिल्ली, मुंबई और गुजरात की कुछ कंपनियों तक सीमित है और उद्योग में इसके बहुत कम उदाहरण हैं.
बाजार से जुड़े लोगों और नियामकीय सोच से परिचित सूत्रों का आरोप है कि कुछ कंपनियां स्वतंत्र ट्रेडर्स को अपनी प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग डेस्क का "कर्मचारी" दिखाती हैं. इस व्यवस्था से मार्जिन दायित्व, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) और आयकर देनदारी कम हो सकती है. आलोचकों का कहना है कि इससे वास्तविक प्रॉप ट्रेडिंग और तीसरे पक्ष की सामूहिक सट्टेबाजी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.
जिन कंपनियों पर ऐसे आरोप लगे हैं, उन्होंने लगातार इन आरोपों से इनकार किया है. हालांकि SEBI में माधबी पुरी बुच के कार्यकाल के दौरान शुरू हुई नियामकीय सख्ती के पीछे यह पूरा घटनाक्रम भी एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि माना जाता है.
आगे की राह
बुधवार की बाजार गिरावट ने उद्योग को अपनी सबसे मजबूत दलील दे दी है. यह एक वास्तविक उदाहरण था कि जब प्रॉप ट्रेडिंग पर निर्भर और अत्यधिक लीवरेज वाला बाजार बैंक फंडिंग से वंचित हो जाता है और उसी समय कोई बड़ा भू-राजनीतिक झटका लगता है, तो क्या स्थिति बनती है.
अब सवाल यह है कि क्या RBI भी इसी घटना को अपने फैसले की पुष्टि के रूप में देखता है. यानी क्या वह इसे इस बात का प्रमाण मानता है कि इतना अधिक लीवरेज वाला बाजार बैंक गारंटी के सहारे चलना ही नहीं चाहिए था.
आने वाले दिनों में RBI को दिए जाने वाले प्रतिनिधित्व से इसका जवाब मिल सकता है.
फिलहाल दोनों पक्ष एक ही गिरावट को देख रहे हैं, लेकिन उससे बिल्कुल अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
इस अधिग्रहण के साथ VOYAGE 1 का एकीकरण कुंडू के डेस्टिनेशन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ट्रैवल और टूरिज्म सेक्टर के अनुभवी उद्यमी नवीन कुंडू ने दुबई स्थित डेस्टिनेशन मैनेजमेंट कंपनी (DMC) VOYAGE 1 में बहुमत हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया है. इस डील के तहत कंपनी का एकीकरण उनकी डेस्टिनेशन मार्केटिंग और AI-आधारित प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा. कंपनी का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर अपने नेटवर्क का विस्तार करना और ट्रैवल एजेंट्स के लिए AI आधारित स्मार्ट सेवाएं उपलब्ध कराना है.
ट्रैवल इंडस्ट्री के उद्यमी नवीन कुंडू ने दुबई स्थित डेस्टिनेशन मैनेजमेंट कंपनी (DMC) VOYAGE 1 में बहुमत हिस्सेदारी हासिल कर ली है. इस अधिग्रहण के साथ VOYAGE 1 का एकीकरण कुंडू के डेस्टिनेशन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा.
नई स्वामित्व संरचना के तहत नवीन कुंडू एकीकृत कंपनी के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की जिम्मेदारी संभालेंगे. इस दौरान वह कंपनी की मौजूदा संस्थापक टीम के साथ मिलकर कारोबार का नेतृत्व करेंगे.
कई देशों में मौजूद है VOYAGE 1
VOYAGE 1 की स्थापना विशाल धनसिंघानी ने की थी, जबकि लविन धनसिंघानी और अमित कुमार इसके सह-संस्थापक हैं. कंपनी अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली डेस्टिनेशन कंपनियों के जरिए अवकाश और बिजनेस ट्रैवल से जुड़े कई बाजारों में सेवाएं देती है.
फिलहाल कंपनी का संचालन संयुक्त अरब अमीरात (UAE), अजरबैजान, कजाकिस्तान, जॉर्जिया, वियतनाम, जापान, दक्षिण अफ्रीका, जाम्बिया, केन्या, तंजानिया, रवांडा और युगांडा सहित कई देशों में है.
अगले चरण में इन बाजारों में होगा विस्तार
एकीकृत कंपनी अब अपने डेस्टिनेशन मैनेजमेंट नेटवर्क का विस्तार स्विट्जरलैंड, नॉर्डिक देशों, थाईलैंड और अमेरिका महाद्वीप के बाजारों तक करने की तैयारी में है. यह विस्तार कंपनी की अगली विकास रणनीति का हिस्सा होगा.
AI और डेस्टिनेशन मैनेजमेंट का होगा मेल
कंपनी के अनुसार, इस एकीकरण से VOYAGE 1 की स्थानीय विशेषज्ञता और डेस्टिनेशन मैनेजमेंट क्षमताओं को Tourism Futures.AI के AI-संचालित डेस्टिनेशन मार्केटिंग और ग्राहक अधिग्रहण प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ा जाएगा. इसका उद्देश्य ट्रैवल एजेंट्स को व्यक्तिगत सिफारिशें, बेहतर ग्राहक अधिग्रहण, परिचालन दक्षता और नए व्यावसायिक अवसर उपलब्ध कराना है.
नवीन कुंडू ने कहा कि डेस्टिनेशन मैनेजमेंट का पारंपरिक मॉडल अब बड़े बदलाव के लिए तैयार है. उन्होंने कहा कि VOYAGE 1 के मजबूत ऑपरेशनल नेटवर्क को Tourism Futures.AI की इंटेलिजेंट ऑटोमेशन तकनीक के साथ जोड़कर दुनिया का पहला वास्तविक स्मार्ट DMC नेटवर्क तैयार किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि यह नेटवर्क केवल यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डेटा आधारित विश्लेषण के जरिए बाजार की मांग का पहले से अनुमान लगाएगा, B2B डिस्ट्रीब्यूशन पार्टनर्स को ग्राहक बढ़ाने में मदद करेगा और विभिन्न महाद्वीपों में बेहतर यात्रा अनुभव उपलब्ध कराएगा.
35 वर्षों का अनुभव
नवीन कुंडू के पास ट्रैवल, टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी, कॉर्पोरेट ट्रैवल, डेस्टिनेशन मैनेजमेंट और MICE (मीटिंग्स, इंसेंटिव्स, कॉन्फ्रेंस और एग्जीबिशन) सेक्टर में 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है. हालांकि, दोनों कंपनियों के बीच हुई इस डील की वित्तीय शर्तों का खुलासा नहीं किया गया है.
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85% आयात करता है. ऐसे में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरे और युद्ध जैसी परिस्थितियों को देखते हुए रणनीतिक तेल भंडार की अहमियत और बढ़ गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की सप्लाई पर बढ़ते जोखिमों के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करने की तैयारी में है. सरकारी तेल कंपनी ONGC ने मंगलुरु में 17.5 लाख टन क्षमता का नया स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) बनाने की योजना बनाई है. इस भंडार का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संकट या सप्लाई बाधित होने की स्थिति में देश में तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करना है.
वैश्विक संकट से निपटने की तैयारी
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85% आयात करता है. ऐसे में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरे और युद्ध जैसी परिस्थितियों को देखते हुए रणनीतिक तेल भंडार की अहमियत और बढ़ गई है. हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़ी अनिश्चितताओं ने भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई थीं.
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ONGC ने दक्षिण भारत के मंगलुरु में 17.5 लाख टन क्षमता वाला नया राष्ट्रीय रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व विकसित करने का फैसला किया है. कंपनी ने इसकी जानकारी शेयर बाजारों को भेजी गई रेगुलेटरी फाइलिंग में दी है.
क्या होता है स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व?
स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) वह विशेष भंडार होता है, जहां बड़ी मात्रा में कच्चा तेल सुरक्षित रखा जाता है. यदि युद्ध, प्राकृतिक आपदा या अंतरराष्ट्रीय संकट के कारण विदेशों से तेल की सप्लाई प्रभावित हो जाए, तो इसी रिजर्व से देश की जरूरतें पूरी की जाती हैं. इससे पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन की उपलब्धता बनी रहती है और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर नहीं पड़ता.
कमर्शियल इस्तेमाल के लिए सरकार से मांगेगी मंजूरी
ONGC ने कहा है कि इस रणनीतिक भंडार के एक हिस्से का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए वह केंद्र सरकार से अनुमति मांगेगी. फिलहाल सरकार दक्षिण भारत के मंगलुरु, पादुर और विशाखापट्टनम स्थित रणनीतिक तेल भंडारों के कुछ हिस्से के कमर्शियल उपयोग की अनुमति देती है. इन तीनों स्थानों पर कुल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल संग्रहित किया जा सकता है. इनका संचालन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) करती है.
UAE और जापान के साथ बढ़ रहा सहयोग
भारत अपने रणनीतिक तेल भंडार को मजबूत करने के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और जापान जैसे देशों के साथ भी सहयोग बढ़ा रहा है. मंगलुरु स्थित ONGC की सहयोगी कंपनी मंगलुरु रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) की 3 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली रिफाइनरी में पहले से 15 लाख टन का स्टोरेज मौजूद है. इसका आधा हिस्सा MRPL और आधा हिस्सा UAE की सरकारी तेल कंपनी ADNOC के पास लीज पर है.
इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की UAE यात्रा के दौरान ADNOC ने भारत में अपने कच्चे तेल के भंडारण को बढ़ाकर 3 करोड़ बैरल करने की घोषणा की थी. साथ ही फुजैराह में भारत के लिए अतिरिक्त रणनीतिक स्टोरेज विकसित करने की संभावनाओं पर भी काम चल रहा है.
ओडिशा और पादुर में भी बढ़ेगी भंडारण क्षमता
सरकार केवल मंगलुरु तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है.
1. ओडिशा के चंडीखोल में 40 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाला नया रणनीतिक तेल भंडार बनाया जाएगा.
2. कर्नाटक के पादुर में 25 लाख मीट्रिक टन क्षमता की अतिरिक्त स्टोरेज सुविधा विकसित की जाएगी.
भारत की ऊर्जा सुरक्षा होगी और मजबूत
ONGC का यह प्रोजेक्ट भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई मजबूती देगा. भविष्य में यदि वैश्विक बाजार में युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव या सप्लाई चेन बाधित होती है, तो रणनीतिक तेल भंडार देश में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने और आर्थिक गतिविधियों को बिना रुकावट जारी रखने में अहम भूमिका निभाएगा.
CRISIL की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021 से 2026 के बीच देश के प्रमुख टियर-2 शहरों में आवासीय मांग 14% की सालाना दर से बढ़ी, जबकि लखनऊ, नागपुर और कोयंबटूर जैसे शहरों में यह वृद्धि करीब 20% रही.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का रियल एस्टेट बाजार अब केवल दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों तक सीमित नहीं रहा. बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, तेज शहरीकरण और बढ़ते रोजगार के अवसरों के चलते टियर-2 शहर निवेश और हाउसिंग डिमांड के नए केंद्र बनकर उभर रहे हैं. क्रिसिल (CRISIL) की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021 से 2026 के बीच देश के प्रमुख टियर-2 शहरों में आवासीय मांग 14% की सालाना दर से बढ़ी, जबकि लखनऊ, नागपुर और कोयंबटूर जैसे शहरों में यह वृद्धि करीब 20% रही.
टियर-2 शहरों की ओर बढ़ रहा है खरीदारों का रुझान
क्रिसिल की 'हाउसिंग हॉटस्पॉट्स' रिपोर्ट के अनुसार, देश के 10 प्रमुख टियर-2 शहर अब रियल एस्टेट सेक्टर के नए ग्रोथ सेंटर बन रहे हैं. इन शहरों में बेहतर कनेक्टिविटी, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने आवासीय बाजार को नई गति दी है. यही वजह है कि अब घर खरीदारों और निवेशकों की दिलचस्पी पारंपरिक महानगरों से हटकर इन शहरों की ओर बढ़ रही है.
बड़े और प्रीमियम घरों की बढ़ी मांग
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में कुल आवासीय आपूर्ति में 2BHK और 3BHK घरों की हिस्सेदारी 75% से अधिक रही. वहीं, प्रीमियम सेगमेंट में बड़े आकार के घरों की मांग लगातार बढ़ी है. इससे साफ है कि खरीदार अब बेहतर सुविधाओं और अधिक खुले रहने के स्थान को प्राथमिकता दे रहे हैं.
₹2 करोड़ से अधिक के घरों की बढ़ी हिस्सेदारी
इंदौर, लखनऊ और सूरत जैसे शहर अब प्रीमियम हाउसिंग मार्केट के रूप में तेजी से उभर रहे हैं. इन शहरों में सक्रिय आवासीय आपूर्ति का 20% से अधिक हिस्सा 2 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत वाले घरों का है. रिपोर्ट के अनुसार, आईटी सेक्टर के विस्तार और उद्यमियों की बढ़ती आय ने इस ट्रेंड को मजबूती दी है.
इंफ्रास्ट्रक्चर और कॉर्पोरेट विस्तार से मिल रही रफ्तार
विशेषज्ञों के मुताबिक, नए एक्सप्रेसवे, क्षेत्रीय एयरपोर्ट, बेहतर सड़क नेटवर्क और मेट्रो परियोजनाओं ने टियर-2 शहरों को बड़े आर्थिक केंद्रों से जोड़ दिया है. वहीं, वर्क-फ्रॉम-होम और वर्कफोर्स के विकेंद्रीकरण के चलते कई कंपनियां इन शहरों में सैटेलाइट ऑफिस खोल रही हैं, जिससे स्थानीय रोजगार और हाउसिंग की मांग दोनों बढ़ रही हैं.
लग्जरी हाउसिंग का बढ़ रहा बाजार
पहले जहां टियर-2 शहरों का रियल एस्टेट स्थानीय डेवलपर्स तक सीमित था, वहीं अब यहां राष्ट्रीय स्तर की रियल एस्टेट कंपनियां भी तेजी से निवेश कर रही हैं. गेटेड कम्युनिटी, स्मार्ट होम, हरित क्षेत्र और प्रीमियम सुविधाओं वाले प्रोजेक्ट्स की मांग लगातार बढ़ रही है. लखनऊ और कोयंबटूर जैसे शहरों में खरीदार अब महानगरों जैसी लाइफस्टाइल की उम्मीद कर रहे हैं.
स्मार्ट सिटीज मिशन से मिली नई दिशा
स्मार्ट सिटीज मिशन ने भी इन शहरों के विकास में अहम भूमिका निभाई है. इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC), बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट, जल आपूर्ति और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी सुविधाओं ने शहरों की कार्यक्षमता में सुधार किया है. इससे इन शहरों में निवेश और रियल एस्टेट विकास की संभावनाएं और मजबूत हुई हैं.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
हीरो रियल्टी के सीईओ रोहित किशोर के अनुसार, भारत के शहरी विकास का अगला चरण टियर-2 शहरों से संचालित होगा. उनका कहना है कि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ इन शहरों में लोगों की आकांक्षाएं और प्रीमियम जीवनशैली की मांग तेजी से बढ़ रही है. खासकर लखनऊ जैसे शहर दीर्घकालिक रियल एस्टेट विकास के लिए पूरी तरह तैयार दिखाई देते हैं.
मेट्रो, एक्सप्रेसवे और एयरपोर्ट विस्तार जैसी परियोजनाएं निश्चित रूप से शहर की विकास क्षमता को मजबूत कर रही हैं, लेकिन इससे भी बड़ा बदलाव यहां के लोगों की बढ़ती आकांक्षाओं और आत्मविश्वास में दिखाई देता है. आज के खरीदार सोच-समझकर डिजाइन किए गए घर, बेहतर सुविधाएं और ऐसे समुदाय चाहते हैं, जहां अपनापन महसूस हो. आवास की मांग लगातार आपूर्ति से अधिक बनी हुई है और शहर का आर्थिक एवं सामाजिक ढांचा लगातार मजबूत हो रहा है. हमारा मानना है कि लखनऊ दीर्घकालिक विकास के लिए पूरी तरह तैयार है और यहां ऐसे समुदाय विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं, जिन पर लोग गर्व कर सकें.
देविका ग्रुप के डायरेक्टर अंकित अग्रवाल ने कहा भारत के टियर-2 शहर आज रियल एस्टेट की नई ग्रोथ स्टोरी लिख रहे हैं और वृंदावन इसका सबसे जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है. अब लोग यहां सिर्फ दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए नहीं, बल्कि स्थायी आवास और सुरक्षित लॉन्ग-टर्म निवेश के लिए भी आ रहे हैं. 'स्पिरिचुअल होमकमिंग' की बढ़ती भावना के बीच आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, विश्वस्तरीय रिहायशी परियोजनाएं, गेटेड कम्युनिटी, वेलनेस सुविधाएं और बेहतर लाइफस्टाइल वृंदावन को होमबायर्स और निवेशकों के लिए तेजी से पसंदीदा गंतव्य बना रही हैं.
सांघवी रियल्टी के प्रबंध निदेशक पक्षल सांघवी ने कहा भारत के रियल एस्टेट सेक्टर की अगली बड़ी ग्रोथ टियर-2 शहरों से आएगी. लखनऊ, नागपुर और कोयंबटूर जैसे शहर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजगार के बढ़ते अवसर, किफायती आवास और उच्च गुणवत्ता वाली जीवनशैली के कारण तेजी से उभर रहे हैं. सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी पर बढ़ता निवेश इस बदलाव को और गति दे रहा है. आने वाले वर्षों में टियर-1 शहर प्रीमियम हाउसिंग के केंद्र बने रहेंगे, जबकि टियर-2 शहर पहली बार घर खरीदने वालों, एंड-यूजर्स और बेहतर रिटर्न की तलाश करने वाले दीर्घकालिक निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक बाजार साबित होंगे.
अरीटे ग्रुप के वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग) वीरेंद्र कुमार का कहना है कि टियर-2 शहरों की ग्रोथ अब केवल किफायती आवास तक सीमित नहीं है, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित विकास और सर्विस सेक्टर में बढ़ते रोजगार से संचालित हो रही है. बेहतर कनेक्टिविटी, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और बढ़ती आर्थिक गतिविधियां ऐसे शहरी इकोसिस्टम तैयार कर रही हैं, जो आवासीय मांग को लगातार मजबूत बना रहे हैं. दक्षिण गुजरात का वापी इसका बेहतरीन उदाहरण है. दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर पर इसकी रणनीतिक स्थिति, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम, मुंबई और सूरत से सहज कनेक्टिविटी तथा तेजी से विकसित हो रहा सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर इसे कारोबार और घर खरीदारों, दोनों के लिए आकर्षक बना रहा है. साथ ही खरीदारों की पसंद भी बदल रही है. बड़े घरों, इंटीग्रेटेड टाउनशिप और प्रीमियम लाइफस्टाइल प्रोजेक्ट्स की मांग लगातार बढ़ रही है. बढ़ती आय और रोजगार के नए अवसरों के साथ वापी अब अपनी औद्योगिक पहचान से आगे बढ़कर गुजरात के सबसे संभावनाशील प्रीमियम और लग्जरी रेजिडेंशियल बाजारों में शामिल हो रहा है.
प्रॉपर्टीपिस्टल के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक आशीष नारायण अग्रवाल कहते हैं, भारत के रियल एस्टेट सेक्टर की अगली सफलता की कहानी सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि टियर-2 शहर इसकी अगुवाई करेंगे. वित्त वर्ष 2021 से 2026 के बीच इन शहरों में आवासीय मांग 14% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ी है, जबकि नागपुर, कोयंबटूर और लखनऊ जैसे शहरों में यह वृद्धि लगभग 20% रही. यह केवल अस्थायी उछाल नहीं, बल्कि बाजार में हो रहे संरचनात्मक बदलाव का संकेत है. इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, एयरपोर्ट और सर्विस सेक्टर के विस्तार से टियर-2 शहर आत्मनिर्भर शहरी इकोसिस्टम के रूप में विकसित हो रहे हैं, जहां रोजगार, बेहतर सामाजिक सुविधाएं और उच्च गुणवत्ता वाली जीवनशैली उपलब्ध है. वहीं उपभोक्ताओं की आकांक्षाएं भी तेजी से बदल रही हैं. नई आवासीय सप्लाई का 75% से अधिक हिस्सा 2 और 3 BHK घरों का है, लेकिन बड़े, प्रीमियम और लग्जरी घरों की मांग लगातार बढ़ रही है. आने वाला दशक उन्हीं शहरों का होगा, जो आर्थिक अवसरों और बेहतर जीवनशैली का संतुलित मेल पेश करेंगे, और इस बदलाव का नेतृत्व करने के लिए टियर-2 भारत पूरी तरह तैयार है.
विशेषज्ञों का मानना है कि जहां टियर-1 शहरों का रियल एस्टेट बाजार धीरे-धीरे परिपक्व हो रहा है, वहीं टियर-2 शहर अभी विकास के शुरुआती चरण में हैं. बेहतर रिटर्न की संभावना, बढ़ती आबादी, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार के नए अवसर इन्हें भविष्य के सबसे आकर्षक रियल एस्टेट बाजारों में शामिल कर रहे हैं.
कंपनी के मुताबिक, कुल मांग का 65% हिस्सा टियर-2 और उससे छोटे शहरों से आया, जबकि 25% ऑर्डर Flipkart Minutes के जरिए पूरे किए गए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में हेल्दी, प्रीमियम और मॉडर्न फूड प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग का सबसे बड़ा फायदा फ्लिपकार्ट (Flipkart) को मिला है. कंपनी के अनुसार, उसकी फूड एंड न्यूट्रिशन कैटेगरी में सालाना आधार पर 50% की वृद्धि दर्ज की गई है. इस ग्रोथ में Gen Z उपभोक्ताओं, टियर-2 और उससे छोटे शहरों की बढ़ती हिस्सेदारी तथा क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म Flipkart Minutes की अहम भूमिका रही है.
हेल्दी और प्रीमियम फूड की ओर बढ़ रहा है ग्राहकों का रुझान
फ्लिपकार्ट ने बताया कि उसके फूड एंड न्यूट्रिशन कारोबार में सालाना आधार पर 50% की वृद्धि हुई है. इस तेजी में धुलिया, इंफाल, धारवाड़, उज्जैन, हुबली, मीरगंज और लहरपुर जैसे टियर-2 और छोटे शहरों के ग्राहकों का बड़ा योगदान रहा. कंपनी के मुताबिक, कुल मांग का 65% हिस्सा टियर-2 और उससे छोटे शहरों से आया, जबकि 25% ऑर्डर Flipkart Minutes के जरिए पूरे किए गए.
Gen Z बना सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन
रिपोर्ट के अनुसार, इस कैटेगरी की कुल सालाना वृद्धि में लगभग 60% योगदान Gen Z उपभोक्ताओं का रहा. सोशल मीडिया, फूड क्रिएटर्स और वेलनेस ट्रेंड्स से प्रभावित युवा प्रोटीन ओट्स, हाई-प्रोटीन पीनट बटर, प्रोटीन म्यूसली, गॉरमे चॉकलेट और कोरियन फ्लेवर वाले स्नैक्स जैसे प्रोडक्ट्स तेजी से खरीद रहे हैं. इन प्रोडक्ट्स की मांग खासकर बेंगलुरु और नई दिल्ली जैसे बड़े शहरों में अधिक देखी गई.
महिलाओं और पुरुषों की खरीदारी में भी बदला ट्रेंड
कंपनी के मुताबिक, पुरुष ग्राहकों में नट्स, ड्राई फ्रूट्स, चॉकलेट और जैम-एंड-स्प्रेड्स की मांग बढ़ी है. वहीं महिला ग्राहक वैल्यू-एडेड चाय, कॉफी और खाने योग्य बीज (Edible Seeds) को प्राथमिकता दे रही हैं. इससे फंक्शनल न्यूट्रिशन और प्रीमियम स्नैकिंग सेगमेंट को बढ़ावा मिला है.
छोटे शहरों में बढ़ी वेलनेस प्रोडक्ट्स की मांग
फ्लिपकार्ट के अनुसार, टियर-2 और टियर-3 शहरों के ग्राहक अब कोल्ड-प्रेस्ड ऑयल, ऑलिव ऑयल, प्रोटीन ओट्स, प्रोटीन म्यूसली, प्रीमियम ड्राई फ्रूट्स, ऑथेंटिक घी और खजूर (Dates) जैसे हेल्दी प्रोडक्ट्स तेजी से खरीद रहे हैं. पिछले एक साल में इन प्रोडक्ट्स की ऑनलाइन सर्च करीब 80% बढ़ी है, जो छोटे शहरों में बदलती लाइफस्टाइल और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता को दर्शाती है.
Flipkart Minutes की बढ़ती भूमिका
कंपनी ने बताया कि उसकी क्विक कॉमर्स सेवा Flipkart Minutes अब फूड एंड न्यूट्रिशन कैटेगरी की कुल मांग का 25% पूरा कर रही है. इससे स्पष्ट है कि उपभोक्ता अब तेजी से डिलीवरी और सुविधा को भी प्राथमिकता दे रहे हैं.
फूड फेस्ट 3.0 में दिखी फूड कॉमर्स की नई तस्वीर
फ्लिपकार्ट ने अपने तीसरे Food Fest का भी आयोजन किया, जिसमें 50 से अधिक प्रमुख फूड एवं बेवरेज ब्रांड, 1,000 से ज्यादा क्रिएटर्स और कई सेलिब्रिटी शेफ व कलाकार शामिल हुए. इस दो दिवसीय कार्यक्रम में 10 से अधिक नए प्रोडक्ट लॉन्च किए गए और चोकोलैंड, ब्रेकफास्ट, बेवरेज तथा किचन स्टेपल्स जैसे थीम आधारित अनुभव तैयार किए गए.
फ्लिपकार्ट के वाइस प्रेसिडेंट (कंज्यूमेबल्स) निशांत दलाल ने कहा कि भारत में भोजन अब केवल जरूरत नहीं, बल्कि वेलनेस, पहचान और नई चीजों को आजमाने का माध्यम बनता जा रहा है. उनके अनुसार, डिजिटल कॉमर्स ने देशभर के उपभोक्ताओं तक बेहतर और आधुनिक फूड विकल्प पहुंचाना आसान बना दिया है, जबकि छोटे-बड़े ब्रांडों को भी तेजी से बढ़ने का अवसर मिल रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक संगठित फूड सर्विसेज सेक्टर की सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) 17-18% रहने का अनुमान है. वहीं असंगठित बाजार की ग्रोथ केवल 3-4% रहने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का फूड सर्विसेज बाजार अगले पांच वर्षों में तेज रफ्तार से बढ़ने की ओर है. रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स (Redseer Strategy Consultants) की एक रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती सुविधा-आधारित खपत, संगठित रेस्तरां चेन की लोकप्रियता और ऑनलाइन फूड डिलीवरी के विस्तार के दम पर यह बाजार 2025 के करीब 90 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 150 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है.
संगठित फूड सर्विसेज सेक्टर की होगी तेज बढ़ोतरी
रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक संगठित (Organised) फूड सर्विसेज सेक्टर की सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) 17-18% रहने का अनुमान है. वहीं असंगठित (Unorganised) बाजार की ग्रोथ केवल 3-4% रहने की उम्मीद है.
संगठित कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी 2025 में 45-50% से बढ़कर 2030 तक 60-70% हो सकती है. यह दर्शाता है कि उपभोक्ताओं का रुझान तेजी से ब्रांडेड रेस्तरां और फूड सर्विस चेन की ओर बढ़ रहा है.
ऑनलाइन फूड डिलीवरी बनेगी सबसे बड़ा ग्रोथ ड्राइवर
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑनलाइन फूड डिलीवरी उद्योग की सबसे बड़ी ग्रोथ इंजन बनी रहेगी. वित्त वर्ष 2026 में कुल फूड सर्विसेज बाजार में ऑनलाइन डिलीवरी की हिस्सेदारी 11% रहने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2031 तक बढ़कर 18% हो सकती है. इस वृद्धि के पीछे डिजिटल अपनाने की बढ़ती दर और टियर-2 तथा छोटे शहरों से बढ़ती मांग प्रमुख वजह है.
छोटे शहरों में तेजी से बढ़ा ऑनलाइन ऑर्डर
रेडसीर के अनुसार, वित्त वर्ष 2021 के बाद से टियर-2 और छोटे शहरों में फूड डिलीवरी ट्रांजैक्शन लगभग तीन गुना बढ़ चुके हैं. वहीं हर महीने ऑनलाइन फूड ऑर्डर करने वाले सक्रिय उपभोक्ताओं की संख्या करीब 1 करोड़ से बढ़कर लगभग 3 करोड़ हो गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, नई पीढ़ी के फूड ब्रांड अपनी करीब 90% आय ऑनलाइन माध्यम से हासिल कर रहे हैं, जबकि पारंपरिक रेस्तरां चेन के लिए यह आंकड़ा लगभग 50% है. इससे डिजिटल-फर्स्ट बिजनेस मॉडल की बढ़ती अहमियत साफ होती है.
क्लाउड किचन और प्रीमियम ब्रांड्स से मिलेगी रफ्तार
रिपोर्ट में कहा गया है कि तेज वृद्धि के बावजूद भारत का संगठित फूड सर्विसेज उद्योग अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है. देश में 1,000 से अधिक संगठित फूड सर्विस कंपनियां हैं, लेकिन इनमें से केवल लगभग 2% कंपनियों का सालाना राजस्व 500 करोड़ रुपये से अधिक है. इससे संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में विस्तार की बड़ी संभावनाएं अभी भी मौजूद हैं.
रेडसीर के अनुसार, क्लाउड किचन मॉडल, सीमित लेकिन फोकस्ड मेन्यू और प्रीमियम ब्रांड पोजिशनिंग कंपनियों की लाभप्रदता बढ़ाने और कारोबार का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
स्नैक्स, डेजर्ट और बेवरेज सेगमेंट में सबसे ज्यादा अवसर
रिपोर्ट में स्नैक्स, डेजर्ट और पेय पदार्थ (बेवरेज) को सबसे तेजी से बढ़ने वाले सेगमेंट बताया गया है. खासतौर पर प्रीमियम चाय और कॉफी चेन के व्यापक बाजार से बेहतर प्रदर्शन करने की संभावना जताई गई है. इसकी वजह बेहतर मार्जिन और स्टोर स्तर पर मजबूत ग्रोथ मानी गई है.
नई कंपनी में Dixon Technologies की 51% हिस्सेदारी होगी, जबकि Vivo Mobile India के पास 49% हिस्सेदारी रहेगी. बहुमत हिस्सेदारी होने के कारण नई इकाई का नियंत्रण Dixon के पास रहेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी Dixon Technologies और चीन की स्मार्टफोन कंपनी Vivo की भारतीय इकाई Vivo Mobile India के संयुक्त उद्यम (JV) को केंद्र सरकार से मंजूरी मिल गई है. इस मंजूरी के साथ दोनों कंपनियां भारत में स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग को नई रफ्तार देंगी. JV में Dixon की 51% और Vivo Mobile India की 49% हिस्सेदारी होगी. इस खबर के बाद निवेशकों का उत्साह भी बढ़ा और Dixon Technologies के शेयर में तेजी भी देखने को मिली है.
दिसंबर 2024 में हुआ था समझौता
Dixon Technologies ने शेयर बाजार को दी गई जानकारी में बताया कि Vivo Mobile India के साथ प्रस्तावित जॉइंट वेंचर को सरकार की मंजूरी मिल गई है. दोनों कंपनियों ने इस साझेदारी के लिए दिसंबर 2024 में समझौता किया था. अब नियामकीय मंजूरी मिलने के बाद संयुक्त उद्यम औपचारिक रूप से आगे बढ़ सकेगा.
Dixon के पास रहेगा कंट्रोल
नई कंपनी में Dixon Technologies की 51% हिस्सेदारी होगी, जबकि Vivo Mobile India के पास 49% हिस्सेदारी रहेगी. बहुमत हिस्सेदारी होने के कारण नई इकाई का नियंत्रण Dixon के पास रहेगा. यह जॉइंट वेंचर केवल Vivo के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य में अन्य स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांड्स के लिए भी मैन्युफैक्चरिंग सेवाएं उपलब्ध करा सकेगा.
सरकार की मंजूरी क्यों थी जरूरी?
Vivo चीन की मूल कंपनी से जुड़ा ब्रांड है. भारत में चीन सहित पड़ोसी देशों से आने वाले निवेश पर लागू प्रेस नोट-3 के तहत ऐसे निवेश या संयुक्त उद्यम के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी अनिवार्य होती है. इसी प्रावधान के तहत इस JV को भी स्वीकृति दी गई है.
सरकार ने मार्च 2026 में प्रेस नोट-3 के कुछ प्रावधानों में राहत दी थी. नए नियमों के अनुसार कुछ मामलों में 10% तक की गैर-नियंत्रण (Non-controlling) हिस्सेदारी के लिए मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती. हालांकि, नियंत्रण वाले संयुक्त उद्यमों के लिए सरकारी अनुमति अब भी अनिवार्य है.
Dixon को मिलेगा बड़ा कारोबारी फायदा
कंपनी का मानना है कि इस साझेदारी से उसकी स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी. साथ ही एंड्रॉयड स्मार्टफोन सेगमेंट में उसकी मौजूदगी और मजबूत होगी. JV के जरिए कंपनी को नए ऑर्डर मिलने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और कारोबार का विस्तार करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत अब केवल कम लागत वाले सेवा केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रिसर्च और बौद्धिक संपदा (IP) के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) हब बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा विजन पेश किया है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2030 तक देश में 5,000 GCC स्थापित करने का लक्ष्य रखा और इसे पूरी तरह हासिल किया जा सकने वाला बताया. उन्होंने कहा कि भारत अब केवल कम लागत वाले सेवा केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रिसर्च और बौद्धिक संपदा (IP) के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है.
वैल्यू चेन में आगे बढ़ने का दिया संदेश
'CII GCC Business Summit 2026' को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि GCCs को अब केवल बैक-ऑफिस सेवाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें वैल्यू चेन में ऊपर बढ़ते हुए बौद्धिक संपदा (IP) विकसित करने, रिसर्च एवं डेवलपमेंट (R&D) में नेतृत्व करने, AI आधारित समाधान तैयार करने, उत्पाद डिजाइन का स्वामित्व लेने और वैश्विक नवाचार को गति देने पर ध्यान देना होगा.
2030 तक 5,000 GCC का लक्ष्य
निर्मला सीतारमण ने कहा कि 2030 तक भारत में 5,000 GCC स्थापित करने का लक्ष्य यथार्थवादी और पूरी तरह हासिल किया जा सकने वाला है. उन्होंने बताया कि Fortune Global 2000 की करीब दो-तिहाई कंपनियों ने अभी तक भारत में अपना GCC स्थापित नहीं किया है, जिससे भविष्य में निवेश और विस्तार की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं.
भारत में 2,100 से ज्यादा GCC, 23 लाख लोगों को रोजगार
वित्त मंत्री के मुताबिक, वर्तमान में भारत में 2,100 से अधिक GCC संचालित हो रहे हैं, जहां करीब 23 लाख पेशेवर कार्यरत हैं. इन केंद्रों से हर साल लगभग 100 अरब डॉलर का राजस्व प्राप्त होता है. उन्होंने बताया कि Forbes Global 2000 की 500 से अधिक कंपनियां भारत में GCC स्थापित कर चुकी हैं और दुनिया के आधे से अधिक GCC अब भारत में मौजूद हैं.
अब हर दिन खुल रहा नया GCC
सीतारमण ने कहा कि भारत में GCC विस्तार की रफ्तार लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2024 में जहां हर सप्ताह एक नया GCC स्थापित हो रहा था, वहीं अब औसतन हर दिन एक नया केंद्र शुरू हो रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि नए स्थापित होने वाले आधे से अधिक GCC 'AI-First' मॉडल पर आधारित हैं.
AI से बढ़ेगा अवसर, लेकिन चुनौतियां भी रहेंगी
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उन GCC के लिए चुनौती बन सकता है, जो कम लागत वाले और बार-बार दोहराए जाने वाले कार्यों पर निर्भर हैं. उन्होंने कहा कि भारत को AI को केवल तकनीक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक अवसर के रूप में अपनाना होगा ताकि वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी बढ़त बनाए रख सके.
टियर-2 शहर बनेंगे अगला ग्रोथ इंजन
वित्त मंत्री ने कहा कि GCC का अगला विस्तार केवल बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम जैसे बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगा. वाराणसी, चंडीगढ़, विशाखापत्तनम, तिरुचिरापल्ली और मैसूरु जैसे उभरते शहर भी भविष्य के इनोवेशन हब बन सकते हैं. उन्होंने बताया कि कम से कम 10 राज्यों ने GCC नीति लागू की है या उस पर काम कर रहे हैं.
'लो-कॉस्ट' से 'हाई-कैपेबिलिटी' तक भारत की पहचान
सीतारमण ने कहा कि भारत की पहचान अब केवल कम लागत पर सेवाएं देने वाले देश की नहीं रही. देश तेजी से उच्च क्षमता, नवाचार, AI, पेटेंट, एल्गोरिद्म, प्लेटफॉर्म और वैश्विक उत्पाद विकास के केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है. आने वाले दशक में भारत की सफलता GCC की संख्या से नहीं, बल्कि यहां से विकसित होने वाले वैश्विक विचारों और तकनीकों से तय होगी.
पहली तिमाही में TCS के AI कारोबार ने मजबूत वृद्धि दर्ज की. कंपनी ने बताया कि AI से होने वाला राजस्व बढ़कर 2.6 अरब डॉलर पहुंच गया, जो पिछली तिमाही की तुलना में 13.6% अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की सबसे बड़ी आईटी सेवा कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन किया है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित कारोबार और बड़े डील्स के दम पर कंपनी की आय और मुनाफा दोनों में बढ़ोतरी दर्ज हुई. तिमाही के दौरान कंपनी का शुद्ध लाभ 4.6% बढ़कर ₹13,349 करोड़ रहा, जबकि राजस्व 13.9% बढ़कर ₹72,275 करोड़ पहुंच गया. कंपनी का प्रदर्शन राजस्व के मामले में बाजार के अनुमानों से बेहतर रहा.
AI कारोबार ने बढ़ाई रफ्तार
पहली तिमाही में TCS के AI कारोबार ने मजबूत वृद्धि दर्ज की. कंपनी ने बताया कि AI से होने वाला राजस्व बढ़कर 2.6 अरब डॉलर पहुंच गया, जो पिछली तिमाही की तुलना में 13.6% अधिक है. अब कंपनी के कुल राजस्व में AI कारोबार की हिस्सेदारी करीब 9% हो गई है.
आय और मुनाफे में मजबूत बढ़ोतरी
अप्रैल-जून तिमाही में TCS का शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 4.6% बढ़कर ₹13,349 करोड़ हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में ₹12,760 करोड़ था. वहीं, कंपनी का राजस्व 13.9% बढ़कर ₹72,275 करोड़ पहुंच गया, जबकि एक साल पहले यह ₹63,437 करोड़ था. तिमाही-दर-तिमाही आधार पर कंपनी की आय में 2.2% की वृद्धि हुई, जबकि स्थिर मुद्रा (Constant Currency) के आधार पर 0.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
राजस्व में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन
राजस्व के मामले में TCS ने बाजार के अनुमानों को पीछे छोड़ दिया. ब्लूमबर्ग ने कंपनी के लिए ₹71,862 करोड़ के राजस्व और ₹13,394 करोड़ के शुद्ध लाभ का अनुमान लगाया था. हालांकि मुनाफा अनुमान से थोड़ा कम रहा, लेकिन आय में कंपनी का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा.
AI से जुड़े कई बड़े सौदे मिले
तिमाही के दौरान TCS ने AI आधारित कई बड़े कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए. इनमें SKF के साथ 80 करोड़ डॉलर का बड़ा सौदा और ServiceNow के साथ मल्टी-मिलियन डॉलर का करार शामिल है. कंपनी के अनुसार, पिछले पांच तिमाहियों में उसने AI क्षेत्र में छह बड़े रणनीतिक सौदों पर हस्ताक्षर किए हैं.
ऑर्डर बुक मजबूत बनी रही
पहली तिमाही में कंपनी की कुल ऑर्डर बुक (TCV) 9.5 अरब डॉलर रही, जो पिछले साल की समान अवधि के 9.4 अरब डॉलर से अधिक है. हालांकि यह पिछली तिमाही के 12 अरब डॉलर के मुकाबले कम रही. कुल TCV में उत्तरी अमेरिका का योगदान 4.7 अरब डॉलर, BFSI सेक्टर का 2.5 अरब डॉलर और कंज्यूमर बिजनेस का 1.4 अरब डॉलर रहा.
दूसरी तिमाही को लेकर जताया भरोसा
TCS के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और प्रबंध निदेशक के. कृत्तिवासन ने कहा कि भू-राजनीतिक और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बावजूद कंपनी ने पहली तिमाही में लगातार वृद्धि बनाए रखी है. उन्होंने उम्मीद जताई कि दूसरी तिमाही में मांग में सुधार देखने को मिलेगा और कंपनी आगे भी सकारात्मक प्रदर्शन जारी रखेगी.
भारतीय कारोबार में तेज वृद्धि
घरेलू बाजार में भी TCS का प्रदर्शन मजबूत रहा. कंपनी के भारतीय कारोबार में सालाना आधार पर 22.9% और पिछली तिमाही की तुलना में 7.6% की वृद्धि दर्ज की गई, जो भारत में डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और आईटी सेवाओं की मजबूत मांग को दर्शाता है.