दुनिया के सबसे रईस व्यक्ति और टेस्ला के सीईओ एलन मस्क को सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर को खरीदने के लिए काफी कम समय बचा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
नई दिल्लीः दुनिया के सबसे रईस व्यक्ति और टेस्ला के सीईओ एलन मस्क को सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर को खरीदने के लिए काफी कम समय बचा है. अगर वो इस डील को तय समय तक पूरा नहीं करते हैं तो फिर डेलावेयर स्थित कोर्ट में ट्विटर की तरफ दाखिल मुकदमें का सामना करना पड़ेगा. एलन मस्क के पास सूत्रों के अनुसार केवल 28 अक्टूबर तक का समय है जब वो इस 44 अरब डॉलर की डील को पूरा कर सकें.
3 अक्टूबर को की थी ये घोषणा
3 अक्टूबर को, मस्क ने डेलावेयर चांसरी कोर्ट में 17 अक्टूबर की लड़ाई से बचने के उद्देश्य से कंपनी को मूल कीमत पर खरीदने के लिए औपचारिक रूप से सार्वजनिक दबाव में कंपनी को फिर से खरीदने की पेशकश की थी. ट्विटर के शेयर में तेजी आई, निवेशकों को होश आ गया कि ड्रामा लगभग खत्म हो गया है. लेकिन कंपनी के वकीलों ने मस्क के पत्र में शर्तों के बारे में संदेह किया, जिसमें यह शर्त भी शामिल है कि ट्विटर ने अपना मुकदमा छोड़ दिया, इसे "आगे शरारत का निमंत्रण" कहा.
अदालत में हारने की अटकलें ज्यादा
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर को खरीदने के लिए दिये गये अपने पुराने प्रस्ताव को उन्होंने फिर से जीवित किया है. वे 54.20 अमेरिकी डॉलर प्रति शेयर पर डील करने को राजी हो गए हैं. हालांकि, यह फैसला चौंकाने वाला नहीं है, क्योंकि इस मामले में उनके अदालत में हार जाने की अटकलें जोरों पर थीं.
जुलाई में रद्द के थी डील
जुलाई में डील कैंसिल करने के बाद से एलन मस्क लगातार अपने फैसले को सही साबित करने के लिए ट्विटर को कठघरे में खड़ा करते आए हैं. हाल ही में उन्होंने कहा था कि ट्विटर का एक पूर्व कर्मचारी जो व्हिसल ब्लोअर बन गया था, उसे कंपनी की तरफ से लाखों डॉलर का भुगतान किया. यह एक बड़ा कारण था, जिसके चलते उन्होंने ट्विटर को खरीदने की 44 अरब डॉलर की डील को रद्द कर दिया. मस्क के वकीलों ने इसे मर्जर एग्रीमेंट का उल्लंघन बताया था.
भारत कनेक्शन का जिक्र
इतना ही नहीं, एलन मस्क ने ट्विटर डील तोड़ने के पीछे भारत कनेक्शन का भी जिक्र किया था. उन्होंने कहा था कि ट्विटर ने भारत सरकार के खिलाफ जाकर दुनिया के तीसरे सबसे बड़े बाजार को खतरे में डाल दिया था. डील के समय कंपनी ने उन्हें भारत में चल रहे डेवलपमेंट के बारे में नहीं बताया था. हालांकि, ट्विटर का दावा है कि एलन मस्क को हर बात से अवगत कराया गया था.
ये तो नहीं वजह?
इतने आरोप लगाने के बाद अब आखिर ऐसा क्या हुआ कि एलन मस्क ट्विटर को फिर से अपना बनाना चाहते हैं? इसकी पहली वजह है कानूनी लड़ाई. दरअसल, ट्विटर ने मस्क के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है और माना जा रहा है कि ट्विटर का पक्ष मजबूत है. इसके अलावा, कानूनी जंग की टेंशन भी मस्क को अपना फैसला पलटने पर विवश कर रही है. जब से एलन मस्क ने डील रद्द की है, तब से उनकी कंपनी टेस्ला के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मस्क का फोकस टेस्ला से हटकर ट्विटर के साथ कानूनी लड़ाई पर चला गया है, जिसका खामियाजा कंपनी भुगत रही है. ऐसे में अगर कानूनी जंग लंबी खिंचती है तो मस्क को खासा नुकसान उठाना पड़ेगा. इसके अलावा, यदि कोर्ट का फैसला ट्विटर के पक्ष में आया, तो शर्मिंदगी के साथ बड़ा आर्थिक झटका भी लगेगा.
VIDEO: लैपटॉप के बदले ग्राहक को मिला डिटर्जेंट साबुन
एक पूर्णकालिक सदस्य ने निप्पॉन से जुड़े आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. दूसरे सदस्य अभी फैसला नहीं कर पाए हैं. बॉन्ड फिर से जीवित हो गए हैं. और सेबी चेयरमैन की डायरी बार-बार निप्पॉन से टकरा रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
सायोनारा, तर्क
सेबी (SEBI) के लिए यह साल जापानी रंग में रंगा रहा है. चेयरमैन ओसाका गए, जापान के कौंसुल जनरल सेबी आए और सेबी का आदेश जारी होने से पहले ही निप्पॉन का पैसा आ गया. यहां तक कि लेह में 11,500 फीट की ऊंचाई पर भी चेयरमैन ने निप्पॉन इंडिया की शाखा में जाने का समय निकाल लिया. यह शहर की एकमात्र म्यूचुअल फंड कंपनी की शाखा है.
निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट (NAM India) ने यस बैंक के AT-1 बॉन्ड मामले में समझौता करने के लिए सेबी को 96.76 करोड़ रुपये का भुगतान किया है. पैसा कागजी कार्रवाई से पहले पहुंच गया. इस भुगतान को उचित ठहराने वाला आदेश अभी तक पारित नहीं हुआ है. अन्य जगहों पर किसी सौदे पर हस्ताक्षर होने से पहले किए गए भुगतान को अग्रिम राशि कहा जाता है. सेबी में इसे सैद्धांतिक मंजूरी कहा जाता है.
इस आदेश के लिए दो पूर्णकालिक सदस्यों की जरूरत है. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, संदीप प्रधान इस पर हस्ताक्षर कर चुके हैं. केवीआर मूर्ति ने अभी हस्ताक्षर नहीं किए हैं. 15 अक्टूबर से यह फाइल आगे नहीं बढ़ी है. इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने उन बॉन्ड को फिर से जीवित कर दिया था, जिन्हें खत्म माना जा रहा था.
AT-1 बॉन्ड अब तक किसी टीवी धारावाहिक के खलनायक से भी ज्यादा बार खत्म होकर वापस आ चुके हैं. इस बार उनका फिर से जीवित होना सेबी के समझौते को भी अपने साथ ले डूब सकता है.
वह नुकसान, जो हुआ ही नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड को मार्च 2020 में राइट-डाउन करने के फैसले को रद्द कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह अवैध और अमान्य बताया.
सेबी का अगस्त 2024 का कारण बताओ नोटिस एक आंकड़े पर आधारित है. इसमें योजनाओं के AT-1 बॉन्ड निवेश का मूल्य शून्य माना गया और निवेशकों का नुकसान 1,828.70 करोड़ रुपये आंका गया. समझौता भी इसी आधार पर टिका है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 अप्रैल 2026 को सेबी के एक पत्र के जरिए भुगतान की गई राशि का करीब 93 फीसदी, यानी लगभग 89.74 करोड़ रुपये, उन निवेशकों को देने की बात कही गई थी, जिन्हें नुकसान हुआ था.
अब इन बॉन्ड की पूरी कीमत वापस मिल गई है. ब्याज के बकाया भुगतान को जोड़ने पर योजनाओं को करीब 2,900 करोड़ रुपये मिल सकते हैं. यह समझौते के तहत मिलने वाली राशि से लगभग 30 गुना अधिक है. और चूंकि निप्पॉन इंडिया ने 6 मार्च 2020 को इन बॉन्ड को साइड-पॉकेट में डाल दिया था, इसलिए इसकी वसूली उन सभी निवेशकों को मिलेगी, जिनके पास उस दिन यूनिट थीं. इसमें वे निवेशक भी शामिल हैं, जिन्होंने बाद में अपनी यूनिट बेच दी थीं.
इसलिए सवाल क्रिकेट स्कोरबोर्ड जितना छोटा है: आखिर किस नुकसान का समझौता किया जा रहा है?
सेबी जीते तो भी तर्क हारे
अगस्त 2025 में सेबी ने इसी मामले में अनिल अंबानी, जय अनमोल अंबानी और राणा कपूर की समझौते की अपीलें खारिज कर दी थीं. खबरों के मुताबिक, इसकी वजह निवेशकों को हुआ बड़ा नुकसान और पूरे बाजार पर पड़ने वाला प्रभाव बताया गया था. ये वही आधार हैं, जिनके तहत सेबी के नियम किसी मामले में समझौते से इनकार करने की अनुमति देते हैं.
एक ही नोटिस. एक ही लेनदेन. एक ही नुकसान. प्रमोटर्स से कहा गया कि मामला इतना गंभीर है कि इसमें समझौता नहीं हो सकता. लेकिन जिन फंड हाउस ने बॉन्ड खरीदे थे, उन्हें समझौता मिल गया.
अगर नुकसान के आधार पर अंबानी और कपूर को समझौते से बाहर रखा गया, तो यही आधार फंड हाउस पर भी लागू होना चाहिए. और अगर ऐसा नहीं था, तो 15 अक्टूबर के बाद शायद नुकसान बचा ही नहीं है. ऐसे में उन्हें समझौते से इनकार करने का सेबी का आधार भी खत्म हो गया है. सेबी नुकसान का तर्क दे सकता है या समझौते का. दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं.
इस महीने के नए समझौता नियमों के तहत जिन आवेदकों के आवेदन पहले खारिज हो चुके हैं, उन्हें दोबारा आवेदन करने के लिए एक बार 90 दिन का मौका दिया गया है. वकीलों को उम्मीद है कि NAM India के आदेश को आधार बनाकर समानता के अधिकार के तहत चुनौती दी जा सकती है. समझौते का उद्देश्य विवाद खत्म करना होता है. लेकिन सेबी में यह मामला तीन नए विवादों की शुरुआत कर सकता है.
सेबी के पास बचाव का एक तर्क है
सेबी के धोखाधड़ी-रोधी नियमों के तहत कार्रवाई के लिए नुकसान होना जरूरी नहीं है. इसके अलावा, 88.59 करोड़ रुपये की प्रबंधन फीस की वसूली और एक्सपोजर सीमा के उल्लंघन का मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी बना हुआ है. यह तर्क अपनी जगह सही है. लेकिन तब आदेश में स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि यह राशि नुकसान के लिए नहीं, बल्कि आचरण के लिए ली जा रही है. साथ ही यह भी बताना होगा कि समान आचरण के लिए एक नोटिस पाने वाली कंपनी को समझौते की अनुमति क्यों दी जा रही है, जबकि दूसरी को नहीं.
नवंबर में अप्रैल के गणित पर हस्ताक्षर करने का मतलब होगा कि सेबी उस आधार को सही ठहरा रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है.
एक हस्ताक्षर, एक खामोशी
यह फाइल सबसे पहले कमलेश वार्ष्णेय के पास गई थी, लेकिन उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया. इसके बाद फाइल मूर्ति और प्रधान के पास पहुंची. मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मूर्ति ने इस पर संकोच जताया. समझौता पैनल का सामूहिक फैसला होता है, महज औपचारिक मुहर नहीं. अगर मूर्ति यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह आदेश अब भी तर्कसंगत है, तो संभव है कि वह इस इमारत में अकेले व्यक्ति हों, जो यह सवाल खुलकर पूछ रहे हैं.
सूत्रों के मुताबिक, दो साल तक NAM India और उसके अधिकारियों ने नोटिस के जवाब में मामले के गुण-दोष पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. छोटे फंड हाउस को शायद ही कभी दो साल तक चुप रहने की ऐसी छूट मिलती है. वे यह सोच सकते हैं कि इस फाइल को किस कतार में रखा गया था.
CBI को इसकी जानकारी नहीं मिली
CBI ने कपूर और अनिल अंबानी के खिलाफ रिलायंस निप्पॉन म्यूचुअल फंड और यस बैंक के बीच कथित 2,797 करोड़ रुपये के लेनदेन के बदले लाभ (Quid Pro Quo) के मामले में आरोपपत्र दाखिल किया है. आरोपपत्र देखने वाले लोगों के मुताबिक, इसमें सिक्का और त्रिपाठी की भूमिकाओं का भी जिक्र है. साथ ही पूरक आरोपपत्र दाखिल करने की छूट भी रखी गई है. BW Businessworld को NAM India की ओर से CBI की इस कार्रवाई के बारे में कोई एक्सचेंज डिस्क्लोजर नहीं मिला.
सिक्का AMFI के अध्यक्ष हैं, जो 75 लाख करोड़ रुपये के उद्योग का प्रतिनिधित्व करता है. एक एजेंसी उनके खिलाफ अपनी जांच पूरी कर रही है. दूसरी एजेंसी ने अपनी जांच का रास्ता खुला रखा है.
पांचवां T
तुहिन कांत पांडे ने सेबी की कमान संभालते समय चार T का वादा किया था: भरोसा (Trust), पारदर्शिता (Transparency), टीमवर्क (Teamwork) और टेक्नोलॉजी (Technology). पांचवां T, यानी समय (Timing), सबसे मुश्किल साबित हो रहा है.
22 जनवरी: निप्पॉन लाइफ के मुख्यालय वाले शहर ओसाका में निवेशकों की बैठक हुई. ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे पता चले कि उन्होंने निप्पॉन लाइफ से मुलाकात की थी. और हमारा यह सुझाव भी नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया. भूगोल कोई सबूत नहीं है. यह महज भूगोल है.
15 अप्रैल: सेबी का समझौता पत्र NAM India को भेजा गया.
22 जुलाई: जापान के मुंबई स्थित कौंसुल जनरल ने उनसे शिष्टाचार मुलाकात की.
15 सितंबर: लेह में सेना के लिए AMFI के निवेशक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान उन्होंने निप्पॉन इंडिया की शाखा का दौरा किया. यह इस क्षेत्र में किसी म्यूचुअल फंड हाउस का पहला कार्यालय है. 11,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शहर में एकमात्र फंड हाउस वही था, जो अपने नियामक के हस्ताक्षर का इंतजार कर रहा था.
सूत्रों के मुताबिक, निप्पॉन लाइफ भारत-जापान क्रिकेट मैच की मेजबानी भी कर रही है.
इनमें से कोई भी बात अपने आप में अनुचित नहीं है. लेकिन एक नियामक को निष्पक्ष दिखना भी जरूरी है.
जब किसी समझौते का तथ्यात्मक आधार खत्म हो चुका हो और फिर भी उसे हस्ताक्षर के लिए आगे बढ़ाया जा रहा हो, जबकि चेयरमैन का पूरा साल आवेदक के समूह और उसके देश के लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण मुलाकातों में बीता हो, तो यह महज छवि का सवाल नहीं रह जाता. यही मुख्य मुद्दा बन जाता है.
शीर्ष स्तर पर खामोशी
सेबी ने विस्तृत सवालों का जवाब नहीं दिया. CBI ने भी निप्पॉन के खिलाफ अपने मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
सेबी अब भी इस फाइल को वापस भेजकर गणना दोबारा कर सकता है. या फिर नवंबर में अप्रैल के समझौते पर हस्ताक्षर कर सकता है और आने वाले वर्षों तक ट्रिब्यूनल तथा उन नोटिस पाने वालों को इसका जवाब देता रह सकता है, जिन्हें उसने समझौते से बाहर कर दिया था.
फिलहाल, पैसा जमा हो चुका है, एक पेन रुक चुका है और दूसरा अब भी मूर्ति की जेब में है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
गुरुग्राम की Vaydha Advisory स्मॉल और मिड-कैप कंपनियों को निवेशक संबंध (Investor Relations), IPO की तैयारी, कंपनियों के विभाजन और अधिग्रहण से जुड़ी सलाह देगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वेदांता ग्रुप की पूर्व डिप्टी CFO स्वाति चौहान ने अपनी नई कंपनी वैधा एडवाइजरी (Vaydha Advisory) की शुरुआत की है. गुरुग्राम स्थित यह कंपनी भारत की स्मॉल और मिड-कैप सूचीबद्ध कंपनियों को निवेशक संबंधों (IR) से जुड़ी सलाह और सेवाएं देगी. चौहान अक्टूबर 2026 से इस कंपनी की संस्थापक के तौर पर काम कर रही हैं.
चौहान ने अपनी लिंक्डइन पोस्ट में बताया कि वेदांता में निवेशक संबंधों से जुड़े काम के दौरान उन्होंने महसूस किया कि कंपनियों के वित्तीय नतीजे हमेशा अपने आप पूरी कहानी नहीं बताते. निवेशकों को यह समझना भी जरूरी होता है कि कंपनी का प्रदर्शन किन वजहों से प्रभावित हो रहा है, विकास के लिए पूंजी कहां से आ रही है और भविष्य की कारोबारी रणनीति क्या है. उन्होंने कहा कि Vaydha का उद्देश्य कंपनियों के प्रबंधन को अपनी कारोबारी और निवेश संबंधी योजनाएं निवेशकों के सामने स्पष्ट और लगातार प्रभावी ढंग से रखने में मदद करना है.
तीन प्रमुख क्षेत्रों में देगी सलाह
Vaydha की लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, कंपनी की सेवाओं को तीन प्रमुख क्षेत्रों में बांटा गया है. इनमें सामान्य निवेशक संबंध सेवाएं, रणनीतिक निवेशक संबंध और विशेष कारोबारी परिस्थितियों से जुड़ी सलाह शामिल हैं.
सामान्य निवेशक संबंध सेवाओं के तहत कंपनी वित्तीय नतीजों की घोषणा, अर्निंग्स कॉल की स्क्रिप्ट तैयार करने और प्रबंधन को निवेशकों के सवालों के जवाब देने की तैयारी में मदद करेगी. वहीं, रणनीतिक सेवाओं में निवेशकों की पहचान और विश्लेषकों के साथ संवाद बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा.
इसके अलावा, कंपनी आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) की तैयारी, कंपनियों के विभाजन (डिमर्जर) और अधिग्रहण से जुड़े मामलों में भी सलाह देगी.
कंपनी की प्रोफाइल में धातु, खनन और प्राकृतिक संसाधनों सहित पांच क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है. इसके अलावा, कंपनी में दो से 10 कर्मचारियों की टीम होने का उल्लेख है. स्वाति चौहान खुद ग्राहकों से जुड़े कामकाज का नेतृत्व करेंगी.
वेदांता में पांच साल से अधिक का अनुभव
स्वाति चौहान ने वेदांता ग्रुप में पांच साल और तीन महीने तक काम किया. इस दौरान उन्होंने तीन अलग-अलग पदों पर जिम्मेदारी संभाली. अप्रैल 2024 से मई 2026 तक वह अनिल अग्रवाल फाउंडेशन में डिप्टी CFO रहीं. इससे पहले सितंबर 2022 से मार्च 2024 तक उन्होंने वेदांता में डिप्टी हेड-इन्वेस्टर रिलेशंस और मार्च 2021 से सितंबर 2022 तक ग्रुप फाइनेंशियल प्लानिंग एंड एनालिसिस (FP&A) में एसोसिएट जनरल मैनेजर के तौर पर काम किया.
वेदांता में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने 4 अरब डॉलर के कर्ज के पुनर्वित्त (Debt Refinancing) और समूह के पांच अलग-अलग कंपनियों में विभाजन से जुड़ी निवेशक संवाद प्रक्रिया में भी सहयोग किया.
वेदांता से पहले चौहान Apollo LogiSolutions, Delhivery और Wisdom Mart जैसी कंपनियों में काम कर चुकी हैं. Vaydha की लिंक्डइन प्रोफाइल में Lenovo का नाम भी उनके पूर्व पेशेवर अनुभव से जुड़ी कंपनियों में शामिल है.
इसके तहत कंपनी भारत में फोटोग्राफी, फिल्ममेकिंग और कंटेंट क्रिएटर से जुड़े तेजी से बढ़ते बाजार में निकॉन की मौजूदगी को मजबूत करने का काम करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
80dB कम्यूनिकेशंस ने निकॉन इंडिया का स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशन मैंडेट हासिल किया है. इस साझेदारी के तहत एजेंसी निकॉन की कॉरपोरेट और ब्रांड छवि को मजबूत करने, मीडिया के साथ संबंध विकसित करने, उत्पादों के प्रचार, कंपनी के नेतृत्व की पहचान बढ़ाने और कंटेंट क्रिएटर्स के साथ जुड़ाव बढ़ाने की जिम्मेदारी संभालेगी.
इस पहल का उद्देश्य भारत के तेजी से बदलते विजुअल स्टोरीटेलिंग इकोसिस्टम में निकॉन की स्थिति को और मजबूत करना है. इसके लिए एजेंसी Nikon की इमेजिंग तकनीक और मिररलेस कैमरा सेगमेंट में बढ़ते पोर्टफोलियो को प्रमुखता से सामने लाएगी. साथ ही RED डिजिटल सिनेमा टेक्नोलॉजी के जरिए फिल्ममेकिंग और क्रिएटिव क्षेत्र में उपलब्ध नए अवसरों को भी रेखांकित करेगी.
एजेंसी निकॉन इंडिया के नेतृत्व की सार्वजनिक छवि को मजबूत करने के साथ फोटोग्राफर्स, फिल्ममेकर्स और टेक्नोलॉजी मीडिया के साथ संबंधों को भी गहरा करेगी. इसके अलावा ब्रांड की प्रतिष्ठा से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी भी इसकी जिम्मेदारी होगी.
क्रिएटर इकोसिस्टम की जरूरतों को समझना प्राथमिकता
निकॉन इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर सज्जन कुमार ने कहा कि भारत में इमेजिंग का क्षेत्र तेजी से बदल रहा है. वीडियो और सिनेमैटिक स्टोरीटेलिंग के बढ़ते चलन से फोटोग्राफर्स, फिल्ममेकर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए नए अवसर खुल रहे हैं.
उन्होंने कहा कि निकॉन अपनी जी सीरीज के जरिए इमेजिंग क्षेत्र में अपनी क्षमताओं का विस्तार कर रहा है और उन्नत तकनीक को अधिक से अधिक क्रिएटिव लोगों तक पहुंचाने पर काम कर रहा है. कंपनी का फोकस क्रिएटर्स की बदलती जरूरतों को समझने और उन्हें अपने विचारों को वास्तविक रूप देने में मदद करने पर है.
उन्होंने 80dB कम्यूनिकेशंस के साथ साझेदारी को लेकर कहा कि इससे क्रिएटर्स और प्रोफेशनल्स के साथ कंपनी का जुड़ाव मजबूत होगा और भारतीय बाजार में निकॉन की मौजूदगी को विस्तार मिलेगा.
80dB कम्यूनिकेशंस ने क्या कहा?
80dB कम्यूनिकेशंस की को-फाउंडर और ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर अभिलाषा पाढ़ी ने कहा कि निकॉन जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड के साथ साझेदारी करना उनके लिए गर्व की बात है. इस ब्रांड ने एक सदी से अधिक समय से दुनिया को देखने और कहानियां बताने के तरीके को प्रभावित किया है.
उन्होंने कहा कि भारत में क्रिएटर्स तेजी से वीडियो और सिनेमैटिक फॉर्मेट अपना रहे हैं. ऐसे में एजेंसी का फोकस बेहतर स्टोरीटेलिंग, मीडिया और क्रिएटर्स के साथ भरोसेमंद संबंध बनाने और विजुअल स्टोरीटेलिंग के क्षेत्र में निकॉन इंडिया की पहचान को और मजबूत करने पर रहेगा.
सेबी ने म्यूचुअल फंड स्कीमों को शेयरों की खरीद और बिक्री से मिलने वाली रकम को आपस में एडजस्ट करने की अनुमति दी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शेयर बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने म्यूचुअल फंड कंपनियों के लिए शेयरों की खरीद-बिक्री से जुड़े भुगतान के नियमों में बदलाव किया है. अब एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम शेयर खरीदने और बेचने से बनने वाली भुगतान राशि को आपस में एडजस्ट कर सकेगी. इस व्यवस्था को नेट सेटलमेंट (Net Settlement) कहा जाता है. इससे म्यूचुअल फंड कंपनियों को लेनदेन के निपटान में आसानी होगी और कुछ समय के लिए अतिरिक्त नकदी जुटाने की जरूरत कम पड़ेगी.
सेबी ने 5 नवंबर को जारी सर्कुलर में इस बदलाव की जानकारी दी है. नए नियम 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे. इससे पहले नियामक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को भी इस तरह की सुविधा दे चुका है.
क्या है सेबी का नया नियम?
अभी तक म्यूचुअल फंड स्कीमों को शेयरों की खरीद और बिक्री के लिए भुगतान का निपटान अलग-अलग करना पड़ता था. नई व्यवस्था के तहत एक ही स्कीम तय सेटलमेंट अवधि में शेयर खरीदने और बेचने से बनने वाली रकम को एडजस्ट कर सकेगी. इसके बाद केवल बची हुई राशि का भुगतान करना होगा.
इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. मान लीजिए किसी म्यूचुअल फंड स्कीम ने 10 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे और उसी सेटलमेंट अवधि में 7 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए. नई व्यवस्था के तहत दोनों रकम को एडजस्ट करने के बाद स्कीम को केवल 3 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा. इससे फंड हाउसों को खरीदारी के लिए अस्थायी तौर पर अतिरिक्त पैसे की व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी.
क्या सभी म्यूचुअल फंड स्कीमों को मिलेगी यह सुविधा?
सेबी ने स्पष्ट किया है कि नेट सेटलमेंट की सुविधा केवल एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम के भीतर मिलेगी. यानी किसी फंड हाउस की दो अलग-अलग स्कीमों के लेनदेन की रकम को आपस में एडजस्ट नहीं किया जा सकेगा.
इसके अलावा, यदि कोई स्कीम एक ही सेटलमेंट अवधि में किसी शेयर की खरीद और बिक्री दोनों करती है, तो उस शेयर से जुड़े सौदों पर यह सुविधा लागू नहीं होगी. ऐसे लेनदेन का निपटान पहले की तरह अलग-अलग किया जाएगा.
यह व्यवस्था केवल शेयर बाजार के कैश सेगमेंट में निर्धारित शर्तों के तहत होने वाली सीधी खरीद और बिक्री के सौदों पर लागू होगी.
किन सौदों पर लागू नहीं होंगे नए नियम?
सेबी के मुताबिक, डेरिवेटिव्स, सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग (शेयर उधार लेने और देने), शॉर्ट सेलिंग और अन्य निर्दिष्ट लेनदेन को इस सुविधा से बाहर रखा गया है. हालांकि, शेयरों की डिलीवरी की मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा. नए नियम के तहत केवल भुगतान की रकम को एडजस्ट करने की अनुमति दी गई है.
म्यूचुअल फंड कंपनियों को करनी होगी ये तैयारी
सेबी ने एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) को नए नियमों के क्रियान्वयन के लिए जरूरी व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया है. इसके लिए एम्फी क्लियरिंग कॉरपोरेशन, स्टॉक एक्सचेंज, कस्टोडियन और अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर काम करेगा.
म्यूचुअल फंड कंपनियों और कस्टोडियन को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे हर स्कीम के लेनदेन और भुगतान का रिकॉर्ड अलग-अलग रखा जा सके. यह भी सुनिश्चित करना होगा कि एक स्कीम की रकम का इस्तेमाल दूसरी स्कीम के भुगतान के लिए न हो.
निवेशकों पर क्या होगा असर?
सेबी के इस फैसले से म्यूचुअल फंड कंपनियों के लिए शेयरों की खरीद-बिक्री और भुगतान का प्रबंधन आसान हो सकता है. इससे फंड मैनेजरों को अस्थायी नकदी की जरूरत कम पड़ेगी और लेनदेन की प्रक्रिया अधिक कुशल हो सकेगी.
हालांकि, इस बदलाव का निवेशकों को मिलने वाले रिटर्न पर सीधा असर पड़ने की गारंटी नहीं है. यह मुख्य रूप से म्यूचुअल फंड कंपनियों के परिचालन और भुगतान निपटान से जुड़ा सुधार है.
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) ने इस हफ्ते करीब 5,200 करोड़ रुपये के बॉन्ड की शुद्ध खरीदारी की है. यह जुलाई के बाद किसी एक हफ्ते में उनकी सबसे बड़ी खरीदारी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में इस हफ्ते जोरदार तेजी देखने को मिली है. कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट से भारतीय बॉन्ड को सहारा मिला है. इसका असर विदेशी निवेशकों की खरीदारी में भी दिखाई दिया. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) ने इस हफ्ते करीब 5,200 करोड़ रुपये के बॉन्ड की शुद्ध खरीदारी की है. यह जुलाई के बाद किसी एक हफ्ते में उनकी सबसे बड़ी खरीदारी है. इस प्रदर्शन के साथ भारतीय सरकारी बॉन्ड उभरते एशियाई बाजारों में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले बॉन्ड बन गए हैं.
सरकारी बॉन्ड की यील्ड में 22 बेसिस पॉइंट की गिरावट
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इंडोनेशिया, फिलीपींस, चीन, मलेशिमया और थाईलैंड जैसे बाजारों की तुलना में इस हफ्ते भारतीय बॉन्ड का प्रदर्शन बेहतर रहा. शुक्रवार, 6 नवंबर को सुबह 11:40 बजे भारत के बेंचमार्क 6.94 फीसदी वाले 2036 में मैच्योर होने वाले सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.1973 फीसदी पर थी.
दिन के कारोबार के दौरान यील्ड में 2.5 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन पूरे सप्ताह में इसमें करीब 22 बेसिस पॉइंट की गिरावट दर्ज की गई. अप्रैल के बाद यह बॉन्ड बाजार का सबसे अच्छा साप्ताहिक प्रदर्शन हो सकता है. गौरतलब है कि बॉन्ड की यील्ड में गिरावट का मतलब उसकी कीमतों में बढ़ोतरी होता है.
FIIs ने एक हफ्ते में खरीदे ₹5,200 करोड़ के बॉन्ड
भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ने लगी है. इस हफ्ते FIIs ने करीब 5,200 करोड़ रुपये के बॉन्ड की शुद्ध खरीदारी की. जुलाई के बाद यह किसी एक सप्ताह में उनकी सबसे बड़ी खरीदारी है.
इसकी प्रमुख वजह अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड में आई गिरावट है. अमेरिका के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड इस हफ्ते करीब 10 बेसिस पॉइंट नीचे आई है. इससे भारतीय बॉन्ड विदेशी निवेशकों के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा आकर्षक हो गए हैं. विशेषज्ञों के अनुसार,रुपये की स्थिरता, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें भारतीय बॉन्ड बाजार के लिए अहम हैं. इन परिस्थितियों के कारण भारत वैश्विक बॉन्ड निवेशकों के रडार पर तेजी से आ रहा है.
कच्चे तेल की कीमतों में 15% की गिरावट से रुपये को सहारा
कच्चे तेल की कीमतों में इस हफ्ते करीब 15 फीसदी की गिरावट आई है. अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीद से तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है. अप्रैल 2020 के बाद यह कच्चे तेल की कीमतों में सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट बताई जा रही है.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है. ऐसे में तेल की कीमतों में गिरावट से देश को कई मोर्चों पर राहत मिल सकती है. इससे आयात बिल और महंगाई का दबाव कम होने के साथ रुपये को भी मजबूती मिल सकती है.
इस सप्ताह रुपया करीब 1 फीसदी मजबूत होकर 94.10 प्रति डॉलर पर पहुंच गया. वहीं, निफ्टी 50 भी सप्ताह के दौरान 6.7 फीसदी चढ़कर 24,612 के स्तर पर पहुंच गया. विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की संभावनाओं ने भारतीय बाजार में निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है. हालांकि, उनका मानना है कि 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में आगे और गिरावट के लिए ईरान संकट का समाधान होना और कच्चे तेल की कीमतों का 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आना जरूरी होगा.
RBI की ओर से ब्याज दरें बढ़ाने की आशंका घटी
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से ब्याज दरों में बड़ी बढ़ोतरी की आशंका भी कम हुई है. एक निजी बैंक के ट्रेडर के मुताबिक, पहले बाजार में RBI की ओर से कुल 125 बेसिस पॉइंट तक ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना जताई जा रही थी. अब यह अनुमान घटकर 50 से 75 बेसिस पॉइंट रह गया है.
इसका असर ब्याज दरों से जुड़े ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप (OIS) बाजार में भी देखने को मिला है. एक साल की OIS दर इस हफ्ते 32 बेसिस पॉइंट घटकर 6.40 फीसदी पर आ गई. वहीं, दो साल की दर 34 बेसिस पॉइंट गिरकर 6.40 फीसदी और पांच साल की दर 37 बेसिस पॉइंट घटकर 6.49 फीसदी रह गई. OIS दरों में आई गिरावट से संकेत मिलता है कि बाजार अब भविष्य में ब्याज दरों में बढ़ोतरी को लेकर पहले के मुकाबले कम आशंकित है.
FADA के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में देशभर में कुल 31,72,000 से अधिक वाहनों का रजिस्ट्रेशन हुआ, जबकि पिछले साल इसी महीने बिक्री का आंकड़ा इससे काफी अधिक था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में ऑटोमोबाइल की खुदरा बिक्री अक्टूबर में सालाना आधार पर 23.8 फीसदी घटकर करीब 31.72 लाख यूनिट रह गई. दोपहिया और यात्री वाहनों की बिक्री में आई गिरावट ने कुल आंकड़ों को प्रभावित किया. हालांकि, फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के मुताबिक, बिक्री में इस गिरावट की प्रमुख वजह त्योहारी कैलेंडर में बदलाव है. इस बीच, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की कुल रिटेल बिक्री में हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 11.5 फीसदी पर पहुंच गई.
FADA के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में देशभर में कुल 31,72,000 से अधिक वाहनों का रजिस्ट्रेशन हुआ, जबकि पिछले साल इसी महीने बिक्री का आंकड़ा इससे काफी अधिक था. दोपहिया वाहनों की खुदरा बिक्री में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई. इस श्रेणी में बिक्री सालाना आधार पर 28.35 फीसदी घटकर 23.21 लाख यूनिट रह गई. वहीं, यात्री वाहनों की बिक्री 4.23 फीसदी गिरकर करीब 5.08 लाख यूनिट पर आ गई.
त्योहारों की तारीखों में बदलाव का असर
FADA के मुताबिक, अक्टूबर में बिक्री के आंकड़ों में गिरावट की एक बड़ी वजह इस साल त्योहारों का नवंबर में पड़ना है. पिछले साल नवरात्रि और दिवाली दोनों अक्टूबर में थे, जबकि इस साल नवरात्रि अक्टूबर में और धनतेरस व दिवाली नवंबर में मनाई जा रही है.
FADA के अध्यक्ष साई गिरिधर ने कहा कि अक्टूबर भारत में ऑटोमोबाइल खुदरा बिक्री के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण महीनों में से एक होता है. इसलिए इस साल के आंकड़ों को त्योहारी कैलेंडर में हुए बदलाव के संदर्भ में देखना जरूरी है. उनके मुताबिक, पिछले साल अक्टूबर में नवरात्रि और दिवाली एक साथ पड़ने के अलावा, 22 सितंबर 2025 को GST दरों में कटौती के बाद लंबे समय से रुकी मांग भी बाजार में आई थी. इस वजह से पिछले साल का बिक्री आधार काफी ऊंचा था.
ग्रामीण इलाकों में दोपहिया वाहनों की बिक्री ज्यादा घटी
FADA के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर में ग्रामीण क्षेत्रों में दोपहिया वाहनों की खुदरा बिक्री 33.97 फीसदी घट गई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह गिरावट 20.77 फीसदी रही. दूसरी ओर, इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री करीब 3.55 लाख यूनिट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. कुल वाहन बिक्री में EV की हिस्सेदारी पिछले साल के करीब 6 फीसदी से बढ़कर इस साल 11.5 फीसदी हो गई.
एक और अहम बदलाव वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों की बढ़ती मांग के रूप में सामने आया. अक्टूबर में CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की संयुक्त हिस्सेदारी कुल बिक्री में 41.83 फीसदी रही, जो पेट्रोल वाहनों की 41.6 फीसदी हिस्सेदारी से अधिक थी.
कमर्शियल वाहन, तिपहिया और ट्रैक्टर की बिक्री में बढ़ोतरी
जहां दोपहिया और यात्री वाहनों की बिक्री में गिरावट रही, वहीं अन्य वाहन श्रेणियों का प्रदर्शन बेहतर रहा. अक्टूबर में कमर्शियल वाहनों की खुदरा बिक्री 2.29 फीसदी बढ़कर करीब 1.15 लाख यूनिट हो गई. तिपहिया वाहनों की बिक्री 3.97 फीसदी बढ़कर 1.41 लाख यूनिट और ट्रैक्टरों की बिक्री 3.10 फीसदी बढ़कर 79,285 यूनिट पर पहुंच गई.
निर्माण उपकरणों की बिक्री में भी 22.07 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 7,434 यूनिट रही. साई गिरिधर के मुताबिक, कुल मिलाकर अक्टूबर अब तक का दूसरा सबसे अच्छा महीना रहा. वहीं, कमर्शियल वाहनों, तिपहिया वाहनों और ट्रैक्टरों के लिए यह अब तक का सबसे बेहतर अक्टूबर साबित हुआ.
नवंबर में बिक्री को लेकर डीलरों को उम्मीद
FADA ने बताया कि सितंबर के मुकाबले अक्टूबर में वाहन बिक्री में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जो त्योहारी मांग का संकेत देती है. डीलरों को नवंबर में बिक्री बेहतर रहने की उम्मीद है, क्योंकि इस महीने 6 नवंबर को धनतेरस और 8 नवंबर को दिवाली है.
एसोसिएशन के मुताबिक, नवंबर में त्योहारी खरीदारी से ऑटो बाजार को सहारा मिल सकता है. हालांकि, दिसंबर और जनवरी में बिक्री का रुख साल के अंत में मिलने वाले डिस्काउंट, नए मॉडल की लॉन्चिंग और ग्राहकों की मांग के अनुरूप वाहनों की उपलब्धता पर निर्भर करेगा.
भारत ने अब तक 310 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता स्थापित की है. 2030 तक 500 गीगावाट का लक्ष्य हासिल करने के लिए 190 गीगावाट क्षमता और जोड़नी होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 2030 तक 220 अरब डॉलर की अनुमानित निवेश जरूरत से अधिक पूंजी आने की उम्मीद है. केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने गुरुवार को यह भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि देश में स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का विस्तार तेजी से हो रहा है और इस क्षेत्र में घरेलू के साथ-साथ विदेशी निवेशकों की भी दिलचस्पी बढ़ रही है.
भारत मंडपम में आयोजित भारत रिन्यूएबल एनर्जी (BRE) समिट एंड एक्सपो 2026 से इतर बातचीत में जोशी ने बताया कि देश ने अब तक 310 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता स्थापित कर ली है. सरकार ने 2030 तक इसे बढ़ाकर 500 गीगावाट करने का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए अगले चार वर्षों में 190 गीगावाट अतिरिक्त क्षमता जोड़नी होगी.
जोशी ने कहा कि सरकार को भरोसा है कि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 220 अरब डॉलर की अनुमानित निवेश जरूरत से अधिक पूंजी जुटाई जा सकेगी. भारत का स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.
दो साल में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में आया 7 लाख करोड़ रुपये का निवेश
मंत्री ने बताया कि पिछले दो वर्षों में भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में करीब 7 लाख करोड़ रुपये का निवेश आया है. इसमें घरेलू निवेश के साथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भी शामिल है. यह निवेश देश में स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार और इस क्षेत्र में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है.
जोशी ने भारत में स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ने की रफ्तार का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि देश को शुरुआती 100 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता स्थापित करने में 10 साल लगे थे. इसके बाद अगली 100 गीगावाट क्षमता जोड़ने में सात साल का समय लगा. वहीं, हाल की 100 गीगावाट क्षमता सिर्फ दो वर्षों में स्थापित की गई है.
उन्होंने उम्मीद जताई कि क्षमता विस्तार की यह रफ्तार आगे भी तेज बनी रहेगी और भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य हासिल कर लेगा.
2030 के बाद 300 गीगावाट क्षमता जोड़ने की तैयारी
जोशी ने कहा कि सरकार 2030 के लक्ष्य से आगे की योजना पर भी काम कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश के अनुरूप अतिरिक्त 300 गीगावाट क्षमता जोड़ने के लिए रणनीति तैयार की जाएगी. इसका उद्देश्य आने वाले वर्षों में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन को और बढ़ाना है.
उन्होंने यह भी कहा कि भारत आपूर्ति श्रृंखला में संभावित बाधाओं से निपटने की तैयारी मजबूत कर रहा है. पहले आई चुनौतियों से मिले अनुभव के आधार पर सरकार ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर काम कर रही है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के दौरान आपूर्ति में रुकावटों का असर कम किया जा सके.
वैश्विक निवेशकों की भागीदारी बढ़ने का दावा
BRE समिट एंड एक्सपो 2026 में नीति निर्माता, निवेशक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और नवाचार से जुड़े विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं. जोशी के मुताबिक, पहली बार नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े तीन अहम आयोजनों को एक साथ आयोजित किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि इस आयोजन में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों की मौजूदगी भारत के स्वच्छ ऊर्जा विस्तार और ऊर्जा बदलाव में उसकी भूमिका को लेकर बढ़ते वैश्विक भरोसे को दिखाती है.
गुरुवार को बीएसई सेंसेक्स 2,008.61 अंक यानी 2.60 फीसदी की बढ़त के साथ 79,310.01 पर बंद हुआ था. वहीं, एनएसई निफ्टी 576 अंक यानी 2.40 फीसदी चढ़कर 24,536.60 के स्तर पर पहुंच गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
धनतेरस के दिन शेयर बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत हैं. गुरुवार को सेंसेक्स और निफ्टी में 2 फीसदी से ज्यादा की जोरदार तेजी के बाद आज मुनाफावसूली का दबाव देखने को मिल सकता है. गिफ्ट निफ्टी 130 अंक से ज्यादा टूट गया है, वहीं अमेरिकी बाजारों में भारी बिकवाली के बाद एशियाई बाजारों में भी हाहाकार मचा है. इस बीच कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. बाजार की इस हलचल के बीच निवेशकों की नजर भारती एयरटेल, टाइटन, ओएनजीसी और ब्रिटानिया समेत तिमाही नतीजे जारी करने वाली कंपनियों के शेयरों पर रहेगी. वहीं, आज कई कंपनियां सितंबर तिमाही के नतीजे भी घोषित करेंगी.
गुरुवार को सेंसेक्स 2,008 अंक उछला था
भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार (5 नवंबर) को जबरदस्त तेजी देखने को मिली थी. बीएसई सेंसेक्स 2,008.61 अंक यानी 2.60 फीसदी की बढ़त के साथ 79,310.01 पर बंद हुआ था. वहीं, एनएसई निफ्टी 576 अंक यानी 2.40 फीसदी चढ़कर 24,536.60 के स्तर पर पहुंच गया था.
इस तेजी के साथ बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 500 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया था. एक कारोबारी सत्र में निवेशकों की संपत्ति में करीब 8 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ था.
हालांकि, व्यापक बाजार में तेजी का प्रदर्शन कुछ कमजोर रहा. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 1.8 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.5 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुए थे.
FIIs की लगातार पांचवें दिन खरीदारी
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की खरीदारी घरेलू बाजार के लिए राहत की खबर है. विदेशी निवेशक लगातार पांच कारोबारी सत्रों से भारतीय शेयर बाजार में शुद्ध खरीदार बने हुए हैं. 5 नवंबर को उन्होंने भारतीय शेयर बाजार में शुद्ध रूप से 14,975 करोड़ रुपये का निवेश किया.
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट
अमेरिका के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड घटकर करीब 4.83 फीसदी पर आ गई है. शेयर बाजारों में भारी बिकवाली के बीच निवेशकों के सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करने से बॉन्ड यील्ड में गिरावट आई है.
एचएसटी वेल्थ के फाउंडर और सीईओ हरिसेल्वन राधाकृष्णन के मुताबिक, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट से भारत जैसे उभरते बाजारों को फायदा मिल सकता है. हालांकि, इसके लिए वैश्विक बाजारों में निवेशकों का भरोसा मजबूत होना जरूरी है.
इन शेयरों पर रखें नजर
तिमाही नतीजों और कारोबारी अपडेट के चलते आज भारती एयरटेल, टाइटन, ओएनजीसी, ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज, बीकाजी फूड्स, रूबिकॉन रिसर्च, अशोका बिल्डकॉन, सास्केन टेक्नोलॉजीज और टेक्समैको रेल के शेयरों में हलचल रह सकती है. भारती एयरटेल का सितंबर तिमाही में कंसॉलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 31 फीसदी बढ़कर 8,887 करोड़ रुपये रहा, जबकि प्रति ग्राहक औसत रेवेन्यू (ARPU) 264 रुपये से बढ़कर 271 रुपये पहुंच गया. टाइटन कंपनी का कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू 10 फीसदी बढ़कर 20,614 करोड़ रुपये और नेट प्रॉफिट दोगुने से ज्यादा बढ़कर 2,393 करोड़ रुपये हो गया. ओएनजीसी का स्टैंडअलोन नेट प्रॉफिट 57.3 फीसदी की बढ़त के साथ 15,488.6 करोड़ रुपये और रेवेन्यू 32.8 फीसदी बढ़कर 43,875.2 करोड़ रुपये रहा. वहीं, ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज का रेवेन्यू 15.6 फीसदी बढ़कर 5,597.8 करोड़ रुपये और नेट प्रॉफिट 10.2 फीसदी बढ़कर 721 करोड़ रुपये पहुंच गया. बीकाजी फूड्स का रेवेन्यू 13 फीसदी बढ़कर 921 करोड़ रुपये रहा, हालांकि कंपनी का एबिटा 9.7 फीसदी घटकर 102 करोड़ रुपये और नेट प्रॉफिट 11.3 फीसदी गिरकर 71 करोड़ रुपये रह गया. दूसरी ओर, रूबिकॉन रिसर्च ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए रेवेन्यू में 39.8 फीसदी, एबिटा में 52.1 फीसदी और नेट प्रॉफिट में 66.7 फीसदी की बढ़त दर्ज की. कंपनी का नेट प्रॉफिट 90 करोड़ रुपये रहा. कारोबारी अपडेट की बात करें तो अशोका बिल्डकॉन को 865.90 करोड़ रुपये की एनएचएआई परियोजना के लिए सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी (L-1) घोषित किया गया है. यह परियोजना वडोदरा-मुंबई एक्सप्रेसवे के करवाद-जुजुवा खंड में आठ लेन की सड़क बनाने से जुड़ी है. इसके अलावा सास्केन टेक्नोलॉजीज को यूरोप की एक प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनी से कई वर्षों का इंजीनियरिंग कॉन्ट्रैक्ट मिला है, जबकि टेक्समैको रेल एंड इंजीनियरिंग को घरेलू बाजार में 428.55 करोड़ रुपये के तीन नए ऑर्डर मिले हैं.
आज इन कंपनियों के आएंगे सितंबर तिमाही के नतीजे
शुक्रवार को कई अन्य कंपनियां भी वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजे घोषित करेंगी. इनमें हिंडाल्को इंडस्ट्रीज, होनासा कंज्यूमर, सीमेंस, एस्टर डीएम हेल्थकेयर, ब्लू डार्ट एक्सप्रेस, बॉम्बे डाइंग, सीएमआर ग्रीन टेक्नोलॉजीज, कोहांस लाइफसाइंसेज, कोरमंडल इंटरनेशनल, ग्लैंड फार्मा, जुबिलेंट फूडवर्क्स, नुवामा वेल्थ मैनेजमेंट और वोल्टास शामिल हैं.
ग्लोबल बाजारों में गिरावट, कच्चा तेल भी चढ़ा
वैश्विक बाजारों में बिकवाली का असर घरेलू शेयर बाजार पर पड़ सकता है. गिफ्ट निफ्टी 130 अंक यानी 0.53 फीसदी गिरकर 24,467.50 पर कारोबार कर रहा था. जापान का निक्केई 225 करीब 8 फीसदी और दक्षिण कोरिया का कोस्पी 8.8 फीसदी तक टूट गया. कोस्पी में तेज गिरावट के कारण सर्किट ब्रेकर भी लगाना पड़ा. इससे पहले गुरुवार को अमेरिकी बाजारों में एसएंडपी 500 में 4.4 फीसदी, डाउ जोंस में 3.4 फीसदी और नैस्डैक कंपोजिट में 5.5 फीसदी की गिरावट आई थी. इस बीच पश्चिम एशिया में तेल टैंकरों पर नए हमलों की खबरों से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई. ब्रेंट क्रूड 1.2 फीसदी बढ़कर 99.50 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड 0.98 फीसदी चढ़कर 91.41 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से भारत के आयात बिल और महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
नीदरलैंड की कंपनी Evos में 100% हिस्सेदारी का अधिग्रहण करेगी APSEZ, यूरोप के 5 देशों में 8 पोर्ट टर्मिनल मिलेंगे; सौदे से कंपनी की वैश्विक मौजूदगी 10 देशों में 28 बंदरगाहों और टर्मिनल तक पहुंचेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी समूह (Adani) की कंपनी अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार का विस्तार करने जा रही है. कंपनी ने यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी स्वतंत्र लिक्विड स्टोरेज ऑपरेटर Evos B.V. में 100 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए समझौता किया है. यह सौदा 2.56 अरब यूरो (करीब 2.56 बिलियन यूरो) के एंटरप्राइज वैल्यू पर ऑल-कैश आधार पर होगा. नीदरलैंड मुख्यालय वाली Evos को खरीदने के बाद APSEZ को यूरोप के पांच देशों में मौजूद आठ पोर्ट टर्मिनल का कारोबार मिलेगा. इस अधिग्रहण से कंपनी की वैश्विक मौजूदगी बढ़कर 10 देशों में 28 बंदरगाहों और टर्मिनल तक पहुंच जाएगी.
कंपनी की ओर से 5 नवंबर 2026 को जारी बयान के मुताबिक, Evos की इक्विटी वैल्यू 1.18 अरब यूरो आंकी गई है. यह सौदा वित्त वर्ष 2025 के आंकड़ों के आधार पर 11.7 गुना EV/EBITDA मल्टीपल पर किया जा रहा है. Evos ने कैलेंडर वर्ष 2025 में 39.2 करोड़ यूरो का राजस्व और 21.9 करोड़ यूरो का EBITDA दर्ज किया था. कंपनी का EBITDA मार्जिन 56 फीसदी रहा. प्रस्तावित अधिग्रहण नियामकीय मंजूरियों और वर्क्स काउंसिल से परामर्श की प्रक्रिया पूरी होने के अधीन है.
यूरोप के 5 देशों में मिलेगा 8 पोर्ट टर्मिनल का नेटवर्क
Evos के पास कुल 63 लाख क्यूबिक मीटर की लिक्विड स्टोरेज क्षमता है. कंपनी नीदरलैंड, जर्मनी, स्पेन, बेल्जियम और माल्टा में आठ बंदरगाह आधारित टर्मिनल संचालित करती है. इसके टर्मिनल यूरोप के प्रमुख ऊर्जा और औद्योगिक केंद्रों में स्थित हैं. इनमें एम्स्टर्डम-रॉटरडैम-एंटवर्प (ARA) क्षेत्र, हैम्बर्ग और भूमध्यसागरीय क्षेत्र शामिल हैं.
कंपनी के नेटवर्क में 452 स्टोरेज टैंक और जहाजों व बार्ज के लिए 63 बर्थ शामिल हैं. इसके अलावा कई एकीकृत पाइपलाइन कनेक्टिविटी भी हैं, जिनमें एम्स्टर्डम शिफोल एयरपोर्ट और सेंट्रल यूरोप पाइपलाइन सिस्टम से जुड़ाव शामिल है. Evos ने कैलेंडर वर्ष 2025 में 37 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) कार्गो का संचालन किया था.
99% कमर्शियल ऑक्यूपेंसी, 56% EBITDA मार्जिन
Evos का कारोबार पारंपरिक ईंधन के साथ ऊर्जा संक्रमण से जुड़े नए ईंधनों के भंडारण और संचालन तक फैला हुआ है. इसके उत्पादों में पेट्रोल, गैस ऑयल, समुद्री ईंधन और जेट फ्यूल शामिल हैं. इसके अलावा कंपनी सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF), बायोफ्यूल, मेथनॉल और बायोएथेनॉल जैसे वैकल्पिक ईंधनों के कारोबार में भी मौजूद है.
कंपनी का औसत कमर्शियल ऑक्यूपेंसी स्तर 99 फीसदी है. इसके राजस्व का एक बड़ा हिस्सा टेक-ऑर-पे (Take-or-Pay) अनुबंधों और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट के तहत आता है. इस तरह कंपनी को अपेक्षाकृत स्थिर राजस्व और नकदी प्रवाह मिलता है. Evos के ग्राहक आधार में वैश्विक ऊर्जा कंपनियां, प्रमुख औद्योगिक और केमिकल कंपनियां तथा कमोडिटी ट्रेडर्स शामिल हैं.
अडानी पोर्ट्स के कारोबार को मिलेगा विस्तार
APSEZ के मैनेजिंग डायरेक्टर करण अडानी ने कहा कि Evos का अधिग्रहण कंपनी की वैश्विक एकीकृत परिवहन प्लेटफॉर्म बनाने की रणनीति में एक महत्वपूर्ण कदम है. इससे कंपनी को दुनिया के प्रमुख लिक्विड स्टोरेज और ऊर्जा केंद्रों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का मौका मिलेगा. उन्होंने कहा कि कंपनी यूरोप के ऊर्जा बदलाव में भागीदारी करने और दीर्घकालिक मूल्य सृजित करने की दिशा में काम करेगी.
कंपनी के मुताबिक, इस अधिग्रहण से उसके लिक्विड कारोबार का विस्तार होगा और भौगोलिक स्तर पर विविधता बढ़ेगी. इसके अलावा यूरोप में नए ऊर्जा ईंधनों की ओर बढ़ते बदलाव से जुड़े अवसरों का लाभ उठाने में मदद मिलेगी. Evos का 56 फीसदी EBITDA मार्जिन APSEZ के अंतरराष्ट्रीय पोर्ट कारोबार के वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही के 44.8 फीसदी मार्जिन से अधिक है. इससे संयुक्त कारोबार के मार्जिन को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है.
कर्ज के जरिए होगा सौदे का वित्तपोषण, FY27 तक घटेगा डेट रेशियो
इस अधिग्रहण के लिए APSEZ कर्ज के जरिए फंडिंग करेगी. कंपनी के मुताबिक, APSEZ और Evos के वित्तीय आंकड़ों के आधार पर संयुक्त इकाई का प्रो-फॉर्मा नेट डेट-टू-EBITDA अनुपात 2.76 गुना रहेगा. वित्त वर्ष 2027 तक इसके करीब 2.5 गुना होने का अनुमान है.
प्रस्तावित सौदे के लिए MUFG ने एकमात्र अंडरराइटर के रूप में 2.8 अरब यूरो तक की फाइनेंसिंग प्रतिबद्धता दी है. APSEZ के लिए Linklaters और Cyril Amarchand Mangaldas ने क्रमशः अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कानूनी सलाहकार के रूप में काम किया है.
अंतरराष्ट्रीय पोर्ट कारोबार में भी बढ़ी कंपनी की गतिविधियां
APSEZ के मुताबिक, 30 सितंबर 2026 को समाप्त वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही तक कंपनी के पास 12,502 करोड़ रुपये का नकद बैलेंस था. अंतरराष्ट्रीय पोर्ट कारोबार ने वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में 3,586 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड राजस्व और 1,608 करोड़ रुपये का EBITDA दर्ज किया. इस दौरान EBITDA मार्जिन भी रिकॉर्ड 44.8 फीसदी रहा.
अंतरराष्ट्रीय पोर्ट कारोबार का वॉल्यूम वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही के 17 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में 47 मिलियन मीट्रिक टन हो गया. इसमें कोलंबो वेस्ट इंटरनेशनल टर्मिनल, तंजानिया के परिचालन और ऑस्ट्रेलिया के NQXT कारोबार का योगदान रहा.
भारत में 27% पोर्ट कार्गो वॉल्यूम संभालती है APSEZ
अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन अडानी समूह का हिस्सा है. कंपनी भारत के पश्चिमी, दक्षिणी और पूर्वी तट पर 16 बंदरगाह और टर्मिनल संचालित करती है. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, कोलंबो, इजरायल और तंजानिया में चार अंतरराष्ट्रीय पोर्ट भी हैं.
कंपनी की मौजूदा कार्गो हैंडलिंग क्षमता 671 मिलियन टन सालाना है और भारत के कुल पोर्ट वॉल्यूम में इसकी हिस्सेदारी करीब 27 फीसदी है. कंपनी ने वित्त वर्ष 2031 तक अपने कार्गो थ्रूपुट को बढ़ाकर 1 अरब टन करने का लक्ष्य रखा है. Evos का अधिग्रहण इसी वैश्विक विस्तार रणनीति का हिस्सा है.
अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण बढ़ने से ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत को मिल सकता है बढ़ावा, लेकिन रूसी तेल की खरीद और अमेरिकी व्यापार नीतियों को लेकर भारत की चुनौतियां बनी रहेंगी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के नतीजों से भारत को फिलहाल आर्थिक मोर्चे पर बड़ी राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, रूस से तेल खरीदने पर संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों और व्यापार शुल्क (टैरिफ) को लेकर अनिश्चितता भारत के लिए चुनौती बनी रह सकती है. केयरएज रेटिंग्स (CareEdge Ratings) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण मजबूत होने से ईरान के साथ जारी संघर्ष को लेकर कूटनीतिक बातचीत का दबाव बढ़ सकता है. हालांकि, इसका भारत के व्यापार और आर्थिक संभावनाओं पर तत्काल बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है.
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव के नतीजों का भारत पर असर मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी व्यापार नीतियों और विदेशी निवेश के प्रवाह के जरिए देखने को मिल सकता है. जहां कमजोर अमेरिकी डॉलर और विदेशी निवेशकों के रुख में बदलाव से भारतीय रुपये को कुछ समर्थन मिल सकता है, वहीं रूस से कच्चे तेल की खरीद और अमेरिका की ओर से अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाने का जोखिम बना रहेगा.
कच्चे तेल और प्रतिबंधों से जुड़ा जोखिम बरकरार
केयरएज रेटिंग्स ने कच्चे तेल की कीमतों को चुनाव के नतीजों का भारत पर पड़ने वाला सबसे तात्कालिक असर बताया है. इसकी वजह यह है कि तेल की कीमतों में बदलाव का सीधा प्रभाव महंगाई, चालू खाता घाटे, राजकोषीय घाटे और वित्तीय बाजारों पर पड़ता है.
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों के बाद बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 8.7 फीसदी की गिरावट आई और यह 94.62 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ. गुरुवार को रिपोर्ट तैयार किए जाने के समय यह 0.86 फीसदी गिरकर 93.81 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था.
हालांकि, रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि कच्चे तेल की कीमतें होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़े घटनाक्रम और ऊर्जा आपूर्ति में संभावित रुकावटों के प्रति संवेदनशील बनी रहेंगी. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इससे भारत की आयात लागत ऊंची बनी रहने का खतरा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत होने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के सैन्य खर्चों की जांच-पड़ताल भी बढ़ सकती है. जनवरी 2027 में नई कांग्रेस के कामकाज शुरू करने के बाद सांसद सैन्य अभियानों के लिए अतिरिक्त फंडिंग पर शर्तें लगा सकते हैं. इससे ईरान के साथ संघर्ष का कूटनीतिक समाधान निकालने का दबाव बढ़ने की संभावना है. हालांकि, उस समय तक पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने का जोखिम बना रहेगा.
भारत को अमेरिकी टैरिफ से जल्द राहत मिलने की उम्मीद कम
अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने के बावजूद भारत को व्यापार शुल्क के मोर्चे पर तत्काल राहत मिलने की संभावना नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति के पास टैरिफ तय करने और उनमें बदलाव करने के व्यापक अधिकार हैं. इसलिए कांग्रेस में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण बढ़ने से भारत पर लगाए गए शुल्कों में तुरंत बदलाव होना मुश्किल है.
वित्त वर्ष 2026 में अमेरिका को भारत का वस्तुओं का निर्यात करीब 90 अरब डॉलर रहा था. ऐसे में अमेरिकी व्यापार नीतियों में किसी भी तरह का बदलाव भारतीय निर्यातकों के लिए अहम होगा.
इसके अलावा रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाने का खतरा भी बना हुआ है. अमेरिका के 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगा सकते हैं.
केयरएज के मुताबिक, 16 अक्टूबर को जारी की गई छूट की कोई निश्चित समयसीमा नहीं है और अमेरिकी प्रशासन इसे कभी भी वापस ले सकता है. ऐसे में यदि अमेरिका अपनी मौजूदा नीति में बदलाव करता है, तो भारतीय निर्यातकों पर दोबारा व्यापारिक दबाव बढ़ सकता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नई अमेरिकी कांग्रेस भारत की ओर से रूस से कच्चे तेल और रक्षा उपकरणों की खरीद की ज्यादा जांच-पड़ताल कर सकती है. इससे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में अनिश्चितता बढ़ सकती है.
रुपये को मिल सकता है सहारा, FPI निवेश में बदलाव की संभावना
रिपोर्ट में अमेरिकी चुनाव के नतीजों का भारतीय रुपये और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) पर असर हल्का सकारात्मक बताया गया है. कमजोर अमेरिकी डॉलर से भारतीय मुद्रा को मजबूती मिल सकती है. इसके अलावा वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में निवेश की रफ्तार धीमी पड़ने की स्थिति में विदेशी निवेशक अपने निवेश का कुछ हिस्सा भारत जैसे दूसरे बाजारों में लगा सकते हैं.
हालांकि, एच-1बी वीजा नियमों और रणनीतिक संबंधों पर चुनाव के नतीजों का असर लगभग तटस्थ रहने की उम्मीद है. रिपोर्ट के अनुसार, इन मुद्दों पर फैसले मुख्य रूप से अमेरिकी व्हाइट हाउस और वहां की अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.
भारत के लिए जोखिम का संतुलन बदला, चुनौतियां अभी बरकरार
केयरएज रेटिंग्स ने अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों को भारत के लिए किसी बड़े बदलाव के बजाय जोखिमों के संतुलन में बदलाव बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी का दोनों सदनों में नियंत्रण मजबूत होने से कूटनीतिक बातचीत की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन इससे भारत को तेल और व्यापार के मोर्चे पर तत्काल राहत मिलने की उम्मीद नहीं है.
आने वाले समय में भारत पर इसका व्यापक आर्थिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन टैरिफ, रूस से तेल खरीद और पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर क्या फैसले लेता है.