Cred फिलहाल पेमेंट्स, लेंडिंग, इंश्योरेंस और वेल्थ मैनेजमेंट से जुड़ी सेवाएं दे रहा है. अब कंपनी स्टॉक ब्रोकिंग बिजनेस में आने को तैयार है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
फाइनेंशियल सर्विसेज देने वाली क्रेड (Cred) अब स्टॉक ब्रोकिंग के भी कारोबार में उतरने की तैयार कर रही है. अभी यह पेमेंट्स, लेंडिंग, इंश्योरेंस और वेल्थ मैनेजमेंट से जुड़ी सर्विसेज देती है. हालांकि अब यह अपने फाइनेंशियल प्लेटफॉर्म में स्टॉक ब्रोकिंग की सर्विसेज जोड़ने के लिए आवेदन कर दिया है. सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक क्रेड की सहायक कंपनी स्पेनी (Spenny) ने स्टॉक ब्रोकिंग लाइसेंस के लिए अप्लाई कर दिया है. इस सेगमेंट में अभी जीरोधा (Zerodha), ग्रो (Groww) और एंजेल वन (Angel One) का बोलबाला है यानी कि क्रेड को इनसे टक्कर लेनी होगी.
क्या है Cred का प्लान?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, क्रेड (Cred) ने अपनी सहायक कंपनी Spenny के जरिए स्टॉक ब्रोकिंग लाइसेंस के लिए आवेदन किया है. हालांकि, अभी कंपनी ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन जानकारों का मानना है कि यह कदम Cred की स्टॉक ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म्स द्वारा हाल के वर्षों में देखी गई रेवेन्यू ग्रोथ से प्रेरित है. कुणाल शाह ने कहा है कि क्रेड सिर्फ उन्हीं प्रोडक्ट्स को लॉन्च करता है जो ग्राहकों की वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाएं. कंपनी कभी भी सट्टा बेस्ड प्रोडक्ट या हाई-इंटरेस्ट वाले लोन की पेशकश नहीं करेगी.
मौजूदा वक्त में ये हैं Cred की सेवाएं
Cred, जो कुणाल शाह द्वारा शुरू की गई है. अभी क्रेडिट कार्ड बिल पेमेंट, लोन और इंश्योरेंस, वेल्थ मैनेजमेंट जैसी सर्विसेस दे रही है. हाल ही में क्रेड ने कुवेरा (Kuvera) का अधिग्रहण किया, जो म्यूचुअल फंड और वेल्थ मैनेजमेंट में काम करती है. वित्त वर्ष 2023-24 में Cred का रेवेन्यू 66% बढ़कर 2,473 करोड़ रुपए हो गया. परिचालन घाटा- पिछले साल के ₹1,024 करोड़ से घटकर ₹609 करोड़ हो गया. Cred के पास 1.3 करोड़ ग्राहक और हर महीने 1.1 करोड़ ट्रांजैक्शन हैं.
अन्य ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म्स का प्रदर्शन
Zerodha: ₹8,320 करोड़ का रेवेन्यू और ₹4,700 करोड़ का मुनाफा. Groww: 308% की प्रॉफिट ग्रोथ. Cred का स्टॉक ब्रोकिंग कारोबार में प्रवेश अन्य प्लेटफॉर्म्स के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ाएगा. क्रेड की एंट्री से पहले से मौजूद दिग्गज ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म्स के वर्चस्व को चुनौती मिल सकती है. क्रेड का मजबूत कस्टमर बेस और फाइनेंशियल सर्विसेस का अनुभव इसे सेक्टर में मजबूत खिलाड़ी बना सकता है.
दोनों देशों ने 'इंडिया-न्यूजीलैंड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप: रोडमैप 2030' को भी मंजूरी दी, जिसके तहत अगले चार वर्षों में व्यापार, कृषि, सुरक्षा, नवाचार, पर्यटन और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर संयुक्त रूप से काम किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान भारत और न्यूजीलैंड ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए कई अहम समझौतों पर सहमति जताई है. दोनों देशों ने 2030 तक आपसी व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर (करीब ₹35,000 करोड़) तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. इसके साथ ही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA), कृषि, डेयरी, पर्यटन, समुद्री सहयोग, कौशल विकास और स्वच्छ ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत करने का रोडमैप भी तैयार किया गया है.
भारत-न्यूजीलैंड रिश्ते बने 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप'
भारत और न्यूजीलैंड ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को आधिकारिक तौर पर 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' का दर्जा दे दिया है. दोनों देशों ने 'इंडिया-न्यूजीलैंड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप: रोडमैप 2030' को भी मंजूरी दी, जिसके तहत अगले चार वर्षों में व्यापार, कृषि, सुरक्षा, नवाचार, पर्यटन और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर संयुक्त रूप से काम किया जाएगा.
यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में लिया गया. उल्लेखनीय है कि करीब चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक न्यूजीलैंड यात्रा है.
2030 तक ₹35,000 करोड़ व्यापार का लक्ष्य
दोनों देशों ने आर्थिक साझेदारी को नई गति देने के लिए 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं के द्विपक्षीय व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर (करीब ₹35,000 करोड़) तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. सरकारों का मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच निवेश बढ़ेगा, नए कारोबारी अवसर बनेंगे और कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंच मिलेगी.
FTA को जल्द लागू करने पर बनी सहमति
भारत और न्यूजीलैंड ने लंबे समय से लंबित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को जल्द अंतिम रूप देने और लागू करने पर भी सहमति जताई है. दोनों प्रधानमंत्रियों ने कहा कि यह समझौता संतुलित, व्यापक और दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा. FTA लागू होने के बाद व्यापारिक बाधाएं कम होंगी, आयात-निर्यात आसान होगा और दोनों देशों के उद्योगों को नए अवसर मिलेंगे.
कृषि और डेयरी सेक्टर को मिलेगा बड़ा फायदा
दोनों देशों ने कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई है. इसके तहत बागवानी, वानिकी, पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं पर काम किया जाएगा. न्यूजीलैंड भारत में कीवी, सेब और शहद के उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए तकनीकी सहयोग देगा. साथ ही भारत में कीवी फ्रूट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना में भी सहयोग करेगा. पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच नए सहयोग समझौते (MoC) पर सहमति बनी है.
पर्यटन और सीधी उड़ानों को मिलेगा बढ़ावा
पर्यटन क्षेत्र को मजबूत करने के लिए दोनों देशों ने एक समझौता (MoA) पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके अलावा भारत और न्यूजीलैंड के बीच सीधी नॉन-स्टॉप उड़ानें शुरू करने की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा. सीधी उड़ानें शुरू होने से पर्यटन, व्यापार और शिक्षा के क्षेत्र में आवाजाही आसान होगी और लोगों के बीच संपर्क बढ़ेगा.
कस्टम और समुद्री सहयोग होगा मजबूत
दोनों देशों ने कस्टम प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने के लिए ऑथराइज्ड इकोनॉमिक ऑपरेटर-म्यूचुअल रिकग्निशन अरेंजमेंट (AEO-MRA) लागू करने पर सहमति जताई है. इसके जरिए भरोसेमंद निर्यातकों और आयातकों के लिए कस्टम क्लियरेंस की प्रक्रिया अधिक तेज और सुगम हो सकेगी.
इसके साथ ही भारत और न्यूजीलैंड समुद्री क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाएंगे. दोनों देश नाविकों के प्रमाणपत्रों की पारस्परिक मान्यता पर काम करेंगे, जिससे भारतीय नाविकों के लिए वैश्विक रोजगार के नए अवसर खुलेंगे.
कई क्षेत्रों में बढ़ेगा सहयोग
'रोडमैप 2030' के तहत दोनों देशों ने स्वच्छ ऊर्जा, कौशल विकास, नवाचार, निवेश और तकनीकी सहयोग को भी प्राथमिकता देने का फैसला किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीतिक साझेदारी न केवल द्विपक्षीय व्यापार को नई गति देगी, बल्कि दोनों देशों के बीच आर्थिक, तकनीकी और लोगों के स्तर पर सहयोग को भी मजबूत बनाएगी.
'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत अब तक 40 लाख रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन का लक्ष्य हासिल किया जा चुका है. इस योजना का उद्देश्य 1 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों तक सोलर बिजली पहुंचाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में रूफटॉप सोलर अपनाने की रफ्तार बढ़ाने के लिए विश्व बैंक ने बड़ा कदम उठाया है. संस्था देश में 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत 4.2 अरब डॉलर की निजी वित्तपोषण (Private Financing) जुटाने में मदद करेगी. इस पहल से लाखों परिवारों के लिए सोलर पैनल लगाना आसान होगा, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार और घरेलू विनिर्माण को भी बढ़ावा मिलेगा.
विश्व बैंक ने मंजूर किया फंडिंग पैकेज
विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशक मंडल ने भारत की रूफटॉप सोलर योजना को गति देने के लिए नए वित्तपोषण पैकेज को मंजूरी दे दी है. इस पैकेज का उद्देश्य 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत घरों में सोलर पैनल लगाने की प्रक्रिया को तेज करना और निजी निवेश को आकर्षित करना है. विश्व बैंक के मुताबिक, इस पहल के जरिए 4.2 अरब डॉलर तक की निजी फाइनेंसिंग जुटाई जाएगी, जिससे देश में रूफटॉप सोलर अपनाने की रफ्तार और तेज होगी.
फंडिंग पैकेज में क्या-क्या शामिल?
इस कार्यक्रम के लिए तैयार किए गए वित्तीय पैकेज में कई स्रोतों से धन उपलब्ध कराया जाएगा.
1. इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (IBRD) से 82 करोड़ डॉलर का ऋण.
2. क्लीन टेक्नोलॉजी फंड (CTF) से 6 करोड़ डॉलर का रियायती ऋण.
3. IBRD के 'लिवेबल प्लैनेट फंड' के तहत 1 करोड़ डॉलर का अनुदान.
40 लाख इंस्टॉलेशन का लक्ष्य पूरा, अब 1 करोड़ घरों पर नजर
सरकार की 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत अब तक 40 लाख रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन का लक्ष्य हासिल किया जा चुका है. इस योजना का उद्देश्य 1 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों तक सोलर बिजली पहुंचाना है. सरकार का मानना है कि इस मिशन से नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण, इंस्टॉलेशन और सर्विस सेक्टर में करीब 17 लाख रोजगार के अवसर पैदा होंगे.
बिना गिरवी के मिलेगा सोलर लोन
विश्व बैंक के कार्यक्रम के टास्क टीम लीडर मोएज चेरिफ ने कहा कि यह योजना आवासीय सोलर बाजार में बड़ा बदलाव ला सकती है. उन्होंने कहा कि वितरण कंपनियों (DISCOMs), बैंकों और सोलर उपकरण विक्रेताओं की क्षमता बढ़ाकर एकीकृत सेवा मॉडल तैयार किया जाएगा. इसके जरिए परिवार बिना किसी संपत्ति को गिरवी रखे ऋण लेकर सोलर पैनल लगवा सकेंगे और अपने बिजली बिल में उल्लेखनीय बचत कर पाएंगे.
65 लाख आवेदन विचाराधीन
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने हाल ही में बताया था कि योजना के तहत 65 लाख से अधिक आवेदन प्रक्रिया में हैं. सरकार का लक्ष्य दिसंबर 2026 तक 75 लाख घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित करना है.
भारत के सोलर मिशन को मिलेगा नया बल
भारत में विश्व बैंक के कार्यवाहक कंट्री डायरेक्टर पॉल प्रोप्सी ने कहा कि विश्व बैंक पिछले एक दशक से अधिक समय से भारत के रूफटॉप सोलर सेक्टर का समर्थन कर रहा है. उन्होंने बताया कि इस दौरान 2 अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय सहायता जुटाई गई, जिससे देश की रूफटॉप सोलर क्षमता 500 मेगावॉट से बढ़कर 27 गीगावॉट से अधिक हो गई.
नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में अहम कदम
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य तय किया है. साथ ही 2035 तक देश के बिजली उत्पादन में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा की हिस्सेदारी 60% तक पहुंचाने का संकल्प लिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व बैंक की यह नई पहल भारत के स्वच्छ ऊर्जा अभियान, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ग्रीन इकोनॉमी को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया लिक्विडिटी उपाय और विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह बैंकिंग सिस्टम को समर्थन देंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का बैंकिंग सेक्टर अगले तीन वित्त वर्षों (FY26-FY28) में मजबूत कमाई दर्ज कर सकता है. ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFS) की रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार बढ़ती कर्ज मांग, RBI की लिक्विडिटी सपोर्ट और नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) में वृद्धि के दम पर बैंकिंग सेक्टर की आय 15% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने का अनुमान है. रिपोर्ट में प्राइवेट बैंकों के सरकारी बैंकों (PSU Banks) से बेहतर प्रदर्शन करने की संभावना जताई गई है.
FY28 तक 15% CAGR से बढ़ सकती है कमाई
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFS) की रिपोर्ट के अनुसार, FY26 से FY28 के बीच भारतीय बैंकिंग सेक्टर की आय लगभग 15% CAGR की दर से बढ़ सकती है. वहीं, प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की कमाई इस अवधि में करीब 20% CAGR से बढ़ने का अनुमान है, जिससे उनके सरकारी बैंकों से बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद है.
कर्ज की मजबूत मांग देगी रफ्तार
रिपोर्ट के मुताबिक, FY27 में कॉरपोरेट, सर्विसेज और इंडस्ट्रियल सेक्टर में मजबूत मांग के चलते क्रेडिट ग्रोथ मिड-टू-हाई टीन्स में बनी रह सकती है. मई 2026 में कॉरपोरेट सेक्टर को दिए गए कर्ज में सालाना आधार पर 18.7% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि सर्विस सेक्टर को दिए गए कर्ज में 19.1% की वृद्धि हुई.
इंडस्ट्रियल क्रेडिट में आई तेजी
रिपोर्ट के अनुसार, FY26 की पहली छमाही में जहां औद्योगिक क्षेत्र को मिलने वाले कर्ज की वृद्धि एकल अंक (Mid-Single Digit) में थी, वहीं दिसंबर 2025 के बाद इसमें मिड-टीन्स की वृद्धि दर्ज की गई है. इस तेजी की वजह बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और बड़े कॉरपोरेट्स, मिड-साइज कंपनियों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की वर्किंग कैपिटल जरूरतों में इजाफा बताया गया है.
RBI के कदम से मिलेगा सहारा
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया लिक्विडिटी उपाय और विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह बैंकिंग सिस्टम को समर्थन देंगे. MOFS का अनुमान है कि FCNR(B) डिपॉजिट और विदेशी उधारी से जुड़े नियमों में RBI की ढील के बाद 40 से 50 अरब डॉलर तक का विदेशी निवेश आ सकता है. यह बैंकिंग सिस्टम के कुल डिपॉजिट का करीब 1.5% से 1.8% के बराबर होगा.
डिपॉजिट ग्रोथ अभी भी कमजोर
रिपोर्ट के मुताबिक, डिपॉजिट ग्रोथ अभी भी क्रेडिट ग्रोथ से पीछे चल रही है. मई 2026 तक डिपॉजिट ग्रोथ 12% रही, जबकि पूरे 2026 में यह 10% से 12% के दायरे में बनी हुई है. इसका असर यह हुआ कि बैंकिंग सिस्टम का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो बढ़कर रिकॉर्ड 83.4% पर पहुंच गया.
मार्जिन पर रहेगा दबाव
MOFS का कहना है कि FY27 की पहली तिमाही में नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बना रह सकता है. इसकी वजह पहले हुई रेपो रेट कटौती का असर, लेंडिंग यील्ड में कमी और डिपॉजिट पर ऊंची ब्याज दरें हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि होलसेल और MSME लेंडिंग का बढ़ता हिस्सा बैंकों की ब्याज दरों में सुधार की क्षमता को सीमित कर सकता है. इसके अलावा, कुछ मिड-साइज बैंकों ने तिमाही के दौरान डिपॉजिट रेट बढ़ाई है. वहीं, चालू खाता-बचत खाता (CASA) अनुपात में गिरावट से बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ने की आशंका है.
मध्यम अवधि का आउटलुक सकारात्मक
हालांकि, निकट अवधि में चुनौतियां बनी रहने की संभावना है, लेकिन MOFS ने बैंकिंग सेक्टर के मध्यम अवधि के आउटलुक को सकारात्मक बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, उधारी लागत में संभावित कमी और FY27 के अंत तक ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी से बैंकों के मार्जिन और आय में सुधार देखने को मिल सकता है.
कंपनी का प्रस्तावित IPO नए शेयरों के फ्रेश इश्यू और मौजूदा शेयरधारकों की ओर से ऑफर फॉर सेल (OFS) का संयोजन होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टेक्नोलॉजी आधारित मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म Zetwerk Manufacturing Business Limited को अपने प्रस्तावित इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) से मंजूरी मिल गई है. कंपनी का IPO नए शेयरों के निर्गम (Fresh Issue) और मौजूदा निवेशकों द्वारा ऑफर फॉर सेल (OFS) का मिश्रण होगा. हालांकि, इश्यू का आकार और वैल्यूएशन बुक-बिल्डिंग प्रक्रिया के दौरान तय किए जाएंगे.
SEBI ने दी हरी झंडी
Zetwerk Manufacturing Business Limited को अपने IPO के लिए SEBI की मंजूरी मिल गई है. SEBI की ओर से जारी ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट्स की नवीनतम प्रोसेसिंग रिपोर्ट के अनुसार, 9 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में कंपनी को ऑब्जर्वेशन लेटर जारी किया गया. Zetwerk ने 1 अप्रैल 2026 को IPO के लिए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया था.
फ्रेश इश्यू और OFS दोनों होंगे शामिल
कंपनी का प्रस्तावित IPO नए शेयरों के फ्रेश इश्यू और मौजूदा शेयरधारकों की ओर से ऑफर फॉर सेल (OFS) का संयोजन होगा. हालांकि, इश्यू का आकार और कंपनी का वैल्यूएशन बुक-बिल्डिंग प्रक्रिया के दौरान तय किया जाएगा.
Zetwerk के प्रमुख निवेशकों में Khosla Ventures, Baillie Gifford, राकेश गंगवाल, Accel, Peak XV, GreenOak और Lightspeed जैसे बड़े नाम शामिल हैं.
2018 में हुई थी कंपनी की शुरुआत
Zetwerk की स्थापना वर्ष 2018 में अमृत आचार्य और श्रीनाथ रामाकृष्णन ने की थी. कंपनी टेक्नोलॉजी आधारित मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म संचालित करती है, जो औद्योगिक मांग को सप्लायर्स और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के बड़े नेटवर्क से जोड़ता है.
कई सेक्टरों में फैला कारोबार
कंपनी का कारोबार ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, एयरोस्पेस, कैपिटल गुड्स, औद्योगिक सप्लाई और कच्चे माल की खरीद जैसे कई क्षेत्रों में फैला हुआ है. Zetwerk अपने स्वामित्व वाले सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म 'Zetwerk OS' के जरिए सोर्सिंग, प्रोडक्शन प्लानिंग, सप्लायर कोऑर्डिनेशन और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट का संचालन करती है.
वैश्विक सप्लाई चेन का उठा रही फायदा
कंपनी अपने स्वामित्व वाली मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के साथ-साथ दुनिया भर में फैले थर्ड-पार्टी सप्लायर नेटवर्क के जरिए काम करती है. वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव, डेटा सेंटर और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, ऊर्जा परिवर्तन, रक्षा विनिर्माण और भारत में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा जैसी प्रवृत्तियों का लाभ Zetwerk को मिल रहा है.
विस्तार को मिलेगी रफ्तार
IPO के जरिए Zetwerk सार्वजनिक बाजार में कदम रखने की तैयारी कर रही है. कंपनी का मानना है कि इससे उसके विस्तार की योजनाओं को गति मिलेगी और विभिन्न मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी और मजबूत होगी.
SBI ने प्री-IPO प्लेसमेंट के तहत SBI Funds Management के 2.88 करोड़ इक्विटी शेयर 30 निवेशकों को बेचे हैं. इस हिस्सेदारी की बिक्री 574 रुपये प्रति शेयर के भाव पर हुई, जो IPO के प्राइस बैंड का ऊपरी स्तर है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने अपनी एसेट मैनेजमेंट इकाई SBI Funds Management में 1.42% हिस्सेदारी 1,655 करोड़ रुपये में बेच दी है. यह सौदा कंपनी के 11,700 करोड़ रुपये के IPO से पहले प्री-IPO प्लेसमेंट के जरिए किया गया है. इस डील से कंपनी को मजबूत संस्थागत निवेशकों का भरोसा मिलने का संकेत माना जा रहा है.
30 निवेशकों को बेचे 2.88 करोड़ शेयर
SBI ने प्री-IPO प्लेसमेंट के तहत SBI Funds Management के 2.88 करोड़ इक्विटी शेयर 30 निवेशकों को बेचे हैं. इस हिस्सेदारी की बिक्री 574 रुपये प्रति शेयर के भाव पर हुई, जो IPO के प्राइस बैंड का ऊपरी स्तर है.
कंपनी के मुताबिक, इस सौदे में टाटा AIG जनरल इंश्योरेंस, गो डिजिट जनरल इंश्योरेंस, 360 ONE फंड्स, बेनेट कोलमैन के अलावा कई अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) और फैमिली ऑफिसेज ने निवेश किया है.
14 जुलाई को खुलेगा 11,700 करोड़ रुपये का IPO
SBI Funds Management का 11,700 करोड़ रुपये का IPO 14 जुलाई को निवेशकों के लिए खुलेगा और 16 जुलाई को बंद होगा. कंपनी ने IPO का प्राइस बैंड 545 रुपये से 574 रुपये प्रति शेयर तय किया है. शेयरों की लिस्टिंग 21 जुलाई को BSE और NSE पर होने की उम्मीद है.
1.17 लाख करोड़ रुपये तक हो सकता है वैल्यूएशन
IPO के ऊपरी प्राइस बैंड 574 रुपये के आधार पर SBI Funds Management का वैल्यूएशन करीब 1.17 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. इससे यह देश की सबसे मूल्यवान एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल होगी.
पूरी तरह OFS होगा IPO
यह IPO पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा. यानी इस इश्यू से कंपनी को कोई नई पूंजी नहीं मिलेगी. IPO के तहत SBI अपनी 12.83 करोड़ इक्विटी शेयर बेचेगा, जबकि उसकी संयुक्त उद्यम (JV) साझेदार यूरोप की एसेट मैनेजमेंट कंपनी Amundi India Holding 7.54 करोड़ शेयरों की बिक्री करेगी. दोनों मिलकर कंपनी की करीब 10% चुकता इक्विटी हिस्सेदारी बेचेंगे.
SBI और Amundi का संयुक्त उपक्रम
SBI Funds Management, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और यूरोप की एसेट मैनेजमेंट कंपनी Amundi का संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) है. यह देश की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल है और IPO के जरिए निवेशकों को इसमें हिस्सेदारी खरीदने का अवसर मिलेगा.
बुधवार को बाजार में आई भारी गिरावट ने केंद्रीय बैंक के बैंक गारंटी नियमों को लेकर उद्योग की बहस को फिर से तेज कर दिया है. लेकिन जहां एक ओर पूरा उद्योग एकजुट नजर आ रहा है, वहीं अंदरखाने ब्रोकरेज कंपनियां इस मुद्दे पर बंटी हुई हैं. साथ ही RBI के कदम के पीछे भी ठोस वजहें हो सकती हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
बुधवार के बाजार में आई बड़ी गिरावट के लिए सिर्फ एक बयान काफी था. जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम "खत्म हो गया है", तो सेंसेक्स 1,677 अंक टूट गया. यह पिछले तीन महीनों में उसकी सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट थी. वहीं निफ्टी 24,000 के नीचे फिसल गया. इस दौरान निवेशकों की करीब 8 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई, जबकि इंडिया VIX में लगभग 30% की तेजी दर्ज की गई.
इस गिरावट की वजह भू-राजनीतिक तनाव था. लेकिन बाजार के जानकारों को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की हुई कि गिरावट को थामने के लिए बाजार में खरीदारी लगभग नदारद थी. ब्रोकिंग इंडस्ट्री का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इसकी वजह RBI के नए क्रेडिट नियम हैं, जो 1 अप्रैल से लागू हुए. इन नियमों के तहत बैंकों को ब्रोकर्स की प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग के लिए फंडिंग देने से रोक दिया गया और क्लियरिंग कॉरपोरेशन को दी जाने वाली बैंक गारंटी पर कड़े कोलेटरल नियम लागू कर दिए गए.
लिक्विडिटी की दलील
प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग डेस्क लंबे समय से भारतीय डेरिवेटिव बाजारों में झटकों को संभालने का काम करते रहे हैं. खासकर BSE और MCX में, जहां कुल कारोबार का बड़ा हिस्सा प्रॉप ट्रेडिंग से आता है. ब्रोकर्स का कहना है कि इन डेस्कों को मिलने वाली बैंक फंडिंग पर रोक लगाकर RBI ने बाजार के उसी हिस्से को कमजोर कर दिया, जो अस्थिरता बढ़ने पर खरीदारी के लिए आगे आता था.
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "उच्च अस्थिरता से निपटने के लिए लिक्विडिटी सबसे अहम होती है. बुधवार जैसे दिन बाजार में दूसरी तरफ खरीदारी करने वाला कोई मौजूद ही नहीं था."
उद्योग की दूसरी शिकायत यह है कि इन प्रतिबंधों को जोखिम प्रबंधन के नाम पर लागू किया गया, जबकि अधिकारियों का कहना है कि पिछले 20 वर्षों में मार्जिन की कमी के कारण एक भी डिफॉल्ट दर्ज नहीं हुआ है. उनका सवाल है कि यदि दो दशक से व्यवस्था बिना किसी समस्या के चल रही थी, तो आखिर किस जोखिम को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है?
इसी तर्क के आधार पर ब्रोकर्स अब RBI और वित्त मंत्रालय के समक्ष एक नया प्रतिनिधित्व तैयार कर रहे हैं. इस बार वे SEBI, मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों और ब्रोकर्स एसोसिएशनों सहित सभी हितधारकों को साथ लेकर समीक्षा की मांग करना चाहते हैं.
अधिकारी ने कहा, "जो उद्योग के लिए अच्छा है, वही सभी हितधारकों के लिए भी अच्छा है."
RBI का पक्ष
हालांकि केंद्रीय बैंक की चिंताएं काल्पनिक नहीं हैं. वे इस बात से जुड़ी हैं कि बैंक गारंटी का इस्तेमाल और उसकी मार्केटिंग किस तरह की जा रही थी.
आमतौर पर बैंक गारंटी केवल 10-25% मार्जिन के आधार पर जारी की जाती है. यानी यदि कोई ब्रोकर 25 रुपये जमा करता है, तो उसे 100 रुपये की बैंक गारंटी मिल सकती है. यदि इस गारंटी का इस्तेमाल डेरिवेटिव ट्रेडिंग में किया जाए, जहां पहले से ही 30-40 गुना एक्सपोजर मिलता है, तो वास्तविक लीवरेज बढ़कर ब्रोकर की अपनी पूंजी का 120-160 गुना तक पहुंच जाता है.
एक अनुभवी बाजार विशेषज्ञ ने इसे साफ शब्दों में समझाया. "यह दूसरे के पैसे से सट्टेबाजी है. ब्रोकर्स अपनी पूंजी लगाने के बजाय बैंक का पैसा इस्तेमाल करना चाहते हैं. मुनाफा हुआ तो उनका, लेकिन नुकसान हुआ तो वे डिफॉल्ट घोषित कर देते हैं और बैंक का पैसा डूब जाता है."
यह केवल सैद्धांतिक आशंका नहीं है. 2019 से 2021 के बीच कई ब्रोकरेज कंपनियां दिवालिया हुईं. उस दौरान कई बैंकों ने क्लियरिंग हाउस को दी गई बैंक गारंटी का भुगतान करने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वे पहले डिफॉल्ट करने वाले ब्रोकर से अपना बकाया वसूलेंगे, जो कई मामलों में पूरी बैंक गारंटी के बराबर था.
इस नजरिए से देखें तो RBI का संदेश स्पष्ट है. यदि सट्टा लगाना है तो 100% मार्जिन अपनी पूंजी से लाना होगा. बैंक गारंटी उपलब्ध रहेगी, लेकिन उसके पीछे वास्तविक कोलेटरल होना चाहिए. प्रॉपराइटरी एक्सपोजर के लिए कम से कम 50% नकद कोलेटरल जरूरी होगा, ताकि डेरिवेटिव में सट्टेबाजी असुरक्षित बैंक ऋण के सहारे न चल सके.
उद्योग में मतभेद
जिस एकजुटता के साथ उद्योग अपनी बात रखना चाहता है, उसे कायम रखना आसान नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि पुराने सिस्टम का फायदा और नुकसान सभी को समान रूप से नहीं मिला.
छोटे ब्रोकर्स का कहना है कि व्यवहार में बैंक गारंटी का लाभ केवल बड़े खिलाड़ियों को मिलता था. ऐसे संस्थानों को, जिनकी बैलेंस शीट 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की थी और जो बैंकों से आसानी से बैंक गारंटी हासिल कर सकते थे.
वे यह शिकायत भी करते हैं कि ANMI ने भी इस मुद्दे पर बड़े ब्रोकर्स का साथ दिया है.
एक छोटे ब्रोकर ने सवाल किया, "इसमें छोटे ब्रोकर्स की क्या गलती है?"
उनका कहना है कि पत्रकारों और नीति-निर्माताओं तक सबसे ज्यादा आवाज उन्हीं कुछ बड़ी प्रॉप-ट्रेडिंग कंपनियों की पहुंच रही है, जिन्हें बैंक के लीवरेज वाले फंड का सबसे अधिक लाभ मिला.
नियामकीय जांच कुछ बड़ी प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग कंपनियों के कारोबारी मॉडल पर भी केंद्रित रही है. यह मॉडल मुख्य रूप से दिल्ली, मुंबई और गुजरात की कुछ कंपनियों तक सीमित है और उद्योग में इसके बहुत कम उदाहरण हैं.
बाजार से जुड़े लोगों और नियामकीय सोच से परिचित सूत्रों का आरोप है कि कुछ कंपनियां स्वतंत्र ट्रेडर्स को अपनी प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग डेस्क का "कर्मचारी" दिखाती हैं. इस व्यवस्था से मार्जिन दायित्व, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) और आयकर देनदारी कम हो सकती है. आलोचकों का कहना है कि इससे वास्तविक प्रॉप ट्रेडिंग और तीसरे पक्ष की सामूहिक सट्टेबाजी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.
जिन कंपनियों पर ऐसे आरोप लगे हैं, उन्होंने लगातार इन आरोपों से इनकार किया है. हालांकि SEBI में माधबी पुरी बुच के कार्यकाल के दौरान शुरू हुई नियामकीय सख्ती के पीछे यह पूरा घटनाक्रम भी एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि माना जाता है.
आगे की राह
बुधवार की बाजार गिरावट ने उद्योग को अपनी सबसे मजबूत दलील दे दी है. यह एक वास्तविक उदाहरण था कि जब प्रॉप ट्रेडिंग पर निर्भर और अत्यधिक लीवरेज वाला बाजार बैंक फंडिंग से वंचित हो जाता है और उसी समय कोई बड़ा भू-राजनीतिक झटका लगता है, तो क्या स्थिति बनती है.
अब सवाल यह है कि क्या RBI भी इसी घटना को अपने फैसले की पुष्टि के रूप में देखता है. यानी क्या वह इसे इस बात का प्रमाण मानता है कि इतना अधिक लीवरेज वाला बाजार बैंक गारंटी के सहारे चलना ही नहीं चाहिए था.
आने वाले दिनों में RBI को दिए जाने वाले प्रतिनिधित्व से इसका जवाब मिल सकता है.
फिलहाल दोनों पक्ष एक ही गिरावट को देख रहे हैं, लेकिन उससे बिल्कुल अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
इस अधिग्रहण के साथ VOYAGE 1 का एकीकरण कुंडू के डेस्टिनेशन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ट्रैवल और टूरिज्म सेक्टर के अनुभवी उद्यमी नवीन कुंडू ने दुबई स्थित डेस्टिनेशन मैनेजमेंट कंपनी (DMC) VOYAGE 1 में बहुमत हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया है. इस डील के तहत कंपनी का एकीकरण उनकी डेस्टिनेशन मार्केटिंग और AI-आधारित प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा. कंपनी का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर अपने नेटवर्क का विस्तार करना और ट्रैवल एजेंट्स के लिए AI आधारित स्मार्ट सेवाएं उपलब्ध कराना है.
ट्रैवल इंडस्ट्री के उद्यमी नवीन कुंडू ने दुबई स्थित डेस्टिनेशन मैनेजमेंट कंपनी (DMC) VOYAGE 1 में बहुमत हिस्सेदारी हासिल कर ली है. इस अधिग्रहण के साथ VOYAGE 1 का एकीकरण कुंडू के डेस्टिनेशन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा.
नई स्वामित्व संरचना के तहत नवीन कुंडू एकीकृत कंपनी के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की जिम्मेदारी संभालेंगे. इस दौरान वह कंपनी की मौजूदा संस्थापक टीम के साथ मिलकर कारोबार का नेतृत्व करेंगे.
कई देशों में मौजूद है VOYAGE 1
VOYAGE 1 की स्थापना विशाल धनसिंघानी ने की थी, जबकि लविन धनसिंघानी और अमित कुमार इसके सह-संस्थापक हैं. कंपनी अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली डेस्टिनेशन कंपनियों के जरिए अवकाश और बिजनेस ट्रैवल से जुड़े कई बाजारों में सेवाएं देती है.
फिलहाल कंपनी का संचालन संयुक्त अरब अमीरात (UAE), अजरबैजान, कजाकिस्तान, जॉर्जिया, वियतनाम, जापान, दक्षिण अफ्रीका, जाम्बिया, केन्या, तंजानिया, रवांडा और युगांडा सहित कई देशों में है.
अगले चरण में इन बाजारों में होगा विस्तार
एकीकृत कंपनी अब अपने डेस्टिनेशन मैनेजमेंट नेटवर्क का विस्तार स्विट्जरलैंड, नॉर्डिक देशों, थाईलैंड और अमेरिका महाद्वीप के बाजारों तक करने की तैयारी में है. यह विस्तार कंपनी की अगली विकास रणनीति का हिस्सा होगा.
AI और डेस्टिनेशन मैनेजमेंट का होगा मेल
कंपनी के अनुसार, इस एकीकरण से VOYAGE 1 की स्थानीय विशेषज्ञता और डेस्टिनेशन मैनेजमेंट क्षमताओं को Tourism Futures.AI के AI-संचालित डेस्टिनेशन मार्केटिंग और ग्राहक अधिग्रहण प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ा जाएगा. इसका उद्देश्य ट्रैवल एजेंट्स को व्यक्तिगत सिफारिशें, बेहतर ग्राहक अधिग्रहण, परिचालन दक्षता और नए व्यावसायिक अवसर उपलब्ध कराना है.
नवीन कुंडू ने कहा कि डेस्टिनेशन मैनेजमेंट का पारंपरिक मॉडल अब बड़े बदलाव के लिए तैयार है. उन्होंने कहा कि VOYAGE 1 के मजबूत ऑपरेशनल नेटवर्क को Tourism Futures.AI की इंटेलिजेंट ऑटोमेशन तकनीक के साथ जोड़कर दुनिया का पहला वास्तविक स्मार्ट DMC नेटवर्क तैयार किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि यह नेटवर्क केवल यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डेटा आधारित विश्लेषण के जरिए बाजार की मांग का पहले से अनुमान लगाएगा, B2B डिस्ट्रीब्यूशन पार्टनर्स को ग्राहक बढ़ाने में मदद करेगा और विभिन्न महाद्वीपों में बेहतर यात्रा अनुभव उपलब्ध कराएगा.
35 वर्षों का अनुभव
नवीन कुंडू के पास ट्रैवल, टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी, कॉर्पोरेट ट्रैवल, डेस्टिनेशन मैनेजमेंट और MICE (मीटिंग्स, इंसेंटिव्स, कॉन्फ्रेंस और एग्जीबिशन) सेक्टर में 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है. हालांकि, दोनों कंपनियों के बीच हुई इस डील की वित्तीय शर्तों का खुलासा नहीं किया गया है.
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85% आयात करता है. ऐसे में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरे और युद्ध जैसी परिस्थितियों को देखते हुए रणनीतिक तेल भंडार की अहमियत और बढ़ गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की सप्लाई पर बढ़ते जोखिमों के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करने की तैयारी में है. सरकारी तेल कंपनी ONGC ने मंगलुरु में 17.5 लाख टन क्षमता का नया स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) बनाने की योजना बनाई है. इस भंडार का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संकट या सप्लाई बाधित होने की स्थिति में देश में तेल की उपलब्धता सुनिश्चित करना है.
वैश्विक संकट से निपटने की तैयारी
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85% आयात करता है. ऐसे में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरे और युद्ध जैसी परिस्थितियों को देखते हुए रणनीतिक तेल भंडार की अहमियत और बढ़ गई है. हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़ी अनिश्चितताओं ने भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई थीं.
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ONGC ने दक्षिण भारत के मंगलुरु में 17.5 लाख टन क्षमता वाला नया राष्ट्रीय रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व विकसित करने का फैसला किया है. कंपनी ने इसकी जानकारी शेयर बाजारों को भेजी गई रेगुलेटरी फाइलिंग में दी है.
क्या होता है स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व?
स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) वह विशेष भंडार होता है, जहां बड़ी मात्रा में कच्चा तेल सुरक्षित रखा जाता है. यदि युद्ध, प्राकृतिक आपदा या अंतरराष्ट्रीय संकट के कारण विदेशों से तेल की सप्लाई प्रभावित हो जाए, तो इसी रिजर्व से देश की जरूरतें पूरी की जाती हैं. इससे पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन की उपलब्धता बनी रहती है और अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर नहीं पड़ता.
कमर्शियल इस्तेमाल के लिए सरकार से मांगेगी मंजूरी
ONGC ने कहा है कि इस रणनीतिक भंडार के एक हिस्से का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए वह केंद्र सरकार से अनुमति मांगेगी. फिलहाल सरकार दक्षिण भारत के मंगलुरु, पादुर और विशाखापट्टनम स्थित रणनीतिक तेल भंडारों के कुछ हिस्से के कमर्शियल उपयोग की अनुमति देती है. इन तीनों स्थानों पर कुल 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल संग्रहित किया जा सकता है. इनका संचालन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) करती है.
UAE और जापान के साथ बढ़ रहा सहयोग
भारत अपने रणनीतिक तेल भंडार को मजबूत करने के लिए संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और जापान जैसे देशों के साथ भी सहयोग बढ़ा रहा है. मंगलुरु स्थित ONGC की सहयोगी कंपनी मंगलुरु रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) की 3 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली रिफाइनरी में पहले से 15 लाख टन का स्टोरेज मौजूद है. इसका आधा हिस्सा MRPL और आधा हिस्सा UAE की सरकारी तेल कंपनी ADNOC के पास लीज पर है.
इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की UAE यात्रा के दौरान ADNOC ने भारत में अपने कच्चे तेल के भंडारण को बढ़ाकर 3 करोड़ बैरल करने की घोषणा की थी. साथ ही फुजैराह में भारत के लिए अतिरिक्त रणनीतिक स्टोरेज विकसित करने की संभावनाओं पर भी काम चल रहा है.
ओडिशा और पादुर में भी बढ़ेगी भंडारण क्षमता
सरकार केवल मंगलुरु तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है.
1. ओडिशा के चंडीखोल में 40 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाला नया रणनीतिक तेल भंडार बनाया जाएगा.
2. कर्नाटक के पादुर में 25 लाख मीट्रिक टन क्षमता की अतिरिक्त स्टोरेज सुविधा विकसित की जाएगी.
भारत की ऊर्जा सुरक्षा होगी और मजबूत
ONGC का यह प्रोजेक्ट भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई मजबूती देगा. भविष्य में यदि वैश्विक बाजार में युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव या सप्लाई चेन बाधित होती है, तो रणनीतिक तेल भंडार देश में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने और आर्थिक गतिविधियों को बिना रुकावट जारी रखने में अहम भूमिका निभाएगा.
CRISIL की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021 से 2026 के बीच देश के प्रमुख टियर-2 शहरों में आवासीय मांग 14% की सालाना दर से बढ़ी, जबकि लखनऊ, नागपुर और कोयंबटूर जैसे शहरों में यह वृद्धि करीब 20% रही.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का रियल एस्टेट बाजार अब केवल दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों तक सीमित नहीं रहा. बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, तेज शहरीकरण और बढ़ते रोजगार के अवसरों के चलते टियर-2 शहर निवेश और हाउसिंग डिमांड के नए केंद्र बनकर उभर रहे हैं. क्रिसिल (CRISIL) की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021 से 2026 के बीच देश के प्रमुख टियर-2 शहरों में आवासीय मांग 14% की सालाना दर से बढ़ी, जबकि लखनऊ, नागपुर और कोयंबटूर जैसे शहरों में यह वृद्धि करीब 20% रही.
टियर-2 शहरों की ओर बढ़ रहा है खरीदारों का रुझान
क्रिसिल की 'हाउसिंग हॉटस्पॉट्स' रिपोर्ट के अनुसार, देश के 10 प्रमुख टियर-2 शहर अब रियल एस्टेट सेक्टर के नए ग्रोथ सेंटर बन रहे हैं. इन शहरों में बेहतर कनेक्टिविटी, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और बढ़ती आर्थिक गतिविधियों ने आवासीय बाजार को नई गति दी है. यही वजह है कि अब घर खरीदारों और निवेशकों की दिलचस्पी पारंपरिक महानगरों से हटकर इन शहरों की ओर बढ़ रही है.
बड़े और प्रीमियम घरों की बढ़ी मांग
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में कुल आवासीय आपूर्ति में 2BHK और 3BHK घरों की हिस्सेदारी 75% से अधिक रही. वहीं, प्रीमियम सेगमेंट में बड़े आकार के घरों की मांग लगातार बढ़ी है. इससे साफ है कि खरीदार अब बेहतर सुविधाओं और अधिक खुले रहने के स्थान को प्राथमिकता दे रहे हैं.
₹2 करोड़ से अधिक के घरों की बढ़ी हिस्सेदारी
इंदौर, लखनऊ और सूरत जैसे शहर अब प्रीमियम हाउसिंग मार्केट के रूप में तेजी से उभर रहे हैं. इन शहरों में सक्रिय आवासीय आपूर्ति का 20% से अधिक हिस्सा 2 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत वाले घरों का है. रिपोर्ट के अनुसार, आईटी सेक्टर के विस्तार और उद्यमियों की बढ़ती आय ने इस ट्रेंड को मजबूती दी है.
इंफ्रास्ट्रक्चर और कॉर्पोरेट विस्तार से मिल रही रफ्तार
विशेषज्ञों के मुताबिक, नए एक्सप्रेसवे, क्षेत्रीय एयरपोर्ट, बेहतर सड़क नेटवर्क और मेट्रो परियोजनाओं ने टियर-2 शहरों को बड़े आर्थिक केंद्रों से जोड़ दिया है. वहीं, वर्क-फ्रॉम-होम और वर्कफोर्स के विकेंद्रीकरण के चलते कई कंपनियां इन शहरों में सैटेलाइट ऑफिस खोल रही हैं, जिससे स्थानीय रोजगार और हाउसिंग की मांग दोनों बढ़ रही हैं.
लग्जरी हाउसिंग का बढ़ रहा बाजार
पहले जहां टियर-2 शहरों का रियल एस्टेट स्थानीय डेवलपर्स तक सीमित था, वहीं अब यहां राष्ट्रीय स्तर की रियल एस्टेट कंपनियां भी तेजी से निवेश कर रही हैं. गेटेड कम्युनिटी, स्मार्ट होम, हरित क्षेत्र और प्रीमियम सुविधाओं वाले प्रोजेक्ट्स की मांग लगातार बढ़ रही है. लखनऊ और कोयंबटूर जैसे शहरों में खरीदार अब महानगरों जैसी लाइफस्टाइल की उम्मीद कर रहे हैं.
स्मार्ट सिटीज मिशन से मिली नई दिशा
स्मार्ट सिटीज मिशन ने भी इन शहरों के विकास में अहम भूमिका निभाई है. इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC), बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट, जल आपूर्ति और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी सुविधाओं ने शहरों की कार्यक्षमता में सुधार किया है. इससे इन शहरों में निवेश और रियल एस्टेट विकास की संभावनाएं और मजबूत हुई हैं.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
हीरो रियल्टी के सीईओ रोहित किशोर के अनुसार, भारत के शहरी विकास का अगला चरण टियर-2 शहरों से संचालित होगा. उनका कहना है कि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ इन शहरों में लोगों की आकांक्षाएं और प्रीमियम जीवनशैली की मांग तेजी से बढ़ रही है. खासकर लखनऊ जैसे शहर दीर्घकालिक रियल एस्टेट विकास के लिए पूरी तरह तैयार दिखाई देते हैं.
मेट्रो, एक्सप्रेसवे और एयरपोर्ट विस्तार जैसी परियोजनाएं निश्चित रूप से शहर की विकास क्षमता को मजबूत कर रही हैं, लेकिन इससे भी बड़ा बदलाव यहां के लोगों की बढ़ती आकांक्षाओं और आत्मविश्वास में दिखाई देता है. आज के खरीदार सोच-समझकर डिजाइन किए गए घर, बेहतर सुविधाएं और ऐसे समुदाय चाहते हैं, जहां अपनापन महसूस हो. आवास की मांग लगातार आपूर्ति से अधिक बनी हुई है और शहर का आर्थिक एवं सामाजिक ढांचा लगातार मजबूत हो रहा है. हमारा मानना है कि लखनऊ दीर्घकालिक विकास के लिए पूरी तरह तैयार है और यहां ऐसे समुदाय विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं, जिन पर लोग गर्व कर सकें.
देविका ग्रुप के डायरेक्टर अंकित अग्रवाल ने कहा भारत के टियर-2 शहर आज रियल एस्टेट की नई ग्रोथ स्टोरी लिख रहे हैं और वृंदावन इसका सबसे जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है. अब लोग यहां सिर्फ दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए नहीं, बल्कि स्थायी आवास और सुरक्षित लॉन्ग-टर्म निवेश के लिए भी आ रहे हैं. 'स्पिरिचुअल होमकमिंग' की बढ़ती भावना के बीच आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, विश्वस्तरीय रिहायशी परियोजनाएं, गेटेड कम्युनिटी, वेलनेस सुविधाएं और बेहतर लाइफस्टाइल वृंदावन को होमबायर्स और निवेशकों के लिए तेजी से पसंदीदा गंतव्य बना रही हैं.
सांघवी रियल्टी के प्रबंध निदेशक पक्षल सांघवी ने कहा भारत के रियल एस्टेट सेक्टर की अगली बड़ी ग्रोथ टियर-2 शहरों से आएगी. लखनऊ, नागपुर और कोयंबटूर जैसे शहर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजगार के बढ़ते अवसर, किफायती आवास और उच्च गुणवत्ता वाली जीवनशैली के कारण तेजी से उभर रहे हैं. सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी पर बढ़ता निवेश इस बदलाव को और गति दे रहा है. आने वाले वर्षों में टियर-1 शहर प्रीमियम हाउसिंग के केंद्र बने रहेंगे, जबकि टियर-2 शहर पहली बार घर खरीदने वालों, एंड-यूजर्स और बेहतर रिटर्न की तलाश करने वाले दीर्घकालिक निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक बाजार साबित होंगे.
अरीटे ग्रुप के वाइस प्रेसिडेंट (मार्केटिंग) वीरेंद्र कुमार का कहना है कि टियर-2 शहरों की ग्रोथ अब केवल किफायती आवास तक सीमित नहीं है, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित विकास और सर्विस सेक्टर में बढ़ते रोजगार से संचालित हो रही है. बेहतर कनेक्टिविटी, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और बढ़ती आर्थिक गतिविधियां ऐसे शहरी इकोसिस्टम तैयार कर रही हैं, जो आवासीय मांग को लगातार मजबूत बना रहे हैं. दक्षिण गुजरात का वापी इसका बेहतरीन उदाहरण है. दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर पर इसकी रणनीतिक स्थिति, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम, मुंबई और सूरत से सहज कनेक्टिविटी तथा तेजी से विकसित हो रहा सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर इसे कारोबार और घर खरीदारों, दोनों के लिए आकर्षक बना रहा है. साथ ही खरीदारों की पसंद भी बदल रही है. बड़े घरों, इंटीग्रेटेड टाउनशिप और प्रीमियम लाइफस्टाइल प्रोजेक्ट्स की मांग लगातार बढ़ रही है. बढ़ती आय और रोजगार के नए अवसरों के साथ वापी अब अपनी औद्योगिक पहचान से आगे बढ़कर गुजरात के सबसे संभावनाशील प्रीमियम और लग्जरी रेजिडेंशियल बाजारों में शामिल हो रहा है.
प्रॉपर्टीपिस्टल के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक आशीष नारायण अग्रवाल कहते हैं, भारत के रियल एस्टेट सेक्टर की अगली सफलता की कहानी सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि टियर-2 शहर इसकी अगुवाई करेंगे. वित्त वर्ष 2021 से 2026 के बीच इन शहरों में आवासीय मांग 14% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ी है, जबकि नागपुर, कोयंबटूर और लखनऊ जैसे शहरों में यह वृद्धि लगभग 20% रही. यह केवल अस्थायी उछाल नहीं, बल्कि बाजार में हो रहे संरचनात्मक बदलाव का संकेत है. इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, एयरपोर्ट और सर्विस सेक्टर के विस्तार से टियर-2 शहर आत्मनिर्भर शहरी इकोसिस्टम के रूप में विकसित हो रहे हैं, जहां रोजगार, बेहतर सामाजिक सुविधाएं और उच्च गुणवत्ता वाली जीवनशैली उपलब्ध है. वहीं उपभोक्ताओं की आकांक्षाएं भी तेजी से बदल रही हैं. नई आवासीय सप्लाई का 75% से अधिक हिस्सा 2 और 3 BHK घरों का है, लेकिन बड़े, प्रीमियम और लग्जरी घरों की मांग लगातार बढ़ रही है. आने वाला दशक उन्हीं शहरों का होगा, जो आर्थिक अवसरों और बेहतर जीवनशैली का संतुलित मेल पेश करेंगे, और इस बदलाव का नेतृत्व करने के लिए टियर-2 भारत पूरी तरह तैयार है.
विशेषज्ञों का मानना है कि जहां टियर-1 शहरों का रियल एस्टेट बाजार धीरे-धीरे परिपक्व हो रहा है, वहीं टियर-2 शहर अभी विकास के शुरुआती चरण में हैं. बेहतर रिटर्न की संभावना, बढ़ती आबादी, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार के नए अवसर इन्हें भविष्य के सबसे आकर्षक रियल एस्टेट बाजारों में शामिल कर रहे हैं.
कंपनी के मुताबिक, कुल मांग का 65% हिस्सा टियर-2 और उससे छोटे शहरों से आया, जबकि 25% ऑर्डर Flipkart Minutes के जरिए पूरे किए गए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में हेल्दी, प्रीमियम और मॉडर्न फूड प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग का सबसे बड़ा फायदा फ्लिपकार्ट (Flipkart) को मिला है. कंपनी के अनुसार, उसकी फूड एंड न्यूट्रिशन कैटेगरी में सालाना आधार पर 50% की वृद्धि दर्ज की गई है. इस ग्रोथ में Gen Z उपभोक्ताओं, टियर-2 और उससे छोटे शहरों की बढ़ती हिस्सेदारी तथा क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म Flipkart Minutes की अहम भूमिका रही है.
हेल्दी और प्रीमियम फूड की ओर बढ़ रहा है ग्राहकों का रुझान
फ्लिपकार्ट ने बताया कि उसके फूड एंड न्यूट्रिशन कारोबार में सालाना आधार पर 50% की वृद्धि हुई है. इस तेजी में धुलिया, इंफाल, धारवाड़, उज्जैन, हुबली, मीरगंज और लहरपुर जैसे टियर-2 और छोटे शहरों के ग्राहकों का बड़ा योगदान रहा. कंपनी के मुताबिक, कुल मांग का 65% हिस्सा टियर-2 और उससे छोटे शहरों से आया, जबकि 25% ऑर्डर Flipkart Minutes के जरिए पूरे किए गए.
Gen Z बना सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन
रिपोर्ट के अनुसार, इस कैटेगरी की कुल सालाना वृद्धि में लगभग 60% योगदान Gen Z उपभोक्ताओं का रहा. सोशल मीडिया, फूड क्रिएटर्स और वेलनेस ट्रेंड्स से प्रभावित युवा प्रोटीन ओट्स, हाई-प्रोटीन पीनट बटर, प्रोटीन म्यूसली, गॉरमे चॉकलेट और कोरियन फ्लेवर वाले स्नैक्स जैसे प्रोडक्ट्स तेजी से खरीद रहे हैं. इन प्रोडक्ट्स की मांग खासकर बेंगलुरु और नई दिल्ली जैसे बड़े शहरों में अधिक देखी गई.
महिलाओं और पुरुषों की खरीदारी में भी बदला ट्रेंड
कंपनी के मुताबिक, पुरुष ग्राहकों में नट्स, ड्राई फ्रूट्स, चॉकलेट और जैम-एंड-स्प्रेड्स की मांग बढ़ी है. वहीं महिला ग्राहक वैल्यू-एडेड चाय, कॉफी और खाने योग्य बीज (Edible Seeds) को प्राथमिकता दे रही हैं. इससे फंक्शनल न्यूट्रिशन और प्रीमियम स्नैकिंग सेगमेंट को बढ़ावा मिला है.
छोटे शहरों में बढ़ी वेलनेस प्रोडक्ट्स की मांग
फ्लिपकार्ट के अनुसार, टियर-2 और टियर-3 शहरों के ग्राहक अब कोल्ड-प्रेस्ड ऑयल, ऑलिव ऑयल, प्रोटीन ओट्स, प्रोटीन म्यूसली, प्रीमियम ड्राई फ्रूट्स, ऑथेंटिक घी और खजूर (Dates) जैसे हेल्दी प्रोडक्ट्स तेजी से खरीद रहे हैं. पिछले एक साल में इन प्रोडक्ट्स की ऑनलाइन सर्च करीब 80% बढ़ी है, जो छोटे शहरों में बदलती लाइफस्टाइल और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता को दर्शाती है.
Flipkart Minutes की बढ़ती भूमिका
कंपनी ने बताया कि उसकी क्विक कॉमर्स सेवा Flipkart Minutes अब फूड एंड न्यूट्रिशन कैटेगरी की कुल मांग का 25% पूरा कर रही है. इससे स्पष्ट है कि उपभोक्ता अब तेजी से डिलीवरी और सुविधा को भी प्राथमिकता दे रहे हैं.
फूड फेस्ट 3.0 में दिखी फूड कॉमर्स की नई तस्वीर
फ्लिपकार्ट ने अपने तीसरे Food Fest का भी आयोजन किया, जिसमें 50 से अधिक प्रमुख फूड एवं बेवरेज ब्रांड, 1,000 से ज्यादा क्रिएटर्स और कई सेलिब्रिटी शेफ व कलाकार शामिल हुए. इस दो दिवसीय कार्यक्रम में 10 से अधिक नए प्रोडक्ट लॉन्च किए गए और चोकोलैंड, ब्रेकफास्ट, बेवरेज तथा किचन स्टेपल्स जैसे थीम आधारित अनुभव तैयार किए गए.
फ्लिपकार्ट के वाइस प्रेसिडेंट (कंज्यूमेबल्स) निशांत दलाल ने कहा कि भारत में भोजन अब केवल जरूरत नहीं, बल्कि वेलनेस, पहचान और नई चीजों को आजमाने का माध्यम बनता जा रहा है. उनके अनुसार, डिजिटल कॉमर्स ने देशभर के उपभोक्ताओं तक बेहतर और आधुनिक फूड विकल्प पहुंचाना आसान बना दिया है, जबकि छोटे-बड़े ब्रांडों को भी तेजी से बढ़ने का अवसर मिल रहा है.