प्रस्ताव में कहा गया है कि Rs 1,500 से Rs 10,000 के कपड़ों पर ज्यादा GST लगेगा और Rs 10,000 से ऊपर के कपड़ों पर 28% कर लगेगा, जिससे उद्योग में चिंता बढ़ गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अगुवाई वाले रेट रेशनलाइजेशन पर मंत्रियों के समूह (GoM) ने वस्त्र उद्योग के लिए जीएसटी (GST) ढांचे में बड़े बदलाव का प्रस्ताव दिया है. 2 दिसंबर 2024 को घोषित इन सिफारिशों के मुताबिक, 1,500 रुपये से 10,000 रुपये तक के कपड़ों पर जीएसटी दर बढ़ाकर 18% और 10,000 रुपये से ऊपर के कपड़ों पर 28% कर दिया जाएगा. इस कदम से उद्योग में उत्पादन, कीमत और ग्राहक मांग पर बुरा असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है.
वस्त्र उद्योग पर पड़ेगा प्रभाव
नए प्रस्तावों के तहत, Rs 1,500 तक के तैयार वस्त्रों पर 5 प्रतिशत GST लगेगा, लेकिन Rs 1,500 से Rs 10,000 तक के वस्त्रों पर 18 प्रतिशत GST लगेगा, और Rs 10,000 से ऊपर के वस्त्रों पर 28 प्रतिशत GST लगेगा. इस बदलाव के कारण, भारतीय वस्त्र उद्योग की वाणिज्यिक स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है. क्लोथिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CMAI) ने इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है. उनका कहना है कि इससे फॉर्मल रिटेल में दिक्कतें आएंगी, नौकरियां जा सकती हैं और उद्योग की वित्तीय स्थिति पर बुरा असर पड़ेगा.
25 प्रतिशत आय की हो सकती है कमी
यह प्रस्ताव उपभोक्ताओं और व्यवसायों को अनौपचारिक बाजारों की ओर धकेल सकता है, जिससे कानूनी व्यापारियों का राजस्व कम हो सकता है और अवैध विक्रेताओं को फायदा हो सकता है. वस्त्र उद्योग पहले ही आर्थिक दबाव में है और छोटे व मझोले उद्योगों को इससे गंभीर नुकसान हो सकता है. भारत के हैंडलूम क्षेत्र में भी 25 प्रतिशत आय की कमी हो सकती है, जो 2 मिलियन कातने वालों को प्रभावित करेगा. ऊन उद्योग, जो 1.2 मिलियन कर्मचारियों को सहारा देता है, उसे भी भारी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है.
GST बढ़ने से बढ़ सकती हैं कपड़ों की कीमतें
GST दर बढ़ने से कपड़ों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे खासकर महिलाएं और कीमतों को लेकर संवेदनशील उपभोक्ता प्रभावित हो सकते हैं. इससे कपड़ों की खपत और कम हो सकती है. शादी जैसे खास मौकों के कपड़ों पर अधिक टैक्स से लोगों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है, खासकर जब उनकी बचत पहले से कम हो. क्लोथिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CMAI) का कहना है कि सरकार भले ही टैक्स से राजस्व बढ़ाना चाहती है, लेकिन ये बदलाव उद्योग में औपचारिकता (Formalisation) को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इससे उद्योग के नियमों का पालन कम होगा और टैक्स कलेक्शन भी घट सकता है.
CMAI के अधिकारियों ने क्या कहा?
CMAI के अध्यक्ष संतोष कटारिया ने चिंता जताई कि ये बदलाव वस्त्र उद्योग को अस्थिर कर देंगे. उद्योग पहले ही ग्राहकों की घटती मांग और पूंजी की कमी से जूझ रहा है. उन्होंने बताया कि पहले की 5% समान GST दर से उद्योग को स्थिरता मिली थी और यह पूरे सप्लाई चेन में रुकावटें कम करने में मददगार थी. वहीं CMAI के चीफ मेंटर राहुल मेहता ने भी इन प्रस्तावों की आलोचना की. उनका कहना है कि कपड़ा उद्योग को बिक्री बढ़ाने के लिए सहायक नीतियों की जरूरत है, न कि टैक्स का अतिरिक्त बोझ. उन्होंने जोर दिया कि इस उद्योग का आर्थिक योगदान बहुत अहम है और सरकार को नीतियां बनाने से पहले सभी पक्षों से चर्चा करनी चाहिए ताकि बदलाव उद्योग के लिए फायदेमंद हों और मौजूदा समस्याएं न बढ़ें.
CMAI ने सरकार से किया ये अनुरोध
CMAI ने सरकार से अनुरोध किया है कि प्रस्तावित कर वृद्धि पर दोबारा विचार करें, क्योंकि उनका मानना है कि वर्तमान GST संरचना स्थिरता प्रदान करती है, नौकरियों को सुरक्षित रखती है और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देती है. एसोसिएशन ने यह भी बताया कि कर दरों में असमानता है. उदाहरण के लिए, Rs 10,000 के कपड़े पर 28% कर लगाया जा रहा है, जबकि Rs 1.5 लाख के मोबाइल फोन पर केवल 18% कर है. CMAI ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की मांग की है, जो कपड़ा उद्योग में दीर्घकालिक स्थिरता और विकास को प्रोत्साहित करे. इन बदलावों पर सरकार का फैसला भारत के कपड़ा उद्योग के भविष्य पर बड़ा असर डाल सकता है. यह उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लाखों लोगों को रोजगार देता है और देश के GDP में योगदान करता है.
इस सप्ताह नया इश्यू लाने वाली एकमात्र कंपनी R K Fashion Accessories है. कोलकाता स्थित यह कंपनी नकली आभूषणों के वितरण का कारोबार करती है. कंपनी आईपीओ के जरिए 34.99 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के प्राथमिक बाजार में इस सप्ताह गतिविधियां अपेक्षाकृत धीमी रहने वाली हैं. 5 अक्टूबर से शुरू हो रहे सप्ताह में सिर्फ एक नया आईपीओ खुलने जा रहा है, जबकि 29 कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध होंगी. खास बात यह है कि इस सप्ताह एक भी नया मेनबोर्ड आईपीओ बाजार में नहीं आएगा.
R K Fashion Accessories खोलेगी आईपीओ
इस सप्ताह नया इश्यू लाने वाली एकमात्र कंपनी R K Fashion Accessories है. कोलकाता स्थित यह कंपनी नकली आभूषणों के वितरण का कारोबार करती है. कंपनी आईपीओ के जरिए 34.99 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है. इसके तहत 42.67 लाख नए शेयर जारी किए जाएंगे. आईपीओ के लिए मूल्य दायरा 77 से 82 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है.
9 महीने में 1.21 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जुटे
2026 के पहले नौ महीनों में भारतीय प्राथमिक बाजार में आईपीओ गतिविधियां काफी मजबूत रही हैं. जनवरी से सितंबर के बीच 275 कंपनियों ने आईपीओ के जरिए 1.21 लाख करोड़ रुपये से अधिक जुटाए हैं. इनमें 96 मेनबोर्ड कंपनियां शामिल हैं, जिन्होंने करीब 1.13 लाख करोड़ रुपये जुटाए. अकेले अगस्त और सितंबर में कंपनियों ने आईपीओ के जरिए 65,175 करोड़ रुपये जुटाए हैं.
इस साल अब तक बड़े आईपीओ में National Stock Exchange of India का 22,563 करोड़ रुपये का आईपीओ सबसे बड़ा रहा. इसके अलावा SBI Funds Management ने 9,795 करोड़ रुपये, Manipal Health Enterprises ने 9,275 करोड़ रुपये, Indo-MIM ने 3,812 करोड़ रुपये, Clean Max Enviro Energy Solutions ने 3,080 करोड़ रुपये और Dhoot Transmission ने 3,067 करोड़ रुपये जुटाए.
इस सप्ताह 10 आईपीओ होंगे बंद
सप्ताह के शुरुआती दो दिनों में पहले से खुले 10 आईपीओ बंद होंगे. मेनबोर्ड सेगमेंट में Vishal Nirmiti और Nityas Gems & Jewellery के आईपीओ 5 अक्टूबर को बंद होंगे. वहीं, एसएमई सेगमेंट में Dove Soft, EverestIMS Technologies, Omara Ventures India, Eventions, SJP Ultrasonics और Sollfege Smart Electronics के आईपीओ 5 अक्टूबर को बंद होंगे. Acme India Industries, Paramount Syntex और TNA Solutions के आईपीओ 6 अक्टूबर को बंद होंगे.
29 कंपनियों की होगी शेयर बाजार में एंट्री
इस सप्ताह कुल 29 कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध होंगी. इनमें 8 मेनबोर्ड और 21 एसएमई कंपनियां शामिल हैं. 5 अक्टूबर को Orient Cables India, Runwal Enterprises, Acevector और German Green Steel & Power के शेयर BSE और NSE पर सूचीबद्ध होंगे. इसके बाद 6 अक्टूबर को Shah Investor's Home और SRIT India की लिस्टिंग होगी. Vishal Nirmiti और Nityas Gems & Jewellery के शेयर 8 अक्टूबर को बाजार में सूचीबद्ध होंगे.
एसएमई सेगमेंट में Himalayan Solar और Bench Mark Infotech Services के शेयर 5 अक्टूबर को NSE Emerge पर सूचीबद्ध होंगे. वहीं Sai Urja Indo Ventures और Dudani Retail की लिस्टिंग BSE SME पर होगी.
6 अक्टूबर को Acme Universal Safezone 9, Pind Hospitality और Shivchem Agro की लिस्टिंग प्रस्तावित है. 7 अक्टूबर को Green Asia Impex, Papadmalji Agro Foods, Black Opal Consultants और Vans Electroengineerings बाजार में दस्तक देंगी.
8 अक्टूबर को 8 एसएमई कंपनियों की लिस्टिंग होगी, जबकि Acme India Industries, Paramount Syntex और TNA Solutions के शेयर 9 अक्टूबर को सूचीबद्ध होने की उम्मीद है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
एवरेस्ट को वापस मंगाए गए उत्पाद का पूरा रिकॉर्ड रखने और तय समय-सीमा के भीतर जरूरी जानकारी तथा स्टेटस रिपोर्ट जमा करने को कहा गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने एवरेस्ट के पैक्ड जीरा पाउडर के एक बैच को बाजार से तुरंत वापस मंगाने का आदेश दिया है. रेगुलेटरी जांच में इस उत्पाद में एजोक्सीस्ट्रोबिन और थियामेथोक्सम नामक कीटनाशकों के अंश तय अधिकतम सीमा से ज्यादा पाए गए, जिसके बाद सैंपल को 'असुरक्षित' घोषित किया गया. इसके अलावा, FSSAI ने खाद्य सुरक्षा और साफ-सफाई से जुड़े गंभीर उल्लंघनों के चलते 'क्रिएटिव बेकर्स एंड कन्फेक्शनर्स प्राइवेट लिमिटेड' का लाइसेंस भी तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है.
जीरा पाउडर के सैंपल में मिले कीटनाशक
FSSAI के मुताबिक, गोवा में M/s रिवरसाइड रिसॉर्ट्स एंड हॉलिडे होम्स प्राइवेट लिमिटेड के परिसर से एवरेस्ट के पहले से पैक किए गए जीरा पाउडर का रेगुलेटरी सैंपल लिया गया था. फूड एनालिस्ट की जांच में एजोक्सीस्ट्रोबिन और थियामेथोक्सम के अंश तय अधिकतम अवशेष सीमा से अधिक पाए गए. इसके बाद फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के तहत सैंपल को 'असुरक्षित' घोषित किया गया.
एवरेस्ट को इस रिपोर्ट के खिलाफ अपील का मौका दिया गया, जिसके बाद सैंपल को रेफरल फूड लेबोरेटरी भेजा गया. FSSAI के अनुसार, रेफरल लेबोरेटरी ने भी सैंपल को असुरक्षित पाया और कीटनाशकों की मात्रा तय सीमा से अधिक होने की पुष्टि की.
पूरे बैच को वापस मंगाने का निर्देश
रेफरल लेबोरेटरी की रिपोर्ट के बाद FSSAI ने संबंधित जीरा पाउडर के पूरे बैच को तुरंत बाजार से वापस मंगाने का निर्देश दिया. एवरेस्ट को वापस मंगाए गए उत्पाद का पूरा रिकॉर्ड रखने और तय समय-सीमा के भीतर जरूरी जानकारी तथा स्टेटस रिपोर्ट जमा करने को कहा गया है. रेगुलेटर ने कंपनी को भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए सुधारात्मक कदम उठाने और रिकॉल प्रक्रिया पूरी होने के बाद रिपोर्ट जमा करने का भी निर्देश दिया है.
क्रिएटिव बेकर्स का लाइसेंस भी निलंबित
एक अलग कार्रवाई में FSSAI ने 'क्रिएटिव बेकर्स एंड कन्फेक्शनर्स प्राइवेट लिमिटेड' का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया. यह कंपनी पूर्वी भारत में 'द शुगर एंड स्पाइस' नाम से रिटेल चेन चलाती है. निरीक्षण के दौरान खाद्य पदार्थ बनाने और संभालने वाली जगहों पर साफ-सफाई और हाइजीन से जुड़ी गंभीर कमियां पाई गईं.
रेगुलेटर के मुताबिक, परिसर में गंदगी, ग्रीस, धूल, मकड़ी के जाले और मक्खियां पाई गईं. खराब होने वाले कच्चे माल को खुले में रखा गया था, जबकि कच्चे और अर्ध-तैयार उत्पादों के लिए जंग लगे तथा ठीक से साफ नहीं किए गए कंटेनरों का इस्तेमाल किया जा रहा था.
कीड़े-मकौड़ों से बचाव के इंतजाम भी अपर्याप्त
FSSAI के निरीक्षण में कीड़े-मकौड़ों का काफी प्रकोप और उन्हें रोकने के अपर्याप्त इंतजाम भी सामने आए. इनमें मक्खियों को रोकने के प्रभावी उपायों की कमी, चूहों से बचाव के उचित इंतजाम नहीं होना और खिड़कियों तथा खुले स्थानों पर कीटरोधी जालियों का अभाव शामिल था.
इसके अलावा, खाद्य पदार्थ संभालने वाले क्षेत्रों में कचरा, पुराना स्टॉक, रिजेक्टेड लॉट और कबाड़ जमा पाया गया. परिसर में जंग लगे उपकरण, उखड़ता पेंट, सीलन और टूटी हुई फर्श की टाइलें भी मिलीं.
जरूरी खाद्य सुरक्षा रिकॉर्ड नहीं मिले
FSSAI ने कहा कि कंपनी की ओर से पानी और तैयार उत्पादों की टेस्टिंग, समय-तापमान की निगरानी, उपकरणों का कैलिब्रेशन, प्रिवेंटिव मेंटेनेंस, मॉक रिकॉल, ग्राहकों की शिकायतों, छानने और ऑडिट से जुड़े जरूरी रिकॉर्ड और सिस्टम भी उचित तरीके से बनाए नहीं गए थे. लाइसेंस निलंबित किए जाने के बाद कंपनी को निलंबन की अवधि के दौरान खाद्य कारोबार से जुड़ी सभी गतिविधियां बंद करने का निर्देश दिया गया है.
बीते कारोबारी सत्र यानी 1 अक्टूबर को सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79 फीसदी गिरकर 71,909.70 पर और निफ्टी 198.50 अंक यानी 0.88 फीसदी टूटकर 22,421.95 पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 5 अक्टूबर को सकारात्मक शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी करीब 130 अंक की बढ़त के साथ 22,650 के पार कारोबार कर रहा है. एशियाई बाजारों में भी जोरदार तेजी है, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में ऊपरी स्तरों से नरमी से घरेलू बाजार को कुछ राहत मिल सकती है. हालांकि, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बाजार की तेजी को सीमित कर सकती है. इससे पहले 1 अक्टूबर को सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79 फीसदी गिरकर 71,909.70 पर और निफ्टी 198.50 अंक यानी 0.88 फीसदी टूटकर 22,421.95 पर बंद हुआ था.
गिफ्ट निफ्टी से सकारात्मक संकेत
सोमवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में करीब 130 अंकों की तेजी रही और यह 22,650 के पार कारोबार करता दिखा. इससे घरेलू बाजार में खरीदारी के साथ शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. बाजार की नजर अब वैश्विक संकेतों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और आगामी आर्थिक घटनाक्रम पर रहेगी.
एशियाई बाजारों में तेजी
अमेरिका के कमजोर रोजगार आंकड़ों के बाद एशियाई बाजारों में सोमवार को तेजी देखने को मिल रही है. कमजोर रोजगार आंकड़ों से अमेरिकी फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी का दबाव कुछ कम होने की उम्मीद है. MSCI एशिया पेसिफिक इंडेक्स करीब आधे फीसदी ऊपर है, जबकि जापान का निक्केई करीब 2.5 फीसदी चढ़ा है. दक्षिण कोरिया का बाजार नेशनल फाउंडेशन डे की छुट्टी के कारण बंद है.
कच्चे तेल में नरमी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में ऊपरी स्तरों से नरमी आई है. ब्रेंट क्रूड करीब आधे फीसदी की गिरावट के साथ 101 डॉलर प्रति बैरल के आसपास और WTI क्रूड करीब 90 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है. कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए सकारात्मक मानी जाती है, क्योंकि इससे आयात लागत और महंगाई के दबाव को कुछ राहत मिल सकती है.
RBI MPC बैठक पर नजर
निवेशकों की नजर आज से शुरू हो रही RBI की मौद्रिक नीति समिति यानी MPC की बैठक पर भी रहेगी. बैठक 7 अक्टूबर को खत्म होगी. ब्याज दरों पर RBI के फैसले और उसके रुख से बाजार की दिशा प्रभावित हो सकती है.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार को भारत कोकिंग कोल, DLF, HDFC Bank, अरबिंदो फार्मा, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज, बजाज फाइनेंस, TCS, यस बैंक और हिंदुस्तान जिंक समेत कई शेयर चर्चा में रहेंगे. भारत कोकिंग कोल को झारखंड सरकार की ओर से 3,816.83 करोड़ रुपये की कथित बकाया राशि की वसूली से जुड़ा नोटिस मिला है. DLF की गुरुग्राम स्थित लग्जरी आवासीय परियोजना 'द ऑरेवा' की सभी इकाइयां करीब 1,985 करोड़ रुपये की बिक्री के साथ बिक चुकी हैं. HDFC Bank को अनुप बागची को तीन साल के लिए प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी नियुक्त करने की RBI से मंजूरी मिली है. बजाज फाइनेंस के बोर्ड ने शेयर जारी करने और परिवर्तनीय वारंट के जरिए कुल 17,500 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी दी है. TCS ने Best Buy के साथ समझौता किया है, जिसके तहत भारत में Best Buy का ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर TCS को हस्तांतरित किया जाएगा. अरबिंदो फार्मा को अमेरिका में पेराम्पैनल दवा के निर्माण और बिक्री के लिए FDA की अंतिम मंजूरी मिली है. हिंडाल्को इंडस्ट्रीज और अलुकेम ने प्रस्तावित अधिग्रहण का समझौता आपसी सहमति से समाप्त कर दिया है. वहीं, नैक पैकेजिंग को 150 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है, जबकि रेल विकास निगम का ईस्ट कोस्ट रेलवे से मिला ऑर्डर रद्द हो गया है. यस बैंक के ऋण और अग्रिम सालाना आधार पर 24 फीसदी बढ़कर 3.1 लाख करोड़ रुपये हो गए हैं. हिंदुस्तान जिंक का खनन से प्राप्त धातु उत्पादन 5 फीसदी बढ़कर 2.71 लाख टन और बिक्री योग्य धातु उत्पादन 7 फीसदी बढ़कर 2.64 लाख टन रहा.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
बैंकों ने कोर्ट को यह भी बताया कि मामले में अटैच की गई कुछ शेयर होल्डिंग्स अभी भी बरकरार हैं और उनकी बिक्री नहीं हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विजय माल्या से जुड़े बैंक लोन मामले में SBI की अगुवाई वाले बैंकों के कंसोर्टियम ने बॉम्बे हाई कोर्ट में रिकवरी को लेकर बड़ा अपडेट दिया है. बैंकों के मुताबिक, 31 अगस्त 2026 तक विजय माल्या से करीब ₹8,751.86 करोड़ की रकम अभी वसूल की जानी बाकी है. यह राशि कानूनी और अन्य खर्चों को शामिल किए बिना बताई गई है.
बैंकों ने कोर्ट को बताया कि डेट रिकवरी ऑफिसर (DRO) की प्रक्रिया के जरिए अब तक करीब ₹10,270 करोड़ की राशि अस्थायी रूप से रिकवर की जा चुकी है. इसके अलावा मुकदमा दायर होने से पहले ₹544.58 करोड़ की रिकवरी हुई थी. हालांकि, बैंकों का कहना है कि इन रिकवरी आंकड़ों को बाकी बकाया राशि से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
जनवरी में ₹8,135 करोड़ था बकाया
SBI-led कंसोर्टियम की ओर से दाखिल हलफनामे के अनुसार, जनवरी 2026 में विजय माल्या पर करीब ₹8,135.63 करोड़ की देनदारी बकाया बताई गई थी. इसके बाद ब्याज और अन्य देनदारियों के जुड़ने से 31 अगस्त 2026 तक यह रकम बढ़कर ₹8,751.86 करोड़ हो गई. इससे साफ है कि बैंकों की ओर से अब तक हजारों करोड़ रुपये की रिकवरी किए जाने के बावजूद मामले में पूरी देनदारी की वसूली अभी बाकी है.
माल्या ने बैंकों की रिकवरी पर उठाया था सवाल
विजय माल्या ने 2020 में बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया था और अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों को खत्म करने की मांग की थी. उन्होंने दावा किया था कि बैंकों ने उनकी देनदारी से अधिक रकम रिकवर कर ली है और बैंकिंग विवाद का निपटारा हो चुका है. हालांकि, बैंकों ने अपने ताजा हलफनामे में इस दावे का विरोध किया है. उनका कहना है कि माल्या से अभी भी बड़ी रकम की वसूली बाकी है.
कुछ अटैच शेयरों की बिक्री अभी बाकी
बैंकों ने कोर्ट को यह भी बताया कि मामले में अटैच की गई कुछ शेयर होल्डिंग्स अभी भी बरकरार हैं और उनकी बिक्री नहीं हुई है. इसका मतलब है कि रिकवरी की प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और अटैच संपत्तियों से आगे भी वसूली की प्रक्रिया जारी रह सकती है.
ED ने ₹14,131 करोड़ की संपत्तियों का दिया जिक्र
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोर्ट में अलग से बताया कि करीब ₹14,131.6 करोड़ की चल और अचल संपत्तियां SBI-led कंसोर्टियम को लौटाई गई हैं. हालांकि, ED ने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक की देनदारी की रिकवरी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े आपराधिक मामलों को अलग-अलग आधार पर देखा जाना चाहिए. यानी बैंकों की ओर से कर्ज की वसूली और आपराधिक मामलों की कानूनी स्थिति एक-दूसरे से अलग मुद्दे हैं. विजय माल्या से जुड़े इस मामले में बैंकों की रिकवरी प्रक्रिया और कोर्ट में चल रही कानूनी कार्यवाही दोनों जारी हैं.
आंध्र प्रदेश सरकार के मुताबिक, हॉर्टिकल्चर हब को तीन चरणों में विकसित किया जाएगा. तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार परियोजना के लिए ₹40,352 करोड़ का योगदान देगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में शुक्रवार को मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ₹1 लाख करोड़ की अनुमानित लागत वाले ग्लोबल हॉर्टिकल्चर हब की आधारशिला रखी. इसके साथ ही इंडियन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर (ISA) की भी नींव रखी गई. यह संस्थान कृषि क्षेत्र में तकनीक, रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देने पर केंद्रित होगा. परियोजना के तहत 10 जिलों के 5,869 गांवों को 201 क्लस्टर के जरिए जोड़ा जाएगा.
सरकार देगी ₹40,352 करोड़, निजी निवेश जुटाने की योजना
आंध्र प्रदेश सरकार के मुताबिक, हॉर्टिकल्चर हब को तीन चरणों में विकसित किया जाएगा. तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार परियोजना के लिए ₹40,352 करोड़ का योगदान देगी. इसके अलावा करीब ₹60,000 करोड़ का निजी निवेश जुटाने का लक्ष्य रखा गया है.
यह परियोजना अनंतपुर, अन्नामय्या, चित्तूर, कुरनूल, नंद्याल, श्री सत्य साईं, तिरुपति, कडप्पा, प्रकाशम और मार्कापुरम जिलों में लागू की जाएगी. इन 10 जिलों में 303 मंडलों और 5,869 गांवों को परियोजना के दायरे में शामिल किया गया है.
6 लाख हेक्टेयर बढ़ाया जाएगा खेती का क्षेत्र
सरकार मौजूदा 8.41 लाख हेक्टेयर के हॉर्टिकल्चर यानी बागवानी क्षेत्र को 6 लाख हेक्टेयर और बढ़ाने की योजना बना रही है. इसके बाद परियोजना के तहत कुल 14.41 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बागवानी खेती को कवर करने का लक्ष्य है.
परियोजना के जरिए बागवानी उत्पादन को मौजूदा 222 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 435 लाख मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रखा गया है. सरकारी जानकारी के अनुसार, इससे 10 जिलों के करीब 9.6 लाख किसानों को सीधे लाभ मिलने की उम्मीद है.
कृषि में AI और आधुनिक तकनीक पर जोर
इंडियन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर को इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस की तर्ज पर विकसित करने की योजना है. इसका उद्देश्य आधुनिक तकनीक, रिसर्च और इनोवेशन के जरिए कृषि क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देना है. रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने राज्य सरकार के साथ मिलकर इस संस्थान की स्थापना और संचालन में सहयोग करने की पेशकश की है.
ISA किसानों को तकनीक आधारित मार्गदर्शन देने के साथ कृषि क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों के समाधान विकसित करने पर काम करेगा. इसके तहत डिजिटल एग्रीकल्चर, प्रिसीजन फार्मिंग, फसल निगरानी, स्मार्ट सिंचाई और मार्केट इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों पर फोकस किया जाएगा.
कृषि मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की कोशिश
हॉर्टिकल्चर हब का उद्देश्य केवल खेती का रकबा और उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि कृषि से जुड़ी पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना भी है. इसके तहत उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग, मार्केटिंग और निर्यात से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने पर जोर दिया जाएगा.
सरकार का लक्ष्य रायालसीमा क्षेत्र में बागवानी उत्पादन को तकनीक से जोड़कर किसानों की बाजार तक पहुंच बेहतर करना और कृषि उत्पादों की वैल्यू बढ़ाना है. परियोजना के तीन चरणों में लागू होने से इसके तहत आने वाले गांवों और किसानों को चरणबद्ध तरीके से जोड़े जाने की योजना है.
कंपनी के मुताबिक, इस पहल का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के साथ किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए नए आर्थिक अवसर पैदा करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) आंध्र प्रदेश में कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट स्थापित करने के लिए ₹1 लाख करोड़ के निवेश की योजना बना रही है. कंपनी के कार्यकारी निदेशक अनंत एम. अंबानी ने इस निवेश की घोषणा की. प्रस्तावित परियोजनाओं से 3 लाख से अधिक रोजगार पैदा होने और आने वाले दशकों में राज्य के लिए करीब ₹60,000 करोड़ का राजस्व उत्पन्न होने का अनुमान है. कंपनी के मुताबिक, इस पहल का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के साथ किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए नए आर्थिक अवसर पैदा करना है.
कृषि कचरे से बनेगी कंप्रेस्ड बायोगैस
अनंत अंबानी ने 2 अक्टूबर को मदनपल्ले में रायालसीमा हॉर्टिकल्चर हब और इंडियन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर (ISA) के शिलान्यास कार्यक्रम में निवेश की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित सीबीजी प्लांट कृषि अवशेष, पशुओं के गोबर, खाद्य कचरे और अन्य जैविक सामग्री से मीथेन युक्त गैस तैयार करेंगे.
सीबीजी का इस्तेमाल पारंपरिक प्राकृतिक गैस के विकल्प के तौर पर किया जा सकता है. इन परियोजनाओं से कृषि कचरे के उपयोग, ग्रामीण रोजगार और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के लिए नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है.
अंबानी ने कहा कि देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले किसान अब ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में भी योगदान दे सकते हैं. उनके मुताबिक, इससे भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सकता है.
रायालसीमा में बढ़ेगा रिलायंस का क्लीन एनर्जी फोकस
प्रस्तावित निवेश आंध्र प्रदेश में रिलायंस की व्यापक स्वच्छ ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है. कंपनी रायालसीमा क्षेत्र में क्लीन एनर्जी के साथ एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग के अवसरों पर भी काम कर रही है.
अनंत अंबानी के अनुसार, जून 2024 से आंध्र प्रदेश सरकार ने 388 मेगा प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है. इन परियोजनाओं में ₹14 लाख करोड़ से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता और करीब 11 लाख रोजगार पैदा होने की संभावना है. राज्य सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इनमें से करीब एक-तिहाई निवेश रायालसीमा क्षेत्र में आने की उम्मीद है.
यह घोषणा रिलायंस की अप्रैल 2025 में की गई योजना के बाद आई है. उस समय कंपनी ने आंध्र प्रदेश में 500 सीबीजी प्लांट स्थापित करने के लिए ₹65,000 करोड़ के निवेश की घोषणा की थी. हालांकि, नए ₹1 लाख करोड़ के प्रस्ताव का पहले की योजना से सटीक संबंध और दोनों योजनाओं की अलग-अलग समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं की गई है.
खेती में AI और आधुनिक तकनीक पर भी जोर
रिलायंस इंडियन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर को रणनीतिक निवेश, डिजिटल क्षमताओं, तकनीकी विशेषज्ञता और इंडस्ट्री पार्टनरशिप के जरिए सहयोग देने की योजना बना रही है.
प्रस्तावित संस्थान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक कृषि तकनीकों को पारंपरिक खेती के ज्ञान के साथ जोड़ा जाएगा. इसके प्रमुख क्षेत्रों में कीटों की भविष्यवाणी, ड्रोन से फसल की निगरानी, प्रिसीजन इरिगेशन, रोबोटिक्स और फसलों की कीमतों से जुड़ी जानकारी शामिल होगी.
अंबानी ने कहा कि जियो गांवों में वर्चुअल क्लासरूम के जरिए भारतीय भाषाओं में किसानों के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने के लिए संस्थान के साथ सहयोग करेगा. इसके अलावा ग्रामीण युवाओं को डिजिटल तकनीक से लैस कृषि विस्तार कार्यकर्ताओं के रूप में प्रशिक्षित करने की भी योजना है.
₹40,000 करोड़ के हॉर्टिकल्चर हब का प्रस्ताव
रायालसीमा हॉर्टिकल्चर हब को क्षेत्र में तकनीक आधारित कृषि को बढ़ावा देने और कृषि मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है. अनंत अंबानी के मुताबिक, इस हब के लिए ₹40,000 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव है.
वहीं, व्यापक सरकारी परियोजना को ₹1 लाख करोड़ की पहल के तौर पर बताया गया है, जिसमें ₹40,000 करोड़ की केंद्रीय सहायता और ₹60,000 करोड़ का निजी निवेश शामिल है. परियोजना का उद्देश्य बागवानी खेती का विस्तार, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और रायालसीमा की निर्यात क्षमता को मजबूत करना है.
अंबानी ने कार्यक्रम में कहा कि इन पहलों का उद्देश्य ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा देना, गांवों को मजबूत करना, टिकाऊ विकास को आगे बढ़ाना और किसानों की आय तथा जीवन स्तर में सुधार के लिए नए अवसर तैयार करना है.
प्रस्तावित निवेश ऐसे समय में आया है जब आंध्र प्रदेश बड़े औद्योगिक निवेश आकर्षित करने, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और कृषि क्षेत्र को आधुनिक बनाने पर जोर दे रहा है. हालांकि, ₹1 लाख करोड़ के निवेश, रोजगार और राजस्व से जुड़े अनुमानों का वास्तविक असर परियोजनाओं के क्रियान्वयन, पूंजी निवेश और इनके पूरा होने के बाद मिलने वाले परिणामों पर निर्भर करेगा.
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत एक बड़ा बाजार और उत्पादक देश है, जो अपनी घरेलू जरूरतों के साथ वैश्विक मांग को पूरा करने में भी योगदान देता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने G20 के वाणिज्य एवं व्यापार मंत्रियों की बैठक में कुछ भारतीय सेक्टरों में कथित ‘ओवरकैपेसिटी’ को लेकर उठाई गई चिंताओं को खारिज किया है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत एक बड़ा बाजार और उत्पादक देश है, जो अपनी घरेलू जरूरतों के साथ वैश्विक मांग को पूरा करने में भी योगदान देता है. उन्होंने कहा कि उत्पादन और सप्लाई चेन का विस्तार जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों से बाहर जाकर कदम नहीं उठाए जाने चाहिए.
अमेरिका ने G20 में उठाया था ओवरकैपेसिटी का मुद्दा
यह मुद्दा अमेरिका की अगुवाई में G20 बैठक के दौरान उठाया गया. अमेरिका की ओर से चिंता जताई गई कि कुछ देशों में स्टील, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल और केमिकल जैसे क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता वैश्विक बाजार में असंतुलन पैदा कर सकती है और दूसरे देशों के उद्योगों को प्रभावित कर सकती है.
अमेरिका अलग से सेक्शन 301 के तहत भारत समेत करीब 60 देशों में कुछ प्रमुख क्षेत्रों की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की जांच भी कर रहा है. इस जांच में यह देखा जा रहा है कि किसी देश की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता से अमेरिकी उद्योगों के हितों पर असर पड़ रहा है या नहीं.
भारत ने WTO नियमों पर दिया जोर
पीयूष गोयल ने बैठक में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन का विस्तार अपने आप में गलत नहीं है. भारत जैसे बड़े देश के लिए घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ वैश्विक आपूर्ति में योगदान देना भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में किसी भी तरह के ऐसे कदम से बचना चाहिए जो WTO के नियमों के दायरे से बाहर हों या विकासशील देशों पर अतिरिक्त बोझ डालें.
गोयल के मुताबिक, G20 प्रेसिडेंसी की ओर से जिन क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता को लेकर चिंता जताई गई है, उनमें भारत के पास ऐसी संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता नहीं है, जिसे दूसरे देशों के उद्योगों के लिए नुकसानदेह माना जाए.
डंपिंग को लेकर भारत की भी चिंता
बैठक में भारत ने डंपिंग और बेहद कम कीमत पर दूसरे देशों के बाजारों में सामान पहुंचाए जाने को लेकर भी चिंता जताई. गोयल ने कहा कि कई देशों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि कुछ देश अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए ऐसी नीतियां अपना सकते हैं, जिससे वैश्विक बाजार में डंपिंग की स्थिति बन सकती है.
भारत लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में कम कीमत वाले आयात और घरेलू उद्योगों पर उनके प्रभाव का मुद्दा उठाता रहा है. खासतौर पर स्टील और कुछ अन्य औद्योगिक उत्पादों के मामले में भारतीय उद्योगों की ओर से डंपिंग को लेकर चिंता जताई जाती रही है.
भारत-अमेरिका ट्रेड डील के लिहाज से भी अहम मुद्दा
ओवरकैपेसिटी और डंपिंग का मुद्दा ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है. अमेरिका की ओर से भारतीय औद्योगिक क्षेत्रों और व्यापार नीतियों से जुड़े कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं.
ऐसे में G20 मंच पर भारत की ओर से WTO के नियमों और विकासशील देशों के हितों पर दिया गया जोर व्यापार वार्ता के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है. भारत का रुख है कि वैश्विक व्यापार में उत्पादन और सप्लाई चेन का विस्तार नियम आधारित व्यवस्था के भीतर होना चाहिए और इसके लिए विकासशील देशों पर असमान बोझ नहीं डाला जाना चाहिए.
यह नुकसान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रुपये में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा तय किए जाने के बाद हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय बैंकों को 2026 की पहली छमाही में विदेशी मुद्रा कारोबार से करीब 500 मिलियन डॉलर का मार्क-टू-मार्केट नुकसान उठाना पड़ा. यह नुकसान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रुपये में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा तय किए जाने के बाद हुआ. नए नियमों के तहत बैंकों को कम समय में अपनी पोजीशन घटानी या फिर दोबारा संतुलित करनी पड़ी. हालांकि, बाद में बाजार में स्प्रेड बढ़ने और पोजीशन सामान्य होने से बैंकों ने शुरुआती नुकसान में से करीब 400 मिलियन डॉलर की भरपाई कर ली.
RBI ने 100 मिलियन डॉलर की तय की थी सीमा
RBI ने 27 मार्च को निर्देश जारी कर अधिकृत डीलर बैंकों की ऑनशोर रुपये की एंड-ऑफ-डे नेट ओपन पोजीशन को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दिया था. बैंकों को 10 अप्रैल तक अपनी पोजीशन इस सीमा के भीतर लानी थी. इसके चलते बैंकों को अपने फॉरेक्स ट्रेडिंग बुक में तेजी से बदलाव करना पड़ा.
यह बदलाव ऐसे समय में हुआ जब रुपये में उतार-चढ़ाव ज्यादा था. विदेशी निवेशकों की ओर से पूंजी निकासी हो रही थी और कंपनियों की ओर से मुद्रा जोखिम से बचाव यानी करेंसी हेजिंग की मांग भी मजबूत थी. इन परिस्थितियों ने बैंकों के लिए अपनी फॉरेक्स पोजीशन को कम करना या फिर दोबारा संतुलित करना चुनौतीपूर्ण बना दिया.
कम समय में पोजीशन घटाने से बढ़ा दबाव
RBI की नई सीमा से बैंकों की ओर से अपनी बुक पर रखे जा सकने वाले विदेशी मुद्रा जोखिम की मात्रा कम हो गई. इसका असर ग्राहकों को फॉरेक्स लिक्विडिटी उपलब्ध कराने और उनके जोखिम को कुछ समय के लिए अपने पास रखने की बैंकों की क्षमता पर भी पड़ा.
क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के मार्केट स्ट्रक्चर एंड टेक्नोलॉजी के वाइस प्रेसिडेंट नितिन अगिचा के मुताबिक, नए RBI नियमों को लागू करने के लिए मिला कम समय बैंकों के लिए बड़ी चुनौती बना. उन्हें रुपये में अधिक उतार-चढ़ाव, विदेशी निवेशकों की निकासी और कंपनियों की मजबूत हेजिंग मांग के बीच तेजी से अपनी पोजीशन बदलनी पड़ी.
कुछ बैंकों के लिए संबंधित पक्षों से जुड़े डेरिवेटिव के जरिए अपने जोखिम को संतुलित करने की क्षमता भी सीमित हो गई. जोखिम लेने की क्षमता घटने और पोजीशन में बदलाव के लिए कम समय मिलने से ट्रेडिंग बुक को दोबारा व्यवस्थित करने की लागत बढ़ी और सामान्य मार्केट-मेकिंग गतिविधियों पर भी असर पड़ा.
बाजार में स्प्रेड बढ़ने से 400 मिलियन डॉलर की भरपाई
शुरुआत में हुए मार्क-टू-मार्केट नुकसान का एक बड़ा हिस्सा बाद में कम हुआ. नए नियामकीय ढांचे के अनुरूप बाजार में कारोबार की स्थितियां बदलने लगीं और डीलरों ने कम बैलेंस-शीट क्षमता तथा ज्यादा एग्जीक्यूशन रिस्क को ध्यान में रखते हुए कीमतों में बदलाव किया.
इसके चलते बाजार में स्प्रेड बढ़ा और बैंकों की पोजीशन धीरे-धीरे सामान्य स्तर पर आने लगी. रिसर्च के मुताबिक, इससे बैंकों को शुरुआती करीब 500 मिलियन डॉलर के नुकसान में से लगभग 400 मिलियन डॉलर की भरपाई करने में मदद मिली.
20 अप्रैल को RBI ने कुछ प्रतिबंधों में ढील भी दी. इसके तहत संबंधित पक्षों के बीच होने वाले कुछ लेनदेन के लिए सीमित अपवाद की अनुमति दी गई. हालांकि, ऑनशोर डिलीवरेबल मार्केट में 100 मिलियन डॉलर की नेट ओपन पोजीशन सीमा बरकरार रही.
कच्चे तेल की कीमतों ने भी बढ़ाई फॉरेक्स में अस्थिरता
बैंकों के ट्रेडिंग नुकसान की यह स्थिति केवल RBI के नए नियमों तक सीमित नहीं थी. उस दौरान भारतीय विदेशी मुद्रा बाजार पर कच्चे तेल की कीमतों का भी दबाव था. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है.
क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल और 50 फीसदी प्राकृतिक गैस आयात करता है. ऐसे में ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से आयात के लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत बढ़ती है, जिसका असर रुपये पर पड़ सकता है.
रिसर्च के अनुसार, जनवरी से जुलाई 2026 के बीच भारत का आयात बिल 20 फीसदी बढ़ा और कुल आयात 95.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया. यह 2011 के बाद सबसे ऊंचा स्तर बताया गया है. आयात में बढ़ोतरी से विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ी, जबकि रुपये पर पूंजी प्रवाह और वैश्विक जोखिम से जुड़े दबाव भी बने रहे.
बैंकों की फॉरेक्स जोखिम क्षमता पर असर
RBI की ओर से विदेशी मुद्रा पोजीशन पर लगाई गई सीमा का असर सिर्फ शुरुआती मार्क-टू-मार्केट नुकसान तक सीमित नहीं है. ओपन करेंसी पोजीशन पर सख्त सीमा से बैंकों की ग्राहकों से जुड़े फॉरेक्स जोखिम को अपने पास रखने और बाजार में लिक्विडिटी उपलब्ध कराने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.
क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के डायरेक्टर आमिर हजरिया के अनुसार, आगे रुपये की स्थिति RBI की नीतियों, पूंजी प्रवाह में सुधार, वैश्विक जोखिम धारणा और ऊर्जा आयात पर भारत की संरचनात्मक निर्भरता जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी.
पहली छमाही का यह घटनाक्रम दिखाता है कि बैंकों की विदेशी मुद्रा पोजीशन से जुड़े नियामकीय बदलाव कम समय में ट्रेडिंग बुक, बाजार की लिक्विडिटी और कंपनियों की हेजिंग लागत पर असर डाल सकते हैं.
ब्रह्मोस और आकाश जैसे स्वदेशी सिस्टम भारत के डिफेंस प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट क्षमता के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इन उत्पादों की विदेशी मांग बढ़ने से भारतीय रक्षा कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार के नए अवसर भी बन रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट अब छोटे हथियारों और कलपुर्जों तक सीमित नहीं रह गया है. स्वदेश में विकसित ब्रह्मोस और आकाश जैसे मिसाइल सिस्टम भी विदेशी बाजार में जगह बना रहे हैं. ब्रह्मोस से जुड़े संभावित सौदों के चलते इसका एक्सपोर्ट पाइपलाइन 600 मिलियन डॉलर से अधिक पहुंचने की उम्मीद है. वहीं, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम की मांग भी कई देशों से सामने आई है. यह बदलाव भारत के बढ़ते डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर को दिखाता है.
ब्रह्मोस के एक्सपोर्ट से 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा की उम्मीद
ब्रह्मोस भारत के बढ़ते डिफेंस एक्सपोर्ट का प्रमुख उत्पाद बनकर उभरा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फिलीपींस को करीब 330 मिलियन डॉलर के ब्रह्मोस सिस्टम की सप्लाई की जा चुकी है. इसके अलावा वियतनाम के साथ करीब 100 मिलियन डॉलर और इंडोनेशिया के साथ करीब 200 मिलियन डॉलर की संभावित डील की जानकारी सामने आई है.
इन संभावित सौदों के पूरा होने पर ब्रह्मोस से जुड़े एक्सपोर्ट का कुल मूल्य 600 मिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है. ब्रह्मोस अपनी तेज रफ्तार और लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता के लिए जाना जाता है. इसके एयर-लॉन्च वर्जन का इस्तेमाल सुखोई-30MKI लड़ाकू विमानों के साथ भी किया जाता है.
आकाश मिसाइल सिस्टम की भी विदेशी मांग बढ़ी
ब्रह्मोस के साथ भारत का आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम भी विदेशी बाजार में अपनी जगह बना रहा है. इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है, जबकि इसके निर्माण में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) जैसी भारतीय कंपनियां शामिल हैं.
आकाश सिस्टम को तेज गति से उड़ने वाले हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है. इसके शुरुआती संस्करण की मारक क्षमता करीब 25-30 किलोमीटर बताई जाती है, जबकि आकाश-NG की रेंज करीब 50 किलोमीटर तक बताई गई है.
आर्मेनिया आकाश का शुरुआती विदेशी ग्राहक बना. इसके बाद ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को भी इसके एक्सपोर्ट की जानकारी सामने आई है. इससे स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए विदेशी बाजार में बढ़ती दिलचस्पी का संकेत मिलता है.
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट
मिसाइल सिस्टम के एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी भारत के पूरे डिफेंस सेक्टर में हो रहे विस्तार का हिस्सा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट बढ़कर रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ पर पहुंच गया. वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा ₹23,622 करोड़ था. यानी एक साल में डिफेंस एक्सपोर्ट में 62.66 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा से जुड़े उत्पाद और सिस्टम एक्सपोर्ट कर रहा है. सरकार ने आने वाले वर्षों में डिफेंस एक्सपोर्ट को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. इसके साथ ही देश में रक्षा उत्पादन बढ़ाने और स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है.
मिसाइल सिस्टम के साथ बढ़ रही स्वदेशी तकनीक
ब्रह्मोस और आकाश जैसे सिस्टम की विदेशी मांग बढ़ने के साथ भारत के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तकनीकी क्षमताओं का भी विस्तार हो रहा है. मिसाइल सिस्टम के अलावा गाइडेंस सिस्टम, रडार, प्रोपल्शन और कमांड नेटवर्क जैसी तकनीकों के घरेलू विकास पर भी जोर दिया जा रहा है.
ब्रह्मोस और आकाश जैसे स्वदेशी सिस्टम भारत के डिफेंस प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट क्षमता के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इन उत्पादों की विदेशी मांग बढ़ने से भारतीय रक्षा कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार के नए अवसर भी बन रहे हैं.
स्मार्टफोन बाजार में चीनी कंपनियों के दबदबे के बीच सरकार भारतीय मोबाइल ब्रांडों को मजबूत करने की तैयारी कर रही है. ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना में करीब ₹5,000 करोड़ भारतीय कंपनियों के लिए रखे गए हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के स्मार्टफोन बाजार में कभी मजबूत स्थिति रखने वाली घरेलू कंपनियों की हिस्सेदारी पिछले एक दशक में तेजी से घटी है. 2014 में माइक्रोमैक्स, कार्बन, लावा और इंटेक्स जैसे भारतीय ब्रांडों की बाजार हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी थी, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी थी. 2025 तक तस्वीर पूरी तरह बदल गई. इस दौरान भारतीय ब्रांडों की हिस्सेदारी घटकर करीब 1 फीसदी रह गई, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 73 फीसदी से अधिक हो गई.
अब सरकार घरेलू मोबाइल कंपनियों को दोबारा मजबूत करने के लिए एक नई योजना पर काम कर रही है. इसके तहत ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना में करीब ₹5,000 करोड़ भारतीय मोबाइल कंपनियों के लिए निर्धारित किए गए हैं.
2016 के बाद बदला मोबाइल बाजार
भारतीय मोबाइल कंपनियों की शुरुआती सफलता मुख्य रूप से कम कीमत वाले फोन और मजबूत वितरण नेटवर्क पर आधारित थी. उस समय कई कंपनियां चीन में बने 3जी फोन आयात कर अपने ब्रांड नाम से भारत में बेचती थीं.
हालांकि, 2016 में रिलायंस जियो की 4जी सेवा शुरू होने के बाद मोबाइल बाजार में तेजी से बदलाव आया. भारतीय कंपनियों के पास 3जी फोन का बड़ा भंडार था और वे 4जी की बढ़ती मांग के अनुरूप तेजी से बदलाव नहीं कर सकीं.
दूसरी ओर, शाओमी, वीवो और ओप्पो जैसी चीनी कंपनियां बेहतर कैमरा, आधुनिक तकनीक और नए फीचर वाले 4जी स्मार्टफोन लेकर बाजार में उतरीं. इन कंपनियों ने अनुसंधान, डिजाइन और वितरण नेटवर्क में भी बड़े पैमाने पर निवेश किया. इसका असर भारतीय कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी पर पड़ा. 2017 तक भारतीय ब्रांडों की हिस्सेदारी घटकर करीब 16 फीसदी रह गई, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 55 फीसदी से ज्यादा हो गई.
किन कंपनियों को मिलेगा सरकारी प्रोत्साहन?
सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए कंपनियों के लिए कुछ शर्तें तय की गई हैं. इसके तहत कंपनी का सालाना कारोबार कम से कम ₹1,000 करोड़ होना चाहिए और उसमें भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी कम से कम 51 फीसदी होनी चाहिए.
इसके अलावा मोबाइल से जुड़े पेटेंट भारत में कंपनी के नाम पर होने जरूरी होंगे. योजना में शामिल कंपनियों को देश में अपना अनुसंधान एवं विकास (R&D) केंद्र भी स्थापित करना होगा.
सरकार कंपनियों को उनकी बिक्री के 9.5 फीसदी तक प्रोत्साहन दे सकती है. इसमें सालाना बढ़ी बिक्री पर 5 फीसदी, बैटरी और कैमरा मॉड्यूल जैसे प्रमुख कंपोनेंट भारत से खरीदने पर 1.5 फीसदी और देश में अनुसंधान एवं विकास केंद्र स्थापित करने पर 3 फीसदी प्रोत्साहन शामिल है.
लावा समेत कई कंपनियों ने दिखाई दिलचस्पी
अब तक कम से कम तीन घरेलू कंपनियों ने इस योजना में रुचि दिखाई है. इनमें लावा इंटरनेशनल, नेक्स्टक्वांटम शिफ्ट टेक्नोलॉजीज और हैदराबाद की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी मिवी शामिल हैं. नेक्स्टक्वांटम ने एआई प्लस नाम से स्मार्टफोन ब्रांड शुरू किया है और अब तक 10 लाख से अधिक फोन बेचने का दावा किया है. कंपनी चालू वित्त वर्ष में स्मार्टफोन बाजार में 3-4 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.
कंपनी अपने फोन की औसत बिक्री कीमत दिवाली तक ₹13,500 से बढ़ाकर ₹15,000 करने की तैयारी कर रही है. उसने अनुसंधान पर पहले ही 60 लाख डॉलर खर्च किए हैं और अगले साल तक कुल निवेश बढ़ाकर करीब ₹350 करोड़ करने की योजना है. इसके तहत करीब 80 विदेशी विशेषज्ञों और 300 इंजीनियरों की नियुक्ति की योजना है.
₹15,000 से कम कीमत वाले फोन पर नजर
भारतीय कंपनियों के लिए ₹15,000 से कम कीमत वाले स्मार्टफोन का बाजार एक बड़ा अवसर बन सकता है. देश में बिकने वाले कुल स्मार्टफोन में इस श्रेणी की हिस्सेदारी करीब 51 फीसदी है.
मेमोरी चिप की कीमतों में बढ़ोतरी और कम मार्जिन के कारण कुछ बड़ी वैश्विक कंपनियां इस श्रेणी से दूरी बना रही हैं और महंगे स्मार्टफोन पर अधिक ध्यान दे रही हैं. ऐसे में भारतीय कंपनियां कम कीमत वाले स्मार्टफोन बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं.
बोल्ट, एआई प्लस और मिवी जैसे ब्रांड इस सेगमेंट पर ध्यान दे रहे हैं. मिवी ने ₹11,999 की कीमत में अपना पहला 5जी स्मार्टफोन पेश किया है. कंपनी के मुताबिक, इस फोन का डिजाइन उसकी अपनी टीम ने तैयार किया है और भविष्य में वह देश में ही इसका उत्पादन करने की योजना बना रही है. हालांकि, मिवी ने योजना के तहत ₹1,000 करोड़ के न्यूनतम कारोबार की शर्त को नई कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है.
सिर्फ सस्ते फोन से नहीं बनेगा मजबूत ब्रांड
भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती सिर्फ कम कीमत वाले फोन बेचने तक सीमित नहीं है. लंबे समय में मजबूत ब्रांड बनाने के लिए उन्हें ₹15,000 से ₹25,000 और उससे ऊपर के स्मार्टफोन बाजार में भी अपनी मौजूदगी बढ़ानी होगी.
इस श्रेणी में बेहतर कैमरा, प्रोसेसर, सॉफ्टवेयर और डिजाइन की जरूरत होती है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए अनुसंधान, तकनीक, डिजाइन और पेटेंट क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण होगा.
सरकारी प्रोत्साहन से घरेलू कंपनियों को पूंजी और विस्तार के स्तर पर मदद मिल सकती है, लेकिन वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए भारतीय ब्रांडों को तकनीक और उत्पाद के स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनानी होगी.