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Budget 23: क्या इस बार भी प्राइवेटाइजेशन के प्रति प्यार दर्शाएगी मोदी सरकार?
एक फरवरी को पेश होने वाले आम बजट में सरकार विनिवेश यानी डिसइनवेस्टमेंट को लेकर शायद ही कोई नई घोषणा करे.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
पूरा देश एक फरवरी को पेश होने वाले बजट पर टकटकी लगाए हुए है. महंगाई की मार झेल रही जनता को उम्मीद है कि शायद मोदी सरकार की वित्त मंत्री को इस बार उसकी याद आ जाए. वहीं, उद्योग जगत की भी अपनी कई उम्मीदें हैं. इस बीच, एक सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि क्या सरकारी संपत्तियों को बेचने की मोदी सरकार की मुहिम इस बजट में भी देखने को मिल सकती है?
ये हैं दो बड़ी वजह
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इसकी संभावना बेहद कम है कि सरकार यूनियन बजट 2023-24 में विनिवेश यानी डिसइनवेस्टमेंट (Disinvestment) को लेकर कोई बड़ा ऐलान करे. इसकी दो बड़ी वजह हैं, पहली - यह मोदी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट है, क्योंकि अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में सरकार विनिवेश का जिक्र करके किसी भी वर्ग को नाराज करने का जोखिम मोल नहीं लेगी. दूसरी - पुराने विनिवेश लक्ष्यों का पूरा नहीं कर पाना. उनके मुताबिक, सरकार Union Budget 2023-24 में पिछले डिसइनवेस्टमेंट लक्ष्यों को पूरा करने का जिक्र कर सकती है, लेकिन नया ऐलान मुश्किल है.
डिसइनवेस्टमेंट लिस्ट
BPCL, IDBI के अलावा सरकार की संभावित डिसइनवेस्टमेंट लिस्ट में कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (Concor), राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान जिंक, NMDC और SAIL के स्टील प्लांट सहित कुछ छोटी कंपनियों की बिक्री शामिल हो सकती है. IDBI को निजी हाथों में सौंपने लेकर सरकार काफी तेजी से काम कर रही है. कुछ विदेशी संस्थाओं ने भी इसमें रुचि दिखाई है. BPCL के डिसइनवेस्टमेंट को लेकर भी सरकार बीच में सक्रिय हुई थी, लेकिन फिर इससे जुड़ी खबरें सामने आना बंद हो गई.
सुधर रही कंपनियों की सेहत
एक रिपोर्ट बताती है कि बीते कुछ सालों में सरकारी कंपनियों की सेहत बेहतर हुई है. वित्त वर्ष 2018 में शेयर बाजार में सूचीबद्ध सभी कंपनियों के कुल मुनाफे में 16.8 फीसदी हिस्सा सरकारी कंपनियों का था. वहीं, प्राइवेट कंपनियों की हिस्सेदारी 83.2 फीसदी थी. हालांकि वित्त वर्ष 2022 में सरकारी कंपनियों का कुल मुनाफे में हिस्सा बढ़कर 31.3% पहुंच गया, जबकि प्राइवेट सेक्टर कंपनियों की हिस्सेदारी घटकर 68.7 प्रतिशत पर आ गई. गौर करने वाली बात ये है कि मुनाफा बढ़ाने में सबसे अधिक योगदान उन सरकारी बैंकों का है, जिनके कामकाज पर सबसे ज्यादा सवाल उठते रहे हैं.
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