लंदन के बड़े निवेशकों के साथ साझेदारी करेगा ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट, जानिए क्यों?

ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट, विकासशील देशों में निजी निवेश बढ़ाने के लिए शुरुआती £50 मिलियन की सस्ती पूंजी (concessionary capital) देगा.

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Friday, 31 January, 2025
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लंदन शहर जलवायु वित्त (climate finance) के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है। इसके लिए उसे ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट (BII) के साथ मिलकर काम करना होगा, जो ब्रिटेन की एक विकास वित्त संस्था (development finance institution) और प्रभाव निवेशक (impact investor) है। यह संस्थान जलवायु संकट से निपटने के प्रयासों में मदद करता है।  

पिछले साल, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि BII एक नया £100 मिलियन का मोबिलाइजेशन फंड (Mobilisation Facility) संभालेगा. इस फंड का उद्देश्य उन विकासशील देशों (Emerging economies) में निजी निवेश बढ़ाना है, जिन्हें बड़े निवेशक जोखिम भरा मानते हैं. 

आज, BII ने बताया कि इस फंड में से £50 मिलियन एक नई पहल (initiative) के लिए अलग रखे गए हैं. इसके तहत, BII वैश्विक निवेश फर्म Mercer के साथ साझेदारी कर रहा है. इसका मकसद निवेश प्रबंधकों (asset managers) को ऐसी योजनाएँ बनाने के लिए प्रेरित करना है, जो जलवायु से जुड़े प्रोजेक्ट्स में निजी निवेश को आकर्षित करें. साथ ही, यह उन चुनौतियों को हल करने की कोशिश करेगा, जिनमें बड़े निवेशकों का जोखिम लेने की क्षमता और उनकी लाभ की उम्मीदों के बीच अंतर होता है.

विकासशील देश (Emerging Economies) आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक वृद्धि (Global Economic Growth) में अहम भूमिका निभाएंगे. वर्तमान में, वे दुनिया की कुल GDP का 60% से अधिक योगदान देते हैं और 2050 तक वैश्विक ऊर्जा खपत (energy consumption) का 74% हिस्सा बनने की उम्मीद है. इससे स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) जैसे क्षेत्रों में निवेश के नए अवसर खुल सकते हैं, जो विकास, विविधता और सकारात्मक प्रभाव के लिए फायदेमंद हो सकते हैं.

मिनिस्टर ऑफ डेवलपमेंट एनेलीज़ डोड्स ने इस पहल का स्वागत किया और कहा कि "जो देश जलवायु संकट (Climate Crisis) से प्रभावित हैं, वे भीषण मौसम (Extreme Weather) का सामना कर रहे हैं. इससे उनकी अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है, विकास रुक रहा है और लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं. इन देशों को इस संकट से निपटने और खुद को इसके अनुसार ढालने के लिए तुरंत वित्तीय मदद (Finance) की जरूरत है.

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि "इसी समय, ब्रिटेन की वित्तीय संस्थाएं (Financial Institutions) जलवायु वित्त (Climate Finance) में वैश्विक नेतृत्व करने और इन नए बाज़ारों में निवेश करने के लिए बिल्कुल सही स्थिति में हैं. इससे न केवल ब्रिटेन में आर्थिक वृद्धि होगी, बल्कि दूसरे देशों को भी ज़रूरी वित्तीय सहायता मिलेगी. निजी (Private) और सरकारी (Public) विशेषज्ञता और पूंजी (Capital) को एक साथ लाकर, ब्रिटेन दुनिया का नेतृत्व कर रहा है और उन देशों को वित्तीय मदद पहुंचा रहा है, जिन्हें जलवायु संकट से निपटने के लिए इसकी सख्त जरूरत है."

ब्रिटेन और दुनियाभर के एसेट मैनेजर्स (Asset Managers), जो जलवायु वित्त (Climate Finance) में अच्छा अनुभव रखते हैं और विकासशील देशों (Emerging Economies) में निवेश करने में रुचि रखते हैं, उन्हें BII के साथ साझेदारी के लिए अपने प्रस्ताव (Proposals) भेजने का आमंत्रण दिया गया है.  

वे प्रस्ताव, जो निजी निवेश (Private Investment) को तेज़ी से बढ़ाने और बड़े स्तर पर जलवायु प्रभाव दिखाने की क्षमता रखते हैं, उन्हें £50 मिलियन तक की सस्ती पूंजी (Concessional Capital) मिलेगी. इसके अलावा, उन्हें BII से अतिरिक्त निवेश फंडिंग (Non-Concessional Investment Funding) पाने का भी मौका मिलेगा.

BII के CEO, लेस्ली मासडॉर्प ने कहा कि "BII, ब्रिटेन की मुख्य संस्था है, जो जलवायु वित्त (Climate Finance) को बाज़ारों तक पहुंचाती है. लेकिन जलवायु संकट की बड़ी चुनौती को देखते हुए, हमें निजी संस्थानों (Private Institutions) की बड़ी पूंजी को भी इसमें लगाना होगा. आज हमने जो साझेदारी शुरू की है, वह इसे करने का एक नया और बेहतरीन तरीका है."  

Mercer के यूके प्रेसिडेंट और CEO, बेनोइट हुडोन ने कहा कि "यह पहल विकासशील देशों में नए प्रोजेक्ट्स में निवेश को बढ़ावा दे सकती है, जिससे उनकी आर्थिक प्रगति (Economic Development) को समर्थन मिलेगा. मर्सर उन एसेट मैनेजर प्रस्तावों की पहचान करने में अहम भूमिका निभाएगा, जो ऊर्जा बदलाव (Energy Transition) में मदद कर सकते हैं और निवेशकों की उन चिंताओं को दूर कर सकते हैं, जो विकासशील देशों में निवेश को लेकर झिझकते हैं."
 


G20 में पीयूष गोयल ने ओवरकैपेसिटी के आरोपों को नकारा, कहा- WTO नियमों से चले वैश्विक व्यापार

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत एक बड़ा बाजार और उत्पादक देश है, जो अपनी घरेलू जरूरतों के साथ वैश्विक मांग को पूरा करने में भी योगदान देता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 03 October, 2026
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Saturday, 03 October, 2026
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भारत ने G20 के वाणिज्य एवं व्यापार मंत्रियों की बैठक में कुछ भारतीय सेक्टरों में कथित ‘ओवरकैपेसिटी’ को लेकर उठाई गई चिंताओं को खारिज किया है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत एक बड़ा बाजार और उत्पादक देश है, जो अपनी घरेलू जरूरतों के साथ वैश्विक मांग को पूरा करने में भी योगदान देता है. उन्होंने कहा कि उत्पादन और सप्लाई चेन का विस्तार जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों से बाहर जाकर कदम नहीं उठाए जाने चाहिए.

अमेरिका ने G20 में उठाया था ओवरकैपेसिटी का मुद्दा

यह मुद्दा अमेरिका की अगुवाई में G20 बैठक के दौरान उठाया गया. अमेरिका की ओर से चिंता जताई गई कि कुछ देशों में स्टील, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल और केमिकल जैसे क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता वैश्विक बाजार में असंतुलन पैदा कर सकती है और दूसरे देशों के उद्योगों को प्रभावित कर सकती है.

अमेरिका अलग से सेक्शन 301 के तहत भारत समेत करीब 60 देशों में कुछ प्रमुख क्षेत्रों की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की जांच भी कर रहा है. इस जांच में यह देखा जा रहा है कि किसी देश की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता से अमेरिकी उद्योगों के हितों पर असर पड़ रहा है या नहीं.

भारत ने WTO नियमों पर दिया जोर

पीयूष गोयल ने बैठक में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन का विस्तार अपने आप में गलत नहीं है. भारत जैसे बड़े देश के लिए घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ वैश्विक आपूर्ति में योगदान देना भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में किसी भी तरह के ऐसे कदम से बचना चाहिए जो WTO के नियमों के दायरे से बाहर हों या विकासशील देशों पर अतिरिक्त बोझ डालें.

गोयल के मुताबिक, G20 प्रेसिडेंसी की ओर से जिन क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता को लेकर चिंता जताई गई है, उनमें भारत के पास ऐसी संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता नहीं है, जिसे दूसरे देशों के उद्योगों के लिए नुकसानदेह माना जाए.

डंपिंग को लेकर भारत की भी चिंता

बैठक में भारत ने डंपिंग और बेहद कम कीमत पर दूसरे देशों के बाजारों में सामान पहुंचाए जाने को लेकर भी चिंता जताई. गोयल ने कहा कि कई देशों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि कुछ देश अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए ऐसी नीतियां अपना सकते हैं, जिससे वैश्विक बाजार में डंपिंग की स्थिति बन सकती है.

भारत लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में कम कीमत वाले आयात और घरेलू उद्योगों पर उनके प्रभाव का मुद्दा उठाता रहा है. खासतौर पर स्टील और कुछ अन्य औद्योगिक उत्पादों के मामले में भारतीय उद्योगों की ओर से डंपिंग को लेकर चिंता जताई जाती रही है.

भारत-अमेरिका ट्रेड डील के लिहाज से भी अहम मुद्दा

ओवरकैपेसिटी और डंपिंग का मुद्दा ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है. अमेरिका की ओर से भारतीय औद्योगिक क्षेत्रों और व्यापार नीतियों से जुड़े कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं.

ऐसे में G20 मंच पर भारत की ओर से WTO के नियमों और विकासशील देशों के हितों पर दिया गया जोर व्यापार वार्ता के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है. भारत का रुख है कि वैश्विक व्यापार में उत्पादन और सप्लाई चेन का विस्तार नियम आधारित व्यवस्था के भीतर होना चाहिए और इसके लिए विकासशील देशों पर असमान बोझ नहीं डाला जाना चाहिए.
 


RBI के फॉरेक्स नियमों से बैंकों को $500 मिलियन का नुकसान, बाद में $400 मिलियन की भरपाई

यह नुकसान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रुपये में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा तय किए जाने के बाद हुआ.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 03 October, 2026
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Saturday, 03 October, 2026
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भारतीय बैंकों को 2026 की पहली छमाही में विदेशी मुद्रा कारोबार से करीब 500 मिलियन डॉलर का मार्क-टू-मार्केट नुकसान उठाना पड़ा. यह नुकसान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रुपये में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा तय किए जाने के बाद हुआ. नए नियमों के तहत बैंकों को कम समय में अपनी पोजीशन घटानी या फिर दोबारा संतुलित करनी पड़ी. हालांकि, बाद में बाजार में स्प्रेड बढ़ने और पोजीशन सामान्य होने से बैंकों ने शुरुआती नुकसान में से करीब 400 मिलियन डॉलर की भरपाई कर ली.

RBI ने 100 मिलियन डॉलर की तय की थी सीमा

RBI ने 27 मार्च को निर्देश जारी कर अधिकृत डीलर बैंकों की ऑनशोर रुपये की एंड-ऑफ-डे नेट ओपन पोजीशन को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दिया था. बैंकों को 10 अप्रैल तक अपनी पोजीशन इस सीमा के भीतर लानी थी. इसके चलते बैंकों को अपने फॉरेक्स ट्रेडिंग बुक में तेजी से बदलाव करना पड़ा.

यह बदलाव ऐसे समय में हुआ जब रुपये में उतार-चढ़ाव ज्यादा था. विदेशी निवेशकों की ओर से पूंजी निकासी हो रही थी और कंपनियों की ओर से मुद्रा जोखिम से बचाव यानी करेंसी हेजिंग की मांग भी मजबूत थी. इन परिस्थितियों ने बैंकों के लिए अपनी फॉरेक्स पोजीशन को कम करना या फिर दोबारा संतुलित करना चुनौतीपूर्ण बना दिया.

कम समय में पोजीशन घटाने से बढ़ा दबाव

RBI की नई सीमा से बैंकों की ओर से अपनी बुक पर रखे जा सकने वाले विदेशी मुद्रा जोखिम की मात्रा कम हो गई. इसका असर ग्राहकों को फॉरेक्स लिक्विडिटी उपलब्ध कराने और उनके जोखिम को कुछ समय के लिए अपने पास रखने की बैंकों की क्षमता पर भी पड़ा.

क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के मार्केट स्ट्रक्चर एंड टेक्नोलॉजी के वाइस प्रेसिडेंट नितिन अगिचा के मुताबिक, नए RBI नियमों को लागू करने के लिए मिला कम समय बैंकों के लिए बड़ी चुनौती बना. उन्हें रुपये में अधिक उतार-चढ़ाव, विदेशी निवेशकों की निकासी और कंपनियों की मजबूत हेजिंग मांग के बीच तेजी से अपनी पोजीशन बदलनी पड़ी.

कुछ बैंकों के लिए संबंधित पक्षों से जुड़े डेरिवेटिव के जरिए अपने जोखिम को संतुलित करने की क्षमता भी सीमित हो गई. जोखिम लेने की क्षमता घटने और पोजीशन में बदलाव के लिए कम समय मिलने से ट्रेडिंग बुक को दोबारा व्यवस्थित करने की लागत बढ़ी और सामान्य मार्केट-मेकिंग गतिविधियों पर भी असर पड़ा.

बाजार में स्प्रेड बढ़ने से 400 मिलियन डॉलर की भरपाई

शुरुआत में हुए मार्क-टू-मार्केट नुकसान का एक बड़ा हिस्सा बाद में कम हुआ. नए नियामकीय ढांचे के अनुरूप बाजार में कारोबार की स्थितियां बदलने लगीं और डीलरों ने कम बैलेंस-शीट क्षमता तथा ज्यादा एग्जीक्यूशन रिस्क को ध्यान में रखते हुए कीमतों में बदलाव किया.

इसके चलते बाजार में स्प्रेड बढ़ा और बैंकों की पोजीशन धीरे-धीरे सामान्य स्तर पर आने लगी. रिसर्च के मुताबिक, इससे बैंकों को शुरुआती करीब 500 मिलियन डॉलर के नुकसान में से लगभग 400 मिलियन डॉलर की भरपाई करने में मदद मिली.

20 अप्रैल को RBI ने कुछ प्रतिबंधों में ढील भी दी. इसके तहत संबंधित पक्षों के बीच होने वाले कुछ लेनदेन के लिए सीमित अपवाद की अनुमति दी गई. हालांकि, ऑनशोर डिलीवरेबल मार्केट में 100 मिलियन डॉलर की नेट ओपन पोजीशन सीमा बरकरार रही.

कच्चे तेल की कीमतों ने भी बढ़ाई फॉरेक्स में अस्थिरता

बैंकों के ट्रेडिंग नुकसान की यह स्थिति केवल RBI के नए नियमों तक सीमित नहीं थी. उस दौरान भारतीय विदेशी मुद्रा बाजार पर कच्चे तेल की कीमतों का भी दबाव था. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है.

क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल और 50 फीसदी प्राकृतिक गैस आयात करता है. ऐसे में ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से आयात के लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत बढ़ती है, जिसका असर रुपये पर पड़ सकता है.

रिसर्च के अनुसार, जनवरी से जुलाई 2026 के बीच भारत का आयात बिल 20 फीसदी बढ़ा और कुल आयात 95.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया. यह 2011 के बाद सबसे ऊंचा स्तर बताया गया है. आयात में बढ़ोतरी से विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ी, जबकि रुपये पर पूंजी प्रवाह और वैश्विक जोखिम से जुड़े दबाव भी बने रहे.

बैंकों की फॉरेक्स जोखिम क्षमता पर असर

RBI की ओर से विदेशी मुद्रा पोजीशन पर लगाई गई सीमा का असर सिर्फ शुरुआती मार्क-टू-मार्केट नुकसान तक सीमित नहीं है. ओपन करेंसी पोजीशन पर सख्त सीमा से बैंकों की ग्राहकों से जुड़े फॉरेक्स जोखिम को अपने पास रखने और बाजार में लिक्विडिटी उपलब्ध कराने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.

क्रिसिल कोएलिशन ग्रीनविच के डायरेक्टर आमिर हजरिया के अनुसार, आगे रुपये की स्थिति RBI की नीतियों, पूंजी प्रवाह में सुधार, वैश्विक जोखिम धारणा और ऊर्जा आयात पर भारत की संरचनात्मक निर्भरता जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी.

पहली छमाही का यह घटनाक्रम दिखाता है कि बैंकों की विदेशी मुद्रा पोजीशन से जुड़े नियामकीय बदलाव कम समय में ट्रेडिंग बुक, बाजार की लिक्विडिटी और कंपनियों की हेजिंग लागत पर असर डाल सकते हैं.
 


विदेशी बाजार में बढ़ी भारत की मिसाइलों की मांग, 600 मिलियन डॉलर पार हो सकता है एक्सपोर्ट

ब्रह्मोस और आकाश जैसे स्वदेशी सिस्टम भारत के डिफेंस प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट क्षमता के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इन उत्पादों की विदेशी मांग बढ़ने से भारतीय रक्षा कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार के नए अवसर भी बन रहे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 03 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 03 October, 2026
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भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट अब छोटे हथियारों और कलपुर्जों तक सीमित नहीं रह गया है. स्वदेश में विकसित ब्रह्मोस और आकाश जैसे मिसाइल सिस्टम भी विदेशी बाजार में जगह बना रहे हैं. ब्रह्मोस से जुड़े संभावित सौदों के चलते इसका एक्सपोर्ट पाइपलाइन 600 मिलियन डॉलर से अधिक पहुंचने की उम्मीद है. वहीं, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम की मांग भी कई देशों से सामने आई है. यह बदलाव भारत के बढ़ते डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर को दिखाता है.

ब्रह्मोस के एक्सपोर्ट से 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा की उम्मीद

ब्रह्मोस भारत के बढ़ते डिफेंस एक्सपोर्ट का प्रमुख उत्पाद बनकर उभरा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फिलीपींस को करीब 330 मिलियन डॉलर के ब्रह्मोस सिस्टम की सप्लाई की जा चुकी है. इसके अलावा वियतनाम के साथ करीब 100 मिलियन डॉलर और इंडोनेशिया के साथ करीब 200 मिलियन डॉलर की संभावित डील की जानकारी सामने आई है.

इन संभावित सौदों के पूरा होने पर ब्रह्मोस से जुड़े एक्सपोर्ट का कुल मूल्य 600 मिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है. ब्रह्मोस अपनी तेज रफ्तार और लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता के लिए जाना जाता है. इसके एयर-लॉन्च वर्जन का इस्तेमाल सुखोई-30MKI लड़ाकू विमानों के साथ भी किया जाता है.

आकाश मिसाइल सिस्टम की भी विदेशी मांग बढ़ी

ब्रह्मोस के साथ भारत का आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम भी विदेशी बाजार में अपनी जगह बना रहा है. इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है, जबकि इसके निर्माण में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) जैसी भारतीय कंपनियां शामिल हैं.

आकाश सिस्टम को तेज गति से उड़ने वाले हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है. इसके शुरुआती संस्करण की मारक क्षमता करीब 25-30 किलोमीटर बताई जाती है, जबकि आकाश-NG की रेंज करीब 50 किलोमीटर तक बताई गई है.

आर्मेनिया आकाश का शुरुआती विदेशी ग्राहक बना. इसके बाद ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को भी इसके एक्सपोर्ट की जानकारी सामने आई है. इससे स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए विदेशी बाजार में बढ़ती दिलचस्पी का संकेत मिलता है.

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट

मिसाइल सिस्टम के एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी भारत के पूरे डिफेंस सेक्टर में हो रहे विस्तार का हिस्सा है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट बढ़कर रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ पर पहुंच गया. वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा ₹23,622 करोड़ था. यानी एक साल में डिफेंस एक्सपोर्ट में 62.66 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा से जुड़े उत्पाद और सिस्टम एक्सपोर्ट कर रहा है. सरकार ने आने वाले वर्षों में डिफेंस एक्सपोर्ट को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. इसके साथ ही देश में रक्षा उत्पादन बढ़ाने और स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है.

मिसाइल सिस्टम के साथ बढ़ रही स्वदेशी तकनीक

ब्रह्मोस और आकाश जैसे सिस्टम की विदेशी मांग बढ़ने के साथ भारत के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तकनीकी क्षमताओं का भी विस्तार हो रहा है. मिसाइल सिस्टम के अलावा गाइडेंस सिस्टम, रडार, प्रोपल्शन और कमांड नेटवर्क जैसी तकनीकों के घरेलू विकास पर भी जोर दिया जा रहा है.

ब्रह्मोस और आकाश जैसे स्वदेशी सिस्टम भारत के डिफेंस प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट क्षमता के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इन उत्पादों की विदेशी मांग बढ़ने से भारतीय रक्षा कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार के नए अवसर भी बन रहे हैं.


भारत में फिर मजबूत होंगे देसी मोबाइल ब्रांड, सरकार देगी ₹5,000 करोड़ का प्रोत्साहन

स्मार्टफोन बाजार में चीनी कंपनियों के दबदबे के बीच सरकार भारतीय मोबाइल ब्रांडों को मजबूत करने की तैयारी कर रही है. ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना में करीब ₹5,000 करोड़ भारतीय कंपनियों के लिए रखे गए हैं.

Last Modified:
Friday, 02 October, 2026
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भारत के स्मार्टफोन बाजार में कभी मजबूत स्थिति रखने वाली घरेलू कंपनियों की हिस्सेदारी पिछले एक दशक में तेजी से घटी है. 2014 में माइक्रोमैक्स, कार्बन, लावा और इंटेक्स जैसे भारतीय ब्रांडों की बाजार हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी थी, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी थी. 2025 तक तस्वीर पूरी तरह बदल गई. इस दौरान भारतीय ब्रांडों की हिस्सेदारी घटकर करीब 1 फीसदी रह गई, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 73 फीसदी से अधिक हो गई.

अब सरकार घरेलू मोबाइल कंपनियों को दोबारा मजबूत करने के लिए एक नई योजना पर काम कर रही है. इसके तहत ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना में करीब ₹5,000 करोड़ भारतीय मोबाइल कंपनियों के लिए निर्धारित किए गए हैं.

2016 के बाद बदला मोबाइल बाजार

भारतीय मोबाइल कंपनियों की शुरुआती सफलता मुख्य रूप से कम कीमत वाले फोन और मजबूत वितरण नेटवर्क पर आधारित थी. उस समय कई कंपनियां चीन में बने 3जी फोन आयात कर अपने ब्रांड नाम से भारत में बेचती थीं.

हालांकि, 2016 में रिलायंस जियो की 4जी सेवा शुरू होने के बाद मोबाइल बाजार में तेजी से बदलाव आया. भारतीय कंपनियों के पास 3जी फोन का बड़ा भंडार था और वे 4जी की बढ़ती मांग के अनुरूप तेजी से बदलाव नहीं कर सकीं.

दूसरी ओर, शाओमी, वीवो और ओप्पो जैसी चीनी कंपनियां बेहतर कैमरा, आधुनिक तकनीक और नए फीचर वाले 4जी स्मार्टफोन लेकर बाजार में उतरीं. इन कंपनियों ने अनुसंधान, डिजाइन और वितरण नेटवर्क में भी बड़े पैमाने पर निवेश किया. इसका असर भारतीय कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी पर पड़ा. 2017 तक भारतीय ब्रांडों की हिस्सेदारी घटकर करीब 16 फीसदी रह गई, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 55 फीसदी से ज्यादा हो गई.

किन कंपनियों को मिलेगा सरकारी प्रोत्साहन?

सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए कंपनियों के लिए कुछ शर्तें तय की गई हैं. इसके तहत कंपनी का सालाना कारोबार कम से कम ₹1,000 करोड़ होना चाहिए और उसमें भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी कम से कम 51 फीसदी होनी चाहिए.

इसके अलावा मोबाइल से जुड़े पेटेंट भारत में कंपनी के नाम पर होने जरूरी होंगे. योजना में शामिल कंपनियों को देश में अपना अनुसंधान एवं विकास (R&D) केंद्र भी स्थापित करना होगा.

सरकार कंपनियों को उनकी बिक्री के 9.5 फीसदी तक प्रोत्साहन दे सकती है. इसमें सालाना बढ़ी बिक्री पर 5 फीसदी, बैटरी और कैमरा मॉड्यूल जैसे प्रमुख कंपोनेंट भारत से खरीदने पर 1.5 फीसदी और देश में अनुसंधान एवं विकास केंद्र स्थापित करने पर 3 फीसदी प्रोत्साहन शामिल है.

लावा समेत कई कंपनियों ने दिखाई दिलचस्पी

अब तक कम से कम तीन घरेलू कंपनियों ने इस योजना में रुचि दिखाई है. इनमें लावा इंटरनेशनल, नेक्स्टक्वांटम शिफ्ट टेक्नोलॉजीज और हैदराबाद की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी मिवी शामिल हैं. नेक्स्टक्वांटम ने एआई प्लस नाम से स्मार्टफोन ब्रांड शुरू किया है और अब तक 10 लाख से अधिक फोन बेचने का दावा किया है. कंपनी चालू वित्त वर्ष में स्मार्टफोन बाजार में 3-4 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.

कंपनी अपने फोन की औसत बिक्री कीमत दिवाली तक ₹13,500 से बढ़ाकर ₹15,000 करने की तैयारी कर रही है. उसने अनुसंधान पर पहले ही 60 लाख डॉलर खर्च किए हैं और अगले साल तक कुल निवेश बढ़ाकर करीब ₹350 करोड़ करने की योजना है. इसके तहत करीब 80 विदेशी विशेषज्ञों और 300 इंजीनियरों की नियुक्ति की योजना है.

₹15,000 से कम कीमत वाले फोन पर नजर

भारतीय कंपनियों के लिए ₹15,000 से कम कीमत वाले स्मार्टफोन का बाजार एक बड़ा अवसर बन सकता है. देश में बिकने वाले कुल स्मार्टफोन में इस श्रेणी की हिस्सेदारी करीब 51 फीसदी है.

मेमोरी चिप की कीमतों में बढ़ोतरी और कम मार्जिन के कारण कुछ बड़ी वैश्विक कंपनियां इस श्रेणी से दूरी बना रही हैं और महंगे स्मार्टफोन पर अधिक ध्यान दे रही हैं. ऐसे में भारतीय कंपनियां कम कीमत वाले स्मार्टफोन बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं.

बोल्ट, एआई प्लस और मिवी जैसे ब्रांड इस सेगमेंट पर ध्यान दे रहे हैं. मिवी ने ₹11,999 की कीमत में अपना पहला 5जी स्मार्टफोन पेश किया है. कंपनी के मुताबिक, इस फोन का डिजाइन उसकी अपनी टीम ने तैयार किया है और भविष्य में वह देश में ही इसका उत्पादन करने की योजना बना रही है. हालांकि, मिवी ने योजना के तहत ₹1,000 करोड़ के न्यूनतम कारोबार की शर्त को नई कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है.

सिर्फ सस्ते फोन से नहीं बनेगा मजबूत ब्रांड

भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती सिर्फ कम कीमत वाले फोन बेचने तक सीमित नहीं है. लंबे समय में मजबूत ब्रांड बनाने के लिए उन्हें ₹15,000 से ₹25,000 और उससे ऊपर के स्मार्टफोन बाजार में भी अपनी मौजूदगी बढ़ानी होगी.

इस श्रेणी में बेहतर कैमरा, प्रोसेसर, सॉफ्टवेयर और डिजाइन की जरूरत होती है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए अनुसंधान, तकनीक, डिजाइन और पेटेंट क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण होगा.

सरकारी प्रोत्साहन से घरेलू कंपनियों को पूंजी और विस्तार के स्तर पर मदद मिल सकती है, लेकिन वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए भारतीय ब्रांडों को तकनीक और उत्पाद के स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनानी होगी.

 


IPO बाजार में रिकॉर्ड तेजी, 6 महीने में 78 कंपनियों ने जुटाए ₹94,205 करोड़

अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान मेनबोर्ड आईपीओ के जरिए कंपनियों की फंड जुटाने की रफ्तार तेज रही. इस दौरान 78 कंपनियों ने ₹94,205 करोड़ जुटाए, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 35 फीसदी अधिक है.

Last Modified:
Friday, 02 October, 2026
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शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में रिकॉर्ड तेजी देखने को मिली है. अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 78 कंपनियों ने मेनबोर्ड आईपीओ के जरिए कुल ₹94,205 करोड़ जुटाए. पिछले साल की समान अवधि में 65 कंपनियों ने ₹69,533 करोड़ जुटाए थे. इस तरह इस साल पहली छमाही में आईपीओ के जरिए जुटाई गई रकम में करीब 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

अगस्त-सितंबर में तेज हुई आईपीओ की रफ्तार

प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आईपीओ बाजार की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी रही. अप्रैल से जून के बीच कंपनियां सिर्फ ₹3,794 करोड़ जुटा सकीं. हालांकि, इसके बाद बाजार में तेजी लौटी.

अगस्त में कंपनियों ने आईपीओ के जरिए ₹20,000 करोड़ से ज्यादा जुटाए, जबकि सितंबर में यह आंकड़ा ₹40,000 करोड़ के पार पहुंच गया. इस तेजी का असर सार्वजनिक इक्विटी के जरिए कुल फंड जुटाने पर भी पड़ा. पहली छमाही में पब्लिक इक्विटी फंडरेजिंग 75 फीसदी बढ़कर ₹2.43 लाख करोड़ हो गई.

इस दौरान नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का ₹22,563 करोड़ का आईपीओ सबसे बड़ा रहा. इसके बाद एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट ने ₹9,795 करोड़ और मणिपाल हेल्थ एंटरप्राइजेज ने ₹9,275 करोड़ जुटाए. कंपनियों के औसत आईपीओ आकार में भी बढ़ोतरी हुई है. यह पिछले साल की पहली छमाही के ₹1,070 करोड़ से बढ़कर इस साल ₹1,208 करोड़ हो गया.

रिटेल निवेशकों की बढ़ी भागीदारी

आईपीओ बाजार में रिटेल निवेशकों की भागीदारी भी इस दौरान बढ़ी है. कुल 64 आईपीओ में से 42 को 10 गुना से अधिक सब्सक्रिप्शन मिला, जबकि 25 आईपीओ 50 गुना से अधिक सब्सक्राइब हुए. इसके अलावा 9 आईपीओ को 3 गुना से अधिक बोलियां मिलीं.

रिटेल निवेशकों के आवेदनों की औसत संख्या भी बढ़कर 17.71 लाख प्रति आईपीओ हो गई, जो पिछले साल की समान अवधि में 12.69 लाख थी. छोटे निवेशकों ने कुल ₹2.47 लाख करोड़ के शेयरों के लिए आवेदन किया. हालांकि, उन्हें अंततः ₹25,944 करोड़ के शेयर ही आवंटित हुए.

आईपीओ की लिस्टिंग पर औसत 19% रिटर्न

आईपीओ बाजार में निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी की एक वजह इस साल लिस्टिंग के बाद मिला रिटर्न भी रहा है. 29 सितंबर तक लिस्ट हुए 64 आईपीओ का औसत लिस्टिंग गेन 19 फीसदी रहा. पिछले साल की पहली छमाही में यह औसत सिर्फ 7 फीसदी था.

29 सितंबर तक 64 में से 46 आईपीओ अपने इश्यू प्राइस से ऊपर कारोबार कर रहे थे. यानी करीब 72 फीसदी सूचीबद्ध आईपीओ अपने इश्यू प्राइस के मुकाबले ऊंचे स्तर पर थे.

प्राइमरी मार्केट में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भी प्राइमरी मार्केट में मजबूत भागीदारी रही. आंकड़ों के मुताबिक, जहां विदेशी निवेशकों ने सेकेंडरी मार्केट में ₹1.64 लाख करोड़ की बिकवाली की, वहीं प्राइमरी मार्केट में उन्होंने ₹44,960 करोड़ का निवेश किया.

आईपीओ के जरिए जुटाई गई रकम का इस्तेमाल कंपनियां अलग-अलग जरूरतों के लिए कर रही हैं. मुख्य आईपीओ के जरिए जुटाई गई कुल रकम में 41 फीसदी यानी ₹38,510 करोड़ फ्रेश कैपिटल था. इसमें से कंपनियों ने करीब 42 फीसदी रकम पुराने कर्ज को चुकाने में इस्तेमाल की. वहीं, प्राइवेट प्रमोटर्स ने ₹26,048 करोड़ के शेयरों की बिक्री की.

आईपीओ की बड़ी पाइपलाइन तैयार

प्राइमरी मार्केट में आगे भी गतिविधियां तेज रहने की संभावना है. फिलहाल 145 कंपनियों को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) से आईपीओ की मंजूरी मिल चुकी है. ये कंपनियां करीब ₹2.78 लाख करोड़ जुटाने की तैयारी में हैं.

इसके अलावा 102 कंपनियां करीब ₹1.87 लाख करोड़ जुटाने के लिए सेबी की मंजूरी का इंतजार कर रही हैं. इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में भी आईपीओ बाजार में कंपनियों की फंड जुटाने की गतिविधियां जारी रह सकती हैं.


चंद्रशेखरन और वेंणु श्रीनिवासन के बीच टीवीएस से जुड़ा दूसरा सौदा टाटा संस बोर्ड के समक्ष नहीं रखा गया: रिपोर्ट

टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के परिवार की कंपनी कर्नाटक में 330 करोड़ रुपये के औद्योगिक पार्क की योजना बना रही है. यहां टीवीएस मोटर और उसके टियर-1 आपूर्तिकर्ताओं के लिए ऑटो कंपोनेंट्स बनाए जाने हैं.

Last Modified:
Friday, 02 October, 2026
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टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के परिवार के स्वामित्व वाली कंपनी हन्नो वन वेयरहाउसिंग कर्नाटक में 330 करोड़ रुपये की लागत से एक औद्योगिक पार्क विकसित करने की योजना पर काम कर रही है. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस पार्क में टीवीएस मोटर कंपनी और उसके टियर-1 आपूर्तिकर्ताओं के लिए ऑटो कंपोनेंट्स का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है.

रिपोर्ट के मुताबिक, चंद्रशेखरन की पत्नी ललिता और बेटे प्रणव के स्वामित्व वाली हन्नो वन वेयरहाउसिंग ने नवंबर 2025 में कर्नाटक की लैंड ऑडिट कमेटी के समक्ष जमीन के लिए आवेदन किया था. कंपनी ने मैसूर से करीब 20 किलोमीटर दक्षिण में स्थित राज्य सरकार के इम्मावु औद्योगिक क्षेत्र में 35 एकड़ जमीन की मांग की थी.

प्रस्तावित परियोजना को ऑटो कंपोनेंट्स के निर्माण और टीवीएस मोटर तथा उसके टियर-1 आपूर्तिकर्ताओं को इनकी आपूर्ति के लिए औद्योगिक पार्क के रूप में पेश किया गया था.

कर्नाटक में करीब 27 करोड़ रुपये में मिली जमीन

हन्नो के हालिया वित्तीय विवरणों के अनुसार, कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरियाज डेवलपमेंट बोर्ड (KIADB) ने कंपनी को जमीन आवंटित कर दी है. इसके लिए करीब 27 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना है. वित्तीय वर्ष 2025-26 में कंपनी ने जमीन के लिए 7.91 करोड़ रुपये का भुगतान किया था.

यह कर्नाटक परियोजना हन्नो और टीवीएस मोटर के बीच दूसरा रिपोर्टेड कारोबारी संबंध है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले टीवीएस मोटर ने तमिलनाडु में हन्नो को जमीन लीज पर दी थी.

पहले हुए टीवीएस समझौते पर भी सवाल

रिपोर्ट के मुताबिक, एन. चंद्रशेखरन और टीवीएस मोटर के चेयरमैन-एमेरिटस वेंणु श्रीनिवासन ने इस कारोबारी संबंध की जानकारी टाटा संस के बोर्ड को नहीं दी थी. टाटा संस ने पहले कहा था कि इन लेनदेन को बोर्ड के समक्ष रखने की जरूरत नहीं थी.

वेंणु श्रीनिवासन टाटा ट्रस्ट्स के नामित सदस्य के तौर पर टाटा संस के बोर्ड में शामिल हैं. वह बोर्ड की नामांकन और पारिश्रमिक समिति के सदस्य भी हैं. यह समिति चंद्रशेखरन के प्रदर्शन और पारिश्रमिक का मूल्यांकन करती है. ऐसे में हन्नो और टीवीएस मोटर के बीच कारोबारी संबंध दोनों की टाटा समूह में भूमिकाओं के संदर्भ में सामने आए हैं.

टाटा संस के पुनर्गठन के बीच सामने आया मामला

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब टाटा ट्रस्ट्स की ओर से टाटा संस के पुनर्गठन का प्रस्ताव विचाराधीन है. टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है और ट्रस्ट्स ने होल्डिंग कंपनी की संरचना में बदलाव का प्रस्ताव दिया है.

टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (TESS) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) का टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड में विलय करने का प्रस्ताव दिया है. इसका उद्देश्य टाटा संस की नियामकीय श्रेणी में बदलाव करना है, जबकि कंपनी को गैर-सूचीबद्ध निजी कंपनी के रूप में बनाए रखना है.

ट्रस्ट्स के अनुसार, प्रस्तावित विलय के बाद टाटा संस को गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) की श्रेणियों से बाहर लाने में मदद मिलेगी. ट्रस्ट्स का कहना है कि अतिरिक्त परिचालन आय से कंपनी एनबीएफसी पर लागू मुख्य कारोबार संबंधी मानदंडों के दायरे से बाहर आ सकेगी.

टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित पुनर्गठन से टाटा संस के समूह की कंपनियों में निवेश भी सीआईसी के लिए लागू सीमा से नीचे आ जाएगा. यह प्रस्ताव सोमवार को प्रस्तुत किया गया था.

टाटा ट्रस्ट्स ने इतिहास का दिया हवाला

टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि प्रस्तावित पुनर्गठन से टाटा संस उस परिचालन मॉडल की ओर लौट सकेगी, जिसे उसने अपने इतिहास के बड़े हिस्से में अपनाया था. ट्रस्ट्स के अनुसार, अपने 100 साल के इतिहास में करीब 80 वर्षों तक टाटा संस के पास परिचालन कारोबार और उससे होने वाला राजस्व था.

ट्रस्ट्स ने कहा कि इन कारोबारों से होने वाली आय का इस्तेमाल टाटा संस नए कारोबारी उपक्रमों को वित्तपोषित करने के लिए करती थी. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) भी 2004 में अलग सहायक कंपनी के रूप में अलग होने से पहले टाटा संस का एक कारोबारी प्रभाग थी.

टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार, टाटा संस के पास पहले भी कई अन्य परिचालन कारोबार थे, जिन्हें बाद में अलग कर दिया गया. प्रस्तावित पुनर्गठन के बाद टाटा संस के पास अपने परिचालन और राजस्व का स्रोत होगा और वह टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी के रूप में भी बनी रहेगी.

टाटा ट्रस्ट्स ने यह भी कहा कि प्रस्तावित ढांचा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 2004 के बाद टाटा संस को गैर-बैंकिंग, गैर-वित्तीय कंपनी के रूप में दिए गए वर्गीकरण के अनुरूप होगा.
 


त्योहारी सीजन से पहले निसान की बड़ी छलांग, घरेलू बिक्री में 100% उछाल

निसान मोटर इंडिया ने सितंबर 2026 में घरेलू बाजार में 3,300 वाहनों की थोक बिक्री दर्ज की, जो पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 100 प्रतिशत अधिक है. कंपनी ने घरेलू और निर्यात बाजारों को मिलाकर सितंबर में कुल 10,025 वाहनों की थोक बिक्री की.

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Friday, 02 October, 2026
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निसान मोटर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने सितंबर 2026 के बिक्री आंकड़े जारी किए हैं. कंपनी के अनुसार, सितंबर में घरेलू बाजार में 3,300 वाहनों की थोक बिक्री हुई, जबकि 6,725 वाहनों का निर्यात किया गया. इस तरह कंपनी की कुल थोक बिक्री 10,025 यूनिट रही.

घरेलू बाजार में निसान की बिक्री सितंबर 2025 में दर्ज 1,652 यूनिट के मुकाबले इस साल सितंबर में 100 प्रतिशत बढ़ी है. कंपनी ने कहा कि बिक्री में यह वृद्धि उसके बढ़ते एसयूवी पोर्टफोलियो और देशभर में डीलर नेटवर्क के विस्तार के बीच दर्ज की गई है.

निसान के मौजूदा पोर्टफोलियो में मैग्नाइट और ग्रेवाइट के साथ नई निसान टेकटन भी शामिल है. कंपनी के अनुसार, इन उत्पादों के जरिए वह भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार के अलग-अलग सेगमेंट में अपनी मौजूदगी बढ़ाने पर ध्यान दे रही है.

निसान मोटर इंडिया के प्रबंध निदेशक सौरभ वत्स ने कहा कि सितंबर में घरेलू बिक्री में सालाना आधार पर करीब दोगुनी वृद्धि कंपनी की उत्पाद-केंद्रित रणनीति और डीलर नेटवर्क की क्षमता को दर्शाती है. उन्होंने कहा कि भारत में बढ़ती घरेलू बिक्री कंपनी को आगे विस्तार करने के लिए आधार दे रही है.

उन्होंने कहा कि कंपनी के प्रदर्शन में उसके वित्तीय और कारोबारी साझेदारों के साथ भारतीय ग्राहकों का बढ़ता भरोसा भी महत्वपूर्ण है. इसके अलावा, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निसान के निर्यात प्रदर्शन में सहयोग के लिए विदेशी डीलरों, वितरकों और ग्राहकों के योगदान का उल्लेख किया.

6,725 वाहनों का निर्यात

सितंबर 2026 में निसान मोटर इंडिया ने 6,725 वाहनों का निर्यात किया. कंपनी भारत में निर्मित वाहनों को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी भेजती है. निसान की 'वन कार. वन वर्ल्ड.' रणनीति के तहत भारत और विदेशों के बाजारों के लिए वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप वाहनों का उत्पादन किया जाता है.

कंपनी के मुताबिक, भारत उसके वैश्विक परिचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और यहां से होने वाला निर्यात अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उसकी मौजूदगी को मजबूत करता है.

एसयूवी पोर्टफोलियो पर फोकस

निसान ने भारतीय बाजार में एसयूवी सेगमेंट पर अपना फोकस बढ़ाया है. कंपनी के पोर्टफोलियो में मैग्नाइट और ग्रेवाइट के साथ नई टेकटन शामिल है. कंपनी का कहना है कि टेकटन को निसान की एसयूवी पहचान को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है और इसमें तकनीक, प्रदर्शन तथा रोजमर्रा की उपयोगिता पर जोर दिया गया है.

निसान के अनुसार, इन मॉडलों के जरिए कंपनी भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार के प्रमुख सेगमेंट में अपनी पहुंच बढ़ाने और घरेलू कारोबार में आगे विस्तार करने की दिशा में काम कर रही है.


दूसरी तिमाही में 7.3% रह सकती है भारत की विकास दर, पहली तिमाही से धीमी होगी रफ्तार

रिपोर्ट में कहा गया है कि पूंजीगत और बुनियादी ढांचा क्षेत्र से जुड़े सामान का उत्पादन निवेश गतिविधियों में मजबूती के संकेत दे रहा है.

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Friday, 02 October, 2026
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वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है. वित्त मंत्रालय की सितंबर की मासिक आर्थिक समीक्षा के अनुसार, जुलाई-सितंबर तिमाही में आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं, लेकिन पहली तिमाही की 7.8 प्रतिशत की तेज वृद्धि के मुकाबले रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है. वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव और व्यापार मार्गों से जुड़े जोखिमों के बीच घरेलू मांग और निवेश अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं.

पहली तिमाही में 7.8% रही थी GDP ग्रोथ

वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही थी. यह मौजूदा श्रृंखला में पहली तिमाही की सबसे अधिक वृद्धि दर थी. अब दूसरी तिमाही के लिए 7.3 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियां जारी रहीं, हालांकि वृद्धि की गति में कुछ नरमी के संकेत मिले हैं. ई-वे बिल जारी होने और विनिर्माण क्षेत्र के खरीद प्रबंधक सूचकांक (PMI) की वृद्धि दर में कमी आई है. वहीं, अगस्त में नई मांग और रोजगार में मजबूती के चलते सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में सुधार देखा गया.

GST कलेक्शन और बैंक क्रेडिट से मिल रहा सहारा

मासिक आर्थिक समीक्षा के अनुसार, दूसरी तिमाही की शुरुआत में आर्थिक गतिविधियों को कई उच्च आवृत्ति वाले संकेतकों से समर्थन मिला है. इनमें निर्यात और GST संग्रह प्रमुख हैं. बिजली और ईंधन की खपत में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जबकि बैंक ऋण की वृद्धि मजबूत बनी हुई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पूंजीगत और बुनियादी ढांचा क्षेत्र से जुड़े सामान का उत्पादन निवेश गतिविधियों में मजबूती के संकेत दे रहा है. इसके अलावा ग्रामीण और शहरी दोनों बाजारों में वाहन बिक्री की गति अच्छी बनी हुई है. इससे घरेलू खपत का आधार व्यापक रहने का संकेत मिलता है.

बेहतर मॉनसून से ग्रामीण मांग को समर्थन

रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मॉनसून की स्थिति शुरुआती अनुमान से बेहतर रही है. कई प्रमुख फसलों की खरीफ बुवाई पिछले साल के स्तर के आसपास रही है. इससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग की संभावनाओं को समर्थन मिलने की उम्मीद है. हालांकि, आगे रबी फसल के प्रदर्शन पर नजर रखना जरूरी होगा.

वैश्विक जोखिम अब भी चुनौती

घरेलू अर्थव्यवस्था के मजबूत संकेतकों के बावजूद वैश्विक स्तर पर कई जोखिम बने हुए हैं. पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण ऊर्जा बाजार और व्यापार मार्ग प्रभावित हुए हैं. इसके अलावा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में रणनीतिक बदलाव, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और वित्तीय परिस्थितियों में सख्ती का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बाहरी जोखिमों के बीच आर्थिक वृद्धि की गति बनाए रखने के लिए वृहद आर्थिक स्थिरता पर ध्यान देना और अर्थव्यवस्था की बुनियाद को और मजबूत करना जरूरी होगा.

भारत की साख में सुधार

रिपोर्ट में भारत की क्रेडिट रेटिंग में हालिया सुधार को भी अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद का संकेत बताया गया है. जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने सितंबर 2026 में भारत की रेटिंग को ‘BBB प्लस’ से बढ़ाकर ‘A माइनस’ कर दिया था.

इस तरह दूसरी तिमाही में GDP वृद्धि पहली तिमाही के मुकाबले कुछ धीमी रहने का अनुमान है, लेकिन घरेलू मांग, निवेश, बैंक क्रेडिट, सरकारी राजस्व और बेहतर मॉनसून जैसे कारक अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रहे हैं.

 


डॉ. शार्दुल एस. श्रॉफ: IBC से संस्थान निर्माण तक, कानून की दुनिया में पांच दशकों का सफर

इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत कानूनी व्यवस्था को विकसित करने से लेकर एक नई लॉ फर्म की संस्थागत नींव तैयार करने तक, डॉ. शार्दुल के करियर में संस्थानों को बदलते समय के अनुरूप तैयार करने पर जोर रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 01 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 01 October, 2026
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भारत के दिवालियापन कानून के विकास और देश की प्रमुख कानूनी संस्थाओं में से एक के निर्माण से डॉ. शार्दुल एस. श्रॉफ का पेशेवर सफर जुड़ा रहा है. इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत कानूनी व्यवस्था को विकसित करने से लेकर एक नई लॉ फर्म की संस्थागत नींव तैयार करने तक, उनके करियर में संस्थानों को बदलते समय के अनुरूप तैयार करने पर जोर रहा है.

मई 2015 में अमरचंद मंगलदास एंड सुरेश ए. श्रॉफ एंड कंपनी का विभाजन हुआ और इसके बाद दो स्वतंत्र लॉ फर्म अस्तित्व में आईं. इनमें शार्दुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी और सिरिल अमरचंद मंगलदास शामिल थीं. डॉ. शार्दुल एस. श्रॉफ के लिए यह उनके पेशेवर जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत थी. उन्हें एक पुरानी कानूनी विरासत को आगे बढ़ाते हुए एक अलग संस्थान की पहचान और दिशा तय करनी थी.

मई 2026 में BW Legal World के साथ बातचीत में श्रॉफ ने उस शुरुआती दौर को “एक सदी पुरानी विरासत वाला स्टार्टअप” बताया था. उन्होंने बताया कि उस समय टीम में करीब 300 लोग थे और फर्म से जुड़े रहने या इसमें शामिल होने वाले लोगों के पहले साल के भुगतान की उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी ली थी. उनके अनुसार, चुनौती एक कठिन बदलाव को पूरी टीम के साझा प्रयास में बदलने की थी.

फर्म के संचालन में गवर्नेंस पर जोर

इस प्रक्रिया में संस्थागत गवर्नेंस को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई. श्रॉफ ने नौ सदस्यीय प्रबंधन बोर्ड के गठन का उल्लेख किया. साथ ही, पार्टनर्स के मूल्यांकन में केवल तकनीकी विशेषज्ञता और कारोबारी प्रदर्शन के बजाय लोगों के विकास, फर्म के निर्माण और संस्थागत संस्कृति जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया.

उन्होंने फर्म के देशभर में काम करने के तरीके को “एक साझेदारी, एक बैलेंस शीट और एक लाभ-हानि खाता” के रूप में वर्णित किया था.

आईबीसी और दिवालियापन कानून में भूमिका

संस्थानों के निर्माण पर यह जोर उनके दिवालियापन कानून से जुड़े काम में भी दिखाई देता है. श्रॉफ ने फर्म की इंसॉल्वेंसी और रिस्ट्रक्चरिंग प्रैक्टिस की स्थापना की. वह भारत सरकार की इंसॉल्वेंसी लॉ कमेटी और कंपनी लॉ कमेटी के सदस्य भी रह चुके हैं.

इसके अलावा, वह सुप्रीम कोर्ट के समक्ष महत्वपूर्ण दिवालियापन मामलों से जुड़ी कानूनी कार्यवाही में शामिल रहे हैं. उन्होंने इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के तहत मध्यस्थता के इस्तेमाल की संभावनाओं की जांच करने वाली भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) की विशेषज्ञ समिति में भी काम किया है.

सिर्फ समयसीमा तय करने से नहीं सुलझेगी देरी

दिसंबर 2025 में BW Legal World के साथ एक बातचीत में आईबीसी से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा करते हुए श्रॉफ ने कहा था कि केवल कानून में समयसीमा तय कर देने से मामलों में देरी खत्म नहीं होगी.

उनके मुताबिक, समयबद्ध प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए ट्रिब्यूनल का बुनियादी ढांचा, पर्याप्त स्टाफ, रजिस्ट्री की क्षमता और तकनीक भी जरूरी हैं. यानी दिवालियापन प्रक्रिया की प्रभावशीलता केवल कानूनी प्रावधानों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसे लागू करने वाले संस्थागत ढांचे की क्षमता भी महत्वपूर्ण है.

मई 2026 में अपनी लॉ फर्म के भविष्य पर बात करते हुए श्रॉफ ने इसका आकलन मानवीय स्तर पर करने की बात कही थी. उनके अनुसार, ग्राहकों को यह महसूस होना चाहिए कि जरूरत के समय फर्म उनके साथ खड़ी है, जबकि युवा पार्टनर्स को यह भरोसा और अवसर मिलना चाहिए कि वे विकसित हो सकते हैं और जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं.

डॉ. शार्दुल एस. श्रॉफ के जन्मदिन के मौके पर उनके करियर के ये दोनों पहलू सामने आते हैं—भारत में दिवालियापन कानून के विकास में योगदान और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक कानूनी संस्थान को तैयार करने की प्रक्रिया


विनिर्माण क्षेत्र में 14 लाख से ज्यादा नई नौकरियां, FY25 में रोजगार बढ़कर 2.10 करोड़ हुआ

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार 7.19 फीसदी बढ़ा. इस दौरान पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठानों की संख्या भी बढ़कर 2.67 लाख हो गई, जबकि सकल मूल्य वर्धन (GVA), पूंजी निवेश और औद्योगिक उत्पादन में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 01 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 01 October, 2026
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भारत के पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2024-25 में रोजगार, उत्पादन, निवेश और मूल्य वर्धन समेत प्रमुख आर्थिक संकेतकों में वृद्धि दर्ज की है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की ओर से जारी वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण (ASI) 2024-25 के अनुसार, इस दौरान विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार 7.19 फीसदी बढ़कर 2.10 करोड़ हो गया. वित्त वर्ष 2023-24 में यह आंकड़ा 1.96 करोड़ था. यानी एक साल में 14 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला.

पंजीकृत विनिर्माण इकाइयों की संख्या भी बढ़ी

सर्वेक्षण के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठानों की संख्या 2.64 फीसदी बढ़कर 2.67 लाख हो गई. वित्त वर्ष 2023-24 में इनकी संख्या 2.60 लाख थी. इसी अवधि में औद्योगिक उत्पादन में 7.81 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. विनिर्माण क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को दिए गए कुल पारिश्रमिक में भी 12.08 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

पांच राज्यों में 56 फीसदी रोजगार

विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार का बड़ा हिस्सा कुछ राज्यों में केंद्रित है. तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा ने मिलकर वित्त वर्ष 2024-25 में कुल विनिर्माण रोजगार में करीब 56 फीसदी हिस्सेदारी दर्ज की.

पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठानों की संख्या के मामले में तमिलनाडु 41,221 इकाइयों के साथ सबसे आगे रहा. इसके बाद गुजरात में 33,084 और महाराष्ट्र में 27,379 प्रतिष्ठान रहे. उत्तर प्रदेश में 24,964 और कर्नाटक में 15,629 पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठान दर्ज किए गए.

विनिर्माण GVA बढ़कर 26.94 लाख करोड़ रुपये

सर्वेक्षण के अनुसार, पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन (GVA) वित्त वर्ष 2024-25 में 9.59 फीसदी बढ़कर 26.94 लाख करोड़ रुपये हो गया. वित्त वर्ष 2023-24 में यह 24.58 लाख करोड़ रुपये था.

GVA में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 15.92 फीसदी रही. इसके बाद गुजरात की 14.10 फीसदी और तमिलनाडु की 10.90 फीसदी हिस्सेदारी रही. कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी क्रमशः 7.31 फीसदी और 6.64 फीसदी रही.

महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश ने मिलकर देश के कुल विनिर्माण GVA में 54 फीसदी से ज्यादा का योगदान दिया.

पूंजी निवेश में भी तेज बढ़ोतरी

वित्त वर्ष 2024-25 में विनिर्माण क्षेत्र में पूंजी निवेश भी बढ़ा. सर्वेक्षण के मुताबिक, स्थिर पूंजी 10.54 फीसदी बढ़कर 51.12 लाख करोड़ रुपये हो गई. वहीं, स्थिर पूंजी और भौतिक कार्यशील पूंजी को मिलाकर कुल निवेशित पूंजी 11.10 फीसदी बढ़कर 75.56 लाख करोड़ रुपये रही. इसी दौरान शुद्ध आय में 9.68 फीसदी और शुद्ध लाभ में 7.73 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

विनिर्माण उत्पादन बढ़कर 165.24 लाख करोड़ रुपये

मौजूदा कीमतों पर विनिर्माण क्षेत्र का उत्पादन वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 165.24 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो एक साल पहले 153.27 लाख करोड़ रुपये था. इसी अवधि में इनपुट 128.69 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 138.30 लाख करोड़ रुपये हो गया. वित्त वर्ष 2024-25 में शुद्ध आय 20.55 लाख करोड़ रुपये और शुद्ध लाभ 11.56 लाख करोड़ रुपये रहा.

इन उद्योगों का GVA में सबसे बड़ा योगदान

सर्वेक्षण के मुताबिक, बेसिक मेटल, मोटर वाहन, रसायन एवं रासायनिक उत्पाद, फार्मास्युटिकल उत्पाद और खाद्य उत्पाद विनिर्माण GVA में सबसे बड़े योगदानकर्ता रहे. इन पांच उद्योगों ने मिलकर वित्त वर्ष 2024-25 में कुल विनिर्माण GVA में 45 फीसदी से ज्यादा का योगदान दिया.

रोजगार के लिहाज से खाद्य उत्पाद उद्योग सबसे आगे रहा, जिसमें करीब 23.61 लाख लोग कार्यरत थे. इसके बाद कपड़ा उद्योग में 17.57 लाख, बेसिक मेटल में 15.82 लाख, मोटर वाहन उद्योग में करीब 14.80 लाख और परिधान क्षेत्र में करीब 14.60 लाख लोग कार्यरत रहे.

परिचालन में कारखानों की संख्या भी बढ़ी

वित्त वर्ष 2024-25 में परिचालन कर रहे कारखानों की संख्या बढ़कर 2,18,543 हो गई, जबकि वित्त वर्ष 2023-24 में यह संख्या 2,12,990 थी. यह वृद्धि विनिर्माण गतिविधियों में विस्तार का संकेत देती है.

पांच राज्यों का दबदबा रोजगार के साथ-साथ विनिर्माण प्रतिष्ठानों और मूल्य वर्धन में भी दिखाई दिया. महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश ने मिलकर कुल पंजीकृत विनिर्माण प्रतिष्ठानों में 53.30 फीसदी हिस्सेदारी दर्ज की.

वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण में क्या शामिल है?

वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के दायरे में फैक्ट्री अधिनियम के तहत पंजीकृत कारखाने, कुछ बीड़ी और सिगार विनिर्माण इकाइयां, बिजली प्रतिष्ठान और राज्य के बिजनेस रजिस्टर में दर्ज 100 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली इकाइयां शामिल हैं. सर्वेक्षण में उत्पादन, मूल्य वर्धन, रोजगार, पूंजी निर्माण, मजदूरी और विनिर्माण गतिविधियों से जुड़े अन्य संकेतकों का प्रतिष्ठान स्तर पर आंकड़ा जुटाया जाता है.

अप्रैल 2024 से मार्च 2025 तक के आंकड़े

एएसआई 2024-25 के आंकड़े अप्रैल 2024 से मार्च 2025 की अवधि से संबंधित हैं. सर्वेक्षण के लिए फील्डवर्क अक्टूबर 2025 से जून 2026 के बीच किया गया. MoSPI ने कहा है कि ये अनुमान नमूना सर्वेक्षण पर आधारित हैं. इसलिए आंकड़ों का इस्तेमाल आवश्यक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए.