नोएल टाटा के साथ मतभेदों के बीच इस्तीफा, टाटा संस की लिस्टिंग और बोर्ड में प्रतिनिधित्व को लेकर भी रही असहमति
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस में बड़ा बदलाव हुआ है. एन. चंद्रशेखरन ने चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया है. हालांकि, वह फरवरी 2027 तक अपने मौजूदा कार्यकाल की जिम्मेदारियां संभालते रहेंगे. यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच कुछ अहम मुद्दों पर मतभेद की खबरें सामने आई हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नोएल टाटा चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति से पहले कुछ शर्तों पर प्रतिबद्धता चाहते थे. इनमें टाटा संस को भविष्य में शेयर बाजार में लिस्ट नहीं किए जाने की गारंटी भी शामिल थी. हालांकि, चंद्रशेखरन ऐसी प्रतिबद्धता देने के पक्ष में नहीं थे. दोनों पक्षों के बीच टाटा संस के बोर्ड में प्रतिनिधित्व को लेकर भी मतभेद बताए गए हैं.
30 से ज्यादा कंपनियों को नियंत्रित करती है टाटा संस
टाटा संस टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है और इसके जरिए समूह की 30 से अधिक कंपनियों को नियंत्रित किया जाता है. इनमें टीसीएस, टाटा मोटर्स और एयर इंडिया जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं. टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66% हिस्सेदारी है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फरवरी में टाटा संस ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर फैसला टाल दिया था. इसके बाद से ही उनके भविष्य को लेकर अटकलें तेज थीं.
1987 में टाटा समूह से जुड़े थे चंद्रशेखरन
एन. चंद्रशेखरन 1987 में टाटा समूह से जुड़े थे. उन्होंने 2009 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के सीईओ की जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद 2017 में उन्हें टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया. उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने कई बड़े कारोबारों और रणनीतिक क्षेत्रों में विस्तार किया. हालांकि, पिछले कुछ समय में समूह को कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है.
एयर इंडिया से लेकर JLR तक कई चुनौतियां
पिछले एक साल में टाटा समूह की प्रमुख कंपनियों से जुड़े कई घटनाक्रम चर्चा में रहे हैं. एयर इंडिया को विमान दुर्घटना के बाद नियामकीय जांच का सामना करना पड़ा. वहीं, टीसीएस पर कीमतों का दबाव देखने को मिला. टाटा समूह की ब्रिटिश ऑटो कंपनी जगुआर लैंड रोवर (JLR) पर साइबर हमले के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ.
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेदों का इतिहास भी पुराना है. 2016 में तत्कालीन चेयरमैन साइरस मिस्त्री को टाटा संस के बोर्ड ने पद से हटा दिया था. इसके बाद टाटा समूह और मिस्त्री के बीच लंबे समय तक कानूनी विवाद चला था.
चंद्रशेखरन का इस्तीफा ऐसे समय हुआ है, जब टाटा समूह के भविष्य के नेतृत्व और टाटा संस की रणनीतिक दिशा को लेकर आगे के फैसले पर बाजार की नजर रहेगी.
IMF के अप्रैल 2026 के अनुमान में जापान और ब्रिटेन भारत से आगे. वहीं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए दो साल में करीब 28% घटा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत 2025-26 में 3.92 ट्रिलियन डॉलर के नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के साथ दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अप्रैल 2026 के वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के आधार पर सरकार ने मंगलवार को संसद में यह जानकारी दी. इसी के साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) की एसेट क्वालिटी में सुधार से जुड़े आंकड़े भी पेश किए गए.
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में कहा कि IMF की रैंकिंग मौजूदा अमेरिकी डॉलर विनिमय दरों पर आधारित नॉमिनल GDP के आधार पर तय की जाती है. ऐसे में आर्थिक वृद्धि, विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव, कीमतों में बदलाव, राष्ट्रीय खातों में संशोधन और अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि जैसे कई कारण देशों की रैंकिंग को प्रभावित कर सकते हैं.
कभी पांचवें और चौथे स्थान पर था भारत का अनुमान
भारत ने सितंबर 2022 में नॉमिनल GDP के आधार पर ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान हासिल किया था. इसके बाद अप्रैल 2025 में IMF ने अनुमान जताया था कि भारत 2025 में जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. उस समय भारत की नॉमिनल GDP 4.187 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया था.
सरकार की ओर से 30 दिसंबर 2025 को जारी सालाना आर्थिक समीक्षा में भी कहा गया था कि भारत जापान को पीछे छोड़ चुका है और देश की GDP करीब 4.18 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई है. हालांकि, IMF के अप्रैल 2026 के ताजा अनुमानों में जापान और ब्रिटेन दोनों भारत से आगे हैं, जिसके चलते भारत 2025-26 में छठे स्थान पर पहुंच गया है.
मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और MSME पर सरकार का फोकस
सरकार भारत की आर्थिक विकास क्षमता को मजबूत करने के लिए व्यापक रणनीति पर काम कर रही है. इसमें मैन्युफैक्चरिंग, कृषि, बुनियादी ढांचा और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी MSME प्रमुख फोकस क्षेत्र हैं. सरकार प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं, क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स में ढील, कृषि उत्पादकता बढ़ाने और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार जैसे कदमों के जरिए आर्थिक वृद्धि को गति देने की कोशिश कर रही है.
इसके अलावा, पीएम गति शक्ति और नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी के माध्यम से लॉजिस्टिक्स की दक्षता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है. सरकार इनोवेशन, डिजिटलीकरण और रिसर्च को बढ़ावा देने के साथ-साथ सार्वजनिक पूंजीगत खर्च, उदारीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति और प्रत्यक्ष कर एवं GST से जुड़े सुधारों के जरिए निवेश को समर्थन दे रही है.
भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए मुक्त व्यापार समझौतों और व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौतों पर भी जोर दिया जा रहा है. नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से 5 अगस्त 2026 के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की सकल बिक्री ₹29.8 लाख करोड़ रही.
PSB का सकल NPA दो साल में 28% घटा
इस बीच, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की एसेट क्वालिटी में पिछले दो वर्षों के दौरान उल्लेखनीय सुधार हुआ है. PSBs का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति यानी ग्रॉस एनपीए 31 मार्च 2026 तक घटकर ₹2,45,634 करोड़ रह गया, जो दो साल पहले ₹3,39,541 करोड़ था.
इस तरह सकल एनपीए में करीब 28% की कमी दर्ज की गई है. इसी अवधि में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का ग्रॉस एनपीए रेशियो भी 3.47% से घटकर 1.93% रह गया.
बैंकों में धोखाधड़ी के मामलों में 89% की गिरावट
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में दर्ज धोखाधड़ी के मामलों में भी बड़ी कमी आई है. 2023-24 में जहां 54,850 मामले सामने आए थे, वहीं 2025-26 में यह संख्या घटकर 5,786 रह गई. यह करीब 89% की गिरावट है.
PSBs की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वित्त वर्षों में 5,147 मामलों में कर्मचारियों की जवाबदेही तय की गई. वहीं, धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार उधारकर्ताओं के खिलाफ 9,451 मामलों में एफआईआर दर्ज कराई गई.
GRSE में हुआ लॉन्च, समुद्री निगरानी से लेकर एंटी-पायरेसी मिशन तक में निभाएगा अहम भूमिका
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय नौसेना के लिए नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (NGOPV) ‘श्रुति’ को 11 अगस्त को कोलकाता में लॉन्च किया गया. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, यार्ड 3037 श्रुति को कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) में लॉन्च किया गया. यह पोत समुद्री निगरानी और सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा.
नौसेना और रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी रहे मौजूद
पोत का लॉन्च मणिका साधु ने किया. इस दौरान वॉरशिप प्रोडक्शन एंड एक्विजिशन की कंट्रोलर वाइस एडमिरल संजय साधु मौजूद रहे. लॉन्च समारोह में भारतीय नौसेना, रक्षा मंत्रालय और GRSE के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया.
दो शिपयार्ड में एक साथ बन रहे पोत
NGOPV कार्यक्रम को एक साथ दो भारतीय शिपयार्ड में आगे बढ़ाया जा रहा है. कोलकाता में GRSE और गोवा में गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) इन पोतों का निर्माण कर रहे हैं. इन जहाजों को देश में ही डिजाइन और तैयार किया जा रहा है. इनका उद्देश्य भारतीय नौसेना के मौजूदा ऑफशोर पेट्रोल वेसल (OPV) और नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल बेड़े को मजबूत करना है.
समुद्री निगरानी और रेस्क्यू ऑपरेशन में उपयोग
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, नए पोतों को कई तरह के समुद्री अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इनमें समुद्री निगरानी, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन, ऑफशोर संपत्तियों की सुरक्षा, मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) तथा एंटी-पायरेसी मिशन शामिल हैं. इन पोतों से समुद्री सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न परिचालन जरूरतों को पूरा करने में नौसेना की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है.
चार वेदों से जुड़ा है ‘श्रुति’ नाम
यार्ड 3037 को ‘श्रुति’ नाम दिया गया है, जो भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से प्रेरित है. ‘श्रुति’ नाम चार वेदों को संदर्भित करता है. रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पोत के क्रेस्ट में उर्सा मेजर तारामंडल के साथ लाल और सफेद रंग का लाइटहाउस भी दर्शाया गया है.
आत्मनिर्भर भारत अभियान को मिलेगा बढ़ावा
‘श्रुति’ का लॉन्च भारत में स्वदेशी युद्धपोत निर्माण की दिशा में नौसेना के प्रयासों की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है. यह कार्यक्रम सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान और देश में स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति के अनुरूप है. GRSE और GSL में इन पोतों का समानांतर निर्माण भारतीय नौसेना के पेट्रोल वेसल बेड़े को बढ़ाने में मदद करेगा. इससे समुद्री सुरक्षा, निगरानी और विभिन्न परिचालन अभियानों के लिए नौसेना की क्षमता और मजबूत होने की उम्मीद है.
10 अगस्त तक नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में 23.09% की वृद्धि, नॉन-कॉरपोरेट टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स ने बढ़ाया राजस्व
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन चालू वित्त वर्ष में 10 अगस्त तक सालाना आधार पर 23.09% बढ़कर ₹8.11 लाख करोड़ हो गया है. आयकर विभाग की ओर से मंगलवार को जारी शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, नॉन-कॉरपोरेट टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में मजबूत वृद्धि से कुल प्रत्यक्ष कर संग्रह को गति मिली है. यह संग्रह सरकार के चालू वित्त वर्ष के ₹26.97 लाख करोड़ के पूरे साल के प्रत्यक्ष कर लक्ष्य का करीब एक-तिहाई है. पिछले वित्त वर्ष में दर्ज वास्तविक संग्रह के आधार पर पूरे साल के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी 15.25% की वृद्धि दर के मुकाबले मौजूदा नेट टैक्स कलेक्शन की रफ्तार काफी अधिक है.
ग्रॉस डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 19.75% बढ़ा
1 अप्रैल से 10 अगस्त के बीच ग्रॉस डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन ₹9.55 लाख करोड़ रहा, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 19.75% अधिक है. इस दौरान रिफंड 3.79% बढ़कर ₹1.43 लाख करोड़ हो गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह ₹1.38 लाख करोड़ था. ग्रॉस कलेक्शन की तुलना में रिफंड की धीमी वृद्धि का असर नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन पर पड़ा और इसमें 23.09% की तेज वृद्धि दर्ज की गई.
कॉरपोरेट टैक्स में भी मजबूत बढ़ोतरी
कॉरपोरेट टैक्स के ग्रॉस कलेक्शन में सालाना आधार पर 14.34% की वृद्धि हुई और यह ₹3.80 लाख करोड़ पहुंच गया. रिफंड को समायोजित करने के बाद नेट कॉरपोरेट टैक्स कलेक्शन 19.83% बढ़कर ₹2.70 लाख करोड़ रहा.
वहीं, नॉन-कॉरपोरेट टैक्स, जिसमें मुख्य रूप से पर्सनल इनकम टैक्स शामिल है, में इससे भी ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई. इस श्रेणी का ग्रॉस कलेक्शन 22.29% बढ़कर ₹5.41 लाख करोड़ रहा, जबकि नेट कलेक्शन 23.43% बढ़कर ₹5.07 लाख करोड़ पहुंच गया.
STT कलेक्शन में 51% से ज्यादा उछाल
प्रत्यक्ष कर संग्रह के प्रमुख घटकों में सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) ने सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की. STT कलेक्शन 51.30% बढ़कर ₹33,823.74 करोड़ हो गया, जो पिछले साल की समान अवधि में ₹22,354.31 करोड़ था. यह बढ़ोतरी शेयर बाजार में लगातार बनी गतिविधियों को दर्शाती है. हालांकि, कुल प्रत्यक्ष कर राजस्व में STT का योगदान अभी भी अपेक्षाकृत छोटा है.
आगे रिफंड की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद
डेलॉइट (Deloitte India) के पार्टनर रोहिंटन सिधवा ने कहा कि आंकड़ों से नॉन-कॉरपोरेट टैक्स और STT कलेक्शन में मजबूत वृद्धि और रिफंड की रफ्तार में कमी का पता चलता है. इसके चलते नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में करीब 23% की वृद्धि हुई है.
उन्होंने कहा कि आने वाले महीनों में रिफंड की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद है. वहीं, ग्रॉस कॉरपोरेट टैक्स कलेक्शन करीब 14% की अपेक्षाकृत धीमी दर से बढ़ रहा है. वित्त वर्ष के बाकी महीनों में रिफंड और टैक्स कलेक्शन की दिशा यह तय करेगी कि पूरे वित्त वर्ष में नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन की अंतिम वृद्धि दर कितनी रहती है.
बिटगेट इंस्टीट्यूशनल ने ‘प्रोजेक्ट आर्किमिडीज’ के तहत 300 मिलियन डॉलर का कैपिटल प्रोग्राम शुरू किया है. कंपनी का लक्ष्य अगले छह महीनों में 50 से अधिक संभावनाशील प्रोजेक्ट्स को इस फंड के जरिए समर्थन देना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दुनिया के सबसे बड़े यूनिवर्सल एक्सचेंज (UEX), बिटगेट इंस्टीट्यूशनल (Bitget) ने क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग फर्मों, एसेट मैनेजर्स और मार्केट मेकर्स के लिए 300 मिलियन डॉलर के इंस्टीट्यूशनल कैपिटल प्रोग्राम ‘प्रोजेक्ट आर्किमिडीज’ की शुरुआत की है. कंपनी का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य बाजार को प्रभावित करने वाली मजबूत ट्रेडिंग रणनीतियों और संस्थानों को उनकी विकास यात्रा के अलग-अलग चरणों में पूंजी उपलब्ध कराना है. इस प्रोग्राम के तहत दो अलग-अलग योजनाएं शुरू की गई हैं.
100 मिलियन डॉलर का कैपिटल प्रोवाइडर प्रोग्राम
प्रोजेक्ट आर्किमिडीज के तहत 100 मिलियन डॉलर का कैपिटल प्रोवाइडर प्रोग्राम शुरू किया गया है. यह खासतौर पर उभरती और तेजी से बढ़ रही क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग फर्मों के लिए है, जो मार्केट-न्यूट्रल रणनीतियों पर काम कर रही हैं. बिटगेट इन फर्मों को पूंजी उपलब्ध कराएगा और रिटर्न को पहले से तय संरचना और जोखिम ढांचे के तहत साझा किया जाएगा.
स्थापित संस्थानों को मिलेगा 200 मिलियन डॉलर का ब्याज-मुक्त लोन
दूसरे चरण में 200 मिलियन डॉलर का इंटरेस्ट-फ्री लेंडिंग प्रोग्राम शुरू किया गया है. यह उन स्थापित संस्थानों के लिए होगा जिनके पास परिपक्व ट्रेडिंग रणनीतियां और पहले से पर्याप्त ट्रेडिंग स्केल मौजूद है. पात्र संस्थान तय ट्रेडिंग वॉल्यूम या पोजीशन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर ब्याज-मुक्त पूंजी हासिल कर सकेंगे. इससे उनकी फंडिंग लागत कम होने और ट्रेडिंग रणनीतियों के लिए अधिक पूंजी उपलब्ध होने की उम्मीद है.
अगले छह महीने में 50 से अधिक प्रोजेक्ट्स को समर्थन का लक्ष्य
[Bitget](https://www.bitget.com/?utm_source=chatgpt.com) की CEO ग्रेसी चेन ने कहा, "मजबूत रणनीतियां अक्सर एक ऐसे मुकाम पर पहुंचती हैं, जहां प्रतिभा नहीं बल्कि पूंजी उनकी वृद्धि की सबसे बड़ी सीमा बन जाती है. प्रोजेक्ट आर्किमिडीज सक्षम टीमों को आगे बढ़ने के लिए जरूरी समर्थन देगा." उन्होंने कहा कि कंपनी का लक्ष्य अगले छह महीनों में इस पूंजी के जरिए 50 से अधिक प्रोजेक्ट्स को गति देना है.
संस्थागत ट्रेडिंग में बढ़ रही है पूंजी की अहमियत
कंपनी के मुताबिक, संस्थागत ट्रेडिंग ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां पूंजी तक पहुंच, बेहतर एक्जीक्यूशन और जोखिम नियंत्रण यह तय करेंगे कि कौन सी रणनीतियां बड़े स्तर तक विस्तार कर सकती हैं. स्थापित क्रिप्टो बाजारों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण आर्बिट्राज से मिलने वाला रिटर्न कम हुआ है. ऐसे में क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग फर्म अब बेसिस स्प्रेड, फंडिंग रेट में अंतर और टोकनाइज्ड एसेट्स जैसी बाजार संरचनाओं में नए अवसर तलाश रही हैं.
टोकनाइज्ड अमेरिकी शेयरों में भी अवसर
टोकनाइज्ड अमेरिकी शेयरों को कंपनी ने इसका एक उदाहरण बताया है. स्पॉट और डेरिवेटिव मार्केट के बीच बेसिस और फंडिंग रेट में अंतर के कारण आर्बिट्राज के अवसर पैदा हो सकते हैं. आमतौर पर ऐसी रणनीतियों में किसी ट्रेड के दोनों पक्षों में पोजीशन बनाए रखने की जरूरत होती है, जिससे अलग-अलग अकाउंट्स में मार्जिन फंस सकता है.
बिटगेट के यूनिफाइड अकाउंट के तहत पात्र rToken स्पॉट पोजीशन को डेरिवेटिव ट्रेडिंग के लिए कोलैटरल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके लिए अलग-अलग अकाउंट्स के बीच फंड ट्रांसफर करने की जरूरत नहीं होगी.
कंपनी के अनुसार, इससे संस्थान टोकनाइज्ड शेयरों में अपना एक्सपोजर बनाए रखते हुए उसी अकाउंट से संबंधित कॉन्ट्रैक्ट रणनीतियों को लागू कर सकेंगे, जिससे उपलब्ध पूंजी का बेहतर उपयोग हो सकेगा.
जोखिम नियंत्रण और ड्यू डिलिजेंस पर रहेगा जोर
प्रोजेक्ट आर्किमिडीज की शुरुआत में उन मार्केट-न्यूट्रल रणनीतियों पर फोकस करेगा, जिनका ऑपरेटिंग ट्रैक रिकॉर्ड स्थापित है और जिनके जोखिम नियंत्रण को मापा जा सकता है. कार्यक्रम में शामिल होने वाले संस्थानों की रणनीतियों का मूल्यांकन, ड्यू डिलिजेंस और ड्रॉडाउन रिव्यू किया जाएगा.
यह प्रोग्राम दीर्घकालिक पूंजी सहयोग के ढांचे के रूप में तैयार किया गया है, जिसमें समय-समय पर नए संस्थानों को शामिल किया जाएगा और चरणबद्ध तरीके से पूंजी उपलब्ध कराई जाएगी. कंपनी के मुताबिक, आगे चलकर कार्यक्रम की प्रगति, भाग लेने वाले संस्थानों की संख्या, तैनात पूंजी और विभिन्न ट्रेडिंग रणनीतियों से जुड़ी जानकारी साझा करेगा.
प्रोजेक्ट आर्किमिडीज के जरिए कंपनी का लक्ष्य केवल पूंजी उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि संस्थानों को लिक्विडिटी, यूनिफाइड ट्रेडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और अंतरराष्ट्रीय संस्थागत नेटवर्क से जोड़ना भी है. कैपिटल एलोकेशन और ब्याज-मुक्त लेंडिंग के माध्यम से यह पहल उभरती ट्रेडिंग टीमों को मजबूत आधार देने और स्थापित संस्थानों को अपनी सफल रणनीतियों का बड़े स्तर पर विस्तार करने में मदद करेगी.
बाजार में लिक्विडिटी और कीमतों की खोज बेहतर करने के लिए सेबी ने एफपीआई को गैर-कृषि इंडेक्स और फिजिकली सेटल्ड कमोडिटी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग की अनुमति देने का प्रस्ताव रखा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने एक्सचेंज-ट्रेडेड कमोडिटी डेरिवेटिव्स (ETCD) में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भागीदारी बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत एफपीआई को गैर-कृषि इंडेक्स डेरिवेटिव्स और फिजिकली सेटल्ड गैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग की अनुमति देने का प्रस्ताव है. सेबी का मानना है कि इससे कमोडिटी बाजार में भागीदारों का आधार बढ़ेगा, लिक्विडिटी में सुधार होगा और कीमतों की बेहतर खोज में मदद मिलेगी.
गैर-कृषि इंडेक्स डेरिवेटिव्स में भागीदारी का प्रस्ताव
सेबी द्वारा मंगलवार को जारी परामर्श पत्र के अनुसार, पहले प्रस्ताव के तहत एफपीआई को गैर-कृषि इंडेक्स डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट्स में भाग लेने की अनुमति देने की बात कही गई है. इसमें यह मायने नहीं रखेगा कि इन कॉन्ट्रैक्ट्स से जुड़े अंडरलाइंग कॉन्ट्रैक्ट्स का निपटान नकद में होता है या नहीं. फिलहाल एफपीआई केवल ऐसे गैर-कृषि डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट्स में हिस्सा ले सकते हैं, जिनसे जुड़े अंडरलाइंग कॉन्ट्रैक्ट्स का निपटान नकद में होता है.
सेबी ने कहा कि इंडेक्स डेरिवेटिव्स का निपटान हमेशा नकद में होता है, चाहे उनकी अंडरलाइंग एसेट्स का निपटान नकद में हो या नहीं. इसलिए ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स में एफपीआई की भागीदारी की अनुमति देने से डिलिवरी से जुड़ी कोई समस्या नहीं होगी. कमोडिटी डेरिवेटिव एडवाइजरी कमेटी (CDAC) ने भी इस प्रस्ताव पर सहमति जताई है.
फिजिकली सेटल्ड कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भी एंट्री
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सेबी के दूसरे प्रस्ताव में एफपीआई को घरेलू एक्सचेंजों पर उपलब्ध ऐसे गैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भाग लेने की अनुमति देने की बात कही गई है, जिनका निपटान नकद के बजाय वास्तविक डिलिवरी के जरिए होता है. इसमें कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, सोना, चांदी और बेस मेटल्स जैसी कमोडिटीज से जुड़े डेरिवेटिव्स शामिल हैं. ये कमोडिटीज वैश्विक बेंचमार्क से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं.
सेबी के मुताबिक, इन सेगमेंट में एफपीआई की भागीदारी से बाजार में प्रतिभागियों का आधार बढ़ेगा. इसके साथ ही लिक्विडिटी बेहतर होगी, डेरिवेटिव्स और फिजिकल कमोडिटी मार्केट के बीच तालमेल मजबूत होगा और भारतीय कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाजार को वैश्विक कमोडिटी बाजार से जोड़ने में मदद मिलेगी.
डिलिवरी से पहले निवेश बेचना या रोलओवर करना होगा
प्रस्ताव के तहत एफपीआई को टेंडर अवधि शुरू होने से पहले अपनी पोजीशन बेचनी या रोलओवर करनी होगी. यह अवधि एक्सपायरी से तीन दिन पहले यानी T-3 से शुरू होती है. अगर एफपीआई ऐसा करने में विफल रहते हैं तो उनकी ओपन पोजीशन को किसी ट्रेडिंग मेंबर (TM) या ट्रेडिंग-कम-क्लियरिंग मेंबर (TCM) के प्रोपराइटरी खातों में अपने आप ट्रांसफर करने का प्रस्ताव है.
डिलिवरी को लेकर क्यों है नियम?
यह सुरक्षा उपाय इसलिए प्रस्तावित किया गया है क्योंकि भारत में एफपीआई का कोई स्थायी कारोबारी ठिकाना नहीं होता और उन्हें कमोडिटी की डिलिवरी लेने या देने की अनुमति नहीं है.
सेबी के मुताबिक, भले ही कोई एफपीआई अपनी ओर से कमोडिटी की डिलिवरी लेने या देने के लिए किसी ट्रेडिंग मेंबर या ब्रोकर को नियुक्त करे, फिर भी भारत में कमोडिटी की खरीद या बिक्री के लिए उसे जीएसटी रजिस्ट्रेशन की जरूरत पड़ सकती है. इसी वजह से सेबी ने एफपीआई के लिए निवेश की बिक्री या पोजीशन रोलओवर करने का नियम प्रस्तावित किया है. हालांकि, नियामक ने यह भी माना है कि केवल निवेश की बिक्री का यह सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हो सकता, क्योंकि इसकी सफलता पूरी तरह एफपीआई की ओर से समय पर उठाए गए कदमों पर निर्भर करेगी.
बाजार में क्या होगा असर?
सेबी का प्रस्ताव लागू होने पर भारतीय कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाजार में विदेशी निवेशकों की भागीदारी बढ़ सकती है. इससे खासकर गैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में कारोबार और लिक्विडिटी को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. साथ ही, घरेलू डेरिवेटिव्स बाजार का वैश्विक कमोडिटी बाजार के साथ जुड़ाव और मजबूत हो सकता है.
बिना जांचे, बिना ऑडिट के, बेलगाम: भारत की चार सर्वशक्तिशाली एजेंसियां. ये मनमाने ढंग से आपकी जिंदगी को रोक सकती हैं, लेकिन एक छिपा हुआ कानूनी चक्र उनकी विफलताओं को पूरी तरह सार्वजनिक नजरों से दूर रखता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
चार बेहद शक्तिशाली एजेंसियां पूरी तरह एक तरह की भरोसे की व्यवस्था पर काम करती हैं, संपत्तियां और स्वतंत्रता जब्त करते हुए भी अपने वास्तविक प्रदर्शन को जनता से छिपाए रखती हैं. इन चार एजेंसियों में प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो शामिल हैं. सामूहिक रूप से इनके पास तलाशी लेने, संपत्ति जब्त करने, संपत्ति कुर्क करने और लोगों को जेल भेजने की व्यापक शक्तियां हैं. फिर भी इनमें से किसी एक का भी इस बात को लेकर उचित सार्वजनिक ऑडिट नहीं हुआ है कि इनमें से कोई भी काम वास्तव में कितना प्रभावी है.
ईडी
सबसे पहले प्रवर्तन निदेशालय से शुरुआत करते हैं. 2021-22 से 2025-26 के पांच वर्षों में इसने मनी लॉन्ड्रिंग के 4,622 मामले दर्ज किए. वित्त मंत्रालय ने खुद यह आंकड़ा राज्यसभा के सामने रखा. इनमें से केवल 43 मामलों में दोषसिद्धि हुई. 43 प्रतिशत नहीं. 43 मामले. सौ में एक से भी कम.
इसी अवधि में एजेंसी ने 2,444 अभियोजन शिकायतें दाखिल कीं और 1,243 लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें से हर गिरफ्तारी मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत जमानत की कड़ी दोहरी शर्त वाली कसौटी से गुजरी, जो आरोपी व्यक्ति को यह साबित करने के लिए मजबूर करती है कि वह संभवतः निर्दोष है, तभी वह घर जा सकता है. घरों की तलाशी ली गई. बैंक खाते फ्रीज किए गए. एक ही न्यूज साइकिल में करियर और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा. और लंबी प्रक्रिया के अंत में: 43 दोषसिद्धियां.
एजेंसी आपको बताएगी कि उसकी दोषसिद्धि दर 93 प्रतिशत से अधिक है. यह आंकड़ा भी सही है. लेकिन इसमें एक पेंच है. इसकी गणना केवल उन मामलों पर की जाती है जो वास्तव में अंतिम फैसले तक पहुंचे हैं. एक प्रतिशत से कम का आंकड़ा उन सभी मामलों पर आधारित है जिन्हें एजेंसी ने खुद दर्ज करने का फैसला किया. वही एजेंसी, वही वर्ष, दो बिल्कुल अलग कहानियां. ईडी के बाहर कोई यह तय नहीं करता कि इनमें से कौन सा आंकड़ा ईमानदार है, क्योंकि किसी स्वतंत्र संस्था ने कभी दोनों का ऑडिट नहीं किया.
हाई-प्रोफाइल मामलों पर करीब से नजर डालें. दस वर्षों में ईडी ने मौजूदा और पूर्व सांसदों, विधायकों, विधान परिषद सदस्यों और अन्य राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ 193 मामले दर्ज किए. दोषसिद्धियां: दो. अकेले हाल के पांच वर्षों में इसने राजनेताओं के खिलाफ 125 नए मामले दर्ज किए और एक भी दोषसिद्धि हासिल नहीं की. लगभग कुछ भी पूरा नहीं हो रहा है.
सीबीआई
सीबीआई की अपनी समस्याएं हैं. भारत की प्रमुख जांच एजेंसी में 1,502 अधिकारी कम हैं. केंद्रीय सतर्कता आयोग की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 7,300 पदों की स्वीकृत संख्या है और वास्तव में केवल 5,798 लोग तैनात हैं. अदालतें जिन सबसे संवेदनशील मामलों के लिए इस एजेंसी का रुख करती हैं, वहां पांच में से एक से अधिक पद खाली हैं.
जो काम यह कर भी पाती है, वह भी अक्सर लंबित पड़ा रहता है. 2024 के अंत में 46 सरकारी संगठनों से जुड़े सीबीआई के 200 मामले अभियोजन की मंजूरी के इंतजार में अटके हुए थे यह उस आरोपी अधिकारी के अपने मंत्रालय से मिलने वाली औपचारिक अनुमति है, जिसके आधार पर उसे मुकदमे का सामना करने के लिए अदालत में पेश किया जा सके. इनमें से आधे से अधिक मामलों में कानूनी समयसीमा पहले ही पार हो चुकी थी. अदालतों में सीबीआई के 6,900 से अधिक भ्रष्टाचार के मामले लंबित थे. इनमें से 361 मामले 20 वर्षों से अधिक समय से लंबित थे. 2005 में आरोपी बनाया गया कोई क्लर्क अब सेवानिवृत्त हो चुका हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो चुकी हो, फिर भी उसका नाम विचाराधीन मामले में दर्ज हो सकता है.
सीवीसी ने खुद सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ लंबित 60 विभागीय मामलों को भी दर्ज किया. इनमें से 22 मामले चार वर्षों से अधिक समय से अनसुलझे थे. जिस एजेंसी को भ्रष्टाचार खत्म करने की जिम्मेदारी दी गई है, वह अपने ही लोगों के खिलाफ मामलों को उचित समय में बंद नहीं कर पा रही है.
एसएफआईओ, एनसीबी
गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय से पूछें कि उसने कितनी दोषसिद्धियां हासिल की हैं तो जवाब में आमतौर पर भेजे गए मामलों या दाखिल की गई शिकायतों की संख्या बताई जाती है. वास्तविक दोषसिद्धि दर गायब है. इसलिए नहीं कि यह गोपनीय है, बल्कि इसलिए कि व्यवस्था ने कभी किसी को इसकी गणना करने के लिए बाध्य ही नहीं किया.
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के प्रवर्तन कार्य को लेकर कभी प्रकाशित सीएजी प्रदर्शन ऑडिट नहीं हुआ है. रिकॉर्ड में इसके सबसे करीब 2014 की एक पुरानी समीक्षा है, लेकिन उसमें किसी और चीज को देखा गया था, राजस्व विभाग के अफीम संबंधी संचालन को. हम अंदाजा लगा सकते हैं कि वास्तविक ऑडिट में क्या सामने आ सकता है, क्योंकि सीएजी ने राज्य स्तर पर इसी तरह का काम किया है और नतीजे गंभीर थे. पंजाब में एक वर्ष में मादक पदार्थों से जुड़े मामलों में बरी हुए 756 लोगों में से 532 इसलिए रिहा हो गए क्योंकि उन्हीं पुलिस अधिकारियों की गवाही में समस्याएं थीं, जिन्होंने उन्हें गिरफ्तार किया था. 70 प्रतिशत बरी होने के मामले जांच करने वाली एजेंसी की ओर से कमजोर सबूतों तक सीमित रहे. जब्त किए गए नमूने अक्सर 23 से 476 दिनों की देरी से फोरेंसिक प्रयोगशालाओं तक पहुंचे. सबूत अलमारियों में पड़े रहे और लोग जेलों में.
यह एक राज्य के मादक पदार्थ प्रवर्तन का एक ऑडिट था. समस्या को उन चार राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ जोड़कर देखिए, जिन्हें कभी इसी तरह की जांच का सामना नहीं करना पड़ा.
अन्य देश नियमित रूप से ऐसा करते हैं. अमेरिका में न्याय विभाग का इंस्पेक्टर जनरल और गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस एफबीआई और डीईए की जांच करते हैं. ब्रिटेन में निरीक्षकों के लिए नेशनल क्राइम एजेंसी की जांच करना कानूनी दायित्व है. ऑस्ट्रेलिया का ऑडिट कार्यालय फेडरल पुलिस की जांच करता है, जिसमें यह भी शामिल है कि वे अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कैसे करते हैं.
कम ऑडिट
भारत में ऐसा कुछ भी तुलनीय नहीं है. सीएजी को सार्वजनिक धन का इस्तेमाल करने वाली किसी भी संस्था का प्रदर्शन ऑडिट करने की अनुमति है, लेकिन इन एजेंसियों के लिए ऐसा करना अनिवार्य नहीं है. चारों संगठन अलग-अलग मंत्रालयों और अलग-अलग संसदीय समितियों को जवाब देते हैं, इसलिए कोई एक जगह पूरी तस्वीर नहीं देख पाती या एक एजेंसी के नतीजों की दूसरी एजेंसी से तुलना नहीं कर पाती. केंद्रीय सतर्कता आयोग केवल सीबीआई को देखता है और वह भी केवल सतर्कता के नजरिए से, जांच की समग्र गुणवत्ता के नजरिए से नहीं. सीबीआई, ईडी और एनसीबी सूचना का अधिकार अधिनियम की एक विशेष अनुसूची में शामिल हैं, जो प्रदर्शन से जुड़े ज्यादातर आंकड़ों को सार्वजनिक नजरों से दूर रखती है.
पैसों के पक्ष का सावधानी से ऑडिट किया जाता है, वेतन, वाहन, कार्यालय का किराया, हर चीज का हिसाब आखिरी रुपये तक संतुलित किया जाता है. केवल एक चीज की गिनती कभी नहीं होती कि वास्तव में किसी को न्याय के कटघरे तक पहुंचाया गया या नहीं.
संसद एक ही सत्र में इसे बदल सकती है. वह केंद्रीय जांच एजेंसियों के प्रदर्शन का केंद्रित ऑडिट करने के लिए सीएजी से कह सकती है. वह जोर दे सकती है कि प्रत्येक एजेंसी समान दोषसिद्धि दर की परिभाषा का इस्तेमाल करते हुए एक स्पष्ट वार्षिक प्रदर्शन विवरण प्रकाशित करे. वह एसएफआईओ और एनसीबी को अपनी पारदर्शी बजट मदें दे सकती है, ताकि लागत और नतीजों की तुलना की जा सके. वह चारों एजेंसियों पर अधिकार रखने वाली एक संयुक्त समिति या उचित निरीक्षण संस्था बना सकती है.
जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक चार शक्तिशाली एजेंसियां, जो किसी व्यक्ति का घर, बैंक खाता और स्वतंत्रता छीन सकती हैं, भरोसे की व्यवस्था पर काम करती रहेंगी. वे अपने ही होमवर्क को खुद जांचती हैं और वही आंकड़ा पेश करती हैं जो सबसे अच्छा दिखाई देता है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
मंगलवार को सेंसेक्स 388.19 अंक यानी 0.49 फीसदी की गिरावट के साथ 78,154.25 अंक पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50 में 112.10 अंक यानी 0.46 फीसदी की गिरावट के साथ 24,471.70 अंक पर बंद हुआ.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में मंगलवार, 11 अगस्त को गिरावट देखने को मिली. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर निवेशकों के सेंटीमेंट पर पड़ा. कारोबार के दौरान बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा फिसला, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 50 भी 24,500 के स्तर से नीचे चला गया. कारोबार के अंत में सेंसेक्स 388.19 अंक यानी 0.49 फीसदी की गिरावट के साथ 78,154.25 अंक पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50 में 112.10 अंक यानी 0.46 फीसदी की गिरावट रही और यह 24,471.70 अंक पर बंद हुआ. हालांकि, आज सुबह गिफ्ट निफ्टी करीब 24,545-24,560 के आसपास कारोबार कर रहा है, जो मंगलवार के बंद स्तर से हल्की बढ़त दिखा रहा है. ऐसे में भारतीय बाजार की शुरुआत फ्लैट से मामूली तेजी के साथ होने के संकेत हैं.
30 में से 25 शेयर लाल निशान में
सेंसेक्स की 30 कंपनियों में से 25 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. अल्ट्राटेक सीमेंट का शेयर सबसे ज्यादा 2.75 फीसदी टूटा. इसके अलावा एक्सिस बैंक, इंडिगो, भारती एयरटेल, बजाज फाइनेंस, पावरग्रिड, आईटीसी, महिंद्रा एंड महिंद्रा, टाटा स्टील, हिंदुस्तान यूनिलीवर, एशियन पेंट्स और अडानी पोर्ट्स में भी गिरावट रही. दूसरी ओर, इटरनल का शेयर 2.01 फीसदी चढ़कर सबसे ज्यादा बढ़त में रहा. इंफोसिस, टाइटन, एचसीएल टेक और टीसीएस के शेयर भी तेजी के साथ बंद हुए.
ब्रॉडर मार्केट में कैसी रही चाल
ब्रॉडर मार्केट में निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.02 फीसदी की मामूली गिरावट के साथ बंद हुआ, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.22 फीसदी की तेजी रही. सेक्टोरल आधार पर सीमेंट, एफएमसीजी, रियल्टी और मेटल शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला. वहीं, निफ्टी फार्मा ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया.
कच्चे तेल की तेजी से बढ़ी चिंता
बाजार की नजर फिलहाल पश्चिम एशिया के घटनाक्रम और कच्चे तेल की कीमतों पर बनी हुई है. 12 अगस्त की सुबह ब्रेंट क्रूड करीब 89-90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था. पिछले पांच कारोबारी सत्रों में इसमें करीब 12 फीसदी की तेजी आ चुकी है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर अनिश्चितता बनी रहने से भारतीय बाजार में भी उतार-चढ़ाव जारी रहने की आशंका है.
आज इन शेयरों में दिख सकती है हलचल
12 अगस्त को कई कंपनियों के तिमाही नतीजों और कॉरपोरेट अपडेट्स के चलते कुछ शेयर फोकस में रह सकते हैं. Tata Motors, Hindustan Aeronautics (HAL), Grasim Industries, Apollo Hospitals, Lenskart Solutions, GMR Airports और IRCTC के आज Q1 FY27 नतीजे आने हैं. ऐसे में इन शेयरों में कारोबारी गतिविधि बढ़ सकती है. BEML को HAL से 184.25 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है, जिससे कंपनी के शेयर में हलचल देखने को मिल सकती है. L&T का L&T Network Services में अपनी पूरी हिस्सेदारी Vyoma को बेचने का फैसला भी बाजार के रडार पर रहेगा.
Manappuram Finance के पहली तिमाही के मुनाफे में चार गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है, जबकि Bata India का मुनाफा 23.1 फीसदी बढ़ा है. इन अपडेट्स के चलते दोनों शेयरों में भी हलचल देखने को मिल सकती है. Glenmark Pharmaceuticals भी आज फोकस में रह सकता है. उसकी अमेरिकी सब्सिडियरी ने Humana के साथ मुकदमे के निपटारे के लिए 15.28 मिलियन डॉलर का भुगतान करने पर सहमति जताई है.
कच्चे तेल की कीमत करीब 90 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने के कारण Indian Oil, BPCL और HPCL जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां भी निवेशकों के रडार पर रहेंगी. इसके अलावा Tenneco Clean Air India, RHI Magnesita India, Senco Gold, TBZ, HG Infra Engineering, Zydus Lifesciences और Metropolis Healthcare के शेयरों में भी कॉरपोरेट अपडेट्स के चलते हलचल देखने को मिल सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
छह साल पहले मुखबिरों को 10 करोड़ रुपये तक इनाम देने का वादा हुआ था, लेकिन सेबी की पिछली दो रिपोर्टों में किसी को इनाम नहीं मिला.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
सेबी की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के पृष्ठ 207 पर "अन्य मामले" शीर्षक के तहत अंदरूनी कारोबार की जानकारी देने वाले मुखबिरों से जुड़ा सालभर का आंकड़ा दिया गया है.
पच्चीस फॉर्म
सेबी को अंदरूनी कारोबार से जुड़ी जानकारी देने वाले मुखबिरों से इस साल सिर्फ 25 शिकायतें या फॉर्म मिले. इनमें से 14 मामलों की जांच पूरी हो चुकी है, जबकि 12 मामलों की अभी जांच चल रही है. खास बात यह है कि देश में 22.5 करोड़ से ज्यादा डीमैट खाते हैं और अंदरूनी कारोबार की शिकायतों के बावजूद मुखबिरों के लिए बनाई गई सेबी की गोपनीय व्यवस्था के जरिए बहुत कम जानकारी सामने आई है.
और यह तेजी का साल है
पिछले साल की रिपोर्ट के पृष्ठ 245 पर जाएं. पूरे 2024-25 में, मुखबिर संरक्षण कार्यालय को चार फॉर्म मिले, चार और उन चार में से "मूल जानकारी" जिस पर वास्तव में कार्रवाई की जा सकती थी, ठीक एक में मौजूद थी. बाकी तीन को कुछ भी शामिल नहीं होने के कारण बंद कर दिया गया. भारत की अंदरूनी कारोबार सूचना लाइन ने एक पूरे वित्तीय वर्ष में एक उपयोगी सूचना दी.
इस साल की रिपोर्ट, संयोग से, यह नहीं बताती कि 25 फॉर्म में से कितनों में मूल जानकारी थी. पिछले साल की रिपोर्ट में यह जानकारी थी. वह विवरण चुपचाप हटा दिया गया है, इसलिए हमें पता है कि 25 लिफाफे पहुंचे और हमें बिल्कुल पता नहीं कि उनमें से कोई खोलने लायक भी था या नहीं.
अब पैसे की बात. 2021 में सेबी ने मुखबिर के अधिकतम पुरस्कार को 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये कर दिया था और इसे इस तरह पेश किया गया था मानो बाढ़ के द्वार खुलने वाले हों. यह योजना 24 दिसंबर 2019 को लागू हुई थी, छह साल से भी अधिक समय पहले. 10 करोड़ रुपये को ऐसी जानकारी की कीमत के तौर पर प्रचारित किया गया था, जो अंदरूनी कारोबार के किसी बड़े मामले को उजागर कर सके.
पिछली दो वार्षिक रिपोर्टों में से किसी में भी किसी एक मुखबिर को एक रुपये का भुगतान दर्ज नहीं है.
यहां बताया गया है कि उन्हीं रिपोर्टों में क्या दर्ज है. धारा 13.4.6, सम्मान और पुरस्कार: 25 साल की सेवा के लिए नौ कर्मचारियों का सम्मान और 10वीं और 12वीं कक्षा में शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए कर्मचारियों के 26 बच्चों को पुरस्कार.
स्पष्ट कर दें, यह एक नियोक्ता के लिए करने के लिए बिल्कुल अच्छी बात है और किसी को भी 16 साल के बच्चे को प्रमाणपत्र मिलने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए. बच्चे मुद्दा नहीं हैं. मुद्दा यह है कि सेबी एक ऐसे पुरस्कार कार्यक्रम का संचालन करता है जो दस्तावेजीकृत है, प्रशासित है, जिसका प्रिंट में जश्न मनाया जाता है और जो स्पष्ट रूप से काम कर रहा है और वह रिपोर्ट कार्ड के लिए है. दूसरा वाला, जो बाजार में कदाचार की परतें खोलने के लिए बनाया गया था, उसका कोई दर्ज आउटपुट ही नहीं है.
सेबी ने शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए 26 बच्चों को पुरस्कृत किया. उसकी वार्षिक रिपोर्टों से पता चलता है कि उसने अंदरूनी कारोबार के किसी भी मुखबिर को पुरस्कृत नहीं किया है.
आसपास की अर्थव्यवस्था यह संकेत नहीं देती कि यह कोई दुर्घटना है. पूरे 2025-26 में, सेबी के निर्णयन अधिकारियों ने अंदरूनी कारोबार के लिए 12 संस्थाओं पर कुल 1.4 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया, तालिका 10.19. इस बीच नियामक ने खुद अंदरूनी कारोबार से जुड़ी 221 जांच शुरू कीं और 202 पूरी कीं. यह हमेशा की तरह इन मामलों का पता लगाता है: निगरानी, एक्सचेंज अलर्ट, अपनी खुद की सूंघने की क्षमता. मुखबिर चैनल कोई स्रोत नहीं है. यह सिर्फ एक संकेत-पट्ट है.
जिससे तीन सवाल बचते हैं, जो किसी को सेबी से लिखित में पूछने चाहिए. मुखबिर संरक्षण कार्यालय को चलाने में कितना खर्च आता है? इसके वैधानिक वार्षिक रिपोर्ट कहां हैं, जिन्हें ढांचे के अनुसार सार्वजनिक किया जाना है? और छह साल में, क्या इसने कभी किसी को कुछ भी भुगतान किया है?
स्टॉपवॉच लेकर आएं.
स्रोत: सेबी की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26, धारा 13.14, पृष्ठ 207; तालिका 10.19 और तालिका 10.4, अध्याय 10; धारा 13.4.6. सेबी की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25, धारा 13.14(ए), पृष्ठ 245. पुरस्कार की अधिकतम सीमा, 2021 में संशोधित सेबी (अंदरूनी कारोबार का निषेध) विनियमों के अनुसार.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
जुलाई में ₹500 प्रति 14.2 किलो सिलेंडर था घाटा, सरकार पर अब भी ₹59,000 करोड़ से ज्यादा की सब्सिडी देनदारी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को सब्सिडी वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की बिक्री पर होने वाला घाटा अगस्त में काफी घट गया है. पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने सोमवार को संसद में बताया कि अगस्त में 14.2 किलो के घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर तेल कंपनियों का राजस्व नुकसान घटकर ₹188 प्रति सिलेंडर रह गया, जबकि जुलाई में यह ₹500 था.
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (HPCL) दिल्ली में जून से 14.2 किलो का घरेलू एलपीजी सिलेंडर ₹942 में बेच रही हैं. सब्सिडी वाली कीमत और कंपनियों की लागत के बीच के अंतर की भरपाई सरकार करती है, हालांकि इसका भुगतान कुछ देरी से किया जाता है.
सरकार ने ₹30,000 करोड़ जारी किए
संसद में लिखित जवाब में सुरेश गोपी ने बताया कि सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 के लिए एलपीजी सब्सिडी के बकाये के तौर पर ₹30,000 करोड़ जारी किए हैं. इसके बावजूद 31 जुलाई 2026 तक सरकारी तेल कंपनियों को सब्सिडी वाले एलपीजी की बिक्री के लिए सरकार से मिलने वाली कुल बकाया राशि ₹59,000 करोड़ से ज्यादा थी.
जून में ₹29 महंगा हुआ था घरेलू सिलेंडर
दिल्ली में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 7 जून को ₹29 बढ़ाकर ₹942 कर दी गई थी. इससे पहले इसकी कीमत ₹913 थी. तीन महीने के भीतर यह दूसरी बढ़ोतरी थी. उस समय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा था कि भारत में घरेलू उपभोक्ता अभी भी दुनिया के कई देशों की तुलना में कम कीमत पर खाना पकाने की गैस प्राप्त कर रहे हैं.
उज्ज्वला लाभार्थियों को ₹300 की सब्सिडी
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के पात्र लाभार्थियों को एक वित्त वर्ष में पहले चार रिफिल पर प्रति सिलेंडर ₹300 की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) सब्सिडी मिलती है. इस सब्सिडी के बाद उज्ज्वला लाभार्थियों के लिए 14.2 किलो के सिलेंडर की प्रभावी कीमत ₹642 रह जाती है. मंत्रालय के मुताबिक, यह प्रभावी कीमत पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में घरेलू एलपीजी की मौजूदा कीमतों की तुलना में कम है.
LPG की मांग और कीमतों में सुधार से घाटा घटा
प्रति सिलेंडर नुकसान में कमी ऐसे समय आई है जब एलपीजी की सप्लाई की स्थिति में सुधार हुआ है और मांग भी नरम हुई है. ICICI Securities की जुलाई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर मौजूदा कीमतें बनी रहती हैं तो सितंबर तिमाही में IOC, BPCL और HPCL का एलपीजी घाटा करीब आधा हो सकता है.
ब्रोकरेज ने अनुमान लगाया था कि दूसरी तिमाही में एलपीजी घाटे की तिमाही रन रेट ₹12,000 करोड़ से नीचे आ सकती है, जबकि पहली तिमाही में यह करीब ₹22,000 करोड़ थी.
घरेलू LPG उत्पादन में 40% से ज्यादा बढ़ोतरी
एलपीजी की उपलब्धता में सुधार को घरेलू उत्पादन में तेज बढ़ोतरी से भी समर्थन मिला है. पश्चिम एशिया में संघर्ष के शुरुआती महीनों के दौरान भारतीय रिफाइनरियों ने एलपीजी उत्पादन में 40 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी की.
इससे अप्रैल और मई में घरेलू एलपीजी की उपलब्धता बढ़कर करीब 15-16 लाख टन प्रति माह हो गई. इस दौरान घरेलू उत्पादन देश की कुल एलपीजी मांग का 65 फीसदी से ज्यादा पूरा करने में सक्षम रहा, जिससे आयात पर निर्भरता कम हुई.
LPG आयात पर निर्भरता भी घटी
इस अवधि में भारत का एलपीजी आयात करीब 10 लाख टन प्रति माह रहने का अनुमान था, जो कुल खपत का लगभग 38 फीसदी था. हालिया भू-राजनीतिक संघर्ष से पहले भारत की एलपीजी जरूरत का 62 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आयात से पूरा होता था. उस समय हर महीने औसतन करीब 17 लाख टन एलपीजी का आयात किया जाता था.
प्रति सिलेंडर राजस्व नुकसान में आई कमी से सरकारी तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव कम हो सकता है. हालांकि, सब्सिडी के रूप में सरकार पर जमा बकाया देनदारी अब भी ₹59,000 करोड़ से अधिक बनी हुई है.
पेट्रोलियम मंत्रालय ने संसद में दी जानकारी, घरेलू स्तर पर मौजूद अतिरिक्त इथेनॉल क्षमता के इस्तेमाल का भी मिलेगा मौका; पेट्रोल में 20% ब्लेंडिंग की सीमा फिलहाल बरकरार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार खाना पकाने के ईंधन के तौर पर इथेनॉल के इस्तेमाल की संभावनाओं पर विचार कर रही है. इसका मकसद घरेलू रसोई में एलपीजी की जगह वैकल्पिक और अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना और आयातित एलपीजी पर देश की निर्भरता कम करना है. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) ने संसद को यह जानकारी दी है.
मंत्रालय के मुताबिक, इस पहल से देश में मौजूद अतिरिक्त इथेनॉल उत्पादन क्षमता के लिए भी नया इस्तेमाल तैयार हो सकता है. सरकार का उद्देश्य घरेलू खाना पकाने के लिए वैकल्पिक ईंधनों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ पारंपरिक जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना है.
इथेनॉल आधारित कुकिंग सॉल्यूशन विकसित करने में जुटी एजेंसियां
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन की संयुक्त पहल LPG Equipment Research Centre (LERC) सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के साथ मिलकर इथेनॉल आधारित खाना पकाने के समाधान विकसित करने पर काम कर रहा है. यह पहल घरेलू खाना पकाने के लिए वैकल्पिक ईंधनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है.
पेट्रोल में 20% से ज्यादा इथेनॉल ब्लेंडिंग पर अभी फैसला नहीं
सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की मौजूदा 20 फीसदी सीमा बढ़ाने को लेकर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है. पेट्रोलियम मंत्रालय ने यह भी कहा कि डीजल में इथेनॉल मिलाने का प्रयोग व्यावहारिक साबित नहीं हुआ है. परीक्षणों के दौरान इथेनॉल मिश्रित डीजल निर्धारित फ्लैश प्वाइंट की शर्तों को पूरा नहीं कर सका. इथेनॉल की मौजूदगी के कारण डीजल का फ्लैश प्वाइंट काफी कम हो गया था.
अमेरिका से इथेनॉल आयात की खबरों को सरकार ने बताया गलत
इथेनॉल नीति को लेकर सरकार का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब भारत में घरेलू इथेनॉल की उपलब्धता और आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में इसकी भूमिका को लेकर चर्चा जारी है.
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने उन रिपोर्टों को भी खारिज किया है जिनमें दावा किया गया था कि भारत ने पेट्रोल में ब्लेंडिंग के लिए अमेरिका से बड़ी मात्रा में इथेनॉल आयात करने पर सहमति जताई है.
मंत्रालय ने इन रिपोर्टों को “बेबुनियाद और तथ्यात्मक रूप से गलत” बताया. सरकार के मुताबिक, Ethanol Blended with Petrol Programme (EBP) के लिए जरूरी इथेनॉल पूरी तरह घरेलू उत्पादकों से खरीदा जाता है और पेट्रोल ब्लेंडिंग में अमेरिका से आयातित इथेनॉल का इस्तेमाल नहीं हो रहा है.
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता के दौरान ईंधन ब्लेंडिंग के लिए इथेनॉल आयात को लेकर भारत ने कोई रियायत या प्रतिबद्धता नहीं दी है. देश में इथेनॉल की खरीद और ब्लेंडिंग नीति घरेलू जरूरतों के आधार पर तय की जाती है.
E20 पेट्रोल की गुणवत्ता पर OMCs ने दी सफाई
इस बीच, सरकारी तेल कंपनियों ने E20 पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है. E20 पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल और बाकी पेट्रोल होता है. इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल में ज्यादा नमी और क्लोराइड संदूषण होने की मीडिया रिपोर्ट्स के बाद देशभर में E20 की व्यापक जांच की गई. इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन ने कहा कि जांच में ईंधन सप्लाई चेन के अलग-अलग चरणों को शामिल किया गया और गुणवत्ता निर्धारित मानकों के भीतर पाई गई.
तेल कंपनियों के मुताबिक, उपभोक्ता E20 पेट्रोल का इस्तेमाल भरोसे के साथ जारी रख सकते हैं. OMC नेटवर्क के जरिए उपलब्ध कराया जा रहा ईंधन निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप है और पूरी सप्लाई चेन में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निगरानी और जांच की मजबूत व्यवस्था मौजूद है.
परिवहन से आगे बढ़ सकता है इथेनॉल का इस्तेमाल
सरकार का खाना पकाने के ईंधन के तौर पर इथेनॉल के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाशना इस जैव ईंधन की भूमिका को परिवहन क्षेत्र से आगे बढ़ाने की दिशा में कदम है. फिलहाल पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की सीमा 20 फीसदी पर बरकरार है और इसके लिए घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल पर ही निर्भरता जारी है.