भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने ऋण प्रतिभूतियों के सार्वजनिक निर्गम के लिए आवेदन प्रक्रिया को बेहतर बनाने को लेकर बड़ा फैसला लिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
अगर आप शेयर बाजार में निवेश करते हैं, तो ये खबर आपके काम की हो सकती है. दरअसल, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने ऋण प्रतिभूतियों के सार्वजनिक निर्गम के लिए आवेदन प्रक्रिया को बेहतर बनाने को लेकर बड़ा फैसला लिया है. इसके तहत बाजार मध्यस्थों के जरिये पांच लाख रुपये तक के निवेश को लेकर व्यक्तिगत निवेशकों को फंड ‘ब्लॉक’ करने के लिए अब केवल यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) का उपयोग करने को कहा गया है. इसे लेकर बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने एक सर्कुलर भी जारी किया है. तो चलिए जानते हैं
1 नवंबर से लागू होंगे प्रावधान
सेबी ने सर्कुलर में यूपीआई के जरिए पांच लाख रुपये तक के निवेश के अलावा यह भी कहा कि निवेशकों के पास आवेदन करने के लिए स्व-प्रमाणित सिंडिकेट बैंकों या शेयर बाजार प्लेटफॉर्म के माध्यम से आवेदन करने जैसे अन्य तरीकों के उपयोग का विकल्प बना रहेगा. यह प्रावधान एक नवंबर से ऋण प्रतिभूतियों के सार्वजनिक निर्गमों पर लागू होंगे.
क्या है इस कदम का उद्देश्य?
सेबी के इस कदम का उद्देश्य ऋण प्रतिभूतियों, गैर-परिवर्तनीय विमोच्य तरजीही शेयर, नगर निगम की ऋण प्रतिभूतियों आदि के सार्वजनिक निर्गम के लिए आवेदन प्रक्रिया को दुरुस्त करना और इक्विटी शेयर के सार्वजनिक निर्गम के मामले में आवेदन प्रक्रिया के अनुरूप इसे बनाना है. सेबी ने कहा है कि बाजार मध्यस्थों (पंजीकृत शेयर ब्रोकर, डिपॉजिटरी प्रतिभागी आदि) के जरिये पांच लाख रुपये तक के निवेश को लेकर व्यक्तिगत निवेशक कोष ‘ब्लॉक’ करने के लिए यूपीआई का उपयोग करेंगे. इसके अलावा, उन्हें मध्यस्थों के साथ जमा किए गए, बोली-सह-आवेदन पत्र में अपने बैंक खाते से जुड़े यूपीआई आईडी प्रदान करना आवश्यक है. बता दें, सेबी ने पिछले सप्ताह ऋण प्रतिभूतियों को सार्वजनिक रूप से जारी करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए नियमों में संशोधन किया था. इसका उद्देश्य ऐसे निर्गम जारी करने वालों के लिए कोष तक पहुंच में तेजी लाना है.
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उच्च दांव वाला DOJ–SEC मामला “नो-एडमिशन” समझौते की ओर बढ़ रहा है, जो वाशिंगटन और भारत के सबसे शक्तिशाली व्यापारिक साम्राज्यों में से एक के बीच एक संतुलित रीसेट का संकेत देता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
अमेरिकी न्याय विभाग (U.S. Department of Justice) से कुछ ही ब्लॉकों की दूरी पर स्थित शांत गलियारों में और यू.एस. सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के प्रवर्तन क्षेत्रों में एक दृष्टिकोण धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है: गौतम अडानी से जुड़ा लंबे समय से चल रहा अमेरिकी कानूनी दबाव शायद अदालत में लड़ाई के रूप में समाप्त न हो, बल्कि एक ऐसे बातचीत से तय समझौते के रूप में समाप्त हो, जिसे अत्यंत सटीकता के साथ तैयार किया गया हो, ऐसा समझौता जो औपचारिक दोष स्वीकार किए बिना मामले को बंद करने की अनुमति दे. वरिष्ठ कानूनी और नीतिगत सूत्रों के अनुसार, समझौता लगभग तय है और संभवतः इसी महीने घोषित किया जा सकता है.
सूत्रों ने बताया कि हाल के हफ्तों में संभावित समाधान ढांचे पर चर्चाएँ तेज हुई हैं, जबकि मामला औपचारिक रूप से न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट में अपनी प्रक्रियात्मक गति से आगे बढ़ रहा है. अमेरिकी प्रवर्तन प्रथा से परिचित कई लोगों के अनुसार, जिस संरचना पर विचार किया जा रहा है वह अमेरिकी नियामक उपकरणों में असामान्य नहीं है: एक नागरिक समझौता जिसमें आरोपों को “स्वीकार या अस्वीकार किए बिना” निपटाया जाता है, एक ऐसा सूत्र जिसने पिछले दो दशकों में कई जटिल सीमा-पार प्रवर्तन मामलों को हल किया है.
वह मामला जिसने अडानी को वाशिंगटन की निगाह में ला दिया
इस मामले के केंद्र में एक दोहरी अमेरिकी कार्रवाई है सिविल और आपराधिक, जिसने अमेरिकी नियामकों के अधिकार क्षेत्र को भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र तक काफी बढ़ा दिया.
SEC की सिविल शिकायत में आरोप है कि अडानी और उनके सहयोगियों ने ऊर्जा अनुबंधों से जुड़े कथित तौर पर सैकड़ों मिलियन डॉलर के अनुचित भुगतान की योजना बनाई, जबकि साथ ही अमेरिकी निवेशकों से ऐसी जानकारी के आधार पर पूंजी जुटाई जो नियामकों के अनुसार भ्रामक थी.
इसके समानांतर, अमेरिकी अभियोजकों ने 2024 में एक आपराधिक अभियोग (indictment) जारी किया, जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों पर साजिश, प्रतिभूति धोखाधड़ी और अमेरिकी वित्तीय बाजारों से जुड़े भ्रष्टाचार-रोधी कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए.
दोनों कार्रवाइयों के पीछे वाशिंगटन की परिचित कानूनी धारणा है: यदि अमेरिकी निवेशक, डॉलर लेनदेन या अमेरिकी वित्तीय प्रणाली शामिल है, तो अधिकार क्षेत्र लागू होता है, भले ही मूल गतिविधि संयुक्त राज्य के बाहर हुई हो.
इस बाह्य-क्षेत्रीय अधिकार को चुनौती दी गई है. अडानी की कानूनी टीम ने अदालत में दलील दी है कि कथित आचरण मूल रूप से “बाह्य-क्षेत्रीय” है और अमेरिकी अदालतों के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, यह बचाव अभी भी मामले को खारिज करने के लिए दायर याचिका का हिस्सा है.
फिर भी, जैसे-जैसे यह कानूनी चुनौती आगे बढ़ रही है, दोनों पक्षों ने चुपचाप प्रक्रियात्मक समयसीमा पर सहमति जैसा रुख अपनाया है, जो एक वाशिंगटन स्थित प्रतिभूति वकील के अनुसार “सिर्फ मुकदमा नहीं, बल्कि बातचीत की जगह” का संकेत है.
समझौता क्यों और अभी क्यों
अमेरिकी प्रवर्तन संस्कृति में, विशेषकर जटिल सीमा-पार मामलों में, मुकदमे अक्सर अपवाद होते हैं, नियम नहीं.
पूर्व प्रवर्तन अधिकारियों और व्हाइट-कॉलर रक्षा वकीलों के अनुसार, तीन कारक ऐसे हैं जो अडानी मामले में समझौते की संभावना बढ़ाते हैं.
पहला, साक्ष्य की जटिलता, कथित आचरण का अधिकांश हिस्सा अमेरिकी क्षेत्र से बाहर हुआ है, जिसमें विदेशी अधिकारी, ऑफशोर संरचनाएँ और बहुराष्ट्रीय वित्तपोषण शामिल हैं. अमेरिकी आपराधिक मानकों को पूरा करने वाला ट्रायल केस बनाना संसाधन-गहन और अनिश्चित है.
दूसरा, अधिकार क्षेत्र का तनाव, SEC को भारत में समन भेजने में पहले ही प्रक्रियात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ा है, और अदालत से पारंपरिक माध्यमों को दरकिनार करने की अनुमति भी माँगनी पड़ी है. यह तनाव मामले की कूटनीतिक और कानूनी संवेदनशीलता को दर्शाता है.
तीसरा, बाजार स्थिरता, अमेरिकी प्रवर्तन कार्रवाई के मात्र सामने आने से अडानी समूह के बाजार मूल्य में समय-समय पर अरबों डॉलर की गिरावट आई, जो लंबे अनिश्चितता के प्रभाव को दर्शाता है.
नियामकों के लिए, एक संतुलित समझौता प्रवर्तन उद्देश्यों दंड, अनुपालन प्रतिबद्धताओं और मिसाल को प्राप्त कर सकता है, बिना लंबे सीमा-पार मुकदमे के जोखिम के.
“नो एडमिट, नो डिनाई” सिद्धांत
उभरती हुई इस कहानी के केंद्र में एक विशिष्ट अमेरिकी कानूनी उपकरण है.
SEC लंबे समय से ऐसे समझौतों पर निर्भर रहा है जिनमें प्रतिवादी न तो दोष स्वीकार करते हैं और न ही इनकार करते हैं, लेकिन वित्तीय दंड और अनुपालन उपायों पर सहमत होते हैं. यह दृष्टिकोण नियामकों को ट्रायल की अनिश्चितता के बिना लागू करने योग्य परिणाम देता है, जबकि प्रतिवादी औपचारिक स्वीकारोक्ति से बचते हैं जो अन्य क्षेत्रों में अतिरिक्त देनदारियों को जन्म दे सकती है.
वाशिंगटन के कानूनी विशेषज्ञ इसे “स्वीकारोक्ति के बिना समाधान” कहते हैं.
ऐसे समझौतों में आम तौर पर शामिल होते हैं: मौद्रिक दंड या वसूली, भविष्य के उल्लंघनों पर रोक और शासन या अनुपालन संबंधी प्रतिबद्धताएँ, और कुछ मामलों में अधिकारी या निदेशक के रूप में सेवा करने पर प्रतिबंध. महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वीकारोक्ति का अभाव परिणाम के अभाव का संकेत नहीं है. आदेश स्वयं कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है और उल्लंघन पर लागू किया जा सकता है.
समानांतर रूप से, आपराधिक पक्ष पर, DOJ ने कॉर्पोरेट मामलों में डिफर्ड प्रॉसिक्यूशन एग्रीमेंट (DPA) या नॉन-प्रॉसिक्यूशन एग्रीमेंट (NPA) का अधिक उपयोग किया है, ऐसे तंत्र जो अनुपालन, जुर्माना और निगरानी के बदले आरोपों को स्थगित या समाप्त कर सकते हैं.
सूत्रों के अनुसार, अडानी मामले में किसी भी व्यापक समाधान में SEC के साथ नागरिक समझौता और DOJ के साथ एक संरचित समाधान का संयोजन शामिल हो सकता है — हालांकि सटीक रूप अभी भी बदल रहा है.
अडानी के लिए रणनीतिक गणना
अडानी के लिए यह विकल्प केवल कानूनी नहीं, बल्कि वैश्विक है. अमेरिका में लंबा मुकदमा समूह को अनिश्चितता के घेरे में रखेगा, जबकि वह अंतरराष्ट्रीय पूंजी जुटा रहा है और बुनियादी ढांचे में विस्तार कर रहा है. एक समझौता, भले ही वित्तीय दंड के साथ हो, अंतिमता प्रदान करता है.
समान रूप से महत्वपूर्ण यह है कि दोष स्वीकार करने से बचना. ऐसा स्वीकारोक्ति भारत और अन्य न्याय क्षेत्रों में अतिरिक्त प्रभाव पैदा कर सकती है, जिससे नियामकीय या शेयरधारक कार्रवाई शुरू हो सकती है.
एक वाशिंगटन स्थित रक्षा वकील ने स्पष्ट कहा: “ऐसे मामलों में, पैसे से ज्यादा भाषा मायने रखती है.”
आगे क्या होगा
औपचारिक रूप से मामला अभी भी अदालत में सक्रिय है. खारिज करने की याचिकाएँ लंबित हैं और प्रक्रियात्मक समयसीमाएँ जारी हैं. लेकिन इसके पीछे वाशिंगटन में बातचीत यह संकेत देती है कि दोनों पक्ष अंतिम परिणाम को समझते हैं. एक सावधानीपूर्वक शब्दबद्ध, कानूनी रूप से मजबूत और कूटनीतिक रूप से संतुलित समझौता अमेरिकी नियामकों को अधिकार क्षेत्र और मानक लागू करने की अनुमति देगा, जबकि अडानी को अपने सबसे महत्वपूर्ण कानूनी चुनौतियों में से एक को बंद करने का रास्ता देगा.
यह परिणाम कब और किन शर्तों पर होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष कितनी दूर तक जाने को तैयार हैं. लेकिन वाशिंगटन के प्रवर्तन हलकों में एक बात तेजी से स्पष्ट हो रही है: यह मामला शायद अदालत में जीता या हारा नहीं जाएगा, बल्कि बंद दरवाजों के पीछे, पंक्ति-दर-पंक्ति तय किया जाएगा.
राजनीतिक प्रभाव, संयुक्त राज्य
वाशिंगटन में, बिना दोष स्वीकार किए हुआ समझौता ट्रंप प्रशासन की कमजोरी नहीं, बल्कि संतुलित तरीके से इस्तेमाल की गई नियामक शक्ति का उदाहरण माना जाएगा. DOJ और SEC के लिए यह साफ संदेश है कि अमेरिकी बाजार और डॉलर प्रणाली पर उनका कानूनी अधिकार बना रहता है, चाहे मामला कहीं भी हुआ हो. साथ ही, अदालत की लंबी लड़ाई से बचकर यह कदम भारत के साथ रिश्तों में अनावश्यक तनाव पैदा होने से भी रोकता है, खासकर तब जब अमेरिका व्यापार, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत को अहम साझेदार मान रहा है. नीति विशेषज्ञ इसे “गोल्डीलॉक्स जोन” कहते हैं, यानी ऐसा संतुलन जहाँ कार्रवाई भी हो और टकराव भी न बढ़े.
राजनीतिक प्रभाव, भारत
भारत में इसका प्रभाव अधिक जटिल होगा. एक समझौता विशेषकर बिना स्वीकारोक्ति के सरकार और अडानी समूह को इसे दोष के बजाय समाधान के रूप में प्रस्तुत करने की जगह देता है. इससे नई दिल्ली यह तर्क दे सकती है कि भारतीय कॉर्पोरेट दिग्गज वैश्विक जांच का सामना कर सकते हैं, बिना अमेरिकी अदालत में स्पष्ट हार के. साथ ही, विपक्षी आवाजें इसे शासन मानकों और नियामकीय निगरानी पर सवाल उठाने के लिए उपयोग कर सकती हैं. लेकिन राजनीतिक शोर के नीचे एक शांत संकेत है: वैश्विक स्तर पर काम करने वाले भारतीय समूह अब पूरी तरह पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों की अधिकार-सीमा और अनुपालन अपेक्षाओं के भीतर हैं.
एक नया मोड़
कुल मिलाकर, यह समाधान एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है. लंबे कानूनी टकराव के बजाय, एक संरचित समझौता अमेरिका–भारत आर्थिक संबंधों में अधिक व्यावहारिक चरण का रास्ता खोलता है, जहाँ प्रवर्तन कार्रवाइयाँ और पूंजी प्रवाह तथा रणनीतिक सहयोग साथ-साथ चलते हैं. इस तरह यह विवाद पर एक रेखा खींच देता है और खेल के नियमों को स्पष्ट करता है. वाशिंगटन और नई दिल्ली दोनों के लिए, यह स्पष्टता अंततः मामले से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
सरकार का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनाना है. इन नई परियोजनाओं को इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए गुजरात में दो नए चिप प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे दी है. इस फैसले के साथ भारत में घरेलू चिप निर्माण क्षमता विकसित करने की योजना को और गति मिलेगी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत दो नई परियोजनाओं को हरी झंडी दी गई. इनमें एक मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और दूसरी सेमीकंडक्टर पैकेजिंग यूनिट शामिल है. दोनों प्रोजेक्ट्स गुजरात में स्थापित किए जाएंगे.
3,936 करोड़ रुपये का संयुक्त निवेश
इन दोनों परियोजनाओं में कुल मिलाकर लगभग 3,936 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है. सरकार के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स से 2,200 से अधिक कुशल रोजगार अवसर पैदा होने की उम्मीद है.
धोलेरा में बड़ा सेमीकंडक्टर प्लांट
क्रिस्टल मैट्रिक्स (Crystal Matrix) द्वारा गुजरात के धोलेरा में एक इंटीग्रेटेड कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन और पैकेजिंग यूनिट स्थापित की जाएगी. यह यूनिट मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले पैनल बनाएगी और गैलियम नाइट्राइड (GaN) फाउंड्री सेवाएं भी प्रदान करेगी.
इस प्लांट की वार्षिक क्षमता 72,000 वर्ग मीटर डिस्प्ले पैनल और 24,000 सेट RGB GaN वेफर्स होगी. इसके उत्पाद टीवी, स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच, इन-कार डिस्प्ले और एक्सटेंडेड रियलिटी डिवाइसेज जैसे क्षेत्रों में उपयोग किए जाएंगे.
सूरत में OSAT यूनिट का निर्माण
सुची सेमीकॉन (Suchi Semicon) द्वारा सूरत में एक आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (OSAT) यूनिट स्थापित की जाएगी. यह यूनिट डिस्क्रीट सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन करेगी. इसकी सालाना उत्पादन क्षमता 1 अरब से अधिक चिप्स की होगी, जो ऑटोमोबाइल, औद्योगिक ऑटोमेशन, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स में इस्तेमाल होंगे.
सेमीकंडक्टर मिशन में बढ़ी रफ्तार
इन नई मंजूरियों के बाद भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत कुल परियोजनाओं की संख्या बढ़कर 12 हो गई है. इन सभी परियोजनाओं में कुल अनुमानित निवेश लगभग 1.64 लाख करोड़ रुपये है.
सरकार के अनुसार, इनमें से दो परियोजनाएं पहले ही व्यावसायिक उत्पादन और शिपमेंट शुरू कर चुकी हैं, जबकि दो अन्य जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है.
डिजाइन इकोसिस्टम भी मजबूत
सरकार ने बताया कि देश में सेमीकंडक्टर डिजाइन इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है. अब तक 300 से अधिक शैक्षणिक संस्थान और 100 से ज्यादा स्टार्टअप्स को डिजाइन इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट दिया जा चुका है.
आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम
सरकार का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनाना है. इन नई परियोजनाओं को इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है.
इस तिमाही में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 11% बढ़कर 82,762 करोड़ रुपये पहुंच गया. मजबूत ऑर्डर इनफ्लो और कई सेक्टर्स से मिले बड़े प्रोजेक्ट्स ने कंपनी की टॉपलाइन को सपोर्ट किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर इंजीनियरिंग सेक्टर की दिग्गज कंपनी लार्सन एंड टर्बो (L&T) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही के नतीजे जारी किए हैं, जिसमें कंपनी के मुनाफे में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि रेवेन्यू और ऑर्डर इनफ्लो में मजबूत वृद्धि देखने को मिली है.
Q4 में मुनाफे में हल्की गिरावट
जनवरी-मार्च तिमाही में L&T का समेकित शुद्ध लाभ 3% घटकर 5,326 करोड़ रुपये रहा. कंपनी ने बताया कि यह गिरावट मुख्य रूप से पिछले वर्ष हुए एक बार के असाधारण लाभ के कारण बने आधार प्रभावकी वजह से हुई है.
रेवेन्यू में 11% की बढ़ोतरी
इस तिमाही में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 11% बढ़कर 82,762 करोड़ रुपये पहुंच गया. मजबूत ऑर्डर इनफ्लो और कई सेक्टर्स से मिले बड़े प्रोजेक्ट्स ने कंपनी की टॉपलाइन को सपोर्ट किया.
वेस्ट एशिया तनाव का सीमित असर
कंपनी प्रबंधन ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का इस तिमाही पर केवल सीमित प्रभाव पड़ा है. हालांकि, आगे चलकर सप्लाई चेन और इनपुट कॉस्ट पर इसका दबाव बढ़ सकता है, जिसे लेकर कंपनी सतर्क है.
रिकॉर्ड ऑर्डर इनफ्लो और मजबूत ऑर्डर बुक
L&T ने तिमाही के दौरान 89,772 करोड़ रुपये के ऑर्डर हासिल किए, जो बिल्डिंग्स, रोड्स, अर्बन ट्रांसपोर्ट, पावर ट्रांसमिशन और हाइड्रोकार्बन जैसे क्षेत्रों से आए. कंपनी का कुल ऑर्डर बुक 31 मार्च तक 7.40 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिसमें 52% हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आया है.
डिविडेंड की घोषणा
कंपनी के बोर्ड ने 38 रुपये प्रति शेयर के फाइनल डिविडेंड की सिफारिश की है, जो शेयरधारकों की मंजूरी के बाद लागू होगा.
पूरे वित्त वर्ष का प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2025-26 में L&T का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 7% बढ़कर 16,084 करोड़ रुपये रहा, जबकि कुल राजस्व 12% बढ़कर 2.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इसी अवधि में वार्षिक ऑर्डर इनफ्लो 22% बढ़कर 4.35 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया.
सेगमेंट-वाइज प्रदर्शन
इंफ्रास्ट्रक्चर सेगमेंट ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए 26% की वृद्धि दर्ज की, जबकि एनर्जी सेगमेंट में 34% की गिरावट और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में 24% की गिरावट देखी गई. आईटी और टेक्नोलॉजी सर्विसेज सेगमेंट में 13% की बढ़त रही, वहीं फाइनेंशियल सर्विसेज सेगमेंट में 22% की वृद्धि दर्ज की गई.
आगे की रणनीति और आउटलुक
कंपनी ने कहा कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं, लेकिन भारत का डिजिटल और सर्विस सेक्टर ग्रोथ का प्रमुख इंजन बना रहेगा. इसमें फिनटेक, क्लाउड, AI-आधारित सेवाएं और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स अहम भूमिका निभाएंगे.
FY27 का अनुमान
L&T ने संकेत दिया है कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में पश्चिम एशिया तनाव का कुछ असर सप्लाई चेन और इनपुट कॉस्ट के जरिए देखने को मिल सकता है. हालांकि कंपनी ने पूरे साल के लिए 10-12% रेवेन्यू ग्रोथ और स्थिर मार्जिन का अनुमान जताया है.
इस विस्तारित कार्यक्रम के तहत 2030 तक करीब 5.5 मिलियन शिक्षार्थियों, कामगारों और MSMEs तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है. इसका उद्देश्य AI को केवल तकनीक नहीं बल्कि समावेशी विकास का साधन बनाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एशिया की सबसे बड़ी सोशल इन्वेस्टर्स नेटवर्क संस्था AVPN ने अपने AI Opportunity Fund: Asia-Pacific के विस्तार की घोषणा की है. इस नई चरण में Google.org द्वारा 10 मिलियन डॉलर (लगभग 83 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त योगदान दिया गया है, जिसका उद्देश्य शिक्षकों, युवाओं, कामगारों और MSMEs को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) स्किल्स से सक्षम बनाना है.
AI को नई बुनियादी साक्षरता बनाने की पहल
इस कार्यक्रम का फोकस अब केवल AI स्किल्स सिखाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे रोजमर्रा की पढ़ाई, कामकाज और बिजनेस में लागू करने पर होगा. AVPN का मानना है कि आने वाले समय में AI कोई स्पेशलाइज्ड स्किल नहीं बल्कि एक “बेसिक लिटरेसी” बन जाएगी, जिसे हर छात्र, शिक्षक और बिजनेस को सीखना जरूरी होगा.
शिक्षा और युवाओं पर खास जोर
नई योजना के तहत स्कूलों, कॉलेजों और ट्रेनिंग संस्थानों में AI लर्निंग को मजबूत किया जाएगा. इस पहल से पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में लगभग 4.7 मिलियन लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद है. नैना सभरवाल बत्रा ने कहा कि शिक्षक इस बदलाव की सबसे अहम कड़ी हैं, क्योंकि जब वे AI को पढ़ाई में शामिल करते हैं, तो पूरा सिस्टम धीरे-धीरे AI-रेडी बनता है. वहीं, संजय गुप्ता ने कहा कि जब शिक्षक जिम्मेदारी से AI का इस्तेमाल करते हैं, तो इसका सीधा फायदा छात्रों और पूरे शिक्षा तंत्र को मिलता है.
क्रिएटर्स और MSMEs के लिए नई स्किलिंग पहल
इस फंड के तहत क्रिएटिव इंडस्ट्री के लिए भी एक खास AI स्किलिंग प्रोग्राम शुरू किया जाएगा, जिसका पहला पायलट प्रोजेक्ट एशिया-प्रशांत क्षेत्र के किसी देश में लागू किया जाएगा. इसके अलावा छोटे और मझोले व्यवसायों (MSMEs) को AI आधारित टूल्स से दक्षता, निर्णय क्षमता और बाजार पहुंच बढ़ाने में मदद दी जाएगी. इस पहल को ASEAN क्षेत्रीय संस्थाओं के सहयोग से आगे बढ़ाया जाएगा.
वर्कफोर्स और रोजगार पर फोकस
कार्यक्रम का एक बड़ा लक्ष्य कामगारों को AI आधारित नई नौकरियों के लिए तैयार करना भी है. इसके तहत ऐसे ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किए जाएंगे जो छात्रों से लेकर नौकरीपेशा लोगों तक एक निरंतर स्किल डेवलपमेंट पाइपलाइन बनाएं. इससे कामगारों को बदलते रोजगार बाजार में बेहतर अवसर मिल सकेंगे.
नीति और क्षेत्रीय सहयोग
AVPN ने ASEAN फाउंडेशन और क्षेत्रीय शिक्षा मंत्रालयों के साथ मिलकर इस पहल को नीति स्तर पर भी मजबूत करने की योजना बनाई है. इसका लक्ष्य है कि AI ट्रेनिंग को स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढाला जाए और पूरे क्षेत्र में एक समान डिजिटल क्षमता विकसित हो.
2030 तक का लक्ष्य
इस विस्तारित कार्यक्रम के तहत 2030 तक करीब 5.5 मिलियन शिक्षार्थियों, कामगारों और MSMEs तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है. इसका उद्देश्य AI को केवल तकनीक नहीं बल्कि समावेशी विकास का साधन बनाना है.
यह पहल एशिया-प्रशांत क्षेत्र में डिजिटल बदलाव की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर AI स्किल्स को बड़े पैमाने पर अपनाया गया, तो यह आने वाले वर्षों में शिक्षा, रोजगार और छोटे व्यवसायों के लिए विकास के नए अवसर खोल सकता है.
कंपनी की ग्रोथ में ऑटो सेक्टर, खासकर एसयूवी सेगमेंट, सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा. साल के दौरान एसयूवी की बिक्री 6.6 लाख यूनिट तक पहुंच गई और बाजार हिस्सेदारी बढ़कर 25.3% हो गई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मजबूत एसयूवी डिमांड, कृषि कारोबार में स्थिर प्रदर्शन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित पहलों के सहारे महिंद्रैा (Mahindra & Mahindra) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में शानदार नतीजे पेश किए हैं. कंपनी का मुनाफा और राजस्व दोनों ही मजबूत वृद्धि के साथ नई ऊंचाई पर पहुंचे, जिससे इसके शेयरों में भी तेजी देखने को मिली.
चौथी तिमाही में कंपनी का समेकित शुद्ध मुनाफा 42% बढ़कर 4,668 करोड़ रुपये हो गया. वहीं राजस्व 29% की वृद्धि के साथ 54,982 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. नतीजों के बाद बीएसई सेसेंक्स पर कंपनी के शेयर में तेजी दर्ज की गई और यह मंगलवार को 3.36 प्रतिशत की तेजी के साथ 3,210.80 रुपये पर बंद हुआ था.
पूरे साल भी मजबूत ग्रोथ
पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कंपनी का कुल राजस्व 25% बढ़कर 1,98,639 करोड़ रुपये हो गया, जबकि कर बाद लाभ (PAT) 32% बढ़कर 17,099 करोड़ रुपये रहा. यह प्रदर्शन कंपनी की मजबूत बिजनेस रणनीति और विविध पोर्टफोलियो को दर्शाता है.
वाहन कारोबार बना ग्रोथ का इंजन
कंपनी की ग्रोथ में ऑटो सेक्टर, खासकर एसयूवी सेगमेंट, सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा. साल के दौरान एसयूवी की बिक्री 6.6 लाख यूनिट तक पहुंच गई और बाजार हिस्सेदारी बढ़कर 25.3% हो गई. इससे कंपनी की लीडरशिप और मजबूत हुई.
कृषि कारोबार और मजबूत मार्जिन
कृषि उपकरण सेगमेंट ने घरेलू मांग के चलते अच्छा प्रदर्शन किया, हालांकि वैश्विक बाजारों में कुछ कमजोरी रही. ट्रैक्टर बिजनेस में मार्जिन 20.54% पर स्थिर रहा, जो इस सेगमेंट की मजबूती को दर्शाता है.
फाइनेंशियल और सर्विस बिजनेस का योगदान
कंपनी के फाइनेंशियल सर्विसेज और अन्य सेवा कारोबारों ने भी बेहतर प्रदर्शन किया. चौथी तिमाही में इस सेगमेंट का राजस्व 23% बढ़कर 12,147 करोड़ रुपये रहा, जबकि मुनाफा 64% उछलकर 1,348 करोड़ रुपये हो गया.
AI से नए अवसर
कंपनी के मैनेजमेंट के अनुसार, AI अब बिजनेस का अहम हिस्सा बन चुका है. वाहन कारोबार में AI आधारित पहल से करीब 4,100 करोड़ रुपये के अतिरिक्त राजस्व की उम्मीद है. इसके साथ ही ग्राहक संतुष्टि में सुधार और प्रोडक्ट डेवलपमेंट का समय भी घटेगा.
क्षमता विस्तार पर फोकस
कंपनी ने बढ़ती मांग को देखते हुए उत्पादन क्षमता में भी इजाफा किया है. मासिक उत्पादन क्षमता को 59,000 यूनिट से बढ़ाकर करीब 64,500 यूनिट किया गया है, जिससे भविष्य की ग्रोथ को सपोर्ट मिलेगा.
कंपनी का मानना है कि मजबूत फंडामेंटल, अनुशासित निवेश और नए टेक्नोलॉजी इनिशिएटिव्स के चलते वह अनिश्चित वैश्विक माहौल में भी ग्रोथ बनाए रखने की स्थिति में है. आने वाले समय में SUV, EV और AI आधारित इनोवेशन कंपनी की रणनीति के केंद्र में रहेंगे.
आरबीआई ने इस मसौदे पर सभी हितधारकों से 26 मई तक सुझाव आमंत्रित किए हैं. अंतिम नियम लागू होने से पहले इन सुझावों पर विचार किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कर्ज वसूली को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और एनबीएफसी के लिए नए नियमों का मसौदा जारी किया है. इस प्रस्ताव के तहत, यदि कोई कर्ज नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) बन जाता है और वसूली के अन्य सभी विकल्प विफल हो जाते हैं, तो बैंक गिरवी रखी गई अचल संपत्ति जैसे जमीन या मकान पर कब्जा कर सकते हैं. हालांकि, केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि यह कदम केवल विशेष परिस्थितियों में ही उठाया जाएगा और इसके लिए सख्त शर्तें लागू होंगी.
क्या है नया प्रस्ताव?
आरबीआई के ड्राफ्ट नियमों के मुताबिक, बैंक और एनबीएफसी डूबे हुए कर्ज की वसूली के लिए सिक्योरिटी के तौर पर रखी गई प्रॉपर्टी को अपने कब्जे में ले सकेंगे. यह कदम तब उठाया जाएगा जब कर्ज की रिकवरी के अन्य सभी रास्ते बंद हो चुके हों या असरदार साबित न हुए हों.
7 साल के भीतर बेचना होगा एसेट
प्रस्ताव में यह भी साफ किया गया है कि वित्तीय संस्थान ऐसी संपत्तियों को हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते. उन्हें अधिकतम सात साल के भीतर इन प्रॉपर्टीज को बेचकर अपनी राशि की वसूली करनी होगी. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बैंक रियल एस्टेट कारोबार में न उलझें और केवल कर्ज वसूली तक सीमित रहें.
क्या होगा फायदा?
आरबीआई के अनुसार, इस व्यवस्था से बैंकों को डूबे हुए कर्ज की बेहतर रिकवरी में मदद मिलेगी. समयबद्ध और पारदर्शी बिक्री प्रक्रिया से संस्थान अपने नुकसान को कम कर सकेंगे और वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनी रहेगी.
किन्हें नहीं बेच पाएंगे प्रॉपर्टी?
ड्राफ्ट में गड़बड़ी या हितों के टकराव को रोकने के लिए सख्त प्रावधान भी किए गए हैं. इसके तहत बैंक या एनबीएफसी ऐसी जब्त की गई प्रॉपर्टी को उसी डिफॉल्टर या उससे जुड़े किसी व्यक्ति को दोबारा नहीं बेच सकेंगे.
SNFA क्या है?
आरबीआई ने इन संपत्तियों को “स्पेसिफाइड नॉन फाइनेंशियल एसेट्स (SNFA)” की श्रेणी में रखा है. इसका मतलब उन अचल संपत्तियों से है जिन्हें कर्ज की वसूली के लिए उधारकर्ता से लेकर संस्थान अपने कब्जे में लेते हैं. इसमें अन्य गैर-वित्तीय एसेट्स भी शामिल हो सकते हैं.
26 मई तक मांगे गए सुझाव
आरबीआई ने इस मसौदे पर सभी हितधारकों से 26 मई तक सुझाव आमंत्रित किए हैं. अंतिम नियम लागू होने से पहले इन सुझावों पर विचार किया जाएगा.
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो बैंकों के लिए NPA रिकवरी का एक मजबूत विकल्प तैयार होगा. वहीं, उधार लेने वालों के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि डिफॉल्ट की स्थिति में गिरवी रखी गई संपत्ति पर कब्जा संभव है, जिससे क्रेडिट अनुशासन को बढ़ावा मिल सकता है.
मंगलवार को सेंसेक्स 252 अंक यानी 0.33% गिरकर 77,017.79 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50 86.50 अंक (0.36%) टूटकर 24,032.80 के स्तर पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कमजोर होते रुपये और सेक्टोरल दबाव के बीच कल भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का माहौल बना हुआ है. एक ओर सेंसेक्स और निफ्टी 50 गिरावट के साथ बंद हुए, वहीं दूसरी ओर ग्लोबल बाजारों की मजबूती और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आज के कारोबार के लिए राहत के संकेत दे रही है. ऐसे में आज निवेशकों के लिए बाजार की दिशा अब वैश्विक घटनाक्रम, क्रूड ऑयल की चाल और चुनिंदा शेयरों में आ रहे एक्शन पर निर्भर करेगी.
मंगलवार को कारोबार के अंत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE Sensex) 252 अंक यानी 0.33% गिरकर 77,017.79 पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (Nifty 50) 86.50 अंक (0.36%) टूटकर 24,032.80 के स्तर पर आ गया. दिन के दौरान सेंसेक्स में 600 अंकों से अधिक की गिरावट भी देखने को मिली.
रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर
कमजोर बाजार सेंटीमेंट के बीच भारतीय मुद्रा पर भी दबाव रहा. रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.2% गिरकर 95.28 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ, जो निवेशकों की बढ़ती चिंता को दर्शाता है.
किन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट?
सेंसेक्स के 30 में से 20 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. प्रमुख गिरने वाले शेयरों में ICICI Bank सबसे ज्यादा 1.54% लुढ़का. इसके अलावा Tech Mahindra, Axis Bank, Maruti Suzuki, Adani Ports, State Bank of India और Tata Steel में भी गिरावट रही. दूसरी ओर कुछ शेयरों ने बाजार को सहारा देने की कोशिश की, जिनमें Infosys, Reliance Industries, Hindustan Unilever और Titan Company शामिल रहे.
सेक्टरवार प्रदर्शन
सेक्टोरल स्तर पर दबाव साफ दिखा. बैंकिंग, रियल्टी और ऑयल एंड गैस शेयरों में गिरावट रही. वहीं ऑटो और एफएमसीजी सेक्टर में कुछ मजबूती देखने को मिली, जिसने गिरावट को सीमित रखने में मदद की. मुख्य सूचकांकों के विपरीत, ब्रॉडर मार्केट में सीमित तेजी रही. मिडकैप इंडेक्स में 0.17% और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.28% की बढ़त दर्ज की गई, जो चुनिंदा शेयरों में खरीदारी का संकेत है.
भू-राजनीतिक तनाव बना बड़ी चिंता
पश्चिम एशिया में तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. स्ट्रेट ऑफ हार्मुज के पास अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की खबरों ने बाजार पर दबाव बनाया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कार्गो जहाजों पर हमले और सैन्य गतिविधियों ने हालात को और गंभीर बना दिया है. इस बीच, अमेरिका के राषट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिकी जहाजों पर किसी भी हमले का सख्त जवाब दिया जाएगा.
विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक वैश्विक स्तर पर तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है. निवेशकों को फिलहाल सतर्क रहने और चुनिंदा सेक्टरों में ही निवेश की सलाह दी जा रही है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज यानी 6 मई 2026 को भारतीय शेयर बाजार में मजबूत शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं, क्योंकि वैश्विक बाजारों की तेजी और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से निवेशकों का सेंटीमेंट बेहतर हुआ है; GIFT Nifty करीब 204 अंकों की बढ़त के साथ 24,310 के आसपास कारोबार करता दिखा, जिससे Nifty 50 के हरे निशान में खुलने की उम्मीद है. इस बीच Brent Crude और WTI Crude में गिरावट से महंगाई को लेकर चिंता कुछ कम हुई है. स्टॉक्स इन फोकस में Larsen & Toubro (मुनाफा हल्का घटा), Hero MotoCorp (मजबूत Q4), Biocon (लीडरशिप बदलाव), Grasim Industries (NCLAT से राहत), Poonawalla Fincorp (मुनाफा 4 गुना), Vedanta (विस्तार योजना), Emcure Pharmaceuticals, Zen Technologies, KEC International और Lemon Tree Hotels जैसे शेयर शामिल हैं, जबकि आज One 97 Communications, Bajaj Auto, Polycab India, Godrej Consumer Products और PB Fintech समेत कई कंपनियों के Q4 नतीजों पर भी बाजार की नजर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 भारतीय इक्विटी बाजार के लिए काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. इस दौरान वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने बाजार में अस्थिरता बढ़ाई.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है. मोतीलाल ओसवाल (Motilal Oswal Financial Services) की एक रिपोर्ट के अनुसार Nifty 500 कंपनियों में DII की हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 20.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की हिस्सेदारी घटकर 17.1 प्रतिशत रह गई है. यह बदलाव बाजार में बदलते निवेश रुझानों को स्पष्ट रूप से दर्शाता है.
वैश्विक तनावों के बीच उतार-चढ़ाव भरा साल
वित्त वर्ष 2026 भारतीय इक्विटी बाजार के लिए काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. इस दौरान वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने बाजार में अस्थिरता बढ़ाई. इसके बावजूद घरेलू निवेशकों ने लगातार बाजार को सहारा दिया और स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
DII की मजबूत खरीदारी से बाजार को मिला सहारा
2026 की पहली तिमाही में घरेलू संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 27.2 अरब डॉलर का निवेश किया. इस दौरान सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए नियमित निवेश प्रवाह ने भी बाजार को मजबूती दी. घरेलू निवेशकों की लगातार खरीदारी ने विदेशी निवेशकों की बिकवाली के दबाव को काफी हद तक संतुलित किया.
खरीदारी से भारी बिकवाली तक
विदेशी निवेशकों का रुख इस अवधि में काफी अस्थिर रहा. फरवरी 2026 में FII ने लगभग 1.7 अरब डॉलर की शुद्ध खरीदारी की, लेकिन मार्च में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण उन्होंने 14.2 अरब डॉलर की भारी बिकवाली कर दी. इस तरह पूरे तिमाही में कुल विदेशी निवेश आउटफ्लो 15.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसने बाजार पर दबाव बढ़ाया.
ओनरशिप पैटर्न में बड़ा बदलाव
मार्च 2026 तक Nifty 500 में FII और DII के बीच ओनरशिप रेशियो घटकर 0.8 गुना रह गया. फ्री फ्लोट में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 360 बेसिस पॉइंट घटकर 33.8 प्रतिशत पर आ गई, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी 310 बेसिस पॉइंट बढ़कर 41.2 प्रतिशत तक पहुंच गई. इस अवधि में प्रमोटर होल्डिंग 49.4 प्रतिशत पर स्थिर रही, जबकि रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़कर 12.7 प्रतिशत हो गई.
सेक्टर वाइज निवेश में अलग-अलग रणनीति
सेक्टर स्तर पर निवेश रणनीतियों में स्पष्ट अंतर देखने को मिला. घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 24 में से 21 सेक्टरों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई, जिसमें प्राइवेट बैंक, टेक्नोलॉजी, टेलीकॉम, रियल एस्टेट, हेल्थकेयर और एनबीएफसी प्रमुख रहे. दूसरी ओर विदेशी निवेशकों ने बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और इंश्योरेंस (BFSI) सेक्टर में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 32.1 प्रतिशत कर दी, जबकि मेटल्स, हेल्थकेयर, यूटिलिटीज और ऑयल-गैस में निवेश बढ़ाया. खास बात यह रही कि टेक्नोलॉजी सेक्टर में FII की हिस्सेदारी घटकर रिकॉर्ड 7.3 प्रतिशत पर पहुंच गई.
रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार घरेलू संस्थागत निवेशकों की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है और वे भारतीय बाजार की दिशा तय करने में अहम ताकत बनते जा रहे हैं. यदि विदेशी निवेशकों की बिकवाली में कमी आती है तो बाजार का सेंटीमेंट बेहतर हो सकता है, जबकि लगातार विदेशी निवेश वापसी से बाजार में तेज तेजी देखने को मिल सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, RBI की दर कटौती से कर्ज जरूर सस्ता हुआ, लेकिन इसका पूरा फायदा अभी तक ग्राहकों तक नहीं पहुंच पाया है. बैंकिंग सिस्टम में असमान ट्रांसमिशन इस अंतर की बड़ी वजह बना हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बावजूद वित्त वर्ष 2025-26 में इसका पूरा लाभ उधारकर्ताओं तक नहीं पहुंच पाया. Bank of Baroda (BoB) की एक रिपोर्ट के अनुसार, लेंडिंग रेट्स में गिरावट रेपो रेट की तुलना में धीमी रही, जिससे कर्ज सस्ता होने की प्रक्रिया आंशिक ही रही.
125 बेसिस पॉइंट की कटौती, लेकिन असर सीमित
आरबीआई ने फरवरी 2025 से रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती करते हुए इसे 6.50 प्रतिशत से घटाकर 5.25 प्रतिशत कर दिया था. इसका उद्देश्य कर्ज की लागत कम करना और निजी निवेश को बढ़ावा देना था. हालांकि, BoB की रिपोर्ट बताती है कि बैंकिंग सिस्टम में इस कटौती का असर समान रूप से नहीं दिखा.
लेंडिंग रेट्स में धीमी गिरावट
रिपोर्ट के मुताबिक, नए कर्ज पर वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट (WALR) में 93 बेसिस पॉइंट की गिरावट आई. वहीं, MCLR (Marginal Cost of Funds-based Lending Rate) में केवल 45 बेसिस पॉइंट की कमी दर्ज की गई. यह संकेत देता है कि बैंकों ने पॉलिसी रेट कट का पूरा फायदा ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया.
डिपॉजिट रेट्स में कटौती का भी असर
इस दौरान बैंकों ने अपनी बैलेंस शीट को संतुलित रखने के लिए डिपॉजिट रेट्स भी घटाए. इसका असर MCLR जैसे आंतरिक बेंचमार्क पर पड़ा, जिससे लेंडिंग रेट्स में गिरावट की रफ्तार सीमित रही.
अलग-अलग बैंकों में ट्रांसमिशन असमान
रिपोर्ट में पाया गया कि ब्याज दरों में कटौती का असर सभी बैंकों में एक जैसा नहीं था:
1. विदेशी बैंकों में सबसे तेज गिरावट देखी गई
2. निजी बैंकों ने इसके बाद स्थान लिया
3. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सबसे धीमा असर रहा
इसका मुख्य कारण EBLR (External Benchmark Lending Rate) से जुड़े लोन का अनुपात है.
1.विदेशी बैंकों में ~94% लोन EBLR से जुड़े
2. निजी बैंकों में ~89%
3. सार्वजनिक बैंकों में ~51%
जहां यह अनुपात ज्यादा था, वहां दरों में कटौती का असर भी तेज दिखा.
सेक्टर के हिसाब से भी अलग तस्वीर
विभिन्न सेक्टरों में ब्याज दरों का स्तर अलग-अलग रहा, जैसे अनसिक्योर्ड रिटेल लोन 10.1% (सबसे ज्यादा), कृषि लोन 9.81%, रुपये में एक्सपोर्ट क्रेडिट 6.78% (सबसे कम) रहा.
रिटेल सेगमेंट में होम लोन 7.63% (तुलनात्मक रूप से सस्ते), वाहन और एजुकेशन लोन 9% से अधिक रहा.
किन सेक्टर्स को मिला ज्यादा फायदा?
रिपोर्ट के अनुसार एक्सपोर्ट क्रेडिट और एजुकेशन लोन में 160 बेसिस पॉइंट से ज्यादा गिरावट, MSME और अनसिक्योर्ड लोन में भी रेपो कट के अनुरूप कमी आई. वहीं, कृषि, प्रोफेशनल सर्विसेज और बड़े उद्योगों में गिरावट सीमित रही.
उधारकर्ताओं को ₹19,000 करोड़ की बचत
कुल मिलाकर, कम ब्याज दरों से उधारकर्ताओं को लगभग 19,000 करोड़ रुपये की बचत हुई. इसमें सबसे बड़ा योगदान हाउसिंग और MSME लोन का रहा.
रिपोर्ट के मुताबिक, अब ब्याज दर चक्र स्थिरता के करीब है. ऐसे में निकट भविष्य में लेंडिंग रेट्स में बहुत बड़े बदलाव की संभावना कम है, जब तक मौद्रिक नीति में कोई बड़ा संकेत नहीं मिलता.
मार्च तिमाही में पीएनबी का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 14.4 प्रतिशत बढ़कर 5,225 करोड़ रुपये हो गया. पिछले साल इसी अवधि में बैंक ने 4,567 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकारी बैंक पंजाब नेशनल बैंक (PNB) ने वित्त वर्ष 2025-26 की मार्च तिमाही के नतीजे जारी कर दिए हैं. बैंक ने इस तिमाही में मुनाफे में ठोस बढ़त दर्ज की है, जबकि बैड लोन की स्थिति में भी सुधार देखने को मिला है. हालांकि, कुल आय में हल्की गिरावट रही. बैंक ने शेयरधारकों के लिए ₹3 प्रति शेयर डिविडेंड का ऐलान भी किया है.
मुनाफे में 14% से ज्यादा की बढ़ोतरी
मार्च तिमाही में पीएनबी का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 14.4 प्रतिशत बढ़कर 5,225 करोड़ रुपये हो गया. पिछले साल इसी अवधि में बैंक ने 4,567 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था. बैंक के मुताबिक, इस बढ़त की प्रमुख वजह ब्याज से होने वाली आय में इजाफा रहा, जिसने कमाई को सहारा दिया.
कुल आय में हल्की गिरावट
जहां मुनाफा बढ़ा, वहीं बैंक की कुल आय में मामूली गिरावट दर्ज की गई. मार्च तिमाही में कुल आय घटकर 36,319 करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल 36,705 करोड़ रुपये थी. यह संकेत देता है कि बैंक को अन्य आय स्रोतों में कुछ दबाव का सामना करना पड़ा.
ब्याज आय ने दिया सहारा
पीएनबी की ब्याज से कमाई में वृद्धि देखने को मिली. तिमाही के दौरान ब्याज आय बढ़कर 32,157 करोड़ रुपये हो गई, जो एक साल पहले 31,989 करोड़ रुपये थी. यह वृद्धि बैंक के कोर ऑपरेशंस की मजबूती को दर्शाती है.
बैड लोन में सुधार, एसेट क्वालिटी मजबूत
बैंक की एसेट क्वालिटी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.
1. ग्रॉस NPA घटकर 2.95 प्रतिशत रहा (पहले 3.95 प्रतिशत)
2. नेट NPA घटकर 0.29 प्रतिशत रहा (पहले 0.4 प्रतिशत)
यह दिखाता है कि बैंक ने अपने खराब कर्ज यानी बैड लोन को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया है.
निवेशकों के लिए डिविडेंड का तोहफा
पीएनबी के बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ₹3 प्रति शेयर डिविडेंड देने की सिफारिश की है. हालांकि, अंतिम मंजूरी बैंक की वार्षिक आम बैठक (AGM) में शेयरधारकों की स्वीकृति के बाद ही मिलेगी.
तिमाही नतीजे बताते हैं कि PNB ने मुनाफे और एसेट क्वालिटी दोनों मोर्चों पर सुधार किया है. हालांकि, कुल आय में गिरावट एक ऐसा पहलू है जिस पर आगे नजर रखनी होगी. कुल मिलाकर, बैंक की परफॉर्मेंस स्थिरता और सुधार का संकेत देती है, जो निवेशकों के भरोसे को मजबूत कर सकती है.