IndiGo में बड़ा नेतृत्व बदलाव, किरण थडिमर्री बने नए CFO; कस्टम आदेश को देगी चुनौती

InterGlobe Aviation की बोर्ड बैठक में किरण थडिमर्री को नया मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) नियुक्त किया गया है. वहीं, कंपनी ने कुछ आयातित सामान पर कस्टम ड्यूटी, ब्याज और जुर्माने से जुड़े आदेश को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया है.

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Tuesday, 28 July, 2026
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देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो (IndiGo) का संचालन करने वाली इंटरग्लोब एविएशन (InterGlobe Aviation) ने सोमवार को शीर्ष प्रबंधन में बड़ा बदलाव किया है. कंपनी ने किरण थडिमर्री को नया मुख्य वित्तीय अधिकारी (Chief Financial Officer-CFO) नियुक्त किया है. वह वर्तमान CFO गौरव नेगी की जगह लेंगे, जिन्हें अब प्रबंध निदेशक (MD) का सलाहकार नियुक्त किया गया है. यह नियुक्तियां 28 जुलाई 2026 से प्रभावी होंगी.

कंपनी के बोर्ड ने 27 जुलाई को हुई बैठक में इन नियुक्तियों को मंजूरी दी. वर्तमान में डिप्टी CFO के पद पर कार्यरत किरण थडिमर्री 28 जुलाई से कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी के साथ-साथ प्रमुख प्रबंधकीय कार्मिक (Key Managerial Personnel) की जिम्मेदारी भी संभालेंगे.

दो दशक से अधिक का वित्तीय अनुभव

चार्टर्ड अकाउंटेंट किरण थडिमर्री के पास वित्तीय क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है. उन्होंने ट्रेजरी, फाइनेंशियल प्लानिंग, निवेशक संबंध (Investor Relations), टैक्सेशन, ऑडिट और पूंजी जुटाने जैसे कई महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व किया है. InterGlobe Aviation से पहले वह Udaan और Genworks Health में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं. Genworks Health में उन्होंने सह-संस्थापक (Co-founder) और CFO के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई. इसके अलावा उन्होंने General Electric (GE) में 13 वर्षों से अधिक समय तक विभिन्न वित्तीय भूमिकाओं में काम किया है.

कस्टम विभाग के आदेश को देगी चुनौती

एक अलग नियामकीय खुलासे में कंपनी ने बताया कि नई दिल्ली के प्रधान आयुक्त (कस्टम) ने कुछ आयातित सामान के वर्गीकरण (Classification) में बदलाव करते हुए कस्टम ड्यूटी, ब्याज और जुर्माने का भुगतान करने का आदेश दिया है. यह मामला अप्रैल 2020 से मार्च 2024 के बीच किए गए कुछ आयातों से जुड़ा है. आदेश में कस्टम ड्यूटी और ब्याज के अलावा ₹1.14 करोड़ से अधिक का जुर्माना भी लगाया गया है.

कंपनी ने आदेश से जताई असहमति

InterGlobe Aviation ने कहा कि वह इस आदेश से सहमत नहीं है और इसके खिलाफ सक्षम अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपील दायर करेगी. कंपनी उपलब्ध सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करेगी. एयरलाइन का कहना है कि इस कस्टम विवाद का उसके वित्तीय प्रदर्शन, कारोबार या परिचालन पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की उम्मीद नहीं है.
 


RBI जल्द करेगा ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोटों का ट्रायल, सरकार ने दी मंजूरी

परीक्षण के तौर पर जारी होंगे 10 और 20 रुपये के एक-एक अरब पॉलिमर नोट. सफल ट्रायल के बाद इन्हें नियमित रूप से जारी करने पर फैसला लिया जाएगा, हालांकि मौजूदा कागजी नोट प्रचलन में बने रहेंगे.

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Tuesday, 28 July, 2026
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देश में जल्द ही ₹10 और ₹20 के नए पॉलिमर (प्लास्टिक) बैंक नोट देखने को मिल सकते हैं. केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को इन दोनों मूल्यवर्ग के एक-एक अरब पॉलिमर नोट परीक्षण के तौर पर जारी करने की मंजूरी दे दी है. यदि फील्ड ट्रायल सफल रहता है, तो RBI इन्हें नियमित रूप से प्रचलन में ला सकता है. हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि पारंपरिक कागज के नोट पूरी तरह बंद नहीं किए जाएंगे और दोनों तरह के नोट साथ-साथ चलेंगे.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि RBI के केंद्रीय बोर्ड ने भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 25 के तहत ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल का प्रस्ताव सरकार को भेजा था. सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.

कागजी नोटों की जगह नहीं लेंगे पॉलिमर नोट

सरकार के अनुसार, पॉलिमर बैंक नोट मौजूदा कपास की लुगदी और पादप फाइबर से बने कागजी नोटों के साथ ही जारी किए जाएंगे. फिलहाल पारंपरिक बैंक नोटों को पूरी तरह पॉलिमर नोटों से बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है.

क्यों लाए जा रहे हैं पॉलिमर नोट?

RBI का मानना है कि पॉलिमर नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ होते हैं और इनकी उम्र भी काफी लंबी होती है. अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, ये नोट जल्दी खराब नहीं होते, जिससे बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम पड़ती है और लंबे समय में लागत में भी कमी आती है. RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक नोटों की छपाई पर ₹4,875.2 करोड़ खर्च हुए, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में यह खर्च ₹6,372.8 करोड़ था.

डिजिटल भुगतान पर असर का आकलन बाद में

वित्त राज्य मंत्री ने कहा कि पॉलिमर नोट अभी शुरुआती चरण में हैं. इनका डिजिटल भुगतान पर क्या असर पड़ेगा, इसका आकलन नियमित रूप से जारी होने के बाद ही किया जा सकेगा. उन्होंने कहा कि नकद और डिजिटल भुगतान दोनों ही आम जनता के लिए पूरक भुगतान माध्यम हैं.

पहले भी हो चुकी है कोशिश

भारत ने वर्ष 2012 में पहली बार पॉलिमर बैंक नोट लाने की योजना बनाई थी, लेकिन तकनीकी चुनौतियों के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका. अब एक बार फिर RBI इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है.

दुनिया के कई देशों में पहले से चल रहे हैं पॉलिमर नोट

दुनिया के करीब 60 देशों में पॉलिमर बैंक नोट प्रचलन में हैं. ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में सबसे पहले प्लास्टिक नोट जारी किए थे. इसके बाद सिंगापुर, कनाडा, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया और रोमानिया समेत कई देशों ने भी इन्हें अपनाया. इन देशों का अनुभव बताता है कि पॉलिमर नोट अधिक टिकाऊ होने के साथ सुरक्षा के लिहाज से भी बेहतर माने जाते हैं.
 


कल 776 अंक उछला था सेंसेक्स, आज इन ट्रिगर्स से तय होगी बाजार की अगली चाल

सोमवार को सेंसेक्स 776.01 अंक यानी 1.02% की बढ़त के साथ 76,835.78 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 228.50 अंक यानी 0.96% चढ़कर 23,995.95 के स्तर पर पहुंच गया.

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Tuesday, 28 July, 2026
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पांच कारोबारी सत्र की लगातार गिरावट के बाद सोमवार को घरेलू शेयर बाजार ने दमदार वापसी की. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 776.01 अंक यानी 1.02% की बढ़त के साथ 76,835.78 पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 228.50 अंक यानी 0.96% चढ़कर 23,995.95 के स्तर पर पहुंच गया. इस तेजी से बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब ₹5 लाख करोड़ बढ़ गया. पश्चिम एशिया में तनाव कम होने, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और रुपये में मजबूती से निवेशकों का भरोसा लौटा. अब मंगलवार के कारोबार में निवेशकों की नजर Wipro की AI साझेदारी, Adani Energy Solutions के QIP, TVS Motor के बड़े निवेश, IndiGo में प्रबंधन बदलाव और कई दिग्गज कंपनियों के तिमाही नतीजों पर रहेगी.

कल क्यों लौटी थी बाजार में तेजी?

सोमवार को पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट से वैश्विक बाजारों में सकारात्मक माहौल बना, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 800 अंक से अधिक उछला, जबकि निफ्टी 24,000 के स्तर के करीब पहुंच गया. बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, इस तेजी के चलते बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब ₹5 लाख करोड़ बढ़कर लगभग ₹480 लाख करोड़ हो गया. सेंसेक्स के 30 में से 27 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. Eternal में 5.63%, IndiGo में 4.77%, Infosys में 3.66%, Bajaj Finance में 3.50%, Asian Paints में 2.87% और Mahindra & Mahindra में 2.55% की तेजी रही. दूसरी ओर HDFC Bank, Power Grid और Axis Bank के शेयर गिरावट के साथ बंद हुए. डॉलर के मुकाबले रुपया भी 63 पैसे मजबूत होकर 95.90 पर बंद हुआ.

ब्रॉडर मार्केट में भी रही खरीदारी

निफ्टी मिडकैप और निफ्टी स्मॉलकैप सूचकांक क्रमशः 1.11% और 1.31% की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स में आईटी, मीडिया और रियल्टी शेयरों ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि ऑयल एंड गैस सेक्टर अपेक्षाकृत कमजोर रहा.

कच्चे तेल में गिरावट से मिला बाजार को सहारा

अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव कम होने की खबरों के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई. कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 8% टूटकर 88.89 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. इससे भारत जैसे कच्चे तेल के बड़े आयातक देश के लिए राहत की उम्मीद बढ़ी और बाजार में खरीदारी का माहौल बना.

आज इन शेयरों पर रहेगी नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में कई कंपनियों से जुड़े अहम घटनाक्रम निवेशकों के फोकस में रहेंगे. Wipro ने Databricks के साथ साझेदारी की है. इस सहयोग का उद्देश्य एंटरप्राइज ग्राहकों को डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर आधुनिक बनाने और बड़े पैमाने पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) समाधान अपनाने में मदद करना है. IndiGo ने गौरव नेगी को CFO पद से हटाकर प्रबंध निदेशक का सलाहकार नियुक्त किया है. वहीं किरण थडिमर्री 28 जुलाई से नए CFO का कार्यभार संभालेंगे. TVS Motor ने TVS Credit Services में Lucas-TVS की 4.39% हिस्सेदारी ₹711 करोड़ में खरीदने का फैसला किया है. इस सौदे के बाद TVS Credit Services में उसकी हिस्सेदारी बढ़कर 85.15% हो जाएगी. Adani Energy Solutions ने QIP लॉन्च किया है. इसके लिए ₹1,698.15 प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया गया है और जरूरत पड़ने पर 5% तक की छूट भी दी जा सकती है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक Elevation Capital ब्लॉक डील के जरिए Meesho में करीब ₹1,200 करोड़ की हिस्सेदारी बेच सकती है.  Vardhman Special Steels ने Aichi Steel Corporation के साथ ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए नई फोर्जिंग सुविधा विकसित करने की घोषणा की है. इस परियोजना में दो चरणों में कुल ₹1,116 करोड़ का निवेश किया जाएगा.

आज आएंगे कई दिग्गज कंपनियों के नतीजे

आज कई बड़ी कंपनियां अप्रैल-जून तिमाही के वित्तीय नतीजे जारी करेंगी. इनमें Larsen & Toubro, Hindustan Unilever, Ambuja Cements, Tata Capital, Cholamandalam Investment and Finance Company, City Union Bank, DCM Shriram, Equitas Small Finance Bank, Pfizer, Phoenix Mills, Pine Labs, Radico Khaitan, Supreme Industries, Suzlon Energy, Varun Beverages और VST Industries शामिल हैं. इन कंपनियों के नतीजों का असर आज उनके शेयरों की चाल और पूरे बाजार के सेंटीमेंट पर देखने को मिल सकता है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


राजेंद्र मेहता ने सुजलॉन ग्रुप के प्रेजीडेंट और ग्रुप CHRO पद से दिया इस्तीफा

दिसंबर 2022 में सुजलॉन ग्रुप से जुड़े राजेंद्र मेहता ने कंपनी के प्रेजीडेंट और ग्रुप चीफ ह्यूमन रिसॉर्सिस ऑफिसर (Group CHRO) पद से इस्तीफा दे दिया है. हालांकि, कंपनी की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.

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Monday, 27 July, 2026
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सुजलॉन ग्रुप (Suzlon Group) के प्रेजीडेंट और ग्रुप CHRO राजेंद्र मेहता ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. हालांकि, कंपनी की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है. राजेंद्र मेहता दिसंबर 2022 में सुजलॉन ग्रुप से जुड़े थे. उन्हें कंपनी के ह्यूमन रिसोर्सेज (HR) विभाग का नेतृत्व सौंपा गया था. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने संगठन की पीपल स्ट्रैटेजी को आगे बढ़ाने और विभिन्न HR पहलों को लागू करने में अहम भूमिका निभाई.

तीन दशक से अधिक का HR नेतृत्व का अनुभव

तीन दशक से अधिक के अनुभव वाले राजेंद्र मेहता देश के अनुभवी HR पेशेवरों में गिने जाते हैं. उन्हें टैलेंट मैनेजमेंट, लीडरशिप डेवलपमेंट, ऑर्गेनाइजेशनल ट्रांसफॉर्मेशन, परफॉर्मेंस मैनेजमेंट, सक्सेशन प्लानिंग, कर्मचारी संबंध, विविधता एवं समावेशन (Diversity & Inclusion) और डिजिटल HR ट्रांसफॉर्मेशन जैसे क्षेत्रों में व्यापक अनुभव हासिल है. उन्होंने इंजीनियरिंग, मीडिया एवं एंटरटेनमेंट, रिटेल, फाइनेंशियल सर्विसेज और मैन्युफैक्चरिंग जैसे कई सेक्टरों में काम किया है.

Zee Entertainment और Times Group में निभा चुके हैं अहम जिम्मेदारियां

सुजलॉन से पहले मेहता जी एंटरटेन्मेंट (Zee Entertainment) में ग्लोबल चीफ पीपल ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे, जहां उन्होंने संगठनात्मक क्षमताओं को मजबूत करने और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप कार्यबल तैयार करने पर काम किया. इसके अलावा वह DHFL, DCM Shriram, VNL, Synergy Capital और Times Group जैसी कंपनियों में भी वरिष्ठ नेतृत्व की भूमिकाएं निभा चुके हैं.

उनके करियर का सबसे लंबा कार्यकाल टाइम्स ग्रुप (Times Group) में रहा, जहां उन्होंने करीब एक दशक तक विभिन्न HR नेतृत्व पदों पर काम किया और अंततः वाइस प्रेजीडेंट एवं हेड ऑफ ह्यूमन रिसॉर्सिस बने. इस दौरान उन्होंने एचआर रणनीति तैयार करने, बिजनेस लीडर्स के साथ मिलकर काम करने और संगठन की पीपल प्रोसेसेज को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

अगले कदम और उत्तराधिकारी पर नजर

राजेंद्र मेहता ने ह्यूमन रिसोर्सेज में मास्टर डिग्री हासिल की है. फिलहाल उनके इस्तीफे के कारण, सुजलॉन ग्रुप में उनके उत्तराधिकारी और उनके अगले पेशेवर कदम को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. कंपनी की आधिकारिक घोषणा का इंतजार है.


डॉ. सुभाष चंद्रा का भावुक संदेश, बोले- ‘बाबूजी शरीर से दूर हैं, लेकिन संस्कारों में हमेशा जीवित रहेंगे’

पिता नंद किशोर गोयनका की रस्म पगड़ी के बाद पूर्व राज्यसभा सांसद ने साझा की भावनात्मक पोस्ट, जीवन मूल्यों और विरासत को किया याद

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
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एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सुभाष चंद्रा ने अपने पिता एवं वरिष्ठ उद्योगपति और समाजसेवी स्वर्गीय नंद किशोर गोयनका की रस्म पगड़ी के बाद एक भावुक संदेश साझा किया है. उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की जीवन यात्रा भले ही समाप्त हो जाए, लेकिन उसके संस्कार, अनुशासन और जीवन मूल्य हमेशा परिवार और समाज का मार्गदर्शन करते रहते हैं.

डॉ. सुभाष चंद्रा ने 26 जुलाई 2026 को संपन्न हुई रस्म पगड़ी के बाद सोशल मीडिया पर अपने पिता को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा कि यह केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं थी, बल्कि उस जिम्मेदारी को स्वीकार करने का अवसर था, जो एक पिता अपने जाने के बाद परिवार को सौंप जाता है.

‘बाबूजी के संस्कार हमारे आचरण में हमेशा रहेंगे’

अपने संदेश में डॉ. चंद्रा ने कहा कि उनके पिता का जीवन अब केवल यादों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके संस्कार परिवार के व्यवहार, फैसलों और आने वाली पीढ़ियों के माध्यम से आगे बढ़ते रहेंगे. उन्होंने लिखा, "जीवन का एक शाश्वत सत्य है कि एक दिन व्यक्ति दृश्य संसार से विदा हो जाता है, लेकिन उसके संस्कार, उसका अनुशासन और उसके द्वारा दिखाया गया मार्ग समय से परे हो जाता है." डॉ. चंद्रा ने कहा कि उनके पिता के आदर्श और जीवन मूल्य परिवार के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे.

कठिन समय में साथ देने वालों का जताया आभार

डॉ. सुभाष चंद्रा ने अपने संदेश में उन सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया, जिन्होंने इस कठिन समय में परिवार का साथ दिया. उन्होंने कहा कि लोगों की उपस्थिति, प्रार्थनाओं और स्नेह ने परिवार को मजबूती दी है, जिसके लिए वे हृदय से आभारी हैं. उन्होंने अपने संदेश के अंत में लिखा, "बाबूजी, आपकी देह यात्रा पूर्ण हो गई है, लेकिन आपके दिए संस्कारों की यात्रा निरंतर चलती रहेगी. ॐ शांति."

96 वर्ष की आयु में हुआ था नंद किशोर गोयनका का निधन

गौरतलब है कि डॉ. सुभाष चंद्रा के पिता नंद किशोर गोयनका का 13 जुलाई 2026 को मुंबई में 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया था. उनका अंतिम संस्कार हरियाणा के अग्रोहा धाम स्थित गोयनका उद्यान में किया गया था.

नंद किशोर गोयनका उद्योग जगत के साथ-साथ समाज सेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे थे. उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए डॉ. सुभाष चंद्रा ने हरियाणा के अग्रोहा में करीब 100 करोड़ रुपये की लागत से ‘नंद किशोर गोयनका यूनिवर्सिटी’ स्थापित करने की घोषणा की है. प्रस्तावित विश्वविद्यालय का उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ समाज सेवा और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना होगा.
 


भारत में बिजली की कमी हुई दोगुनी से ज्यादा, जनवरी-मई 2026 में सप्लाई संकट बढ़ा: IEA

पहली छमाही में बिजली मांग में 6% की बढ़ोतरी, रिकॉर्ड गर्मी और बढ़ती कूलिंग जरूरतों ने डाला दबाव

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
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भारत में बिजली की मांग में तेजी के साथ ही सप्लाई पर दबाव भी बढ़ रहा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुसार, वर्ष 2026 की पहली छमाही में भारत की बिजली मांग करीब 6 फीसदी बढ़ी है. वहीं, जनवरी से मई 2026 के बीच बिजली आपूर्ति में कमी पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले दोगुनी से अधिक रही.

IEA की रिपोर्ट के मुताबिक, बिजली मांग में बढ़ोतरी की मुख्य वजह उद्योग और सेवा क्षेत्र में मजबूत गतिविधियां तथा भीषण गर्मी के कारण बढ़ी कूलिंग जरूरतें रहीं. अप्रैल के मध्य से जून की शुरुआत तक चली हीटवेव के दौरान बिजली खपत में तेज उछाल देखने को मिला.

मई में बिजली खपत 11% बढ़ी

गर्मी बढ़ने के साथ बिजली की मांग में तेजी आई. मई 2026 में बिजली खपत सालाना आधार पर 11 फीसदी बढ़ी, जबकि कूलिंग डिग्री डेज (Cooling Degree Days) में 7 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. इसके चलते एसी, कूलर और अन्य कूलिंग उपकरणों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हुई और बिजली की मांग पर अतिरिक्त दबाव पड़ा.

18 मई से 21 मई के बीच लगातार चार दिनों तक देश में बिजली की पीक डिमांड रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची. 21 मई को यह 270.8 गीगावाट (GW) तक पहुंच गई. हालांकि, थर्मल और रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में बढ़ोतरी की मदद से इस मांग को पूरा किया गया.

IEA के अनुसार, दिन के समय सोलर फोटोवोल्टिक (Solar PV) उत्पादन ने अहम भूमिका निभाई और करीब 60 GW बिजली का योगदान दिया, जो दिन के पीक लोड का लगभग 22 फीसदी था.

शाम के समय बिजली उत्पादन पर बढ़ा दबाव

हालांकि दिन के समय पीक डिमांड पूरी कर ली गई, लेकिन शाम के समय बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया. IEA ने बताया कि शाम के वक्त सोलर जैसी वैरिएबल रिन्यूएबल एनर्जी का उत्पादन घट जाता है, जबकि बिजली की मांग ऊंची बनी रहती है.

ऐसे में कोयला और गैस आधारित बिजली संयंत्रों को तेजी से उत्पादन बढ़ाना पड़ता है, जिससे संचालन संबंधी चुनौतियां पैदा होती हैं. कई मामलों में इसका असर बिजली आपूर्ति की कमी के रूप में देखने को मिला.

इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उत्तरी भारत के कुछ राज्यों में दिखाई दिया. IEA के मुताबिक, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में बिजली की आपूर्ति में कमी का स्तर सबसे अधिक रहा. अप्रैल में कुछ क्षेत्रों में बिजली की कमी मासिक मांग के 2 फीसदी तक पहुंच गई.

2026 में बिजली मांग 7% तक बढ़ने का अनुमान

IEA का अनुमान है कि वर्ष 2026 के बाकी महीनों में बिजली की मांग और तेज गति से बढ़ सकती है. पूरे साल में बिजली मांग वृद्धि करीब 7 फीसदी रहने की संभावना है.

यह वृद्धि देश में आर्थिक गतिविधियों के विस्तार और तेजी से हो रहे विद्युतीकरण (Electrification) से प्रेरित होगी. यह 2025 की तुलना में काफी अधिक होगी, जब मानसून जल्दी आने के कारण बिजली मांग में सालाना आधार पर केवल 1.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी.

मौसम की स्थिति भी 2026 में बिजली खपत के रुझान को प्रभावित करने वाली अहम भूमिका निभाएगी. भारत में मानसून की शुरुआत 4 जून को हुई, जो सामान्य समय से तीन दिन देरी से थी. वहीं, भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इस साल मानसून में 11 वर्षों में सबसे कम बारिश का अनुमान जताया है.

कम बारिश की स्थिति में सिंचाई पंपों के अधिक इस्तेमाल से कृषि क्षेत्र में बिजली खपत बढ़ सकती है, जबकि गर्मी के कारण कूलिंग की मांग भी ऊंची बनी रह सकती है.

JM Financial ने जताई सप्लाई जोखिम की आशंका

ब्रोकरेज फर्म JM Financial का अनुमान है कि एल नीनो (El Niño) की स्थिति मजबूत होने से बिजली की अधिक मांग वाला सीजन सामान्य गर्मियों के महीनों से आगे बढ़ सकता है.

फर्म के अनुसार, बिजली मांग का संबंध केवल तापमान से नहीं बल्कि वेट-बल्ब तापमान (Wet-bulb Temperature), यानी गर्मी और नमी दोनों से होता है. 2023 के एल नीनो के दौरान अधिक नमी के कारण मई-जून के बाद भी कूलिंग की मांग ऊंची बनी रही थी.

FY24 में बिजली की पीक डिमांड सितंबर में 243 GW तक पहुंच गई थी, जबकि सामान्य रूप से अधिक मांग वाले मई-जून में यह 224 GW रही थी. इससे पता चलता है कि एल नीनो जैसी मौसमी परिस्थितियां बिजली की अधिक मांग वाले समय को बढ़ा सकती हैं.

जुलाई-सितंबर में विंड और हाइड्रो पावर पर दबाव

JM Financial के अनुसार, जुलाई से सितंबर के बीच हवा आधारित बिजली उत्पादन में मौसमी गिरावट आ सकती है. फर्म का अनुमान है कि पीक विंड पावर सप्लाई 15-18 GW से घटकर अगस्त-सितंबर तक करीब 10 GW रह सकती है.

इसके अलावा जलविद्युत उत्पादन पर भी दबाव बना हुआ है. जलाशयों में ऊर्जा उपलब्धता पिछले साल की तुलना में 50 फीसदी कम बताई गई है.

ब्रोकरेज के मुताबिक, थर्मल पावर क्षमता पहले से ही 90 फीसदी से अधिक प्लांट लोड फैक्टर (PLF) पर काम कर रही है, जिससे अचानक बढ़ी मांग को पूरा करने की गुंजाइश सीमित है. गैस आधारित बिजली संयंत्र कुछ अतिरिक्त सहायता दे सकते हैं, लेकिन JM Financial का अनुमान है कि जुलाई के मध्य से अगस्त के अंत तक बिजली घाटे की स्थिति बनी रह सकती है.
 


कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और कमजोर डॉलर से रुपया मजबूत, शुरुआती कारोबार में 28 पैसे चढ़ा

पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के संकेतों और बेहतर वैश्विक माहौल से रुपये को मिला समर्थन

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
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कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और वैश्विक बाजारों में सुधरे जोखिम भाव से सोमवार को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया मजबूत हुआ. रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 28 पैसे बढ़कर 96.25 के स्तर पर पहुंच गया. इससे पहले शुक्रवार को रुपया 20 पैसे की बढ़त के साथ 96.56 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भारत के आयात बिल और महंगाई के दबाव को कम करने में मदद मिलेगी, जिससे रुपये को सहारा मिला है.

कच्चे तेल में गिरावट से रुपये को राहत

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट से देश के चालू खाते के घाटे और आयातित महंगाई पर दबाव कम होता है. हाल के दिनों में महंगे कच्चे तेल और भू-राजनीतिक तनाव के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ था. इसके अलावा अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में कमजोरी से भी उभरते बाजारों की मुद्राओं को मजबूती मिली है. इसका फायदा भारतीय रुपये को भी मिला.

फेड के फैसले पर बाजार की नजर

अब मुद्रा बाजार की नजर इस सप्ताह होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक पर है. निवेशक फेड के ब्याज दरों से जुड़े संकेतों और डॉलर की आगे की दिशा पर नजर रख रहे हैं. सोमवार को घरेलू शेयर बाजारों में भी सकारात्मक शुरुआत देखने को मिली. कच्चे तेल की कीमतों में नरमी को भारत के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा की मांग कम हो सकती है और आर्थिक मोर्चे पर राहत मिल सकती है.

हालांकि, सोमवार की तेजी के बावजूद रुपया अभी भी अपने रिकॉर्ड निचले स्तरों के करीब बना हुआ है. हाल के सत्रों में महंगे तेल, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और डॉलर की मजबूत मांग के कारण रुपये पर दबाव रहा है.


TKIL Industries को Q1 FY27 में ₹1,475.40 करोड़ के नए ऑर्डर मिले, इंजीनियरिंग और EPC कारोबार को मिली मजबूती

कंपनी ने कहा कि यह प्रदर्शन भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, माइनिंग, ऊर्जा और संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे निवेश और उसकी मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता पर ग्राहकों के भरोसे को दर्शाता है.

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
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इंजीनियरिंग और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन क्षेत्र की कंपनी TKIL Industries Pvt. Ltd. ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) की पहली तिमाही में ₹1,475.40 करोड़ के नए ऑर्डर हासिल किए हैं. कंपनी ने कहा कि यह प्रदर्शन भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, माइनिंग, ऊर्जा और संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे निवेश और उसकी मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता पर ग्राहकों के भरोसे को दर्शाता है.

औद्योगिक निवेश से बढ़ी इंजीनियरिंग समाधानों की मांग

कंपनी के अनुसार, भारत में बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, खनन, ऊर्जा और संसाधन विकास क्षेत्रों में निवेश लगातार बढ़ रहा है. क्षमता विस्तार, औद्योगिक आधुनिकीकरण, नई तकनीकों को अपनाने और परिचालन दक्षता बढ़ाने पर बढ़ते फोकस के कारण उन्नत इंजीनियरिंग और EPC (Engineering, Procurement and Construction) समाधानों की मांग मजबूत बनी हुई है. ऐसे माहौल में जटिल औद्योगिक परियोजनाओं को समय पर पूरा करने में सक्षम इंजीनियरिंग कंपनियों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है.

ग्राहकों का भरोसा हमारी सबसे बड़ी ताकत: विवेक भाटिया

TKIL Industries के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (MD & CEO) विवेक भाटिया ने कहा, "पहली तिमाही में मिले मजबूत ऑर्डर इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे ग्राहक TKIL Industries की इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन क्षमता पर भरोसा करते हैं. हम तकनीक-आधारित और टिकाऊ समाधान उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो ग्राहकों के विकास को गति देने के साथ-साथ भारत के औद्योगिक विकास में भी योगदान दें."

पूंजीगत वस्तु और इंजीनियरिंग उद्योग के लिए अनुकूल माहौल

कंपनी का कहना है कि भारत में संसाधन सुरक्षा, ऊर्जा संक्रमण, औद्योगिक आधुनिकीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास पर बढ़ता जोर पूंजीगत वस्तु (Capital Goods) और इंजीनियरिंग उद्योग के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर रहा है. साथ ही ऑटोमेशन, नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग और स्थानीयकरण (Localization) पर जोर के कारण भविष्य के अनुरूप औद्योगिक समाधानों में निवेश भी तेजी से बढ़ रहा है.

भविष्य की परियोजनाओं पर कंपनी की नजर

TKIL Industries ने कहा कि मजबूत ऑर्डर पाइपलाइन और प्रोजेक्ट निष्पादन क्षमता के दम पर वह विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों के ग्राहकों को अत्याधुनिक इंजीनियरिंग और EPC समाधान उपलब्ध कराने की बेहतर स्थिति में है. कंपनी का फोकस नवाचार और टिकाऊ इंजीनियरिंग समाधानों के जरिए ग्राहकों और हितधारकों के लिए दीर्घकालिक मूल्य सृजित करने के साथ-साथ भारत के विनिर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक विकास में योगदान देने पर बना रहेगा.
 


₹1,800 करोड़ का IPO लेकर आ रही Juniper Green Energy, 30 जुलाई से खुलेगा इश्यू, जानें पूरी डिटेल

IPO से जुटाई गई राशि में से ₹683.24 करोड़ का उपयोग कंपनी अपने कर्ज के भुगतान या प्री-पेमेंट के लिए करेगी.

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
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रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर की कंपनी जूनिपर ग्रीन एनर्जी (Juniper Green Energy) ने अपने ₹1,800 करोड़ के इनिशियल पब्लिक ऑफर (IPO) के लिए ₹214-225 प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय कर दिया है. यह पूरी तरह फ्रेश इश्यू होगा, जो 30 जुलाई से 3 अगस्त तक निवेशकों के लिए खुला रहेगा. IPO से जुटाई गई राशि का इस्तेमाल मुख्य रूप से कर्ज घटाने और कारोबार के विस्तार में किया जाएगा.

30 जुलाई को खुलेगा IPO, 29 जुलाई को एंकर निवेशकों की बोली

रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी Juniper Green Energy का ₹1,800 करोड़ का IPO 30 जुलाई को खुलेगा और 3 अगस्त को बंद होगा. एंकर निवेशकों के लिए बोली 29 जुलाई को शुरू होगी. कंपनी ने IPO के लिए ₹214 से ₹225 प्रति इक्विटी शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. अपर प्राइस बैंड के आधार पर कंपनी का अनुमानित मार्केट कैप करीब ₹12,802 करोड़ होगा.

पूरी तरह फ्रेश इश्यू, नहीं होगी OFS

यह IPO पूरी तरह फ्रेश इश्यू है. यानी इसमें कोई मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर नहीं बेचेगा. इससे पहले कंपनी ने सेबी के पास दाखिल ड्राफ्ट पेपर्स में ₹3,000 करोड़ तक जुटाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन अब इश्यू का आकार ₹1,800 करोड़ रखा गया है.

कर्ज घटाने और ग्रुप कंपनियों में निवेश पर होगा फोकस

IPO से जुटाई गई राशि में से ₹683.24 करोड़ का उपयोग कंपनी अपने कर्ज के भुगतान या प्री-पेमेंट के लिए करेगी. वहीं ₹728.69 करोड़ अपनी सहायक कंपनियों Juniper Green Gamma One, Juniper Green Kite और Juniper Green Power Five में निवेश करेगी, ताकि वे भी अपने कर्ज का भुगतान कर सकें. शेष राशि का इस्तेमाल सामान्य कॉर्पोरेट जरूरतों के लिए किया जाएगा.

रिटेल निवेशकों के लिए 35% हिस्सा आरक्षित

IPO में 50% हिस्सा योग्य संस्थागत खरीदारों (QIBs), 15% गैर-संस्थागत निवेशकों (NIIs) और 35% रिटेल निवेशकों के लिए आरक्षित रखा गया है. इसके अलावा पात्र कर्मचारियों के लिए ₹2 करोड़ तक के शेयर रिजर्व किए गए हैं, जिन पर ₹21 प्रति शेयर की छूट मिलेगी.

6 अगस्त को शेयर बाजार में होगी लिस्टिंग

कंपनी के शेयरों की BSE और NSE पर संभावित लिस्टिंग 6 अगस्त को होगी. इस IPO के बुक रनिंग लीड मैनेजर ICICI Securities, HSBC Securities, JM Financial और Kotak Mahindra Capital हैं, जबकि KFin Technologies को रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया है.

क्या करती है Juniper Green Energy?

गुरुग्राम स्थित Juniper Green Energy सोलर, विंड, हाइब्रिड और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) परियोजनाओं के विकास, निर्माण और संचालन के कारोबार में है. कंपनी को सिंगापुर स्थित AT Capital Group का समर्थन प्राप्त है. हाल के वर्षों में कंपनी ने राजस्थान में भारत की पहली 100 MWh मर्चेंट बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) परियोजना शुरू की है. इसके अलावा कंपनी ने सोलर, विंड और बैटरी स्टोरेज को जोड़ने वाली Firm and Dispatchable Renewable Energy (FDRE) परियोजना का चरणबद्ध संचालन भी शुरू किया है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


₹140 लाख करोड़ का ब्लैक बॉक्स: SEBI की खतरनाक अनदेखी

क्या इसकी कीमत खुदरा निवेशक चुका रहे हैं?

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
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₹140 लाख करोड़.

यह वह रकम है जिस पर आज भारत के फंड मैनेजर बैठे हैं, देश की पूरी बचत, जिसे म्यूचुअल फंड, PMS, AIF और ऑफशोर व्हीकल्स में बांटा गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की ₹140 लाख करोड़ की बचत एक ब्लैक बॉक्स में गायब हो गई है?

यह वह बात है जिसे कोई खुलकर नहीं कहता. ₹140 लाख करोड़ का एक बड़ा हिस्सा कुछ उन्हीं चुनिंदा फर्मों के जरिए चलता है अलग-अलग निवेश माध्यमों के माध्यम से. जब इनमें से कोई वित्तीय फर्म किसी शेयर का समर्थन करती है, तो हर ग्राहक के लिए निवेश विचार एक जैसा होता है, चाहे वह म्यूचुअल फंड हो, PMS हो या AIF, क्योंकि ये सभी एक ही छतरी यानी उसी एसेट मैनेजमेंट कंपनी के अंतर्गत आते हैं. लेकिन अलग-अलग निवेश माध्यमों को मैनेज करने से इन फर्मों को मिलने वाली फीस अक्सर अलग-अलग होती है.

एक रिटेल म्यूचुअल फंड सीमित और तय फीस देता है. लेकिन उसी फर्म द्वारा चलाए जाने वाले कई PMS खाते, AIF और ऑफशोर फंड प्रदर्शन आधारित फीस लेते हैं यानी मुनाफे का एक हिस्सा जो कई गुना अधिक हो सकता है. एक ही एनालिस्ट. एक ही निवेश फैसला. लेकिन यह फैसला किस ग्राहक के खाते में जाता है, इसके आधार पर फर्म को सामान्य फीस मिल सकती है या बहुत अधिक कमाई हो सकती है.

और किसी भी सुबह, इनमें से केवल एक खाते को सबसे पहले भरा जा सकता है. पहले नंबर पर आने वाले को बेहतर कीमत मिलती है.

तो क्या उस कतार में खुदरा निवेशक सबसे आगे होता है, या वह ग्राहक जिसका खाता फर्म को अधिक कमाई कराता है? किसी ने कभी इसकी जांच नहीं की. न यह देखा गया कि ऐसा होता है या नहीं, न यह कि कितनी बार ऐसा हुआ क्योंकि ऐसी जांच व्यवस्था मौजूद ही नहीं है.

यह संभावना वहां मौजूद रहती है जहां एक ही फर्म रिटेल पैसा, प्रदर्शन आधारित फीस वाला पैसा और ऑफशोर पैसा एक ही निवेश इंजन से चलाती है. क्या कोई फर्म वास्तव में किसी एक पक्ष की ओर झुकती है, यही वह सवाल है जिसका जवाब व्यवस्थित निगरानी के जरिए दिया जा सकता है. भारत के बाजार नियामक SEBI ने कभी ऐसी जांच प्रणाली बनाई ही नहीं.

और यही असली खोज है. मामला केवल यह नहीं है कि जवाब छिपा हुआ है. मामला यह है कि यहां हितों के टकराव की एक पूरी श्रेणी मौजूद है, जिसे केवल किसी फर्म के अपने उत्पादों के बीच निवेश आवंटन की जांच करके पकड़ा जा सकता है, लेकिन SEBI ऐसी किसी जांच के लिए स्क्रीनिंग नहीं करता.

यह ऐसा मामला नहीं है जिसे SEBI ने जांच कर बंद कर दिया हो. यह एक ऐसा सवाल है जिसे SEBI ने कभी खोला ही नहीं.

जिस कतार पर कोई नजर नहीं रखता

एक दशक पहले बाजार को-लोकेशन मामले को लेकर हिल गया था, कुछ ब्रोकर एक्सचेंज के अंदर बाकी लोगों से कुछ मिलीसेकंड पहले पहुंच गए थे. यह मामला एक कतार को लेकर था: बाजार तक सबसे पहले कौन पहुंचता है. घोटाला सामने आने के वर्षों बाद SEBI ने इसकी निगरानी के लिए व्यवस्था बनाई.

लेकिन अब एक दूसरी कतार मौजूद है. यह एक्सचेंज के बाहर नहीं है. यह फंड हाउस के अंदर है, एक ही फर्म अपने म्यूचुअल फंड, निजी पोर्टफोलियो और ऑफशोर पैसे को एक ही ट्रेड में किस क्रम में निवेश करती है. इस कतार पर कोई नजर नहीं रखता.

यह समझने के लिए कि यह स्थिति कैसे बनती है, आपको समझना होगा कि भारतीय एसेट मैनेजर का स्वरूप किस तरह बदल गया है. एक पीढ़ी पहले कोई फंड हाउस केवल एक काम करता था: वह जनता के लिए म्यूचुअल फंड चलाता था और उस पर सीमित फीस होती थी. आज वही समूह आमतौर पर एक ही प्रतिभाशाली टीम के जरिए चार कारोबार चलाता है,  रिटेल निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंड, अमीर ग्राहकों के लिए PMS, बहुत अमीर निवेशकों के लिए AIF और विदेशी तथा NRI पैसे के लिए ऑफशोर या FPI व्हीकल.

अलग-अलग फीस, अलग-अलग खुलासे, अलग-अलग ग्राहक. लेकिन अक्सर एक ही रिसर्च टीम और एक ही चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर इन सभी को संभाल रहे होते हैं.

जब यह एक ही निवेश इंजन किसी ऐसे निवेश विचार को तैयार करता है जिसमें जगह सीमित हो, जैसे कोई ब्लॉक डील, कम कारोबार वाला स्मॉल-कैप शेयर या QIP का हिस्सा, तो कोई यह तय करता है कि कौन सा निवेश पूल खरीदेगा और किस क्रम में खरीदेगा.

यही वह फैसला है जहां रिटेल निवेशक कतार में सबसे पीछे पहुंच सकता है. और यह फैसला दिखाई नहीं देता.

ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि यह फैसला लेना गैरकानूनी है. बल्कि इसलिए क्योंकि किसी को इसे दिखाने की जरूरत नहीं है.

हर फंड हाउस ट्रेड-आवंटन नीति रखता है; कोई भी निवेशक उसे पढ़ नहीं सकता. हर समूह अपने डेस्क के बीच सूचना संबंधी दीवार होने का दावा करता है; लेकिन उनकी मजबूती को स्वतंत्र रूप से कभी प्रकाशित नहीं किया जाता.

SEBI फंड हाउसों की जांच करता है; लेकिन रिपोर्ट गोपनीय होती हैं. ट्रस्टी हितों के टकराव की निगरानी के लिए होते हैं; लेकिन उनकी रिपोर्ट भी बंद रहती हैं.

रिटेल निवेशक की सुरक्षा करने वाला पूरा ढांचा ऐसे दस्तावेजों पर बना है जिन्हें रिटेल निवेशक देख ही नहीं सकता.

इस अंतर को इस बात से समझा जा सकता है कि भारत में हितों के टकराव के मामले वास्तव में कैसे सामने आए हैं.

2022 में एक्सिस म्यूचुअल फंड में फ्रंट-रनिंग कार्रवाई आंतरिक संदेह और बाजार की चर्चाओं के जरिए सामने आई. 2024 में क्वांट की जांच एक सूचना मिलने के बाद शुरू हुई. इससे पहले के अन्य मामलों में शिकायतों या संकटों की भूमिका रही.

हर मामला SEBI तक पहुंचाया गया. लेकिन किसी भी मामले को नियमित जांच के जरिए नहीं पकड़ा गया, जिसमें यह देखा जाता कि क्या किसी समूह का अपना आवंटन पैटर्न उसके अधिक फीस वाले निवेश माध्यमों को रिटेल निवेशकों के मुकाबले फायदा पहुंचा रहा है, क्योंकि ऐसी कोई जांच व्यवस्था मौजूद ही नहीं है.

अमेरिका में SEC सलाहकार द्वारा मैनेज किए जाने वाले खातों में इसी तरह की सांख्यिकीय जांच करता है. इसी तरह की जांच के जरिए उसने 2024 में वेस्टर्न एसेट में 600 मिलियन डॉलर के आवंटन मामले का पता लगाया था.

मुद्दा अमेरिकी मामला नहीं है. मुद्दा यह है कि यह जांच उपकरण विदेशों में सामान्य है, लेकिन भारत में मौजूद नहीं है.

एक ऐसी साफ-सुथरी फर्म, जिसकी आप फिर भी पुष्टि नहीं कर सकते

एक वास्तविक उदाहरण लेते हैं, जिसे इसलिए चुना गया है क्योंकि इस फर्म के खिलाफ कोई आरोप नहीं है. यही इस उदाहरण का उद्देश्य है. दिग्गज निवेशक समीर अरोड़ा द्वारा स्थापित Helios Capital एक पूरा निवेश ढांचा चलाता है, जिसमें लगभग दो दशक पुराना सिंगापुर FPI कारोबार, 2023 में शुरू किया गया भारतीय म्यूचुअल फंड और PMS तथा AIF योजनाएं शामिल हैं. इसके अपने डिस्क्लोजर दस्तावेज में समूह के भीतर साझा रिसर्च क्षमता को स्वीकार किया गया है. यहां Helios का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया गया है क्योंकि यह सबसे खराब मामला है, बल्कि इसलिए किया गया है क्योंकि यह सबसे बेहतर मामलों में से एक है, इस कहानी की सबसे अधिक जानकारी साझा करने वाली फर्म, जिसने पूरी तरह जवाब दिया. अगर इतनी पारदर्शी फर्म की भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकती, तो समस्या स्पष्ट रूप से फर्म में नहीं है.

जून 2026 तक की तिमाही में Helios का वही निवेश विचार Adani Enterprises पूरे समूह में दिखाई दिया. सिंगापुर के तीन ऑफशोर फंडों ने लगभग 7.7 लाख शेयर खरीदे, जिनमें से दो ने पहली बार खरीदारी की थी. भारतीय Flexi Cap Fund ने मई में 5.73 लाख शेयरों की पोजीशन शुरू की, जो उस महीने की उसकी सबसे बड़ी एकल खरीद थी. Adani Ports, Eternal और Paytm में भी इसी तरह का ओवरलैप दिखाई देता है.

इसमें कुछ भी गलत नहीं है. एक साझा रिसर्च टीम द्वारा अपने सभी फंडों में एक ही निवेश विचार तैयार करना उसका काम है. लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है. म्यूचुअल फंड की खरीद की तारीख मई की है. ऑफशोर खरीद की तारीख केवल "तिमाही" तक ही सीमित है. यह पोजीशन कंपनी की करीब 0.06% हिस्सेदारी है, जो भारत में हर डिस्क्लोजर सीमा से नीचे है. न कोई ब्लॉक डील रिकॉर्ड है, न किसी शेयरहोल्डिंग पैटर्न में इसका उल्लेख है.

इसलिए सीधा सवाल, किस सप्ताह, किस कीमत पर, किस निवेश माध्यम ने खरीदारी की और रिटेल फंड पहले आया या बाद में Helios के बाहर कोई भी इसका जवाब नहीं दे सकता. यह डेटा केवल फर्म, उसके ट्रस्टी और SEBI के पास है. SEBI ने कभी भी किसी फंड हाउस के लिए ऐसी जांच सार्वजनिक नहीं की है.

यह भेजे जाने के बाद, अरोड़ा ने पूरा जवाब दिया, रिकॉर्ड पर, जो कि ज्यादातर लोगों ने नहीं किया. उनका पक्ष विस्तृत है. उनके अनुसार, तीनों कारोबारों को भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रूप से अलग रखा गया है, इन्हें अलग-अलग मैनेजर और डीलर अलग-अलग सिस्टम पर संचालित करते हैं; म्यूचुअल फंड और PMS पक्ष के डीलर कॉल रिकॉर्ड किए जाते हैं; समूह ने कभी भी अपने ही निवेश माध्यमों के बीच कोई सिक्योरिटी ट्रांसफर नहीं की है.

उन्होंने अपने बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों के बहुमत का भी उल्लेख किया, जो नियमों की मांग से अधिक है.

और मुख्य सवाल पर उन्होंने प्रोत्साहन व्यवस्था को उलटकर समझाया: उनके अनुसार, उनके PMS और AIF निवेशकों में 15% से भी कम लोग प्रदर्शन आधारित फीस देते हैं, और मजबूत म्यूचुअल फंड प्रदर्शन समय के साथ कहीं अधिक पैसा जुटाता है, जबकि अतिरिक्त फीस का छोटा हिस्सा कभी भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता, इसलिए अगर कोई झुकाव है भी तो वह रिटेल फंड की ओर होगा, उससे दूर नहीं.

उन्होंने अंत में कहा कि SEBI पूरे उद्योग में जो भी निगरानी करना चाहे, उसका वह स्वागत करेंगे.

यह एक गंभीर जवाब है और पूरी तरह सही भी हो सकता है. लेकिन कोई बाहरी व्यक्ति इसकी किसी भी बात की पुष्टि नहीं कर सकता. हर आश्वासन, चाहे वह दीवारों का हो, रिकॉर्डिंग का हो, क्रम निर्धारण का हो या ट्रांसफर न होने का,  केवल Helios, उसके ऑडिटर और SEBI द्वारा ही जांचा जा सकता है.

एक स्पष्ट और सम्मानित फर्म के पास भी जनता को देने के लिए केवल यही बचता है "हम पर भरोसा करें और भरोसा करें कि नियामक ने जांच कर ली है."

यह फर्म की गलती नहीं है कि इस वाक्य के दोनों हिस्सों की जांच नहीं की जा सकती. नियामक ने कभी ऐसा किया ही नहीं और SEBI से पूछा जाना चाहिए कि क्यों.

द गैलरी - हर जगह एक जैसा पैटर्न

Motilal Oswal, वही शेयर, म्यूचुअल फंड और PMS.

Motilal Oswal इस मामले में अलग है क्योंकि वह अपने उत्पादों के बीच रिसर्च के एकीकरण को खुद बढ़ावा देता है. इसका परिणाम उसके अपने डिस्क्लोजर में देखा जा सकता है.

Eternal (पूर्व में Zomato) उसके Flexi Cap म्यूचुअल फंड की प्रमुख होल्डिंग्स में शामिल है और फरवरी 2026 तक उसकी Value Strategy PMS में भी 4.79% हिस्सेदारी है. CG Power भी दोनों में दिखाई देता है और Kalyan Jewellers भी म्यूचुअल फंड तथा NTDOP PMS दोनों में मौजूद है.

दूसरे शब्दों में, रिटेल यूनिटधारकों और प्रदर्शन आधारित फीस वाले PMS ग्राहकों को एक ही डेस्क द्वारा उन्हीं शेयरों की ओर निर्देशित किया जा रहा है.

किसी भी खरीदारी में किस खाते ने पहले खरीदारी की और किस कीमत पर की, म्यूचुअल फंड अपनी होल्डिंग्स का खुलासा हर महीने करता है; जबकि PMS की पोजीशन केवल समय-समय पर जारी फैक्टशीट में सामने आती हैं. दोनों को एक ही दिन के आधार पर नहीं मिलाया जा सकता.

(स्रोत: pmsaifworld.com Value Strategy holdings; businesstoday.in flexicap May 2026 portfolio.)

Abakkus, Helios के बाद सबसे स्पष्ट तारीख आधारित मामला

सुनील सिंघानिया की Abakkus एक केंद्रित PMS और AIF पोर्टफोलियो चलाती है. इसकी कई पोजीशन 1% और 5% सीमा को पार करती हैं, इसलिए वे कंपनियों के शेयरहोल्डिंग पैटर्न और बल्क डील रिकॉर्ड में दिखाई देती हैं , जिससे सटीक तारीखें मिलती हैं.

जून 2026 तक Abakkus के पास Carysil में 5.30% हिस्सेदारी थी; मार्च से जून 2026 के बीच उसने Hindware Home Innovation में हिस्सेदारी 4.60% से बढ़ाकर 5.56% कर ली; और 15 जुलाई 2026 को एक ही बल्क डील में Mrs Bectors Food Specialities के 29,39,588 शेयर खरीदे.

अब Abakkus ने म्यूचुअल फंड लाइसेंस भी हासिल कर लिया है, जो उसी स्मॉल और मिड-कैप ब्रह्मांड पर केंद्रित है जिसमें उसके प्रदर्शन आधारित फीस वाले निवेश माध्यम पहले से निवेश कर रहे हैं.

जब यह रिटेल फंड उन नामों को खरीदना शुरू करेगा, जिनमें AIF और PMS पहले से 5% से अधिक हिस्सेदारी रखते हैं, तो क्रम का सवाल महत्वपूर्ण हो जाएगा — और Helios की तरह यहां भी केवल Abakkus और SEBI ही देख पाएंगे कि कतार में कौन कहां खड़ा था.

(स्रोत: trendlyne.com Abakkus bulk/block deals; business-standard.com Bectors bulk deal, 16 July 2026.)

SBI / Amundi, सबसे बड़ा और सबसे स्पष्ट मामला

भारत का सबसे बड़ा म्यूचुअल फंड SBI, फ्रांस की एसेट मैनेजर Amundi के साथ संयुक्त उद्यम है.

यह कोई अनुमान नहीं है: SBI Funds Management के IPO डिस्क्लोजर में कहा गया है कि वह Amundi के Global Emerging Markets mandates को सलाहकार सेवाएं देता है, जिसमें 31 मार्च 2026 तक ₹1,49,653 मिलियन यानी करीब ₹1.5 लाख करोड़ के भारत से जुड़े एसेट्स शामिल हैं.

इसका मतलब है कि वही संस्था जो करोड़ों भारतीयों की रिटेल बचत को संभालती है, वह विदेशी फंड पूल को यह सलाह भी देती है कि कौन से भारतीय शेयर खरीदे जाएं.

क्या ये दोनों निवेश प्रवाह अलग-अलग रखे गए हैं, और जब दोनों एक ही शेयर में रुचि रखते हैं तो पहले कौन कदम उठाता है, यही वह सवाल है जो किसी ने उनसे नहीं पूछा.

(स्रोत: SBI Funds Management IPO disclosures)

Nippon India, अपने ही दस्तावेज से पूरा ढांचा

Nippon Life India Asset Management स्पष्ट रूप से बताता है कि वह म्यूचुअल फंड और ETF, PMS सहित मैनेज्ड अकाउंट्स, अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स, पेंशन फंड्स और ऑफशोर फंड तथा सलाहकार सेवाओं को संभालता है, जिसमें GIFT City के माध्यम भी शामिल हैं, सब एक ही छत के नीचे.

जो ढांचा हितों के टकराव को जन्म दे सकता है, उसका आरोप यहां नहीं लगाया गया है; बल्कि इसे खुद फर्म ने बताया है.

(स्रोत: indiainfoline.com company summary.)

द गैलरी से उभरता पैटर्न

इनमें से दो मोतीलाल ओसवाल और अबक्कस को वास्तविक होल्डिंग्स के आधार पर और अबक्कस के मामले में वास्तविक तारीखों के आधार पर जोड़ा जा सकता है. दोनों ही मामलों में एक ही निवेश विचार एक साथ रिटेल निवेश माध्यम और परफॉर्मेंस-फीस वाले निवेश माध्यम में दिखाई देता है. एसबीआई/अमूंडी के मामले को प्रॉस्पेक्टस में स्वीकार किया गया है. बाकी मामलों की पुष्टि खुद कंपनियों द्वारा अपने बारे में दिए गए विवरणों से होती है. और इनमें से किसी एक के लिए भी, जिसमें हेलिओस भी शामिल है, कोई बाहरी व्यक्ति उस एक अहम तथ्य को स्थापित नहीं कर सकता जो सबसे ज्यादा मायने रखता है: किसी खास ट्रेड में किस फंड को पहले मौका मिला और किस कीमत पर.

यही इस पूरी कहानी की कड़ी है. भारत की आठ प्रमुख एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में साझा निवेश इंजन दिखाई देता है, निवेशों में ओवरलैप दिखाई देता है, लेकिन ऑर्डर का क्रम केवल कंपनी और उसके रेगुलेटर के अलावा किसी और को दिखाई नहीं देता. सेबी ने कभी इसकी जांच नहीं की.

मॉडल की पुष्टि करने वाली कंपनी

आदित्य बिड़ला सन लाइफ ने एक गंभीर जवाब दिया, जो पूरी तरह सही भी हो सकता है, लेकिन जिसकी पुष्टि कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता. कंपनी का कहना है कि उसका साझा रिसर्च सिस्टम उसके म्यूचुअल फंड, पीएमएस, एआईएफ और ऑफशोर कारोबार में "जानबूझकर दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से" साझा किया जाता है और वह यह भी स्पष्ट करती है कि यह नियामकीय ढांचे के तहत अनुमत है.

कंपनी के अनुसार, इस साझा रिसर्च को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए बाकी सभी स्तरों पर अलगाव रखा गया है, अलग निवेश टीमें, बैक ऑफिस, डीलिंग डेस्क और सिस्टम स्तर के नियंत्रण मौजूद हैं. अप्रकाशित निवेश योजनाएं, पोर्टफोलियो की स्थिति और ट्रेड से जुड़ी जानकारी अलग-अलग कारोबार इकाइयों के बीच सीमित रखी जाती है. प्रत्येक फंड मैनेजर केवल अपने निवेश माध्यम के उद्देश्य के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेता है, ताकि साझा रिसर्च का इस्तेमाल म्यूचुअल फंड निवेशकों के साथ अलग व्यवहार करने के लिए न हो. कंपनी ने अपने अनुपालन ढांचे का हवाला दिया है.

आदित्य बिड़ला ने वह बात साफ तौर पर कही जिसे बाकी कंपनियां केवल संकेतों में छोड़ देती हैं, एक ही रिसर्च इंजन चार तरह के ग्राहकों के लिए काम करता है और फिर जनता से भरोसा करने को कहता है कि यह इंजन कभी किसी एक दिशा में नहीं झुकेगा. यह कंपनी की आलोचना नहीं है. यही इस मुद्दे का मूल बिंदु है: भरोसा ही एकमात्र आश्वासन है, क्योंकि इसकी पुष्टि करने वाला कोई तंत्र मौजूद नहीं है.

वह कंपनी जिसने कहा: हमारी जांच कीजिए

सौरभ मुखर्जी द्वारा स्थापित मार्सेलस के मामले में समस्या का स्वरूप अलग है और कंपनी ने सबसे उपयोगी जवाब दिया. यह हजारों पीएमएस खातों में 18–45 शेयरों का केंद्रित पोर्टफोलियो चलाती है, इसलिए हर नया ग्राहक उन शेयरों को खरीदता है जिन्हें पहले से मौजूद ग्राहक भी रखते हैं. मुखर्जी का कहना है कि कंपनी ऑर्डर रोटेशन नीति अपनाती है, जिसके तहत किसी भी ग्राहक समूह को प्राथमिकता नहीं दी जाती. कंपनी अलग-अलग ब्रोकरों का इस्तेमाल कर ट्रेड निष्पादन में अंतर रखती है और पूरी प्रक्रिया को अनुपालन और ऑडिट के दायरे में रखती है.

उन्होंने रिकॉर्ड पर हमारी दो धारणाओं को भी स्पष्ट किया, कंपनी का गिफ्ट सिटी कारोबार केवल आउटबाउंड है और उसकी अमेरिकी इकाई ग्लोबल इक्विटी में निवेश करती है, जिसका भारतीय पोर्टफोलियो में कोई प्रवाह नहीं आता. कंपनी का कोई म्यूचुअल फंड नहीं है, वह आईपीओ या क्यूआईपी में भाग नहीं लेती और अपने कर्मचारियों तथा उनके रिश्तेदारों को सीधे शेयर रखने से रोकती है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब उनसे पूछा गया कि क्या वह निवेश आवंटन नीतियों के सार्वजनिक खुलासे और सेबी द्वारा अमेरिकी एसईसी जैसी अलग-अलग निवेश माध्यमों की जांच प्रणाली अपनाने का समर्थन करेंगे, तो मार्सेलस ने दोनों के लिए सहमति जताई.

यही सबसे महत्वपूर्ण संकेत है. जब इस क्षेत्र की एक समझदार कंपनी खुद इस तरह की जांच का स्वागत करती है, तो जांच प्रणाली का न होना केवल तकनीकी कमी नहीं रह जाता. उद्योग अपने रेगुलेटर से आगे निकल चुका है.

वह कंपनी जिसने कुछ नहीं कहा

क्वांट म्यूचुअल फंड से सबसे आसान सवाल पूछा गया था. सवाल यह नहीं था कि 2024 की फ्रंट रनिंग जांच में उसने कुछ गलत किया या नहीं क्योंकि किसी समझौते का मतलब किसी गलती को स्वीकार करना नहीं होता और यहां ऐसा कोई आरोप भी नहीं लगाया गया, बल्कि सवाल यह था कि यदि समझौते के कारण यूनिटधारकों को जांच में सामने आई जानकारी कभी नहीं मिलती, तो क्या कंपनी उन्हें खुद बताएगी.

उसका पूरा जवाब था: "आपके ईमेल में उठाए गए मुद्दों पर हमारी ओर से कोई टिप्पणी नहीं है." इसके बाद कंपनी ने चेतावनी दी कि कोई भी गलत या "बिना पुष्टि वाली" रिपोर्टिंग होने पर वह कानून के तहत उपलब्ध सभी अधिकारों और उपायों का इस्तेमाल करेगी.

एक ऐसी कंपनी जो पहले ही फ्रंट रनिंग जांच का सामना कर चुकी है, जब अपने निवेशकों के साथ पारदर्शिता से जुड़े सवाल का सामना करती है तो उसका जवाब कानूनी भाषा में आता है. निवेशक को कोई जानकारी नहीं मिलती और उसे यह संदेश मिलता है कि सवाल पूछना भी कानूनी मामला बन सकता है.

और फिर आई चुप्पी

यही प्रश्नावली, जिसे पूरे उद्योग में इस बात की समीक्षा के रूप में भेजा गया था कि इन हितों के टकराव को कैसे नियंत्रित किया जाता है, जिसमें दो सप्ताह का समय और पृष्ठभूमि बातचीत का विकल्प दिया गया था, एक सप्ताह से अधिक समय पहले बाकी बड़ी मल्टी-प्रोडक्ट कंपनियों को भेजी गई थी. कोटक, मोतीलाल ओसवाल, निप्पॉन इंडिया, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल, व्हाइटओक, 360 ONE, अबक्कस और एएसके की ओर से कोई जवाब नहीं आया. न टिप्पणी से इनकार, न कोई प्रतिक्रिया.

ये छोटी कंपनियां नहीं हैं जिन्हें अचानक भेजे गए ईमेल ने चौंका दिया हो. ये भारतीय परिवारों की बड़ी मात्रा में बचत संभालने वाली प्रमुख संस्थाएं हैं. इन्हें एक सीधा सवाल भेजा गया था जिसका कोई भी ईमानदार फिड्यूशियरी एक पैराग्राफ में जवाब दे सकता है, आप यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि सबसे छोटा निवेशक कतार में सबसे पीछे न रह जाए?

इनके पास एक सप्ताह से ज्यादा समय था. उन्होंने चुप्पी चुनी. इतनी बड़ी संस्थाओं से इतने बुनियादी मुद्दे पर चुप्पी केवल नजरअंदाज करना नहीं है; यह एक फैसला है और जिन लाखों लोगों की बचत इनके पास है, उन्हें इस फैसले के मायने समझने का अधिकार है.

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जनता की बचत संभालने वाली इतनी सारी कंपनियों ने सामान्य शब्दों में भी यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि वे इन निवेश पूलों को अलग कैसे रखती हैं. और इन कंपनियों की संरचना सार्वजनिक रिकॉर्ड में मौजूद है. मोतीलाल ओसवाल अपने फंडों में एक साझा रिसर्च ढांचे के इस्तेमाल को खुले तौर पर बढ़ावा देता है. व्हाइटओक पहले ऑफशोर मैनेजर था और बाद में म्यूचुअल फंड बना, जहां एक ही प्लेटफॉर्म से काम होता है और गिफ्ट सिटी एआईएफ उसके म्यूचुअल फंड स्कीम से जुड़ा है. अबक्कस ने बड़ा केंद्रित पीएमएस और एआईएफ पोर्टफोलियो बनाया है और अब उसी स्मॉल-कैप क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए रिटेल म्यूचुअल फंड लाइसेंस भी हासिल कर लिया है.

ब्लैकस्टोन की बहुलांश हिस्सेदारी वाली एएसके घरेलू पीएमएस और एआईएफ, गिफ्ट सिटी, सिंगापुर और आयरलैंड स्थित संरचनाओं के जरिए समान रणनीतियां चलाती है. इन सभी से अपनी आंतरिक सुरक्षा दीवारों के बारे में बताने को कहा गया था. अब तक सभी ने जवाब नहीं देने का विकल्प चुना है. जहां किसी कंपनी ने जवाब नहीं दिया, वहां यह कहानी उसके खिलाफ किसी गलत काम का आरोप नहीं लगाती केवल यह बताती है कि उसने उन लोगों को भरोसा दिलाने का मौका गंवा दिया जिनका पैसा वह संभालती है.

इससे भी बड़ा और शांत रूप वाला हितों का टकराव है, जिसके बारे में कोई सवाल नहीं करता. भारत के कई बड़े म्यूचुअल फंडों में विदेशी कंपनियों की हिस्सेदारी है, जबकि उन्हीं विदेशी कंपनियों के ग्लोबल फंड भारतीय शेयरों में बड़े विदेशी निवेशकों में शामिल हैं, जैसे एसबीआई फंड इकाई में अमूंडी, एक्सिस में श्रोडर्स और यूटीआई में टी. रो प्राइस.

हर मामले में वही मूल कंपनी एक तरफ भारतीय शेयर खरीदने वाले बड़े विदेशी फंड को सलाह देती है और दूसरी तरफ भारतीय रिटेल निवेशकों के लिए उन्हीं शेयरों में निवेश करने वाले घरेलू फंड की सह-मालिक होती है. किसी ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं पूछा कि क्या इन दोनों के बीच दीवार बनी हुई है. यहां यह सवाल पूछा गया. वहां भी चुप्पी रही.

निष्कर्ष क्या है

इस पूरी कहानी का एक अंतिम पहलू भी है. 2004 में भारत के सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल ने एक प्रमुख मामले में "यह कहा था" कि इन हितों के टकराव को संभालने की जिम्मेदारी किसी व्यक्ति से ज्यादा एएमसी और ट्रस्टियों,  यानी संस्थानों की होती है. 22 साल बाद भी यही संस्थागत परत सबसे ज्यादा बंद रखी गई है: गोपनीय निरीक्षण, गुप्त नीतियां और ऐसी ट्रस्टी रिपोर्ट जिन्हें कोई पढ़ नहीं सकता. ट्रिब्यूनल ने जिस कमी की ओर इशारा किया था, वह आज भी दूर नहीं हुई है.

इसलिए यह कहानी किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में नहीं है जिसे चोरी करते हुए पकड़ा गया हो. इस संवाददाता की जांच और शोध में जो सामने आया है, वह इससे भी ज्यादा असहज करने वाला है. भारत ने जनता के पैसे को संभालने के लिए ₹140 लाख करोड़ की ऐसी व्यवस्था बना ली है, जिसमें फंड हाउस के बाहर कोई भी न बचतकर्ता, न मीडिया, न ही वह रेगुलेटर जिसके पास पूरा डेटा है, यह साबित कर सकता है कि किसी के साथ धोखा नहीं हो रहा है.

इसका समाधान बहुत जटिल नहीं है. सेबी को हर तिमाही ट्रेड डेटा पहले से मिलता है. वह एसईसी की तरह इसकी जांच कर सकता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं ज्यादा फीस वाले निवेश माध्यमों को फायदा पहुंचाने वाला कोई आवंटन पैटर्न तो नहीं है. वह कंपनियों से अपनी निवेश आवंटन नीतियों का सारांश उन निवेशकों के सामने रखने को कह सकता है, जो इन नीतियों से प्रभावित होते हैं. वह अपने निरीक्षणों में सामने आए हितों के टकराव से जुड़े निष्कर्षों को बंद रखने के बजाय सार्वजनिक कर सकता है. इसके लिए किसी नए कानून की जरूरत नहीं है. जरूरत सिर्फ देखने की इच्छा की है.

जब तक ऐसा नहीं होता, ईमानदार कंपनियां, जिन्होंने जवाब दिया, जिन्होंने कहा कि हमारी जांच कीजिए, खुद को ईमानदार साबित करने में असमर्थ रह जाएंगी, और बाकी कंपनियां बिना जांच के बची रहेंगी. वहीं 5 करोड़ म्यूचुअल फंड निवेशकों से कहा जाएगा कि वे अपनी बचत किसी ऐसी चीज पर भरोसा करके रखें जिसे वे खुद सत्यापित नहीं कर सकते, बल्कि केवल विश्वास के आधार पर रखें.

जब तक सेबी स्वतंत्र रूप से यह सत्यापित नहीं कर सकता कि ₹140 लाख करोड़ की भारतीय बचत को अलग-अलग प्रतिस्पर्धी ग्राहक समूहों के बीच कैसे आवंटित किया जाता है, तब तक देश का सबसे बड़ा मनी मैनेजमेंट उद्योग आज की तरह ही बना रहेगा: एक ब्लैक बॉक्स. यह नियमन नहीं है. यह केवल उम्मीद है.

हेलिओस कैपिटल (समीर अरोड़ा), मार्सेलस (सौरभ मुखर्जी), आदित्य बिड़ला सन लाइफ और क्वांट ने जवाब दिया और उनके जवाबों को उन्हीं के शब्दों में शामिल किया गया है. कोटक, मोतीलाल ओसवाल, निप्पॉन इंडिया, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल, व्हाइटओक, 360 ONE, अबक्कस, एएसके और विदेशी प्रायोजित फंड हाउसों ने एक सप्ताह से अधिक पहले भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया. इस कहानी में किसी भी नामित कंपनी के खिलाफ किसी गलत काम का आरोप नहीं लगाया गया है; इसमें उस ढांचे की जांच की गई है जो इन सभी को नियंत्रित करता है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


NTPC का ₹12,000 करोड़ जुटाने का प्लान, NCD जारी करने के प्रस्ताव को बोर्ड की मंजूरी

कंपनी यह रकम नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) जारी कर जुटाएगी. इसके लिए शेयरधारकों की मंजूरी लेना जरूरी होगा.

Last Modified:
Monday, 27 July, 2026
BWHindia

सरकारी क्षेत्र की प्रमुख बिजली कंपनी एनटीपीसी (NTPC Limited) ने अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ा कदम उठाया है. कंपनी के बोर्ड ने घरेलू बाजार से NCD जारी कर ₹12,000 करोड़ तक जुटाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. यह राशि प्राइवेट प्लेसमेंट के जरिए अधिकतम 12 चरणों (ट्रेंच) में जुटाई जाएगी. कंपनी ने यह फैसला शुक्रवार को हुई बोर्ड बैठक में लिया. इसी बैठक में NTPC ने जून 2026 तिमाही (Q1FY27) के वित्तीय नतीजों को भी मंजूरी दी.

शेयरधारकों की मंजूरी के बाद शुरू होगी प्रक्रिया

NTPC ने बताया कि NCD जारी करने की योजना को लागू करने के लिए शेयरधारकों से विशेष प्रस्ताव (Special Resolution) की मंजूरी लेनी होगी. मंजूरी मिलने के बाद कंपनी एक साल तक या वित्त वर्ष 2027-28 की अगली वार्षिक आम बैठक (AGM) तक, जो भी पहले हो, NCD जारी कर सकेगी.

सिक्योर्ड या अनसिक्योर्ड NCD जारी करने का विकल्प

कंपनी के मुताबिक, वह जरूरत के अनुसार सिक्योर्ड या अनसिक्योर्ड, टैक्सेबल या टैक्स-फ्री और क्यूमुलेटिव या नॉन-क्यूमुलेटिव NCD जारी कर सकती है. हर ट्रेंच के लिए अवधि, ब्याज दर (कूपन रेट), सिक्योरिटी स्ट्रक्चर और लिस्टिंग से जुड़ी शर्तें बाद में तय की जाएंगी. NTPC ने कहा कि अलग-अलग चरणों में जारी किए जाने वाले NCD को जरूरत के अनुसार बीएसई, एनएसई या दोनों स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध किया जा सकता है.

क्या होता है NCD?

नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) एक तरह का डेट इंस्ट्रूमेंट होता है, जिसके जरिए कंपनियां निवेशकों से पैसा उधार लेती हैं. इसके बदले निवेशकों को तय ब्याज दिया जाता है. NCD को भविष्य में कंपनी के शेयरों में बदला नहीं जा सकता, इसलिए इसे नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर कहा जाता है.