भारत के स्मार्टफोन बाजार में कभी मजबूत स्थिति रखने वाली घरेलू कंपनियों की हिस्सेदारी पिछले एक दशक में तेजी से घटी है. 2014 में माइक्रोमैक्स, कार्बन, लावा और इंटेक्स जैसे भारतीय ब्रांडों की बाजार हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी थी, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी थी. 2025 तक तस्वीर पूरी तरह बदल गई. इस दौरान भारतीय ब्रांडों की हिस्सेदारी घटकर करीब 1 फीसदी रह गई, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 73 फीसदी से अधिक हो गई.
अब सरकार घरेलू मोबाइल कंपनियों को दोबारा मजबूत करने के लिए एक नई योजना पर काम कर रही है. इसके तहत ₹62,500 करोड़ की मोबाइल फोन विनिर्माण योजना में करीब ₹5,000 करोड़ भारतीय मोबाइल कंपनियों के लिए निर्धारित किए गए हैं.
2016 के बाद बदला मोबाइल बाजार
भारतीय मोबाइल कंपनियों की शुरुआती सफलता मुख्य रूप से कम कीमत वाले फोन और मजबूत वितरण नेटवर्क पर आधारित थी. उस समय कई कंपनियां चीन में बने 3जी फोन आयात कर अपने ब्रांड नाम से भारत में बेचती थीं.
हालांकि, 2016 में रिलायंस जियो की 4जी सेवा शुरू होने के बाद मोबाइल बाजार में तेजी से बदलाव आया. भारतीय कंपनियों के पास 3जी फोन का बड़ा भंडार था और वे 4जी की बढ़ती मांग के अनुरूप तेजी से बदलाव नहीं कर सकीं.
दूसरी ओर, शाओमी, वीवो और ओप्पो जैसी चीनी कंपनियां बेहतर कैमरा, आधुनिक तकनीक और नए फीचर वाले 4जी स्मार्टफोन लेकर बाजार में उतरीं. इन कंपनियों ने अनुसंधान, डिजाइन और वितरण नेटवर्क में भी बड़े पैमाने पर निवेश किया. इसका असर भारतीय कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी पर पड़ा. 2017 तक भारतीय ब्रांडों की हिस्सेदारी घटकर करीब 16 फीसदी रह गई, जबकि चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 55 फीसदी से ज्यादा हो गई.
किन कंपनियों को मिलेगा सरकारी प्रोत्साहन?
सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए कंपनियों के लिए कुछ शर्तें तय की गई हैं. इसके तहत कंपनी का सालाना कारोबार कम से कम ₹1,000 करोड़ होना चाहिए और उसमें भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी कम से कम 51 फीसदी होनी चाहिए.
इसके अलावा मोबाइल से जुड़े पेटेंट भारत में कंपनी के नाम पर होने जरूरी होंगे. योजना में शामिल कंपनियों को देश में अपना अनुसंधान एवं विकास (R&D) केंद्र भी स्थापित करना होगा.
सरकार कंपनियों को उनकी बिक्री के 9.5 फीसदी तक प्रोत्साहन दे सकती है. इसमें सालाना बढ़ी बिक्री पर 5 फीसदी, बैटरी और कैमरा मॉड्यूल जैसे प्रमुख कंपोनेंट भारत से खरीदने पर 1.5 फीसदी और देश में अनुसंधान एवं विकास केंद्र स्थापित करने पर 3 फीसदी प्रोत्साहन शामिल है.
लावा समेत कई कंपनियों ने दिखाई दिलचस्पी
अब तक कम से कम तीन घरेलू कंपनियों ने इस योजना में रुचि दिखाई है. इनमें लावा इंटरनेशनल, नेक्स्टक्वांटम शिफ्ट टेक्नोलॉजीज और हैदराबाद की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी मिवी शामिल हैं. नेक्स्टक्वांटम ने एआई प्लस नाम से स्मार्टफोन ब्रांड शुरू किया है और अब तक 10 लाख से अधिक फोन बेचने का दावा किया है. कंपनी चालू वित्त वर्ष में स्मार्टफोन बाजार में 3-4 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.
कंपनी अपने फोन की औसत बिक्री कीमत दिवाली तक ₹13,500 से बढ़ाकर ₹15,000 करने की तैयारी कर रही है. उसने अनुसंधान पर पहले ही 60 लाख डॉलर खर्च किए हैं और अगले साल तक कुल निवेश बढ़ाकर करीब ₹350 करोड़ करने की योजना है. इसके तहत करीब 80 विदेशी विशेषज्ञों और 300 इंजीनियरों की नियुक्ति की योजना है.
₹15,000 से कम कीमत वाले फोन पर नजर
भारतीय कंपनियों के लिए ₹15,000 से कम कीमत वाले स्मार्टफोन का बाजार एक बड़ा अवसर बन सकता है. देश में बिकने वाले कुल स्मार्टफोन में इस श्रेणी की हिस्सेदारी करीब 51 फीसदी है.
मेमोरी चिप की कीमतों में बढ़ोतरी और कम मार्जिन के कारण कुछ बड़ी वैश्विक कंपनियां इस श्रेणी से दूरी बना रही हैं और महंगे स्मार्टफोन पर अधिक ध्यान दे रही हैं. ऐसे में भारतीय कंपनियां कम कीमत वाले स्मार्टफोन बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं.
बोल्ट, एआई प्लस और मिवी जैसे ब्रांड इस सेगमेंट पर ध्यान दे रहे हैं. मिवी ने ₹11,999 की कीमत में अपना पहला 5जी स्मार्टफोन पेश किया है. कंपनी के मुताबिक, इस फोन का डिजाइन उसकी अपनी टीम ने तैयार किया है और भविष्य में वह देश में ही इसका उत्पादन करने की योजना बना रही है. हालांकि, मिवी ने योजना के तहत ₹1,000 करोड़ के न्यूनतम कारोबार की शर्त को नई कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है.
सिर्फ सस्ते फोन से नहीं बनेगा मजबूत ब्रांड
भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती सिर्फ कम कीमत वाले फोन बेचने तक सीमित नहीं है. लंबे समय में मजबूत ब्रांड बनाने के लिए उन्हें ₹15,000 से ₹25,000 और उससे ऊपर के स्मार्टफोन बाजार में भी अपनी मौजूदगी बढ़ानी होगी.
इस श्रेणी में बेहतर कैमरा, प्रोसेसर, सॉफ्टवेयर और डिजाइन की जरूरत होती है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए अनुसंधान, तकनीक, डिजाइन और पेटेंट क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण होगा.
सरकारी प्रोत्साहन से घरेलू कंपनियों को पूंजी और विस्तार के स्तर पर मदद मिल सकती है, लेकिन वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए भारतीय ब्रांडों को तकनीक और उत्पाद के स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनानी होगी.