इस डील के तहत नोकिया अपने डिवाइसेज को डिप्लोय करेगी और एयरटेल के नेटवर्क को असाधारण 5G क्षमता और कवरेज के साथ बढ़ाएगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत की दिग्गज टेलीकॉम कंपनी भारती एयरटेल ने फिनलैंड की टेलीकॉम इक्विपमेंट कंपनी नोकिया को अरबों डॉलर का ठेका दिया है. भारती एयरटेल द्वारा नोकिया को दिया गया ये कॉन्ट्रैक्ट कई सालों तक चलेगा. दोनों कंपनियों के बीच हुई इस डील के तहत नोकिया भारत के प्रमुख शहरों और राज्यों में 4G और 5G डिवाइस लगाएगी. कंपनी ने बयान जारी करके ये जानकारी दी. कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार, नोकिया अपने 5G एयरस्केल पोर्टफोलियो से इक्विपमेंट लगाएगी. इनमें बेस स्टेशन, बेसबैंड यूनिट्स और विशाल एमआईएमओ रेडियो की लेटेस्ट जनरेशन शामिल है, जो सभी इसकी ऊर्जा-कुशल ‘रीफशार्क सिस्टम-ऑन-चिप तकनीक’ द्वारा संचालित हैं.
एयरटेल यूजर्स को मिलेगा नया एक्सपीरियंस
बयान में कहा गया है, “नोकिया को भारती एयरटेल द्वारा प्रमुख भारतीय शहरों और राज्यों में 4G और 5G नेटवर्क एक्सपेंशन प्लान के तहत डिवाइस लगाने के लिए कई सालों के लिए कई अरब डॉलर का एक्सपेंशन कॉन्ट्रैक्ट दिया गया है.” ये समाधान एयरटेल के नेटवर्क को असाधारण 5G क्षमता और कवरेज के साथ बढ़ाएंगे और इसके नेटवर्क डेवलपमेंट को सपोर्ट करेंगे. दोनों कंपनियों के बीच हुई इस डील के तहत नोकिया मल्टीबैंड रेडियो और बेसबैंड डिवाइस के साथ एयरटेल के मौजूदा 4G नेटवर्क को भी आधुनिक बनाएगी, जो 5G नेटवर्क को भी सहयोग कर सकते हैं.
पर्यावरण अनुकूल होगा भारती एयरटेल का नेटवर्क
देश की दूसरी सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी भारती एयरटेल के वाइस चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर गोपाल विट्टल ने कहा, “नोकिया के साथ ये रणनीतिक साझेदारी हमारे नेटवर्क इंफ्रा को भविष्य के लिए सुरक्षित बनाएगी और ग्राहकों को यूनिक यूजर एक्सपीरियंस प्रदान करेगी. ये पार्टनरशिप ऐसा नेटवर्क भी उपलब्ध कराएगी जो पर्यावरण अनुकूल होगा.” नोकिया के प्रेसिडेंट और सीईओ पेक्का लुंडमार्क ने कहा कि ये रणनीतिक समझौता भारत में कंपनी की उपस्थिति को और मजबूत करेगा. साथ ही एयरटेल के साथ इसका लॉन्ग टर्म सहयोग भी मजबूत होगा.
रिपोर्ट के अनुसार, AI फिलहाल हर साल लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर के बराबर उत्पादकता बढ़ा रहा है. यह अध्ययन में शामिल 86 देशों की कुल GDP का करीब 3.4% है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वैश्विक अर्थव्यवस्था में हर साल करीब 2.7 ट्रिलियन डॉलर की उत्पादकता बढ़ा रहा है, लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ अब भी अमीर देशों और अधिक वेतन पाने वाले पेशेवरों को मिल रहा है. एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी के मुताबिक, यदि विकासशील देश AI से जुड़े नियमों, बुनियादी ढांचे और स्थानीय AI इकोसिस्टम को मजबूत नहीं करते हैं, तो वे AI क्रांति में और पीछे छूट सकते हैं.
100 से ज्यादा देशों के डेटा पर आधारित है अध्ययन
यह अध्ययन जनवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच 100 से अधिक देशों में लगभग 10 लाख AI बातचीत (AI Conversations) के विश्लेषण पर आधारित है. इसमें Anthropic Economic Index के पांच संस्करणों के डेटा का इस्तेमाल किया गया.
शोधकर्ताओं ने AI के आर्थिक प्रभाव को मापने के लिए दो नए पैमाने विकसित किए हैं. पहला 'लेबर कॉस्ट इक्विवेलेंट' (LCE), जो AI से होने वाले उत्पादकता लाभ का अनुमान लगाता है. दूसरा 'AI कंसंट्रेशन इंडेक्स' (ACI), जो यह बताता है कि AI से होने वाले लाभ विभिन्न पेशों में कितनी समानता से बंट रहे हैं.
2.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा AI का आर्थिक योगदान
रिपोर्ट के अनुसार, AI फिलहाल हर साल लगभग 2.7 ट्रिलियन डॉलर के बराबर उत्पादकता बढ़ा रहा है. यह अध्ययन में शामिल 86 देशों की कुल GDP का करीब 3.4% है. यह आंकड़ा 2025 के मध्य में अनुमानित 1.2 ट्रिलियन डॉलर से दोगुने से भी अधिक है. इसकी मुख्य वजह यह है कि AI का उपयोग अब केवल सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षा, सेल्स, ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन और अन्य बड़े रोजगार वाले क्षेत्रों तक फैल गया है.
AI का उपयोग बढ़ा, लेकिन प्रति बातचीत आर्थिक मूल्य घटा
रिपोर्ट में दिलचस्प तथ्य सामने आया कि प्रत्येक AI बातचीत से मिलने वाला औसत आर्थिक मूल्य कुछ कम हुआ है. जनवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच AI वार्तालाप का वेतन सूचकांक (Wage Index) 5.5% घटा. हालांकि, AI के इस्तेमाल में तेज बढ़ोतरी ने इस गिरावट की भरपाई कर दी. कुल उत्पादकता लाभ में हुई वृद्धि का 80% से अधिक हिस्सा AI उपयोग की बढ़ती मात्रा से आया.
अमीर देशों को मिल रहा सबसे ज्यादा फायदा
स्टडी के अनुसार, AI से होने वाले आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा अभी भी उच्च आय वाले देशों के पास केंद्रित है. हाई-इनकम देशों में AI से मिलने वाला उत्पादकता लाभ उनकी GDP के लगभग 4.2% के बराबर है. वहीं, मध्यम आय वाले देशों में यह आंकड़ा केवल 0.6% और निम्न आय वाले देशों में महज 0.1% है.
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक कार्यबल में अपेक्षाकृत कम हिस्सेदारी होने के बावजूद अमीर देशों को AI से होने वाले कुल उत्पादकता लाभ का लगभग 96% हिस्सा मिल रहा है.
भारत में सीमित वर्ग तक पहुंचा AI का लाभ
अध्ययन के मुताबिक, भारत में भी AI से होने वाले लाभ मुख्य रूप से उच्च कौशल और अधिक वेतन पाने वाले पेशेवरों तक सीमित हैं. भारत का AI कंसंट्रेशन इंडेक्स (ACI) 0.84 दर्ज किया गया, जो बताता है कि AI से होने वाली अधिकांश उत्पादकता वृद्धि सीमित संख्या में कुशल कर्मचारियों को मिल रही है.
इसके मुकाबले अमेरिका का ACI 0.49 है, जो दर्शाता है कि वहां AI का उपयोग ऑफिस प्रशासन, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और बिजनेस सर्विसेज जैसे कई क्षेत्रों में व्यापक रूप से हो रहा है.
कई नए क्षेत्रों में बढ़ रहा AI का इस्तेमाल
रिपोर्ट के अनुसार, AI का उपयोग अब केवल सॉफ्टवेयर और STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स) क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. अध्ययन में शामिल आधे से अधिक देशों में 2025 के अंत से 2026 की शुरुआत के बीच AI कंसंट्रेशन इंडेक्स में गिरावट दर्ज की गई. इसका मतलब है कि AI का इस्तेमाल अब अधिक विविध पेशों में होने लगा है, खासकर मध्यम आय वाले देशों में, हालांकि, कई निम्न आय वाले देशों में AI का उपयोग अब भी सीमित पेशेवर वर्ग तक ही केंद्रित है.
AI से अधिक फायदा दिलाने में नियमों की अहम भूमिका
स्टडी के मुताबिक, किसी देश का AI नियामकीय ढांचा (Regulatory Framework) यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि उसे AI से कितना आर्थिक लाभ मिलेगा. जिन देशों में AI से जुड़े नियम अधिक मजबूत हैं, वहां उत्पादकता लाभ भी ज्यादा है और उसका वितरण विभिन्न पेशों में अपेक्षाकृत संतुलित है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जिन देशों में अंग्रेजी आधिकारिक भाषा है, वहां AI के फायदे अधिक तेजी से अलग-अलग पेशों तक पहुंचे हैं. इसकी वजह यह है कि मौजूदा बड़े भाषा मॉडल (Large Language Models) मुख्य रूप से अंग्रेजी डेटा पर प्रशिक्षित हैं.
चुनौतियां अभी भी बरकरार
शोधकर्ताओं ने कहा कि यह अनुमान केवल AI से बचने वाले समय और उत्पादकता लाभ पर आधारित है. इसमें AI इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा खपत, सब्सक्रिप्शन शुल्क, निवेश लागत और संभावित रोजगार प्रभाव जैसे खर्च शामिल नहीं हैं.
इसके अलावा, अध्ययन में एंटरप्राइज API और अन्य प्रमुख AI प्लेटफॉर्म के उपयोग को भी शामिल नहीं किया गया है. ऐसे में वास्तविक आर्थिक प्रभाव वर्तमान अनुमान से अलग हो सकता है.
विकासशील देशों के लिए बड़ा संदेश
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि AI का दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि इसके लाभ उच्च आय वाले देशों और विशेषज्ञ पेशों से आगे कितनी तेजी से बाकी दुनिया तक पहुंचते हैं.
हालांकि AI अब शिक्षा, बिक्री और प्रशासनिक कार्यों जैसे क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा है, लेकिन विकासशील देशों के बड़े हिस्से को अभी भी वह व्यापक उत्पादकता लाभ नहीं मिल पाया है, जो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पहले से देखने को मिल रहा है.
GP Petroleums ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसकी संयुक्त उद्यम कंपनी Amron Oil Resources Pvt Ltd को IOCL के गुजरात स्थित पिपावाव बिटुमेन सेल के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जीपी पेट्रोलियम (GP Petroleums Ltd) की संयुक्त उद्यम (JV) कंपनी एमरॉन ऑयल रिसोर्सिस (Amron Oil Resources Pvt Ltd) को इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) ने गुजरात के पिपावाव स्थित अपने बिटुमेन सेल के लिए ऑपरेटिंग पार्टनर चुना है. इस साझेदारी से गुजरात और आसपास के क्षेत्रों में स्पेशलिटी बिटुमेन उत्पादों की आपूर्ति मजबूत होने के साथ सड़क और परिवहन अवसंरचना परियोजनाओं को भी गति मिलने की उम्मीद है.
IOCL ने Amron Oil Resources को चुना
GP Petroleums ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि उसकी संयुक्त उद्यम कंपनी Amron Oil Resources Pvt Ltd को IOCL के गुजरात स्थित पिपावाव बिटुमेन सेल के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है. Amron Oil Resources, GP Petroleums और West Coast Oils LLP के बीच 50:50 हिस्सेदारी वाला संयुक्त उद्यम है.
सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद बनाती है कंपनी
Amron Oil Resources स्पेशलिटी बिटुमेन उत्पादों का निर्माण करती है. इनमें बिटुमेन इमल्शन, पॉलिमर मॉडिफाइड बिटुमेन (PMB) और क्रम्ब रबर मॉडिफाइड बिटुमेन (CRMB) शामिल हैं. इन उत्पादों का व्यापक उपयोग सड़क निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में किया जाता है.
जून से शुरू हो चुकी है सप्लाई
कंपनी के मुताबिक, पिपावाव सुविधा से बल्क बिटुमेन की आपूर्ति 4 जून 2026 से शुरू हो चुकी है. इस सुविधा का उद्घाटन इंडियन ऑयल के 'SPRING 2026 Mission Excellence' (यदि मूल नाम 'SPRINT 2026 Mission Excellence' है तो वही रखें) पहल के तहत किया गया था.
गुजरात और आसपास के राज्यों को मिलेगा फायदा
GP Petroleums का कहना है कि पिपावाव बिटुमेन सेल के संचालन से गुजरात और आसपास के क्षेत्रों में स्पेशलिटी बिटुमेन उत्पादों की उपलब्धता बेहतर होगी. पिपावाव बंदरगाह के निकट स्थित होने के कारण यह सुविधा लॉजिस्टिक्स को अधिक कुशल बनाएगी, जिससे सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को समय पर सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी.
सड़क अवसंरचना कारोबार में बढ़ेगी हिस्सेदारी
कंपनी का मानना है कि IOCL के ऑपरेटिंग पार्टनर के रूप में चयन होने से स्पेशलिटी बिटुमेन सेगमेंट में GP Petroleums की मौजूदगी और मजबूत होगी. साथ ही भारत के सड़क और परिवहन अवसंरचना क्षेत्र में कंपनी की भागीदारी का दायरा भी बढ़ेगा.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि देशभर में लागू किए जाने से पहले E20 पेट्रोल का इंजन की मजबूती, उत्सर्जन, जंग-प्रतिरोध और वाहनों के साथ अनुकूलता जैसे कई मानकों पर व्यापक परीक्षण किया गया है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने पहली बार स्वीकार किया है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से कुछ वाहनों का माइलेज 3% से 5% तक कम हो सकता है. हालांकि, सरकार का कहना है कि बेहतर इंजन परफॉर्मेंस, कम प्रदूषण और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने जैसे फायदे इस मामूली कमी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने E20 पेट्रोल को लेकर जारी विस्तृत FAQ में इसकी जानकारी दी है.
E20 पेट्रोल पर सरकार का बड़ा बयान
केंद्र सरकार ने शुक्रवार को कहा कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से कुछ वाहनों की ईंधन दक्षता (फ्यूल इकोनॉमी) में 3% से 5% तक कमी आ सकती है. हालांकि, सरकार का कहना है कि E20 एक स्वच्छ और हाई-ऑक्टेन ईंधन है, जो इंजन की बेहतर कार्यक्षमता, कम उत्सर्जन और ऊर्जा सुरक्षा जैसे कई फायदे देता है.
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि देशभर में लागू किए जाने से पहले E20 पेट्रोल का इंजन की मजबूती, उत्सर्जन, जंग-प्रतिरोध (Corrosion Resistance) और वाहनों के साथ अनुकूलता जैसे कई मानकों पर व्यापक परीक्षण किया गया है.
E20 को जल्दबाजी में लागू करने के दावों को किया खारिज
सरकार ने E20 पेट्रोल को जल्दबाजी में लागू किए जाने के आरोपों को भी खारिज किया है. मंत्रालय के मुताबिक, भारत का एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol-EBP) कार्यक्रम वर्ष 2001 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ था. इसके बाद 2018 में राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति (National Policy on Biofuels) लागू होने के बाद इस कार्यक्रम का धीरे-धीरे विस्तार किया गया.
सरकार ने 2022 में तय समय से पहले 10% एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लिया था. वहीं, 2025-26 एथेनॉल आपूर्ति वर्ष के दौरान 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य भी पूरा कर लिया गया.
ऑटो कंपनियों ने नहीं जताई कोई चिंता
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, Maruti Suzuki और Hero MotoCorp सहित प्रमुख वाहन निर्माताओं ने वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में E20 पेट्रोल के कारण इंजन में जंग लगने या पुर्जों के असामान्य घिसाव जैसी किसी समस्या की रिपोर्ट नहीं दी है.
तेल आयात घटाना है सरकार का मुख्य उद्देश्य
सरकार ने स्पष्ट किया कि एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का उद्देश्य पेट्रोल की कीमतें कम करना नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना है.
मंत्रालय के अनुसार, इस कार्यक्रम के जरिए वर्ष 2014-15 से अब तक 1.97 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है. इसके अलावा करीब 316 लाख टन कच्चे तेल के आयात की आवश्यकता कम हुई है.
किसानों और पर्यावरण को भी हुआ फायदा
सरकार का दावा है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से लगभग 952 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन में कमी आई है. साथ ही इस कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को 1.66 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है, जिससे उनकी आय बढ़ाने और जैव ईंधन उत्पादन को प्रोत्साहन देने में मदद मिली है.
दोनों देशों ने 'इंडिया-न्यूजीलैंड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप: रोडमैप 2030' को भी मंजूरी दी, जिसके तहत अगले चार वर्षों में व्यापार, कृषि, सुरक्षा, नवाचार, पर्यटन और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर संयुक्त रूप से काम किया जाएगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान भारत और न्यूजीलैंड ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए कई अहम समझौतों पर सहमति जताई है. दोनों देशों ने 2030 तक आपसी व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर (करीब ₹35,000 करोड़) तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. इसके साथ ही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA), कृषि, डेयरी, पर्यटन, समुद्री सहयोग, कौशल विकास और स्वच्छ ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत करने का रोडमैप भी तैयार किया गया है.
भारत-न्यूजीलैंड रिश्ते बने 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप'
भारत और न्यूजीलैंड ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को आधिकारिक तौर पर 'स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' का दर्जा दे दिया है. दोनों देशों ने 'इंडिया-न्यूजीलैंड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप: रोडमैप 2030' को भी मंजूरी दी, जिसके तहत अगले चार वर्षों में व्यापार, कृषि, सुरक्षा, नवाचार, पर्यटन और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर संयुक्त रूप से काम किया जाएगा.
यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में लिया गया. उल्लेखनीय है कि करीब चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक न्यूजीलैंड यात्रा है.
2030 तक ₹35,000 करोड़ व्यापार का लक्ष्य
दोनों देशों ने आर्थिक साझेदारी को नई गति देने के लिए 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं के द्विपक्षीय व्यापार को 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर (करीब ₹35,000 करोड़) तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. सरकारों का मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच निवेश बढ़ेगा, नए कारोबारी अवसर बनेंगे और कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंच मिलेगी.
FTA को जल्द लागू करने पर बनी सहमति
भारत और न्यूजीलैंड ने लंबे समय से लंबित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को जल्द अंतिम रूप देने और लागू करने पर भी सहमति जताई है. दोनों प्रधानमंत्रियों ने कहा कि यह समझौता संतुलित, व्यापक और दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा. FTA लागू होने के बाद व्यापारिक बाधाएं कम होंगी, आयात-निर्यात आसान होगा और दोनों देशों के उद्योगों को नए अवसर मिलेंगे.
कृषि और डेयरी सेक्टर को मिलेगा बड़ा फायदा
दोनों देशों ने कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई है. इसके तहत बागवानी, वानिकी, पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं पर काम किया जाएगा. न्यूजीलैंड भारत में कीवी, सेब और शहद के उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए तकनीकी सहयोग देगा. साथ ही भारत में कीवी फ्रूट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना में भी सहयोग करेगा. पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच नए सहयोग समझौते (MoC) पर सहमति बनी है.
पर्यटन और सीधी उड़ानों को मिलेगा बढ़ावा
पर्यटन क्षेत्र को मजबूत करने के लिए दोनों देशों ने एक समझौता (MoA) पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके अलावा भारत और न्यूजीलैंड के बीच सीधी नॉन-स्टॉप उड़ानें शुरू करने की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा. सीधी उड़ानें शुरू होने से पर्यटन, व्यापार और शिक्षा के क्षेत्र में आवाजाही आसान होगी और लोगों के बीच संपर्क बढ़ेगा.
कस्टम और समुद्री सहयोग होगा मजबूत
दोनों देशों ने कस्टम प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने के लिए ऑथराइज्ड इकोनॉमिक ऑपरेटर-म्यूचुअल रिकग्निशन अरेंजमेंट (AEO-MRA) लागू करने पर सहमति जताई है. इसके जरिए भरोसेमंद निर्यातकों और आयातकों के लिए कस्टम क्लियरेंस की प्रक्रिया अधिक तेज और सुगम हो सकेगी.
इसके साथ ही भारत और न्यूजीलैंड समुद्री क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाएंगे. दोनों देश नाविकों के प्रमाणपत्रों की पारस्परिक मान्यता पर काम करेंगे, जिससे भारतीय नाविकों के लिए वैश्विक रोजगार के नए अवसर खुलेंगे.
कई क्षेत्रों में बढ़ेगा सहयोग
'रोडमैप 2030' के तहत दोनों देशों ने स्वच्छ ऊर्जा, कौशल विकास, नवाचार, निवेश और तकनीकी सहयोग को भी प्राथमिकता देने का फैसला किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीतिक साझेदारी न केवल द्विपक्षीय व्यापार को नई गति देगी, बल्कि दोनों देशों के बीच आर्थिक, तकनीकी और लोगों के स्तर पर सहयोग को भी मजबूत बनाएगी.
'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत अब तक 40 लाख रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन का लक्ष्य हासिल किया जा चुका है. इस योजना का उद्देश्य 1 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों तक सोलर बिजली पहुंचाना है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में रूफटॉप सोलर अपनाने की रफ्तार बढ़ाने के लिए विश्व बैंक ने बड़ा कदम उठाया है. संस्था देश में 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत 4.2 अरब डॉलर की निजी वित्तपोषण (Private Financing) जुटाने में मदद करेगी. इस पहल से लाखों परिवारों के लिए सोलर पैनल लगाना आसान होगा, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार और घरेलू विनिर्माण को भी बढ़ावा मिलेगा.
विश्व बैंक ने मंजूर किया फंडिंग पैकेज
विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशक मंडल ने भारत की रूफटॉप सोलर योजना को गति देने के लिए नए वित्तपोषण पैकेज को मंजूरी दे दी है. इस पैकेज का उद्देश्य 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत घरों में सोलर पैनल लगाने की प्रक्रिया को तेज करना और निजी निवेश को आकर्षित करना है. विश्व बैंक के मुताबिक, इस पहल के जरिए 4.2 अरब डॉलर तक की निजी फाइनेंसिंग जुटाई जाएगी, जिससे देश में रूफटॉप सोलर अपनाने की रफ्तार और तेज होगी.
फंडिंग पैकेज में क्या-क्या शामिल?
इस कार्यक्रम के लिए तैयार किए गए वित्तीय पैकेज में कई स्रोतों से धन उपलब्ध कराया जाएगा.
1. इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट (IBRD) से 82 करोड़ डॉलर का ऋण.
2. क्लीन टेक्नोलॉजी फंड (CTF) से 6 करोड़ डॉलर का रियायती ऋण.
3. IBRD के 'लिवेबल प्लैनेट फंड' के तहत 1 करोड़ डॉलर का अनुदान.
40 लाख इंस्टॉलेशन का लक्ष्य पूरा, अब 1 करोड़ घरों पर नजर
सरकार की 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' के तहत अब तक 40 लाख रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन का लक्ष्य हासिल किया जा चुका है. इस योजना का उद्देश्य 1 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों तक सोलर बिजली पहुंचाना है. सरकार का मानना है कि इस मिशन से नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण, इंस्टॉलेशन और सर्विस सेक्टर में करीब 17 लाख रोजगार के अवसर पैदा होंगे.
बिना गिरवी के मिलेगा सोलर लोन
विश्व बैंक के कार्यक्रम के टास्क टीम लीडर मोएज चेरिफ ने कहा कि यह योजना आवासीय सोलर बाजार में बड़ा बदलाव ला सकती है. उन्होंने कहा कि वितरण कंपनियों (DISCOMs), बैंकों और सोलर उपकरण विक्रेताओं की क्षमता बढ़ाकर एकीकृत सेवा मॉडल तैयार किया जाएगा. इसके जरिए परिवार बिना किसी संपत्ति को गिरवी रखे ऋण लेकर सोलर पैनल लगवा सकेंगे और अपने बिजली बिल में उल्लेखनीय बचत कर पाएंगे.
65 लाख आवेदन विचाराधीन
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने हाल ही में बताया था कि योजना के तहत 65 लाख से अधिक आवेदन प्रक्रिया में हैं. सरकार का लक्ष्य दिसंबर 2026 तक 75 लाख घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित करना है.
भारत के सोलर मिशन को मिलेगा नया बल
भारत में विश्व बैंक के कार्यवाहक कंट्री डायरेक्टर पॉल प्रोप्सी ने कहा कि विश्व बैंक पिछले एक दशक से अधिक समय से भारत के रूफटॉप सोलर सेक्टर का समर्थन कर रहा है. उन्होंने बताया कि इस दौरान 2 अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय सहायता जुटाई गई, जिससे देश की रूफटॉप सोलर क्षमता 500 मेगावॉट से बढ़कर 27 गीगावॉट से अधिक हो गई.
नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में अहम कदम
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य तय किया है. साथ ही 2035 तक देश के बिजली उत्पादन में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा की हिस्सेदारी 60% तक पहुंचाने का संकल्प लिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व बैंक की यह नई पहल भारत के स्वच्छ ऊर्जा अभियान, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ग्रीन इकोनॉमी को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया लिक्विडिटी उपाय और विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह बैंकिंग सिस्टम को समर्थन देंगे.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का बैंकिंग सेक्टर अगले तीन वित्त वर्षों (FY26-FY28) में मजबूत कमाई दर्ज कर सकता है. ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFS) की रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार बढ़ती कर्ज मांग, RBI की लिक्विडिटी सपोर्ट और नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) में वृद्धि के दम पर बैंकिंग सेक्टर की आय 15% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने का अनुमान है. रिपोर्ट में प्राइवेट बैंकों के सरकारी बैंकों (PSU Banks) से बेहतर प्रदर्शन करने की संभावना जताई गई है.
FY28 तक 15% CAGR से बढ़ सकती है कमाई
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFS) की रिपोर्ट के अनुसार, FY26 से FY28 के बीच भारतीय बैंकिंग सेक्टर की आय लगभग 15% CAGR की दर से बढ़ सकती है. वहीं, प्राइवेट सेक्टर के बैंकों की कमाई इस अवधि में करीब 20% CAGR से बढ़ने का अनुमान है, जिससे उनके सरकारी बैंकों से बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद है.
कर्ज की मजबूत मांग देगी रफ्तार
रिपोर्ट के मुताबिक, FY27 में कॉरपोरेट, सर्विसेज और इंडस्ट्रियल सेक्टर में मजबूत मांग के चलते क्रेडिट ग्रोथ मिड-टू-हाई टीन्स में बनी रह सकती है. मई 2026 में कॉरपोरेट सेक्टर को दिए गए कर्ज में सालाना आधार पर 18.7% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि सर्विस सेक्टर को दिए गए कर्ज में 19.1% की वृद्धि हुई.
इंडस्ट्रियल क्रेडिट में आई तेजी
रिपोर्ट के अनुसार, FY26 की पहली छमाही में जहां औद्योगिक क्षेत्र को मिलने वाले कर्ज की वृद्धि एकल अंक (Mid-Single Digit) में थी, वहीं दिसंबर 2025 के बाद इसमें मिड-टीन्स की वृद्धि दर्ज की गई है. इस तेजी की वजह बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और बड़े कॉरपोरेट्स, मिड-साइज कंपनियों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की वर्किंग कैपिटल जरूरतों में इजाफा बताया गया है.
RBI के कदम से मिलेगा सहारा
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया लिक्विडिटी उपाय और विदेशी पूंजी का मजबूत प्रवाह बैंकिंग सिस्टम को समर्थन देंगे. MOFS का अनुमान है कि FCNR(B) डिपॉजिट और विदेशी उधारी से जुड़े नियमों में RBI की ढील के बाद 40 से 50 अरब डॉलर तक का विदेशी निवेश आ सकता है. यह बैंकिंग सिस्टम के कुल डिपॉजिट का करीब 1.5% से 1.8% के बराबर होगा.
डिपॉजिट ग्रोथ अभी भी कमजोर
रिपोर्ट के मुताबिक, डिपॉजिट ग्रोथ अभी भी क्रेडिट ग्रोथ से पीछे चल रही है. मई 2026 तक डिपॉजिट ग्रोथ 12% रही, जबकि पूरे 2026 में यह 10% से 12% के दायरे में बनी हुई है. इसका असर यह हुआ कि बैंकिंग सिस्टम का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो बढ़कर रिकॉर्ड 83.4% पर पहुंच गया.
मार्जिन पर रहेगा दबाव
MOFS का कहना है कि FY27 की पहली तिमाही में नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बना रह सकता है. इसकी वजह पहले हुई रेपो रेट कटौती का असर, लेंडिंग यील्ड में कमी और डिपॉजिट पर ऊंची ब्याज दरें हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि होलसेल और MSME लेंडिंग का बढ़ता हिस्सा बैंकों की ब्याज दरों में सुधार की क्षमता को सीमित कर सकता है. इसके अलावा, कुछ मिड-साइज बैंकों ने तिमाही के दौरान डिपॉजिट रेट बढ़ाई है. वहीं, चालू खाता-बचत खाता (CASA) अनुपात में गिरावट से बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ने की आशंका है.
मध्यम अवधि का आउटलुक सकारात्मक
हालांकि, निकट अवधि में चुनौतियां बनी रहने की संभावना है, लेकिन MOFS ने बैंकिंग सेक्टर के मध्यम अवधि के आउटलुक को सकारात्मक बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, उधारी लागत में संभावित कमी और FY27 के अंत तक ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी से बैंकों के मार्जिन और आय में सुधार देखने को मिल सकता है.
कंपनी का प्रस्तावित IPO नए शेयरों के फ्रेश इश्यू और मौजूदा शेयरधारकों की ओर से ऑफर फॉर सेल (OFS) का संयोजन होगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टेक्नोलॉजी आधारित मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म Zetwerk Manufacturing Business Limited को अपने प्रस्तावित इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) से मंजूरी मिल गई है. कंपनी का IPO नए शेयरों के निर्गम (Fresh Issue) और मौजूदा निवेशकों द्वारा ऑफर फॉर सेल (OFS) का मिश्रण होगा. हालांकि, इश्यू का आकार और वैल्यूएशन बुक-बिल्डिंग प्रक्रिया के दौरान तय किए जाएंगे.
SEBI ने दी हरी झंडी
Zetwerk Manufacturing Business Limited को अपने IPO के लिए SEBI की मंजूरी मिल गई है. SEBI की ओर से जारी ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट्स की नवीनतम प्रोसेसिंग रिपोर्ट के अनुसार, 9 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में कंपनी को ऑब्जर्वेशन लेटर जारी किया गया. Zetwerk ने 1 अप्रैल 2026 को IPO के लिए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया था.
फ्रेश इश्यू और OFS दोनों होंगे शामिल
कंपनी का प्रस्तावित IPO नए शेयरों के फ्रेश इश्यू और मौजूदा शेयरधारकों की ओर से ऑफर फॉर सेल (OFS) का संयोजन होगा. हालांकि, इश्यू का आकार और कंपनी का वैल्यूएशन बुक-बिल्डिंग प्रक्रिया के दौरान तय किया जाएगा.
Zetwerk के प्रमुख निवेशकों में Khosla Ventures, Baillie Gifford, राकेश गंगवाल, Accel, Peak XV, GreenOak और Lightspeed जैसे बड़े नाम शामिल हैं.
2018 में हुई थी कंपनी की शुरुआत
Zetwerk की स्थापना वर्ष 2018 में अमृत आचार्य और श्रीनाथ रामाकृष्णन ने की थी. कंपनी टेक्नोलॉजी आधारित मैन्युफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म संचालित करती है, जो औद्योगिक मांग को सप्लायर्स और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के बड़े नेटवर्क से जोड़ता है.
कई सेक्टरों में फैला कारोबार
कंपनी का कारोबार ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, एयरोस्पेस, कैपिटल गुड्स, औद्योगिक सप्लाई और कच्चे माल की खरीद जैसे कई क्षेत्रों में फैला हुआ है. Zetwerk अपने स्वामित्व वाले सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म 'Zetwerk OS' के जरिए सोर्सिंग, प्रोडक्शन प्लानिंग, सप्लायर कोऑर्डिनेशन और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट का संचालन करती है.
वैश्विक सप्लाई चेन का उठा रही फायदा
कंपनी अपने स्वामित्व वाली मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के साथ-साथ दुनिया भर में फैले थर्ड-पार्टी सप्लायर नेटवर्क के जरिए काम करती है. वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव, डेटा सेंटर और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, ऊर्जा परिवर्तन, रक्षा विनिर्माण और भारत में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा जैसी प्रवृत्तियों का लाभ Zetwerk को मिल रहा है.
विस्तार को मिलेगी रफ्तार
IPO के जरिए Zetwerk सार्वजनिक बाजार में कदम रखने की तैयारी कर रही है. कंपनी का मानना है कि इससे उसके विस्तार की योजनाओं को गति मिलेगी और विभिन्न मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी और मजबूत होगी.
SBI ने प्री-IPO प्लेसमेंट के तहत SBI Funds Management के 2.88 करोड़ इक्विटी शेयर 30 निवेशकों को बेचे हैं. इस हिस्सेदारी की बिक्री 574 रुपये प्रति शेयर के भाव पर हुई, जो IPO के प्राइस बैंड का ऊपरी स्तर है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने अपनी एसेट मैनेजमेंट इकाई SBI Funds Management में 1.42% हिस्सेदारी 1,655 करोड़ रुपये में बेच दी है. यह सौदा कंपनी के 11,700 करोड़ रुपये के IPO से पहले प्री-IPO प्लेसमेंट के जरिए किया गया है. इस डील से कंपनी को मजबूत संस्थागत निवेशकों का भरोसा मिलने का संकेत माना जा रहा है.
30 निवेशकों को बेचे 2.88 करोड़ शेयर
SBI ने प्री-IPO प्लेसमेंट के तहत SBI Funds Management के 2.88 करोड़ इक्विटी शेयर 30 निवेशकों को बेचे हैं. इस हिस्सेदारी की बिक्री 574 रुपये प्रति शेयर के भाव पर हुई, जो IPO के प्राइस बैंड का ऊपरी स्तर है.
कंपनी के मुताबिक, इस सौदे में टाटा AIG जनरल इंश्योरेंस, गो डिजिट जनरल इंश्योरेंस, 360 ONE फंड्स, बेनेट कोलमैन के अलावा कई अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) और फैमिली ऑफिसेज ने निवेश किया है.
14 जुलाई को खुलेगा 11,700 करोड़ रुपये का IPO
SBI Funds Management का 11,700 करोड़ रुपये का IPO 14 जुलाई को निवेशकों के लिए खुलेगा और 16 जुलाई को बंद होगा. कंपनी ने IPO का प्राइस बैंड 545 रुपये से 574 रुपये प्रति शेयर तय किया है. शेयरों की लिस्टिंग 21 जुलाई को BSE और NSE पर होने की उम्मीद है.
1.17 लाख करोड़ रुपये तक हो सकता है वैल्यूएशन
IPO के ऊपरी प्राइस बैंड 574 रुपये के आधार पर SBI Funds Management का वैल्यूएशन करीब 1.17 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. इससे यह देश की सबसे मूल्यवान एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल होगी.
पूरी तरह OFS होगा IPO
यह IPO पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा. यानी इस इश्यू से कंपनी को कोई नई पूंजी नहीं मिलेगी. IPO के तहत SBI अपनी 12.83 करोड़ इक्विटी शेयर बेचेगा, जबकि उसकी संयुक्त उद्यम (JV) साझेदार यूरोप की एसेट मैनेजमेंट कंपनी Amundi India Holding 7.54 करोड़ शेयरों की बिक्री करेगी. दोनों मिलकर कंपनी की करीब 10% चुकता इक्विटी हिस्सेदारी बेचेंगे.
SBI और Amundi का संयुक्त उपक्रम
SBI Funds Management, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और यूरोप की एसेट मैनेजमेंट कंपनी Amundi का संयुक्त उपक्रम (Joint Venture) है. यह देश की सबसे बड़ी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों में शामिल है और IPO के जरिए निवेशकों को इसमें हिस्सेदारी खरीदने का अवसर मिलेगा.
बुधवार को बाजार में आई भारी गिरावट ने केंद्रीय बैंक के बैंक गारंटी नियमों को लेकर उद्योग की बहस को फिर से तेज कर दिया है. लेकिन जहां एक ओर पूरा उद्योग एकजुट नजर आ रहा है, वहीं अंदरखाने ब्रोकरेज कंपनियां इस मुद्दे पर बंटी हुई हैं. साथ ही RBI के कदम के पीछे भी ठोस वजहें हो सकती हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
बुधवार के बाजार में आई बड़ी गिरावट के लिए सिर्फ एक बयान काफी था. जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ युद्धविराम "खत्म हो गया है", तो सेंसेक्स 1,677 अंक टूट गया. यह पिछले तीन महीनों में उसकी सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट थी. वहीं निफ्टी 24,000 के नीचे फिसल गया. इस दौरान निवेशकों की करीब 8 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई, जबकि इंडिया VIX में लगभग 30% की तेजी दर्ज की गई.
इस गिरावट की वजह भू-राजनीतिक तनाव था. लेकिन बाजार के जानकारों को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की हुई कि गिरावट को थामने के लिए बाजार में खरीदारी लगभग नदारद थी. ब्रोकिंग इंडस्ट्री का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इसकी वजह RBI के नए क्रेडिट नियम हैं, जो 1 अप्रैल से लागू हुए. इन नियमों के तहत बैंकों को ब्रोकर्स की प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग के लिए फंडिंग देने से रोक दिया गया और क्लियरिंग कॉरपोरेशन को दी जाने वाली बैंक गारंटी पर कड़े कोलेटरल नियम लागू कर दिए गए.
लिक्विडिटी की दलील
प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग डेस्क लंबे समय से भारतीय डेरिवेटिव बाजारों में झटकों को संभालने का काम करते रहे हैं. खासकर BSE और MCX में, जहां कुल कारोबार का बड़ा हिस्सा प्रॉप ट्रेडिंग से आता है. ब्रोकर्स का कहना है कि इन डेस्कों को मिलने वाली बैंक फंडिंग पर रोक लगाकर RBI ने बाजार के उसी हिस्से को कमजोर कर दिया, जो अस्थिरता बढ़ने पर खरीदारी के लिए आगे आता था.
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "उच्च अस्थिरता से निपटने के लिए लिक्विडिटी सबसे अहम होती है. बुधवार जैसे दिन बाजार में दूसरी तरफ खरीदारी करने वाला कोई मौजूद ही नहीं था."
उद्योग की दूसरी शिकायत यह है कि इन प्रतिबंधों को जोखिम प्रबंधन के नाम पर लागू किया गया, जबकि अधिकारियों का कहना है कि पिछले 20 वर्षों में मार्जिन की कमी के कारण एक भी डिफॉल्ट दर्ज नहीं हुआ है. उनका सवाल है कि यदि दो दशक से व्यवस्था बिना किसी समस्या के चल रही थी, तो आखिर किस जोखिम को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है?
इसी तर्क के आधार पर ब्रोकर्स अब RBI और वित्त मंत्रालय के समक्ष एक नया प्रतिनिधित्व तैयार कर रहे हैं. इस बार वे SEBI, मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों और ब्रोकर्स एसोसिएशनों सहित सभी हितधारकों को साथ लेकर समीक्षा की मांग करना चाहते हैं.
अधिकारी ने कहा, "जो उद्योग के लिए अच्छा है, वही सभी हितधारकों के लिए भी अच्छा है."
RBI का पक्ष
हालांकि केंद्रीय बैंक की चिंताएं काल्पनिक नहीं हैं. वे इस बात से जुड़ी हैं कि बैंक गारंटी का इस्तेमाल और उसकी मार्केटिंग किस तरह की जा रही थी.
आमतौर पर बैंक गारंटी केवल 10-25% मार्जिन के आधार पर जारी की जाती है. यानी यदि कोई ब्रोकर 25 रुपये जमा करता है, तो उसे 100 रुपये की बैंक गारंटी मिल सकती है. यदि इस गारंटी का इस्तेमाल डेरिवेटिव ट्रेडिंग में किया जाए, जहां पहले से ही 30-40 गुना एक्सपोजर मिलता है, तो वास्तविक लीवरेज बढ़कर ब्रोकर की अपनी पूंजी का 120-160 गुना तक पहुंच जाता है.
एक अनुभवी बाजार विशेषज्ञ ने इसे साफ शब्दों में समझाया. "यह दूसरे के पैसे से सट्टेबाजी है. ब्रोकर्स अपनी पूंजी लगाने के बजाय बैंक का पैसा इस्तेमाल करना चाहते हैं. मुनाफा हुआ तो उनका, लेकिन नुकसान हुआ तो वे डिफॉल्ट घोषित कर देते हैं और बैंक का पैसा डूब जाता है."
यह केवल सैद्धांतिक आशंका नहीं है. 2019 से 2021 के बीच कई ब्रोकरेज कंपनियां दिवालिया हुईं. उस दौरान कई बैंकों ने क्लियरिंग हाउस को दी गई बैंक गारंटी का भुगतान करने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वे पहले डिफॉल्ट करने वाले ब्रोकर से अपना बकाया वसूलेंगे, जो कई मामलों में पूरी बैंक गारंटी के बराबर था.
इस नजरिए से देखें तो RBI का संदेश स्पष्ट है. यदि सट्टा लगाना है तो 100% मार्जिन अपनी पूंजी से लाना होगा. बैंक गारंटी उपलब्ध रहेगी, लेकिन उसके पीछे वास्तविक कोलेटरल होना चाहिए. प्रॉपराइटरी एक्सपोजर के लिए कम से कम 50% नकद कोलेटरल जरूरी होगा, ताकि डेरिवेटिव में सट्टेबाजी असुरक्षित बैंक ऋण के सहारे न चल सके.
उद्योग में मतभेद
जिस एकजुटता के साथ उद्योग अपनी बात रखना चाहता है, उसे कायम रखना आसान नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि पुराने सिस्टम का फायदा और नुकसान सभी को समान रूप से नहीं मिला.
छोटे ब्रोकर्स का कहना है कि व्यवहार में बैंक गारंटी का लाभ केवल बड़े खिलाड़ियों को मिलता था. ऐसे संस्थानों को, जिनकी बैलेंस शीट 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की थी और जो बैंकों से आसानी से बैंक गारंटी हासिल कर सकते थे.
वे यह शिकायत भी करते हैं कि ANMI ने भी इस मुद्दे पर बड़े ब्रोकर्स का साथ दिया है.
एक छोटे ब्रोकर ने सवाल किया, "इसमें छोटे ब्रोकर्स की क्या गलती है?"
उनका कहना है कि पत्रकारों और नीति-निर्माताओं तक सबसे ज्यादा आवाज उन्हीं कुछ बड़ी प्रॉप-ट्रेडिंग कंपनियों की पहुंच रही है, जिन्हें बैंक के लीवरेज वाले फंड का सबसे अधिक लाभ मिला.
नियामकीय जांच कुछ बड़ी प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग कंपनियों के कारोबारी मॉडल पर भी केंद्रित रही है. यह मॉडल मुख्य रूप से दिल्ली, मुंबई और गुजरात की कुछ कंपनियों तक सीमित है और उद्योग में इसके बहुत कम उदाहरण हैं.
बाजार से जुड़े लोगों और नियामकीय सोच से परिचित सूत्रों का आरोप है कि कुछ कंपनियां स्वतंत्र ट्रेडर्स को अपनी प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग डेस्क का "कर्मचारी" दिखाती हैं. इस व्यवस्था से मार्जिन दायित्व, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) और आयकर देनदारी कम हो सकती है. आलोचकों का कहना है कि इससे वास्तविक प्रॉप ट्रेडिंग और तीसरे पक्ष की सामूहिक सट्टेबाजी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.
जिन कंपनियों पर ऐसे आरोप लगे हैं, उन्होंने लगातार इन आरोपों से इनकार किया है. हालांकि SEBI में माधबी पुरी बुच के कार्यकाल के दौरान शुरू हुई नियामकीय सख्ती के पीछे यह पूरा घटनाक्रम भी एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि माना जाता है.
आगे की राह
बुधवार की बाजार गिरावट ने उद्योग को अपनी सबसे मजबूत दलील दे दी है. यह एक वास्तविक उदाहरण था कि जब प्रॉप ट्रेडिंग पर निर्भर और अत्यधिक लीवरेज वाला बाजार बैंक फंडिंग से वंचित हो जाता है और उसी समय कोई बड़ा भू-राजनीतिक झटका लगता है, तो क्या स्थिति बनती है.
अब सवाल यह है कि क्या RBI भी इसी घटना को अपने फैसले की पुष्टि के रूप में देखता है. यानी क्या वह इसे इस बात का प्रमाण मानता है कि इतना अधिक लीवरेज वाला बाजार बैंक गारंटी के सहारे चलना ही नहीं चाहिए था.
आने वाले दिनों में RBI को दिए जाने वाले प्रतिनिधित्व से इसका जवाब मिल सकता है.
फिलहाल दोनों पक्ष एक ही गिरावट को देख रहे हैं, लेकिन उससे बिल्कुल अलग-अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
इस अधिग्रहण के साथ VOYAGE 1 का एकीकरण कुंडू के डेस्टिनेशन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ट्रैवल और टूरिज्म सेक्टर के अनुभवी उद्यमी नवीन कुंडू ने दुबई स्थित डेस्टिनेशन मैनेजमेंट कंपनी (DMC) VOYAGE 1 में बहुमत हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया है. इस डील के तहत कंपनी का एकीकरण उनकी डेस्टिनेशन मार्केटिंग और AI-आधारित प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा. कंपनी का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर अपने नेटवर्क का विस्तार करना और ट्रैवल एजेंट्स के लिए AI आधारित स्मार्ट सेवाएं उपलब्ध कराना है.
ट्रैवल इंडस्ट्री के उद्यमी नवीन कुंडू ने दुबई स्थित डेस्टिनेशन मैनेजमेंट कंपनी (DMC) VOYAGE 1 में बहुमत हिस्सेदारी हासिल कर ली है. इस अधिग्रहण के साथ VOYAGE 1 का एकीकरण कुंडू के डेस्टिनेशन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म Tourism Futures.AI के साथ किया जाएगा.
नई स्वामित्व संरचना के तहत नवीन कुंडू एकीकृत कंपनी के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की जिम्मेदारी संभालेंगे. इस दौरान वह कंपनी की मौजूदा संस्थापक टीम के साथ मिलकर कारोबार का नेतृत्व करेंगे.
कई देशों में मौजूद है VOYAGE 1
VOYAGE 1 की स्थापना विशाल धनसिंघानी ने की थी, जबकि लविन धनसिंघानी और अमित कुमार इसके सह-संस्थापक हैं. कंपनी अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली डेस्टिनेशन कंपनियों के जरिए अवकाश और बिजनेस ट्रैवल से जुड़े कई बाजारों में सेवाएं देती है.
फिलहाल कंपनी का संचालन संयुक्त अरब अमीरात (UAE), अजरबैजान, कजाकिस्तान, जॉर्जिया, वियतनाम, जापान, दक्षिण अफ्रीका, जाम्बिया, केन्या, तंजानिया, रवांडा और युगांडा सहित कई देशों में है.
अगले चरण में इन बाजारों में होगा विस्तार
एकीकृत कंपनी अब अपने डेस्टिनेशन मैनेजमेंट नेटवर्क का विस्तार स्विट्जरलैंड, नॉर्डिक देशों, थाईलैंड और अमेरिका महाद्वीप के बाजारों तक करने की तैयारी में है. यह विस्तार कंपनी की अगली विकास रणनीति का हिस्सा होगा.
AI और डेस्टिनेशन मैनेजमेंट का होगा मेल
कंपनी के अनुसार, इस एकीकरण से VOYAGE 1 की स्थानीय विशेषज्ञता और डेस्टिनेशन मैनेजमेंट क्षमताओं को Tourism Futures.AI के AI-संचालित डेस्टिनेशन मार्केटिंग और ग्राहक अधिग्रहण प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ा जाएगा. इसका उद्देश्य ट्रैवल एजेंट्स को व्यक्तिगत सिफारिशें, बेहतर ग्राहक अधिग्रहण, परिचालन दक्षता और नए व्यावसायिक अवसर उपलब्ध कराना है.
नवीन कुंडू ने कहा कि डेस्टिनेशन मैनेजमेंट का पारंपरिक मॉडल अब बड़े बदलाव के लिए तैयार है. उन्होंने कहा कि VOYAGE 1 के मजबूत ऑपरेशनल नेटवर्क को Tourism Futures.AI की इंटेलिजेंट ऑटोमेशन तकनीक के साथ जोड़कर दुनिया का पहला वास्तविक स्मार्ट DMC नेटवर्क तैयार किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि यह नेटवर्क केवल यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डेटा आधारित विश्लेषण के जरिए बाजार की मांग का पहले से अनुमान लगाएगा, B2B डिस्ट्रीब्यूशन पार्टनर्स को ग्राहक बढ़ाने में मदद करेगा और विभिन्न महाद्वीपों में बेहतर यात्रा अनुभव उपलब्ध कराएगा.
35 वर्षों का अनुभव
नवीन कुंडू के पास ट्रैवल, टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी, कॉर्पोरेट ट्रैवल, डेस्टिनेशन मैनेजमेंट और MICE (मीटिंग्स, इंसेंटिव्स, कॉन्फ्रेंस और एग्जीबिशन) सेक्टर में 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है. हालांकि, दोनों कंपनियों के बीच हुई इस डील की वित्तीय शर्तों का खुलासा नहीं किया गया है.