अमेरिकी बैंक डूबने के बाद सरकार ने स्‍टार्टअप की मदद के लिए उठाए ये कदम, क्‍या होगा फायदा

दरअसल भारत में पिछले लंबे समय से स्‍टार्टअप के लिए मुहैया कराए जा रहे इंफ्रा के बाद देश में इनकी संख्‍या तेजी से बढ़ी है. सरकार उन्‍हें और बूस्‍ट देने के लिए अलग-अलग तरह के प्रयास कर रही है.

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Tuesday, 11 April, 2023
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अमेरिका में आए सिलिकॉन वैली बैंक के घटनाक्रम के बाद भारत सरकार ने स्‍टार्टअप की मदद के लिए एक कमिटी गठित की है. ये कमिटी SVB घटनाक्रम के बाद स्‍टार्टअप की फंडिंग के हालात पर नजर रखने के लिए बनाई गई है. इस समिति में DPIIT के मेंबर भी शामिल किए गए हैं. जो इस पूरे हालात के बाद स्‍टार्टअप की फंडिंग में मदद को लेकर काम करेंगे. 

कैसे जांच करेगी ये समिति 
अमेरिका में आए बैंक संकट के बाद इंडियन बैंक एसोसिएशन ने एक कमिटी बनाई है. ये कमिटी पता लगाएगी कि आखिर इस संकट के कारण कहीं भारत में स्‍टार्टअप की मदद में किसी तरह की परेशानी तो नहीं आ रही है. ये कमिटी ये भी पता लगाने की कोशिश करेगी कि आखिर किस तरह से स्‍टार्टअप के लिए और फंडिंग का इंतजाम किया जा सकता है. यही नहीं ये कमिटी ये भी पता लगाएगी कि क्‍या इस संकट के कारण किसी तरह के अवसर पैदा हुए हैं अगर ऐसा है तो उनका लाभ कैसे लिया जाएगा. ये कमिटी अगले दो महीने में अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है जिसके बाद सरकार उस दिशा में अपने कदम उठाएगी.  

Startup के लिए अवॉर्ड शो 
सरकार की ओर से प्रतिभाशाली Startup को अवॉर्ड देने के लिए इस बार भी अवॉर्ड शो का कार्यक्रम ओयाजित किया जाएगा. इस बार होने वाला कार्यक्रम ये इस श्रृंखला का पांचवा अवार्ड शो होगा. सरकार इसमें अवॉर्ड जीतने वाले स्‍टार्टअप को अलग-अलग तरीके से मदद करती है. अवॉर्ड जीतने वाले को 5 लाख रुपये कैश अवॉर्ड और उसके बाद उन्‍हें उनके कारोबार को और बेहतर बनाने के लिए अलग-अलग अवसर भी मुहैया कराये जाते हैं. जो भी इस अवॉर्ड को जीतते हैं उन्‍हें DPIIT की ओर से चलाई जाने वाली स्‍कीम में प्राथमिकता दी जाती है. 

नॉर्थ ईस्‍ट में शुरू हुए 140 स्‍टार्टअप 
ज्‍वॉइंट सेक्रेट्री मनमीत चंद्रा ने बताया कि सरकार की ओर से स्‍टार्टअप को लेकर दी सुविधाओं के चलते अब तक नॉर्थ ईस्‍ट में 140 स्‍टार्टअप रजिस्‍टर हो चुके हैं. सरकार दरअसल उन स्‍टार्टअप को स्‍टार्टअप मानती है जो उसकी तय परिभाषा में फिट होते हैं. उन्‍होंने ये भी बताया कि सरकार के पास केवल उन्‍हीं स्‍टार्टअप की जानकारी मौजूद है जो सरकार के क्राइटेरिया पर खरे उतरते हैं. लेकिन देश में ऐसे भी कई स्‍टार्टअप काम कर रहे हैं जो सरकार के क्राइटेरिया पर खरे नहीं उतरते हैं. लेकिन उनकी जानकारी सरकार के पास नहीं है. 


पूर्व राज्यसभा सांसद आर. के. सिन्हा का निधन, पत्रकारिता से लेकर कारोबार और राजनीति तक बनाई थी खास पहचान

नोएडा में 83 वर्षीय आर. के. सिन्हा ने ली अंतिम सांस, SIS ग्रुप की स्थापना कर भारत में निजी सुरक्षा उद्योग को नई पहचान दी; जनसंघ के दौर से भाजपा से जुड़े रहे

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Friday, 30 October, 2026
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वरिष्ठ भाजपा नेता, पूर्व राज्यसभा सांसद और सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (SIS) ग्रुप के संस्थापक एवं चेयरमैन रविंद्र किशोर सिन्हा (आर. के. सिन्हा) का शुक्रवार को निधन हो गया. उन्होंने नोएडा स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर से राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी जगत में शोक की लहर दौड़ गई है. विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और उद्योग जगत की हस्तियों ने उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी है.

पत्रकारिता से अपने करियर की शुरुआत करने वाले आर. के. सिन्हा ने राजनीति और कारोबार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय पहचान बनाई. वह न केवल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल थे, बल्कि उन्होंने भारत में निजी सुरक्षा उद्योग की नींव रखने और उसे वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई.

पत्रकारिता का सफर

राजनीति विज्ञान और कानून की पढ़ाई करने वाले आर. के. सिन्हा ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की थी. उन्होंने अपराध और राजनीतिक रिपोर्टिंग के क्षेत्र में काम किया. वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध संवाददाता के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई. इस दौरान उनके साहसिक काम की काफी सराहना हुई. इसी दौर में उन्होंने 'जन आंदोलन' नामक पुस्तक लिखी. इसे 1970 से 1975 के बीच जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन पर शुरुआती प्रामाणिक शोध कार्यों में गिना जाता है.

दो लोगों से शुरू किया SIS ग्रुप का कारोबार

वर्ष 1971 के युद्ध के बाद पूर्व सैनिकों को रोजगार और पुनर्वास के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आर. के. सिन्हा ने 1974 में सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (SIS) की स्थापना की.

पूर्वी भारत में दो लोगों की टीम और एक छोटे से किराये के कार्यालय से शुरू हुआ यह कारोबार आगे चलकर एशिया-पैसिफिक क्षेत्र की प्रमुख सुरक्षा सेवा कंपनियों में शामिल हो गया. आज SIS ग्रुप के पास 36,000 से अधिक स्थायी कर्मचारी और 3,000 से ज्यादा कॉर्पोरेट ग्राहक हैं. कंपनी का कारोबार 350 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक बताया जाता है.

निजी सुरक्षा उद्योग में उनके योगदान के कारण उन्हें इस क्षेत्र का अग्रणी उद्यमी माना जाता था. सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग उन्हें सम्मानपूर्वक 'आर. के.' कहकर संबोधित करते थे. उन्होंने निजी सुरक्षा उद्योग से जुड़े कानूनों और नियामकीय मुद्दों पर विभिन्न सरकारी निकायों के समक्ष भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया.

वह 1999 से 2004 तक भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय में सलाहकार रहे. वर्ष 2006 में सिंगापुर की सुरक्षा एसोसिएशन ने उन्हें 'लॉस प्रिवेंशन प्रमोटर अवार्ड' से सम्मानित किया था.

जनसंघ के समय से भाजपा से जुड़े थे आर. के. सिन्हा

आर. के. सिन्हा का भाजपा से जुड़ाव जनसंघ के दौर से रहा. वह पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे और उन्होंने संगठन में राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

बिहार में भाजपा के चुनावी अभियानों में भी उनकी अहम भूमिका रही. उन्होंने बिहार चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में काम किया. वर्ष 2014 में भाजपा ने उन्हें बिहार से राज्यसभा के लिए नामित किया था.

संसद में अपने कार्यकाल के दौरान वह गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की स्थायी समितियों, श्रम एवं रोजगार संबंधी सलाहकार समिति और राज्यसभा की याचिकाओं से जुड़ी समिति सहित कई महत्वपूर्ण संसदीय निकायों के सदस्य रहे.

नेताओं ने जताया दुख, पटना ले जाया जाएगा पार्थिव शरीर

आर. के. सिन्हा के निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने गहरा दुख व्यक्त किया. उन्होंने इसे हृदयविदारक बताते हुए कहा कि पत्रकारिता, समाज सेवा और सांगठनिक कार्यों में आर. के. सिन्हा का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा. उनका निधन राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति है.

जनता दल (यूनाइटेड) और बिहार भाजपा ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है. नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनका जाना पार्टी और समाज के लिए बड़ी क्षति है.

पारिवारिक सदस्यों के अनुसार, आर. के. सिन्हा का पार्थिव शरीर दिल्ली से पटना ले जाया जाएगा. अंतिम दर्शन के लिए उनके पार्थिव शरीर को पाटलिपुत्र स्थित 'अन्नपूर्णा भवन' में रखा जाएगा, जहां समर्थक, पार्टी कार्यकर्ता और आम लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकेंगे.


छह महीने में राजकोषीय घाटा 25.4% बढ़कर 7.15 लाख करोड़ रुपये पहुंचा, सालाना लक्ष्य का 42.1% हुआ पूरा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान राजकोषीय घाटा पूरे वित्त वर्ष के लिए तय लक्ष्य का 42.1 प्रतिशत रहा. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 5.7 लाख करोड़ रुपये था.

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Friday, 30 October, 2026
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वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती छह महीनों में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा सालाना आधार पर 25.4 प्रतिशत बढ़कर 7.15 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है. शुक्रवार को जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान राजकोषीय घाटा पूरे वित्त वर्ष के लिए तय लक्ष्य का 42.1 प्रतिशत रहा. पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 5.7 लाख करोड़ रुपये था.

राजकोषीय घाटा सरकार के कुल खर्च और उधारी को छोड़कर कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर होता है. जब सरकार की आय उसके खर्च से कम होती है, तो इस अंतर को पूरा करने के लिए उसे उधार लेना पड़ता है. ऐसे में राजकोषीय घाटा सरकार की वित्तीय स्थिति और उधारी की जरूरत को दर्शाने वाला एक अहम संकेतक है.

पिछले साल के मुकाबले बढ़ा राजकोषीय घाटा

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में राजकोषीय घाटा पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 25.4 प्रतिशत अधिक रहा. अप्रैल-सितंबर के दौरान यह 7.15 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 की इसी अवधि में 5.7 लाख करोड़ रुपये था.

पूरे वित्त वर्ष के लिए निर्धारित लक्ष्य का 42.1 प्रतिशत घाटा पहली छमाही में ही दर्ज किया जा चुका है. ऐसे में वित्त वर्ष के बाकी छह महीनों में सरकार के राजस्व संग्रह और खर्च का प्रबंधन महत्वपूर्ण रहेगा.

सालाना लक्ष्य हासिल करना होगा अहम

वित्त वर्ष 2026-27 के शेष महीनों में सरकार का वित्तीय प्रदर्शन यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगा कि राजकोषीय घाटे को पूरे साल के निर्धारित लक्ष्य के भीतर रखा जा सकेगा या नहीं. सरकार के राजस्व संग्रह और व्यय के बीच संतुलन बनाए रखना इस लिहाज से महत्वपूर्ण होगा.

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दूसरी तिमाही में 7.35% रह सकती है GDP ग्रोथ, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में भी तेजी

अक्टूबर 2026 की मासिक आर्थिक समीक्षा के अनुसार, पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही थी.

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Friday, 30 October, 2026
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भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास रफ्तार बरकरार रहने का अनुमान है. वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में देश की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 7.35 प्रतिशत रह सकती है. औद्योगिक उत्पादन, निर्यात, जीएसटी संग्रह और बैंक कर्ज में बढ़ोतरी से आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिल रही है. हालांकि, इस दौरान खुदरा और खाद्य महंगाई में वृद्धि ने चिंता बढ़ाई है. सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 7.74 प्रतिशत पर पहुंच गई.

अक्टूबर 2026 की मासिक आर्थिक समीक्षा के अनुसार, पहली तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही थी. इसके मुकाबले दूसरी तिमाही में विकास दर थोड़ी कम रहने का अनुमान है, लेकिन इसके बावजूद अर्थव्यवस्था की वृद्धि रफ्तार मजबूत बनी हुई है.

IMF ने बढ़ाया भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है. वहीं, विश्व बैंक, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है.

औद्योगिक उत्पादन में 8% की बढ़ोतरी

देश के औद्योगिक क्षेत्र से भी सकारात्मक संकेत मिले हैं. अगस्त 2026 में औद्योगिक उत्पादन में सालाना आधार पर 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. इस दौरान विनिर्माण क्षेत्र का उत्पादन 9 प्रतिशत बढ़ा. वहीं, सितंबर में आठ प्रमुख उद्योगों के उत्पादन में 7.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में सकल वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. इसके अलावा बैंक कर्ज की वृद्धि दर 21.6 प्रतिशत रही. इससे कारोबार और आर्थिक गतिविधियों में कर्ज की मांग बढ़ने के संकेत मिलते हैं.

महंगाई का बढ़ता दबाव, खुदरा दर 5.54% पर पहुंची

आर्थिक विकास के बीच महंगाई का दबाव भी बढ़ा है. सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी. खाद्य महंगाई भी बढ़कर 7.74 प्रतिशत पर पहुंच गई. प्याज, चीनी, खाद्य तेल और चावल की कीमतों में बढ़ोतरी को इसकी प्रमुख वजह बताया गया है.

महंगाई के दबाव को देखते हुए RBI ने रेपो दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की और मौद्रिक नीति के रुख को तटस्थ से धीरे-धीरे सख्ती की ओर बदला. रेपो दर में वृद्धि का असर कर्ज की ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है.

निर्यात में 11% की वृद्धि, 721 अरब डॉलर हुआ विदेशी मुद्रा भंडार

वैश्विक बाजार में अनिश्चितता के बावजूद भारत के निर्यात में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई. सितंबर 2026 में वस्तुओं और सेवाओं का कुल निर्यात सालाना आधार पर 11 प्रतिशत बढ़ा. इसमें वस्तुओं के निर्यात में 23.1 प्रतिशत की वृद्धि की अहम भूमिका रही.

वहीं, 16 अक्टूबर 2026 तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार 721 अरब डॉलर पर पहुंच गया. यह राशि भारत की करीब 10.3 महीने की आयात जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार से अंतरराष्ट्रीय भुगतान और बाहरी आर्थिक चुनौतियों से निपटने में मदद मिलती है.

कम बारिश से कृषि क्षेत्र पर दबाव

कम बारिश का असर कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है. 2 अक्टूबर 2026 तक खरीफ फसलों की कुल बुवाई का क्षेत्र 1,115.31 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 1,127.12 लाख हेक्टेयर था.

जून से सितंबर के बीच देश में सामान्य औसत के मुकाबले 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई. इससे फसल उत्पादन प्रभावित होने और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव बढ़ने का खतरा है.

मैन्युफैक्चरिंग में निवेश और रोजगार बढ़ा

वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण 2024-25 के मुताबिक, विनिर्माण क्षेत्र के सकल मूल्यवर्धन (GVA) में 9.59 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इस दौरान स्थिर पूंजी में 10.54 प्रतिशत और रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या में 7.19 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

इसके अलावा, अगस्त 2026 में उद्योगों को दिए गए बैंक कर्ज में सालाना आधार पर 18.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई. ये आंकड़े विनिर्माण क्षेत्र में निवेश, रोजगार और कारोबारी गतिविधियों में बढ़ोतरी के संकेत देते हैं.

 


राहुल गांधी ने IDBI बैंक की बिक्री पर उठाए सवाल, सीतारमण बोलीं- 25 हजार करोड़ रुपये डालकर बैंक को उबारा

राहुल गांधी ने सार्वजनिक बैंक को फेयरफैक्स को बेचने के फैसले पर उठाए सवाल, सीतारमण ने UPA सरकार पर लगाए राजनीतिक दबाव में कर्ज बांटने के आरोप; कहा- 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी डालकर IDBI को संकट से निकाला

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Friday, 30 October, 2026
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IDBI बैंक के विनिवेश को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल को IDBI बैंक की बहुलांश हिस्सेदारी बेचने के सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने सार्वजनिक बैंकों को देश के निर्माण का माध्यम बताते हुए कहा कि इन्हें बेचने के बजाय मजबूत किया जाना चाहिए. वहीं, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी के आरोपों पर पलटवार करते हुए कांग्रेस और पूर्ववर्ती UPA सरकार पर बैंकिंग व्यवस्था का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में प्रभावशाली लोगों के लिए 'फोनबुक' और आम नागरिकों के लिए 'रूल बुक' थी.

राहुल गांधी ने IDBI बैंक की बिक्री पर क्या कहा?

राहुल गांधी ने IDBI बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में एक पत्र जारी कर सरकार के विनिवेश फैसले पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक बैंक बेचने की संपत्ति नहीं, बल्कि देश के निर्माण के साधन हैं. इन संस्थानों का निर्माण जनता के पैसे से हुआ है और इनका उद्देश्य देश के उद्योग और अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है.

उन्होंने कहा कि पिछले साल मार्च में IDBI बैंक के कर्मचारियों के एक समूह ने संसद भवन में उनसे मुलाकात की थी. कर्मचारियों ने सवाल उठाया था कि जिस बैंक को उन्होंने मेहनत से मुनाफे में पहुंचाया, सरकार उसे क्यों बेच रही है.

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि कांग्रेस के समय बैंक बनाए जाते थे, जबकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में उन्हें बेचा जा रहा है. उन्होंने बैंक के कर्मचारियों और जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई.

सीतारमण ने कांग्रेस पर लगाए गंभीर आरोप

राहुल गांधी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस पर बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि UPA सरकार के दौरान बैंक कर्मचारियों पर राजनीतिक दबाव डालकर बड़े कारोबारी समूहों को कर्ज दिए जाते थे. इन कर्जों के डूबने से बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा.

सीतारमण ने कहा कि मौजूदा सरकार को IDBI बैंक बेहद खराब वित्तीय स्थिति में मिला था. उनके मुताबिक, वीडियोकॉन, विनसम, एबीजी शिपयार्ड और किंगफिशर जैसे कारोबारी समूहों को दिए गए कर्ज बाद में एनपीए में बदल गए, जिससे बैंक को भारी नुकसान हुआ.

वित्त मंत्री ने दावा किया कि केंद्र सरकार ने 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी डालकर और पेशेवर प्रबंधन के जरिए बैंक को फिर से खड़ा किया है. अब IDBI बैंक विकास के अगले चरण के लिए तैयार है.

'कांग्रेस के दौर में फोनबुक बैंकिंग होती थी'

सीतारमण ने कांग्रेस के शासनकाल की बैंकिंग व्यवस्था पर निशाना साधते हुए 'फोनबुक बैंकिंग' का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उस दौर में प्रभावशाली लोगों के लिए फोन पर कर्ज मंजूर कराने की व्यवस्था थी, जबकि आम नागरिकों को नियमों का पालन करना पड़ता था.

उन्होंने 1976 की एक घटना का भी उल्लेख किया. सीतारमण के मुताबिक, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के चेयरमैन आरके तलवार को पद से हटा दिया गया था, क्योंकि उन्होंने संजय गांधी से जुड़े एक समूह को कर्ज देने के राजनीतिक दबाव को मानने से इनकार कर दिया था.

वित्त मंत्री ने कहा कि अब 'कनेक्शन और सेटिंग' वाली बैंकिंग का दौर खत्म हो चुका है. उनके मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में आम लोगों को आसानी से कर्ज उपलब्ध हो रहा है और बैंक कर्मचारियों पर फोन के जरिए कर्ज मंजूर करने का दबाव नहीं है.

सीतारमण ने राहुल गांधी पर राफेल सौदे को लेकर लगाए गए आरोपों का भी जिक्र किया और कहा कि उनके दावे पहले भी गलत साबित हुए थे. उन्होंने IDBI बैंक के मामले में भी राहुल गांधी के आरोपों को निराधार बताया.

क्या है IDBI बैंक की बिक्री का पूरा गणित?

सरकार ने 14 अक्टूबर को IDBI बैंक की कुल 60.72 फीसदी हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की इकाई को बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. इस सौदे का कुल मूल्य करीब 52,878 करोड़ रुपये है.

इसमें केंद्र सरकार अपनी 30.48 फीसदी हिस्सेदारी और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगा. सौदे के बाद भी केंद्र सरकार के पास बैंक की 15 फीसदी और LIC के पास 19 फीसदी हिस्सेदारी बनी रहेगी.

इस रणनीतिक सौदे को पूरा करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नियामकीय मंजूरी जरूरी है. सरकार को उम्मीद है कि सभी आवश्यक मंजूरियां मिलने के बाद चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी.


IDBI बिक्री: बिजनेसवर्ल्ड की खबर में दिए गए नोट का वित्त मंत्रालय ने खंडन नहीं किया

DIPAM की देर रात आई सफाई में घटनाओं के क्रम, निजी बैंकों को तुलनात्मक सूची से हटाने या फेयरफैक्स की अंतिम चेतावनी को खारिज नहीं किया गया. इसके बजाय सरकार ने एक नया आंकड़ा 627 करोड़ रुपये सामने रखा और पुष्टि की कि सौदे के अपने सलाहकार ने ही बैंक का मूल्यांकन किया था.

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Friday, 30 October, 2026
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पलक शाह

DIPAM का कहना है कि पुस्तिका दिशानिर्देश है, नियम नहीं.

वित्त मंत्रालय ने IDBI बैंक को फेयरफैक्स फाइनेंशियल को बेचे जाने के तरीके पर बिजनेसवर्ल्ड की रिपोर्ट का जवाब दिया है. यह रिपोर्ट निवेश एवं लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के 13 अगस्त के एक आंतरिक नोट पर आधारित थी.

DIPAM की सफाई हमें 29 अक्टूबर को रात 9:45 बजे मिली, यानी खबर प्रकाशित होने के करीब 10 घंटे बाद.

सफाई में यह नहीं कहा गया कि नोट फर्जी, अधूरा या गलत तरीके से उद्धृत किया गया है. इसमें उसी नोट के प्रावधानों का हवाला देते हुए उसके भीतर से ही तर्क दिए गए हैं. साथ ही, इसमें तीन ऐसी बातें भी जोड़ी गई हैं, जिनके बारे में सरकार ने पहले कुछ नहीं कहा था.

सरकार ने किन बातों का खंडन नहीं किया

सफाई में नोट के निम्नलिखित किसी भी बिंदु का खंडन नहीं किया गया है:

घटनाओं का क्रम

पहले दौर की बोलियां मार्च में खोली गई थीं. फेयरफैक्स की संशोधित बोली 13 जुलाई को खोली गई. उसी दिन पुरानी रिजर्व प्राइस को 'गलत' घोषित कर दिया गया और उसे 'खारिज कर दिया गया तथा उस पर विचार नहीं किया गया.'

निजी बैंकों को क्यों हटाया गया

नोट में कहा गया था कि निजी बैंकों को शामिल करने से 'रिजर्व प्राइस का जरूरत से ज्यादा आकलन हो जाता है.' सफाई में इस पंक्ति पर कोई जवाब नहीं दिया गया है.

शेयर की कीमत का दो तरह से इस्तेमाल

नोट में शेयर की कीमत को 'मूल्यांकन के उद्देश्य से अनुपयोगी' बताया गया था. इसके बाद बोली स्वीकार करने के पक्ष में यह तर्क दिया गया कि शेयर बाजार में शेयर की कीमत बोली से कम पर कारोबार कर रही थी.

फेयरफैक्स की अंतिम चेतावनी

उसके पत्र में 81 रुपये प्रति शेयर की बोली को 'अंतिम प्रस्ताव' बताया गया था और कहा गया था कि अगर बोली बढ़ाने के लिए कहा गया तो वह इसे वापस ले लेगी.

पैसों का दबाव

नोट में 'असाधारण राजकोषीय दबाव', विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और रुपये की कमजोरी का हवाला दिया गया था.

कबाड़ बिक्री की मिसाल

नोट में कबाड़ की नीलामी के लिए रेलवे स्टोर्स कोड के नियमों का सहारा लिया गया था.

सुरक्षा संबंधी चिंता

गृह मंत्रालय ने एक बोलीदाता के बारे में 'अतिरिक्त जानकारी' दी थी.

सरकार ने किन बातों की पुष्टि की

सौदे के अपने सलाहकार ने दो मूल्यांकनों में से एक किया था

हमारी रिपोर्ट में बताया गया था कि बिक्री प्रक्रिया संचालित करने के लिए नियुक्त ट्रांजैक्शन एडवाइजर KPMG ने एक मूल्यांकन तैयार किया था. DIPAM ने इसकी पुष्टि की है. विभाग के अनुसार, प्रोटोकॉल के तहत कारोबारी मूल्यांकन 'हमेशा ट्रांजैक्शन एडवाइजर के माध्यम से किया जाता है.' विभाग ने यह भी कहा कि KPMG ने इस काम के लिए 'आगे पेशेवर विशेषज्ञों की नियुक्ति की थी.' हालांकि, उनके नाम नहीं बताए गए हैं.

कैबिनेट के फैसले के बाद चावला ने दोनों मूल्यांकनकर्ताओं को स्वतंत्र बताया था. अब DIPAM का कहना है कि वे 'एक-दूसरे से स्वतंत्र' थे. विभाग ने यह नहीं कहा कि वे सौदे से भी स्वतंत्र थे.

बोली में बढ़ोतरी का आकार

हमारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि फेयरफैक्स की बढ़ी हुई बोली से करीब 3,900 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिले. DIPAM ने यह आंकड़ा 3,917 करोड़ रुपये बताया है.

टैक्स कवर कैसे काम करता है

DIPAM का कहना है कि 'केवल अतिरिक्त कर मांग, यदि उसका भुगतान किया जाता है, तो ही प्रतिपूर्ति के लिए पात्र होगी.' दूसरे शब्दों में, अगर टैक्स विभाग IDBI के खिलाफ कोई मामला जीतता है, तो सरकार नए मालिक को वह पैसा वापस करेगी. हमारी रिपोर्ट में भी यही बताया गया था.

सरकार को कहां आपत्ति है और उसका अपना नोट क्या कहता है

1. 'दिशानिर्देश हैं, नियम नहीं'

DIPAM का कहना है: उसकी प्रक्रियाएं 'संकेतात्मक दिशानिर्देशों की प्रकृति की हैं, न कि कठोर नियमों या विनियमों की.' वर्ष 2017 के कैबिनेट फैसले के तहत विनिवेश पर सचिवों का कोर ग्रुप (CGD) 'आवश्यकतानुसार बदलावों पर विचार कर सकता है.'

नोट में कहा गया है: यही बात नोट में भी कही गई है. इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकारियों को बोलियों की जानकारी दिए बिना रिजर्व प्राइस तय की जाती है और स्वीकार किया गया है कि 'शुरुआत में इस प्रक्रिया को अपनाया गया था, लेकिन बोलियां रिजर्व प्राइस से कम थीं.'

इसे नियम कहा जाए या दिशानिर्देश, नोट स्वीकार करता है कि प्रक्रिया अपनाई गई, बोलियां असफल रहीं और फिर उस प्रक्रिया को छोड़ दिया गया.

2. 'रिजर्व प्राइस न घटाई गई और न बढ़ाई गई'

DIPAM का कहना है: पहली प्रक्रिया 'फंक्टस ऑफिसियो' हो गई थी. इसका मतलब है कि बोलियां मंजूर नहीं होने के बाद वह प्रक्रिया अपने आप समाप्त हो गई.

नोट में कहा गया है: CGD ने फैसला किया था कि 'वह रिजर्व प्राइस जिसे CGD ने गलत घोषित किया था', उसका दोबारा इस्तेमाल 'नहीं किया जा सकता और उसे खारिज कर दिया जाना चाहिए तथा उस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए.'

सरकार के अपने प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, पुरानी रिजर्व प्राइस 94.42 रुपये प्रति शेयर थी, जबकि नया बेंचमार्क 75.99 रुपये था.

3. 'डबल ब्लाइंड' प्रक्रिया

DIPAM का कहना है: 'सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव के लिए बोलियां आमंत्रित करने से पहले अप्रैल 2026 में CGD ने मूल्यांकन पद्धति की समीक्षा की थी.' मूल्यांकनकर्ताओं ने 'मई 2026 में ही संशोधित मूल्यांकन पर काम शुरू कर दिया था.' प्रक्रिया 'डबल ब्लाइंड' बनी रही, क्योंकि बोलीदाता को मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी और मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी थीं. केवल CGD को ही पूरी तस्वीर देखने का मौका मिला.

नोट में कहा गया है: पहले दौर की बोलियां 12 मार्च को खोली गई थीं, यानी अप्रैल में हुई समीक्षा से पहले. फेयरफैक्स की संशोधित बोली 13 जुलाई को खोली गई और रैंकिंग का नतीजा CGD के सामने रखा गया. उसी दिन हुई दूसरी बैठक में CGD ने निर्देश दिया कि बाजार मूल्यांकन का 'इस्तेमाल नहीं किया जा सकता' और तुलनात्मक मूल्यांकन के लिए केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को शामिल किया जाए. इसके बाद ये निर्देश मूल्यांकनकर्ताओं को भेज दिए गए.

हो सकता है कि मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी हों, लेकिन उन्हें निर्देश देने वाले अधिकारियों ने बोलियां देखी थीं.

4. केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही क्यों?

DIPAM का कहना है: किसी बैंक की तुलनीय बिक्री उपलब्ध नहीं थी, इसलिए सभी सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को तुलना के लिए इस्तेमाल किया गया. IDBI को 'केवल नियामकीय उद्देश्यों' के लिए निजी बैंक माना जाता है और निवेशक 'इसे सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के रूप में ही मूल्यांकित करते रहे.'

नोट में कहा गया है: 'तुलनात्मक बैंकों की सूची में निजी क्षेत्र के बैंकों को शामिल करने से रिजर्व प्राइस का जरूरत से ज्यादा आकलन हो जाता है.'

627 करोड़ रुपये का सवाल

DIPAM ने पहली बार खरीदार को दिए गए टैक्स कवर की राशि बताई है:

'इस मद में संभावित देनदारी केवल 627 करोड़ रुपये हो सकती थी, जबकि बोली से प्राप्त कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई.'

पहली नजर में देखें तो सरकार ने 627 करोड़ रुपये का जोखिम अपने ऊपर लिया और बदले में 3,917 करोड़ रुपये अधिक प्राप्त किए.

लेकिन 627 करोड़ रुपये विवादित कुल टैक्स राशि नहीं हो सकती.

13 अगस्त के नोट में कहा गया है कि यह अनुमान IDBI के टैक्स सलाहकार डेलॉयट के जोखिम आकलन के आधार पर तैयार किया गया था. इसमें कहा गया है कि यह अनुमान हाईकोर्ट में टैक्स अपीलों की 12.07 फीसदी सफलता दर के साथ 'अच्छी तरह मेल खाता है.' इससे संकेत मिलता है कि यह जोखिम के आधार पर निकाली गई राशि है, यानी संभावित नुकसान, न कि वह पूरी राशि जिसकी भरपाई करने पर सरकार सहमत हुई है.

यह टैक्स कवर सभी विवादित आयकर मांगों पर लागू होता है, 'चाहे उन्हें IDBI के खातों में आकस्मिक देनदारियों के रूप में दर्ज किया गया हो या नहीं.' DIPAM ने अभी तक यह नहीं बताया है कि कुल कितनी टैक्स राशि विवादित है.

अभी भी अनुत्तरित सवाल

सरकार ने कुल कितने विवादित टैक्स की भरपाई करने पर सहमति दी है?

मूल्यांकन के लिए KPMG ने किन 'पेशेवर विशेषज्ञों' को नियुक्त किया था?

निजी बैंकों को हटाने के लिए नोट में एक वजह और सफाई में दूसरी वजह क्यों दी गई है?

क्या KPMG और BDO की मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएंगी?

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.)


सितंबर में क्रेडिट कार्ड से खर्च 5.9% घटा, 2021 के बाद पहली बार दर्ज हुई सालाना गिरावट

पिछले साल की ऊंची आधार दर और GST दरों में कटौती के असर से खर्च में आई कमी, अक्टूबर-नवंबर में त्योहारी खरीदारी बढ़ने से रिकवरी की उम्मीद

Last Modified:
Friday, 30 October, 2026
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भारत में क्रेडिट कार्ड से होने वाला खर्च सितंबर में सालाना आधार पर 5.9 फीसदी घटकर 2.04 लाख करोड़ रुपये रह गया. फरवरी 2021 के बाद यह पहली बार है, जब क्रेडिट कार्ड खर्च में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की गई है. पिछले साल की ऊंची आधार दर (हाई बेस) को इस गिरावट की प्रमुख वजह माना जा रहा है. हालांकि, विश्लेषकों को उम्मीद है कि अक्टूबर और नवंबर में त्योहारी खरीदारी बढ़ने के साथ क्रेडिट कार्ड खर्च में फिर तेजी आएगी.

केयरएज (CareEdge) की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2025 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) की दरों में कटौती और त्योहारी खरीदारी जल्दी शुरू होने के कारण क्रेडिट कार्ड खर्च में तेज उछाल आया था. पिछले साल सितंबर के अंत में जीएसटी काउंसिल ने दरों में बदलाव की घोषणा की थी. यह फैसला त्योहारी सीजन के साथ आया, जिससे मासिक क्रेडिट कार्ड खर्च बढ़कर 2.17 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था.

सितंबर 2025 में क्रेडिट कार्ड खर्च सितंबर 2024 की तुलना में करीब 23 फीसदी और अगस्त 2025 के मुकाबले 13.3 फीसदी बढ़ा था. इस साल त्योहारी बिक्री अक्टूबर में शुरू होने की उम्मीद है. ऐसे में त्योहारी खरीदारी का बड़ा हिस्सा अक्टूबर में होने की संभावना है.

ऑनलाइन क्रेडिट कार्ड खर्च में 12.5% की गिरावट

सितंबर में ऑनलाइन क्रेडिट कार्ड खर्च सालाना आधार पर 12.5 फीसदी घटकर 1.26 लाख करोड़ रुपये रह गया, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह 1.44 लाख करोड़ रुपये था.

इसके उलट, पॉइंट ऑफ सेल (POS) यानी दुकानों और अन्य कारोबारी प्रतिष्ठानों पर कार्ड से होने वाले भुगतान में 7.18 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई. सितंबर में POS ट्रांजैक्शन बढ़कर 77,751.47 करोड़ रुपये हो गए, जो पिछले साल इसी महीने में 72,543.89 करोड़ रुपये थे.

HDFC बैंक के खर्च में बढ़ोतरी, SBI और ICICI में गिरावट

प्रमुख क्रेडिट कार्ड जारी करने वाले बैंकों में HDFC बैंक ने सितंबर में सालाना आधार पर 7.52 फीसदी की वृद्धि दर्ज की. बैंक का क्रेडिट कार्ड खर्च बढ़कर 65,139.72 करोड़ रुपये हो गया. अगस्त की तुलना में भी इसमें 6.22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

देश के सबसे बड़े स्वतंत्र क्रेडिट कार्ड जारीकर्ता SBI कार्ड के खर्च में सालाना आधार पर 14.09 फीसदी की गिरावट आई और यह 34,895 करोड़ रुपये रह गया. मासिक आधार पर भी इसमें करीब 1.2 फीसदी की कमी दर्ज की गई.

ICICI बैंक के क्रेडिट कार्ड खर्च में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई. सितंबर में इसका खर्च सालाना आधार पर 26.26 फीसदी और मासिक आधार पर 4.4 फीसदी घटकर 30,911.48 करोड़ रुपये रह गया. वहीं, Axis बैंक का क्रेडिट कार्ड खर्च सालाना आधार पर 11 फीसदी घटकर 23,148.67 करोड़ रुपये रहा. हालांकि, अगस्त की तुलना में इसमें 1.95 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

क्रेडिट कार्ड की संख्या बढ़कर 12.53 करोड़ हुई

क्रेडिट कार्ड से कुल खर्च में गिरावट के बावजूद नए कार्ड जारी होने का सिलसिला जारी रहा. सितंबर में देश में कुल क्रेडिट कार्ड की संख्या बढ़कर 12.531 करोड़ हो गई. प्रमुख बैंकों ने त्योहारी सीजन से पहले अपने ग्राहक आधार का विस्तार किया.

HDFC बैंक ने सितंबर में 2,80,353 नए क्रेडिट कार्ड जोड़े, जिससे उसके कुल कार्ड की संख्या बढ़कर 2.737 करोड़ हो गई. ICICI बैंक ने 29,621 कार्ड जोड़े और उसकी कुल संख्या 1.986 करोड़ पहुंच गई.

इसी तरह SBI कार्ड ने 2,08,026 नए कार्ड जारी किए, जिससे उसके कुल कार्ड की संख्या 2.316 करोड़ हो गई. Axis बैंक ने 2,59,525 कार्ड जोड़े और उसके कुल कार्ड की संख्या बढ़कर 1.655 करोड़ हो गई.

कुल मिलाकर, सितंबर में नए क्रेडिट कार्ड जुड़ने की संख्या में सालाना आधार पर 10.5 फीसदी की वृद्धि हुई. नवंबर 2024 के बाद यह नए कार्ड जारी होने की सबसे तेज वृद्धि दर है. इससे संकेत मिलता है कि कुल खर्च में गिरावट के बावजूद बैंकिंग क्षेत्र में क्रेडिट कार्ड का ग्राहक आधार लगातार बढ़ रहा है.


ओडिशा में 3,855 करोड़ रुपये के 22 निवेश प्रस्तावों को मंजूरी, 12 जिलों में खुलेंगे नए उद्योग

पर्यटन, बायोफ्यूल, एयरोस्पेस और डिफेंस समेत 11 क्षेत्रों में निवेश को मिली हरी झंडी, 7,296 रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान; सात पर्यटन परियोजनाओं और तीन कंप्रेस्ड बायोगैस संयंत्रों को भी मंजूरी

Last Modified:
Friday, 30 October, 2026
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ओडिशा सरकार ने राज्य में औद्योगिक निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने 12 जिलों में 3,855.38 करोड़ रुपये के 22 औद्योगिक निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दी है. इन परियोजनाओं का विस्तार पर्यटन, बायोफ्यूल, मैन्युफैक्चरिंग, एयरोस्पेस एवं डिफेंस, फार्मास्यूटिकल्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और पैकेजिंग समेत 11 क्षेत्रों में होगा. इनसे 7,296 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है.

इन निवेश प्रस्तावों को ओडिशा की मुख्य सचिव अनु गर्ग की अध्यक्षता में हुई स्टेट लेवल सिंगल विंडो क्लीयरेंस अथॉरिटी (SLSWCA) की 151वीं बैठक में मंजूरी दी गई. सरकार के मुताबिक, इन परियोजनाओं का उद्देश्य राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों का विस्तार करना और पारंपरिक उद्योगों के साथ उभरते क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करना है.

इन परियोजनाओं के लिए अंगुल, बालासोर, भद्रक, कटक, गंजाम, गंजाम, जाजपुर, झारसुगुड़ा, खुर्दा, नयागढ़, पुरी, संबलपुर और सुंदरगढ़ जिलों में निवेश प्रस्तावित है.

पर्यटन क्षेत्र में 1,035 करोड़ रुपये का निवेश

मंजूर किए गए प्रस्तावों में पर्यटन क्षेत्र सबसे बड़ा निवेश आकर्षित करने वाला क्षेत्र है. इसके तहत सात परियोजनाओं में कुल 1,035.62 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा. इनमें पांच सितारा होटल, लग्जरी रिसॉर्ट, डेस्टिनेशन रिसॉर्ट और रिवरफ्रंट हॉस्पिटैलिटी प्रोजेक्ट शामिल हैं.

आशीर्वाद इंजीनियरिंग एंड कंस्ट्रक्शन खुर्दा में 310 करोड़ रुपये की लागत से पांच सितारा होटल बनाएगी. वहीं, स्वामी रिसॉर्ट्स ने 153 करोड़ रुपये के निवेश से एक और पांच सितारा होटल स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है. इन दोनों परियोजनाओं से क्रमशः 270 और 249 लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है.

इसके अलावा झारसुगुड़ा में 150 करोड़ रुपये की लागत से कन्वेंशन सेंटर वाला पांच सितारा लग्जरी रिसॉर्ट बनाया जाएगा. पुरी में 135 करोड़ रुपये के डेस्टिनेशन रिसॉर्ट और 120 करोड़ रुपये के पांच सितारा होटल का प्रस्ताव है. वहीं, मां भट्टारिका मिनरल्स कटक में 64.04 करोड़ रुपये की लागत से रिवरफ्रंट रिसॉर्ट विकसित करेगी.

बायोफ्यूल और पैकेजिंग क्षेत्र में भी बड़े निवेश

राज्य में कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए तीन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है. इन पर कुल 680 करोड़ रुपये का निवेश होगा और इनकी संयुक्त उत्पादन क्षमता 29,700 टन सालाना होगी.

इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन अंगुल, जाजपुर और संबलपुर में 360 करोड़ रुपये के निवेश से 14,850 टन सालाना क्षमता वाला CBG संयंत्र स्थापित करेगी. किनेता ग्लोबल सुंदरगढ़ में 170 करोड़ रुपये की लागत से 8,250 टन सालाना क्षमता का संयंत्र लगाएगी. वहीं, श्री मेटालिक्स बायो एनर्जी ने बालासोर में 150 करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव दिया है.

पेपर, पैकेजिंग और प्लास्टिक क्षेत्र में भी 1,029.91 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी मिली है. अलीशा टोरेंट क्लोजर्स नयागढ़ में 529.91 करोड़ रुपये के निवेश से बोतलबंद पेय पदार्थों के लिए कैप और क्लोजर बनाने की इकाई स्थापित करेगी. वहीं, स्टार्क रिज खुर्दा में 500 करोड़ रुपये की लागत से पेपर और पेपर उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाएगी.

स्टार्क रिज की प्रस्तावित इकाई में सालाना 1.08 लाख टन कॉरुगेटेड बॉक्स, 48,000 टन पेपर बैग, 48,000 टन मोनो कार्टन और 99,000 टन कागज का उत्पादन किया जाएगा. इस परियोजना से 1,710 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है.

एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में 117 करोड़ का निवेश

ओडिशा में एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए खुर्दा में दो परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है. स्टोनहॉक टेक्नोलॉजीज 65 करोड़ रुपये के निवेश से ड्रोन और अनमैन्ड एरियल सिस्टम (UAS) बनाने की एकीकृत इकाई स्थापित करेगी. वहीं, क्लासिक टेक्नोलॉजिस्टिक्स एंड ट्रेड 52 करोड़ रुपये के निवेश से एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग इकाई लगाएगी.

इन दोनों परियोजनाओं से कुल 1,170 रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है. इनमें स्टोनहॉक की परियोजना से 800 और क्लासिक टेक्नोलॉजिस्टिक्स की इकाई से 370 लोगों को रोजगार मिलेगा.

फार्मा और स्टील मैन्युफैक्चरिंग को भी मंजूरी

फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में अमृताश हेल्थकेयर खुर्दा में 152.69 करोड़ रुपये का निवेश करेगी. प्रस्तावित इकाई में सालाना 1,500 मिलियन टैबलेट, 210 मिलियन कैप्सूल और 48 मिलियन इंजेक्शन बनाने की क्षमता होगी. इससे करीब 520 लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है.

इसके अलावा स्टील डाउनस्ट्रीम और औद्योगिक मैन्युफैक्चरिंग की तीन परियोजनाओं में 323.81 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी गई है. साहा स्टील संबलपुर में 72.81 करोड़ रुपये, एमपीआईएल स्टील स्ट्रक्चर्स जाजपुर में 200 करोड़ रुपये और आर्मर इंडस्ट्रीज सुंदरगढ़ में 51 करोड़ रुपये का निवेश करेगी.

लॉजिस्टिक्स और केमिकल सेक्टर में भी विस्तार

आरबी एबोड्स गंजाम में 209.35 करोड़ रुपये के निवेश से एक इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स पार्क स्थापित करेगी. इस परियोजना में 5 मेगावाट क्षमता का रूफटॉप सोलर पावर प्लांट भी शामिल होगा. इससे 345 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है.

केमिकल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र की दो परियोजनाओं में 225 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी मिली है. आरिश कोटिंग टेक्नोलॉजी खुर्दा में 50 करोड़ रुपये की लागत से इंडस्ट्रियल पेंट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करेगी. वहीं, प्रोएक एनर्जी भद्रक में 175 करोड़ रुपये के निवेश से कैल्साइंड और ग्रेफाइटाइज्ड पेट्रोलियम कोक का उत्पादन करेगी.

इसके अलावा लिंडे साउथ एशिया सर्विसेज खुर्दा में 82 करोड़ रुपये के निवेश से ग्लोबल कॉम्पिटेंसी सेंटर स्थापित करेगी. यह सेंटर ट्रांसपोर्ट और रिमोट ऑपरेशंस पर काम करेगा और इससे 210 लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है.

ओडिशा सरकार के मुताबिक, ये निवेश प्रस्ताव राज्य में औद्योगिक क्षमताओं के विस्तार, नए निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन की रणनीति का हिस्सा हैं. ये परियोजनाएं सरकार के समृद्ध ओडिशा 2036 विजन के तहत विकास प्राथमिकताओं को भी आगे बढ़ाएंगी.

 


जागृति रिहैबिलिटेशन सेंटर ने सीरीज A फंडिंग में जुटाए 28 करोड़ रुपये

अल्केमी ग्रोथ कैपिटल के नेतृत्व में हुआ निवेश, अगले 3-4 वर्षों में देशभर में 40 से अधिक सेंटर और 4,000 से ज्यादा बेड की क्षमता विकसित करने की योजना

Last Modified:
Friday, 30 October, 2026
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भारत के प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति और डिमेंशिया देखभाल नेटवर्क में शामिल जागृति रिहैबिलिटेशन सेंटर ने सीरीज A फंडिंग राउंड में 28 करोड़ रुपये जुटाए हैं. दिल्ली स्थित हेल्थकेयर और कंज्यूमर वेलनेस पर केंद्रित वेंचर कैपिटल फंड अल्केमी ग्रोथ कैपिटल ने इस निवेश का नेतृत्व किया है. यह संगठन का पहला संस्थागत निवेश है. इससे पहले जागृति ने अपने आंतरिक संसाधनों के जरिए नेटवर्क का विस्तार किया था.

वर्ष 2008 में स्थापित जागृति ने 2019 में दो केंद्रों से अपनी विस्तार यात्रा शुरू की थी. अब इसका नेटवर्क नौ शहरों में 19 से अधिक केंद्रों तक पहुंच चुका है. कंपनी इस निवेश का इस्तेमाल नए शहरों में विस्तार, क्लिनिकल सुविधाओं और कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने, विशेष देखभाल कार्यक्रमों को विकसित करने और बीमा कंपनियों तथा कॉरपोरेट संस्थानों के साथ साझेदारी मजबूत करने में करेगी.

कंपनी की योजना अगले 3-4 वर्षों में टियर-1 और टियर-2 शहरों में अपने केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 40 से अधिक और बेड की क्षमता 4,000 से ज्यादा करने की है.

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग के बीच निवेश

भारत में मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति और पुनर्वास सेवाओं की मांग बढ़ रही है. हालांकि, इस क्षेत्र में सेवाएं अभी भी काफी हद तक छोटे स्वतंत्र केंद्रों और अलग-अलग क्लीनिकों के माध्यम से उपलब्ध हैं. ऐसे में एक संगठित नेटवर्क के जरिए समान क्लिनिकल मानकों के साथ बड़े स्तर पर सेवाएं उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ रही हैं.

जागृति रिहैबिलिटेशन सेंटर के संस्थापक एवं निदेशक डॉ. अमर शिंदे ने कहा कि यह पहला संस्थागत निवेश संगठन की यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. वर्ष 2008 में इसकी शुरुआत इस उद्देश्य से की गई थी कि लोगों और उनके परिवारों को व्यवस्थित, संवेदनशील और चिकित्सकीय मार्गदर्शन के साथ देखभाल मिल सके. अब इस निवेश से देशभर में अधिक लोगों तक गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास सेवाएं पहुंचाने में मदद मिलेगी.

अल्केमी को मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में नया अवसर

अल्केमी ग्रोथ कैपिटल की संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर अलका गोयल ने कहा कि भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य सबसे बड़े लेकिन अभी तक कम संगठित क्षेत्रों में से एक है. जागृति ने मानसिक स्वास्थ्य, पुनर्वास और बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में भरोसेमंद पहचान बनाई है.

उन्होंने कहा कि संस्थागत निवेश लेने से पहले ही जागृति ने नौ शहरों में अपना मॉडल स्थापित कर लिया था और इसके पीछे एक पेशेवर प्रबंधन टीम तैयार की थी. अल्केमी का मानना है कि जागृति देश में मानसिक स्वास्थ्य, पुनर्वास और बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में एक प्रमुख विशेषीकृत हेल्थकेयर नेटवर्क बन सकती है.

अल्केमी का यह निवेश मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास सेवाओं के क्षेत्र में उसका पहला निवेश है. इसके पोर्टफोलियो में डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र की रेडक्लिफ लैब्स, मेडिकल डिवाइस कंपनी मेडविटल, आईवीडी डीपटेक क्षेत्र की डाटर कैंसर जेनेटिक्स, इमरजेंसी मेडिकल रिस्पॉन्स सेवा मेडुलेंस, ऑटोनॉमस मोबिलिटी रोबोट कंपनी अल्फाड्रॉइड और फार्मा मैन्युफैक्चरिंग में फिजिकल एआई पर काम करने वाली ल्यूमास शामिल हैं.

82 हजार से अधिक लोगों को दे चुका है सेवाएं

पुणे में वर्ष 2008 में मनोचिकित्सक डॉ. अमर शिंदे और विजया शिंदे ने जागृति की शुरुआत 10 बेड वाले केंद्र के रूप में की थी. वर्ष 2019 में हेमंत शिंदे बतौर सह-संस्थापक और सीईओ संगठन से जुड़े. उनके नेतृत्व में यह एक पेशेवर प्रबंधन वाले नेटवर्क के रूप में विकसित हुआ.

वर्तमान में जागृति के नौ शहरों में 19 से अधिक केंद्र हैं, जहां 1,600 से ज्यादा बेड और 40 से अधिक डॉक्टरों की टीम उपलब्ध है. संगठन अब तक मानसिक स्वास्थ्य, नशे और मादक पदार्थों के सेवन से जुड़ी समस्याओं तथा न्यूरोलॉजिकल देखभाल कार्यक्रमों के तहत 82,000 से अधिक लोगों को सेवाएं दे चुका है.
 


भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ेगी, 8 नए युद्धपोतों के निर्माण के लिए ₹40,000 करोड़ मंजूर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने नौसेना के लिए आठ नेक्स्ट जेनरेशन कोरवेट (NGC) के निर्माण को मंजूरी दे दी है.

Last Modified:
Friday, 30 October, 2026
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भारत अपनी समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक ताकत को मजबूत करने के लिए आठ नए अत्याधुनिक युद्धपोत बनाने जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक में 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की इस परियोजना को मंजूरी दी गई. इन युद्धपोतों का निर्माण स्वदेशी तकनीक और आधुनिक स्टेल्थ डिजाइन के आधार पर किया जाएगा.

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, इन आठ युद्धपोतों के निर्माण के लिए आने वाले कुछ दिनों में कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जाएंगे. इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय नौसेना की मारक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ देश में रक्षा विनिर्माण को भी प्रोत्साहित करना है.

2,000 टन वजन और 55 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार

नौसेना के लिए बनाए जाने वाले ये नेक्स्ट जेनरेशन कोरवेट करीब 2,000 टन वजन के होंगे. इनकी अधिकतम गति लगभग 30 नॉट्स यानी करीब 55 किलोमीटर प्रति घंटा होगी. इन युद्धपोतों को भारतीय नौसेना द्वारा विकसित नए स्टेल्थ डिजाइन पर तैयार किया जाएगा, जिससे दुश्मन के रडार की पकड़ में आने की आशंका कम होगी.

इन युद्धपोतों का निर्माण आधुनिक जहाज निर्माण तकनीकों के इस्तेमाल से किया जाएगा. इन्हें मल्टी-रोल प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि समुद्र में अलग-अलग तरह के सुरक्षा और सैन्य अभियानों को अंजाम दिया जा सके.

2030 तक नौसेना को मिलेगा पहला युद्धपोत

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन आठ युद्धपोतों में से पहला जहाज 2030 तक भारतीय नौसेना को सौंपने का लक्ष्य रखा गया है. हालांकि, निर्माण की समय-सीमा को और कम करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.

ये युद्धपोत हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में समुद्री सुरक्षा से जुड़े विभिन्न मिशनों को पूरा करने में सक्षम होंगे. इनके शामिल होने से भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता और युद्ध की तैयारी को मजबूती मिलने की उम्मीद है.

आत्मनिर्भर भारत को भी मिलेगा बढ़ावा

आठों युद्धपोतों का देश में निर्माण किया जाना रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. इससे घरेलू शिपबिल्डिंग उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और सरकारी शिपयार्ड की निर्माण क्षमता का भी विस्तार होगा.

यह परियोजना प्रधानमंत्री के सागर (SAGAR- क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) विजन के अनुरूप भी है. इसके जरिए भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी समुद्री सुरक्षा क्षमता मजबूत करने के साथ स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है.

 


अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से भारत को मिलेगा बड़ा प्रतिस्पर्धी लाभ: पीयूष गोयल

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में किसानों और घरेलू हितधारकों के संवेदनशील हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. उनके मुताबिक, समझौते से भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए अवसर मिलेंगे.

Last Modified:
Friday, 30 October, 2026
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केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिए जाने के बाद भारत को मजबूत प्रतिस्पर्धी लाभ मिलेगा. उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस समझौते में किसानों और अन्य घरेलू हितधारकों के हितों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी.

इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में गोयल ने कहा कि इस समझौते में घरेलू हितों से जुड़े किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर समझौता नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए अवसर पैदा होंगे.

गोयल ने कहा, "मुझे पूरे विश्वास के साथ यह घोषणा करने का साहस है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का पूरा विवरण सामने आने के बाद भारत के लोग इसका जश्न मनाएंगे, क्योंकि इसमें हमारे किसानों या किसी भी हितधारक के संवेदनशील हितों से जरा भी समझौता नहीं किया गया है."

उन्होंने आगे कहा, "इसके उलट, भारत को बहुत मजबूत प्रतिस्पर्धी लाभ मिलेगा. और व्यापार प्रतिस्पर्धी लाभ पर ही आधारित होता है."

मंत्री का यह बयान भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता को लेकर बढ़ी उम्मीदों के बीच आया है. इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के भारत दौरे के बाद बातचीत को लेकर सकारात्मक संकेत मिले थे. इस यात्रा के दौरान रुबियो ने संकेत दिया था कि कुछ ही हफ्तों में व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है. गोयल भी हाल में दोहरा चुके हैं कि बातचीत अंतिम चरण के करीब है.

छह साल में आठ व्यापार समझौते

भारत ने पिछले छह वर्षों में आठ व्यापार समझौते किए हैं और घरेलू निर्यातकों के लिए व्यापारिक साझेदारियों में विविधता लाने तथा बाजार तक पहुंच बढ़ाने के प्रयासों के तहत कई अन्य देशों के साथ बातचीत कर रहा है.

चालू वित्त वर्ष में भारत ने ओमान, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ तीन मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को लागू किया है. सरकार दिसंबर तक यूरोपीय संघ (EU) के साथ भी समझौते पर हस्ताक्षर करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.

गोयल ने कहा कि इन समझौतों में 38 विकसित और अपेक्षाकृत समृद्ध देश शामिल हैं. उनके मुताबिक, इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं भारत के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय एक-दूसरे की पूरक हैं.

उन्होंने कहा, "हम एक-दूसरे के पूरक हैं. जिन उत्पादों का हमें निर्यात करना है, उनकी जरूरत उन्हें है और जिन उत्पादों का उन्हें निर्यात करना है, उनकी जरूरत हमें है. यह दोनों पक्षों के लिए फायदे की स्थिति है."

संतुलित व्यापार समझौतों पर जोर

मंत्री ने संतुलित व्यापार समझौते करने के महत्व पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि पहले हुए कुछ समझौतों के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ा था. गोयल ने कहा, "असंतुलित समझौते आपको बहुत आगे नहीं ले जा सकते. 2014 से पहले हुए सभी समझौते वैश्विक अर्थव्यवस्था के केवल 10 लाख करोड़ डॉलर के हिस्से को कवर करते थे और मुख्य रूप से ऐसे देशों के साथ थे, जिनसे हमारी प्रतिस्पर्धा थी."

2014 से पहले भारत ने जापान और दक्षिण कोरिया के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (ASEAN) के सदस्य देशों के साथ व्यापार समझौते किए थे. गोयल का तर्क है कि इनमें से कई समझौते असंतुलित थे और इनके लागू होने के बाद भारत का व्यापार घाटा काफी बढ़ गया.

RCEP से बाहर रहने के फैसले को बताया अहम

गोयल ने नवंबर 2019 में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) समझौते की बातचीत से भारत के बाहर निकलने के फैसले का भी बचाव किया. उन्होंने कहा कि इस समझौते में शामिल होने से घरेलू विनिर्माण क्षेत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता था.

RCEP में ASEAN के सदस्य देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन शामिल हैं. भारत शुरुआत में इस समझौते की बातचीत का हिस्सा था, लेकिन घरेलू उद्योगों के लिए बाजार पहुंच और सुरक्षा उपायों से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं होने की चिंता के कारण नवंबर 2019 में इससे बाहर हो गया था.

गोयल ने इस फैसले को भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए निर्णायक मोड़ बताया. उनका कहना था कि इस समझौते में शामिल होने का मतलब घरेलू उद्योगों को चीनी आयात से अधिक प्रतिस्पर्धा के सामने ला देना होता.

उन्होंने कहा, "मैं आपको बताता हूं कि 4 नवंबर, 2019 को बैंकॉक में लिया गया एक फैसला ही इसकी वजह है कि आज हम विनिर्माण और भारत के उद्योगों की चर्चा कर रहे हैं." उन्होंने आगे कहा, "अन्यथा, हम भारत में चीनी सामान बेचने वाले सेल्समैन और सेल्सगर्ल्स का देश बनकर रह जाते."