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अडानी ही नहीं वेदांता पर भी मंडरा रहे हैं खतरे के बादल
अडानी ग्रुप के जबरदस्त उदय और शानदार गिरावट ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा है लेकिन अभी वेदांता ग्रुप और अनिल अग्रवाल पर एक तूफान आ सकता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
मशहूर भारतीय बिजनेस लीडर्स के लिए यह एक मुश्किल भरा समय है. एक महीने के अन्दर ही गौतम अडानी के 236 मिलियन डॉलर्स के साम्राज्य में लगभग 60% की कमी हुई है. लेकिन जहां अडानी ग्रुप के जबरदस्त उदय और शानदार गिरावट ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है, वहीं एक और प्रभावशाली व्यक्ति के लिए अभी तूफान आना बाकी है. एक बार लन्दन में लिस्ट हो चुकी अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता रिसोर्सेज लिमिटेड, 1 बिलियन डॉलर्स की कीमत वाले एक बॉन्ड समेत भारी कर्ज के बोझ तले दबे हुई है. आपको बता दें कि 1 बिलियन डॉलर की कीमत वाले इस बॉन्ड की डेडलाइन जनवरी में थी जो बीत चुकी है. फिर भी इस भार को कम करने की उनकी पिछली कोशिश ने उनके उस पार्टनर को परेशान कर दिया है जिसे उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए था और वह पार्टनर भारत सरकार है.
कर्ज चुकाने की कोशिशों से मुश्किलों में फंसे
पिछले साल इसी समय के आस पास जब US फेडरल रिजर्व इन्फ्लेशन को काबू में करने के लिए इंटरेस्ट रेट्स में बढ़ोत्तरी शुरू करने ही वाला था और युक्रेन और रूस के युद्ध की बदौलत 3 दशकों में वस्तुओं के दाम सबसे ज्यादा बढ़ने लगे थे, तो अनिल अग्रवाल कर्ज तले दबी वेदांता रिसोर्सेज और मुंबई आधारित उसकी कैश-रिच यूनिट वेदांता लिमिटेड को एक करने के बारे में विचार कर रहे थे हालांकि यह प्लान कभी आगे नहीं बढ़ा. लेकिन फिर भी वेदांता रिसोर्सेज ने अपने कर्ज के कुल बोझ, जो पिछले मार्च में लगभग 10 बिलियन डॉलर्स था, को कम करके 8 बिलियन डॉलर्स के आस पास पहुंचा दिया. पिछले ही महीने लिस्टेड यूनिट द्वारा डिविडेंड की घोषणा करने के बाद कंपनी के पैरेंट और मुख्य शेयरहोल्डर अपने दायित्वों को बहुत हद तक सितम्बर 2023 तक पूरा कर पायेंगे. लेकिन जब अनिल अग्रवाल ने इस साल सितम्बर से अगले साल जनवरी तक 1.5 बिलियन डॉलर्स की कीमत के लोन और बॉन्ड के पुनर्भुगतान के लिए पैसे इकट्ठा करने की कोशिश की तो वह मुश्किलों में फंस गए.
भारत सरकार को हुई परेशानी
दो दशकों पहले अनिल अग्रवाल ने भारत सरकार से एक प्राइवेटाईजेशन डील के तहत हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड को खरीदना शुरू किया था, यह एक ऐसी घटना थी जिसने सबको परेशान कर दिया था. तब इस कंपनी के पास कैश उपलब्ध था, हालांकि यह पहले के मुकाबले कम होकर सिर्फ 2 बिलियन डॉलर्स रह गया था. इसके साथ ही, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड को हर क्वार्टर में 300 मिलियन डॉलर्स से 600 मिलियन डॉलर्स का EBITDA (अर्निंग बिफोर इंटरेस्ट, टैक्स, डेप्रिसिएशन एंड अमोर्टाईजेशन) भी मिल रहा था. इसलिए हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में 65% की हिस्सेदारी वाली कंपनी वेदांता लिमिटेड ने THL जिंक लिमिटेड मॉरिशस का बोझ, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के माध्यम से उतारने का फैसला किया. अफ्रिका और नामीबिया में होने वाली इस खनन क्षेत्र की डील की कीमत लगभग 3 बिलियन डॉलर्स थी और इसमें कुल 18 महीनों का समय लगना था. क्योंकि वेदांता लिमिटेड में 70% की हिस्सेदारी वेदांता रिसोर्सेज की है तो बाकी कि लिक्विडिटी की जरूरतें वहाँ से पूरी हो जातीं.
पैसा इकट्ठा करने में आयीं दिक्कतें
लेकिन इस डील में एक ही समस्या थी, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में 30% की हिस्सेदारी अभी भी भारत सरकार की थी. इस डील को लेकर भारत सरकार ने ऐतराज जताते हुए कहा ‘कंपनी से हमारी गुजारिश है कि बाकी के एसेट्स को खरीदने के लिए अन्य कैशलेस तरीकों का इस्तेमाल करे’. 17 फरवरी के अपने लैटर में भारत सरकार ने कहा – अगर हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड इस डील को लेकर आगे बढती है तो कानूनी कार्रवाई की जायेगी. इससे खनन की प्रमुख कंपनी वेदांता के सामने डो बड़ी समस्याएं खड़ी हो गयीं. पहली यह कि, अगर चीन के इकॉनोमिक रिवाइवल से चीजें ठीक नहीं होती तो महामारी के बाद अलौकिक वस्तुओं यानी खनिजों का प्रॉफिट खत्म हो सकता है. अगर अनिल अग्रवाल पूरी तरह हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड के कैश को अपनी वेदांता रिसोर्सेज तक नहीं ले जा पाते तो कर्ज चुकाने की उनकी क्षमता खराब हो सकती है जिससे उन्हें और कर्ज लेना पड़ेगा. लेकिन फेडरल की तरफ से रेट्स में बढ़ोत्तरी का सिलसिला रुकने का कोई इशारा न मिलने और वेदांता के बॉन्ड्स की कीमत में गिरावट को देखते हुए उनको नए स्तर से पैसा इकट्ठा करने में समस्या हो सकती है.
जबरदस्ती डील पूरी करने से भी होगा भारी नुक्सान
अनिल अग्रवाल के सामने दूसरी समस्या यह है कि अगर वह एसेट सेल को जबरदस्ती पूरा करने की कोशिश करते हैं और सरकार की नाराजगी का हिस्सा बनते हैं, तो ताइवान के Foxconn Technology ग्रुप के साथ उनकी 19 बिलियन डॉलर्स के सेमी-कंडक्टर फैक्ट्री की डील पर मुश्किलों के बादल छा सकते हैं. वैसे भी इस प्रोजेक्ट पर महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्यों के अपोजिशन के नेताओं की नजर जमी हुई है और वे पहले ही इस प्रोजेक्ट को गुजरात में रिलोकेट करने पर ऐतराज जता चुके हैं. इसके अलावा चिप बनाने वाली यूनिट्स की कीमत का आधा टैक्सपेयर्स को चुकाना होगा और भारत में अगले साल लोकसभा चुनाव भी हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के इकोनॉमिस्ट और पूर्व RBI (भारतीय रिजर्व बैंक) गवर्नर, रघुराम राजन जैसे प्रमुख लोग वेदांता की भागीदारी को लेकर सवाल खड़े कर चुके हैं. एक टीवी इंटरव्यू के दौरान रघुराम राजन ने सवाल करते हुए कहा था कि ‘मुझे समझ नहीं आता कि चिप बनाने के लिए ऐसी कंपनियों को कैसे चुना जा रहा है?’
न्यूयॉर्क आधारित शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग ने अडानी ग्रुप पर स्टॉक मैनीपुलेशन और अकाउंटिंग फ्रॉड का आरोप लगाया था और इन आरोपों को गौतम अडानी ने सिरे से खारिज कर दिया था, लेकिन फिर भी उनके स्टॉक्स में लगातार गिरावट होती रही और अभी भी जारी है. इस पूरी घटना से मोदी सरकार भी जनता के उद्देश्यों को प्राइवेट प्रॉफिट के साथ मिलाने को लेकर सवालों के घेरे में आ गयी थी. अब मेटल प्रमुख अनिल अग्रवाल की सबसे पहली कोशिश यही होनी चाहिए की वह ऐसी हेडलाइंस का हिस्सा न बनें.
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