Sree Vishwa Varadhi Private Limited में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी का अधिग्रहण अडानी ग्रुप की इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार रणनीति को दर्शाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
अडानी ग्रुप ने इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में अपनी पकड़ और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है. ग्रुप की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज की सब्सिडियरी अडानी रोड ट्रांसपोर्ट लिमिटेड ने Sree Vishwa Varadhi Private Limited में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद ली है. इस डील के साथ ही अडानी ग्रुप ने भविष्य में अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीदने का विकल्प भी खुला रखा है.
एक्सचेंज को दी गई आधिकारिक जानकारी
अडानी ग्रुप की ओर से शेयर बाजार को दी गई जानकारी में कहा गया है कि अडानी रोड ट्रांसपोर्ट लिमिटेड ने Sree Vishwa Varadhi प्राइवेट लिमिटेड में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया है. कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि जरूरत पड़ने पर आगे और हिस्सेदारी खरीदी जा सकती है. हालांकि इस सौदे को लेकर अभी नियामकीय मंजूरी मिलना बाकी है.
रणनीतिक विस्तार की ओर संकेत
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह अधिग्रहण अडानी ग्रुप की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है. रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में बढ़ते निवेश के बीच यह डील ग्रुप को नए प्रोजेक्ट्स और संचालन विस्तार में मदद कर सकती है.
शेयर बाजार में अडानी एंटरप्राइजेज का हाल
सोमवार को अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली. इंट्रा-डे ट्रेडिंग के दौरान शेयर 2274.05 रुपये के निचले स्तर तक पहुंच गया. पिछले 3 महीनों में शेयर करीब 9 प्रतिशत गिरा है. एक साल में शेयर में 8.21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. इसी अवधि में सेंसेक्स 8.26 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है.
लंबी अवधि के निवेशकों को मिला शानदार रिटर्न
हालिया उतार-चढ़ाव के बावजूद लंबी अवधि में अडानी एंटरप्राइजेज ने निवेशकों को मजबूत रिटर्न दिया है. 5 साल में निवेशकों को करीब 376 प्रतिशत का रिटर्न मिला है. 10 साल में शेयर ने करीब 3745 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की है.
डिविडेंड देने में भी आगे
अडानी एंटरप्राइजेज डिविडेंड के मामले में भी निवेशकों को रिटर्न देती रही है. कंपनी ने 2024 में प्रति शेयर 1.30 रुपये का डिविडेंड घोषित किया था.
रिपोर्ट के अनुसार, सोने के आयात पर सख्ती के चलते चालू खाता घाटा (CAD) कुछ हद तक कम हो सकता है. बैंक ने वित्त वर्ष 2027 के लिए CAD का अनुमान GDP के 1.8 प्रतिशत से घटाकर 1.5 प्रतिशत कर दिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का व्यापार घाटा अप्रैल 2026 में बढ़कर 28.4 अरब डॉलर पहुंच गया. मार्च में यह 20.7 अरब डॉलर था. तेल और सोने के आयात में तेज बढ़ोतरी इसकी मुख्य वजह रही. हालांकि निर्यात में हाल के महीनों की तुलना में मजबूत बढ़त दर्ज की गई है. यस बैंक (Yes Bank) की इकोनॉमिक्स रिसर्च टीम की रिपोर्ट के मुताबिक. घरेलू मांग मजबूत रहने से आयात तेजी से बढ़ रहा है. जबकि निर्यात वृद्धि अभी उस गति को पूरी तरह संतुलित नहीं कर पा रही है.
अप्रैल में निर्यात में मजबूत सुधार
अप्रैल में भारत का कुल निर्यात सालाना आधार पर 13.8 प्रतिशत बढ़कर 43.6 अरब डॉलर पहुंच गया. मार्च में इसमें 7.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी. पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में सबसे ज्यादा तेजी देखी गई. यह एक महीने में 85.1 प्रतिशत बढ़ा. वैश्विक कीमतों में उछाल इसका बड़ा कारण रहा. इसके अलावा रत्न एवं आभूषण. इलेक्ट्रॉनिक सामान और लौह अयस्क के निर्यात में भी बढ़त दर्ज की गई. हालांकि गैर-तेल निर्यात में केवल 0.7 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई और यह 34 अरब डॉलर पर पहुंचा. इससे साफ संकेत मिलता है कि ऊर्जा क्षेत्र को छोड़कर निर्यात की रफ्तार अभी भी कमजोर बनी हुई है.
आयात बिल में भी तेज उछाल
अप्रैल में कुल आयात बिल 71.9 अरब डॉलर रहा. यह सालाना आधार पर 10 प्रतिशत अधिक है. गैर-तेल और गैर-सोना आयात 47.7 अरब डॉलर पर मजबूत बना रहा. तेल आयात बिल मार्च के 12.2 अरब डॉलर से बढ़कर अप्रैल में 18.6 अरब डॉलर हो गया. रिपोर्ट के मुताबिक. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में युद्धविराम की घोषणा के बाद तेल आपूर्ति में फिर से तेजी आई. वहीं, सोने का आयात 83.8 प्रतिशत बढ़कर 5.6 अरब डॉलर पहुंच गया. अप्रैल में कुल आयात में सोने की हिस्सेदारी 7.8 प्रतिशत रही.
सरकार ने सोने के आयात पर बढ़ाई सख्ती
सरकार ने 13 मई से सोने और चांदी पर आयात शुल्क 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत कर दिया है. साथ ही कृषि एवं अवसंरचना विकास उपकर (AIDC) को 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत किया गया है. इससे कुल प्रभावी आयात शुल्क 15 प्रतिशत हो गया है.
इसके अलावा एडवांस ऑथराइजेशन योजना के तहत निर्माताओं के लिए 100 किलोग्राम तक की आयात सीमा तय की गई है. नई लाइसेंस शर्तों के तहत कम से कम 50 प्रतिशत पुराने निर्यात दायित्व पूरे करना भी जरूरी होगा. यस बैंक का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में सोने का आयात घटकर करीब 420 टन रह सकता है. जबकि वित्त वर्ष 2026 में यह लगभग 720 टन रहने का अनुमान है.
चालू खाता घाटे के अनुमान में सुधार
रिपोर्ट के अनुसार, सोने के आयात पर सख्ती के चलते चालू खाता घाटा (CAD) कुछ हद तक कम हो सकता है. बैंक ने वित्त वर्ष 2027 के लिए CAD का अनुमान GDP के 1.8 प्रतिशत से घटाकर 1.5 प्रतिशत कर दिया है.
ब्रेंट क्रूड की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल रहने के अनुमान के आधार पर बैंक का कहना है कि केवल सोने के आयात में कमी से करीब 23 अरब डॉलर की बचत हो सकती है. अब वित्त वर्ष 2027 में सोने के कुल आयात का अनुमान 57 अरब डॉलर लगाया गया है. इससे पहले यह अनुमान 80 अरब डॉलर था.
रुपये पर दबाव बना रह सकता है
हालांकि चालू खाता घाटे में राहत के बावजूद यस बैंक ने चेतावनी दी है कि पूंजी प्रवाह पर दबाव बना रह सकता है. बैंक के मुताबिक. भुगतान संतुलन घाटा 30 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि डॉलर के मुकाबले रुपया साल के मध्य तक 97 से 97.50 के स्तर तक पहुंच सकता है.
सेवा क्षेत्र का शुद्ध अधिशेष अप्रैल में थोड़ा घटकर 20.6 अरब डॉलर रह गया. मार्च में यह 20.9 अरब डॉलर था. सेवा निर्यात महीने-दर-महीने 2.5 प्रतिशत घटा. हालांकि सालाना आधार पर इसमें 13.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
केवल सोना नियंत्रण से नहीं सुलझेगी चुनौती
यस बैंक का कहना है कि केवल सोने के आयात पर रोक लगाने से भुगतान संतुलन की पूरी समस्या हल नहीं होगी. असली चुनौती ऐसे समय में पर्याप्त विदेशी पूंजी निवेश आकर्षित करना है. जब वैश्विक बाजार में जोखिम लेने की क्षमता कमजोर बनी हुई है और रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है.
RBL Bank के अनुसार, यह निवेश प्राथमिक पूंजी निवेश के रूप में किया जाएगा. Emirates NBD Bank तरजीही निर्गम के जरिए 280 रुपए प्रति शेयर के भाव पर 959,045,636 इक्विटी शेयर खरीदेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के निजी बैंकिंग सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. दरअसल, वित्त मंत्रालय ने दुबई स्थित एमिरेट्स एनबीडी बैंक (Emirates NBD Bank) को आरबीएल बैंक (RBL Bank) में 74 प्रतिशत तक हिस्सेदारी अधिग्रहित करने की अंतिम मंजूरी दे दी है. इस मंजूरी के साथ करीब 26,850 करोड़ रुपए के बड़े विदेशी निवेश का रास्ता साफ हो गया है. यह सौदा भारतीय बैंकिंग सेक्टर के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशों में से एक माना जा रहा है. अधिग्रहण प्रस्ताव की घोषणा 18 अक्टूबर 2025 को की गई थी.
अब नए निवेशकों के हाथ में होगी बैंक की कमान
वित्त मंत्रालय की मंजूरी के बाद आरबीएल बैंक में मालिकाना हक और नियंत्रण का बड़ा हिस्सा नए प्रमोटर समूह के पास चला जाएगा. बैंक ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि वित्तीय सेवा विभाग की ओर से भेजे गए पत्र में 49 प्रतिशत से अधिक और 74 प्रतिशत तक हिस्सेदारी खरीदने की अनुमति दी गई है.
इस तरह के बड़े बैंकिंग सौदों में रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय की मंजूरी बेहद अहम मानी जाती है. इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुके हैं.
किस तरह पूरी होगी डील
आरबीएल बैंक के अनुसार, यह निवेश प्राथमिक पूंजी निवेश के रूप में किया जाएगा. एमिरेट्स एनबीडी बैंक तरजीही निर्गम के जरिए 280 रुपए प्रति शेयर के भाव पर 959,045,636 इक्विटी शेयर खरीदेगा. इस डील के बाद विदेशी बैंक की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से 74 प्रतिशत के बीच रह सकती है. हालांकि अंतिम हिस्सेदारी नियामकीय शर्तों पर निर्भर करेगी. लेनदेन पूरा होने के बाद बैंक में विदेशी बैंक की अनुषंगी इकाई वाला मॉडल लागू होगा और एमिरेट्स एनबीडी बैंक को प्रमोटर के रूप में मान्यता मिलेगी.
बैंक की ग्रोथ को मिलेगा बड़ा सहारा
बैंक का कहना है कि यह निवेश उसे विकास के अगले चरण के लिए मजबूत स्थिति में लाएगा. पूंजी बढ़ने से बैंक की कर्ज देने की क्षमता. डिजिटल विस्तार और नए कारोबार क्षेत्रों में निवेश को मजबूती मिलेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि इस डील से भारतीय बैंकिंग सेक्टर में विदेशी निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा.
शेयर बाजार में बढ़ सकती है हलचल
वित्त मंत्रालय की मंजूरी के बाद आने वाले कारोबारी सत्रों में आरबीएल बैंक के शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है. शुक्रवार को बैंक का शेयर 1.05 रुपए की तेजी के साथ 338 रुपए पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान शेयर 339.55 रुपए के दिन के उच्च स्तर तक पहुंचा था. वहीं बैंक के शेयर का 52 हफ्तों का उच्चतम स्तर 349.75 रुपए रहा है. फिलहाल शेयर अपने 52 हफ्तों के हाई से करीब 10 से 11 रुपए नीचे कारोबार कर रहा है.
भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए अहम सौदा
विशेषज्ञों के अनुसार. यह सौदा भारतीय बैंकिंग सेक्टर में विदेशी रणनीतिक निवेश के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इससे न केवल आरबीएल बैंक को पूंजी और वैश्विक विशेषज्ञता मिलेगी. बल्कि भारतीय बैंकिंग बाजार में अंतरराष्ट्रीय बैंकों की दिलचस्पी भी बढ़ सकती है.
वर्कर्स ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो आने वाले दिनों में बड़े स्तर पर आंदोलन किया जा सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देशभर में ऐप आधारित टैक्सी ड्राइवरों और डिलीवरी वर्कर्स ने बढ़ती ईंधन कीमतों और कम भुगतान दरों के खिलाफ शनिवार को 5 घंटे की अस्थायी हड़ताल का आह्वान किया है. गिग और प्लेटफॉर्म सर्विसेज वर्कर्स यूनियन (GIPSWU) ने दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक सेवाएं बंद रखने की अपील की है. इस हड़ताल का असर कैब बुकिंग और फूड डिलीवरी जैसी सेवाओं पर पड़ सकता है.
यूनियन का कहना है कि लगातार बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतों और ऐप कंपनियों की कम भुगतान दरों के कारण हजारों ड्राइवरों और डिलीवरी पार्टनर्स के सामने रोजी-रोटी का संकट गहराता जा रहा है.
सोशल मीडिया के जरिए आंदोलन की अपील
यूनियन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर देशभर के गिग वर्कर्स से इस आंदोलन में शामिल होने की अपील की. यूनियन ने कहा कि ऐप कंपनियां किराए और इंसेंटिव में पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं कर रही हैं. जबकि ड्राइवरों का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. GIPSWU के मुताबिक. बढ़ती महंगाई के बीच मौजूदा भुगतान ढांचा वर्कर्स के लिए आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह गया है.
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में फिर बढ़ोतरी
हाल ही में सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है. इसके बाद दिल्ली में पेट्रोल की कीमत लगभग 97.77 रुपए प्रति लीटर और डीजल 90.67 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच गई है. वहीं हैदराबाद में पेट्रोल 110.8 रुपए प्रति लीटर और डीजल 98.9 रुपए प्रति लीटर हो गया है.
बताया जा रहा है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है. कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर करीब 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है.
‘कमाई से ज्यादा खर्च बढ़ रहा है’
कैब ड्राइवर्स का कहना है कि हर बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने पर सबसे ज्यादा असर ड्राइवरों पर पड़ता है. उन्होंने कहा कि ईंधन की लागत बढ़ने के बावजूद किराए में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं होती. उनका कहना है कि कमीशन और ईंधन का खर्च निकालने के after बहुत कम पैसा बचता है. कई बार घर चलाना भी मुश्किल हो जाता है. कई डिलीवरी वर्कर्स ने भी कहा कि उनका ज्यादातर समय सड़क पर गुजरता है. ऐसे में ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे उनकी कमाई को प्रभावित करती हैं.
तेल कंपनियों पर भी बढ़ा दबाव
तेल कंपनियों के अधिकारियों के मुताबिक. हालिया बढ़ोतरी के बावजूद कंपनियां अभी भी अपनी लागत पूरी तरह वसूल नहीं कर पा रही हैं. क्रिसिल के अनुमान के अनुसार. सरकारी ईंधन खुदरा विक्रेताओं को पेट्रोल पर करीब 10 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 13 रुपए प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है.
भारतीय रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल की लागत फरवरी के 69 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर मई में 106 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई है. इस दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 75 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है.
बड़े आंदोलन की चेतावनी
गिग वर्कर्स का कहना है कि इस अस्थायी हड़ताल का उद्देश्य सरकार और ऐप कंपनियों तक अपनी समस्याएं पहुंचाना है. उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई और कम भुगतान के बीच परिवार चलाना मुश्किल होता जा रहा है. वर्कर्स ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली. तो आने वाले दिनों में बड़े स्तर पर आंदोलन किया जा सकता है.
IHC के नियंत्रण में आने के बाद Sammaan Capital के लिए यह कदम रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इससे कंपनी की वित्तीय स्थिति, वैश्विक पहुंच और तकनीकी क्षमताओं में बड़ा बदलाव देखने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की प्रमुख हाउसिंग फाइनेंस कंपनी Sammaan Capital Limited ने एक बड़े कॉर्पोरेट बदलाव का ऐलान किया है. अंतरराष्ट्रीय निवेश कंपनी International Holding Company PJSC (IHC) के निवेश और ओपन ऑफर के पूरा होने के बाद अब Sammaan Capital आधिकारिक तौर पर IHC ग्रुप कंपनी बन गई है. इसके साथ ही कंपनी ने नए प्रमोटर और बोर्ड स्तर पर अहम बदलावों की भी घोषणा की है.
कंपनी ने यह जानकारी 15 मई 2026 को स्टॉक एक्सचेंजों को भेजी गई सूचना में दी. IHC दुनिया की सबसे बड़ी सूचीबद्ध निवेश कंपनियों में से एक है. कंपनी का मार्केट कैप करीब 232 अरब अमेरिकी डॉलर और कुल संपत्ति 117 अरब डॉलर से अधिक है. IHC की मौजूदगी 100 से ज्यादा देशों में है. कंपनी ने भारत को अपने सबसे अहम रणनीतिक बाजारों में शामिल बताया है.
सम्मान कैपिटल को मिलेंगे कई बड़े फायदे
सम्मान कैपिटल ने कहा कि IHC के साथ यह साझेदारी कंपनी के लिए कई बड़े बदलाव लेकर आएगी. इसमें पूंजी की मजबूती, वैश्विक स्तर की वित्तीय विश्वसनीयता, बेहतर क्रेडिट रेटिंग और कम उधारी लागत जैसे फायदे शामिल हैं. कंपनी के अनुसार, दो रेटिंग एजेंसियां पहले ही उसकी रेटिंग अपग्रेड कर चुकी हैं, जबकि अन्य एजेंसियां भी जल्द समीक्षा करेंगी.
AI और टेक्नोलॉजी पर रहेगा फोकस
कंपनी ने बताया कि IHC समूह के विशेषज्ञ अब सम्मान कैपिटल की टीमों के साथ आईटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), जोखिम प्रबंधन, क्रेडिट और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. इससे कंपनी की परिचालन क्षमता और तकनीकी दक्षता को मजबूती मिलेगी. सम्मान कैपिटल ने कहा कि IHC का मजबूत टेक्नोलॉजी और AI इकोसिस्टम कंपनी के दीर्घकालिक विकास, नवाचार और परिचालन दक्षता को बढ़ावा देगा.
कॉर्पोरेट गवर्नेंस को मिलेगी मजबूती
कंपनी ने कहा कि IHC के साथ जुड़ाव से कॉर्पोरेट गवर्नेंस के उच्चतम मानकों और संस्थागत प्रक्रियाओं को और मजबूती मिलेगी. इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और कंपनी की बाजार छवि मजबूत होगी.
अल्विन दिनेश क्रास्टा बने नए निदेशक
कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने 15 मई 2026 को हुई बैठक में कई अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी. बोर्ड ने आधिकारिक रूप से नोट किया कि IHC के स्वामित्व वाली Avenir Investment RSC Ltd ने ओपन ऑफर पूरा कर लिया है और अब वह कंपनी की प्रमोटर बन गई है. इसके अलावा बोर्ड ने अल्विन दिनेश क्रास्टा को अतिरिक्त गैर-कार्यकारी गैर-स्वतंत्र निदेशक नियुक्त करने को मंजूरी दे दी है. यह नियुक्ति 15 मई 2026 से पांच वर्षों के लिए प्रभावी होगी. हालांकि वे रोटेशन के आधार पर रिटायर होने वाले निदेशक रहेंगे.
25 वर्षों का वित्तीय अनुभव
अल्विन दिनेश क्रास्टा वर्तमान में IHC समूह में ग्रुप चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें वित्तीय सेवाओं, कृषि, सप्लाई चेन, उपभोक्ता वस्तु और निवेश क्षेत्रों में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वे मार्च 2018 से अबू धाबी स्थित IHC में बड़े वित्तीय संचालन, निवेश, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और विलय एवं अधिग्रहण गतिविधियों का नेतृत्व कर रहे हैं.
कंपनी ने स्पष्ट किया कि अल्विन दिनेश क्रास्टा का कंपनी के किसी अन्य निदेशक से कोई संबंध नहीं है. साथ ही उन्हें सेबी या किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा निदेशक पद संभालने से प्रतिबंधित नहीं किया गया है.
आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल में भारत का वस्तु निर्यात 13.8% बढ़कर 43.56 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो पिछले चार वर्षों का सर्वोच्च स्तर है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के बावजूद भारत के विदेश व्यापार ने अप्रैल में मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया. वस्तु निर्यात में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली, लेकिन इसी दौरान सोने-चांदी के भारी आयात ने व्यापार घाटे को भी बढ़ा दिया. वाणिज्य मंत्रालय की ओर से आज जारी आंकड़ों के अनुसार, यह स्थिति भारत के बाहरी व्यापार में तेजी और असंतुलन दोनों को दर्शाती है.
अप्रैल में निर्यात 4 साल के उच्च स्तर पर
आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल में भारत का वस्तु निर्यात 13.8% बढ़कर 43.56 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो पिछले चार वर्षों का सर्वोच्च स्तर है. यह बढ़ोतरी ऐसे समय में दर्ज हुई है जब पश्चिम एशिया में संकट के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित थी. वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, कमोडिटी कीमतों में तेजी और भारतीय उद्योगों द्वारा नए बाजारों में विस्तार की रणनीति ने निर्यात को मजबूती दी.
आयात में भी उछाल, व्यापार घाटा बढ़कर 28.38 अरब डॉलर
आयात में भी अप्रैल के दौरान 10% की वृद्धि दर्ज की गई और यह 71.94 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले छह महीनों का उच्च स्तर है. इस बढ़ोतरी का बड़ा कारण सोना और चांदी का भारी आयात रहा. इसके चलते व्यापार घाटा बढ़कर 28.38 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले तीन महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है.
पेट्रोलियम और इलेक्ट्रॉनिक्स ने संभाली निर्यात की रफ्तार
निर्यात वृद्धि में पेट्रोलियम उत्पादों और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की अहम भूमिका रही. पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात 34.7% बढ़कर 9.59 अरब डॉलर हो गया, जबकि इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का निर्यात 40.3% की छलांग लगाकर 5.18 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
सोने-चांदी के आयात में तेज बढ़ोतरी
आयात के मोर्चे पर सबसे बड़ा असर कीमती धातुओं से पड़ा. सोने का आयात 81.7% बढ़कर 5.63 अरब डॉलर हो गया, जबकि चांदी का आयात दोगुने से अधिक होकर 41.10 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया. इस वृद्धि ने कुल आयात बिल को काफी बढ़ा दिया.
सेवाओं के व्यापार में भी मजबूत प्रदर्शन
सेवा क्षेत्र में भी भारत ने सकारात्मक प्रदर्शन किया. अप्रैल में सेवाओं का निर्यात 13.4% बढ़कर 37.24 अरब डॉलर रहा, जबकि सेवाओं का आयात घटकर 16.66 अरब डॉलर रह गया. इससे भारत को लगभग 20.58 अरब डॉलर का सेवा व्यापार अधिशेष प्राप्त हुआ. भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अंतिम आंकड़े बाद में जारी किए जाएंगे.
वैश्विक तनाव का क्षेत्रीय व्यापार पर असर
पश्चिम एशिया संकट का असर भारत के कुछ प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर भी दिखा. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ व्यापार में निर्यात और आयात दोनों में 30% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई. कच्चे तेल के आयात में भी 10% की गिरावट रही और यह 18.63 अरब डॉलर पर आ गया.
अमेरिका अप्रैल में भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य बना रहा, जहां निर्यात 8.48 अरब डॉलर तक पहुंचा. वहीं आयात 4.7% घटकर 5.27 अरब डॉलर रहा. सिंगापुर को निर्यात लगभग तीन गुना बढ़कर 3.20 अरब डॉलर हो गया. चीन को निर्यात 27% बढ़कर 1.77 अरब डॉलर रहा, जबकि चीन से आयात 20.9% बढ़कर 11.97 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिससे वह भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत बना रहा.
गोपीनाथ की टिप्पणी ने एक बार फिर इस मांग को मजबूत किया है कि वैश्विक नीति निर्माण और निर्णय लेने वाले मंचों पर अधिक विविधता सुनिश्चित की जाए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व प्रथम उप प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ ने हाल ही में अमेरिका और चीन के बीच हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में महिलाओं की अनुपस्थिति को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उनकी टिप्पणी के बाद वैश्विक स्तर पर लैंगिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व में विविधता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है.
केवल पुरुष प्रतिनिधियों की मौजूदगी पर जताई आपत्ति
बैठक की तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए गोपीनाथ ने इसे “मेरिटोक्रेसी के अंत की तस्वीर” बताया. उन्होंने कहा कि ऐसे उच्चस्तरीय वैश्विक मंचों पर महिलाओं की अनुपस्थिति निर्णय लेने की प्रक्रिया में विविधता और समावेशिता की कमी को दर्शाती है. उनकी यह टिप्पणी तेजी से नीति विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चर्चा का विषय बन गई, जहां कई लोगों ने वैश्विक नेतृत्व में महिलाओं की कम भागीदारी पर चिंता जताई.
वैश्विक आर्थिक चुनौतियों पर हुई थी अहम बैठक
यह बैठक दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर चर्चा के लिए आयोजित की गई थी. हालांकि, महिला प्रतिनिधित्व की अनुपस्थिति ने चर्चा का केंद्र बदल दिया और नेतृत्व संरचनाओं में मौजूद असमानताओं पर सवाल खड़े कर दिए.
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और कॉरपोरेट नेतृत्व में धीरे-धीरे सुधार हुआ है, लेकिन भू-राजनीतिक और उच्चस्तरीय बैठकों में अब भी लैंगिक असंतुलन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
वैश्विक मंचों पर विविधता की मांग तेज
गोपीनाथ की टिप्पणी ने एक बार फिर इस मांग को मजबूत किया है कि वैश्विक नीति निर्माण और निर्णय लेने वाले मंचों पर अधिक विविधता सुनिश्चित की जाए. विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक सुधार, व्यापार और जलवायु वित्त जैसे विषयों पर बेहतर परिणाम के लिए समावेशी प्रतिनिधित्व जरूरी है.
‘मेरिट’ और ‘प्रतिनिधित्व’ के बीच बढ़ती बहस
इस घटना ने यह भी चर्चा तेज कर दी है कि क्या केवल मेरिटोक्रेसी पर्याप्त है या फिर समान प्रतिनिधित्व भी उतना ही जरूरी है. कई विश्लेषकों का कहना है कि विविधता न केवल नीतियों की गुणवत्ता बढ़ाती है बल्कि उनकी वैधता को भी मजबूत करती है.
वैश्विक संस्थानों पर बढ़ा दबाव
जैसे-जैसे यह मामला चर्चा में आ रहा है, सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर यह दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे नेतृत्व स्तर पर लैंगिक समावेशन को केवल नीति तक सीमित न रखकर वास्तविक प्रतिनिधित्व में भी बदलें.
लगातार दो हफ्तों की गिरावट के बाद विदेशी मुद्रा भंडार में जोरदार वापसी हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के विदेशी मुद्रा भंडार में एक बार फिर मजबूती देखने को मिली है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत के फॉरेक्स रिजर्व में 6.295 अरब डॉलर यानी करीब 60 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. लगातार दो हफ्तों की गिरावट के बाद आए इस उछाल को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, विदेशी यात्राओं को टालने और सोना-चांदी की खरीद में सावधानी बरतने की अपील की थी. माना जा रहा है कि सरकार का फोकस देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखने पर है.
696 अरब डॉलर के करीब पहुंचा फॉरेक्स रिजर्व
आरबीआई के अनुसार, 8 मई को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 696.988 अरब डॉलर हो गया. इससे पहले वाले सप्ताह में इसमें 7.794 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी और रिजर्व घटकर 690.693 अरब डॉलर पर पहुंच गया था. इस साल फरवरी के अंत में भारत का फॉरेक्स रिजर्व 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था. हालांकि बाद में पश्चिम एशिया संकट और रुपए पर बढ़ते दबाव के कारण इसमें गिरावट देखने को मिली. उस दौरान रुपए को स्थिर रखने के लिए आरबीआई को विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचकर हस्तक्षेप करना पड़ा था.
विदेशी मुद्रा संपत्तियों में भी बढ़ोतरी
आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां यानी फॉरेन करेंसी असेट्स भी बढ़ी हैं. 8 मई को समाप्त सप्ताह में ये 562 मिलियन डॉलर बढ़कर 552.387 अरब डॉलर हो गईं. इन परिसंपत्तियों में यूरो, पाउंड और येन जैसी गैर-अमेरिकी मुद्राओं के मूल्य में बदलाव का असर भी शामिल होता है. डॉलर के मुकाबले इन मुद्राओं में मजबूती आने से विदेशी मुद्रा संपत्तियों का मूल्य बढ़ा है.
गोल्ड रिजर्व ने भी बढ़ाई ताकत
देश के गोल्ड रिजर्व में भी मजबूत इजाफा देखने को मिला है. आरबीआई के मुताबिक, सोने के भंडार का मूल्य 5.637 अरब डॉलर बढ़कर 120.853 अरब डॉलर हो गया. इसके अलावा, विशेष आहरण अधिकार (SDRs) में 84 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई और यह 18.873 अरब डॉलर तक पहुंच गया. वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास भारत की आरक्षित स्थिति भी बढ़कर 4.875 अरब डॉलर हो गई.
अर्थव्यवस्था के लिए क्यों अहम है फॉरेक्स रिजर्व
फॉरेक्स रिजर्व किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का बड़ा संकेतक माना जाता है. इससे आयात भुगतान, विदेशी कर्ज और रुपए की स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है. रिजर्व मजबूत होने से वैश्विक स्तर पर निवेशकों का भरोसा भी बढ़ता है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अगर विदेशी निवेश और निर्यात में सुधार जारी रहता है, तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर से रिकॉर्ड स्तर की ओर बढ़ सकता है.
इस फंडिंग राउंड के जरिए कंपनी किफायती ट्रांसपोर्ट और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर फोकस करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की तेजी से बढ़ती राइड-हेलिंग कंपनी रैपिडो (Rapido) ने नए फंडिंग राउंड में 24 करोड़ डॉलर जुटाए हैं. इस निवेश के बाद कंपनी का मूल्यांकन बढ़कर 3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. नई पूंजी के दम पर रैपिडो अब बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करते हुए बड़ी प्रतिस्पर्धी कंपनियों उबर (Uber) और ओला (Ola) को कड़ी चुनौती देने की तैयारी में है.
प्रोसस की अगुआई में हुआ बड़ा निवेश
इस फंडिंग राउंड की अगुआई प्रोसस (Prosus) ने की. इसके अलावा वेस्टब्रिज कैपिटल (WestBridge Capital), एस्सेल (Accel) और अन्य निवेशकों ने भी इसमें भागीदारी की. यह निवेश 73 करोड़ डॉलर की प्राथमिक और द्वितीयक फंडिंग का हिस्सा है. डेटा प्लेटफॉर्म Tracxn के अनुसार, इस फंडिंग से पहले रैपिडो का मूल्यांकन करीब 2.3 अरब डॉलर था. नए निवेश के बाद कंपनी ने भारतीय मोबिलिटी सेक्टर में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है.
मझोले शहरों में बढ़ती मांग पर कंपनी की नजर
रैपिडो का कहना है कि उसका मुख्य उद्देश्य देश में किफायती परिवहन की कमी को दूर करना और लोगों को रोजगार के लचीले अवसर उपलब्ध कराना है. खासतौर पर मझोले शहरों और छोटे बाजारों में तेजी से बढ़ती मांग को देखते हुए कंपनी अपने विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है. नई पूंजी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में परिचालन विस्तार, सप्लाई नेटवर्क मजबूत करने और बड़े महानगरों में अपनी मुख्य सेवाओं को विस्तार देने में किया जाएगा.
‘राइड ही नहीं, रोजगार भी हमारी प्राथमिकता’
रैपिडो के सह-संस्थापक अरविंद सांका ने कहा कि कंपनी हमेशा से परिवहन को केवल राइड तक सीमित नहीं मानती, बल्कि इसे लोगों की आजीविका से भी जोड़कर देखती है. उन्होंने कहा. “हमारा मानना है कि परिवहन का असली पैमाना सिर्फ पूरी हुई राइड नहीं, बल्कि उससे मिलने वाली कमाई और रोजगार के अवसर भी हैं. यह निवेश हमें दोनों क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ने में मदद करेगा.”
सांका ने आगे कहा कि कंपनी उन बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत करेगी जहां मांग तो अधिक है, लेकिन सप्लाई अभी बिखरी हुई है. इसके साथ ही रैपिडो तकनीक को और बेहतर बनाने तथा अपनी मल्टी-मॉडल सेवाओं को तेज गति से विस्तार देने पर ध्यान देगी.
भारतीय डिजिटल अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन रहा परिवहन
आशुतोष शर्मा ने कहा कि परिवहन अब देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था का बुनियादी आधार बनता जा रहा है. उनके मुताबिक, रैपिडो बड़े स्तर पर पहुंच और रोजगार जैसी वास्तविक समस्याओं का समाधान कर रही है और इसी वजह से निवेशकों का कंपनी पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है.
उपभोक्ताओं के बीच मजबूत हो रही रैपिडो की पकड़
सुमीर चड्ढा ने कहा कि किफायती सेवाएं, बेहतर दक्षता और ड्राइवरों के सशक्तिकरण पर रैपिडो का जोर उपभोक्ताओं के साथ मजबूत जुड़ाव बना रहा है. उन्होंने कहा कि कंपनी जिस तेजी से अपने प्लेटफॉर्म का विस्तार कर रही है, वह भारतीय मोबिलिटी सेक्टर में नए विकास चरण की शुरुआत का संकेत है.
भू-राजनीतिक तनाव, एयरस्पेस प्रतिबंध और बढ़ती ईंधन लागत ने टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयरलाइन एयर इंडिया के पुनर्गठन प्रयासों पर भारी दबाव डाला है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एयर इंडिया (Air India) ने वित्त वर्ष 2026 (FY26) में लगभग 2.8 अरब अमेरिकी डॉलर का भारी वार्षिक घाटा दर्ज किया है, जो कंपनी के सामने मौजूद परिचालन और वैश्विक चुनौतियों की गंभीरता को दर्शाता है. यह जानकारी सिंगापुर एयरलाइन्स (Singapore Airlines) द्वारा साझा की गई, जिसके पास एयर इंडिया में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी है. कंपनी के अनुसार, वित्त वर्ष मार्च 2026 तक एयर इंडिया को 3.56 अरब सिंगापुर डॉलर का नुकसान हुआ. यह घाटा निजीकरण के बाद एयर इंडिया के सबसे बड़े नुकसान में से एक माना जा रहा है और इसके चल रहे बहु-वर्षीय टर्नअराउंड प्लान की जटिलताओं को उजागर करता है.
परिचालन दबाव में तेजी
एयर इंडिया का प्रदर्शन कई उद्योग-स्तरीय समस्याओं से प्रभावित हुआ है, जिनमें सप्लाई चेन बाधाएं, एयरस्पेस प्रतिबंध और जेट ईंधन की ऊंची कीमतें शामिल हैं. भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान संघर्ष और पाकिस्तान द्वारा भारतीय विमानन कंपनियों के लिए अपने एयरस्पेस को बंद रखने के कारण एयरलाइंस को लंबे रूट अपनाने पड़े हैं. इससे ईंधन की खपत और परिचालन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. इन परिस्थितियों के कारण अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की क्षमता में भी कटौती करनी पड़ी है, जिससे कई विदेशी रूट्स को सीमित या अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है.
टर्नअराउंड रणनीति पर असर
बढ़ता घाटा एयर इंडिया के पुनर्गठन रोडमैप के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जिसमें बेड़े का आधुनिकीकरण, नेटवर्क विस्तार और सेवा सुधार शामिल हैं. ऑडिटर्स ने सिंगापुर एयरलाइन्स के निवेश को लेकर “मूल्यह्रास (impairment)” के संकेत भी बताए हैं और मौजूदा अनिश्चितता व चुनौतीपूर्ण परिचालन परिस्थितियों की ओर इशारा किया है. हालांकि वित्तीय दबाव के बावजूद सिंगापुर एयरलाइंस ने एयर इंडिया के साथ अपनी दीर्घकालिक साझेदारी पर भरोसा दोहराया है और भारत को तेजी से बढ़ते विमानन बाजारों में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक केंद्र बताया है.
प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी
एयर इंडिया की सीमित क्षमता का फायदा वैश्विक एयरलाइंस जैसे Lufthansa और Cathay Pacific उठा रही हैं. इससे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रूट्स पर प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है. साथ ही, कंपनी को विमान डिलीवरी में देरी, मेंटेनेंस बाधाएं और सप्लाई चेन समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है, जिससे विस्तार की गति प्रभावित हुई है.
आने वाले समय में उच्च ईंधन लागत और भू-राजनीतिक अनिश्चितता लाभप्रदता पर दबाव बनाए रख सकती है. हालांकि एयर इंडिया ने बेड़े के उन्नयन, ग्राहक अनुभव और परिचालन दक्षता में सुधार किया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी मुनाफे के लिए बाहरी परिस्थितियों का स्थिर होना और टर्नअराउंड योजना का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक होगा.
एयर इंडिया का अगला वित्तीय प्रदर्शन यह तय करेगा कि क्या वह वैश्विक विमानन क्षेत्र में अपनी खोई हुई बाजार हिस्सेदारी को फिर से हासिल कर पाएगी या नहीं.
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 से अब तक केवल 17 भारतीय शहरों ने म्यूनिसिपल बॉन्ड जारी किए हैं और कुल 45.4 अरब रुपये जुटाए हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और आर्थिक विकास को समर्थन देने के लिए वर्ष 2037 तक शहरी बुनियादी ढांचे में करीब 80 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी. यह बात ब्रिकवर्क रेटिंग्स (Brickwork Ratings) की एक नई रिपोर्ट में कही गई है. रिपोर्ट के अनुसार, अगर शहरी वित्तपोषण के लिए नया बाजार आधारित मॉडल अपनाया जाता है, तो अगले पांच वर्षों में करीब 4 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा सकता है.
शहरी क्षेत्रों का GDP में बढ़ेगा योगदान
“फ्रॉम ग्रांट्स टू मार्केट्स. हाउ अर्बन चैलेंज फंड (UCF) विल रीशेप अर्बन फाइनेंस इन इंडिया” शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2036 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में शहरी क्षेत्रों की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. ऐसे में टिकाऊ शहरी वित्तपोषण देश की प्राथमिकता बन जाएगा.
Urban Challenge Fund से बदलेगा फंडिंग मॉडल
ब्रिकवर्क रेटिंग्स के अनुसार, केंद्र सरकार समर्थित 1 लाख करोड़ रुपये का अर्बन चैलेंज फंड (UCF) शहरी विकास के पारंपरिक अनुदान आधारित मॉडल से हटकर बाजार से जुड़े वित्तपोषण की दिशा में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.
इस ढांचे के तहत शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को किसी भी परियोजना के लिए केंद्र सरकार की सहायता पाने से पहले कम से कम 50 प्रतिशत फंडिंग बाजार स्रोतों से जुटानी होगी. इसमें म्यूनिसिपल बॉन्ड, बैंक लोन और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) जैसे विकल्प शामिल होंगे.
रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना लागत का 25 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देगी, जबकि बाकी राशि राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को जुटानी होगी.
म्यूनिसिपल बॉन्ड मार्केट को मिलेगा बढ़ावा
ब्रिकवर्क रेटिंग्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनु सहगल ने कहा कि UCF भारत के म्यूनिसिपल फाइनेंस इकोसिस्टम को मजबूत कर सकता है और खासतौर पर म्यूनिसिपल बॉन्ड मार्केट में भागीदारी बढ़ाने में मदद करेगा.
रिपोर्ट के अनुसार, यह मॉडल अगले पांच वर्षों में लगभग 4 लाख करोड़ रुपये के शहरी निवेश को बढ़ावा दे सकता है. साथ ही इससे स्थानीय सरकारों में वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और क्रेडिट योग्यता में सुधार होगा.
छोटे शहरों के सामने बनी रहेंगी चुनौतियां
हालांकि रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि छोटे शहरों में संस्थागत क्षमता की कमी के कारण इस योजना के क्रियान्वयन में चुनौतियां बनी रह सकती हैं. खासतौर पर टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए क्रेडिट रेटिंग की भूमिका बेहद अहम हो जाएगी, क्योंकि उन्हें लंबी अवधि के लिए पूंजी बाजार तक पहुंच बनानी होगी. रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल बैंक लोन पर निर्भर रहने से शहर राज्य सरकार की गारंटी पर निर्भर बने रहते हैं और फंडिंग के स्रोतों में विविधता नहीं आ पाती.
अब तक केवल 17 शहरों ने जारी किए म्यूनिसिपल बॉन्ड
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 से अब तक केवल 17 भारतीय शहरों ने म्यूनिसिपल बॉन्ड जारी किए हैं और कुल 45.4 अरब रुपये जुटाए हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं.
ब्रिकवर्क रेटिंग्स ने कहा कि हाल के वर्षों में म्यूनिसिपल बॉन्ड में निवेशकों का भरोसा बढ़ा है. RBI की रेपो रेट के मुकाबले यील्ड स्प्रेड घटकर वित्त वर्ष 2026 में करीब 155 बेसिस पॉइंट रह गया है, जबकि वित्त वर्ष 2020 में यह लगभग 480 बेसिस पॉइंट था. इससे जोखिम को लेकर निवेशकों की चिंता में कमी आई है.
छोटे शहरों और पूर्वोत्तर राज्यों में अवसर
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 4,223 छोटे शहरी निकायों और पूर्वोत्तर राज्यों के शहरों में बाजार आधारित कर्ज की पहुंच बेहद सीमित है. ऐसे में यहां विकास की बड़ी संभावना मौजूद है. UCF के तहत 5,000 करोड़ रुपये की क्रेडिट रिपेमेंट गारंटी स्कीम निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद करेगी. इसके जरिए छोटे स्थानीय निकायों को पहली बार मिलने वाले कर्ज पर गारंटी दी जाएगी, जिससे निवेश योग्य शहरी संस्थाओं की संख्या बढ़ सकती है.
ब्रिकवर्क रेटिंग्स अब तक 105 शहरी स्थानीय निकायों की रेटिंग कर चुकी है, जिनमें सबसे अधिक झारखंड और उत्तर प्रदेश के निकाय शामिल हैं.
शासन व्यवस्था और सुधार सबसे बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में कई संरचनात्मक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है. इनमें कमजोर प्रशासनिक क्षमता, सुधारों को लागू करने में देरी, संपत्ति कर और यूजर चार्ज सुधारों से जुड़ी राजनीतिक संवेदनशीलता तथा वित्तीय रिपोर्टिंग मानकों की कमियां शामिल हैं.
इसके अलावा, परियोजनाओं में देरी होने से केंद्र और राज्यों से मिलने वाली फंडिंग प्रभावित हो सकती है. खराब डेटा गुणवत्ता के कारण नगर निकायों की क्रेडिट रेटिंग प्रक्रिया भी जटिल हो सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, UCF की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि शहर अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को कितना मजबूत बनाते हैं, ऑडिटेड वित्तीय खुलासों में कितना सुधार करते हैं और दीर्घकालिक कर्ज चुकाने के लिए टिकाऊ राजस्व स्रोत विकसित कर पाते हैं.