कंपनी आंध्र प्रदेश में मेटग्लास (Metglas) नामक अमोर्फस धातु सामग्री के निर्माण के लिए उत्पादन इकाई स्थापित करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
जापान की प्रमुख सामग्री निर्माता कंपनी Proterial ने भारत में अमोर्फस इलेक्ट्रिकल स्टील के पहले विनिर्माण संयंत्र की स्थापना की घोषणा की है. कंपनी इस परियोजना के पहले चरण में 77 से 80 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक का निवेश करेगी. इस कदम का उद्देश्य ऊर्जा-कुशल पावर इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती वैश्विक मांग को पूरा करना है.
आंध्र प्रदेश में स्थापित होगा उत्पादन केंद्र
कंपनी आंध्र प्रदेश में मेटग्लास (Metglas) नामक अमोर्फस धातु सामग्री के निर्माण के लिए उत्पादन इकाई स्थापित करेगी. यह सामग्री ट्रांसफॉर्मर कोर में उपयोग की जाती है और पारंपरिक इलेक्ट्रिकल स्टील की तुलना में बिजली के नुकसान को 20-30 प्रतिशत तक कम कर सकती है.
संयुक्त उद्यम के रूप में होगा संचालन
इस संयंत्र का संचालन Metglas (India) Private Limited द्वारा किया जाएगा, जो एक संयुक्त उद्यम है. इसमें Proterial की 74 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी, जबकि शेष 26 प्रतिशत हिस्सेदारी भारत की Shirdi Sai Electricals के पास होगी. यह संयुक्त उद्यम जून 2025 में स्थापित किया गया था.
जनवरी 2026 से निर्माण कार्य, अक्टूबर 2026 से उत्पादन
संयंत्र का निर्माण कार्य जनवरी 2026 में तिरुपति के श्री सिटी में शुरू होने की योजना है. व्यावसायिक उत्पादन अक्टूबर 2026 से शुरू होने की उम्मीद है. प्रारंभिक उत्पादन क्षमता लगभग 30,000 टन प्रति वर्ष रखी गई है.
दो चरणों में होगा निवेश, 500 लोगों को मिलेगा रोजगार
Proterial ने बताया कि कुल निवेश दो चरणों में किया जाएगा. पहले चरण में 77-80 मिलियन डॉलर का निवेश होगा, जबकि विस्तार के लिए अतिरिक्त 155-160 मिलियन डॉलर की योजना है. इस परियोजना से 200 से 500 लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है.
क्या है अमोर्फस धातु की विशेषता?
अमोर्फस धातुएं पिघली हुई धातु को अत्यधिक तेजी से ठंडा करके बनाई जाती हैं, जिससे परमाणु क्रिस्टलीय संरचना नहीं बना पाते. इस प्रक्रिया से तैयार सामग्री में बेहतर सॉफ्ट मैग्नेटिक गुण होते हैं, जो इसे ट्रांसफॉर्मर कोर और शोर-नियंत्रण वाले मैग्नेटिक कंपोनेंट्स के लिए उपयुक्त बनाते हैं.
भारत की आयात निर्भरता होगी कम
भारत में इस संयंत्र की स्थापना से देश की अमोर्फस इलेक्ट्रिकल स्टील के आयात पर निर्भरता कम होगी. साथ ही, यह घरेलू ट्रांसफॉर्मर निर्माण उद्योग और ऊर्जा दक्षता लक्ष्यों को भी मजबूती देगा.
वैश्विक स्तर पर उत्पादन नेटवर्क होगा मजबूत
भारत में नया संयंत्र स्थापित होने के बाद Proterial का उत्पादन नेटवर्क अमेरिका, जापान और भारत, इन तीन प्रमुख क्षेत्रों में फैल जाएगा. इससे कंपनी को वैश्विक स्तर पर बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने और पावर ग्रिड में ऊर्जा हानि को कम करने में मदद मिलेगी.
निप्पॉन इंडिया MF को करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करना होगा. कंपनी के सीईओ सुंदीप सिक्का और फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी को 2.1-2.1 करोड़ रुपये देने होंगे. सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में कुल भुगतान करीब ₹97 करोड़ होगा. सेबी का आदेश जल्द जारी होने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) ने निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फंड (Nippon India Mutual Fund) और उसके तीन शीर्ष अधिकारियों के साथ सहमति के आधार पर निपटान को मंजूरी दे दी है. यह मामला यस बैंक के Additional Tier-1 (AT1) बॉन्ड में फंड हाउस के निवेश से जुड़ा है. मामले से परिचित लोगों के अनुसार, इससे करीब दो साल पहले नियामक की ओर से जारी किया गया कारण बताओ नोटिस बंद हो जाएगा.
सूत्रों ने कहा कि कारण बताओ नोटिस दो साल पहले जारी किया गया था, लेकिन इस पूरे समय में न तो फंड हाउस और न ही उसके अधिकारियों ने कोई जवाब दाखिल किया और सेबी ने भी उनसे ऐसा करने के लिए दबाव नहीं डाला. दो साल, कोई जवाब नहीं. क्या किसी छोटे खिलाड़ी को भी इतनी ही गुंजाइश दी जाती? यह एक ऐसा सवाल है जो उद्योग के बाकी हिस्से में उठ सकता है.
निपटान के तहत निप्पॉन लाइफ इंडिया एस्सेट मैनेजमेंट करीब ₹92.46 करोड़ का भुगतान करेगी, सूत्रों ने कहा. फंड हाउस के सीईओ और वर्तमान में एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के चेयरमैन सुंदीप सिक्का ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे. हेड फंड मैनेजर अमित त्रिपाठी भी ₹2.1 करोड़ का भुगतान करेंगे और पूर्व चीफ रिस्क ऑफिसर मिलिंद नेसारिकर ₹25.83 लाख का भुगतान करेंगे. कुल मिलाकर राशि करीब ₹97 करोड़ है. सूत्रों के अनुसार कुल आंकड़ा ₹97-100 करोड़ के बीच है.
सेबी की सेटलमेंट प्रोसीडिंग्स रेगुलेशन्स के तहत सभी सहमति-आधारित निपटारों की तरह, आवेदक आरोपों को स्वीकार या अस्वीकार किए बिना निपटान राशि का भुगतान करते हैं. आदेश पारित होने के बाद सेबी की ओर से उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो जाती है. यह बाजार नियामक का यह कहने का तरीका है कि "आइए, इस बारे में बात करना बंद करने पर सहमत होते हैं."
वह फाइल जिसने डेस्क बदले
निपटान आदेशों पर सेबी के पूर्णकालिक सदस्य हस्ताक्षर करते हैं. सूत्रों के अनुसार, इस मामले ने वहां पहुंचने के लिए थोड़ा लंबा रास्ता तय किया. सूत्रों के अनुसार, फाइल सबसे पहले पूर्णकालिक सदस्य वर्षनी के पास गई. उन्होंने खुद को इस मामले से अलग कर लिया क्योंकि उस समय उनके कार्यकाल में कुछ ही दिन बचे थे और बाद में उन्हें कार्यकाल में विस्तार मिला. इसके बाद फाइल KVR मूर्ति के पास गई, जिन्होंने अपने साथी पूर्णकालिक सदस्य संदीप प्रधान के साथ मिलकर इस पर हस्ताक्षर किए, सूत्रों ने कहा.
सेबी के नियम किसी फाइल को नए हस्ताक्षरकर्ता तक पहुंचने से नहीं रोकते. लेकिन इतने संवेदनशील मामले में यह एक ऐसा विवरण है जिस पर बाजार पर नजर रखने वाले ध्यान दे सकते हैं.
इस बीच, सीबीआई
यह निपटान ऐसे आपराधिक मामले के साथ असहज रूप से जुड़ा हुआ है, जिसमें निपटारे के कोई संकेत नहीं हैं. सीबीआई पहले ही इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है. यह मामला कथित ₹2,797 करोड़ के quid pro quo arrangement से जुड़ा है, जिसमें उस समय रिलायंस निप्पॉन MF के नाम से जाने जाने वाले फंड हाउस और यस बैंक के बीच संबंध था. एजेंसी ने यस बैंक के पूर्व प्रमुख राणा कपूर और उद्योगपति अनिल अंबानी के खिलाफ आरोप लगाए हैं. सूत्रों ने कहा कि एजेंसी EPFO फंड के कथित दुरुपयोग की भी जांच कर रही है और एक और आरोपपत्र दाखिल किए जाने की उम्मीद है.
सेबी का निपटान, सेबी की अपनी कार्यवाही को समाप्त करता है. यह सीबीआई पर बाध्यकारी नहीं है और न ही इसका आपराधिक अभियोजन पर कोई असर पड़ता है. इसलिए नियामक ने अपना मामला बंद कर दिया है, जबकि जांच एजेंसी अपनी जांच को आगे बढ़ा रही है.
कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि घटनाक्रम का यह क्रम असहज मिसाल कायम कर सकता है. यदि किसी नियामक द्वारा उसी तथ्यों पर चल रही आपराधिक जांच के दौरान मामला निपटाया जाता है, तो इससे मिले-जुले संकेत जाने का जोखिम रहता है. आखिरकार, इसका असर मायने रख सकता है.
दो आवेदक अंदर, दो बाहर
सूत्रों ने कहा कि इसी मामले में सेबी ने अनिल अंबानी और राणा कपूर के निपटान आवेदनों को खारिज कर दिया.
सिक्योरिटीज वकीलों ने कहा कि इस विभाजित नतीजे को चुनौती दिए जाने की संभावना है. दोनों व्यक्ति अदालतों (Securities Appellate Tribunal) के सामने यह तर्क दे सकते हैं कि एक ही लेनदेन में शामिल आवेदकों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया गया. एक वकील ने कहा कि सेबी जैसी अनुभवी नियामक संस्था इस संभावना से अच्छी तरह वाकिफ होगी. अधिक दिलचस्प सवाल यह है कि वह इस अंतर का बचाव किस तरह करेगी.
इन आवेदनों की समीक्षा सेबी की हाई पॉवर्ड एडवाइजरी कमेटी (HPAC) ने की, जो निपटान आदेशों और अपराधों के समझौते से जुड़े मामलों पर विचार करती है. समिति की अध्यक्षता कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जय नारायण पटेल करते हैं. इसके अन्य सदस्यों में पूर्व कानून सचिव पी.के. मल्होत्रा, एस.के मोहंती, IRS (सेवानिवृत्त) और सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य, तथा डेलॉइट इंडिया के पूर्व मैनेजिंग पार्टनर और सीईओ एन. वेंकटराम शामिल हैं. समिति निपटान की शर्तों की सिफारिश करती है और अंतिम फैसला पूर्णकालिक सदस्य करते हैं.
सयोनारा, कारण बताओ नोटिस
सूत्रों के मुताबिक, समय का यह मेल शायद ही इससे अधिक सौहार्दपूर्ण हो सकता था. भारत-जापान संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. 22 जुलाई को मुंबई में जापान की कॉन्सुल-जनरल सातो हितोमी ने सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे से शिष्टाचार मुलाकात की. जापानी कॉन्सुलेट के अनुसार, दोनों पक्षों ने वित्तीय क्षेत्र की गतिविधियों और दोनों देशों के बीच सहयोग पर चर्चा की.
सूत्रों ने कहा कि फंड हाउस की जापानी पैरेंट कंपनी निप्पॉन लाइफ भी भारत और जापान के बीच एक क्रिकेट मैच आयोजित कर रही है. सेबी के चेयरमैन ने हाल ही में उत्तर भारत के एक राज्य में निप्पॉन इंडिया की एक शाखा का दौरा किया. सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने सितंबर 2026 में लेह, जम्मू-कश्मीर/लद्दाख क्षेत्र का दौरा किया था, जहां उन्होंने सेना के जवानों के लिए AMFI की ओर से आयोजित इन्वेस्टर्स अवेयरनेस प्रोग्राम को संबोधित किया.
मामले से परिचित एक व्यक्ति ने कहा कि जापान के सबसे बड़े वित्तीय समूहों में से एक के साथ निपटान द्विपक्षीय संबंधों के लिए "काफी मददगार साबित हो सकता है." बेशक, कोई भी इन घटनाक्रमों के बीच किसी संबंध का सुझाव नहीं दे रहा है. ये महज संयोग हैं.
सिक्का के लिए यह निपटान ऐसे समय में नियामकीय दबाव को हटा देता है, जब उनका प्रोफाइल पहले कभी इतना ऊंचा नहीं रहा. AMFI के चेयरमैन के तौर पर वह ऐसे उद्योग का सार्वजनिक चेहरा हैं, जो ₹75 लाख करोड़ से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करता है.
अगली कतार में: Quant
निप्पॉन का आदेश इस सीजन का एकमात्र बड़ा निपटान नहीं हो सकता. सूत्रों के अनुसार, सेबी से क्वांट म्यूचुअल फंड (Quant Mutual Fund) के फ्रंट रनिंग मामले में निपटान आवेदन पर भी फैसला आने की उम्मीद है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
सर्वे के अनुसार, सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र में नए कारोबार में तेजी आई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग में सुधार हुआ, हालांकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नए ऑर्डर की वृद्धि अधिक मजबूत रही.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में सुधार देखने को मिला है. HSBC के फ्लैश परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में आउटपुट और नए ऑर्डर बढ़ने से निजी क्षेत्र की गतिविधियां तीन महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं. सितंबर में कंपोजिट फ्लैश PMI अगस्त के 54.3 से बढ़कर 56.5 हो गया.
62 महीने से 50 के स्तर से ऊपर PMI
S&P Global की ओर से तैयार HSBC फ्लैश PMI लगातार 62वें महीने 50 के महत्वपूर्ण स्तर से ऊपर रहा. PMI में 50 से ऊपर का आंकड़ा निजी क्षेत्र की गतिविधियों में विस्तार और 50 से नीचे का स्तर गिरावट को दर्शाता है.
सर्वे के अनुसार, सितंबर में भारत के निजी क्षेत्र में नए कारोबार में तेजी आई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग में सुधार हुआ, हालांकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नए ऑर्डर की वृद्धि अधिक मजबूत रही. कुल नए कारोबार में वृद्धि सात महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई.
मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों में सुधार
HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI अगस्त के 52.8 से बढ़कर सितंबर में 55.7 हो गया. वहीं, फ्लैश इंडिया सर्विसेज PMI बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स 54.1 से बढ़कर 55.8 पर पहुंच गया.
सर्विस सेक्टर में मार्केटिंग गतिविधियों के साथ नए ऑर्डर बढ़े. प्रॉपर्टी, ट्रांसपोर्ट, ट्रैवल, सॉफ्टवेयर और डिजिटल सॉल्यूशंस जैसी सेवाओं की मांग में सुधार दर्ज किया गया. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में एल्युमीनियम, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य उत्पादों, दवाओं और नए प्रोडक्ट मॉडल की मांग बढ़ी. इससे फैक्ट्रियों में उत्पादन और नए ऑर्डर दोनों को समर्थन मिला.
HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में तेज सुधार ने निजी क्षेत्र की गतिविधियों को गति दी. उन्होंने कहा कि आउटपुट और घरेलू नए ऑर्डर में तेजी रही, हालांकि मिडिल ईस्ट में बढ़े तनाव के बीच कंपनियां अनिश्चितताओं से निपटने के लिए सुरक्षा उपाय भी कर रही हैं.
एक्सपोर्ट ऑर्डर बढ़े, लेकिन रफ्तार धीमी
सितंबर में नए एक्सपोर्ट ऑर्डर में भी बढ़ोतरी जारी रही. हालांकि, इन ऑर्डर की वृद्धि दर पिछले तीन वर्षों में सबसे धीमी रही. इसके बावजूद घरेलू मांग में सुधार ने कंपनियों की कुल ऑर्डर बुक को मजबूती दी.
नए ऑर्डर और उत्पादन बढ़ने के साथ सितंबर में रोजगार में भी बढ़ोतरी हुई. मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में कंपनियों ने नई नियुक्तियां कीं और दोनों क्षेत्रों में रोजगार बढ़ने की रफ्तार लगभग समान रही.
इनपुट लागत का दबाव घटा
सर्वे के मुताबिक, निजी क्षेत्र में इनपुट लागत बढ़ने की रफ्तार जनवरी के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गई. सर्विस कंपनियों पर लागत का दबाव कम होने से मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में बढ़ी लागत का असर काफी हद तक संतुलित हुआ. हालांकि, कुछ कंपनियों ने इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट्स, खाद्य उत्पादों, ईंधन, धातुओं, दवाओं और टेक्नोलॉजी संसाधनों की लागत बढ़ने की जानकारी दी.
सितंबर में कंपनियों ने बिक्री कीमतों में भी बढ़ोतरी की. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में फैक्ट्री-गेट कीमतों में बढ़ोतरी की रफ्तार तेज हुई, जबकि सर्विस कंपनियों की ओर से ली जाने वाली कीमतों में वृद्धि की गति कुछ धीमी रही.
तैयार माल का स्टॉक साढ़े 11 साल के उच्च स्तर पर
भंडारी के मुताबिक, इनपुट की खरीदारी में तेजी आई है और तैयार माल के स्टॉक का इंडेक्स करीब साढ़े 11 साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया है. मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ने के कारण आउटपुट कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है. यह कंपनियों की मार्जिन को बनाए रखने की कोशिश को दर्शाता है.
फ्लैश PMI पूरे महीने के PMI के शुरुआती संकेत देता है. यह महीने के दौरान मिले करीब 90 फीसदी सर्वे जवाबों पर आधारित होता है. मैन्युफैक्चरिंग PMI का अंतिम आंकड़ा 1 अक्टूबर और सर्विस PMI का अंतिम आंकड़ा 6 अक्टूबर को जारी किया जाएगा.
FY26 में रक्षा उत्पादन 15.6% बढ़ा, निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी भी बढ़कर 24% हुई; भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पादों का निर्यात कर रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का रक्षा विनिर्माण क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा उत्पादन बढ़कर रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष के ₹1.54 लाख करोड़ से 15.6% अधिक है. इसी अवधि में रक्षा निर्यात भी 62.66% बढ़कर ₹38,424 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद निर्यात कर रहा है.
रक्षा क्षेत्र में घरेलू उत्पादन बढ़ने के साथ निजी कंपनियों की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है. FY26 में रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर 24% हो गई, जो FY25 में 22% थी. निजी क्षेत्र का उत्पादन करीब ₹42,000 करोड़ रहा.
80 से ज्यादा देशों तक पहुंचा भारतीय रक्षा निर्यात
भारत के रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, FY14 में जहां रक्षा निर्यात महज ₹686 करोड़ था, वहीं FY26 में यह बढ़कर ₹38,424 करोड़ हो गया. यानी करीब 12 वर्षों में इसमें 56 गुना से ज्यादा की वृद्धि हुई है.
सरकार ने FY29 तक सालाना रक्षा उत्पादन को ₹3 लाख करोड़ और रक्षा निर्यात को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. इससे आने वाले वर्षों में घरेलू रक्षा विनिर्माण और निर्यात बाजार के विस्तार की दिशा स्पष्ट होती है.
स्वदेशीकरण पर जोर, हजारों उपकरणों का घरेलू उत्पादन
रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता घटाने के लिए सरकार स्वदेशीकरण पर भी जोर दे रही है. मई 2026 तक पांच Positive Indigenisation Lists में 5,012 वस्तुओं को शामिल किया गया था. इसके अलावा पिछले पांच वर्षों में 15,700 से अधिक रक्षा वस्तुओं का स्वदेशीकरण किया गया है. Srijan Defence Equipment Empowerment Platform के जरिए घरेलू कंपनियों, MSME और स्टार्टअप को रक्षा क्षेत्र की सप्लाई चेन से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी
रक्षा उत्पादन में सरकारी कंपनियों का योगदान अभी भी बड़ा है, लेकिन निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है. FY26 में कुल रक्षा उत्पादन में सरकारी क्षेत्र का हिस्सा करीब 76% और निजी क्षेत्र का 24% रहा.
रक्षा निर्यात में भी निजी कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है. FY26 के कुल रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 45.16% रही, जबकि रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी DPSU की हिस्सेदारी 54.84% रही.
रक्षा खरीद से घरेलू कंपनियों को मिल रहा बाजार
घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकारी खरीद में भी घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता दी जा रही है. FY27 के आधुनिकीकरण बजट का 75% घरेलू उद्योग के लिए निर्धारित किए जाने से भारतीय कंपनियों के लिए रक्षा ऑर्डर का दायरा बढ़ा है.
वित्त वर्ष 2026 के दौरान रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब ₹6.8 लाख करोड़ के 55 प्रस्तावों को आवश्यकता की स्वीकृति दी, जबकि करीब ₹2.3 लाख करोड़ के 503 पूंजीगत खरीद प्रस्तावों के अनुबंध किए गए. ये आंकड़े रक्षा कंपनियों के लिए संभावित ऑर्डर पाइपलाइन के बड़े आकार को दिखाते हैं.
वायुसेना, सेना और नौसेना की बड़ी खरीद योजनाएं
रक्षा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तीनों सेनाओं के लिए कई बड़े कार्यक्रम शामिल हैं. भारतीय वायुसेना के लिए मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट, LCA Tejas Mk-II, Su-30 MKI अपग्रेड, अतिरिक्त S-400 सिस्टम और अन्य प्लेटफॉर्म से जुड़े कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं.
वहीं, सेना के लिए Future Infantry Combat Vehicles, Future Ready Combat Vehicles, K9 Vajra-T, QRSAM, Akash-NG, loitering munitions और अगली पीढ़ी के Pinaka सिस्टम जैसे कार्यक्रमों पर काम हो रहा है. नौसेना की योजनाओं में Project 75I, अतिरिक्त स्कॉर्पीन पनडुब्बियां, नई पीढ़ी के फ्रिगेट और मानव रहित प्रणालियां शामिल हैं.
रक्षा R&D और स्टार्टअप इकोसिस्टम पर भी जोर
रक्षा क्षेत्र में उत्पादन क्षमता के साथ रिसर्च और टेक्नोलॉजी विकास पर भी जोर बढ़ा है. सरकार iDEX और ADITI जैसी योजनाओं के जरिए स्टार्टअप और नई रक्षा तकनीकों को बढ़ावा दे रही है. रक्षा R&D के लिए आवंटन भी बढ़ा है और उद्योग, स्टार्टअप तथा अकादमिक संस्थानों की भागीदारी को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है.
उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के रक्षा औद्योगिक गलियारे भी इस विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इनसे रक्षा विनिर्माण, सप्लाई चेन और स्थानीय स्तर पर तकनीकी क्षमता विकसित करने के अवसर बढ़ रहे हैं.
आगे क्या है?
रिकॉर्ड उत्पादन और निर्यात के बावजूद भारतीय रक्षा उद्योग के सामने तकनीकी क्षमता, वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने और जटिल रक्षा प्रणालियों में घरेलू तकनीक विकसित करने जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं. ऐसे में आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ उच्च तकनीक वाले रक्षा उत्पादों के निर्यात और वैश्विक सप्लाई चेन में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ाना क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रहेगा.
जून तिमाही में 7.8% की मजबूत GDP ग्रोथ के बाद रेटिंग एजेंसी ने बढ़ाया FY27 का अनुमान; मजबूत खपत, औद्योगिक गतिविधियों, निर्यात और सरकारी निवेश से अर्थव्यवस्था को मिला सहारा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की मजबूत आर्थिक रफ्तार ने वैश्विक रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings को चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है. एजेंसी ने भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान 6.6% से बढ़ाकर 7% कर दिया है. S&P का कहना है कि मजबूत औद्योगिक गतिविधियां, घरेलू खपत, वस्तुओं के निर्यात में मजबूती और सरकारी निवेश अर्थव्यवस्था की रफ्तार को सहारा दे रहे हैं.
भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 7.8% की GDP ग्रोथ दर्ज की. इस मजबूत प्रदर्शन के बाद S&P ने पूरे वित्त वर्ष के अनुमान में बढ़ोतरी की है.
दूसरी छमाही में धीमी हो सकती है ग्रोथ
S&P के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है. रेटिंग एजेंसी का मानना है कि GST में किए गए बदलाव और इनकम टैक्स में कटौती से अर्थव्यवस्था को मिलने वाला शुरुआती फायदा धीरे-धीरे कम हो सकता है.
इसके अलावा मौसम से जुड़े जोखिम भी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं. 9 सितंबर 2026 तक देश में कुल बारिश सामान्य से करीब 15% कम रही थी. ऐसे में कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर मौसम का असर आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण रहेगा.
महंगाई के दबाव पर भी S&P की नजर
S&P ने वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की औसत खुदरा महंगाई 5.1% रहने का अनुमान लगाया है. मजबूत आर्थिक गतिविधियों के साथ महंगाई का दबाव बढ़ने की स्थिति में मौद्रिक नीति पर भी असर पड़ सकता है.
रेटिंग एजेंसी के अनुसार, मजबूत ग्रोथ, महंगाई का दबाव, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और मौसम से जुड़े जोखिमों के बीच RBI चालू वित्त वर्ष में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25% की बढ़ोतरी कर सकता है.
जून तिमाही में किन क्षेत्रों ने दिया ग्रोथ को सहारा?
अप्रैल-जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर से समर्थन मिला. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 9.2% और सर्विसेज में करीब 10% की वृद्धि दर्ज की गई.
इसके अलावा घरेलू मांग, निवेश और निर्यात में मजबूती ने भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पहली तिमाही में निवेश 11.9%, घरेलू खपत 7.1% और निर्यात 12% बढ़ा.
Moody's ने भी बढ़ाया था भारत की ग्रोथ का अनुमान
S&P से पहले Moody's ने भी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% किया था. एजेंसी ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की मजबूत वृद्धि को भारत की आर्थिक मजबूती का संकेत बताया था, हालांकि उसने पश्चिम एशिया के तनाव, ऊर्जा कीमतों और खाद्य महंगाई को जोखिम के तौर पर रेखांकित किया था.
इस बीच, भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान अलग-अलग एजेंसियों में अलग है. ऐसे में आगे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार पर घरेलू मांग, महंगाई, ऊर्जा कीमतों, मानसून और वैश्विक परिस्थितियों का असर महत्वपूर्ण रहेगा.
UAE के सेंट्रल बैंक ने रिटेल पेमेंट सर्विसेज और कार्ड स्कीम्स तथा स्टोर्ड वैल्यू फैसिलिटीज के लिए दी इन-प्रिंसिपल अप्रूवल; कारोबार शुरू करने से पहले लेनी होगी अंतिम मंजूरी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
डिजिटल पेमेंट कंपनी फोनपे (PhonePe) को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के सेंट्रल बैंक (CBUAE) से दो पेमेंट लाइसेंस के लिए सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है. यह मंजूरी कंपनी को UAE में अपना स्थानीय रूप से विनियमित अंतरराष्ट्रीय कारोबार शुरू करने के करीब ले जाती है. हालांकि, वाणिज्यिक परिचालन शुरू करने से पहले PhonePe को नियामक की अंतिम मंजूरी हासिल करनी होगी.
CBUAE की ओर से मिली मंजूरी में रिटेल पेमेंट सर्विसेज और कार्ड स्कीम्स (RPSCS) तथा स्टोर्ड वैल्यू फैसिलिटीज (SVF) शामिल हैं. यह मंजूरी शुरुआती नियामकीय जांच और ड्यू डिलिजेंस प्रक्रिया पूरी होने के बाद मिली है.
UAE में स्थानीय साझेदारों के साथ काम करेगी कंपनी
अंतिम मंजूरी मिलने के बाद PhonePe UAE के पेमेंट इकोसिस्टम में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय बैंकों, लाइसेंस प्राप्त पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और स्थानीय टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ काम करने की योजना बना रही है.
कंपनी का फोकस UAE में उपभोक्ताओं और कारोबारों के लिए डिजिटल पेमेंट सेवाओं को सपोर्ट करने पर होगा. इसके लिए PhonePe अपनी टेक्नोलॉजी और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को UAE की मौजूदा वित्तीय व्यवस्था के साथ जोड़ने की दिशा में काम करेगी.
UAE के Aani और Jaywan से जुड़ने की योजना
PhonePe ने UAE के इंस्टेंट पेमेंट प्लेटफॉर्म Aani और घरेलू कार्ड स्कीम Jaywan के लिए भी अपनी टेक्नोलॉजी के जरिए संभावनाएं तलाशने की बात कही है. कंपनी के मुताबिक, भारत में उसका पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर 70 करोड़ से अधिक रजिस्टर्ड यूजर्स और करीब 5 करोड़ कारोबारियों को सेवाएं देता है. UAE में प्रस्तावित कारोबार के जरिए कंपनी डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में उपभोक्ताओं और कारोबारियों को सेवाएं देने के साथ स्थानीय वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ मिलकर काम करेगी.
PhonePe का यह विस्तार UAE के फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम (Financial Infrastructure Transformation Programme) और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की सरकार की व्यापक रणनीति के अनुरूप है.
भारत से UAE जाने वाले यात्रियों के लिए पहले से मौजूद है सेवा
PhonePe की UAE में पूरी तरह नई एंट्री नहीं होगी. कंपनी पहले से NPCI इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL) के साथ क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट व्यवस्था के जरिए UAE में मौजूद है.
भारत से UAE जाने वाले यात्री PhonePe के जरिए स्थानीय QR कोड स्कैन करके भुगतान कर सकते हैं. इसके लिए UAE में NEOPAY और Network International के टर्मिनलों का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, नए लाइसेंस मिलने के बाद PhonePe की भूमिका केवल विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों को पेमेंट सुविधा देने तक सीमित नहीं रहेगी. अंतिम मंजूरी के बाद कंपनी UAE में एक विनियमित पेमेंट कारोबार संचालित कर सकेगी.
UAE बन सकता है PhonePe का पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार
PhonePe अपनी टेक्नोलॉजी और स्थानीय साझेदारियों के जरिए UAE, भारत और अन्य वैश्विक बाजारों के बीच पेमेंट गतिविधियों को सपोर्ट करने की योजना बना रही है. अंतिम नियामकीय मंजूरी मिलने और वाणिज्यिक परिचालन शुरू होने के बाद UAE, PhonePe का पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार बन सकता है. यह कदम कंपनी की भारत से बाहर विस्तार करने की रणनीति में अहम माना जा रहा है.
30 दिन तक की वैधता वाले वॉइस और SMS-ओनली प्लान लाना होगा, कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों और दूसरी सिम रखने वालों को मिल सकता है फायदा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टेलीकॉम ग्राहकों के लिए रिचार्ज को लेकर राहत की खबर है. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने टेलीकॉम कंपनियों को ऐसे स्पेशल टैरिफ वाउचर (STV) उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है, जिनमें सिर्फ वॉइस कॉल और SMS की सुविधा होगी. इन प्लान में डेटा शामिल नहीं होगा और इनकी वैधता अधिकतम 30 दिन तक रखी जा सकेगी. इसका फायदा खासतौर पर उन ग्राहकों को मिल सकता है, जिन्हें मोबाइल डेटा की जरूरत कम या बिल्कुल नहीं है.
TRAI ने यह बदलाव दूरसंचार उपभोक्ता संरक्षण विनियम, 2024 में संशोधन के जरिए किया है. नियामक के मुताबिक, मौजूदा समय में केवल वॉइस और SMS की सुविधा वाले प्लान सीमित हैं, जबकि लंबी वैधता वाले प्लान ज्यादा उपलब्ध हैं. ऐसे में कम आय वाले और कम अवधि के लिए रिचार्ज करने वाले ग्राहकों के पास सस्ते विकल्प सीमित हैं.
ग्राहकों को अपनी जरूरत के हिसाब से रिचार्ज का विकल्प
TRAI का कहना है कि नए नियमों से ग्राहकों को अपनी जरूरत और आर्थिक क्षमता के हिसाब से मोबाइल प्लान चुनने की ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी. जिन लोगों को इंटरनेट डेटा की जरूरत नहीं है, उन्हें ऐसे प्लान के लिए भुगतान नहीं करना पड़ेगा जिसमें डेटा भी शामिल हो.
इसका फायदा बुजुर्ग ग्राहकों, फीचर फोन इस्तेमाल करने वालों, कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों और दूसरी सिम को एक्टिव रखने वाले लोगों को मिल सकता है. ऐसे ग्राहक अब सिर्फ कॉल और SMS की जरूरत के मुताबिक कम कीमत वाला रिचार्ज चुन सकेंगे.
टेलीकॉम कंपनियों की कमाई पर क्या होगा असर?
नए नियम से ग्राहकों को विकल्प तो बढ़ेंगे, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के औसत प्रति ग्राहक राजस्व (ARPU) पर दबाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है. खासतौर पर ऐसे ग्राहक, जो अभी डेटा वाले पैक लेते हैं लेकिन उसका बहुत कम इस्तेमाल करते हैं, वे वॉइस-ओनली प्लान का रुख कर सकते हैं. इससे प्रति ग्राहक मिलने वाला औसत राजस्व घट सकता है.
डेलॉयट साउथ एशिया के पार्टनर और TMT इंडस्ट्री लीडर रोहन लोबो के मुताबिक, करीब 90 फीसदी मोबाइल कनेक्शन प्रीपेड हैं. ऐसे में कंपनियों के लिए केवल एक रिचार्ज से मिलने वाली रकम ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि ग्राहक कितनी नियमितता से रिचार्ज करता है, यह भी अहम है.
उनके अनुसार, कुछ ग्राहक सस्ते वॉइस-ओनली प्लान पर जा सकते हैं, जिससे ARPU पर दबाव आ सकता है. हालांकि, ऐसे प्लान कीमत के प्रति संवेदनशील ग्राहकों को बनाए रखने और दूसरी सिम को एक्टिव रखने में मदद कर सकते हैं. कुल राजस्व पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रिचार्ज की नियमितता बढ़ने से कम कीमत वाले प्लान से होने वाली कमाई की कितनी भरपाई हो पाती है.
कम डेटा इस्तेमाल करने वालों पर ज्यादा असर
PwC India में टेलीकॉम प्रैक्टिस के लीडर विनिश बावा के मुताबिक, नए नियम से ARPU में कुछ कमी आ सकती है, लेकिन इसका असर बहुत ज्यादा होने की उम्मीद नहीं है. इसका प्रभाव खासतौर पर कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों, बुजुर्गों और दूसरी सिम रखने वाले लोगों पर पड़ सकता है.
वॉइस-ओनली प्लान उपलब्ध होने से कंपनियों के लिए मौजूदा प्रीपेड प्लान में डेटा जोड़कर रिचार्ज की कीमत बढ़ाने की गुंजाइश कुछ कम हो सकती है. हालांकि, ज्यादा डेटा इस्तेमाल करने वाले स्मार्टफोन यूजर्स की जरूरत पहले की तरह डेटा प्लान से पूरी होती रहेगी.
कंपनियों के सामने ग्राहकों को बनाए रखने की चुनौती
नए नियमों के बाद टेलीकॉम कंपनियों को अलग-अलग तरह के ग्राहकों के लिए प्लान तैयार करने पर ज्यादा ध्यान देना होगा. ज्यादा डेटा, तेज इंटरनेट स्पीड, बेहतर नेटवर्क और अतिरिक्त सेवाओं के लिए अधिक भुगतान करने वाले ग्राहकों के लिए कंपनियां प्रीमियम प्लान पेश कर सकती हैं.
वहीं, कम खर्च करने वाले ग्राहकों को बनाए रखने के लिए वॉइस और SMS-ओनली प्लान महत्वपूर्ण हो सकते हैं. इससे ऐसी दूसरी सिम को भी एक्टिव रखने में मदद मिल सकती है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कॉल या SMS के लिए किया जाता है.
इस तरह TRAI का यह बदलाव एक तरफ कम डेटा इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों के लिए रिचार्ज के विकल्प बढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर टेलीकॉम कंपनियों के लिए ग्राहकों के खर्च और ARPU को बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ा सकता है.
ICICI सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, डिपॉजिट जुटाने की लागत अब बैंकों के लिए बड़ा अंतर पैदा करने वाला कारक बन रही है. कम फंडिंग कॉस्ट से बैंकों को मार्जिन बनाए रखने और कर्ज कारोबार बढ़ाने में मदद मिलती है
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय बैंकों के लिए डिपॉजिट और अन्य देनदारियों पर आने वाली लागत यानी कॉस्ट ऑफ फंड्स (CoF) अब मुनाफे और ग्रोथ को प्रभावित करने वाला अहम कारक बन गई है. ICICI सिक्योरिटीज की 22 सितंबर को जारी सेक्टर रिपोर्ट के मुताबिक, फंडिंग की लागत का असर बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM), क्रेडिट कॉस्ट, लोन ग्रोथ और यहां तक कि निवेशकों के वैल्यूएशन पर भी पड़ रहा है. रिपोर्ट में एचडीएफसी बैंक (HDFC) की फंडिंग स्थिति में सुधार के बावजूद CASA हिस्सेदारी में एक्सिस बैंक (Axis) से अंतर को एक महत्वपूर्ण चुनौती बताया गया है.
कम फंडिंग कॉस्ट से मार्जिन को सहारा
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन बैंकों की फंडिंग कॉस्ट कम होती है, उनके पास अपने मार्जिन को बनाए रखने और बिना ज्यादा जोखिम लिए लोन बुक बढ़ाने की गुंजाइश अधिक रहती है. परंपरागत रूप से CASA यानी करंट अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट में जमा को बैंक की सस्ती फंडिंग का अहम संकेतक माना जाता है. हालांकि, बैंक की कुल फंडिंग लागत केवल CASA पर निर्भर नहीं करती. इसमें सेविंग्स अकाउंट पर दी जाने वाली ब्याज दर, टर्म डिपॉजिट, उधारी और बैंक की नेटवर्थ भी भूमिका निभाते हैं.
महंगे फंड से NIM पर दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बड़ी संख्या में लोन के बाहरी बेंचमार्क से जुड़े होने के कारण बैंकों के लिए फंडिंग लागत बढ़ने का पूरा बोझ ग्राहकों पर डालना आसान नहीं है. ऐसे में डिपॉजिट की लागत बढ़ने पर बैंकों के NIM पर दबाव आ सकता है. ICICI सिक्योरिटीज ने फंडिंग कॉस्ट और मध्यम अवधि की क्रेडिट कॉस्ट के बीच भी संबंध का उल्लेख किया है. ज्यादा फंडिंग लागत वाले बैंकों को समान रिटर्न हासिल करने के लिए अधिक जोखिम वाले कर्ज की ओर जाने का दबाव हो सकता है. वहीं, कम फंडिंग कॉस्ट बैंकों को जोखिम बढ़ाए बिना बेहतर रिटर्न बनाए रखने में मदद कर सकती है.
एचडीएफसी बैंक की फंडिंग स्थिति में सुधार
रिपोर्ट के मुताबिक, विलय के बाद एचडीएफसी बैंक ने अपनी फंडिंग प्रोफाइल में सुधार किया है. बैंक की कुल फंडिंग में उधारी की हिस्सेदारी घटकर करीब 13 फीसदी रह गई है, जो विलय के बाद के 25 फीसदी के उच्च स्तर से काफी कम है. हालांकि, बैंक की CASA हिस्सेदारी अभी भी एक्सिस बैंक से करीब 600 बेसिस पॉइंट कम है. यह अंतर एचडीएफसी बैंक की फंडिंग कॉस्ट पर दबाव बनाए रखने वाला एक कारक है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी बैंक की फंडिंग लागत में दूसरे बैंकों की तुलना में बदलाव उसके वैल्यूएशन को भी प्रभावित कर सकता है. उदाहरण के लिए, कोटक महिंद्रा बैंक की FY17-19 के दौरान फंडिंग कॉस्ट में सुधार को उसके री-रेटिंग के पीछे एक कारण बताया गया है. वहीं, विलय के बाद एचडीएफसी बैंक की फंडिंग स्थिति में आई कमजोरी को उसके बाद हुए डी-रेटिंग के कारणों में शामिल किया गया है.
इन बैंकों पर भी रिपोर्ट की नजर
ICICI सिक्योरिटीज ने फेडरल बैंक, आरबीएल बैंक, करुर व्यस्य बैंक, इंडियन बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र का भी फंडिंग कॉस्ट और ग्रोथ के संदर्भ में विश्लेषण किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, फेडरल बैंक के हालिया री-रेटिंग में बेहतर फंडिंग कॉस्ट और CASA प्रदर्शन की भूमिका रही है. वहीं, आरबीएल बैंक के लिए FCNR(B) डिपॉजिट लंबे समय की जमा बढ़ाने का एक अवसर हो सकता है.
CASA और टर्म डिपॉजिट का असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि आमतौर पर CASA का हिस्सा बढ़ने पर डिपॉजिट की लागत कम होने की संभावना रहती है. हालांकि, ज्यादा सेविंग अकाउंट ब्याज देने वाले बैंक इस सामान्य प्रवृत्ति से अलग हो सकते हैं.
Q1FY27 के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि जो बैंक अपेक्षाकृत महंगे टर्म डिपॉजिट पर ज्यादा निर्भर हैं, उन्हें तेज ग्रोथ के दौरान फंडिंग कॉस्ट को नियंत्रित करने में अधिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
बैंकों के सामने संतुलन की चुनौती
बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती डिपॉजिट जुटाने और उसकी लागत को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाने की है. डिपॉजिट पर ब्याज दर कम करने से फंडिंग कॉस्ट घट सकती है, लेकिन इससे नई जमा जुटाने और ग्रोथ पर असर पड़ सकता है. दूसरी ओर, ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ज्यादा ब्याज देने से डिपॉजिट बढ़ सकता है, लेकिन इससे मार्जिन पर दबाव आ सकता है.
ICICI सिक्योरिटीज के मुताबिक, FCNR(B) डिपॉजिट कोटक महिंद्रा बैंक और आरबीएल जैसे बैंकों के लिए लंबी अवधि की जमा बढ़ाने का एक विकल्प हो सकता है. ऐसे में आने वाले समय में डिपॉजिट की संरचना, CASA हिस्सेदारी और फंडिंग कॉस्ट बैंकिंग सेक्टर के प्रदर्शन के अहम संकेतक बने रह सकते हैं.
सेबी के मौजूदा निपटान आदेश में जिन मामलों का निपटारा किया गया है, वे संबंधित पक्ष लेनदेन के खुलासे और ऑडिट रिपोर्ट से जुड़े कथित अनुपालन उल्लंघनों पर केंद्रित हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अडानी ग्रुप की पांच कंपनियों के खिलाफ नियमों के कथित उल्लंघन से जुड़े मामलों का निपटारा कर दिया है. यह कार्रवाई जनवरी 2023 में हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट सामने आने के बाद अडानी ग्रुप से जुड़े मामलों की सेबी की जांच के तहत हुई. निपटान की शर्तों के तहत इन पांच कंपनियों ने कुल करीब 1.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया है.
इन कंपनियों के खिलाफ था मामला
सेबी के निपटान आदेश के मुताबिक, मामले में अडानी ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज, अडानी टोटल गैस, एब्ल्यूएल एग्री बिजनेस (पूर्व में अडानी विल्मर), अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस (पूर्व में अडानी ट्रांसमिशन) शामिल हैं. मामला कुछ संबंधित पक्षों के लेनदेन यानी Related Party Transactions का आवश्यक खुलासा नहीं करने और ऐसी ऑडिट फर्मों से ऑडिट या सीमित समीक्षा रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कराए जाने से जुड़ा था, जिनके पास वैध पीयर रिव्यू प्रमाणपत्र नहीं था.
कंपनियों ने कितना भुगतान किया?
निपटान के तहत अडानी एंटरप्राइजेज ने 76.05 लाख रुपये और अडानी ग्रीन एनर्जी ने 45.50 लाख रुपये का भुगतान किया. वहीं, अडानी टोटल गैस, एब्ल्यूएल एग्री बिजनेस और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस ने 9.75-9.75 लाख रुपये का भुगतान किया. इस तरह पांचों कंपनियों की ओर से कुल करीब 1.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया.
हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद शुरू हुई थी जांच
सेबी की यह पड़ताल अडानी ग्रुप के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च की जनवरी 2023 की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों की जांच के व्यापक दायरे का हिस्सा थी. नियामक ने सूचीबद्धता से जुड़े नियमों और उस समय लागू लिस्टिंग एग्रीमेंट के संभावित उल्लंघनों की भी जांच की थी.
जनवरी 2023 में हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट जारी होने के बाद अडानी ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट देखी गई थी. रिपोर्ट में ग्रुप पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिन्हें अडानी ग्रुप ने खारिज किया था. सेबी के मौजूदा निपटान आदेश में जिन मामलों का निपटारा किया गया है, वे संबंधित पक्ष लेनदेन के खुलासे और ऑडिट रिपोर्ट से जुड़े कथित अनुपालन उल्लंघनों पर केंद्रित हैं.
WEF के अनुसार, सर्वे में शामिल 98 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले एक साल में भारत में औसत या उससे बेहतर आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास संभावनाओं को लेकर वैश्विक अर्थशास्त्रियों का भरोसा बढ़ा है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के सितंबर 2026 के ‘चीफ इकोनॉमिस्ट्स आउटलुक’ के मुताबिक, सर्वे में शामिल 74 फीसदी मुख्य अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में भारत में मजबूत या बहुत मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है. मई में यह आंकड़ा 52 फीसदी था. इस तरह कुछ ही महीनों में भारत के ग्रोथ आउटलुक को लेकर धारणा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है.
WEF के अनुसार, सर्वे में शामिल 98 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले एक साल में भारत में औसत या उससे बेहतर आर्थिक वृद्धि की उम्मीद है. संगठन ने भारत को सर्वे में शामिल क्षेत्रों में सबसे मजबूत ग्रोथ आउटलुक वाला क्षेत्र बताया है. मजबूत घरेलू मांग को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख सहारा माना गया है.
चीन और यूरोप के लिए तस्वीर अलग
भारत के मुकाबले चीन और यूरोप की आर्थिक संभावनाओं को लेकर अर्थशास्त्रियों की राय कमजोर बनी हुई है. चीन में करीब एक-तिहाई मुख्य अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में कमजोर आर्थिक वृद्धि की आशंका है. वहीं, यूरोप सर्वे में सबसे कमजोर क्षेत्र बना हुआ है. 61 फीसदी अर्थशास्त्रियों को यूरोप में कमजोर या बहुत कमजोर ग्रोथ की उम्मीद है.
WEF के आकलन के अनुसार, अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के लिए भी आर्थिक वृद्धि का आउटलुक मजबूत बना हुआ है. हालांकि, इन क्षेत्रों के मुकाबले भारत का समग्र ग्रोथ आउटलुक सबसे मजबूत रहा.
भारत की ग्रोथ उम्मीद 74 फीसदी तक पहुंची
भारत को लेकर अर्थशास्त्रियों की धारणा में बदलाव मई के सर्वे की तुलना में साफ दिखाई देता है. मई 2026 में केवल 52 फीसदी अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में भारत में मजबूत या बहुत मजबूत ग्रोथ की उम्मीद थी. सितंबर में यह आंकड़ा बढ़कर 74 फीसदी हो गया.
WEF ने अगस्त में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान भी बढ़ाकर 6.7 फीसदी किया था. हालांकि, संगठन ने ऊर्जा की ऊंची कीमतों और भू-राजनीतिक जोखिमों को भारत के आर्थिक आउटलुक के लिए प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया है.
घरेलू मांग बनी अर्थव्यवस्था का सहारा
भारत की मजबूत घरेलू मांग को आर्थिक वृद्धि की प्रमुख वजहों में माना जा रहा है. WEF के आकलन के अनुसार, आंतरिक मांग इतनी मजबूत बनी हुई है कि बाहरी जोखिमों के बावजूद अर्थव्यवस्था की वृद्धि को सहारा मिल सकता है.
यह आकलन भारत के हालिया आधिकारिक GDP आंकड़ों से पहले किया गया था. अप्रैल-जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 फीसदी रही थी. उम्मीद से बेहतर आर्थिक प्रदर्शन के बाद कई संस्थानों ने भारत की विकास दर के अनुमान में बदलाव किया है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर भी बढ़ा भरोसा
WEF के सर्वे में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर भी अर्थशास्त्रियों की धारणा में सुधार देखने को मिला है. अब 56 फीसदी मुख्य अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि अगले 12 महीनों में वैश्विक आर्थिक स्थिति स्थिर रहेगी या उसमें सुधार होगा. मई में केवल 11 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने ऐसा अनुमान जताया था. हालांकि, वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने जोखिम अभी भी बने हुए हैं. करीब 97 फीसदी अर्थशास्त्रियों ने भू-राजनीतिक टकरावों को अगले एक साल में अनिश्चितता का संभावित कारण बताया. वहीं, 58 फीसदी अर्थशास्त्रियों को एसेट कीमतों में करेक्शन की आशंका है.
ऊर्जा कीमतें भारत के लिए चुनौती
भारत के मजबूत ग्रोथ आउटलुक के बावजूद ऊर्जा की ऊंची कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं. भारत अपनी तेल जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर आयात बिल, महंगाई और चालू खाते पर पड़ सकता है.
WEF ने भी ऊर्जा की ऊंची कीमतों को भारत की आर्थिक संभावनाओं पर असर डालने वाला प्रमुख जोखिम बताया है. इसके अलावा, पश्चिम एशिया समेत विभिन्न क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अनिश्चितता बढ़ा सकते हैं.
ग्रोथ आउटलुक मजबूत, लेकिन कारोबारी माहौल पर सवाल
भारत के आर्थिक विकास को लेकर भरोसा बढ़ने के बावजूद, मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए कारोबारी माहौल को लेकर तस्वीर उतनी मजबूत नहीं है. मई के सर्वे में भारत को अनुकूल कारोबारी माहौल वाले शीर्ष तीन स्थानों में शामिल करने वाले अर्थशास्त्रियों की हिस्सेदारी 56 फीसदी थी, जो सितंबर में घटकर 40 फीसदी रह गई, यानी, भारत को लेकर वैश्विक अर्थशास्त्रियों का भरोसा मुख्य रूप से उसकी आर्थिक वृद्धि और घरेलू मांग को लेकर मजबूत हुआ है, जबकि निवेश और कारोबारी माहौल से जुड़े कुछ संकेतकों में अभी सुधार की गुंजाइश बनी हुई है.
मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329.00 पर रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार, 23 सितंबर को कारोबार की शुरुआत कमजोर रह सकती है. गिफ्ट निफ्टी के सुस्त संकेतों और एशियाई बाजारों में मिले-जुले कारोबार के बीच घरेलू बाजार पर दबाव बना रहने की आशंका है. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार जारी नरमी बाजार के लिए कुछ राहत दे सकती है. निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, रुपये की चाल और वैश्विक बाजारों के रुख पर रहेगी. इससे पहले मंगलवार को शुरुआती बढ़त के बावजूद सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुए थे.
मंगलवार को 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 फीसदी गिरकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई का निफ्टी 85.30 अंक यानी 0.36 फीसदी की गिरावट के साथ 23,329.00 पर रहा. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 23 गिरावट में रहे, जबकि निफ्टी के 50 शेयरों में 35 शेयर लाल निशान में बंद हुए.
गिफ्ट निफ्टी और ग्लोबल संकेतों पर नजर
बुधवार के कारोबार से पहले गिफ्ट निफ्टी के संकेत घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत की ओर इशारा कर रहे हैं. एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला कारोबार देखने को मिल रहा है. ऐसे में निवेशकों की नजर अमेरिकी और एशियाई बाजारों के रुझान के साथ डॉलर-रुपये की चाल पर रहेगी. पश्चिम एशिया में जारी तनाव भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकता है.
क्रूड में नरमी से बाजार को राहत
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट भारतीय शेयर बाजार के लिए राहत देने वाला संकेत है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 99 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया है, जबकि अमेरिकी WTI 90 डॉलर प्रति बैरल के नीचे कारोबार कर रहा है. बुधवार सुबह नवंबर डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड 0.48 फीसदी गिरकर 98.77 डॉलर प्रति बैरल पर था. वहीं, नवंबर डिलीवरी वाला WTI 0.85 फीसदी की गिरावट के साथ 89.75 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. पिछले छह कारोबारी सत्रों में ब्रेंट क्रूड की कीमत 9 फीसदी से ज्यादा गिर चुकी है.
शुरुआती बढ़त के बाद मंगलवार को फिसला बाजार
मंगलवार को घरेलू बाजार की शुरुआत बढ़त के साथ हुई थी. सेंसेक्स 74,901.50 पर, जबकि निफ्टी 23,454.05 पर खुला था. हालांकि, कारोबार बढ़ने के साथ शुरुआती तेजी कमजोर पड़ गई और दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए.
सेंसेक्स 329.91 अंक टूटकर 74,529.08 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 85.30 अंक गिरकर 23,329.00 पर रहा. सेंसेक्स के 30 शेयरों में केवल 7 शेयर बढ़त में रहे, जबकि 23 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. निफ्टी में भी 35 शेयर नुकसान में बंद हुए.
FII की बिकवाली बनी चुनौती
विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी घरेलू बाजार के लिए दबाव का एक प्रमुख कारण बनी हुई है. 21 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय शेयर बाजार में 576 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की थी. इसके मुकाबले घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने 2,797 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की.
घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी से बाजार को कुछ सहारा मिला है, लेकिन विदेशी पूंजी के प्रवाह और वैश्विक बाजारों की दिशा पर निवेशकों की नजर बनी हुई है.
मंगलवार को इन शेयरों में रही हलचल
सेंसेक्स में इटरनल 1.94 फीसदी की बढ़त के साथ प्रमुख गेनर रहा. इंडिगो 1.58 फीसदी, टाइटन 0.72 फीसदी, टाटा स्टील 0.60 फीसदी और एनटीपीसी 0.15 फीसदी चढ़े. दूसरी ओर, बजाज फिनसर्व 1.62 फीसदी, ट्रेंट 1.47 फीसदी, बजाज फाइनेंस 1.46 फीसदी, सन फार्मा 1.28 फीसदी और टीसीएस 1.13 फीसदी की गिरावट के साथ प्रमुख लूजर रहे.
निफ्टी में कोल इंडिया 3.21 फीसदी की तेजी के साथ सबसे ज्यादा चढ़ा. इटरनल, इंडिगो, टाइटन और डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज में भी बढ़त रही. वहीं, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, नेस्ले इंडिया, बजाज फिनसर्व, बजाज फाइनेंस और सन फार्मा दबाव में रहे.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज IRB Infrastructure Developers, Pine Labs, Lemon Tree Hotels, Veegaland Developers, LG Electronics India, Allcargo Terminals, Swastika Infra और NATCO Pharma के शेयर अहम कॉरपोरेट अपडेट्स के चलते फोकस में रहेंगे. IRB Infrastructure Developers के बोर्ड ने पुणे और मुंबई स्थित गैर-प्रमुख संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से मोनेटाइज करने की सैद्धांतिक मंजूरी दी है. Mastercard ने Pine Labs में अपनी पूरी 4.31 फीसदी हिस्सेदारी करीब 933.57 करोड़ रुपये में बेच दी है. Lemon Tree Hotels ने महाराष्ट्र के नासिक में अपना पहला होटल Keys Prima by Lemon Tree Hotels शुरू किया है. Veegaland Developers के प्रमोटर और संस्थापक Chittilappilly Thomas Kochuouseph ने कंपनी के 2.69 लाख अतिरिक्त शेयर खरीदे हैं, जो 0.55 फीसदी हिस्सेदारी के बराबर है. LG Electronics India को त्योहारी सीजन में बिक्री में दोहरे अंक की वृद्धि की उम्मीद है और कंपनी एक्सपोर्ट कारोबार का विस्तार करने की योजना बना रही है. Allcargo Terminals का अगस्त 2026 में कंटेनर वॉल्यूम सालाना आधार पर 6 फीसदी बढ़कर 65,600 TEUs रहा. वहीं, NATCO Pharma का बोर्ड 25 सितंबर को करीब 1,300 करोड़ रुपये तक के राइट्स इश्यू पर विचार करेगा.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)