इस बार 73% NRI ITR फाइल करने की तैयारी कर रहे हैं. इसमें से 19% अभी तक फाइल कर चुके हैं जबकि 8% NRI ऐसे हैं जो ITR फाइल करने का इरादा नहीं रखते हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
जुलाई का महीना सामने आते ही आईटीआर फाइल करने की तारीख भी नजदीक आनी शुरू हो जाती है. एक ओर देश में जहां नौकरीपेशा से लेकर कारोबार की दुनिया से जुड़ा शख्स आयकर भरने की तैयारी कर रहा है वहीं सर्वे में ये बात सामने आई है कि इस बार 73 प्रतिशत एनआरआई भी आईटीआर फाइल करने की तैयारी कर रहे हैं. जिन देशों के एनआरआई आईटीआर फाइल करने की तैयारी कर रहे हैं उनमें अमेरिका, कनाडा, यूएई और ब्रिटेन जैसे देशों में रहने वाले भारतीय शामिल हैं.
क्या कह रहे हैं सर्वे के आंकड़े?
SBNRI के सर्वे आंकड़े कह रहे हैं कि इस बार 73 प्रतिशत एनआरआई आईटीआर फाइल करने की तैयारी कर रहे हैं. इसमें से 19 प्रतिशत अभी तक फाइल कर चुके हैं जबकि 8 प्रतिशत एनआरआई ऐसे हैं जो आईटीआर फाइल करने का इरादा नहीं रखते हैं. सर्वे में ये भी आंकड़ा सामने आया है कि अमेरिका के 22 प्रतिशत लोग जुलाई में आईटीआर फाइल करने की तैयारी कर रहे हैं. इनमें से 4 प्रतिशत पहले ही फाइल कर चुके हैं जबकि 3 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो फाइल करने का इरादा नहीं रखते हैं. ब्रिटेन के 31 प्रतिशत लोग ऐसे हैं फाइल करने की तैयारी कर रहे हैं जबकि 5 प्रतिशत कर चुके हैं और 4 प्रतिशत करने का इरादा नहीं रखते हैं. जबकि दूसरे देशों में मौजूद एनआरआई में 25 प्रतिशत फाइल करने तैयारी कर रहे हैं जबकि 5 प्रतिशत ने फाइल कर दिया है और 2 प्रतिशत ने फाइल नहीं करने का इरादा रखते हैं.
ये भी पढ़ें: इन 4 छोटे बैंकों का होने जा रहा है मर्जर, सरकार ने बनाई ये योजना
क्या बोले एसबीएनआरआई के संस्थापक?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, SBNRI के संस्थापक मुदित विजयवर्गीय ने टैक्स फाइलिंग में एनआरआई के सामने आने वाली चुनौतियों के समाधान पर अपनी बात कहते हुए कहा कि सर्वेक्षण से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि एनआरआई अपने कर दायित्वों का पालन करने के लिए उत्सुक हैं, लेकिन अक्सर जटिल टैक्स नियमों और समर्थन की कमी के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. एसबीएनआरआई में, हम इन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और एनआरआई को प्रबंधन में मदद करने के लिए आवश्यक उपकरण और मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. एनआरआई का यह सक्रिय दृष्टिकोण एक सकारात्मक संकेत है और हमारा लक्ष्य हर कदम पर उनका समर्थन करना है.
भारत में इतने लोगों ने किया टैक्स फाइल
आयकर विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2022-23 में 7.4 करोड़ लोगों ने आयकर रिटर्न दाखिल किया, जिनमें से 5.16 करोड़ लोगों या 70 प्रतिशत लोगों पर कोई कर देनदारी नहीं थी. इसका मतलब है कि 2022-23 में सिर्फ़ 2.24 करोड़ लोगों ने आयकर का भुगतान किया, जो भारत की कुल आबादी का लगभग 1.6 प्रतिशत है. लेकिन एनआरआई का एक बड़ा प्रतिशत ये बता रहा है कि उनमें भी टैक्स भरने को लेकर जागरूकता में इजाफा हुआ है. इस जागरूकता का असर है कि कई देशों में 30 प्रतिशत से ज्यादा लोग टैक्स भरने की तैयारी कर रहे हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती दिनों में खरीदारी करने वालों में करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी जेनरेशन जेड यानी युवा पीढ़ी की रही. यह आंकड़ा त्योहारी ऑनलाइन खरीदारी में युवाओं की भागीदारी को दिखाता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दिवाली से पहले देश में ऑनलाइन खरीदारी का रुझान तेज हो गया है. त्योहारी सेल के शुरुआती दो दिनों में ई-कॉमर्स कंपनियों ने करीब 24,200 करोड़ रुपये का सामान बेचा. परामर्श कंपनी रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स के अनुमान के मुताबिक, इस दौरान अमेजन, फ्लिपकार्ट, मीशो, अजियो और दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कुल 8 से 9 करोड़ ऑर्डर दिए गए. बिक्री के मूल्य के लिहाज से मोबाइल फोन सबसे बड़ी श्रेणी रहे.
शुरुआती दो दिनों में 24,200 करोड़ रुपये की बिक्री
रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स के एसोसिएट पार्टनर निखिल दलाल के मुताबिक, त्योहारी सेल के शुरुआती आंकड़े भारत में ई-कॉमर्स बाजार के बढ़ते दायरे को दर्शाते हैं. इस दौरान करीब 6 से 6.5 करोड़ खरीदारों ने खरीदारी की. सकल व्यापारिक मूल्य (GMV) 2.5 अरब डॉलर यानी लगभग 24,200 करोड़ रुपये से अधिक रहा.
इस बढ़ोतरी में ऑर्डर की संख्या की अहम भूमिका रही. ग्राहक मोबाइल फोन के अलावा फैशन उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरणों पर भी खर्च कर रहे हैं. खास तौर पर किफायती फैशन उत्पादों की मांग देखने को मिली. टियर-2 शहरों और छोटे शहरों के ग्राहकों ने भी त्योहारी कपड़ों की खरीदारी की.
सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा कारोबार
रेडसीर के अनुसार, शुरुआती दो दिनों में ई-कॉमर्स का सकल व्यापारिक मूल्य सामान्य कारोबारी दिनों के औसत से करीब छह गुना अधिक रहा. अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म अपनी क्विक कॉमर्स सेवाओं का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. इन सेवाओं के जरिए रोजमर्रा के सामान की तेज डिलीवरी के साथ ग्राहकों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.
अनुमानों के मुताबिक, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी सामान्य दिनों के मुकाबले कारोबार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. वहीं, बड़े घरेलू उपकरणों और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में वृद्धि बाजार की औसत रफ्तार से ज्यादा रही.
कुल बिक्री में मोबाइल फोन की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा
शुरुआती दो दिनों की कुल बिक्री में मोबाइल फोन की हिस्सेदारी करीब 38 से 40 फीसदी रहने का अनुमान है. इस श्रेणी में लगभग 9,100 से 9,600 करोड़ रुपये की बिक्री हुई.
कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की हिस्सेदारी करीब 25 से 27 फीसदी यानी 6,000 से 6,500 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. वहीं, फैशन उत्पादों का योगदान 15 से 18 फीसदी यानी लगभग 3,630 से 4,350 करोड़ रुपये रहा.
युवा खरीदारों की भी अहम भूमिका
रेडसीर के मुताबिक, शुरुआती दिनों में खरीदारी करने वालों में करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी जेनरेशन जेड यानी युवा पीढ़ी की रही. यह आंकड़ा त्योहारी ऑनलाइन खरीदारी में युवाओं की भागीदारी को दिखाता है.
कुल मिलाकर, शुरुआती बिक्री में मोबाइल फोन की मजबूत मांग के साथ फैशन, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरणों की खरीदारी ने भी योगदान दिया. छोटे शहरों और नए ग्राहकों की भागीदारी से त्योहारी ई-कॉमर्स बाजार का दायरा बढ़ता नजर आया.
इन कंपनियों का संबंध टेक्नोलॉजी, विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं, रक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा और जल उपचार जैसे क्षेत्रों से है, जिनमें जियो प्लेटफॉर्म्स का प्रस्तावित आईपीओ सबसे बड़ा आकर्षण है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अक्टूबर में प्राइमरी मार्केट में हलचल बढ़ने वाली है. जियो प्लेटफॉर्म्स, जेटवर्क मैन्युफैक्चरिंग और अवाडा इलेक्ट्रो समेत करीब 12 कंपनियां आईपीओ के जरिए पूंजी जुटाने की तैयारी में हैं. इन कंपनियों का संबंध टेक्नोलॉजी, विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं, रक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा और जल उपचार जैसे क्षेत्रों से है, जिनमें जियो प्लेटफॉर्म्स का प्रस्तावित आईपीओ सबसे बड़ा आकर्षण है, जिसका आकार 30,000 करोड़ रुपये से अधिक रहने की उम्मीद है. इस साल अब तक 96 आईपीओ के जरिए कंपनियां 1.1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जुटा चुकी हैं.
जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ होगा सबसे बड़ा
रिलायंस इंडस्ट्रीज की डिजिटल और दूरसंचार इकाई जियो प्लेटफॉर्म्स का प्रस्तावित आईपीओ इस महीने के सबसे चर्चित निर्गमों में शामिल है. सूत्रों के मुताबिक, इसका आईपीओ 21 अक्टूबर को खुलने और 23 अक्टूबर को बंद होने की उम्मीद है. इसका आकार 30,000 करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है. यदि यह योजना तय आकार के साथ आगे बढ़ती है, तो यह भारतीय शेयर बाजार के सबसे बड़े आईपीओ में शामिल हो सकता है.
जेटवर्क और अवाडा इलेक्ट्रो भी जुटाएंगी बड़ी रकम
टेक्नोलॉजी आधारित विनिर्माण प्लेटफॉर्म जेटवर्क करीब 5,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है. इसके प्रस्तावित आईपीओ में 2,600 करोड़ रुपये के नए शेयर जारी किए जाएंगे, जबकि बाकी राशि मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी बिक्री के जरिए जुटाई जाएगी. कंपनी का निर्गम 15 अक्टूबर को खुलने और 19 अक्टूबर को बंद होने का प्रस्ताव है.
नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की कंपनी अवाडा इलेक्ट्रो आईपीओ के जरिए करीब 7,600 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी में है. वहीं, पारस हेल्थकेयर का प्रस्तावित आईपीओ 1,800 करोड़ रुपये और एनडीआर इनविट ट्रस्ट का निर्गम करीब 750 करोड़ रुपये का हो सकता है.
अक्टूबर में इन आईपीओ पर भी रहेगी नजर
एचडी फायर प्रोटेक्ट ने 712 करोड़ रुपये के आईपीओ के लिए 258 से 271 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. कंपनी का निर्गम 13 अक्टूबर को खुलने और 15 अक्टूबर को बंद होने वाला है. इस आईपीओ में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी बिक्री के जरिए पूरी राशि जुटाने का प्रस्ताव है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ग्राहक अनुभव सेवाएं देने वाली फ्यूजन सीएक्स ने 702 करोड़ रुपये के आईपीओ के लिए 275 से 289 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. इसका निर्गम 14 अक्टूबर से 16 अक्टूबर तक खुला रहेगा.
रक्षा तकनीक क्षेत्र की कंपनी टोन्बो इमेजिंग, बोनफिग्लियोली समूह की भारतीय इकाई बोनफिग्लियोली ट्रांसमिशंस और चिकित्सा उपकरण बनाने वाली सहजानंद मेडिकल टेक्नोलॉजीज के आईपीओ भी 15 से 19 अक्टूबर के बीच आने का प्रस्ताव है. टोन्बो इमेजिंग ने 1.22 करोड़ तक शेयरों और बोनफिग्लियोली ट्रांसमिशंस ने 4.32 करोड़ तक शेयरों की बिक्री पेशकश की योजना बनाई है. सहजानंद मेडिकल टेक्नोलॉजीज के प्रस्तावित निर्गम में 1.38 करोड़ शेयरों की बिक्री शामिल है.
गुजरात विक्ट्री फोर्जिंग्स ने भी 1.97 करोड़ तक शेयरों के आईपीओ का प्रस्ताव रखा है. वहीं, जल एवं अपशिष्ट जल उपचार समाधान देने वाली एसएफसी एनवायरनमेंटल टेक्नोलॉजीज ने 150 करोड़ रुपये के नए शेयर जारी करने और 1.23 करोड़ शेयरों की बिक्री पेशकश वाला आईपीओ प्रस्तावित किया है.
इस साल आईपीओ से जुटाए गए 1.1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा
प्राइमरी मार्केट में इस साल अब तक 96 आईपीओ आ चुके हैं. इनके जरिए कंपनियों ने 1.1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई है. सितंबर में ही 35 आईपीओ बाजार में आए थे. इससे कंपनियों की ओर से शेयर बाजार के जरिए पूंजी जुटाने की सक्रियता का पता चलता है.
हालांकि, आईपीओ बाजार की गतिविधियों पर शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक घटनाक्रम का असर पड़ सकता है. ऐसे में कंपनियों के लिए निर्गम का सही समय चुनना महत्वपूर्ण रहेगा.
विशेषज्ञों के अनुसार, साल की दूसरी छमाही में भी भारतीय प्राइमरी मार्केट में गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं. हालांकि, बाजार में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक घटनाक्रम कंपनियों के आईपीओ लाने के समय को प्रभावित कर सकते हैं.
उनके अनुसार, गुणवत्तापूर्ण कंपनियों के शेयरों में निवेशकों की रुचि बनी हुई है. घरेलू संस्थागत निवेशकों के पास उपलब्ध पूंजी और विदेशी निवेशकों की चुनिंदा भागीदारी से भी सार्वजनिक निर्गम बाजार को समर्थन मिल रहा है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
शुक्रवार सेंसेक्स 879 अंक चढ़कर 72,472 पर और निफ्टी 289 अंक बढ़कर 22,520 पर बंद हुआ था. वहीं, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली बाजार के लिए चुनौती बनी हुई है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 12 अक्टूबर को कारोबारी सप्ताह की शुरुआत सकारात्मक संकेतों के बीच होने की उम्मीद है. शुरुआती कारोबार में गिफ्ट निफ्टी करीब 25 अंक चढ़कर 22,630 के पार पहुंच गया था. इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भी घरेलू बाजार को राहत मिल सकती है. हालांकि, एशियाई बाजारों के मिले-जुले संकेत और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बाजार की तेजी को सीमित कर सकते हैं.
इससे पहले शुक्रवार को सेंसेक्स 879.09 अंक यानी 1.23 फीसदी की बढ़त के साथ 72,472.33 पर बंद हुआ था. निफ्टी भी 288.65 अंक यानी 1.30 फीसदी चढ़कर 22,520.45 पर पहुंच गया था. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 29 बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज में गिरावट रही. गुरुवार की भारी बिकवाली के बाद आई इस तेजी से निवेशकों की संपत्ति में करीब 6 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ था.
कच्चे तेल और ग्लोबल संकेतों पर नजर
सोमवार सुबह ब्रेंट क्रूड करीब 1.5 फीसदी गिरकर 103 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड करीब 1.6 फीसदी फिसलकर 90 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से आयात बिल और कंपनियों की लागत पर दबाव कम होने की उम्मीद रहती है.
एशियाई बाजारों में कारोबार का रुख मिला-जुला रहा. जापान का निक्केई मामूली गिरावट के साथ कारोबार कर रहा था, जबकि दक्षिण कोरिया का कॉस्पी करीब 2.4 फीसदी नीचे था. दूसरी ओर, हांगकांग का हैंगसेंग करीब 1 फीसदी की बढ़त पर था.
अमेरिकी बाजार शुक्रवार को लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुए थे. डाउ जोंस 51,650 के ऊपर पहुंचा, जबकि नैस्डैक 173 अंक चढ़कर बंद हुआ. हालांकि, डॉलर इंडेक्स में मजबूती, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेशकों की बिकवाली पर बाजार की नजर बनी रहेगी. विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने 9 अक्टूबर को लगातार 11वें कारोबारी सत्र में बिकवाली की थी. ऐसे में शुक्रवार की तेजी के बाद बाजार में खरीदारी का सिलसिला जारी रहना अहम होगा.
गुरुवार की गिरावट के बाद शुक्रवार को रिकवरी
गुरुवार को सेंसेक्स 1,045 अंक यानी 1.44 फीसदी गिरकर 71,593.24 पर बंद हुआ था. निफ्टी भी 22,231.80 पर आ गया था और कारोबार के दौरान 22,179 तक फिसल गया था. उस दिन बाजार में भारी बिकवाली के चलते निवेशकों की संपत्ति में करीब 11 लाख करोड़ रुपये की कमी आई थी.
इसके बाद शुक्रवार को आई तेजी से बाजार को कुछ राहत मिली. अब निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि सेंसेक्स और निफ्टी अपनी बढ़त बरकरार रख पाते हैं या नहीं. कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक बाजारों का रुख, विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और कंपनियों के तिमाही नतीजे कारोबारी धारणा को प्रभावित कर सकते हैं.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
सोमवार को HCL टेक्नोलॉजीज, RBL बैंक, KEC इंटरनेशनल, लेंसकार्ट सॉल्यूशंस, महिंद्रा एंड महिंद्रा, डीमार्ट, पूनावाला फिनकॉर्प, आनंद राठी वेल्थ, केन फिन होम्स, पर्सिस्टेंट सिस्टम्स, वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज, मीशो, इन्फोसिस और पावर ग्रिड कॉरपोरेशन के शेयरों में कारोबारी गतिविधियों के लिहाज से हलचल रह सकती है.
HCL टेक्नोलॉजीज और RBL बैंक आज वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही के नतीजे जारी करेंगे. निवेशकों की नजर इन कंपनियों के मुनाफे, आय और प्रबंधन के कारोबारी अनुमान पर रहेगी. RBL बैंक के डिपॉजिट सालाना आधार पर 34 फीसदी बढ़कर 1.56 लाख करोड़ रुपये हो गए हैं.
KEC इंटरनेशनल को बिजली ट्रांसमिशन और अन्य कारोबार से जुड़े 1,030 करोड़ रुपये के नए ऑर्डर मिले हैं. इनमें भूटान और सऊदी अरब में ट्रांसमिशन लाइन परियोजनाएं शामिल हैं. वहीं, लेंसकार्ट सॉल्यूशंस में अल्फा वेव वेंचर्स की करीब 1.6 फीसदी हिस्सेदारी की संभावित बिक्री की खबर है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस सौदे का आकार करीब 1,691 करोड़ रुपये हो सकता है.
महिंद्रा एंड महिंद्रा का सितंबर में उत्पादन सालाना आधार पर 19.2 फीसदी बढ़कर 1.21 लाख गाड़ियों पर पहुंच गया. कंपनी की बिक्री 16.3 फीसदी बढ़कर 1.13 लाख गाड़ियां रही, जबकि निर्यात में 8.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
तिमाही नतीजों वाले शेयरों पर भी नजर
डीमार्ट की संचालक एवेन्यू सुपरमार्ट्स का सितंबर तिमाही में मुनाफा सालाना आधार पर 8.5 फीसदी बढ़कर करीब 743 करोड़ रुपये रहा. कंपनी की परिचालन आय 17.8 फीसदी बढ़कर 19,644 करोड़ रुपये पहुंच गई.
पूनावाला फिनकॉर्प का मुनाफा पिछले साल की समान तिमाही के 74.2 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 375 करोड़ रुपये हो गया. कंपनी की कुल आय 70 फीसदी बढ़कर 2,625 करोड़ रुपये रही. दूसरी ओर, आनंद राठी वेल्थ का कंसोलिडेटेड मुनाफा 10.4 फीसदी घटकर 88.96 करोड़ रुपये रह गया, हालांकि परिचालन आय करीब 16 फीसदी बढ़कर 356 करोड़ रुपये पहुंच गई.
केन फिन होम्स का मुनाफा सालाना आधार पर करीब 9.2 फीसदी बढ़कर 274.61 करोड़ रुपये रहा. वहीं, कॉर्डेलिया क्रूज की संचालक वॉटरवेज लीजर टूरिज्म ने सितंबर तिमाही में 58.5 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया, जबकि पिछले साल की समान अवधि में कंपनी को 8.9 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. कंपनी की आय 30.4 फीसदी बढ़कर 133 करोड़ रुपये रही.
पर्सिस्टेंट सिस्टम्स, वारी रिन्यूएबल और पावर ग्रिड के अपडेट
पर्सिस्टेंट सिस्टम्स ने जर्मनी की नागारो एसई में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर करीब 94.04 फीसदी कर ली है. कंपनी ने अधिग्रहण प्रस्ताव की अतिरिक्त स्वीकृति अवधि के दौरान नागारो के 13.35 लाख शेयर हासिल किए.
वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीज को 5 मेगावाट की सौर ऊर्जा परियोजना के लिए एक सरकारी उपक्रम से स्वीकृति पत्र मिला है. परियोजना को 12 महीने में पूरा किया जाना है, जिसके बाद कंपनी 10 वर्षों तक इसका संचालन और रखरखाव भी करेगी.
पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ने राजस्थान में 20 गीगावाट क्षमता वाले नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र से बिजली निकासी के लिए ट्रांसमिशन परियोजना पूरी कर ली है. कंपनी के मुताबिक, यह परियोजना 22 सितंबर 2026 से चालू है और वाणिज्यिक परिचालन की सूचना 11 अक्टूबर को मिली.
मीशो और इन्फोसिस से जुड़े अपडेट
ई-कॉमर्स कंपनी मीशो की मेगा ब्लॉकबस्टर सेल 2026 के पहले दिन ऑर्डर में सालाना आधार पर करीब 75 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई. कंपनी के मुताबिक, सेल शुरू होने के 15 मिनट के भीतर एक समय ऑर्डर की रफ्तार 75,000 प्रति मिनट से अधिक पहुंच गई.
इन्फोसिस ने कहा है कि अमेरिका के स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम (PERM) के तहत आवेदनों पर लगी रोक से उसके कारोबार पर बड़े असर की आशंका नहीं है. कंपनी ने कहा कि वह अमेरिका में लागू कानूनों और नियमों का पालन करती रहेगी.
कुल मिलाकर, सोमवार को बाजार की दिशा वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों के साथ कंपनियों से जुड़ी खबरों पर निर्भर करेगी. निवेशकों की नजर खास तौर पर HCL टेक्नोलॉजीज और RBL बैंक के नतीजों तथा KEC इंटरनेशनल और लेंसकार्ट से जुड़े घटनाक्रम पर रहेगी.
भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये को सहारा देने और विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव कम करने के लिए कई नियामकीय बदलाव किए हैं. इनका उद्देश्य डॉलर की मांग को व्यवस्थित करना, करेंसी डेरिवेटिव कारोबार में जोखिम सीमित करना और बाजार में नियमों का पालन सुनिश्चित करना है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रुपये में लगातार गिरावट और विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ते दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कई अहम कदम उठाए हैं. इसके तहत तीन सरकारी तेल कंपनियों को रोजाना उनकी जरूरत के मुताबिक डॉलर उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है. साथ ही, विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कारोबार में बिना वास्तविक जोखिम के सौदे करने की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है.
तीन सरकारी तेल कंपनियों को विशेष व्यवस्था के तहत मिलेगा डॉलर
RBI ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (HPCL) और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष व्यवस्था की है. इसके तहत केंद्रीय बैंक चुनिंदा बैंकों के माध्यम से इन कंपनियों को रोजाना उनकी जरूरत के मुताबिक डॉलर उपलब्ध कराएगा.
यह सुविधा 12 अक्टूबर 2026 से लागू होगी और अगले आदेश तक जारी रहेगी. इस व्यवस्था से इन सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर की मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी. तेल कंपनियों को कच्चे तेल के आयात के लिए बड़े पैमाने पर डॉलर की जरूरत होती है.
फॉरेक्स मार्केट में ट्रेडिंग के नियम सख्त
रुपये में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा बाजार में जोखिम सीमित करने के लिए RBI ने फॉरेक्स डेरिवेटिव से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया है. नए नियमों के तहत अधिकृत डीलर अब ग्राहकों को रद्द किए जा चुके विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट दोबारा बुक करने की अनुमति नहीं देंगे. हालांकि, कॉन्ट्रैक्ट की मैच्योरिटी पूरी होने पर उसे आगे बढ़ाने यानी रोलओवर की सुविधा जारी रहेगी.
इसके अलावा, बिना किसी वास्तविक लेन-देन या अंतर्निहित जोखिम के विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव में कारोबार करने की सीमा घटा दी गई है. पहले यह सीमा 100 मिलियन डॉलर थी, जिसे अब घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दिया गया है.
यह बदलाव मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों पर रुपये से जुड़े करेंसी डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट पर भी लागू होगा. यहां भी बिना वास्तविक लेन-देन या जोखिम के पोजीशन लेने की सीमा 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है.
विदेशी मुद्रा डीलरों के लिए नया रिजर्व नियम
RBI ने विदेशी मुद्रा डीलरों के लिए 'फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व' (FERR) नाम से एक नई व्यवस्था शुरू की है. इसके तहत डीलरों को रुपये से जुड़े प्रत्येक पात्र डेरिवेटिव सौदे की कुल रकम का 20 फीसदी हिस्सा रिजर्व के तौर पर रखना होगा.
यह नियम उन पात्र सौदों पर लागू होगा, जो चालू खाते से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए किए जाते हैं और जिनमें ग्राहक रुपये देकर विदेशी मुद्रा खरीदता है. इस व्यवस्था का उद्देश्य विदेशी मुद्रा कारोबार से जुड़े जोखिमों के प्रबंधन को मजबूत करना है.
वैश्विक कारणों से रुपये पर दबाव
पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और अन्य वैश्विक घटनाक्रमों के कारण रुपये पर दबाव बना हुआ है. पिछले एक साल में भारतीय मुद्रा करीब 8 फीसदी कमजोर हुई है. ऐसे में RBI विदेशी मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने और रुपये में तेज उतार-चढ़ाव को सीमित करने के लिए लगातार कदम उठा रहा है.
हालांकि, देश का विदेशी मुद्रा भंडार सितंबर की शुरुआत में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद घटा है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 4 सितंबर 2026 को विदेशी मुद्रा भंडार 785.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था. इसके बाद 2 अक्टूबर को समाप्त चार सप्ताह की अवधि में इसमें करीब 51.1 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई. रिजर्व बैंक के इन नए कदमों से विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग के प्रबंधन और डेरिवेटिव कारोबार में जोखिम सीमित करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
नई रणनीति में स्वदेशी तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल के योग्य बनाने, बौद्धिक संपदा विकसित करने, डिजिटल तकनीकों को एकीकृत करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उत्पाद तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार देश में 3D प्रिंटिंग तकनीक और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (NSAM) के दूसरे चरण NSAM 2.0 की रूपरेखा तैयार कर रही है. इसके तहत स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण, उपकरणों और कच्चे माल की उपलब्धता बेहतर बनाने और विभिन्न उद्योगों में इस तकनीक के इस्तेमाल का विस्तार करने पर जोर दिया जाएगा. फरवरी 2022 में शुरू की गई पहली रणनीति के तहत अब तक 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है, 56 स्टार्टअप को समर्थन मिला है और 65 स्वदेशी तकनीकों के विकास में मदद की गई है.
NSAM 2.0 में स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण पर जोर
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) NSAM 2.0 की रूपरेखा तैयार कर रहा है. इसका उद्देश्य नवाचार को बढ़ावा देना, उद्योगों में 3D प्रिंटिंग को अपनाने की गति तेज करना और वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग बाजार में भारत की स्थिति मजबूत करना है.
नई रणनीति में स्वदेशी तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल के योग्य बनाने, बौद्धिक संपदा विकसित करने, डिजिटल तकनीकों को एकीकृत करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उत्पाद तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा. इसके अलावा, क्लस्टर विकसित करके मशीनों और कच्चे माल की लागत कम करने की योजना भी प्रस्तावित है.
NSAM 2.0 अभी अवधारणा तैयार करने के चरण में है. इसमें स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना, रक्षा क्षेत्र में 3D प्रिंटिंग के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और सतत विकास लक्ष्यों से जुड़े पायलट प्रोजेक्ट शुरू करना भी शामिल है.
पहली रणनीति के तहत 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण
भारत की पहली नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग फरवरी 2022 में शुरू की गई थी. इसके तहत वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग बाजार में 5% हिस्सेदारी हासिल करने और भारत की जीडीपी में करीब 1 अरब डॉलर का योगदान देने का लक्ष्य रखा गया था.
रणनीति के अन्य लक्ष्यों में भारत की जरूरतों के अनुरूप 50 तकनीकों का विकास, 100 स्टार्टअप को समर्थन, 500 नए उत्पाद तैयार करना, एक लाख कुशल कामगारों को प्रशिक्षण देना और 10 विनिर्माण क्षेत्रों में क्षमताएं विकसित करना शामिल है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जो शुरुआती लक्ष्य से ज्यादा है. इसके अलावा, 56 स्टार्टअप को समर्थन मिला है और सामग्री, मशीनों, डिजाइन प्रक्रियाओं तथा तैयार उत्पादों से जुड़ी 65 स्वदेशी तकनीकों के विकास में मदद की गई है. सरकार ने अनुसंधान, तकनीक विकास, उद्योगों के साथ सहयोग और कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के लिए सात विशेष विकास एवं तैनाती केंद्र भी स्थापित किए हैं.
क्या है 3D प्रिंटिंग तकनीक?
एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग को आम तौर पर 3D प्रिंटिंग कहा जाता है. इसमें डिजिटल डिजाइन के आधार पर सामग्री की परत-दर-परत जमावट करके किसी वस्तु का निर्माण किया जाता है. इस प्रक्रिया में कंप्यूटर आधारित डिजाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स और मटेरियल साइंस का इस्तेमाल होता है.
इस तकनीक के जरिए पॉलिमर, धातु, सिरेमिक, कंपोजिट और जैविक सामग्री से विभिन्न उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. पारंपरिक विनिर्माण प्रक्रियाओं के मुकाबले यह जटिल डिजाइन वाले पुर्जे बनाने और जरूरत के अनुसार कस्टमाइज्ड उत्पाद तैयार करने में उपयोगी हो सकती है. 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल एयरोस्पेस, रक्षा, स्वास्थ्य सेवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण और फोटोनिक्स जैसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है.
अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में बढ़ रहा इस्तेमाल
अंतरिक्ष क्षेत्र में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास से जुड़े स्टार्टअप अग्निकुल कॉसमॉस ने मई 2024 में अपने अग्निबाण SOrTeD मिशन के तहत एक ही हिस्से में 3D प्रिंट किया गया सेमी-क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन इस्तेमाल किया था. इस मिशन ने स्वदेशी अंतरिक्ष उपकरणों के विकास में एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता को प्रदर्शित किया.
रक्षा क्षेत्र में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. भारतीय सेना ने अहमदाबाद में 12 सप्ताह में दो मंजिला आवासीय इकाई का निर्माण किया. इसके अलावा, लद्दाख जैसे परिचालन क्षेत्रों में रक्षा बुनियादी ढांचे के निर्माण में भी 3D प्रिंटिंग का उपयोग बढ़ाया गया है.
सशस्त्र बल रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल यानी MRO गतिविधियों में भी इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रहे हैं. इससे जरूरत के अनुसार पुर्जे तैयार करने और कुछ मामलों में आपूर्ति संबंधी चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है.
स्वास्थ्य और इलेक्ट्रॉनिक्स में भी नई संभावनाएं
स्वास्थ्य क्षेत्र में स्वदेशी चिकित्सा उपकरणों और मरीजों की जरूरत के अनुरूप इम्प्लांट विकसित करने के लिए 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है. MeitY ने प्राकृतिक रेशम आधारित इम्प्लांट के विकास से जुड़े काम को समर्थन दिया है. वहीं, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड स्वदेशी बायोसिरेमिक सामग्री से 3D प्रिंटेड बोन ग्राफ्ट विकसित करने की परियोजना को सहयोग दे रहा है.
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भी इस तकनीक के जरिए बैटरी, एंटीना, कैपेसिटर और वेरिस्टर जैसे कंपोनेंट तैयार करने के प्रदर्शन किए गए हैं. भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) ने एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग के जरिए फोटोनिक इंटीग्रेटेड सर्किट के ब्लॉक तैयार करने की क्षमता भी प्रदर्शित की है.
इन क्षेत्रों में तकनीक का विस्तार होने से स्वदेशी उत्पादों के विकास और आयात पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं बन सकती हैं. हालांकि, इसका वास्तविक असर उत्पादन लागत, गुणवत्ता, बड़े पैमाने पर विनिर्माण और व्यावसायिक इस्तेमाल पर निर्भर करेगा.
निर्माण क्षेत्र में लागत और उत्सर्जन घटाने की संभावना
निर्माण क्षेत्र में भी 3D प्रिंटिंग को घरों और अन्य संरचनाओं के निर्माण के वैकल्पिक तरीके के रूप में देखा जा रहा है. केल्विन 6K प्रो नामक ऑन-साइट निर्माण प्रिंटर ने कम कार्बन वाले जियोपॉलिमर पदार्थों का इस्तेमाल करके 2,500 वर्ग फुट के घर को 30 दिनों से कम समय में बनाने की क्षमता प्रदर्शित की है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शुरुआती अनुप्रयोगों में पारंपरिक सीमेंट आधारित निर्माण की तुलना में सामग्री और लॉजिस्टिक्स लागत में 30% तक तथा उत्सर्जन में 90% तक की कमी की संभावना जताई गई है. हालांकि, ये संभावित लाभ हैं. वास्तविक बचत परियोजना की प्रकृति, इस्तेमाल की गई सामग्री और निर्माण प्रक्रिया पर निर्भर करेगी.
सरकार और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने की तैयारी
MeitY ने मार्च 2026 में दूसरे नेशनल एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग सिम्पोजियम का आयोजन किया था. इसमें NSAM 2.0, रक्षा क्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल, उद्योगों में इसे अपनाने और अनुसंधान एवं विकास से जुड़ी पहलों पर चर्चा हुई.
सरकार स्कूल स्तर पर भी उभरती तकनीकों से परिचित कराने की कोशिश कर रही है. इसके लिए अटल टिंकरिंग लैब्स के माध्यम से कक्षा छह से 12वीं तक के विद्यार्थियों को 3D प्रिंटर, रोबोटिक्स किट और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) जैसी तकनीकों तक पहुंच दी जा रही है.
2035 तक 149 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है वैश्विक बाजार
सरकार की ओर से उद्धृत अनुमानों के मुताबिक, वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग मशीनों का बाजार 2035 तक 149 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. वहीं, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति श्रृंखला का आकार 18 अरब डॉलर से बढ़कर 112 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. ये भविष्य से जुड़े बाजार अनुमान हैं, मौजूदा बाजार का आकार नहीं. भारत के लिए NSAM 2.0 इस बढ़ते बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने का अवसर बन सकता है.
कुल मिलाकर, नई रणनीति के जरिए सरकार स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण, स्टार्टअप को समर्थन, उपकरणों की किफायती उपलब्धता और उद्योगों में 3D प्रिंटिंग के व्यापक इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहती है. हालांकि, इसके परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि प्रस्तावित योजनाओं को किस तरह लागू किया जाता है और उद्योग इन्हें कितनी तेजी से अपनाते हैं.
नए नियमों के तहत कंपनी के खातों में गड़बड़ी या फंड के दुरुपयोग जैसे मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प उपलब्ध रहेगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शेयर बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सेटलमेंट रेगुलेशंस, 2026 को आधिकारिक तौर पर नोटिफाई कर दिया है. नए नियमों का उद्देश्य नियामकीय उल्लंघनों से जुड़े मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और आसान बनाना है. इसके तहत 10 लाख रुपये तक की सेटलमेंट राशि वाले मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था शुरू की गई है. साथ ही, गलत तरीके से कमाए गए पैसे की वसूली और सेटलमेंट राशि की गणना से जुड़े नियमों में भी बदलाव किए गए हैं.
सेटलमेंट राशि तय करने का तरीका बदला
सेबी के नए नियमों के तहत सेटलमेंट राशि निर्धारित करने की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है. अब इसमें तीन प्रमुख पहलुओं को ध्यान में रखा जाएगा. इनमें सेटलमेंट अमाउंट, गलत तरीके से कमाए गए पैसे की वापसी और सुधारात्मक व नियामकीय शर्तें शामिल हैं.
पहले कुछ मामलों में गलत तरीके से कमाई गई रकम या निवेशकों को हुए नुकसान को सेटलमेंट राशि की गणना में दो बार शामिल किए जाने की समस्या सामने आती थी. नए फ्रेमवर्क में इस दोहरी गणना यानी डबल काउंटिंग को खत्म करने का प्रावधान किया गया है.
अब सेटलमेंट की शुरुआती राशि तय करते समय गलत कमाई या नुकसान की रकम को शामिल नहीं किया जाएगा. इसकी गणना संबंधित उल्लंघन के लिए कानून के तहत निर्धारित न्यूनतम जुर्माने के आधार पर होगी. इसके बाद मामले की गंभीरता, नियामकीय कार्रवाई किस चरण में है और राहत देने या सख्ती बढ़ाने वाले अन्य कारकों के आधार पर अंतिम राशि निर्धारित की जाएगी. गलत तरीके से कमाई गई रकम या निवेशकों को हुए नुकसान की राशि स्पष्ट होने पर उसकी वसूली अलग से की जाएगी.
₹10 लाख तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक व्यवस्था
छोटे और कम गंभीर मामलों का तेजी से निपटारा करने के लिए सेबी ने फास्ट-ट्रैक व्यवस्था शुरू की है. इसके तहत दो तरह के रास्ते बनाए गए हैं. पहले रास्ते में सेटलमेंट राशि के आधार पर मामलों का निपटारा किया जाएगा. जिन मामलों में सेटलमेंट राशि 10 लाख रुपये तक होगी, उन्हें सीधे इंटरनल कमेटी से पूर्णकालिक सदस्यों के पैनल के पास भेजा जाएगा. इसका उद्देश्य ऐसे मामलों में प्रक्रिया को सरल बनाना और निपटारे में लगने वाला समय कम करना है.
दूसरे रास्ते में उल्लंघन की प्रकृति को आधार बनाया जाएगा. इसके तहत डिस्क्लोजर यानी जरूरी जानकारी के खुलासे से जुड़ी कुछ गलतियों के मामलों में सेबी नोटिस भेजकर निर्धारित राशि का भुगतान करने पर मामला समाप्त करने का अवसर देगा.
गंभीर मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प
नए नियमों के तहत कंपनी के खातों में गड़बड़ी या फंड के दुरुपयोग जैसे मामलों में भी सेटलमेंट का विकल्प उपलब्ध रहेगा. हालांकि, इसके लिए संबंधित कंपनी को जरूरी जानकारी का पूरा खुलासा करना होगा. इसके अलावा, गलत तरीके से दूसरी जगह भेजी गई रकम को वापस लाने की शर्त भी पूरी करनी होगी.
इससे सेबी का उद्देश्य मामलों के निपटारे में तेजी लाने के साथ-साथ उल्लंघन करने वाली कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है. गंभीर मामलों में राहत देने से पहले जरूरी शर्तों का पालन भी सुनिश्चित किया जाएगा.
सेबी ने पिछले महीने दी थी मंजूरी
सेबी के बोर्ड ने पिछले महीने हुई बैठक में इन बदलावों को मंजूरी दी थी. अब सेटलमेंट रेगुलेशंस, 2026 को आधिकारिक तौर पर नोटिफाई कर दिया गया है. नए नियमों से नियामकीय उल्लंघनों से जुड़े मामलों में सेटलमेंट की गणना, रकम की वसूली और निपटारे की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने की उम्मीद है.
यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब मानसून के बाद कृषि गतिविधियों और रबी फसल की बुवाई के बीच ग्रामीण श्रम बाजार में रोजगार की मांग में बदलाव देखने को मिल रहा है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना VB-G RAM-G के तहत सितंबर 2026 में काम की मांग में अगस्त के मुकाबले 25.2% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस दौरान करीब 1.56 करोड़ परिवारों ने रोजगार की मांग की, जबकि अगस्त में यह आंकड़ा 1.25 करोड़ था. वहीं, रोजगार मांगने वाले लोगों की संख्या भी बढ़कर 1.88 करोड़ हो गई. यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब मानसून के बाद कृषि गतिविधियों और रबी फसल की बुवाई के बीच ग्रामीण श्रम बाजार में रोजगार की मांग में बदलाव देखने को मिल रहा है.
सितंबर में 1.56 करोड़ परिवारों ने मांगा काम
ग्रामीण विकास मंत्रालय के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, VB-G RAM-G योजना के तहत सितंबर में काम मांगने वाले परिवारों की संख्या बढ़कर 1.56 करोड़ हो गई. अगस्त में यह संख्या 1.25 करोड़ थी. इस तरह एक महीने में रोजगार की मांग में 25.2% की बढ़ोतरी हुई. इससे पहले जुलाई में करीब 1.01 करोड़ परिवारों ने इस योजना के तहत काम की मांग की थी. जुलाई में ही VB-G RAM-G अधिनियम, 2025 के तहत यह योजना शुरू की गई थी.
रोजगार मांगने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी
योजना के तहत रोजगार की मांग करने वाले लोगों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. अगस्त में करीब 1.54 करोड़ लोगों ने काम की मांग की थी, जबकि सितंबर में यह आंकड़ा बढ़कर 1.88 करोड़ हो गया. परिवारों और व्यक्तियों, दोनों स्तरों पर रोजगार की मांग में हुई यह बढ़ोतरी ग्रामीण क्षेत्रों में काम की जरूरत को दर्शाती है. हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आर्थिक दबाव या बेरोजगारी की स्थिति का निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.
साल में 125 दिन रोजगार की गारंटी
VB-G RAM-G योजना के तहत पात्र ग्रामीण परिवारों के लिए सालाना गारंटीकृत रोजगार की अवधि 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन किए जाने का प्रावधान है. खबर में दी गई जानकारी के अनुसार, न्यूनतम दैनिक मजदूरी 300 रुपये तय की गई है.
यह योजना ग्रामीण परिवारों को आय का एक वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लाई गई है. कृषि कार्यों के बीच के समय में भी ग्रामीण परिवार इसके तहत रोजगार की मांग कर सकते हैं.
मानसून और रबी सीजन के बीच बढ़ी मांग पर नजर
सितंबर में रोजगार की मांग बढ़ने के पीछे मानसून के बाद कृषि गतिविधियों में बदलाव और रबी फसल की बुवाई से पहले का अंतर संभावित कारण हो सकते हैं. इस अवधि में ग्रामीण श्रमिकों की काम की उपलब्धता अलग-अलग क्षेत्रों में बदल सकती है.
आने वाले महीनों में रबी सीजन की शुरुआत और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों के साथ इस योजना के तहत काम की मांग का रुझान अहम रहेगा. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि ग्रामीण परिवारों की रोजगार गारंटी योजना पर निर्भरता किस दिशा में बढ़ रही है.
मध्य प्रदेश में प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन (TMZ) देश में दूरसंचार उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ग्वालियर में प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन में 31 कंपनियों ने करीब ₹5,500-6,000 करोड़ के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. इस परियोजना के पहले चरण के लिए 170 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है, जबकि अतिरिक्त 400 एकड़ जमीन आवंटित करने पर विचार किया जा रहा है. केंद्र सरकार ने टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन सुविधाओं के विकास के लिए भी वित्तीय सहायता का प्रावधान किया है.
केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शुक्रवार को बताया कि इस परियोजना के लिए एक स्टार्टअप समेत 31 कंपनियों ने करीब ₹5,500-6,000 करोड़ के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है. सरकार अक्टूबर के अंत से पहले परियोजना का भूमिपूजन करने की तैयारी कर रही है.
दूरसंचार विभाग (DoT) के मुताबिक, इस परियोजना से 18,000 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है. प्रस्तावित जोन में कंपनियों को एक ही स्थान पर विनिर्माण, अनुसंधान एवं विकास (R&D), परीक्षण और प्रमाणन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है. इससे कंपनियों को दूरसंचार उपकरणों के उत्पादन और व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उनकी गुणवत्ता जांचने में मदद मिलेगी.
सिंधिया ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि करीब 30 कंपनियों और एक स्टार्टअप ने इस जोन में अपनी विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई है. उन्होंने स्पष्ट किया कि ये केवल रुचि जताने वाली कंपनियां नहीं हैं, बल्कि यहां अपनी इकाइयां स्थापित करने की योजना बना चुकी हैं.
पहले चरण में 170 एकड़ जमीन, 400 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर विचार
परियोजना के पहले चरण के लिए 170 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है. इसके अलावा कंपनियों को आवंटित करने के लिए 400 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर विचार किया जा रहा है. केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार मिलकर इस परियोजना को विकसित कर रही हैं. राज्य सरकार विनिर्माण कंपनियों को आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहन भी दे रही है.
इस जोन को प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक क्लस्टर के रूप में विकसित करने की योजना है. इसका मतलब है कि कंपनियों को उद्योग स्थापित करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा और साझा सुविधाएं एक ही स्थान पर मिल सकेंगी.
परियोजना के लिए केंद्र सरकार ने पहले चरण के बुनियादी ढांचे के विकास हेतु ₹493 करोड़ की वित्तीय सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई है. वहीं, सरकार ने परीक्षण और प्रमाणन से जुड़ी साझा प्रयोगशालाओं के विकास के लिए ₹193 करोड़ निर्धारित किए हैं. इन सुविधाओं से कंपनियों को अपने दूरसंचार उपकरणों की जांच और प्रमाणन कराने में मदद मिलेगी.
जुलाई 2026 में दूरसंचार विभाग और मध्य प्रदेश सरकार ने इस जोन के विकास के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे. परियोजना को लागू करने और उसकी निगरानी के लिए दोनों सरकारों ने एक विशेष प्रयोजन इकाई (SPV) भी गठित की है.
मोबाइल फोन उत्पादन में भारत की बड़ी छलांग
सिंधिया ने कहा कि भारत अब केवल दूरसंचार तकनीक का उपभोक्ता बने रहने के बजाय इसके विनिर्माण और निर्यात में भी अपनी क्षमता बढ़ा रहा है. उन्होंने बताया कि पिछले 12 वर्षों में देश में मोबाइल फोन का उत्पादन करीब ₹90,000 करोड़ से बढ़कर ₹6.27 लाख करोड़ तक पहुंच गया है.
मंत्री के मुताबिक, भारत से मोबाइल फोन का निर्यात लगभग 28 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. इसके साथ ही देश में मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों की संख्या दो से बढ़कर करीब 300 हो गई है.
सरकार अब इसी विनिर्माण क्षमता को दूरसंचार उपकरणों और इससे जुड़ी दूसरी तकनीकों में भी विकसित करना चाहती है. ग्वालियर में प्रस्तावित जोन इसी रणनीति का हिस्सा है. इसका उद्देश्य राउटर, एंटीना, ऑप्टिकल फाइबर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और 5G तथा 6G नेटवर्क से जुड़ी तकनीकों के विनिर्माण को बढ़ावा देना है.
इससे घरेलू स्तर पर मूल्यवर्धन बढ़ाने और आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है. हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि निवेश की प्रतिबद्धताएं कितनी जल्दी उत्पादन इकाइयों में बदलती हैं.
PLI योजना से घरेलू विनिर्माण को समर्थन
टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन ऐसे समय विकसित किया जा रहा है, जब सरकार उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के जरिए दूरसंचार और नेटवर्किंग उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे रही है.
सरकार के मुताबिक, इस योजना से करीब ₹1.1 लाख करोड़ की अतिरिक्त बिक्री, ₹25,000 करोड़ का अतिरिक्त निर्यात और 30,000 अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं. PLI योजना के तहत कंपनियों को भारत में उत्पादन और बिक्री बढ़ाने के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाता है.
प्रस्तावित ग्वालियर जोन साझा बुनियादी ढांचे, परीक्षण सुविधाओं और विनिर्माण इकाइयों को एक जगह लाकर इस पहल को आगे बढ़ा सकता है. इससे दूरसंचार उपकरण बनाने वाली कंपनियों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने और नए उत्पाद विकसित करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
स्वदेशी 4G तकनीक से 6G की तैयारी तक
सिंधिया ने भारत की स्वदेशी 4G तकनीक का भी उल्लेख किया. उनके मुताबिक, देश में विकसित 4G टेक्नोलॉजी स्टैक को करीब 1.10 लाख टावरों पर तैनात किया जा चुका है. स्वदेशी तकनीक का विकास दूरसंचार नेटवर्क में देश की तकनीकी क्षमता मजबूत करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है.
भारत अब 5G सेवाओं के विस्तार और 5G स्टैंडअलोन नेटवर्क की तैयारी पर भी जोर दे रहा है. ऐसे नेटवर्क से औद्योगिक और कारोबारी इस्तेमाल के लिए उन्नत डिजिटल सेवाओं को बढ़ावा मिल सकता है. सिंधिया के अनुसार, देश में करीब 55 करोड़ 5G उपयोगकर्ता हैं और 2030 तक इनकी संख्या एक अरब करने का लक्ष्य है.
इसके साथ ही भारत भारत 6G एलायंस के जरिए अगली पीढ़ी की दूरसंचार तकनीक के अंतरराष्ट्रीय मानकों को विकसित करने में अधिक भागीदारी चाहता है. इस पहल में शिक्षण संस्थानों और उद्योग जगत के प्रतिभागियों को शामिल किया गया है.
ग्वालियर का प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन विनिर्माण, अनुसंधान, परीक्षण और नवाचार को एक साझा औद्योगिक व्यवस्था में लाने की दिशा में काम करेगा. हालांकि, परियोजना की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निवेश की घोषणाएं कितनी तेजी से वास्तविक उत्पादन, घरेलू तकनीक के विकास और निर्यात में बदलती हैं.
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार चौथे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है. 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भंडार 12.752 अरब डॉलर घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया. पिछले चार सप्ताह में इसमें कुल 51.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इस दौरान विदेशी मुद्रा आस्तियों और सोने के भंडार के मूल्य में भी गिरावट आई है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में लगातार गिरावट का सिलसिला जारी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से शुक्रवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 12.752 अरब डॉलर घट गया. इससे पिछले सप्ताह इसमें 18.343 अरब डॉलर की कमी आई थी. वहीं, 18 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 14.881 अरब डॉलर और 11 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 4.924 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.
इस तरह पिछले चार सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 51.1 अरब डॉलर की कमी आई है. इसके साथ ही भंडार 4 सितंबर 2026 को दर्ज 785.706 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से घटकर 734.606 अरब डॉलर रह गया है. गौरतलब है कि 4 सितंबर तक लगातार 10 सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही थी. इसके बाद इसमें लगातार चार सप्ताह गिरावट आई है.
विदेशी मुद्रा आस्तियों में 10.66 अरब डॉलर की कमी
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets यानी FCA) में आई कमी रही. RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा आस्तियां 10.664 अरब डॉलर घटकर 604.747 अरब डॉलर रह गईं. इससे पिछले सप्ताह भी इनमें 15.570 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.
विदेशी मुद्रा आस्तियां भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा हैं. इनमें अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड और येन जैसी अन्य विदेशी मुद्राओं में रखी गई संपत्तियां भी शामिल होती हैं. डॉलर में इनका मूल्यांकन किए जाने के कारण दूसरी मुद्राओं की विनिमय दरों में होने वाले बदलाव का असर भी इनके मूल्य पर पड़ता है.
सोने के भंडार का मूल्य भी घटा
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के बीच देश के स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) के मूल्य में भी कमी आई है. RBI के आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में सोने के भंडार का मूल्य 2.288 अरब डॉलर घटकर 106.413 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी इसके मूल्य में 2.591 अरब डॉलर की गिरावट आई थी.
मार्च 2026 के अंत तक RBI के पास 880.52 टन सोना था. सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से इसके भंडार का डॉलर में मूल्य प्रभावित होता है. ऐसे में सोने के मूल्य में गिरावट का असर देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े पर भी पड़ता है.
SDR में बढ़ोतरी, IMF रिजर्व घटा
RBI के आंकड़ों के अनुसार, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भारत के विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights यानी SDR) में 15 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई. इसके बाद SDR का कुल भंडार बढ़कर 18.656 अरब डॉलर हो गया. इससे पिछले सप्ताह इसमें 97 मिलियन डॉलर की गिरावट आई थी.
वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रखे गए भारत के रिजर्व में 15 मिलियन डॉलर की कमी आई. इसके बाद यह घटकर 4.789 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी IMF रिजर्व में 86 मिलियन डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी.
इस तरह विदेशी मुद्रा आस्तियों और सोने के भंडार के मूल्य में कमी ने कुल विदेशी मुद्रा भंडार को नीचे खींचा है, जबकि SDR में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, चार सप्ताह में आई कुल गिरावट के पीछे अलग-अलग कारकों की भूमिका समझने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में RBI के हस्तक्षेप और विदेशी परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में हुए बदलावों को भी ध्यान में रखना होगा.
अमेरिका में ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप से जुड़ी PERM प्रक्रिया पर रोक के बाद भारतीय IT कंपनियों के कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं. हालांकि, इस कदम से मौजूदा H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होंगे.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका में आठ टेक्नोलॉजी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) कार्यक्रम से निलंबित किए जाने के बाद भारतीय IT सेक्टर में ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप और कर्मचारियों की नियुक्ति रणनीति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित कंपनियों में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इन्फोसिस, विप्रो, HCLTech, कॉग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और कैपजेमिनी शामिल हैं.
अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labour) ने इन कंपनियों से जुड़े नए PERM आवेदनों को स्वीकार करने और लंबित आवेदनों की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है. यह कार्रवाई रोजगार आधारित इमिग्रेशन कार्यक्रमों के कथित दुरुपयोग की जांच के बीच की गई है. PERM प्रक्रिया पर रोक का सीधा असर ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वाले कर्मचारियों पर पड़ सकता है, लेकिन इससे पहले से जारी H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होते.
इस फैसले ने अस्थायी वर्क वीजा और स्थायी निवास की प्रक्रिया के बीच अंतर को भी चर्चा में ला दिया है. यदि यह प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहता है, तो कंपनियों को कर्मचारियों को बनाए रखने और अमेरिका में अपने कार्यबल की योजना बनाने से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
PERM पर रोक का IT कंपनियों पर क्या होगा असर?
PERM ग्रीन कार्ड हासिल करने की नियोक्ता प्रायोजित प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है. इसके तहत अमेरिकी नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद के लिए योग्य अमेरिकी कर्मचारियों की उपलब्धता और भर्ती से जुड़ी निर्धारित शर्तें पूरी की गई हैं. इसके बाद कर्मचारी ग्रीन कार्ड की आगे की प्रक्रिया में बढ़ सकता है.
वहीं, H-1B वीजा विदेशी पेशेवरों को अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करने की अनुमति देता है. ऐसे में PERM प्रक्रिया पर रोक का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में काम कर रहे सभी प्रभावित कर्मचारियों की नौकरी या वीजा तत्काल समाप्त हो जाएगा. इसका मुख्य असर स्थायी निवास के लिए आवेदन की प्रक्रिया पर पड़ता है.
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने कहा है कि उसे इस रोक से अपनी कार्यबल रणनीति या ग्राहकों से जुड़े कामकाज पर किसी बड़े असर की आशंका नहीं है. कंपनी के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में उसके PERM आवेदनों की संख्या एकल अंक में रही है. TCS ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका में 15,000 अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती की अपनी योजना को भी दोहराया है. कंपनी स्थानीय भर्ती और कैंपस प्लेसमेंट को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा मानती है.
TCS का रुख बताता है कि इस फैसले का असर सभी कंपनियों पर एक जैसा होना जरूरी नहीं है. इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित कंपनी PERM प्रक्रिया का कितना इस्तेमाल करती है और अमेरिका में उसके कर्मचारियों की मौजूदा स्थिति क्या है. हालांकि, कंपनियों के स्तर पर आवेदनों और प्रभावित कर्मचारियों का विस्तृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने के कारण पूरे IT उद्योग पर पड़ने वाले असर का सटीक अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है.
Nasscom ने क्या कहा?
नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज (Nasscom) ने इस मामले में इमिग्रेशन और कुशल कर्मचारियों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही को अलग-अलग मुद्दे बताया है. उद्योग संगठन के मुताबिक, भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीय स्तर पर भर्ती बढ़ाई है और H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता कम की है. कंपनियों ने अमेरिकी बाजार में स्थानीय कार्यबल विकसित करने पर भी जोर दिया है.
Nasscom ने यह भी कहा कि H-1B वीजा पर काम करने वाले अपेक्षाकृत कम कर्मचारी PERM प्रक्रिया के जरिए स्थायी निवास हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं. संगठन के अनुसार, भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियां 80 से अधिक देशों में काम करती हैं और स्थानीय कानूनों व नियामकीय आवश्यकताओं का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
आगे क्या बदलेगी कंपनियों की रणनीति?
PERM प्रक्रिया पर रोक का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंध कितने समय तक लागू रहता है, कितने आवेदन प्रभावित होते हैं और संबंधित कंपनियां ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप पर कितनी निर्भर हैं. फिलहाल, प्रभावित कर्मचारियों की कुल संख्या और कंपनियों पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय असर को लेकर स्पष्ट आंकड़े सामने नहीं आए हैं.
भारतीय IT कंपनियों के लिए फिलहाल सबसे अहम सवाल लंबित आवेदनों की स्थिति और स्थायी निवास की प्रक्रिया में लगे कर्मचारियों पर पड़ने वाले प्रभाव का है. TCS, इन्फोसिस और विप्रो जैसी कंपनियों की प्रतिक्रियाओं के साथ अमेरिकी अधिकारियों की ओर से मिलने वाला अतिरिक्त स्पष्टीकरण यह तय करने में अहम होगा कि कंपनियों को अपनी भर्ती, कर्मचारी प्रतिधारण और कार्यबल नियोजन की रणनीति में कोई बदलाव करना पड़ेगा या नहीं.