2,900 करोड़ रुपये की राहत से अंबानी और निप्पॉन के खिलाफ SEBI की बड़ी कार्रवाई का आधार कमजोर

यस बैंक के AT-1 बॉन्ड को बहाल करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से SEBI की रिलायंस म्यूचुअल फंड जांच की मुख्य धारणा कमजोर पड़ गई है. इस मामले में यह माना गया था कि रिलायंस म्यूचुअल फंड ने जिन बॉन्ड में निवेश किया था, वे बेकार हो चुके थे.

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Wednesday, 21 October, 2026
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पलक शाह 

सुप्रीम कोर्ट के यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के अतिरिक्त टियर-1 (AT-1) बॉन्ड को बहाल करने के फैसले ने SEBI के म्यूचुअल फंड से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक की मुख्य धारणा को कमजोर कर दिया है. इस मामले में माना गया था कि रिलायंस म्यूचुअल फंड द्वारा खरीदे गए बॉन्ड बेकार हो चुके थे.

15 अक्टूबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यस बैंक, उसके पूर्व प्रशासक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत सरकार की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जो मार्च 2020 में बॉन्ड की रकम को बट्टे खाते में डालने के फैसले को रद्द करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के 2023 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बॉन्ड की रकम को बट्टे खाते में डालने का फैसला अधिकार क्षेत्र से बाहर था. अदालत ने प्रशासक की कार्रवाई को "पूरी तरह अवैध और अमान्य" बताया और निर्देश दिया कि बॉन्ड की मूल शर्तों के अनुसार कूपन भुगतान किया जाए.

अदालत ने पाया कि 13 मार्च, 2020 को अधिसूचित अंतिम पुनर्गठन योजना में जानबूझकर उस प्रावधान को हटा दिया गया था, जो मसौदा योजना में बॉन्ड की रकम को बट्टे खाते में डालने की अनुमति देता था. इसके बावजूद प्रशासक ने अगले ही दिन बॉन्ड की रकम को बट्टे खाते में डाल दिया. यह कार्रवाई बहुत देर से की गई, क्योंकि नियमों के अनुसार योजना लागू होने से पहले ऐसा करना जरूरी था. इसके अलावा, यह प्रशासक के अधिकार क्षेत्र से भी बाहर था, क्योंकि यह विकल्प RBI के पास था और उसने इसका इस्तेमाल नहीं किया था. अदालत ने RBI, प्रशासक और यस बैंक के आचरण को "संदेहास्पद" बताया.

इस फैसले का सीधा असर SEBI की 30 अगस्त, 2024 की कारण बताओ नोटिस पर पड़ता है. इस नोटिस में आरोप लगाया गया है कि रिलायंस म्यूचुअल फंड ने 2016 और 2017 में यस बैंक के AT-1 बॉन्ड में 2,150 करोड़ रुपये का निवेश किया था, जबकि यस बैंक ने रिलायंस कैपिटल समूह की कंपनियों को लगभग 3,400 करोड़ रुपये का कर्ज दिया था. SEBI का कहना है कि यह लेनदेन बदले में लाभ पहुंचाने की व्यवस्था थी, जिसके जरिए फंड के अपने प्रायोजक समूह की कंपनियों की निजी तौर पर जारी प्रतिभूतियों में निवेश पर लगी रोक को दरकिनार किया गया.

इस नोटिस में अनिल अंबानी, जय अनमोल अंबानी, राणा कपूर, एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC), जो अब निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट है, इसके पूर्व CEO संदीप सिक्का, फिक्स्ड इनकम प्रमुख अमित त्रिपाठी और मुख्य जोखिम अधिकारी मिलिंद नेसरिकर के नाम शामिल हैं. इन आरोपों को चुनौती दी गई है और अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया है.

नोटिस में छह योजनाओं के पास बचे बॉन्ड का मूल्य शून्य आंका गया था, क्योंकि ये बॉन्ड "पूरी तरह बट्टे खाते में डाल दिए गए थे". इसमें निवेशकों को 1,828.70 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया था. SEBI ने प्रमोटरों से यह रकम वापस योजनाओं में जमा कराने और AMC से प्रबंधन शुल्क के रूप में प्राप्त 88.59 करोड़ रुपये लौटाने की मांग की थी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इन बॉन्ड की पूरी कीमत बहाल हो जाती है. छह से सात वर्षों के 9% से 9.5% की दर से बकाया कूपन भुगतान से लगभग 1,040 करोड़ से 1,150 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिल सकते हैं. इस तरह संबंधित योजनाएं SEBI द्वारा आंके गए नुकसान की तुलना में लगभग 2,900 करोड़ रुपये की वसूली कर सकती हैं. हालांकि, अदालत ने देरी से किए जाने वाले कूपन भुगतान पर ब्याज देने का आदेश नहीं दिया है. जिन यूनिटधारकों ने बॉन्ड की रकम बट्टे खाते में डाले जाने के बाद अपनी यूनिट भुना ली थीं, उन्हें इसका लाभ शायद नहीं मिले.

नोटिस पाने वाले पक्षों के वकीलों से यह तर्क देने की उम्मीद है कि इस फैसले के बाद नोटिस का मूल आधार समाप्त हो गया है. उनका कहना होगा कि जिन योजनाओं को पूरा पैसा वापस मिल रहा है, उनमें 1,828.70 करोड़ रुपये दोबारा जमा कराने का निर्देश दोहरी वसूली के समान होगा. वे यह भी तर्क दे सकते हैं कि SEBI पूरक नोटिस जारी किए बिना नुकसान के किसी नए सिद्धांत पर भरोसा नहीं कर सकता.

हालांकि, SEBI के पास भी अपने तर्क हैं. उसके धोखाधड़ी रोधी नियम ऐसे आचरण पर लागू होते हैं, "चाहे कोई गलत लाभ हुआ हो या किसी नुकसान से बचा गया हो या नहीं". सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों की व्यापक व्याख्या की है. इस दृष्टिकोण के अनुसार, बॉन्ड के साथ आगे क्या हुआ, इससे अलग कथित व्यवस्था नियमों का उल्लंघन हो सकती है. फैसले में यह भी कहा गया है कि अदालत की टिप्पणियों का लंबित कार्यवाहियों पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. नोटिस में AMC पर अपनी आंतरिक निवेश सीमा का उल्लंघन करने का अलग आरोप भी है. यह सीमा एक समय 88.92% तक पहुंच गई थी. यह आरोप नुकसान होने या न होने पर निर्भर नहीं करता.

समय भी महत्वपूर्ण है. SEBI के नए निपटान नियम नवंबर में लागू होंगे. इनके तहत उन पक्षों को एक बार 90 दिन का अवसर मिलेगा, जिनके पहले के निपटान आवेदन खारिज कर दिए गए थे, ताकि वे दोबारा आवेदन कर सकें. हालांकि, इन नियमों के तहत जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों और आर्थिक अपराध कर फरार हुए लोगों के लिए निपटान की अनुमति नहीं है.

SEBI, निप्पॉन लाइफ इंडिया AMC और नोटिस में नामित व्यक्तियों ने टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री पुस्तक के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के शेयर बाजार घोटाले और उन लोगों के गठजोड़ को उजागर करती है, जो कथित तौर पर बिना किसी कार्रवाई के बच निकले. मुंबई में लगभग दो दशक की जमीनी रिपोर्टिंग के दौरान पलक ने वित्तीय बाजारों में धन, सत्ता और नियमन के बीच संबंधों की पड़ताल की है. उनके लेख द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेसलाइन जैसे प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध पत्रकारिता की ओर आकर्षित होने के बाद पलक ने महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई के गैंगवार की जगह कॉरपोरेट कार्यालयों में संचालित सफेदपोश अपराधों ने ले ली है. इसके बाद उन्होंने वित्तीय पत्रकारिता की ओर रुख किया और शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक के मामलों की पड़ताल की. उनका काम वित्तीय बाजारों की चमकदार सतह के पीछे छिपे गठजोड़ को सामने लाने पर केंद्रित है.)

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मीठा सौदा: फेयरफैक्स ने IDBI को सस्ते में खरीदा, अपनी कंपनियों की हिस्सेदारी पूरी कीमत पर बैंक में डाली

गणित चौंकाने वाला है. IDBI को 81 रुपये प्रति शेयर (बाजार भाव 90 रुपये के मुकाबले) पर हासिल करने के एक दिन बाद, प्रेम वत्स के समूह ने Go Digit और IIFL में अपनी हिस्सेदारी, जिसकी कीमत 18,500 करोड़ रुपये है, पूरी बाजार कीमत पर बैंक में डालने की योजना बनाई है. इसका भुगतान नकद में होगा या शेयरों के जरिए, यह अभी स्पष्ट नहीं है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2026
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पलक शाह 

फेयरफैक्स ने सरकार और LIC से बैंक सस्ते में खरीदा.

अब अपनी हिस्सेदारी बैंक में पूरी कीमत पर डालने की तैयारी.

फेयरफैक्स को 6,100 करोड़ रुपये की छूट, क्या इसकी कीमत IDBI चुकाएगा?

फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की योजना अपनी दो भारतीय वित्तीय कंपनियों में हिस्सेदारी को पूरी बाजार कीमत पर IDBI बैंक में स्थानांतरित करने की है. यह घोषणा सरकार द्वारा बैंक का नियंत्रण उसे बाजार मूल्यांकन से कम कीमत पर बेचने पर सहमति जताने के एक दिन बाद आई.

14 अक्टूबर को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने फेयरफैक्स की एक सहायक कंपनी को IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बेचने की मंजूरी दी. इस सौदे का कुल मूल्य लगभग 52,878 करोड़ रुपये है. सरकार अपनी 30.48% हिस्सेदारी बेच रही है, जबकि भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24% हिस्सेदारी बेचेगा. इसके बाद सरकार के पास 15% और LIC के पास 19% हिस्सेदारी बच जाएगी.

उस दिन IDBI बैंक के शेयर 90.39 रुपये पर बंद हुए थे. इस लिहाज से बिक्री मूल्य बाजार भाव से लगभग 10% कम है. कुल 652.8 करोड़ शेयरों के आधार पर कीमत का यह अंतर लगभग 6,100 करोड़ रुपये बैठता है.

अगले दिन फेयरफैक्स के चेयरमैन प्रेम वत्स ने कहा कि समूह बीमा कंपनी Go Digit में अपनी लगभग 57% हिस्सेदारी और फेयरफैक्स इंडिया की ब्रोकिंग कंपनी IIFL Capital में 30.5% हिस्सेदारी IDBI बैंक में स्थानांतरित करेगा. इनका मूल्यांकन "उनकी संबंधित बाजार कीमतों" पर किया जाएगा. 19 अक्टूबर को बाजार बंद होने के भाव के अनुसार, इन हिस्सेदारियों का मूल्य लगभग 18,500 करोड़ रुपये था, जो फेयरफैक्स द्वारा बैंक खरीदने के लिए चुकाई जा रही रकम का लगभग एक-तिहाई है.

इस तरह फेयरफैक्स बैंक को छूट पर खरीद रहा है, जबकि अपनी कंपनियों की हिस्सेदारी उसी बैंक में पूरी कीमत पर डालने की योजना बना रहा है.

नकद या शेयर?

फेयरफैक्स ने यह नहीं बताया है कि IDBI बैंक इस हिस्सेदारी के लिए भुगतान कैसे करेगा. अभी तक कोई बाध्यकारी समझौता भी नहीं हुआ है.

अगर IDBI नकद भुगतान करता है, तो यह पैसा बैंक की पूंजी से आएगा, जिसका आधार आम जमाकर्ताओं की बचत है. फेयरफैक्स पहले ही कह चुका है कि वह IDBI को खरीदने के लिए "उपलब्ध नकदी, मौजूदा क्रेडिट सुविधाओं और संभावित परिसंपत्ति बिक्री" से धन जुटाएगा. IDBI से फेयरफैक्स के अपने कारोबारों के लिए मिलने वाला पैसा बैंक खरीदने की लागत चुकाने में उसकी मदद कर सकता है.

अगर IDBI नए शेयर जारी करके भुगतान करता है, तो फेयरफैक्स की हिस्सेदारी 60.72% से ऊपर चली जाएगी और सरकार तथा LIC की बची हुई कुल 34% हिस्सेदारी का अनुपात घट जाएगा.

इस योजना के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) तथा बीमा नियामक IRDAI की मंजूरी जरूरी है. सरकार ने यह नहीं बताया है कि यह योजना फेयरफैक्स की बोली का हिस्सा थी या नहीं, और क्या सरकार के मूल्यांकनकर्ताओं ने इसे ध्यान में रखा था.

बोली के मुताबिक घटाई गई कीमत

2025-26 में बोली के पहले दौर के दौरान सरकार ने प्रति शेयर 94.42 रुपये का आरक्षित मूल्य तय किया था. बोलियां इस स्तर तक नहीं पहुंच सकीं और उन्हें मंजूरी नहीं दी गई.

अक्टूबर तक सरकार का बेंचमार्क घटकर 75.99 रुपये रह गया, जो पहले से लगभग 20% कम था. यह उन एजेंसियों के दो मूल्यांकनों का औसत था, जिनके नाम सरकार ने सार्वजनिक नहीं किए हैं. उनकी रिपोर्ट भी प्रकाशित नहीं की गई है. फेयरफैक्स की 81 रुपये प्रति शेयर की बोली इस बार तय सीमा से ऊपर रही.

इस सौदे में प्रतिस्पर्धा भी बहुत कम रह गई थी. कोटक महिंद्रा बैंक ने कहा है कि उसने कभी वित्तीय बोली लगाई ही नहीं थी. जुलाई में रॉयटर्स ने खबर दी थी कि एमिरेट्स NBD "सौदे को सक्रिय रूप से आगे नहीं बढ़ा रहा था" और सबसे आगे चल रहा फेयरफैक्स "सरकार के साथ बातचीत कर रहा था".

8 सितंबर को फेयरफैक्स की 81 रुपये प्रति शेयर की पेशकश की खबरें सामने आई थीं, जबकि किसी फैसले की घोषणा होने में अभी कई सप्ताह बाकी थे. उस दिन IDBI के शेयर 10.56% गिरकर 81.12 रुपये पर आ गए थे.

2003 का वादा

बैंक यूनियनें दिसंबर 2003 की ओर ध्यान दिलाती हैं, जब IDBI एक कंपनी बना था. द वायर के मुताबिक, तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने संसद में कहा था कि सरकार "हर परिस्थिति में" बैंक में कम से कम 51% हिस्सेदारी बनाए रखेगी. 2019 में LIC के नियंत्रण संभालने के बाद सरकार की अपनी हिस्सेदारी 51% से नीचे आ गई थी. मौजूदा बिक्री से बैंक पर सार्वजनिक क्षेत्र का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो जाएगा.

वत्स का प्रभाव

नवंबर 2014 में प्रेम वत्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी. यह मुलाकात फेयरफैक्स इंडिया की शुरुआत से कुछ समय पहले हुई थी. उसी महीने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, "श्री मोदी भारत के ली कुआन यू हैं." बिक्री को मंजूरी देने वाली समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं. हालांकि, ऐसा कोई सार्वजनिक साक्ष्य नहीं है कि इस मुलाकात का फैसले पर कोई असर पड़ा. आलोचकों का कहना है कि इस वजह से पूरी जानकारी सार्वजनिक करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि 81 रुपये प्रति शेयर की कीमत दोनों मूल्यांकनों से अधिक थी. एक मूल्यांकन में IDBI की तुलना दूसरे बैंकों से की गई थी, जबकि दूसरे में जमीन और संपत्ति सहित उसकी परिसंपत्तियों का मूल्यांकन किया गया था. सरकार का कहना है कि उसने बाजार मूल्य को अलग रखा, क्योंकि शेयर की कीमत में उतार-चढ़ाव बैंक के वास्तविक मूल्य को नहीं दर्शाता था. IDBI के केवल लगभग 5% शेयरों का ही सार्वजनिक बाजार में कारोबार होता है.

अधिकारियों ने इसे भारत के वित्तीय क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश बताया है. फेयरफैक्स का कहना है कि वह "भारत से दुनिया का बेहतरीन वित्तीय संस्थान" बनाना चाहता है.

16 अक्टूबर को बैंक यूनियनों ने काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया था. मंजूरी मिलने के बाद के दो दिनों में IDBI के शेयर 7% से अधिक गिर गए.

वे सवाल जिनके जवाब अभी बाकी हैं

- क्या Go Digit और IIFL में हिस्सेदारी स्थानांतरित करने की योजना फेयरफैक्स की बोली का हिस्सा थी और क्या कैबिनेट को इसकी जानकारी थी?
- IDBI भुगतान नकद में करेगा या शेयरों के जरिए?
- फेयरफैक्स की कंपनियों का मूल्यांकन कौन करेगा और क्या सरकार तथा LIC को इस पर मतदान करने का अधिकार मिलेगा?
- क्या सौदा पूरा होने से पहले मूल्यांकन रिपोर्ट संसद के सामने रखी जाएंगी?

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
 

 


हवाई किराये पर सरकार लगा सकती है लगाम, असाधारण परिस्थितियों में रूट के हिसाब से तय होगी सीमा

भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत तैयार किए गए इन प्रस्तावित नियमों को प्रशासनिक मंजूरी मिल चुकी है और इन्हें जल्द अधिसूचित किए जाने की उम्मीद है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2026
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Wednesday, 21 October, 2026
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हवाई टिकटों की आसमान छूती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार नए नियम लाने की तैयारी कर रही है. इसके तहत आपात स्थिति या किसी खास रूट पर अचानक मांग बढ़ने की स्थिति में सरकार किराये की अधिकतम सीमा तय कर सकती है. हालांकि, सरकार का इरादा सभी उड़ानों के किराये को नियमित रूप से नियंत्रित करने का नहीं है. नए नियमों के तहत एयरलाइंस को अलग-अलग रूट पर वसूले जाने वाले किराये का ब्योरा नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) को देना होगा.

हवाई यात्रियों को महंगे टिकटों से राहत देने के लिए केंद्र सरकार असाधारण परिस्थितियों में चुनिंदा हवाई मार्गों पर किराये की सीमा तय करने का अधिकार अपने पास रखने पर विचार कर रही है. प्रस्तावित नियामकीय ढांचे का उद्देश्य आपात स्थिति और अचानक बढ़ती मांग के दौरान एयरलाइंस की ओर से मनमाना किराया वसूलने पर रोक लगाना है.

भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत तैयार किए गए इन प्रस्तावित नियमों को प्रशासनिक मंजूरी मिल चुकी है और इन्हें जल्द अधिसूचित किए जाने की उम्मीद है. केंद्र सरकार ने 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि नियमों को अंतिम रूप दिया जा चुका है. अदालत ने सरकार को 16 नवंबर तक नियम पेश करने का निर्देश दिया है.

हर रूट के किराये पर रखी जाएगी नजर

प्रस्तावित नियमों के तहत एयरलाइंस को अपने किराये की संरचना का ब्योरा समय-समय पर नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) को देना होगा. इसमें अलग-अलग हवाई मार्गों पर वसूले जाने वाले किराये की सीमा भी शामिल होगी.

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एयरलाइंस नियामक के सामने घोषित अधिकतम किराये से ज्यादा वसूली न करें. इसके अलावा, किसी असाधारण परिस्थिति में किसी खास रूट पर मांग अचानक बढ़ने और टिकटों की कीमतों में अनुचित उछाल आने पर सरकार अस्थायी रूप से हस्तक्षेप कर सकेगी.

सरकार का प्रयास यात्रियों को अत्यधिक महंगे टिकटों से बचाने और एयरलाइंस को कारोबारी स्वतंत्रता देने के बीच संतुलन बनाने का है. सरकार सभी उड़ानों के किराये पर नियमित नियंत्रण लगाने के पक्ष में नहीं है. विमानन कंपनियों की परिचालन लागत पहले से अधिक होने के कारण व्यापक स्तर पर किराया नियंत्रण से बचने की कोशिश की जा रही है.

त्योहारों के दौरान हवाई किराये में बढ़ोतरी से चिंता

त्योहारी सीजन में हवाई टिकटों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है. रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल की समान अवधि की तुलना में इस साल 1 सितंबर से 10 नवंबर के बीच कुछ प्रमुख रूट पर औसत एकतरफा हवाई किराये में भारी वृद्धि दर्ज की गई.

दिल्ली-हैदराबाद रूट पर औसत किराया 68 फीसदी, मुंबई-कोलकाता रूट पर 51 फीसदी और दिल्ली-गोवा रूट पर 39 फीसदी बढ़ा.

किराये में इस तरह की बढ़ोतरी से हवाई यात्रा की किफायत को लेकर चिंता बढ़ी है. इसका असर खासतौर पर उन यात्रियों पर पड़ता है, जिन्हें आपात स्थिति में या छुट्टियों के व्यस्त समय में अचानक यात्रा करनी पड़ती है.

ऐसे यात्रियों के पास यात्रा की तारीख बदलने या पहले से टिकट बुक करने का विकल्प सीमित होता है. ऐसे में उन्हें अधिक मांग के समय ऊंची कीमत पर टिकट खरीदना पड़ सकता है.

हवाई किराये पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई

हवाई टिकटों की मनमानी कीमतों और अतिरिक्त शुल्कों पर नियंत्रण की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है. सुनवाई के दौरान अदालत ने एक ही रूट पर अलग-अलग एयरलाइंस की ओर से वसूले जाने वाले किराये में अंतर का मुद्दा उठाया और यात्रियों को राहत देने की जरूरत पर जोर दिया.

याचिका में दलील दी गई है कि डायनेमिक प्राइसिंग व्यवस्था के कारण उन यात्रियों को अधिक परेशानी होती है, जिनके पास यात्रा की तारीख और समय बदलने की सुविधा नहीं होती. मांग अधिक होने पर उन्हें महंगे टिकट खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.

सरकार का प्रस्तावित नियामकीय ढांचा इसी तरह की परिस्थितियों में हस्तक्षेप का विकल्प उपलब्ध करा सकता है. हालांकि, इसका वास्तविक असर नियमों में तय शर्तों और उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा.

एयरलाइंस की लागत और मुनाफे का भी रखना होगा ध्यान

हवाई किराये पर नियंत्रण की व्यवस्था तैयार करते समय सरकार को विमानन क्षेत्र की वित्तीय स्थिति का भी ध्यान रखना होगा. एयरलाइंस को एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF), विमान लीज, रखरखाव और एयरपोर्ट शुल्क जैसी कई बड़ी लागतों का सामना करना पड़ता है.

इसके अलावा, किसी रूट पर उड़ानों की सीमित उपलब्धता और यात्रियों की अचानक बढ़ती मांग से भी टिकटों की कीमतों में तेजी आ सकती है.

ऐसे में सभी रूट पर एक समान किराया सीमा लागू करने से एयरलाइंस की परिचालन लागत के अनुरूप कीमतें तय करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसलिए प्रस्तावित व्यवस्था में व्यापक किराया नियंत्रण के बजाय असाधारण परिस्थितियों में चुनिंदा रूट पर सीमित अवधि के लिए हस्तक्षेप पर जोर दिया जा रहा है.

इस व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार असाधारण परिस्थितियों की परिभाषा कैसे तय करती है, एयरलाइंस की ओर से दिए गए किराये के ब्योरे की निगरानी कैसे होती है और नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर किस तरह कार्रवाई की जाती है.

16 नवंबर तक नियम पेश करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से 16 नवंबर तक अंतिम नियम पेश करने को कहा है. अदालत में चल रही सुनवाई के कारण सरकार के लिए हवाई किराये में उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए औपचारिक नियामकीय ढांचा तैयार करना महत्वपूर्ण हो गया है.

यदि प्रस्तावित नियम अधिसूचित होते हैं, तो घरेलू हवाई टिकटों की कीमतों की निगरानी के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है. अभी तक किराये मुख्य रूप से बाजार की मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होते रहे हैं.

हालांकि, नियमों की औपचारिक अधिसूचना होने तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि सरकार किन परिस्थितियों में किराये की अधिकतम सीमा तय कर सकेगी और यात्रियों को राहत देने के लिए कौन-से मानदंड अपनाए जाएंगे.


आंध्र प्रदेश के मुलापेटा पोर्ट में 49-50% हिस्सेदारी लेना चाहता है विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी, जानें क्या है योजना

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में स्थित मुलापेटा पोर्ट को राज्य सरकार ग्रीनफील्ड मल्टीपर्पज पोर्ट के रूप में विकसित कर रही है. परियोजना के पहले चरण पर करीब 3,670 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है.

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Published - Wednesday, 21 October, 2026
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Wednesday, 21 October, 2026
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विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी (VPA) आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से विकसित किए जा रहे मुलापेटा पोर्ट में 49-50 फीसदी हिस्सेदारी लेने की योजना बना रही है. इसके लिए प्राधिकरण ने पोर्ट की विशेष प्रयोजन कंपनी (SPV) में इक्विटी निवेश के साथ पहले और दूसरे चरण में दो-दो बर्थ आवंटित करने का प्रस्ताव दिया है. इस पहल का उद्देश्य कोयला और लौह अयस्क जैसे बल्क कार्गो का संचालन विशाखापत्तनम से मुलापेटा स्थानांतरित करना और मौजूदा पोर्ट पर भीड़ कम करना है.

विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी (VPA) आंध्र प्रदेश में समुद्री बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में मुलापेटा पोर्ट में बड़ी हिस्सेदारी लेने पर विचार कर रही है. प्राधिकरण ने राज्य सरकार के सामने पोर्ट में 49-50 फीसदी इक्विटी हिस्सेदारी लेने का प्रस्ताव रखा है. इसके साथ ही पहले चरण में दो और दूसरे चरण में दो बर्थ आवंटित करने की मांग भी की गई है.

इस प्रस्ताव से मुलापेटा पोर्ट की व्यावसायिक व्यवहार्यता मजबूत होने की उम्मीद है. वहीं, विशाखापत्तनम पोर्ट पर बढ़ते कार्गो दबाव को कम करने और अतिरिक्त माल ढुलाई क्षमता विकसित करने में भी मदद मिल सकती है.

राज्य सरकार करेगी प्रस्ताव की समीक्षा

आंध्र प्रदेश सरकार इस प्रस्ताव के तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं की जांच कर रही है. इसके लिए वित्त मंत्री पय्यावुला केशव, निवेश मंत्री बीसी जनार्दन रेड्डी और पर्यटन मंत्री कंडुला दुर्गेश की अध्यक्षता में मंत्रियों का एक समूह (GoM) गठित किया गया है.

यह समूह प्रस्ताव के विभिन्न पहलुओं पर विचार करेगा और दोनों पक्षों के बीच सहमति से शर्तें तय करने की दिशा में काम करेगा. इसके बाद अंतिम निर्णय के लिए प्रस्ताव राज्य मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा.

VPA ने पोर्ट की विशेष प्रयोजन कंपनी को हस्तांतरित की जाने वाली नमक भूमि के उचित मूल्यांकन की मांग भी की है. भूमि हस्तांतरण और इक्विटी हिस्सेदारी से जुड़ी शर्तें परियोजना की कुल वित्तीय संरचना तथा केंद्र और राज्य सरकारों की भागीदारी तय करने में अहम होंगी.

बल्क कार्गो का संचालन स्थानांतरित करने की योजना

मुलापेटा पोर्ट में निवेश की योजना का प्रमुख उद्देश्य कोयले और लौह अयस्क जैसे बल्क कार्गो के संचालन को विशाखापत्तनम से मुलापेटा स्थानांतरित करना है. इससे मौजूदा पोर्ट पर माल ढुलाई का दबाव कम होने और जहाजों के आने-जाने तथा माल लोडिंग-अनलोडिंग में लगने वाले समय में सुधार होने की उम्मीद है.

पोर्ट पर भीड़ कम होने से शिपिंग कंपनियों की डेमरेज लागत यानी जहाजों के निर्धारित समय से अधिक रुकने पर लगने वाला शुल्क भी घट सकता है. इसके अलावा, शहर के आसपास धूल पैदा करने वाले कार्गो के संचालन से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है.

VPA के लिए मुलापेटा पोर्ट में हिस्सेदारी से अतिरिक्त कार्गो क्षमता उपलब्ध होगी. इससे प्राधिकरण बढ़ती माल ढुलाई जरूरतों को पूरा करने के साथ विशाखापत्तनम पोर्ट के परिचालन को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में कदम उठा सकेगा.

राज्य सरकार को उम्मीद है कि बल्क कार्गो का संचालन मुलापेटा स्थानांतरित होने से पोर्ट की व्यावसायिक गतिविधियों को शुरुआती दौर से ही मजबूती मिलेगी. इसके साथ ही आसपास के क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों और आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिल सकता है.

मुलापेटा पोर्ट की क्षमता 2.35 करोड़ टन होगी

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में स्थित मुलापेटा पोर्ट को राज्य सरकार ग्रीनफील्ड मल्टीपर्पज पोर्ट के रूप में विकसित कर रही है. परियोजना के पहले चरण पर करीब 3,670 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है.

पहले चरण में पोर्ट की सालाना कार्गो हैंडलिंग क्षमता 2.35 करोड़ टन निर्धारित की गई है. इस चरण में कुल चार बर्थ विकसित करने की योजना है, जिनमें तीन सामान्य कार्गो के लिए और एक कोयले की हैंडलिंग के लिए होगी.

VPA ने परियोजना के दूसरे चरण के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) भी तैयार की है. इसके जरिए पोर्ट की क्षमता को आगे बढ़ाने की योजना है. प्राधिकरण पहले भी मुलापेटा को बड़े पोर्ट के रूप में विकसित करने के लिए करीब 1,500 करोड़ रुपये के निवेश में रुचि दिखा चुका है. इसके साथ ही पोर्ट आधारित औद्योगिक केंद्र विकसित करने के लिए आसपास की जमीन हासिल करने की योजना भी सामने आई थी.

प्रस्तावित इक्विटी साझेदारी और बर्थ आवंटन से पोर्ट के विकास को VPA की कार्गो हैंडलिंग रणनीति के अनुरूप आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है. हालांकि, निवेश और संचालन से जुड़ी अंतिम शर्तें राज्य सरकार की समीक्षा और मंजूरी पर निर्भर करेंगी.

आंध्र प्रदेश के समुद्री क्षेत्र को मिलेगा बढ़ावा

मुलापेटा पोर्ट में प्रस्तावित निवेश आंध्र प्रदेश के समुद्री बुनियादी ढांचे का विस्तार करने और व्यापार तथा लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में राज्य की भूमिका मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है.

पोर्ट की क्षमता बढ़ने से औद्योगिक वस्तुओं की आवाजाही आसान हो सकती है. साथ ही, बेहतर कनेक्टिविटी और पोर्ट आधारित उद्योगों के विकास से क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी.

हालांकि, परियोजना की दीर्घकालिक सफलता काफी हद तक सड़क और रेल कनेक्टिविटी के समय पर विकास, जमीन की उपलब्धता और प्रस्तावित स्वामित्व ढांचे पर सहमति बनने पर निर्भर करेगी.

राज्य सरकार की समीक्षा के बाद यह स्पष्ट होगा कि मुलापेटा पोर्ट में VPA की कितनी हिस्सेदारी होगी और पोर्ट के विकास तथा संचालन की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच किस तरह साझा की जाएगी.


टाटा संस से 25,000 करोड़ रुपये के शेयर बायबैक पर विचार करने की मांग, कर्ज चुकाने के लिए SP ग्रुप को फंड की जरूरत

SP ग्रुप की टाटा संस में करीब 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है, जो स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट्स कॉरपोरेशन और साइरस इन्वेस्टमेंट्स के माध्यम से रखी गई है. ग्रुप अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को भुनाकर वित्तीय स्थिति मजबूत करना चाहता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2026
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कर्ज के बोझ से जूझ रहा शापूरजी पल्लोनजी (SP) ग्रुप टाटा संस में अपनी करीब 18.4 फीसदी हिस्सेदारी के एक हिस्से को भुनाकर फंड जुटाना चाहता है. इसके लिए ग्रुप ने टाटा संस से लगभग 25,000 करोड़ रुपये के शेयर बायबैक प्रस्ताव को अगली बोर्ड बैठक में प्राथमिकता देने की मांग की है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के टाटा संस की लिस्टिंग से जुड़े रुख के बीच यह प्रस्ताव अहम हो गया है.

कर्ज के बोझ से जूझ रहे शापूरजी पल्लोनजी (SP) ग्रुप ने टाटा संस से करीब 25,000 करोड़ रुपये के शेयर बायबैक प्रस्ताव पर जल्द विचार करने का आग्रह किया है. मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, ग्रुप चाहता है कि टाटा संस की अगली बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव को प्राथमिकता दी जाए. इससे मिलने वाली रकम का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए किया जा सकता है.

इस प्रस्ताव को टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा संस की पिछली बोर्ड बैठक में रखा था. फिलहाल यह प्रस्ताव विचाराधीन है. SP ग्रुप की टाटा संस में करीब 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है, जो स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट्स कॉरपोरेशन और साइरस इन्वेस्टमेंट्स के माध्यम से रखी गई है. ग्रुप अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को भुनाकर वित्तीय स्थिति मजबूत करना चाहता है.

SP ग्रुप को फंड की तत्काल जरूरत

प्रस्तावित लेनदेन के तहत 18 महीने की अवधि में टाटा संस की शेयर पूंजी में चुनिंदा कटौती की योजना पर विचार किया जा रहा है. इससे SP ग्रुप को कम से कम 25,000 करोड़ रुपये की कुल रकम मिल सकती है. शेयरों का मूल्यांकन लागू आयकर नियमों के तहत निर्धारित उचित बाजार मूल्य के आधार पर किए जाने का प्रस्ताव है.

SP ग्रुप लंबे समय से टाटा संस में अपने निवेश को भुनाने के विकल्प तलाश रहा है. इसका उद्देश्य बैलेंस शीट को मजबूत करना और कर्ज का बोझ कम करना है. टाटा संस में ग्रुप की हिस्सेदारी कर्ज के बदले गिरवी रखी गई है, इसलिए यह निवेश उसके लिए फंड जुटाने का एक अहम संभावित स्रोत है.

ग्रुप ने जुलाई में 21,500 करोड़ रुपये की रीफाइनेंसिंग प्रक्रिया पूरी की थी. इसके बाद करीब 3,500 करोड़ रुपये के बॉन्ड का भुगतान भी किया गया, जिससे तत्काल नकदी संबंधी दबाव कुछ कम हुआ. हालांकि, कर्ज की अन्य देनदारियों को पूरा करने और वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए ग्रुप को अतिरिक्त फंड की जरूरत बनी हुई है.

शेयर पूंजी में चुनिंदा कटौती का प्रस्ताव इसी दिशा में एक विकल्प है. हालांकि, इस लेनदेन की अंतिम संरचना, शेयरों का मूल्यांकन और फंड जुटाने का तरीका अभी चर्चा और जरूरी मंजूरियों पर निर्भर करेगा.

RBI के लिस्टिंग निर्देश से बढ़ी चुनौती

यह घटनाक्रम टाटा संस के भविष्य के स्वामित्व ढांचे को लेकर जारी अनिश्चितता के बीच सामने आया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस के अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने के आवेदन को खारिज कर दिया था.

RBI के नियमों के तहत अपर-लेयर NBFC को निर्धारित समयसीमा के भीतर अपने इक्विटी शेयर किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट कराने होते हैं. इस निर्देश के बाद टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर बहस तेज हो गई है. अब सवाल यह है कि कंपनी निजी स्वामित्व में बनी रहेगी या शेयर बाजार में लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ेगी.

SP ग्रुप ने टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर RBI के रुख का समर्थन किया है. ग्रुप के चेयरमैन शापूर मिस्त्री पहले भी पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही के लिहाज से लिस्टिंग के पक्ष में अपनी राय रख चुके हैं.

हालांकि, ग्रुप की तत्काल वित्तीय जरूरतों के कारण वह लिस्टिंग का इंतजार किए बिना अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को भुनाने का विकल्प भी तलाश रहा है.

दूसरी ओर, टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स सार्वजनिक लिस्टिंग का विरोध करते रहे हैं. उनका तर्क है कि मौजूदा स्वामित्व ढांचे को बनाए रखने से समूह की परोपकारी गतिविधियों को जारी रखने में मदद मिलेगी. इन गतिविधियों के लिए कुछ हद तक टाटा कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड का इस्तेमाल किया जाता है.

शेयर बायबैक प्रस्ताव के सामने कानूनी अड़चनें

प्रस्ताव को लागू करने के लिए कानूनी और नियामकीय प्रावधानों पर विचार करना होगा. कंपनी के शेयरों की चुनिंदा पूंजी कटौती सामान्य शेयर बायबैक से अलग प्रक्रिया है. कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 66 के तहत इस तरह की चुनिंदा पूंजी कटौती के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) की मंजूरी जरूरी होती है.

इसके अलावा, शेयरों के मूल्यांकन, सभी शेयरधारकों के हितों की निष्पक्षता और टाटा संस के फंड के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं. कंपनी को अपनी भविष्य की निवेश जरूरतों और संभावित लिस्टिंग को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव का आकलन करना होगा.

टाटा संस को इस प्रस्ताव पर फैसला लेते समय अपनी पूंजी संबंधी जरूरतों, शेयरधारकों के हितों और नियामकीय दायित्वों के बीच संतुलन बनाना होगा. लेनदेन की संरचना और समयसीमा को लेकर होने वाला फैसला SP ग्रुप की वित्तीय स्थिति के साथ-साथ टाटा संस के दीर्घकालिक स्वामित्व ढांचे को भी प्रभावित कर सकता है.


भारत-UAE का व्यापार 100 अरब डॉलर के पार, पश्चिम एशिया संकट पर जयशंकर ने जताई चिंता

मंगलवार को मुंबई में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और UAE के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान के बीच क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा हुई.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2026
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भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मंगलवार को मुंबई में UAE के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान के साथ बैठक के दौरान यह जानकारी दी. दोनों देशों के बीच 2022 में व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) लागू होने के बाद व्यापारिक संबंधों में तेजी आई है.

बैठक में पश्चिम एशिया के बिगड़ते हालात, खाड़ी क्षेत्र में तनाव, क्षेत्रीय शांति और द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा हुई. जयशंकर ने क्षेत्र की स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए तनाव कम करने के लिए बातचीत और कूटनीति का रास्ता अपनाने की जरूरत पर जोर दिया.

यह बैठक ऐसे समय हुई है, जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ने से ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका है. जयशंकर ने व्यापार, ऊर्जा और उर्वरकों की निर्बाध, सुरक्षित और सुचारु आवाजाही सुनिश्चित करने के महत्व को भी रेखांकित किया.

भारत-UAE व्यापार 100 अरब डॉलर के पार

जयशंकर ने कहा कि व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार 100 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है. दोनों देशों के बीच निवेश भी लगातार बढ़ रहा है.

CEPA एक मई 2022 से लागू हुआ था. इस समझौते का उद्देश्य व्यापारिक बाधाओं को कम करना और दोनों देशों के कारोबारियों के लिए बाजार तक पहुंच आसान बनाना है. इसके बाद भारत और UAE के बीच वस्तुओं, सेवाओं और बुनियादी ढांचे सहित कई क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग बढ़ा है.

दोनों देशों ने 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता और पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद दोनों देश व्यापारिक संबंधों का विस्तार करना चाहते हैं. बढ़ते कारोबारी भरोसे से दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच निवेश को भी समर्थन मिल रहा है.

ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर

बैठक में ऊर्जा सुरक्षा प्रमुख मुद्दों में शामिल रही. पश्चिम एशिया में तनाव से महत्वपूर्ण आपूर्ति मार्गों पर असर पड़ने और ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ने की आशंका है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा संसाधनों से पूरा करता है. ऐसे में खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत के आर्थिक हितों के लिए महत्वपूर्ण है. इन मार्गों पर किसी भी तरह की बाधा से तेल और गैस के अलावा उर्वरकों तथा अन्य जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है.

जयशंकर ने क्षेत्र में शांति बहाल करने और कूटनीतिक बातचीत को बढ़ावा देने वाली पहलों के प्रति भारत का समर्थन दोहराया. उन्होंने UAE में रह रहे भारतीय समुदाय की भलाई सुनिश्चित करने के लिए वहां के नेतृत्व का आभार भी जताया.

दोनों देशों के बीच हुई चर्चा से यह स्पष्ट हुआ कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और व्यापारिक आपूर्ति को सुरक्षित रखना दोनों के साझा हित में है.

रक्षा और तकनीक में भी बढ़ेगा सहयोग

भारत और UAE व्यापार तथा ऊर्जा के अलावा रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं. हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों का रणनीतिक महत्व बढ़ा है. जयशंकर के अनुसार, दोनों देशों के बीच रक्षा और तकनीक संबंधी सहयोग अब रणनीतिक आयाम ले रहा है. इसके साथ आर्थिक संबंधों और लोगों के बीच संपर्क को भी मजबूत किया जा रहा है. सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भी दोनों देशों की साझेदारी को व्यापक बनाने में भूमिका निभाई है.

UAE में बड़ी संख्या में भारतीय रहते और काम करते हैं. यह समुदाय रोजगार, धन प्रेषण, कारोबारी नेटवर्क और पारिवारिक संबंधों के जरिए दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बना हुआ है. शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान की यात्रा से दोनों देशों को अपनी रणनीतिक साझेदारी की समीक्षा करने और क्षेत्रीय चुनौतियों पर आपसी तालमेल बढ़ाने का अवसर मिला है. पश्चिम एशिया में जारी अनिश्चितता के बीच भारत और UAE के संबंधों का महत्व व्यापार, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से लगातार बढ़ रहा है.
 


Jio IPO: आज खुला देश का सबसे बड़ा IPO, रिलायंस के शेयरधारकों को भी मौका; जानें प्राइस बैंड और GMP

शेयरधारक श्रेणी में पात्र निवेशक ऊपरी प्राइस बैंड पर अधिकतम 14 लॉट यानी 168 शेयरों के लिए आवेदन कर सकते हैं. इसके लिए करीब 1.88 लाख रुपये की जरूरत होगी. शेयरों का आवंटन मांग और संबंधित श्रेणी के नियमों के अनुसार किया जाएगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2026
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मुकेश अंबानी की कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स (Jio Platforms) का बहुप्रतीक्षित IPO आज, 21 अक्टूबर को सब्सक्रिप्शन के लिए खुल गया है. करीब 30,213 करोड़ रुपये का यह इश्यू भारतीय शेयर बाजार के सबसे बड़े IPO में शामिल है. इसमें निवेशक 23 अक्टूबर तक बोली लगा सकते हैं. खास बात यह है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों के लिए भी 2,500 करोड़ रुपये तक के शेयर आरक्षित किए गए हैं. IPO का प्राइस बैंड 1,065 से 1,119 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है. वहीं, ग्रे मार्केट में इसके शेयरों का प्रीमियम भी चर्चा में है.

30,213 करोड़ रुपये का IPO, 23 अक्टूबर तक मौका

जियो प्लेटफॉर्म्स का IPO 21 अक्टूबर से 23 अक्टूबर 2026 तक खुला रहेगा. कंपनी इस इश्यू के जरिए करीब 30,213 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है. IPO का प्राइस बैंड 1,065 से 1,119 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है.

इस IPO को लेकर निवेशकों में पहले से ही काफी दिलचस्पी देखी गई. कंपनी की एंकर बुक में करीब 8,110 करोड़ रुपये के आवंटन के मुकाबले लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये की बोलियां मिलने की खबर है. हालांकि, एंकर निवेशकों की बोलियों को आम निवेशकों के सब्सक्रिप्शन से अलग समझना चाहिए.

कितने रुपये से कर सकते हैं निवेश?

जियो प्लेटफॉर्म्स के IPO में आवेदन के लिए न्यूनतम 12 शेयरों का लॉट तय किया गया है. 1,119 रुपये के ऊपरी प्राइस बैंड के हिसाब से एक लॉट के लिए 13,428 रुपये लगाने होंगे. निवेशक 12 शेयरों के गुणक में बोली लगा सकते हैं.

शेयरधारक श्रेणी में पात्र निवेशक ऊपरी प्राइस बैंड पर अधिकतम 14 लॉट यानी 168 शेयरों के लिए आवेदन कर सकते हैं. इसके लिए करीब 1.88 लाख रुपये की जरूरत होगी. शेयरों का आवंटन मांग और संबंधित श्रेणी के नियमों के अनुसार किया जाएगा.

रिलायंस के शेयरधारकों के लिए भी रिजर्वेशन

इस IPO में रिलायंस इंडस्ट्रीज के पात्र शेयरधारकों के लिए 2,500 करोड़ रुपये तक के शेयर आरक्षित किए गए हैं. जिन निवेशकों के पास 14 अक्टूबर 2026 तक रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर थे, वे इस आरक्षण श्रेणी के तहत आवेदन करने के पात्र हैं. इसके बाद शेयर खरीदने वाले निवेशक इस विशेष श्रेणी के लिए पात्र नहीं होंगे.

पात्र निवेशक नियमों के अनुसार शेयरधारक और रिटेल, दोनों श्रेणियों में आवेदन कर सकते हैं. हालांकि, एक से अधिक श्रेणियों में आवेदन करने से शेयर मिलने की गारंटी नहीं होती.

कितना चल रहा है GMP?

IPO खुलने से पहले जियो प्लेटफॉर्म्स के शेयरों का ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) करीब 260 रुपये बताया गया था. 1,119 रुपये के ऊपरी प्राइस बैंड के मुकाबले यह लगभग 23.24% का प्रीमियम है. इस आधार पर शेयर की सांकेतिक कीमत करीब 1,379 रुपये बैठती है.

हालांकि, GMP अनौपचारिक बाजार का संकेतक है. इसमें तेजी या गिरावट आ सकती है और इसका वास्तविक लिस्टिंग कीमत से मेल खाना जरूरी नहीं है. इसलिए केवल GMP के आधार पर निवेश का फैसला करना जोखिम भरा हो सकता है.

कब होगा अलॉटमेंट और लिस्टिंग?

जियो प्लेटफॉर्म्स के IPO के शेयरों का अलॉटमेंट 26 अक्टूबर को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है. वहीं, शेयरों की BSE और NSE पर लिस्टिंग 28 अक्टूबर को संभावित है. इश्यू के ऊपरी प्राइस बैंड पर कंपनी का अनुमानित मूल्यांकन करीब 10.3 लाख करोड़ रुपये बैठता है. इस IPO पर बाजार की नजर इसलिए भी है क्योंकि इसका आकार, कंपनी का मूल्यांकन और रिलायंस के शेयरधारकों के लिए आरक्षण इसे निवेशकों के बीच चर्चा का विषय बना रहे हैं.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


नवरात्रि-दशहरा में कपड़ों और घरेलू उपकरणों की बिक्री 20% से ज्यादा बढ़ी, कारों की मांग भी मजबूत

इस साल नवरात्रि-दशहरा के दौरान कपड़ों, फुटवियर, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और वॉशिंग मशीनों की बिक्री में पिछले साल के मुकाबले 20% से ज्यादा की वृद्धि हुई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2026
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महंगाई के बावजूद नवरात्रि-दशहरा के त्योहारी सीजन में कपड़ों, जूतों और घरेलू उपकरणों की बिक्री में जोरदार उछाल देखने को मिला है. इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, इन उत्पादों की बिक्री पिछले साल के मुकाबले 20% से अधिक बढ़ी है. वहीं, पिछले साल GST दरों में कटौती के बाद बनी ऊंची मांग के बावजूद गाड़ियों की रिटेल बिक्री में 2% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, मेमोरी चिप की बढ़ती कीमतों के कारण स्मार्टफोन, लैपटॉप और टेलीविजन की बिक्री पर दबाव बना हुआ है.

आसान फाइनेंसिंग से बढ़ी खरीदारी

इस साल नवरात्रि-दशहरा के दौरान कपड़ों, फुटवियर, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और वॉशिंग मशीनों की बिक्री में पिछले साल के मुकाबले 20% से ज्यादा की वृद्धि हुई है. इंडस्ट्री के अनुमानों के अनुसार, इन उत्पादों की बिक्री के साथ बेची गई यूनिट्स की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है. जानकारों का मानना है कि आसान फाइनेंसिंग विकल्पों और EMI की सुविधा ने ग्राहकों को खरीदारी के लिए प्रोत्साहित किया है.

पिछले साल GST दरों में कटौती के बाद बाजार में खरीदारी में भारी उछाल आया था. ऐसे में इस साल बिक्री की तुलना पिछले साल के ऊंचे आधार से की जा रही है. इसके बावजूद कई उत्पाद श्रेणियों में मजबूत मांग देखने को मिली है.

गाड़ियों की बिक्री में 2% की बढ़ोतरी

नवरात्रि के दौरान गाड़ियों की रिटेल बिक्री में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई. डीलरों के अनुमानों के मुताबिक, 11 से 19 अक्टूबर के बीच करीब 10.3 लाख गाड़ियां बिकीं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा लगभग 10.1 लाख यूनिट था. इस तरह बिक्री में करीब 2% की वृद्धि हुई.

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन्स (FADA) के अध्यक्ष साई गिरिधर ने कहा कि गाड़ियों की रिटेल बिक्री में इस सीमित बढ़ोतरी को सीधे तौर पर पिछले साल के प्रदर्शन से नहीं आंकना चाहिए. पिछले साल GST दरों में कटौती के बाद बाजार में अचानक मांग बढ़ी थी. उन्होंने बताया कि GST दरों में कटौती से ठीक एक महीने पहले कारों की बिक्री लगभग ठप जैसी स्थिति में थी, जिसके बाद मांग में तेज उछाल आया.

देश की प्रमुख दोपहिया वाहन कंपनी हीरो मोटोकॉर्प की इंडिया बिजनेस यूनिट के चीफ बिजनेस ऑफिसर आशुतोष वर्मा के मुताबिक, ऊंचे आधार के बावजूद इस साल नवरात्रि में रिटेल बिक्री पिछले साल के स्तर से बेहतर रही. इस दौरान स्कूटर की बिक्री खास तौर पर मजबूत रही.

कपड़ों और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री में तेजी

लाइफस्टाइल और फुटवियर रिटेलर वुडलैंड ने त्योहारी सीजन के दौरान 20% से अधिक की बिक्री वृद्धि दर्ज की. वहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स रिटेल चेन विजय सेल्स की बिक्री में भी 20% से ज्यादा का उछाल आया. कंपनी के यहां एयर कंडीशनर की बिक्री में 50% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई.

इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों ने मांग बनाए रखने के लिए ग्राहकों को अतिरिक्त सुविधाएं दीं. इसके तहत EMI की अवधि बढ़ाई गई और एंट्री-लेवल उत्पादों की खरीदारी के लिए भी फाइनेंसिंग विकल्प बढ़ाए गए. इसके अलावा, अक्टूबर से लागू होने वाली कुछ कीमतों में बढ़ोतरी को दिवाली तक टाल दिया गया, ताकि त्योहारी सीजन में ग्राहकों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े.

इंडस्ट्री के अधिकारियों के अनुसार, नवरात्रि के दौरान LG, गोदरेज अप्लायंसेज, हायर और हैवल्स के स्वामित्व वाले लॉयड की बिक्री में 20% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई. इससे संकेत मिलता है कि घरेलू उपकरणों की मांग में मजबूती बनी हुई है.

स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी की बिक्री पर दबाव

जहां कपड़ों और घरेलू उपकरणों की बिक्री में तेजी रही, वहीं स्मार्टफोन, लैपटॉप और टेलीविजन की बिक्री को चुनौतियों का सामना करना पड़ा. मेमोरी चिप की कीमतों में दो से तीन गुना तक बढ़ोतरी होने से इन उत्पादों की लागत बढ़ गई है. इसका असर ग्राहकों की खरीदारी क्षमता पर पड़ा है.

इंडस्ट्री के अधिकारियों के मुताबिक, मेमोरी चिप जैसे महंगे कंपोनेंट इस्तेमाल करने वाले उत्पादों की औसत कीमत पिछले साल की दिवाली के मुकाबले 15% से 40% तक बढ़ गई है. हालांकि, प्रीमियम श्रेणी के उत्पादों की मांग पर इसका असर अपेक्षाकृत कम रहा है.

स्मार्टफोन की ऑनलाइन और ऑफलाइन बिक्री घटी

काउंटरपॉइंट रिसर्च के अनुमान के मुताबिक, नवरात्रि के दौरान ऑनलाइन स्मार्टफोन बिक्री में पिछले साल की तुलना में 16% की गिरावट आई. वहीं, ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन के अनुसार, ऑफलाइन बाजार में स्मार्टफोन की बिक्री करीब 20% कम रही.

एसोसिएशन ने बताया कि देशभर में स्मार्टफोन की बिक्री का कुल मूल्य लगभग स्थिर रहा. हालांकि, गुजरात में स्थिति अलग रही, जहां बिक्री की मात्रा में 15% की वृद्धि दर्ज की गई.

कुल मिलाकर, इस त्योहारी सीजन में ग्राहकों ने कपड़ों, फुटवियर और घरेलू उपकरणों पर खर्च बढ़ाया है. आसान EMI और फाइनेंसिंग विकल्पों ने खरीदारी को सहारा दिया, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों में बढ़ती लागत के कारण स्मार्टफोन समेत कुछ श्रेणियों की मांग प्रभावित हुई.


शेयर बाजार में आज लौटेगी तेजी? गिफ्ट निफ्टी में उछाल, रिलायंस से लेकर इन्फोसिस तक इन शेयरों पर नजर

सोमवार को बीएसई सेंसेक्स 876.37 अंक यानी 1.17 फीसदी गिरकर 73,852.90 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 257.20 अंक यानी 1.11 फीसदी टूटकर 22,888.95 के स्तर पर आ गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 21 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2026
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सोमवार की भारी बिकवाली के बाद बुधवार, 21 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार में रिकवरी की उम्मीद है. गिफ्ट निफ्टी 130 अंक उछलकर 23,000 के पार पहुंच गया है. हालांकि, महंगा कच्चा तेल, पश्चिम एशिया में तनाव और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां बाजार की दिशा तय करेंगी. आज जियो प्लेटफॉर्म्स का 30,213 करोड़ रुपये का IPO भी खुलेगा.

सेंसेक्स और निफ्टी में 1% से ज्यादा गिरावट

सोमवार, 19 अक्टूबर को घरेलू शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली थी. कारोबार के दौरान सेंसेक्स करीब 1,000 अंक तक टूट गया. बाद में कुछ रिकवरी की कोशिश हुई, लेकिन दोनों प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए.

कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 876.37 अंक यानी 1.17 फीसदी गिरकर 73,852.90 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 257.20 अंक यानी 1.11 फीसदी टूटकर 22,888.95 के स्तर पर आ गया. सोमवार को कारोबार की शुरुआत सेंसेक्स के 74,849.30 और निफ्टी के 23,150.85 के स्तर पर हुई थी. गिरावट के कारण बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 5 लाख करोड़ रुपये घटकर 468 लाख करोड़ रुपये से नीचे आ गया.

गिफ्ट निफ्टी में तेजी, बाजार को मिल सकता है सहारा

मंगलवार को दशहरे के अवसर पर बाजार बंद रहने के बाद आज कारोबार दोबारा शुरू होगा. शुरुआती संकेत बाजार में सकारात्मक शुरुआत की ओर इशारा कर रहे हैं. GIFT Nifty में करीब 130 अंकों की तेजी से घरेलू बाजार को सहारा मिलने की उम्मीद है.

एशियाई बाजारों में तेजी और भारत-अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते की उम्मीद भी निवेशकों की धारणा को मजबूत कर सकती है. हालांकि, बाजार की आगे की दिशा कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और कंपनियों के सितंबर तिमाही के नतीजों पर निर्भर करेगी.

एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर के मुताबिक, निवेशक कंपनियों की आय में बढ़ोतरी, मार्जिन और भविष्य के कारोबार को लेकर प्रबंधन के अनुमानों पर नजर रखेंगे. बढ़ती लागत के बीच कंपनियों का प्रदर्शन बाजार की दिशा तय करने में अहम होगा.

कच्चे तेल की कीमतें बनीं चिंता

पश्चिम एशिया में जारी तनाव भारतीय शेयर बाजार के लिए प्रमुख जोखिम बना हुआ है. अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष तथा होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है.

सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत एक समय 112 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थी. बुधवार सुबह भी तेल की कीमतों में तेजी के संकेत मिले और शुरुआती कारोबार में ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स करीब 1.4 फीसदी ऊपर था.

भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी से आयात बिल और कंपनियों की लागत बढ़ सकती है. इसका असर महंगाई, चालू खाते के घाटे और रुपये पर भी पड़ सकता है.

विदेशी निवेशकों की बिकवाली पर रहेगी नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार की गिरावट के पीछे मुनाफावसूली भी एक प्रमुख वजह रही. इससे पहले गुरुवार और शुक्रवार को बाजार में अच्छी तेजी आई थी और निफ्टी इन दोनों कारोबारी सत्रों में दो फीसदी से अधिक चढ़ा था. इसके बाद निवेशकों ने कई शेयरों में मुनाफा वसूला.

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की गतिविधियां भी बाजार के लिए अहम रहेंगी. उपलब्ध शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने शुक्रवार को भारतीय शेयरों में करीब 1,166 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की थी. हालांकि, अक्टूबर में इससे पहले हुई भारी निकासी के मुकाबले यह खरीदारी सीमित रही.

बैंकिंग शेयरों की कमजोरी ने बढ़ाया दबाव

सोमवार को बैंकिंग शेयरों में कमजोरी ने बाजार की गिरावट को बढ़ाया. एक्सिस बैंक का शेयर सेंसेक्स के प्रमुख लूजर्स में शामिल रहा और 3.85 फीसदी गिरकर बंद हुआ. निफ्टी में भी इसमें करीब 4.19 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में सालाना आधार पर 38 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 7,003 करोड़ रुपये का स्टैंडअलोन शुद्ध लाभ दर्ज किया था, लेकिन इसका प्रदर्शन विश्लेषकों की उम्मीदों से कम रहा.

इसके अलावा बजाज फाइनेंस, इन्फोसिस, अल्ट्राटेक सीमेंट और ट्रेंट के शेयरों में भी गिरावट आई. आज कंपनियों के नतीजों पर निवेशकों की प्रतिक्रिया से अलग-अलग शेयरों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.

आज खुलेगा जियो प्लेटफॉर्म्स का IPO

आज बाजार की प्रमुख गतिविधियों में जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ शामिल है. 30,213 करोड़ रुपये का यह आईपीओ 21 अक्टूबर से सब्सक्रिप्शन के लिए खुलेगा. इसका प्राइस बैंड 1,065 रुपये से 1,119 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है.

आईपीओ के बड़े आकार को देखते हुए निवेशकों की नजर इस पर रहेगी. इसके साथ ही हाल में नतीजे जारी करने वाली बजाज फाइनेंस और IREDA जैसी कंपनियों के शेयरों में भी हलचल देखने को मिल सकती है.

कई कंपनियों में कॉरपोरेट अपडेट

डायमंड पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर में मुख्य वित्तीय अधिकारी की नियुक्ति, धामपुर बायो ऑर्गेनिक्स का स्विट्जरलैंड की प्लैनेटरी एसए के साथ तकनीक लाइसेंस समझौता और सीगल इंडिया की सहायक इकाई का बिजली पारेषण सेवा समझौता भी निवेशकों के लिए अहम रहेगा. एलेम्बिक फार्मास्युटिकल्स ने दुबई में नई सहायक कंपनी बनाई है.

ट्रांसरेल लाइटिंग ने एनओपीएल पेस ग्रीन एनर्जी में 49 फीसदी हिस्सेदारी 20 करोड़ रुपये में खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है. वहीं, जेएसडब्ल्यू ड्यूलक्स के खिलाफ जीएसटी मांग संशोधित कर 42.04 करोड़ रुपये कर दी गई है.

आज इन कंपनियों के नतीजों पर रहेगी नजर

आज इटरनल, अडानी ग्रीन एनर्जी, इंडियन होटल्स कंपनी, केईआई इंडस्ट्रीज, महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज, एसआरएफ, विशाल मेगा मार्ट, आदित्य बिड़ला सन लाइफ एएमसी और पीसी ज्वेलर समेत कई कंपनियां सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. निवेशक इन कंपनियों की आय, मुनाफे, मार्जिन और भविष्य के कारोबार को लेकर प्रबंधन के अनुमानों का आकलन करेंगे. इसके अलावा एचडी फायर के शेयरों की एनएसई और बीएसई पर लिस्टिंग भी आज होगी.

फिलहाल बाजार के सामने घरेलू और वैश्विक दोनों तरह की चुनौतियां हैं. GIFT Nifty में तेजी और एशियाई बाजारों के सकारात्मक संकेत राहत दे रहे हैं, लेकिन महंगा कच्चा तेल, भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां बाजार की आगे की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता आज से लागू, 15 साल में आएगा 20 अरब डॉलर का निवेश

भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता 20 अक्टूबर से लागू हो गया है. इसके तहत भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में 100 फीसदी शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 20 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 20 October, 2026
BWHindia

भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) लागू होने के साथ ही दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है. इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी. इसका फायदा खास तौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), महिला उद्यमियों, किसानों और कारीगरों को मिल सकता है. इसके अलावा, अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश की संभावना है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग, बुनियादी ढांचे, कृषि और नवाचार जैसे क्षेत्रों में अवसर पैदा हो सकते हैं.

दोनों देशों ने 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके 7 अरब न्यूजीलैंड डॉलर यानी लगभग 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. इसे हासिल करने के लिए व्यापार में करीब 18 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) की जरूरत होगी.

कपड़ा, फुटवियर और फार्मा सेक्टर को मिलेगा फायदा

मुक्त व्यापार समझौते के तहत कपड़ा, परिधान, चमड़ा और फुटवियर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है. इन क्षेत्रों में 10 फीसदी तक के टैरिफ समाप्त होने से भारतीय उत्पाद न्यूजीलैंड के बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं.

इसके अलावा, इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी, रसायन और कृषि उत्पादों के निर्यातकों को भी बेहतर बाजार पहुंच मिलने की संभावना है.

न्यूजीलैंड के व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैक्ले के मुताबिक, यह समझौता प्रमुख क्षेत्रों के निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा करेगा. उन्होंने कहा कि समझौते के पूरी तरह लागू होने के बाद भारत को होने वाले न्यूजीलैंड के मौजूदा निर्यात के 95 फीसदी हिस्से को टैरिफ समाप्त होने या उनमें बड़ी कटौती का लाभ मिलेगा.

न्यूजीलैंड के जिन उत्पादों पर टैरिफ में कटौती की गई है, उनमें शहद, सेब, कीवीफ्रूट, मिल्क एल्बुमिन सहित अन्य एल्बुमिन, वाइन, फार्मास्यूटिकल्स, पॉलिमर और एल्युमीनियम शामिल हैं.

भारतीय छात्रों को वर्क वीजा, कस्टम मंजूरी भी होगी तेज

इस समझौते में शिक्षा के लिए न्यूजीलैंड जाने वाले भारतीय युवाओं के लिए वर्क वीजा से जुड़ी सुविधा भी शामिल है. इसके तहत पात्र भारतीय छात्रों को निर्धारित अवधि के लिए प्रशिक्षण लेने और काम करने का अवसर मिलेगा.

व्यापार को आसान बनाने के लिए कस्टम मंजूरी की समयसीमा भी तय की गई है. समझौते के तहत सामान्य कार्गो को 48 घंटे के भीतर और जल्दी खराब होने वाले सामान यानी पेरिशेबल कंसाइनमेंट को 24 घंटे के भीतर कस्टम मंजूरी देने का प्रावधान है.

इसके अलावा, पात्र कारोबारियों के लिए डिजिटल सर्टिफिकेशन और उत्पत्ति के नियमों (रूल्स ऑफ ओरिजिन) के तहत स्वयं प्रमाणन की सुविधा दी जाएगी. इससे कागजी प्रक्रिया, देरी और अनुपालन लागत कम करने में मदद मिल सकती है.

घरेलू किसानों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान

भारत और न्यूजीलैंड के बीच कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के साथ घरेलू किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए भी प्रावधान किए गए हैं. केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, भारतीय किसानों को फलों, सब्जियों, मसालों और अन्य कृषि उत्पादों के लिए व्यापक बाजार पहुंच मिलेगी. इससे उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय में सुधार करने और आजीविका मजबूत करने में मदद मिल सकती है.

समझौते के तहत न्यूजीलैंड के सेब, कीवीफ्रूट और मनुका शहद को संतुलित बाजार पहुंच दी गई है. घरेलू किसानों को संभावित प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए टैरिफ-रेट कोटा, न्यूनतम आयात मूल्य और अन्य सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं.

इसके साथ ही, भारत और न्यूजीलैंड कृषि उत्पादकता साझेदारी भी शुरू करेंगे. इस पहल के तहत सटीक खेती (प्रिसीजन एग्रीकल्चर) और संबंधित तकनीकों में न्यूजीलैंड की विशेषज्ञता का इस्तेमाल भारतीय कृषि क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए किया जाएगा.

भारत ने डेयरी और कई कृषि उत्पादों को समझौते से रखा बाहर

घरेलू उद्योगों और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए भारत ने कई उत्पादों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा है. इनमें डेयरी उत्पाद, प्याज, चीनी, चना, मटर, मक्का, बादाम, विभिन्न वसा और तेल, रत्न एवं आभूषण, एल्युमीनियम, तांबा, हथियार और गोला-बारूद शामिल हैं.

वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि भारत और न्यूजीलैंड के बीच संबंध केवल बाजार पहुंच बढ़ाने या एक-दूसरे को अधिक निर्यात करने तक सीमित नहीं हैं. इसका उद्देश्य एक मजबूत और टिकाऊ आर्थिक साझेदारी तैयार करना है.

उन्होंने यह भी कहा कि न्यूजीलैंड का 60 से 70 फीसदी व्यापार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में केंद्रित है. इस क्षेत्र की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ न्यूजीलैंड के व्यापारिक संबंध भारत की तुलना में अधिक मजबूत हैं.

मुक्त व्यापार समझौते से भारत को इस बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने, निर्यात के नए अवसर तलाशने और निवेश आकर्षित करने में मदद मिलने की उम्मीद है. हालांकि, 2030 तक व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य हासिल करने के लिए दोनों देशों को व्यापार में लगातार वृद्धि बनाए रखनी होगी.
 


NH पर हादसों में मौत हुई तो ठेकेदारों पर लगेगा ₹50 लाख तक जुर्माना, सरकार ने कड़े किए नियम

राष्ट्रीय राजमार्गों पर बार-बार होने वाली दुर्घटनाओं और मौतों के लिए अब निर्माण ठेकेदारों की जवाबदेही तय होगी. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के नए नियमों के तहत दूसरी दुर्घटना में प्रत्येक मृतक के लिए ₹25 लाख और तीसरी दुर्घटना में ₹50 लाख तक का जुर्माना देना होगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 20 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 20 October, 2026
BWHindia

राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को रोकने और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार ने ठेकेदारों पर शिकंजा कस दिया है. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) परियोजनाओं के लिए नए मॉडल अनुबंध समझौते में सख्त प्रावधान किए हैं. इसके तहत सड़क की खामियों के कारण बार-बार दुर्घटनाएं होने पर ठेकेदारों को भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है. गंभीर मामलों में अनुबंध समाप्त करने और ठेकेदार के खर्च पर सुधार कार्य कराने का भी प्रावधान है.

दूसरी दुर्घटना में ₹25 लाख, तीसरी पर ₹50 लाख का जुर्माना

नए नियमों के मुताबिक, यदि किसी स्थान पर पहली दुर्घटना के एक वर्ष के भीतर या पिछली दुर्घटना के बाद सुधारात्मक कार्रवाई पूरी होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर, उसी स्थान के 500 मीटर के दायरे में सड़क की खामियों के कारण दूसरी दुर्घटना होती है, तो ठेकेदार पर प्रत्येक मृतक के लिए ₹25 लाख और गंभीर रूप से घायल प्रत्येक व्यक्ति के लिए ₹10 लाख का जुर्माना लगाया जाएगा.

वहीं, अगले एक वर्ष के भीतर उन्हीं खामियों के कारण तीसरी दुर्घटना होने पर जुर्माने की राशि बढ़ जाएगी. इस स्थिति में ठेकेदार को प्रत्येक मृतक के लिए ₹50 लाख और गंभीर रूप से घायल प्रत्येक व्यक्ति के लिए ₹25 लाख देने होंगे.

पहली दुर्घटना के बाद खामियां दूर करने के लिए 15 दिन

नए प्रावधानों के तहत पहली दुर्घटना के बाद ठेकेदार को सड़क की खामियां दूर करने के लिए 15 दिन का समय दिया जाएगा. यदि वह निर्धारित समय में सुधारात्मक कार्रवाई नहीं करता है, तो सरकार उसके खर्च पर सड़क का रखरखाव और जरूरी सुधार कार्य करा सकती है. इसके अलावा, परिस्थितियों के अनुसार ठेकेदार का अनुबंध भी समाप्त किया जा सकता है.

यह व्यवस्था ईपीसी परियोजनाओं के लिए जारी नए मॉडल अनुबंध समझौते का हिस्सा है. इस व्यवस्था में ठेकेदार राजमार्ग का निर्माण करता है और काम के विभिन्न चरण पूरे होने के आधार पर उसे भुगतान किया जाता है. हालांकि, दोष दायित्व अवधि (डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड) समाप्त होने के बाद ठेकेदार की जिम्मेदारी सीमित हो जाती है.

सड़क दुर्घटनाओं में 2024 में 1.77 लाख से अधिक मौतें

मंत्रालय के मुताबिक, भारत में 2024 के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में 1,77,175 लोगों की मौत हुई. यह दुनिया में सबसे अधिक आंकड़ों में से एक है. सड़क सुरक्षा के लिए कई उपाय किए जाने के बावजूद दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि हुई है.

एक अधिकारी के अनुसार, ईपीसी परियोजनाओं के लिए इस तरह का प्रावधान पहली बार किया गया है. इसका उद्देश्य सड़क निर्माण में खामियों के लिए जिम्मेदारी तय करना और दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना है.

उप-ठेके देने की सीमा 49% से घटाकर 30%

राजमार्ग परियोजनाओं की गुणवत्ता और जवाबदेही को लेकर मिल रही शिकायतों के बीच सरकार ने उप-ठेके देने के नियम भी सख्त किए हैं. अब ईपीसी परियोजनाओं में उप-ठेके की सीमा अनुबंध मूल्य के 49 फीसदी से घटाकर 30 फीसदी कर दी गई है.

आमतौर पर मुख्य ठेकेदार परियोजना के कुछ हिस्सों का काम उप-ठेकेदारों को सौंप देते हैं. सरकार का नया कदम निर्माण कार्यों की जिम्मेदारी स्पष्ट करने और मुख्य ठेकेदारों की जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है.

पिछले वर्ष अगस्त में संसद की लोक लेखा समिति ने भी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में उप-ठेके देने के मुद्दे पर मंत्रालय की आलोचना की थी. समिति ने कहा था कि मंत्रालय की अपनी प्रस्तुतियों के अनुसार, सड़क बुनियादी ढांचे का बड़ा हिस्सा उप-ठेकेदारों द्वारा तैयार किया जाता है, जबकि मुख्य अनुबंध व्यवस्था के तहत उनकी जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो सकती है.

ठेकेदारों के चयन और रेटिंग के नियम भी सख्त

नए नियमों में उप-ठेकेदारों के चयन के लिए मंजूरी संबंधी मानदंड भी कड़े किए गए हैं. इसके अलावा, सरकार ने अनुबंध मिलने से पहले लागू होने वाली कई शर्तों को ठेकेदार की रेटिंग से जोड़ दिया है.

इन बदलावों के जरिए सरकार राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण और रखरखाव में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के साथ-साथ दुर्घटनाओं के लिए ठेकेदारों की जवाबदेही बढ़ाना चाहती है.