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शहरी सहकारी बैंकों का पोर्टफोलियो 5 वर्षों में 1.8 गुना बढ़ा, डिजिटल बदलाव से समावेशी विकास की ओर अग्रसर

मार्च 2025 तक UCBs का कुल पोर्टफोलियो बैलेंस बढ़कर 2.9 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो साल-दर-साल आधार पर 6 प्रतिशत की वृद्धि है

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 10 months ago

भारत के शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) ने पिछले पांच वर्षों में अपने पोर्टफोलियो बैलेंस में 1.8 गुना वृद्धि दर्ज की है. यह जानकारी नेशनल अर्बन कोऑपरेटिव फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (NUCFDC) और ट्रांसयूनियन सिबिल द्वारा जारी पहले सहकार ट्रेंड्स रिपोर्ट में सामने आई. रिपोर्ट के अनुसार, यह वृद्धि गहरी क्रेडिट पहुंच और डिजिटल परिवर्तन की दिशा में हुए बदलावों के चलते संभव हो सकी है.

मार्च 2025 तक UCBs का कुल पोर्टफोलियो बैलेंस बढ़कर 2.9 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो साल-दर-साल आधार पर 6 प्रतिशत की वृद्धि है. पारंपरिक चुनौतियों और प्रतिस्पर्धी वित्तीय परिदृश्य के बावजूद, UCBs ने छोटे शहरों और अर्ध-शहरी बाजारों में वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है.

रिपोर्ट में शहरी सहकारी बैंकों के क्रेडिट प्रदर्शन का व्यापक विश्लेषण किया गया है. इन्हें समकक्ष संस्थानों के साथ तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है और दीर्घकालिक विकास के लिए रणनीतिक सिफारिशें दी गई हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के 1,472 UCBs लगभग 9 करोड़ भारतीयों को सेवाएं दे रहे हैं. इनमें माइक्रो-उद्यमी, प्रथम बार घर खरीदने वाले, महिला स्व-सहायता समूह (SHGs) और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक प्रमुख हैं.

NUCFDC के सीईओ प्रभात चतुर्वेदी ने कहा, “UCBs लंबे समय से विश्वास और जमीनी पहुंच के स्तंभ रहे हैं. आज डेटा-आधारित विश्लेषण, डिजिटल टूल्स और संस्थागत समर्थन के बल पर ये समावेशी वित्तीय विकास के एक नए युग की अगुवाई करने के लिए तैयार हैं.”

रिज़र्व बैंक की हालिया फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में भी UCBs के प्रदर्शन की सराहना की गई है. मार्च 2025 तक प्राइमरी UCBs में क्रेडिट ग्रोथ 7.4 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ी है. इनके पूंजीगत स्थिति में भी सुधार हुआ है. पूंजी से जोखिम वजनी संपत्तियों का अनुपात (CRAR) बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया है. वहीं सकल गैर-निष्पादित संपत्तियां (GNPA) घटकर 6.1 प्रतिशत और शुद्ध NPA 0.6 प्रतिशत रह गया है.

रिपोर्ट में UCBs को डिजिटल बदलाव को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है. इसके लिए सहकार क्रेडिट इंजन, सहकार पाठशाला और पोर्टफोलियो रिस्क डैशबोर्ड जैसे उपकरण प्रस्तावित किए गए हैं, जो लोन प्रोसेसिंग को ऑटोमेट करने, आधार-आधारित वेरिफिकेशन और रियल-टाइम क्रेडिट मॉनिटरिंग को सक्षम बनाएंगे. इन टूल्स के साथ स्टाफ प्रशिक्षण भी शामिल है, जिससे ग्राहक अनुभव और परिचालन दोनों बेहतर किए जा सकें.

पिछले पांच वर्षों में UCBs के प्रमुख उत्पाद खंडों में दो अंकों की वृद्धि देखी गई है. हालांकि कॉमर्शियल लोन 28 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा सेगमेंट रहा, लेकिन इसमें सालाना औसत वृद्धि (CAGR) महज 3 प्रतिशत रही. इसके विपरीत, गोल्ड लोन में 52 प्रतिशत की उल्लेखनीय CAGR दर्ज की गई. ऑटो लोन में 33 प्रतिशत और बैंक डिपॉजिट के खिलाफ लोन में 23 प्रतिशत की वृद्धि रही. एमएसएमई-उन्मुख रिटेल बिजनेस लोन 24 प्रतिशत CAGR के साथ 12 प्रतिशत पोर्टफोलियो हिस्सा बना चुके हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, कॉमर्शियल लोन लेने वालों में 37 प्रतिशत न्यू-टू-क्रेडिट (NTC) ग्राहक हैं, जिससे पहली बार उधार लेने वालों और छोटे व्यवसायों को क्रेडिट देने में UCBs की भूमिका स्पष्ट होती है. एक करोड़ रुपये से कम एक्सपोज़र वाले उधारकर्ताओं में डिफॉल्ट दर मार्च 2020 के 3.5 प्रतिशत से घटकर मार्च 2025 में 1.4 प्रतिशत हो गई, जो कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में कम है (3.3 प्रतिशत). एक से दस करोड़ रुपये की सीमा में डिफॉल्ट दर 5 प्रतिशत से घटकर 3.3 प्रतिशत पर आ गई.

आवास ऋणों में भी मजबूत वृद्धि दर्ज हुई. मार्च 2020 से मार्च 2025 के बीच इस क्षेत्र में 19 प्रतिशत CAGR दर्ज की गई. आवास ऋणों की पूछताछ UCBs में 2.8 गुना बढ़ी, जबकि हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों (HFCs) में यह वृद्धि 1.6 गुना रही. UCBs द्वारा दिए गए होम लोन का औसत टिकट साइज 25.2 लाख रुपये रहा. सबप्राइम पूछताछ का अनुपात 2020 के 12 प्रतिशत से घटकर 2025 में 9 प्रतिशत रह गया.

UCBs के ग्राहक प्रोफाइल में भी विविधता देखने को मिली. होम लोन पूछताछ का 20 प्रतिशत हिस्सा न्यू-टू-क्रेडिट ग्राहकों से आया. 35 वर्ष या उससे कम आयु वाले ग्राहकों ने 28 प्रतिशत लोन ओरिजिनेशन में हिस्सा लिया. लिंग समावेशन के मोर्चे पर भी UCBs ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया. जहां HFCs में 57 प्रतिशत होम लोन महिला ग्राहकों को मिले, वहीं UCBs में यह आंकड़ा 71 प्रतिशत रहा. भौगोलिक रूप से, UCBs की उपस्थिति मेट्रो शहरों (42 प्रतिशत) और ग्रामीण इलाकों (22 प्रतिशत) दोनों में HFCs की तुलना में अधिक है.


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