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भारतीय उच्च शिक्षा के ‘शांत स्थापत्यकार’ प्रमथ राज सिन्हा 61 वर्ष के हुए

ISB, अशोका, हरप्पा से लेकर जेटरी तक, सिन्हा की यात्रा ऐसे संस्थानों के निर्माण की कहानी है, जो उद्देश्य और संभावनाओं में जड़ें रखते हुए भविष्य के लिए तैयार और विचारशील हों.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारतीय उच्च शिक्षा के परिदृश्य में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बिना शोर-शराबे के गहराई से बदलाव लाते हैं, प्रमथ राज सिन्हा ऐसे ही एक विचारशील निर्माता हैं. भारतीय शिक्षा जगत में सबसे प्रभावशाली संस्थान के निर्माताओं में गिने जाने वाले प्रमथ राज सिन्हा 12 जून, 2025 को 61 वर्ष के हो गए हैं. पिछले दो दशकों में उन्होंने भारत में शिक्षा के भविष्य को चुपचाप लेकिन निर्णायक रूप से आकार दिया है. देश के कुछ सबसे नवोन्मेषी विश्वविद्यालयों की सह-स्थापना से लेकर डिजिटल युग के लिए कार्यस्थल शिक्षा की पुनर्कल्पना तक, सिन्हा की यात्रा इस विश्वास से प्रेरित रही है कि शिक्षा व्यापक, भविष्योन्मुख और गहराई से मानवीय होनी चाहिए.

पटना में जड़ें जमाई साहित्यिक विरासत
पटना में जन्मे और पले-बढ़े सिन्हा एक ऐसे परिवार से आते हैं, जो साहित्यिक परंपरा में गहराई से रचा-बसा था. उनके पिता एक लेखक और प्रकाशक थे, जिन्होंने नई धारा नामक एक अग्रणी हिंदी साहित्यिक पत्रिका की स्थापना की थी. जिसमें दिनकर, निराला, महादेवी वर्मा और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यिक दिग्गजों की रचनाएँ प्रकाशित होती थीं. 2004 में पिता के निधन के समय उनकी सबसे बड़ी चिंता नई धारा की निरंतरता थी. शायद वह नहीं जानते थे कि उनका बेटा न केवल इस विरासत को आगे बढ़ाएगा बल्कि नई पीढ़ी के लिए इसे पुनर्जीवित भी करेगा, यह याद दिलाते हुए कि संस्कृति और शिक्षा एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते.

आईआईटी से पेनसिलवेनिया और फिर मैकिन्से तक
प्रमथ की शैक्षणिक यात्रा आईआईटी कानपुर से शुरू हुई, जहाँ उन्होंने 1986 में मैटलर्जिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया. इसके बाद वे यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया गए जहाँ उन्होंने एमएसई और पीएचडी की उपाधियाँ प्राप्त कीं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत मैकिन्से एंड कंपनी से की, जहाँ वे बाद में पार्टनर बने और भारत में फर्म की रणनीति को आकार देने में मदद की. वैश्विक नेतृत्व और रणनीति की इस प्रारंभिक समझ ने उन्हें 2001 में इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) की स्थापना की जिम्मेदारी निभाने में सहायता दी. एक संस्थापक डीन के रूप में उन्होंने आईएसबी को विश्व के प्रमुख प्रबंधन संस्थानों में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

मीडिया से मिशन-चालित पहलों तक
2006 से 2007 तक एबीपी ग्रुप के प्रबंध निदेशक और सीईओ के रूप में कार्य करने के बाद, उन्होंने 9.9 ग्रुप की स्थापना की, जोकि एक मीडिया और सलाहकार फर्म जो अनुसंधान, प्रकाशन और शिक्षा में उनकी रुचियों को जोड़ती है, लेकिन उच्च शिक्षा में उनका गहरा प्रवेश ही उनकी विरासत को परिभाषित करने वाला बन गया. अशोका विश्वविद्यालय के संस्थापक और ट्रस्टी के रूप में उन्होंने भारत का अग्रणी लिबरल आर्ट्स विश्वविद्यालय बनाने में मदद की, यंग इंडिया फेलोशिप की शुरुआत की और नेतृत्व शिक्षा के एक नए मॉडल को बढ़ावा दिया. इसके बाद उन्होंने महिलाओं के लिए वेदिका स्कॉलर प्रोग्राम, अनंत राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (संस्थापक प्रोवोस्ट के रूप में), और लद्दाख में नारोपा फेलोशिप की शुरुआत की. हर एक पहल भारत की शिक्षा प्रणाली की किसी विशेष कमी को पूरा करने के लिए थी.

2018 में उन्होंने हरप्पा एजुकेशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य 21वीं सदी के कार्यस्थल कौशलों की आवश्यकता को पूरा करना था. इस मंच ने हज़ारों शिक्षार्थियों तक पहुँच बनाई, और बाद में अपग्रेड द्वारा अधिग्रहित किया गया. जहाँ संक्रमण के दौरान सिन्हा ने अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. 2025 में उन्होंने जेटरी की शुरुआत की, एक संस्थागत पहल जो उच्च शिक्षा में संगठनात्मक विकास और क्षमता निर्माण पर केंद्रित लर्निंग ईकोसिस्टम के निर्माण के लिए समर्पित है.

गहन प्रभाव वाला करियर
इन दशकों के दौरान, सिन्हा ने नेतृत्व की एक असाधारण श्रृंखला निभाई है. वे आईएसबी के संस्थापक डीन (2001–2002); मैकिन्से एंड कंपनी में पार्टनर (1993–2006); एबीपी ग्रुप के एमडी और सीईओ (2006–2007); और 9.9 ग्रुप के संस्थापक और एमडी (2007–वर्तमान) रहे हैं. अशोका विश्वविद्यालय के संस्थापक और ट्रस्टी (2007–वर्तमान) के रूप में, उन्होंने भारत में लिबरल शिक्षा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे अनंत राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के संस्थापक प्रोवोस्ट (2017–2019); नारोपा फेलोशिप के सह-संस्थापक (2017–2025); और वेदिका स्कॉलर्स (2015–वर्तमान) के संस्थापक रहे हैं, जो महिलाओं के लिए एक अग्रणी व्यावसायिक कार्यक्रम है. 2025 में, उन्होंने जेटरी की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा में संगठनात्मक लर्निंग के लिए एक नया मॉडल बनाना है.

इस पूरी यात्रा में, सिन्हा अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े रहे. उन्होंने नई धारा को पुनर्जीवित किया, केवल अपने पिता को श्रद्धांजलि देने के रूप में नहीं, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य के लिए एक जीवंत मंच के रूप में, उन्होंने आईआईटी कानपुर क्लास ऑफ 1986 यंग फैकल्टी फेलोशिप की भी स्थापना की, ताकि अपने पूर्व संस्थान में प्रारंभिक स्तर के अकादमिक अनुसंधान को समर्थन मिल सके.

प्रमथ राज सिन्हा की कहानी केवल व्यावसायिक सफलता की नहीं है; यह दृष्टिकोण, निरंतरता, और दीर्घकालिक सोच की शक्ति की कहानी है. एक ऐसे युग में जहाँ सब कुछ तेजी से बदल रहा है, उन्होंने चुपचाप स्थिरता से और जिम्मेदारी की भावना के साथ निर्माण करना चुना, जो केवल आँकड़ों या बाज़ार हिस्सेदारी से कहीं आगे की सोच है.

जैसे ही वे एक नए दशक में प्रवेश करते हैं, वे संस्थान जो उन्होंने आकार दिए हैं और वे विचार जो वे अब भी पोषित कर रहे हैं, भारत के बौद्धिक और शैक्षिक परिदृश्य में उनके स्थायी योगदान के रूप में खड़े हैं.


 


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