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हिंदी दिवस: वैश्वीकरण के दौर में भाषा के तौर पर 'हिंदी' कहां है?

हिंदी का इस्तेमाल सरकारी कामकाज की कॉपियों तक ही सीमित है, क्योंकि देश के जितने भी महत्वपूर्ण ऐलान होते हैं, वो कभी हिंदी में नहीं होते.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्ली: कस्टमर केयर पर कॉल करते ही अंग्रेजी भाषा के लिए 1 और हिंदी भाषा के लिए 2 दबाते वक्त आपने भी शायद ही कभी गौर किया हो कि भाषा की होड़ में हिंदी हमेशा अंग्रेजी के मुकाबले दूसरे पायदान पर ही रह गई. ये उदाहरण सिर्फ इसलिए कि आज हिंदी दिवस है, अगली बार जब आप कॉल करें तो इस विषय में सोचें जरूर.  

वैश्वीकरण और हिंदी भाषा

वैश्वीकरण के इस दौर में जहां सीमाओं और समय का कोई महत्व नहीं, जहां एक देश का कारोबार किसी दूसरे देश के कारोबार से जुड़ा है, और जहां भाषा के तौर पर अंग्रेजी पूरी तरह से हावी है. दुनिया भर की कंपनियां भारत आकर बिजनेस करती हैं, तो क्या उनके संवाद की भाषा हिंदी होती है, शायद नहीं. क्योंकि कोई अमेरिकी कंपनी या चीन की कंपनी या फिर कोरियाई कंपनी भारत आकर व्यापार करेगी तो वो हमेशा उस भाषा का इस्तेमाल करेगी जिसे वैश्विक रूप से मान्यता मिली हो. जिसमें उसके लिए संवाद करना स्वाभाविक रूप से आसान हो, और वो भाषा अंग्रेजी है. 

किसी विदेशी नेता या दुनिया के दिग्गज कारोबारी के भारत दौरे पर उसके मुंह से राजनीतिक पार्टियां भले ही अटपटे ढंग से 'नमस्टे इंडिया' कहलवाकर ये साबित करने की कोशिश करें कि वो हिंदी के लिए कितना कुछ कर रहे हैं, लेकिन मंशा तो उनकी राजनीतिक ही रहती है. जो लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि देखो फलां देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री या किसी कंपनी के मालिक ने हिंदी में कुछ कहा है और हिंदी का वर्चस्व बढ़ रहा है, सरासर मूर्खता है. 

संविधान के हिसाब से भारत में 22 भाषाएं हैं, इसमें से हिंदी भी एक है. दक्षिण में कई तमिल, कन्नण, तेलुगू, मलयालम और दूसरी कई भाषाएं हैं. इसी तरह पहाड़ी इलाकों की अपनी भाषाएं हैं, उत्तर पूर्वी राज्यों की अलग. भाषाओं की ये विविधता ही भारत देश की खूबसूरती है, लेकिन जब इस बात को उठाया जाता है कि हिंदी को 'कॉमन' भाषा बनाया जाए तो समस्या खड़ी हो जाती है. क्योंकि इन प्रांतों के लोगों के लिए हिंदी समझना कठिन है, लेकिन अक्सर देखा गया है कि उनकी अंग्रेजी अच्छी होती है. 

क्या हिंदी आर्थिक जगत की भाषा है?

इसमें कोई शक नहीं कि अंग्रेजी वैश्विक आर्थिक जगत की भाषा है, दुनिया में आप कही भी चले जाइए, दो बिजनेस करने वाले लोग इंगलिश में ही बात करते हुए मिलेंगे. भारत में हिंदी को इज्जत बख्शने के लिए सरकारी कामकाज को कुछ हद तक भले ही हिंदी के पाले मे खिसका दिया गया हो, जैसे सरकार किसी योजना को जारी करती है तो उसकी हिंदी प्रति होती है, आदेशों और नियमों और गैजेट्स की कॉपियां हिंदी में होती है. हिंदी को सरकारी कामकाज की भाषा जरूर बनाया गया है, लेकिन सच ये भी है इन प्रेस विज्ञप्तियों को जब उठाकर पढ़ने की बारी आती है तो कोई भी लपककर हिंदी की बजाय अंग्रेजी प्रति ही उठाता है, क्योंकि सरकारी हिंदी की भाषा को समझना आसान नहीं, वो आम बोलचाल की भाषा नहीं होती. 

सच ये भी है कि हिंदी का इस्तेमाल सरकारी कामकाज की कॉपियों तक ही सीमित है, क्योंकि देश के जितने भी महत्वपूर्ण ऐलान होते हैं, वो कभी हिंदी में नहीं होते. देश का आम बजट भाषण हो या फिर रिजर्व बैंक की पॉलिसी का ऐलान, ये सभी अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं. बाद में सिर्फ खानापूर्ति के लिए ही सही इनकी हिंदी की प्रतियां उपलब्ध करा दी जाती है. सिर्फ देश के प्रधानमंत्री ही हिंदी में अपना भाषण देते हैं, वो भी ज्यादातर इसलिए कि उनके उन भाषणों का कोई राजनीतिक महत्व होता है. अन्यथा शायद ही किसी बड़ी कंपनी के चेयरमैन,  CEO या फिर किसी मंत्रालय के अधिकारी ने हिंदी में कोई चीज टीवी पर आकर बताई हो. 

इस बात को हम सभी जानते हैं कि अंग्रेजी एक ग्लोबल बिजनेस भाषा है, अगर आप कोई बिजनेस करते हैं और दुनिया भर में जाकर अपने बिजनेस के बारे में बताना चाहते हैं तो आपको इंग्लिश आनी चाहिए. अगर आप अपनी कंपनी का विस्तार करना चाहते हैं तो दुनिया से आप अंग्रेजी में ही जुड़ सकते हैं. अब बात हिंदी की, हिंदी की सीमाएं सिर्फ हिंदुस्तान तक ही सीमित हैं. कोई कंपनी अगर अपनी प्रोडक्ट हिंदुस्तान में रहकर बेचना चाहती है अपना कारोबार फैलाना चाहती है तो उसके लिए हिंदी बहुत जरूरी है, उसके लिए संवाद का माध्यम हिंदी भाषा भी होगी, क्योंकि हिंदी देश के 18 करोड़ लोगों की भाषा है, जबकि 30 करोड़ लोग इसको अपनी दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, यानी करीब 48 से 50 करोड़ लोग हिंदी भाषा बोलते और समझते हैं. 

क्या बीते सालों में हिंदी का मान बढ़ा

एक बात और, दुनिया में चीन और रूस ऐसे मुल्क हैं, जो अपनी मातृ भाषा में घर में बात करते हैं और उसी भाषा में राजनीति और व्यापार करते हैं, वो अंग्रेजी को ढोते नहीं हैं. लेकिन भारत में अंग्रेजी का बोझ सिर पर ढोने का फैशन है. इसमें गलती हमारी भी नहीं, जहां जहां ब्रिटिश हुकूमत रही है उन देशों में अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व 
आज भी है. वर्ल्ड इकोनॉमिकी फोरम WEF ने साल 2017 में हिंदी भाषा को दुनिया की पांचवी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बताया था. जबकि  साल 2016 में ये चौथे नंबर पर था, साल 2013 में तीसरे पायदान पर था. 

कहां हुआ हिंदी का विकास

हालांकि ऐसा नहीं है कि हिंदी ने तरक्की नहीं की है. उच्च शिक्षा में हिंदी के लिए संभावनाओं बढ़ी हैं. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति आने के बाद विश्वविद्यालयों में इंजीनियरिंग जैसे व्यावसायिक विषयों की पढ़ाई हिंदी में भी शुरू हो चुकी है. जो आगे चलकर हिंदी को आर्थिक जगत में एक भाषा के तौर पर स्थापित करने में सहायक साबित हो सकती है, जहां फिलहाल अंग्रेजी का बोलबाला है. 2011 के सेंसस के मुताबिक देश की 44 परसेंट आबादी हिंदी बोलती है, जो कि 1971 के बाद से 7 परसेंट बढ़ी है. 
जहां कुछ समय पहले तक इंटरनेट पर सामग्री खोजने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा का ही कब्जा था, अब हिंदी कंटेंट का बोलबाला है. सोशल मीडिया साइट्स जैसे ट्विटर और फेसबुक पर हिंदी का वर्चस्व बढ़ा है. विकीपीडिया में अबतक सिर्फ खानापूर्ति के लिए हिंदी कंटेंट होते थे आज हिंदी का प्रभाव बढ़ा है. डिजिटल होती दुनिया में हिंदी कहीं से पीछे नहीं दिखती है. एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लिए हिंदी भाषी लोग एक बड़ा मार्केट हैं, यही वजह है कि OTT प्लेटफॉर्म्स पर अलग अलग भाषाओं की फिल्में, सीरीज और कई दूसरे कंटेंट हिंदी में अनुवादित किए जा रहे हैं जिसने अपने आप में एक नई इंडस्ट्री खड़ी कर दी है. ऐप्स की भाषाएं अब अंग्रेजी नहीं रहीं, हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की भी पहुंच बढ़ी है. 

उम्मीद करते हैं कि हिंदी जो हिंदुस्तान के जुबान ही नहीं दिल की भी भाषा है, उसे वो मुकाम मिले जिसकी हम अपेक्षा करते हैं. चलिए कोशिश करते हैं, थोड़ी हम करते हैं थोड़ी आप करिए, हिंदी हमारी गर्व है, अगर हम चाहते हैं कि हिंदी का मुकाम वैश्वीकरण के इस दौर में अंग्रेजी से ज्यादा नहीं तो उससे कम भी न हो. इसकी शुरुआत हम अपने घर से ही करते हैं. 

 

 

 


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