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शिंदे राज में महाराष्ट्र ने खोया बहुत कुछ, जानें कौनसे बड़े प्रोजेक्ट हाथ से निकले
CM की कुर्सी संभालते ही एकनाथ शिंदे ने प्रदेश के विकास और रोजगार की बात कही थी, लेकिन अब तक इस दिशा में वह कुछ खास कर नहीं पाए हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे सरकार इस वक्त सवालों के घेरे में है. सवाल ऐसे हैं, जिनका जवाब देना उसके लिए मुश्किल हो रहा है. विपक्ष तो सरकार को कठघरे में खड़ा कर ही रहा है, आम जनता भी यह जानना चाहती है कि आखिर शिंदे सरकार, पूर्व की उद्धव सरकार से कैसे कमतर साबित हो रही है. मालूम हो कि एकनाथ शिंदे ने भाजपा के साथ मिलकर उद्धव ठाकरे के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं और 30 जून के फ्लोर टेस्ट से पहले ही उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. CM की कुर्सी संभालते ही एकनाथ शिंदे ने प्रदेश के विकास और रोजगार की बात कही थी, लेकिन अब तक इस दिशा में वह कुछ खास कर नहीं पाए हैं, उल्टा महाराष्ट्र के हाथ से कई बड़े प्रोजेक्ट जरूर चले गए हैं.
मेडिकल डिवाइस पार्क
महाराष्ट्र की पूर्व सरकार ने राज्य में मेडिकल डिवाइस पार्क बनाने को मंजूरी दी थी. केंद्र सरकार की योजना के तहत ये पार्क तैयार होना था, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. विपक्ष इसके लिए एकनाथ शिंदे को कठघरे में खड़ा कर रहा है, मगर राज्य सरकार केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने का हवाला दे रही है. जिन राज्यों में मेडिकल डिवाइस पार्क बनाने के प्रस्ताव को केंद्र ने हरो झंडी दिखाई है उनमें उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं. ये पार्क बनाने के लिए सरकार की तरफ से राज्यों को 400 करोड़ रुपए दिए जाएंगे.
क्या होता फायदा?
मेडिकल डिवाइस पार्क बनाने का काम कैमिकल और उर्वरक मंत्रालय के जरिए किया जाएगा. इन पार्कों के अस्तित्व में आने से देश में वैसे मेडिकल उपकरण तैयार होंगे, जो विदेश से मंगाने पड़ते हैं और जो बेहद महंगे होते हैं. फिलहाल देश में 70 परसेंट से अधिक मेडिकल उपकरण आयात होते हैं, जिन पर सरकार का भारी-भरकम पैसा खर्च होता है. यदि महाराष्ट्र में पार्क बनता, तो बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिलता. यह पार्क औरंगाबाद की Auric City में प्रस्तावित था.
बल्क ड्रग पार्क प्रोजेक्ट
महाराष्ट्र में 2,300 करोड़ की लागत से बल्क ड्रग पार्क भी बनना था, लेकिन वो भी राज्य के हाथ से चला गया. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के भरूच जिले के जंबूसार में देश के पहले बल्क ड्रग पार्क (BDP) की आधारशिला रखी. गुजरात के अलावा देश के दो अन्य राज्यों में भी बल्क ड्रग पार्क बनाया जाएगा, लेकिन उसमें महाराष्ट्र शामिल नहीं है. इस योजना के मकसद की बात करें, तो बल्क ड्रग पार्क में दवा तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग तत्वों का निर्माण देश में ही किया जाएगा. इन तत्वों को एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स इनग्रीडिएंट्स (एपीआई) कहते हैं. सरकार ऐसे पार्क की स्थापना से घरेलू दवा बाजार में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना चाहती है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दवा निर्माण और उत्पादन क्षेत्र में भारत को टॉप पर ले जाने की योजना है.
महाराष्ट्र ने क्या खोया?
पहले ये पार्क महाराष्ट्र के राजगढ़ जिले में प्रस्तावित था. एक अनुमान के मुताबिक, इस पार्क के अस्तित्व में आने से कम से कम 80,000 रोजगार निर्मित होते, जिसका फायदा सीधे तौर पर राज्य के युवाओं को भी होता. यानी युवाओं के हाथ से नौकरी का एक मौका चला गया है. विपक्षी नेता आदित्य ठाकरे का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बल्क ड्रग्स पार्क परियोजना के मामले में गंभीरता से केंद्र सरकार से बातचीत करते तो आज प्रोजेक्ट महाराष्ट्र से बाहर नहीं जाता.
वेदांत-फॉक्सकॉन प्रोजेक्ट
वेदांत-फॉक्सकॉन (Vedanta Foxconn) प्रोजेक्ट के महाराष्ट्र में आने की पूरी संभावना थी, लेकिन यह प्रोजेक्ट गुजरात चला गया. 1,54,000 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट को पुणे के पास तालेगांव लगाया जाना था. बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र सरकार और वेदांत-फॉक्सकॉन के बीच प्रोजेक्ट पर डील लगभग फाइनल हो चुकी थी. जुलाई 2022 में वरिष्ठ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की थी. कंपनी के अधिकारियों ने तालेगांव फेज IV में 1,000 एकड़ से अधिक की जमीन भी देखी. लेकिन अचानक प्रोजेक्ट गुजरात में फाइनल हो गया. विपक्ष का कहना है कि उसकी सरकार में प्रोजेक्ट 90 पर्सेंट फाइनल था. शिंदे की सरकार आगे बात नहीं संभाल पाई और पीएम मोदी के सामने समर्पण कर दिया. इस प्रोजेक्ट के तहत डिस्पले और सेमीकंडक्टर बनाए जाएंगे.
महाराष्ट्र ने क्या खोया?
दोनों कंपनियां गुजरात में यह संयंत्र लगाने पर 1,54,000 करोड़ रुपए का निवेश करेंगी. इससे एक लाख से ज्यादा रोजगार पैदा होंगे. यानी महाराष्ट्र के लोगों के हाथ से नौकरी का एक बड़ा अवसर चला गया है. इसके अलावा, इंडस्ट्री डेवेलपमेंट के लिहाज से भी इस प्रोजेक्ट का जाना राज्य के लिए बड़ा झटका है. बता दें कि सेमीकंडक्टर का इस्तेमाल कारों, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों में किया जाता है. इसका निर्माण फिलहाल भारत में नहीं किया जाता.
टाटा-एयरबस प्रोजेक्ट
एकनाथ शिंदे के राज में 22,000 करोड़ रुपए का टाटा-एयरबस प्रोजेक्ट (Tata-Airbus project) भी महाराष्ट्र के हाथ से निकल गया है. टाटा के प्रोजेक्ट के तहत वायुसेना के लिए देश में 56 सैन्य परिवहन विमान बनाए जाने हैं. यह प्रोजेक्ट घरेलू एयरोस्पेस क्षेत्र को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. इस परियोजना के तहत पहली बार कोई प्राइवेट कंपनी देश में मिलिट्री एयरक्राफ्ट तैयार करेगी. कल-पुर्जों से लेकर फाइनल एसेम्बली तक विमान का संपूर्ण निर्माण देश में ही होगा.
महाराष्ट्र ने क्या खोया?
टाटा का प्रोजेक्ट यदि महाराष्ट्र में आता तो राज्य की आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ, बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा होते. एक अनुमान के मुताबिक, टाटा-एयरबस प्रोजेक्ट से 15,000 से अधिक कुशल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होंगे. गौर करने वाली बात ये है कि महाराष्ट्र के इंडस्ट्रीज मिनिस्टर उदय सामंत ने 15 सितंबर को दावा किया था कि भले ही वेदांत प्रोजेक्ट राज्य के हाथ से निकल गया, लेकिन टाटा-एयरबस प्रोजेक्ट नागपुर के आसपास स्थापित किया जाएगा, लेकिन अब उनका कहना है कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है. मीडिया रिपोर्ट में महाराष्ट्र एयरपोर्ट डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के एक अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि तीन साल पहले टाटा के अधिकारियों ने नागपुर में इस प्रोजेक्ट के लिए जमीन की जानकारी मांगी थी. वहीं, विपक्ष का कहना है कि ये प्रोजेक्ट महाराष्ट्र में आना था, लेकिन सरकार की नाकामी के चलते गुजरात चला गया.
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