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ईरान युद्ध से दुनिया पर ऊर्जा संकट का खतरा, ओपेक उत्पादन 26 साल के निचले स्तर पर

दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट के जरिए होती है, लेकिन ईरान युद्ध के बाद इस समुद्री मार्ग पर संकट गहराने लगा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है. ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मची हुई है. दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने चेतावनी दी है कि कच्चे तेल का वैश्विक स्टॉक तेजी से खतरनाक स्तर की ओर बढ़ रहा है. वहीं, ओपेक देशों का तेल उत्पादन 26 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे आने वाले दिनों में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है.

पीएम मोदी ने बताया कोरोना के बाद सबसे बड़ा संकट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति को कोरोना महामारी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा संकट बताया है. उन्होंने लोगों से तेल की बचत करने की अपील करते हुए कहा कि वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और ऊर्जा संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है. भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं.

26 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा ओपेक उत्पादन

रॉयटर्स के सर्वे के अनुसार अप्रैल 2026 में तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक का औसत दैनिक उत्पादन घटकर 20.04 मिलियन बैरल रह गया. यह साल 2000 के बाद का सबसे कम स्तर माना जा रहा है. अप्रैल में उत्पादन में करीब 8.3 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट दर्ज की गई. विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध और सप्लाई रूट पर बढ़ते खतरे के कारण कई देशों का उत्पादन और निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है.

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ी चिंता

दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट के जरिए होती है, लेकिन ईरान युद्ध के बाद इस समुद्री मार्ग पर संकट गहराने लगा है. कुवैत का तेल निर्यात अप्रैल में लगभग शून्य हो गया क्योंकि उसका पूरा निर्यात इसी रास्ते पर निर्भर है. रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध शुरू होने के बाद से एक अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है. इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों पर दिखाई दे रहा है.

सऊदी अरब और इराक के उत्पादन में भारी गिरावट

सऊदी अरब के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों के कारण उसका उत्पादन घटकर करीब 7 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया. हालांकि सऊदी अरब लाल सागर के जरिए ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से तेल निर्यात जारी रखने की कोशिश कर रहा है. इराक में भी हालात सामान्य नहीं हैं और उत्पादन प्रभावित हुआ है. इससे ओपेक देशों की कुल क्षमता पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है.

यूएई ने संकट में दिखाई मजबूती

जहां अधिकांश देश उत्पादन घटने से जूझ रहे हैं, वहीं संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई ने अपनी सप्लाई को स्थिर बनाए रखा है. यूएई होर्मुज स्ट्रेट को बायपास करते हुए फुजैरा पोर्ट से तेल निर्यात कर रहा है.

फिलहाल यूएई प्रतिदिन 3.2 से 3.6 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन कर रहा है. बताया जा रहा है कि देश अगले साल तक इसे बढ़ाकर 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक ले जाने की तैयारी में है.

वेनेजुएला और लीबिया ने बढ़ाया उत्पादन

वेनेजुएला और लीबिया ने अप्रैल में उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन इससे वैश्विक सप्लाई संकट की भरपाई नहीं हो सकी. वेनेजुएला का निर्यात 2018 के बाद सबसे ऊंचे स्तर 1.23 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जबकि लीबिया का उत्पादन 10 साल के उच्चतम स्तर 1.43 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर पहुंचा. इसके बावजूद वैश्विक बाजार में सप्लाई की कमी बनी हुई है.

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल

पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीद फिलहाल बेहद कमजोर दिखाई दे रही है. इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. ताजा कारोबार में ब्रेंट क्रूड करीब 105 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. हाल ही में इसकी कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, जो 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है.

भारत पर क्या होगा असर?

भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में वैश्विक कीमतों में तेजी का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. हालांकि फिलहाल देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है तो आने वाले समय में महंगाई और परिवहन लागत बढ़ सकती है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ा खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में जल्द शांति बहाल नहीं हुई तो दुनिया को एक बड़े ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है. तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से महंगाई, सप्लाई चेन और आर्थिक विकास पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है.


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