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राखी बाजार में ‘वोकल फॉर लोकल’ की गूंज, ₹25 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है कारोबार

रक्षाबंधन पर ₹25 हजार करोड़ के राखी कारोबार का अनुमान, उपहार और अन्य उत्पादों को मिलाकर व्यापार ₹30 हजार करोड़ के पार पहुंचने की उम्मीद

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago

रक्षाबंधन के मौके पर इस बार बाजारों में स्वदेशी राखियों की चमक और बढ़ गई है. पारंपरिक डिजाइन के साथ-साथ ‘विकसित भारत’, ‘मोदी गारंटी’, ‘ब्रह्मोस’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी थीम वाली राखियां लोगों को खूब पसंद आ रही हैं. कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) का अनुमान है कि इस वर्ष देशभर में केवल राखियों का कारोबार करीब ₹25 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है, जबकि मिठाई, उपहार, कपड़े और अन्य त्योहार संबंधी उत्पादों को मिलाकर कुल व्यापार ₹30 हजार करोड़ से अधिक होने की संभावना है.

कैट के राष्ट्रीय महामंत्री और सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी उत्पादों और राष्ट्रभावना के उत्सव के रूप में भी उभरकर सामने आया है. उनके अनुसार, पिछले वर्ष देशभर में करीब ₹17 हजार करोड़ का राखी कारोबार हुआ था, जबकि 2023 में यह आंकड़ा लगभग ₹12 हजार करोड़ था.

‘वोकल फॉर लोकल’ का दिख रहा असर

प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि भारतीय उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं का बढ़ता भरोसा और ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ तथा ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों का असर इस बार राखी बाजार में साफ दिखाई दे रहा है.

उन्होंने बताया कि पारंपरिक राखियों के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनकल्याणकारी योजनाओं, राष्ट्रीय उपलब्धियों और विकसित भारत के संकल्प से प्रेरित राखियों की मांग तेजी से बढ़ी है. बाजार में ‘विकसित भारत राखी’, ‘मोदी गारंटी राखी’, ‘ब्रह्मोस राखी’, ‘आत्मनिर्भर भारत राखी’, ‘वोकल फॉर लोकल राखी’, ‘भारत गौरव राखी’, ‘नारी वंदन राखी’, ‘लखपति दीदी राखी’, ‘नमामि गंगे राखी’, ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र राखी’ और ‘अमृतकाल राखी’ खास तौर पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं.

युवाओं और बच्चों में ‘ब्रह्मोस’ राखी का क्रेज

कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया ने कहा कि इन राखियों के जरिए बहनें सिर्फ रक्षा सूत्र नहीं बांध रही हैं, बल्कि राष्ट्र निर्माण, महिला सशक्तिकरण, स्वदेशी अभियान, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अपनी भावनाएं भी व्यक्त कर रही हैं. उन्होंने कहा कि युवाओं और बच्चों के बीच ‘ब्रह्मोस राखी’, ‘राष्ट्र रक्षा सूत्र राखी’ और ‘विकसित भारत राखी’ को लेकर खास उत्साह देखने को मिल रहा है.

अलग-अलग राज्यों की राखियों को भी मिल रही पहचान

देश के विभिन्न हिस्सों की कला, संस्कृति और स्थानीय उत्पादों से जुड़ी राखियां भी बाजार में अपनी अलग पहचान बना रही हैं. नागपुर की खादी राखी, जयपुर की सांगानेरी कला राखी, पुणे की सीड या बीज राखी, असम की चाय पत्ती राखी, कोलकाता की जूट राखी, मुंबई की सिल्क राखी, बिहार की मधुबनी राखी, बेंगलुरु की पुष्प राखी और जनजातीय हस्तकला से बनी बांस की राखियां उपभोक्ताओं को खूब पसंद आ रही हैं.

कैट का कहना है कि इन उत्पादों की बढ़ती मांग से छोटे कारीगरों, हस्तशिल्प से जुड़े लोगों, महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारोबारियों को बड़ा बाजार मिल रहा है.

चीनी राखियों की मांग लगभग न के बराबर

कैट के मुताबिक, इस वर्ष भी बाजारों में चीनी राखियों की मांग नहीं के बराबर है. व्यापारियों और उपभोक्ताओं का रुझान पूरी तरह भारतीय निर्मित राखियों की ओर है, जिससे स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय उद्योगों को मजबूती मिल रही है.

कैट के राष्ट्रीय चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल ने देशभर के व्यापारियों और उपभोक्ताओं से अपील की कि रक्षाबंधन के साथ-साथ आगामी त्योहारों में भी भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता दी जाए और ‘स्वदेशी अपनाओ, भारत बढ़ाओ’ अभियान को मजबूत बनाया जाए.

प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि कैट विभिन्न शहरों में विशेष स्वदेशी मेले भी आयोजित करने की तैयारी कर रहा है, जहां महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार राखियों और अन्य उत्पादों की बिक्री की जाएगी. खंडेलवाल ने कहा, “आज स्वदेशी राखी केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, विकसित भारत और राष्ट्र गौरव का प्रतीक बन चुकी है.”


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