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अब प्राइवेट कंपनियां भी बनाएंगी अग्नि जैसी मिसाइलें, DRDO ने मांगे आवेदन
DRDO ने मिसाइल और बम वेपन सिस्टम के लिए निजी कंपनियों से मांगे आवेदन, ‘डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर’ मॉडल के तहत होगा चयन
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago
भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने पहली बार रणनीतिक हथियारों और मिसाइल प्रणालियों के निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की पहल की है. इसके तहत निजी कंपनियों से मिसाइल और बम वेपन सिस्टम विकसित करने और उत्पादन के लिए आवेदन मांगे गए हैं. इस कदम से आधुनिक हथियारों का विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन तेजी से करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
निजी कंपनियों को मिलेगा रणनीतिक हथियारों के विकास का मौका
DRDO के मिसाइल एवं रणनीतिक सिस्टम विभाग ने भविष्य की महत्वपूर्ण रक्षा परियोजनाओं के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया है. इसके तहत अग्नि सीरीज जैसी मिसाइलों से लेकर पनडुब्बी से लॉन्च होने वाली परमाणु हथियार प्रणालियों के नए वैरिएंट विकसित किए जाने की योजना है.
अब तक इन संवेदनशील हथियार प्रणालियों के निर्माण में सरकारी कंपनियों की प्रमुख भूमिका रही है. भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम इनके उत्पादन से जुड़े रहे हैं. नई व्यवस्था में निजी क्षेत्र को भी इन परियोजनाओं में भागीदार बनाया जाएगा. टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) और सोलर एयरोस्पेस एंड डिफेंस जैसी कंपनियों की इस तरह की परियोजनाओं में भागीदारी की संभावना है.
कंपनियों के लिए तय किए गए सख्त मानक
रणनीतिक हथियारों के निर्माण से जुड़ी इन परियोजनाओं में भाग लेना निजी कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा. DRDO ने कंपनियों के लिए तकनीकी और वित्तीय योग्यता से जुड़े कड़े मानक तय किए हैं. आवेदक कंपनियों के पास रक्षा निर्माण से संबंधित इंडस्ट्रियल लाइसेंस होना जरूरी होगा. इसके साथ ही विस्फोटकों के सुरक्षित रखरखाव और संचालन के लिए पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (PESO) का लाइसेंस भी अनिवार्य होगा.
कंपनी के लिए न्यूनतम टर्नओवर और नेटवर्थ से जुड़ी शर्तें भी निर्धारित की गई हैं. कंपनी की नेटवर्थ परियोजना की अनुमानित लागत के 5 फीसदी से अधिक होनी चाहिए. इसके अलावा बड़े और जटिल प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरा करने का अनुभव रखने वाली कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी.
हर प्रोजेक्ट में कम से कम दो कंपनियां होंगी
नई व्यवस्था को ‘डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर’ मॉडल के तहत लागू किया जाएगा. प्रत्येक परियोजना के लिए कम से कम दो कंपनियों का चयन किया जाएगा. चयनित कंपनियां DRDO के साथ मिलकर हथियार प्रणालियों के प्रोटोटाइप तैयार करेंगी.
इन प्रोटोटाइप का परीक्षण और मूल्यांकन किया जाएगा. सफल परीक्षण के बाद रणनीतिक बलों की जरूरत और मांग के आधार पर इन्हीं कंपनियों को बड़े पैमाने पर उत्पादन की जिम्मेदारी दी जा सकेगी.
उत्पादन क्षमता की भी होगी कड़ी जांच
हथियारों की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता से कोई समझौता न हो, इसके लिए कंपनियों के इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी क्षमताओं का विस्तृत आकलन किया जाएगा. DRDO यह भी जांच करेगा कि कंपनियां 50 से 100 या उससे अधिक हथियारों का थोक उत्पादन करने में सक्षम हैं या नहीं.
इसके लिए विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय समिति कंपनियों की उत्पादन इकाइयों का निरीक्षण करेगी. टीम यह देखेगी कि संबंधित कंपनी के पास जरूरी मशीनरी, तकनीकी विशेषज्ञता, उत्पादन क्षमता और अन्य आवश्यक बुनियादी ढांचा मौजूद है या नहीं.
निजी क्षेत्र की भागीदारी से बढ़ेगी रक्षा उत्पादन क्षमता
रणनीतिक हथियारों के विकास और उत्पादन में निजी कंपनियों को शामिल करने की यह पहल भारत के रक्षा क्षेत्र में सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को मजबूत कर सकती है. इससे स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ हथियार प्रणालियों के विकास और उत्पादन में लगने वाला समय कम करने में मदद मिल सकती है. साथ ही, यह कदम ‘आत्मनिर्भर भारत’ और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
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