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'स्टीलमैन ऑफ इंडिया' डॉ. जेजे ईरानी के निधन पर टाटा संस के अध्यक्ष ने क्या कहा, जानिए
टाटा स्टील को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने का मुख्य श्रेय जे.जे. ईरानी को ही जाता है. स्टील सेक्टर में उल्लेखनीय योगदान के चलते ही उन्हें स्टील मैन ऑफ इंडिया कहा जाता था.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्ली: 'स्टीलमैन ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर पद्मभूषण टाटा स्टील के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर जेजे ईरानी मंगलवार को पंचतत्व में विलीन हो गए. सोमवार रात लगभग दस बजे उन्होंने जमशेदपुर स्थित टाटा मेन्स हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली थी. आपको बता दें कि 86 वर्षीय ईरानी 6 अक्टूबर को अपने घर पर गिर गए थे, जिसके कारण उनके स्पाइनल कॉड में गहरी चोट आई थी. इसके बाद उन्हें यहां ICU में दाखिल कराया गया था. उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी. कोविड और निमोनिया के कारण उनकी स्थिति और बिगड़ती चली गई. जब उनका निधन हुआ तो अस्पताल में उनके साथ उनकी पत्नी डेजी ईरानी भी साथ थीं.
डॉ. जेजे ईरानी के निधन पर टाटा संस के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन ने क्या कहा
जेजे ईरानी के निधन से पूरे उद्योग जगत में शोक की लहर है. उनके योगदान को याद करते हुए टाटा संस के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन ने कहा, "डॉ. जे जे ईरानी सबसे उत्कृष्ट टाटा मैन थे. उनका कॉर्पोरेट व्यक्तित्व काफी विशाल था. उनका इस्पात उद्योग में बहुत बड़ा योगदान था. टाटा समूह में हम सभी को डॉ. ईरानी की बहुत याद आएगी और हम उनकी दिवंगत आत्मा के लिए प्रार्थना करते हैं"
जे.जे. ईरानी 2011 में टाटा स्टील के बोर्ड से रिटायर हुए थे
टाटा स्टील को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने का मुख्य श्रेय जे.जे. ईरानी को ही जाता है. स्टील सेक्टर में उल्लेखनीय योगदान के चलते ही उन्हें स्टील मैन ऑफ इंडिया कहा जाता था. उन्होंने लगभग चार दशकों तक कंपनी में अपना सेवा दी थी और जून 2011 में टाटा स्टील के बोर्ड से रिटायर हुए थे.
सबसे कम लागत में स्टील बना दिया
वर्ष 1992 में जब उन्होंने टाटा स्टील के एमडी के रूप में कार्यभार संभाला था, तब उदारीकरण के दौर की शुरूआत हुई थी और स्टील उद्योग नई चुनौतियों का सामना कर रहा था. जेजे ईरानी अपने काम में इतने दक्ष थे कि टाटा स्टील को दुनिया में सबसे कम लागत में स्टील उत्पादन करने वाली कंपनी के तौर पर विकसित किया.
जेजे ईरानी का करियर
उन्होंने 1958 में नागपुर यूनिवर्सिटी से जियोलॉजी में मास्टर्स किया था. उसके बाद उन्होंने 1960 में यूके की शेफील्ड यूनिवर्सिटी से 1960 में मेटलर्जी में भी मास्टर्स किया. 1963 में उन्होंने पीएचडी की और टाटा स्टील में बतौर असिस्टेंट अपने करियर की शुरुआत की थी. वे 1981 में टाटा स्टील के बोर्ड में शामिल हुए थे. वे कंपनी में 2001 तक नॉन एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर रहे. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी जमशेदपुर में गुजार दी. एक इंटरव्यू में अपनी इच्छा जाहिर करते हुए उन्होंने कहा था कि जिस शहर में पूरी जिंदगी काम किया, आखिरी सांस भी उसी शहर में लेना चाहते हैं.
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