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जल्द ही कम हो सकते हैं पेट्रोल के दाम, सरकार को है बस इसका इंतजार
भारतीय उद्योग के अधिकारियों ने कहा कि भारत ने भारत ने पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्राइस कैप को अपना समर्थन नहीं दिया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्लीः देश में जल्द ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिल सकती है. सरकार को इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं. रूस भारत को तय मानक से सस्ती कीमतों पर तेल खरीदने की मंजूरी दे सकता है. अगर ऐसा हुआ तो फिर लोगों को पेट्रोल डीजल जो कि कई राज्यों में 100 के करीब है उससे बड़ी राहत मिल सकती है. अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट के बाद भारतीय रिफाइनर अपनी अधिकांश रूसी तेल खरीद को पश्चिमी देशों के 60 डॉलर के प्राइस कैप से कम दर पर प्राप्त करने में सक्षम हो सकते हैं. भारतीय उद्योग के अधिकारियों ने कहा कि भारत ने भारत ने पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्राइस कैप को अपना समर्थन नहीं दिया है. ऐसे में भारत पर इस कैप का असर पड़ने की संभावना कम है.
G7 देशों ने लगाया है कैप
सात देशों के समूह (G7), यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया ने सोमवार से रूसी समुद्री कच्चे तेल पर 60 डॉलर प्रति बैरल की कीमत कैप लगा दी है. समुद्र के द्वारा रूसी कच्चे तेल के आयात और संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, जापान और ब्रिटेन द्वारा इसी तरह की प्रतिज्ञाओं पर यूरोपीय संघ के प्रतिबंध के शीर्ष पर मूल्य कैप आया.
भारत को मिलती रहेगी इससे छूट
हालांकि, रूसी तेल पहले से ही छूट पर कारोबार कर रहा है, जिससे इस बात की संभावना कम हो गई है कि इस कदम से बाजारों में खलल पड़ेगा. हालांकि, कैप हर 2 महीने में समीक्षा के अधीन होगी. यह रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के लिए औसत बाजार मूल्य से कम से कम 5% कम निर्धारित किया जाएगा.
रूस प्राइस कैप लगाने वाले देशों को नहीं देगा तेल
रत्नागिरी रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल के सीईओ एमके सुवर्णा ने कहा कि अगर रूस के तेल का प्राइस लगातार गिरता है तो रूस अपने तेल को कम दामों में बेचने के बजाए उसकी सप्लाई को कम करने के ऑप्शन पर विचार कर सकता है. इससे मार्केट में तेल की डिमांड बढ़ेगी और इससे रूस के कच्चे तेल के प्राइस में भी बढ़त देखी जाएगी. इसके साथ ही रूस उन देशों को तेल की सप्लाई बंद कर सकता है जिन देशों ने इस प्राइस कैप को अपना समर्थन दिया है.
10 डॉलर प्रति बैरल की होगी बचत
बीपीसीएल के एक अधिकारी ने बताया कि प्रतिस्पर्धी क्रूड की तुलना में भारतीय रिफाइनरों के लिए टेबल पर 10 डॉलर प्रति बैरल से अधिक की बचत होती है. सीमा शुल्क के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि के दौरान सऊदी और अमेरिकी कच्चे तेल की लागत क्रमशः 99 डॉलर प्रति बैरल और 97 डॉलर प्रति बैरल थी.
जाहिर है, रूस ने सीमा को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और सभी प्रवाहों को रोकने की धमकी दी है, जिससे भारत जैसे उपभोक्ता किनारे पर हैं. दिल्ली स्थित प्रमुख ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने कहा, "यदि मूल्य सीमा 65 डॉलर प्रति बैरल है, तो भारत और रूस इससे निपट सकते हैं." समस्याएं तब शुरू होती हैं जब कीमतें बढ़ती हैं और रूस मूल्य सीमा से अधिक दर पर जोर देता है.
फिर बीमा और परिवहन समस्या बन जाते हैं. तनेजा ने बताया, "बीमा के बिना आप $2 मिलियन मूल्य का माल नहीं ला सकते हैं."
एक महीने में भारत पहुंचता है शिप
उद्योग के अधिकारियों ने कहा कि भारत के 4.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल के आयात का लगभग 90 प्रतिशत पश्चिमी टैंकरों से आता है, और यह सब यूरोपीय और यूके कंपनियों द्वारा बीमा या पुनर्बीमा किया जाता है. रूस के पास 70 से कम टैंकर हैं, और राज्य द्वारा संचालित शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) और निजी कंपनियां भारत का लगभग 10 प्रतिशत ईंधन ही ले जाती हैं. इसके अलावा, रूस से भारत तक की यात्रा में लगभग एक महीने का समय लगता है और रिफाइनरों को वर्तमान खरीद को शिप करने के लिए कई बड़े कंटेनर्स की आवश्यकता होगी.
भारत ने अक्टूबर में रूस से एक मिलियन बैरल प्रति दिन या अपने कुल आयात का एक चौथाई आयात किया, जिससे रूस भारत के लिए तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया.
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