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IMF ने घटाया एशिया का ग्रोथ अनुमान, चीन के ऊपर फोड़ा सुस्ती का ठीकरा
IMF ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोविड महामारी के असर के रूप में, इस क्षेत्र को वैश्विक वित्तीय सख्ती और बाहरी मांग में गिरावट से कई रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्ली: चीन में छाई सुस्ती ने पूरे एशियाई क्षेत्र का बेड़ा गर्क करके रख दिया है. इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (IMF) ने शुक्रवार को एशिया का आर्थिक अनुमान जारी किया. IMF ने अपनी इस रिपोर्ट में एशिया की रिकवरी में आ रही रुकावटों के लिये बढ़ती महंगाई और सख्त होती मॉनिटरी पॉलिसी को जिम्मेदार बताने के साथ साथ चीन पर भी इसका ठीकरा फोड़ा.
IMF की रिपोर्ट
एशिया पैसिफिक इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में IMF ने कहा कि दुनिया के बाकी क्षेत्रों के मुकाबले एशिया में महंगाई की दर कम बनी हुई है, महंगाई बेकाबू न हो जाए इसके लिये केंद्रीय बैंकों ब्याज दरों में बढ़ोतरी जारी रखनी चाहिए. IMF के एशिया और पैसिफिक विभाग के निदेशक कृष्णा श्रीनिवासन ने कहा, "इस साल की शुरुआत में एशिया की मजबूत आर्थिक वापसी उम्मीद से कमजोर दूसरी तिमाही के साथ गति खो रही है." IMF ने इस साल एशिया के विकास के अनुमान को घटाकर 4% और अगले साल 4.3% कर दिया है, जो अप्रैल से 0.9% और 0.8% कम है. ये गिरावट 2021 में 6.5% के ग्रोथ के बाद है.
एशिया में क्या दिक्कतें
IMF ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोविड महामारी के असर के रूप में, इस क्षेत्र को वैश्विक वित्तीय सख्ती और बाहरी मांग में गिरावट से कई रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है. IMF ने कहा कि सबसे बड़ी रुकावटों में चीन की तेज और व्यापक मंदी है, जो कि कोविड के सख्त प्रतिबंधों और प्रॉपर्टी मार्केट में चिंताओं की वजह से आई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक साल में डिफॉल्टर प्रॉपर्टी डेवलपर्स की बढ़ती संख्या के के चलते, सेक्टर की फाइनेंशियल मार्केट तक पहुंच की चुनौतियां और बढ़ गई हैं. ज्यादा एक्सपोजर की वजह से रियल एस्टेट सेक्टर से बैंकिंग सिस्टम के लिए रिस्क बढ़ रहे हैं.
चीन को लेकर चिंता
IMF का अनुमान है कि 2021 में 8.1% की ग्रोथ के बाद इस साल चीन की विकास दर धीमी होकर 3.2% हो जाएगी, जो कि उसके अप्रैल के अनुमान से 1.2% कम है. चीन जो कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, अगले साल 4.4% और 2024 में 4.5% की ग्रोथ दिखाएगी. IMF का कहना है कि एशिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बाहर जाती पूंजी को रोकने के लिए दरें बढ़ाने को मजबूर हैं. विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप का "विवेकपूर्ण" उपयोग कुछ देशों में मॉनिटरी पॉलिसी पर बोझ को कम करने में मदद कर सकता है.
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