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Weekend Special: 'लिखते लिखते लव हो जाए' से फ्रॉड तक, इस तरह बर्बाद हुई रोटोमैक
रोटोमैक कंपनी की स्थापना विक्रम कोठारी ने की थी, लेकिन इससे पहले वह अपने पिता और भाई के साथ पान मसाले के बिजनेस में थे.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
'लिखते लिखते लव हो जाए', ये टैग लाइन थी कुछ दशक पहले तक धूम मचने वाले वाली कंपनी रोटोमैक की. उस दौर में हर दूसरे शख्स के हाथों में रोटोमैक पेन नजर आता था. वक्त को रिवाइंड करके यदि हम पीछे जाकर देखें तो ऐसा एक भी कारण नहीं था, जिससे इस कंपनी के भविष्य पर कोई सवाल खड़ा होता हो. सबकुछ अच्छा था, कंपनी के पेन हाथोंहाथ बिक रहे थे और मुनाफा बढ़ रहा था.
खत्म हो गए अच्छे दिन
विक्रम कोठारी ने कंपनी को ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा दिया था, जहां से उसके केवल ऊपर की तरफ ही बढ़ना था, लेकिन 2010 आते-आते कंपनी के 'अच्छे दिन' खत्म हो गए. जिस तेजी से वो सफलता की ऊंचाई पर गई थी, उतनी ही तेजी से नीचे आ गई. कंपनी के बाहर लेनदारों की लाइन लग गई, कंपनी पर करोड़ों का कर्ज चढ़ गया और देखते ही देखते सबकुछ बिखर गया. आखिर एक सफल कंपनी कंगाल कैसे हो गई, यह समझने से पहले, यह भी जानना जरूरी है कि आज रोटोमैक की चर्चा क्यों हो रही है?
इसलिए चर्चा में है कंपनी
दरअसल, CBI ने 750.54 करोड़ रुपए की कथित धोखाधड़ी के मामले में कानपुर की रोटोमैक ग्लोबल और उसके निदेशकों के खिलाफ केस दर्ज किया है. कंपनी पर बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले सात बैंकों के गठजोड़ (कंसोर्टियम) का कुल 2,919 करोड़ रुपए बकाया है. इसमें इंडियन ओवरसीज बैंक का हिस्सा 23 प्रतिशत है. जांच एजेंसी ने कंपनी और उसके निदेशकों साधना कोठारी और राहुल कोठारी के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के प्रावधानों के अलावा, आपराधिक साजिश (120-बी) और धोखाधड़ी (420) से संबंधित IPC की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है. इस वजह से पेन बनाने वाली कंपनी रोटोमैक फिर से चर्चा में आ गई है.
पान पराग से रोटोमैक तक
रोटोमैक कंपनी की स्थापना विक्रम कोठारी ने की थी, लेकिन इससे पहले वह अपने पिता मनसुख कोठारी और भाई दीपक कोठारी के साथ पान मसाले के बिजनेस में थे. जिस तरह विक्रम ने पेन इंडस्ट्री में क्रान्ति लाई थी, वैसा ही उनके पिता ने पान मसाला इंडस्ट्री में किया था. 'पान बहार' को टक्कर देने के लिए मनसुख कोठारी ने 'पान पराग' की शुरुआत 1973 की थी, जिसका विज्ञापन ‘बारातियों का स्वागत पान पराग से कीजिए’ हर किसी की जुबां पर चढ़ गया था. 1983 में उन्होंने कोठारी प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई. 1985 में उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने कंपनी की आगे बढ़ने की रफ्तार को एकदम से बढ़ा दिया. यही वो दौर था जब डिब्बे में बिकने वाला पान मसाला को पाउच में आया.
इस तरह हुई शुरुआत
पान इंडस्ट्री में सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन विक्रम कोठारी कुछ अलग करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने पेन इंडस्ट्री में कदम रखने का फैसला लिया और इस तरह 1995 में रोटोमैक पेन अस्तित्व में आया. हालांकि, इस वजह से दोनों भाइयों के रिश्ते में खटास आ गई. ऐसा कहा जाता है कि विक्रम पान पराग कंपनी का पैसा रोटोमैक में लगाने लगे थे, जो उनके बड़े भाई दीपक कोठारी को पसंद नहीं आया. 1999 में परिवार में बंटवारा हो गया. इसके बाद विक्रम कोठारी ने अपना पूरा ध्यान रोटोमैक को नंबर वन कंपनी बनाने में लगाया और सफल भी हुए. अगले कुछ सालों में उनकी रोटोमैक कंपनी की कीमत बढ़कर 100 करोड़ रुपए हो गई थी.
यहां से शुरू हुए ‘बुरे दिन’
रोटोमैक पेन की सफलता के बाद विक्रम कोठारी को भी वही ख्याल आया, जो अक्सर सफल बिजनेसमैन को आता है - विस्तार. कोठारी ने सोचा रोटोमैक की साख उन्हें दूसरे सेक्टर्स में पैर जमाने में मदद कर सकती है. उन्होंने एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट, फॉरेन ट्रेड, रियल इस्टेट, फूड, सॉफ्टवेयर सहित कई क्षेत्रों में निवेश किया. उन्होंने बजट नाम से वाशिंग पाउडर निकाला, डायमंड के कारोबार में भी हाथ आजमाया. हालांकि, सबकुछ उनकी उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा. एक-एक करके उनके दूसरे कारोबार असफल होते चले गए, मुनाफा घाटे में बदल गया. इस बीच, पेन इंडस्ट्री में कई बड़ी कंपनियों की एंट्री हुई, जिसकी वजह से रोटोमैक का मार्केट प्रभावित हुआ. कोठारी दूसरे कारोबार की असफलता में उलझे रहे और दूसरी बड़ी कंपनियों ने रोटोमैक का बाजार कब्ज़ा लिया.
बढ़ता गया कर्ज का बोझ
रोटोमैक की आर्थिक सेहत दुरुस्त करने के लिए विक्रम कोठारी ने कर्जा लेना शुरू किया और यह बोझ धीरे-धीरे बढ़ता चला गया. लेनदार अपना पैसा वापस मांगने लगे. इसके बाद मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल पहुंच गया. इस बीच, यह खबर भी आई कि विक्रम कोठारी विदेश जा रहे हैं, तभी सीबीआई ने पहले उन्हें और बाद में उनके बेटे राहुल को गिरफ्तार कर लिया. हालांकि, बाद में दोनों छूट गए. इस साल जनवरी में विक्रम कोठारी की मौत हो गई, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ. CBI जांच में सामने आया कि किस तरह विक्रम कोठारी ने आयात-निर्यात के नाम पर बैंकों को गलत जानकारी दी.
बड़ा बनने की चाहत ले डूबी
विक्रम कोठारी पर विभिन्न बैंकों की देनदारी सामने आने और CBI द्वारा उन्हें अरेस्ट करने के बाद रोटोमैक कंपनी को खड़ा करने वाले कोठारी के बारे में जो जानकारी आम हुई, उसने सभी को चौंका दिया. जांच में सामने आया कि कोठारी की कंपनियों ने कोई आयात-निर्यात नहीं किया, सबकुछ केवल कागजों तक सीमित रहा. इस तरह, गलत निवेश, गलत फैसले और फिजूलखर्ची ने विक्रम कोठारी के साम्राज्य को खत्म कर दिया. बड़ा बनने की चाहत में उन्होंने हर वो काम किया, जो शायद उन्हें नहीं करना चाहिए था.
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