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नोटबंदी पर सरकार के जवाब से पहले याचिकाकर्ता ने कहा- इसने बदल दी इकोनॉमी की रफ्तार
मोदी सरकार द्वारा नवंबर 2016 में की गई नोटबंदी का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्लीः मोदी सरकार द्वारा नवंबर 2016 में की गई नोटबंदी का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. सरकार द्वारा दायर 58 याचिकाओं के सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट से हलफनामा फाइल करने के लिए वक्त मांगा है. यह उल्लेख करना उचित है कि मामले में हलफनामा दाखिल करने में सरकार की देरी की शीर्ष अदालत ने आलोचना की है. हालांकि इसी बीच एक याचिका दायर करने वाले एक वकील याचिकाकर्ता ने कहा है कि नोटबंदी ने इकोनॉमी की रफ्तार व दिशा में काफी बदलाव कर दिया है, खासतौर पर डिजिटल ट्रांजेक्शन के मामले में.
भारत को बना दिया कैशलेस इकोनॉमी
अधिवक्ता विवेक नारायण शर्मा, जिन्होंने 2016 में हुई नोटबंदी के कारण लोगों को हुई कठिनाइयों को कम करने के लिए अतिरिक्त उपायों की मांग करते हुए याचिका दायर की थी, उन्होंने कहा कि इसने न केवल काले धन पर अंकुश लगाने में मदद की, बल्कि भारत को कैशलेस अर्थव्यवस्था बनने में भी मदद की.
शर्मा द्वारा दायर याचिका में कहा गया है, "नवंबर 2016 में, जिस महीने प्रधानमंत्री द्वारा नोटबंदी की गई थी, भारत में यूपीआई पर 30 बैंक लाइव थे, जिसमें लगभग 100.46 करोड़ रुपये के कुल मूल्य के लिए 0.29 मिलियन वित्तीय लेनदेन किए गए थे. जनवरी 2017 तक भारत में 36 बैंक UPI पर लाइव थे, जिसमें 4.46 मिलियन वित्तीय लेनदेन लगभग 1696.22 करोड़ रुपये के किए गए थे. नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, यूपीआई प्लेटफॉर्म में 358 बैंक ऐप पर लाइव थे और सितंबर में 6,780.80 मिलियन लेनदेन दर्ज किए गए, जो कि बिजनेस स्टैंडर्ड द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 11,16,438.10 करोड़ रुपये है.“
इसके अलावा, शर्मा की याचिका इस बात का भी उल्लेख करती है कि कैसे नोटबंदी ने आर्थिक विकास में मदद की है और अधिक डिजिटल बुनियादी ढांचे और स्मार्ट शहरों का निर्माण किया है.
वरिष्ठ वकीलों ने कमियां बताईं
दूसरी तरफ, वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम और श्याम दीवान ने पिछली सुनवाई में तर्क दिया था कि आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए सिस्टम से केवल एक नगण्य राशि का काला धन समाप्त किया गया था. अनुभवी वकीलों ने भी सिर्फ एक अधिसूचना पारित कर प्रमुख आर्थिक और नीतिगत निर्णयों में तेजी लाने पर सवाल उठाया था.
चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए जनता सरकार ने 1978 में इसी तरह का अभियान चलाया था. हालांकि, अंतर इस तथ्य में निहित था कि उस समय सरकार ने नोटबंदी योजना को प्रभावी बनाने के लिए एक कानून पारित किया था.
सरकार द्वारा 2016 के नोटबंदी के कदम पर न्यायपालिका का रुख जहां समय बताएगा, वहीं सरकार के आर्थिक और राजकोषीय फैसलों में न्यायपालिका किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती है, यह एक ऐसा सवाल है जो जवाब मांगता है. इस मामले पर 24 नवंबर को सुनवाई होने की संभावना है.
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