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भारत में असमानता को लेकर चिंता कम, वैश्विक औसत से काफी पीछे: Ipsos

Ipsos Equalities Index 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में असमानता को लेकर नागरिकों की चिंता अन्य देशों की तुलना में काफी कम है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत उन कुछ देशों में शामिल है जहां असमानता को लेकर लोगों की चिंता अपेक्षाकृत कम देखी गई है. वैश्विक सर्वेक्षण Ipsos Equalities Index 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 31 देशों में नागरिकों की राय ली गई, जिसमें केवल 38% भारतीयों ने असमानता को एक गंभीर मुद्दा माना. वहीं, 19% भारतीयों ने, जो कि किसी भी देश के मुकाबले सबसे अधिक है. यह कहा कि असमानता भारत के लिए कोई महत्वपूर्ण समस्या नहीं है.

यह आंकड़े तब और चौंकाने वाले हो जाते हैं जब अन्य देशों की तुलना की जाए. उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया में 84%, तुर्किये, थाईलैंड और ब्राज़ील में 71% लोग असमानता को गंभीर मुद्दा मानते हैं. केवल कुछ देशों जैसे नीदरलैंड (31%) और स्वीडन में ही चिंता का स्तर भारत जैसा कम पाया गया.

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में असमानता के प्रति यह उदासीन रवैया कई अहम सवाल उठाता है, खासकर तब जब दुनिया भर में इसके विपरीत रुझान देखा जा रहा है.

समानता को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय प्रयासों के प्रति भी समर्थन बहुत कम है. केवल 2 में से 1 भारतीय मानते हैं कि इस दिशा में और अधिक प्रयास किए जाने चाहिए, जबकि एक समान संख्या यह मानती है कि देश ने पहले ही इस क्षेत्र में बहुत अधिक कर दिया है.

इप्सॉस इंडिया के सीईओ सुरेश रामलिंगम ने कहा, “नागरिकों में यह हताशा समझ में आती है. भारत जैसा बड़ा और विविधताओं वाला देश जब समावेशन और समानता की ओर बढ़ता है, तो कुछ बार ऐसा भी होता है कि योग्य उम्मीदवारों को हाशिए पर डाल दिया जाता है, खासकर आरक्षण या विशेष कट-ऑफ जैसी नीतियों के कारण. इससे कई बार विभिन्न क्षेत्रों में अन्याय का भाव उत्पन्न होता है.”

भारतीयों की सोच में मेरिट का महत्व भी तुलनात्मक रूप से कम देखा गया. केवल 23% भारतीय मानते हैं कि सफलता व्यक्तिगत प्रयास और योग्यता पर निर्भर करती है. यह आंकड़ा सर्वेक्षण में शामिल देशों में सबसे कम है. इसके विपरीत, पेरू (57%), इंडोनेशिया (54%), और स्वीडन (53%) जैसे देशों में मेरिट में विश्वास काफी अधिक है. वहीं भारत में 34% लोग मानते हैं कि सफलता उन कारकों पर निर्भर है जो उनके नियंत्रण से बाहर हैं.

भारत समेत अधिकांश देशों में जनता उन ब्रांड्स का समर्थन करती है जो विकलांग लोगों के लिए डिजिटल एक्सेस सुनिश्चित करते हैं. यह समर्थन दक्षिण अफ्रीका (94%), मैक्सिको (93%), कोलंबिया (93%), और चिली (93%) में बहुत अधिक है. भारत में भी 85% लोग इस विचार से सहमत हैं.

सुरेश रामलिंगम ने कहा, “यह सभी के लिए एक्सेस को लोकतांत्रिक बनाने की बात है. जियो इफेक्ट इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जिसने देश भर में इंटरनेट पहुंच को व्यापक बनाया और वह भी बिना आम उपयोगकर्ता पर आर्थिक बोझ डाले.”

रिपोर्ट में पाया गया कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक असमान और अन्यायपूर्ण व्यवहार का सामना कर रही हैं. भारत में 13% पुरुषों ने जबकि 22% महिलाओं ने अन्याय का अनुभव होने की बात कही. तुर्किये में यह अंतर और भी गहरा था, 12% पुरुषों की तुलना में 50% महिलाओं ने अन्यायपूर्ण व्यवहार की बात स्वीकार की.

यह सर्वेक्षण Ipsos की ग्लोबल एडवाइजर ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और भारत में IndiaBus प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से 21 फरवरी से 7 मार्च 2025 के बीच किया गया. इसमें 31 देशों के कुल 23,228 वयस्कों की राय ली गई, जिसमें भारत से 2,200 प्रतिभागी शामिल थ, जिनमें से 1,800 से आमने-सामने और 400 से ऑनलाइन इंटरव्यू किया गया.

भारत का सैंपल मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और सामाजिक-आर्थिक वर्ग A, B, C के प्रतिभागियों पर आधारित था. आंकड़ों को हर देश की जनसंख्या के हालिया जनगणना के अनुसार वज़नित किया गया.

Ipsos की यह रिपोर्ट भारत में असमानता को लेकर जनभावना, नीतियों की स्वीकार्यता और सामाजिक न्याय के प्रति नजरिये पर नई रोशनी डालती है. जहां वैश्विक स्तर पर समानता और समावेशन के लिए प्रयासों को व्यापक समर्थन मिल रहा है, वहीं भारत में इस दिशा में राय बंटी हुई दिख रही है, जो नीति निर्धारण और सामाजिक संवाद के लिए एक अहम संकेत है.
 


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