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और महंगा हो सकता है घर बनाने का सपना, इस 'जरूरी आइटम' की कीमतों में हो सकता है इजाफा
लोगों के लिए अपना घर, दुकान या फिर रोड कंस्ट्रक्शन से जुड़े लोगों के लिए एक बहुत जरूरी आइटम की कीमतों में इजाफा हो सकता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्लीः लोगों के लिए अपना घर, दुकान या फिर रोड कंस्ट्रक्शन से जुड़े लोगों के लिए एक बहुत जरूरी आइटम की कीमतों में इजाफा हो सकता है. वैसे ही प्रत्येक जरूरी सामान की कीमतों में महंगाई हो गई जिसमें सरिया से लेकर ईंट तक शामिल हैं. वहीं अब सीमेंट कंपनियां भी प्रत्येक बोरी की कीमतों में 10-30 रुपये का इजाफा करने के मूड में हैं. पिछले महीने ही सीमेंट करीब 3-4 रुपये प्रति बोरी महंगा हुआ था.
इसलिए बढ़ सकती हैं कीमतें
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड की एक रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते कंपनियां कीमतें बढ़ाने की सोच रही हैं. महीने-दर-महीने (MoM) के आधार पर, कीमतों में पूर्व और दक्षिण 2-3 प्रतिशत और पश्चिम में लगभग एक प्रतिशत की वृद्धि हुई थी.
सीमेंट की मांग हुई थी अक्टूबर में कम
रिपोर्ट के अनुसार, मानसून की देरी से बाहर निकलने और त्योहारी छुट्टियों के कारण श्रमिकों की कमी ने अक्टूबर में मांग को प्रभावित किया था. आने वाले हफ्तों में सीमेंट की मांग में सुधार होने की उम्मीद है, क्योंकि सभी प्रमुख त्योहार समाप्त हो गए हैं और एक व्यस्त कंस्ट्रक्शन सीजन की शुरुआत होने वाली है.
पेटकॉक की कीमतें काफी कम
अंतरराष्ट्रीय पेटकोक की कीमतें 195 डॉलर प्रति टन के शिखर से करीब 30 फीसदी नीचे हैं. एमके ग्लोबल ने कहा कि इसके अलावा ईंधन की कीमतों में गिरावट से वित्त वर्ष 23 की तीसरी तिमाही से लागत में कम से कम 150-200 रुपये प्रति टन की बचत होने की उम्मीद है.
दिल्ली एनसीआर में बैन से पड़ा असर
सीमेंट कंपनियों के लिए दिल्ली एनसीआर एक बहुत बड़ा मार्केट है. हालांकि सरकार ने कुछ दिन पहले दिल्ली में निर्माण गतिविधियों पर रोक लगा दी. जिसके कारण दिल्ली एनसीआर में सभी निर्माण कार्यों पर रोक लग गई है. इससे प्रदूषण कितना कम हुआ ये तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इस बैन के कारण एक पूरी इंडस्ट्री पर बड़ा असर पड़ गया है. हालात ये हैं इनसे जुड़े हजारों लोगों पर इसका असर पड़ गया है.
क्या कहता है नरेडको
रियल स्टेट सेक्टर को लेकर काम करने वाली संस्था नरेडको के चेयरमैन प्रवीण जैन कहते हैं कि हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती मजदूरों को जुटाने की होती है. सरकार के बैन लगाते ही मजदूर चले जाते हैं और जब ये बैन हटता है तो उसके बाद मजदूरों को जुटाने में एक महीने का समय लगता है दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि अगर देखा जाए तो यही चार महीने होते हैं जब काम करने का सही समय होता है. लेकिन इसमें भी बैन लगा दिया जाता है. हमारी सरकार से मांग है कि हर साइट पर एक पल्यूशन कंट्रोल डिवाइस लगाई जाए जिसकी मॉनिटरिंग सरकार करे अगर कहीं भी प्रदूषण का स्तर बढ़ता है तो वहां काम बंद करा दिया जाए. वो बताते हैं कि इस संबंध में हमारी सरकार से बात भी हुई थी लेकिन वो लागू नहीं हो पाया. नतीजा ये है कि प्रोजेक्ट की कास्ट बढ़ जाती है और वो लेट हो जाते हैं.
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